देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 441–450
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 441–450
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४३२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ७ व्यास उवाच इति सञ्चिन्त्य मनसा मुनिर्नारायणस्तदा ॥ ८
विमर्शमकरोच्चित्ते सुखोत्पादनसाधने ।
द्वितीयोऽयं महाशत्रुः क्रोधः सन्तापकारकः ॥ ९
कामादप्यधिको लोके लोभादपि च दारुणः ।
क्रोधाभिभूतः कुरुते हिंसां प्राणविघातिनीम् ॥१०
दुःखदां सर्वभूतानां नरकारामदीर्घिकाम् ।
यथाग्निर्घर्षणाज्जातः पादपं प्रदहेत्तथा ॥ ११
देहोत्पन्नस्तथा क्रोधो देहं दहति दारुणः । व्यास उवाच इति सञ्चिन्त्यमानं तं भ्रातरं दीनमानसम् ॥ १२ उवाच वचनं तथ्यं नरो धर्मसुतोऽनुजः । नर उवाच नारायण महाभाग कोपं यच्छ महामते ॥ १३
शान्तं भावं समाश्रित्य नाशयाहङ्कृतिं पराम् ।
पुराहङ्कारदोषेण तपो नष्टं किलावयोः ॥ १४
संग्रामश्चाभवत्ताभ्यां भावाभ्यामसुरेण ह ।
दिव्यवर्षसहस्त्रं तु प्रह्लादेन महाद्भुतम् ॥ १५
दुःखं बहुतरं प्राप्तं तत्रावाभ्यां सुरोत्तम ।
तस्मात्क्रोधं परित्यज्य शान्तो भव मुनीश्वर ॥ १६
( शान्तत्वं तपसो मूलं मुनिभिः परिकीर्तितम् । ) व्यास उवाच इति तस्य वचः श्रुत्वा शान्तोऽभूद्धर्मनन्दनः । जनमेजय उवाच संशयोऽयं मुनिश्रेष्ठ प्रह्लादेन महात्मना ॥ १७
विष्णुभक्तेन शान्तेन कथं युद्धं कृतं पुरा ।
कृतवन्तौ कथं युद्धं नरनारायणावृषी ॥ १८
तापसौ धर्मपुत्रौ द्वौ सुशान्तमानसावुभौ ।
समागमः कथं जातस्तयोर्दैत्यसुतस्य च ॥ १ ९ ।
व्यासजी बोले – मुनि नारायणने ऐसा निश्चय करके अपने मनमें विचार किया कि सुख प्राप्तिके समस्त साधनोंमें [ अहंकारके बाद ] यह क्रोध दूसरा प्रबल शत्रु है, जो अत्यन्त कष्ट प्रदान करता है । यह क्रोध संसारमें काम तथा लोभसे भी अधिक भयंकर है । क्रोधके वशीभूत प्राणी प्राणघातक हिंसातक कर डालता है, जो ( हिंसा ) सभी प्राणियोंके लिये दुःखदायिनी तथा नरकरूपी बगीचेकी बावलीके तुल्य है । जिस प्रकार वृक्षोंके परस्पर घर्षणसे उत्पन्न अग्नि वृक्षको ही जला डालती है, उसी प्रकार शरीरसे उत्पन्न भीषण क्रोध उसी शरीरको जला डालता है ॥ ८–११३ ॥ व्यासजी बोले- इस प्रकार खिन्नमनस्क होकर चिन्तन करते हुए अपने भाई नारायणसे उनके लघु भ्राता धर्मपुत्र नरने यह तथ्यपूर्ण वचन कहा ॥ १२३ ॥
नर बोले- हे नारायण! हे महाभाग! हे महामते! आप क्रोधका त्याग कीजिये और शान्तभावका आश्रय लेकर इस प्रबल अहंकारका नाश कीजिये; क्योंकि पूर्व समय में इसी अहंकारके दोषसे हम दोनोंका तप विनष्ट हो गया था ॥ १३-१४ ॥ अहंकार तथा क्रोध - इन्हीं दोनों भावोंके कारण हमलोगोंको असुरराज प्रह्लादके साथ एक हजार दिव्य वर्षोंतक अत्यन्त अद्भुत युद्ध करना पड़ा था । हे सुरश्रेष्ठ! उस युद्धमें हम दोनोंको महान् क्लेश मिला था । अतएव हे मुनीश्वर! आप क्रोधका परित्याग करके शान्त हो जाइये ॥ १५-१६ ॥ ( मुनियोंने शान्तिको तपस्याका मूल बतलाया है । ) व्यासजी बोले – उनकी यह बात सुनकर धर्मपुत्र नारायण शान्त हो गये ॥ १६३ ॥
जनमेजय बोले- हे मुनिश्रेष्ठ! मेरे मनमें यह सन्देह उत्पन्न हो गया है कि शान्त स्वभाववाले विष्णुभक्त महात्मा प्रह्लादने पूर्वकालमें यह युद्ध क्यों किया और ऋषि नर - नारायणने भी संग्राम क्यों किया? ॥ १७-१८ ॥ धर्मपुत्र नर - नारायण – ये दोनों ही अत्यन्त शान्त स्वभाववाले तपस्वी थे । ऐसी स्थितिमें दैत्यपुत्र प्रह्लाद तथा उन दोनों ऋषियोंका सम्पर्क कैसे हुआ? ॥ १ ९ ॥
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अ ० ७ ] चतुर्थ स्कन्ध ४३३
संग्रामस्तु कथं ताभ्यां कृतस्तेन महात्मना ।
प्रह्लादोऽप्यतिधर्मात्मा ज्ञानवान्विष्णुतत्परः ॥
नरनारायणौ तद्वत्तापसौ सत्त्वसंस्थितौ ।
तेन ताभ्यां समुद्भूतं वैरं यदि परस्परम् ॥
तदा तपसि धर्मे च श्रम एव हि केवलम् ।
क्व जपः क्व तपश्चर्या पुरा सत्ययुगेऽपि च ॥
तादृशैर्न जितं चित्तं क्रोधाहङ्कारसंवृतम् ।
न क्रोधो न च मात्सर्यमहङ्कारांकुरं विना ॥
अहङ्कारात्समुत्पन्नाः कामक्रोधादयः किल ।
वर्षकोटिसहस्त्रं तु तपः कृत्वातिदारुणम् ॥
अहङ्कारांकुरे जाते व्यर्थं भवति सर्वथा ।
यथा सूर्योदये जाते तमोरूपं न तिष्ठति ॥
अहङ्कारांकुरस्याग्रे तथा पुण्यं न तिष्ठति ।
प्रह्लादोऽपि महाभाग हरिणा समयुध्यत ॥
तदा व्यर्थं कृतं सर्वं सुकृतं किल भूतले ।
नरनारायणौ शान्तौ विहाय परमं तपः ॥
कृतवन्तौ यदा युद्धं क्व शमः सुकृतं पुनः ।
ईदृग्भ्यां सत्त्वयुक्ताभ्यामजेया यद्यहङ्कृतिः ॥
मादृशानाञ्च का वार्ता मुनेऽहङ्कारसंक्षये ।
अहङ्कारपरित्यक्तो न कोऽप्यस्ति जगत्त्रये ॥
न भूतो भविता नैव यस्त्यक्तस्तेन सर्वथा ।
मुच्यते लोहनिगडैर्बद्धः काष्ठमयैस्तथा ॥
अहङ्कारनिबद्धस्तु न कदाचिद्विमुच्यते ।
अहङ्कारावृतं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥
प्रह्लाद भी अत्यन्त धर्मपरायण, ज्ञानसम्पन्न तथा २० विष्णुभक्त थे, तब महात्मा प्रह्लादने उन ऋषियोंके साथ युद्ध क्यों किया? ॥ २० ॥
तपस्वी नर - नारायण भी प्रह्लादकी ही भाँति सात्त्विक भाव सम्पन्न थे । उन दोनों ऋषियों तथा २१ प्रह्लादमें यदि परस्पर वैर उत्पन्न हो गया तो फिर उनकी तपस्या तथा धर्माचरणके पालनमें केवल परिश्रम ही उनके हाथ लगा । उस सत्ययुगमें भी उनके जप तथा २२ घोर तप कहाँ चले गये थे? ॥२१-२२ ॥ वैसे वे महात्मा भी क्रोध और अहंकारसे भरे अपने मनको वशमें नहीं कर सके । अहंकाररूपी २३ बीजके अंकुरित हुए बिना क्रोध तथा मात्सर्य उत्पन्न नहीं होते हैं । यह निश्चित है कि काम - क्रोध आदि अहंकारसे ही उत्पन्न होते हैं । हजार करोड़ वर्षोंतक २४ घोर तपस्या करनेके पश्चात् भी यदि अहंकारका अंकुरण हुआ तो फिर सब कुछ निरर्थक हो जाता है । जिस प्रकार सूर्योदय होनेपर अन्धकार नहीं २५ ठहरता, उसी प्रकार अहंकाररूपी अंकुरके समक्ष पुण्य नहीं ठहर पाता है ॥२३ – २५३ ॥ हे महाभाग! प्रह्लादने भी भगवान् नर - नारायणके २६ साथ संग्राम किया, जिसके कारण पृथ्वीपर उनके द्वारा अर्जित समस्त पुण्य व्यर्थ हो गया ॥ २६३ ॥
शान्त स्वभाववाले नर - नारायण भी अपनी २७ कठिन तपस्या त्यागकर यदि युद्ध करनेमें तत्पर हुए तो फिर उनकी शान्तिवृत्ति तथा पुण्यशीलताका क्या महत्त्व रहा? ॥ २७३ ॥
हे मुने! जब सात्त्विक भावोंसे सम्पन्न इस प्रकारके २८ वे दोनों महात्मा भी अहंकारपर विजय प्राप्त करनेमें असमर्थ रहे, तब मेरे जैसे व्यक्तियोंके लिये अहंकार नष्ट करनेकी बात ही क्या है? इस त्रिलोकमें ऐसा २ ९ कोई भी प्राणी नहीं है जो अहंकारसे मुक्त हो, इसी तरह ऐसा कोई भी न तो हुआ है और न होगा, जो अहंकारसे पूर्णतया मुक्त हो ॥ २८-२९ ३ ॥ ३० काष्ठ तथा लोहेकी जंजीरमें बँधा हुआ व्यक्ति बन्धनमुक्त हो सकता है, किंतु अहंकारसे बँधा व्यक्ति कभी भी नहीं छूट सकता । यह सम्पूर्ण चराचर जगत् ३१ अहंकारसे व्याप्त है ॥ ३०-३१ ॥
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४३४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ७
भ्रमत्येव हि संसारे विष्ठामूत्रप्रदूषिते ।
ब्रह्मज्ञानं कुतस्तावत्संसारे मोहसंवृते ॥
मतं मीमांसकानां वै सम्मतं भाति सुव्रत ।
महान्तोऽपि सदा युक्ताः कामक्रोधादिभिर्मुने ॥
मादृशानां कलावस्मिन्का कथा मुनिसत्तम । व्यास उवाच कार्यं वै कारणाद्भिन्नं कथं भवति भारत ॥
कटकं कुण्डलञ्चैव सुवर्णसदृशं भवेत् ।
अहङ्कारोद्भवं सर्वं ब्रह्माण्डं सचराचरम् ॥
पटस्तन्तुवशः प्रोक्तस्तद्वियुक्तः कथं भवेत् ।
मायागुणैस्त्रिभिः सर्वं रचितं स्थिरजङ्गमम् ॥
सतृणस्तम्बपर्यन्तं का तत्र परिदेवना ।
ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्रस्ते चाहङ्कारमोहिताः ॥
भ्रमन्त्यस्मिन्महागाधे संसारे नृपसत्तम ।
वसिष्ठनारदाद्याश्च मुनयो ज्ञानिनः परम् ॥
तेऽभिभूताः संसरन्ति संसारेऽस्मिन्पुनः पुनः ।
न कोऽप्यस्ति नृपश्रेष्ठ त्रिषु लोकेषु देहभृत् ॥
एभिर्मायागुणैर्मुक्तः शान्त आत्मसुखे स्थितः ।
कामक्रोधौ तथा लोभो मोहोऽहङ्कारसम्भवः ॥
न मुञ्चन्ति नरं सर्वं देहवन्तं नृपोत्तम ।
अधीत्य वेदशास्त्राणि पुराणानि विचिन्त्य च ॥
कृत्वा तीर्थाटनं दानं ध्यानञ्चैव सुरार्चनम् ।
करोति विषयासक्तः सर्वं कर्म च चौरवत् ॥
विचारयति नो पूर्वं काममोहमदान्वितः ।
कृते युगेऽपि त्रेतायां द्वापरे कुरुनन्दन ॥
विद्धोऽत्रास्ति च धर्मोऽपि का कथाद्य कलौ पुनः । अहंकारी मनुष्य मल- -मूत्रसे प्रदूषित इस संसारमें ३२ चक्कर काटता रहता है, तो फिर इस मोहाच्छन्न संसारमें ब्रह्मज्ञानकी कल्पना ही कहाँ रह गयी? ॥ ३२ ॥
हे सुव्रत! मुझे तो मीमांसकोंका कर्म - सिद्धान्त ३३ ही उचित प्रतीत होता है । हे मुने! जब महान् -से- से महान् लोग भी काम, क्रोध आदिसे सदा ग्रस्त रहते हैं, तब हे मुनिश्रेष्ठ! इस कलियुगमें मुझ जैसे लोगोंकी बात ही क्या? ॥ ३३३ ॥
३४ व्यासजी बोले- हे भारत ( जनमेजय )! कारणसे कार्य भिन्न कैसे हो सकता है? कड़ा तथा कुण्डल आकारमें भिन्न होते हुए भी स्वर्णके सदृश होते ३५ हैं । चराचरसहित समस्त ब्रह्माण्ड अहंकारसे उत्पन्न हुआ है । [ धागेसे निर्मित होनेके कारण ] वस्त्र उसके अधीन कहा गया है, अतएव वस्त्ररूपी ३६ कार्य तन्तुरूपी कारणसे पृथक् कैसे रह सकता है? जब मायाके तीनों गुणोंद्वारा ही तिनकेसे लेकर पर्वततक स्थावर - जंगमात्मक यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ३७ विरचित है, तब सृष्टिके विषयमें खेद किस बातका? हे नृपश्रेष्ठ! ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव भी अहंकारसे मोहित होकर इस अत्यन्त अगाध संसारमें भ्रमण ३८ करते रहते हैं । वसिष्ठ, नारद आदि परम ज्ञानी मुनिगण भी अहंकारके वशवर्ती होकर इस संसार में बार - बार आते - जाते रहते हैं । हे नृपश्रेष्ठ! तीनों ३ ९ लोकोंमें ऐसा कोई भी देहधारी नहीं है जो मायाके इन गुणोंसे मुक्त होकर शान्ति धारण करता हुआ आत्मसुखका अनुभव कर सके । हे नृपश्रेष्ठ! अहंकारसे ४० उत्पन्न काम, क्रोध, लोभ तथा मोह किसी भी देहधारी प्राणीको नहीं छोड़ते ॥ ३४-४०३ ॥ ४१ वेद - शास्त्रोंका अध्ययन, पुराणोंका पर्यालोचन, तीर्थभ्रमण, दान, ध्यान तथा देव- पूजन करके भी विषयासक्त प्राणी चोरोंकी भाँति सभी कर्म ४२ करता रहता है । काम, मोह और मदसे युक्त होनेके कारण प्राणी आरम्भमें कुछ विचार ही नहीं करता ॥ ४१–४२३ ॥ ४३ हे कुरुनन्दन! सत्ययुग, त्रेता तथा द्वापरमें भी धर्मका विरोध किया गया था, तो आज कलियुगमें
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अ ० ७ ] स्पर्धा सदैव सद्रोहा लोभामर्षौ च सर्वदा ॥
एवंविधोऽस्ति संसारो नात्र कार्या विचारणा ।
साधवो विरला लोके भवन्ति गतमत्सराः ॥
जितक्रोधा जितामर्षा दृष्टान्तार्थं व्यवस्थिताः । राजोवाच ते धन्याः कृतपुण्यास्ते मदमोहविवर्जिताः ॥
जितेन्द्रियाः सदाचारा जितं तैर्भुवनत्रयम् ।
दुनोमि पातकं स्मृत्वा पितुर्मम महात्मनः ॥
कृतस्तपस्विनः कण्ठे मृतसर्पों ह्यघं विना ।
अतस्तस्य मुनिश्रेष्ठ भविता किं ममाग्रतः ॥
न जाने बुद्धिसम्मोहात्किं वा कार्यं भविष्यति ।
मधु पश्यति मूढात्मा प्रपातं नैव पश्यति ॥
करोति निन्दितं कर्म नरकान्न बिभेति च ।
कथं युद्धं पुरा वृत्तं विस्तरात्तद्वदस्व मे ॥
प्रह्लादेन यथा चोग्रं नरनारायणस्य वै ।
प्रह्लादस्तु कथं यातः पातालात्तद्वदस्व मे ॥
सारस्वते महातीर्थे पुण्ये बदरिकाश्रमे ।
नरनारायणौ शान्तौ तापसौ मुनिसत्तमौ ॥
कृतवन्तौ तथा युद्धं हेतुना केन मानद ।
वैरं भवति वित्तार्थं दारार्थं वा परस्परम् ॥
एषणारहितौ कस्माच्चक्रतुः प्रधनं महत् ।
प्रह्लादोऽपि च धर्मात्मा ज्ञात्वा देवौ सनातनौ ॥
कृतवान्स कथं युद्धं नरनारायणौ मुनी ।
एतद्विस्तरतो ब्रह्मञ्छ्रोतुमिच्छामि कारणम् ॥
चतुर्थ स्कन्ध ४३५ ४४ | उसकी बात ही क्या! इसमें तो द्रोह, स्पर्धा, लोभ तथा क्रोध सर्वदा ही विद्यमान हैं । संसार ऐसे ही स्वभाववाला है; इस विषयमें सन्देह नहीं करना ४५ चाहिये । संसारमें मत्सरहीन साधु पुरुष विरले ही होते हैं । क्रोध तथा ईर्ष्यापर विजय प्राप्त कर लेनेवाले तो दृष्टान्तमात्र के लिये मिलते हैं ॥ ४३ - ४५३ ॥ राजा बोले — वे लोग धन्य तथा पुण्यात्मा हैं, ४६ जिन्होंने मद तथा मोहसे छुटकारा प्राप्त कर लिया है । जो सदाचारपरायण तथा जितेन्द्रिय हैं, उन्होंने मानो तीनों लोकोंपर विजय प्राप्त कर ली है । अपने महात्मा ४७ पिताके पापका स्मरण करके मैं दु: खित रहता हूँ । उन्होंने बिना किसी अपराधके एक तपस्वीके गलेमें ४८ मरा हुआ सर्प डाल दिया । अतः हे मुनिवर! अब मेरे आगे उनकी क्या गति होगी? बुद्धिके मोहग्रस्त हो जानेपर क्या कार्य हो जायगा, यह मैं नहीं जानता । ४ ९ मूर्ख मनुष्य केवल मधु देखता है, किंतु उसके पास ही विद्यमान [ गहरे ] प्रपातकी ओर नहीं निहारता । वह निन्दनीय कर्म करता रहता है और नरकसे नहीं ५० डरता ॥ ४६–४९ ३ ॥ [ हे मुने! ] अब आप मुझे विस्तारपूर्वक यह बताइये कि पूर्वकालमें प्रह्लादके साथ नर-५१ नारायणका घोर युद्ध क्यों हुआ था? प्रह्लाद पाताल-लोकसे सारस्वत महातीर्थ पवित्र बदरिकाश्रममें कैसे पहुँचे, यह भी मुझे बताइये । शान्त स्वभाववाले ५२ मुनिश्रेष्ठ नर - नारायण तो महान् तपस्वी थे; तब हे मानद! उन दोनोंने प्रह्लादके साथ युद्ध किस कारणसे ५३ किया? ॥ ५०–५२३ ॥ प्रायः धन अथवा स्त्रीके लिये लोगों में परस्पर शत्रुता होती है । तब हर प्रकारकी इच्छाओंसे रहित ५४ उन दोनोंने वह भीषण युद्ध क्यों किया और उन नर-नारायणको सनातन देवता जानते हुए भी महात्मा प्रह्लादने उनके साथ युद्ध क्यों किया? हे ब्रह्मन्! मैं विस्तारपूर्वक ५५ । इसका कारण सुनना चाहता हूँ ॥ ५३ - ५५ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे अहङ्कारावर्तनवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥७ ॥
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४३६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ८ अथाष्टमोऽध्यायः व्यासजीद्वारा राजा जनमेजयको प्रह्लादकी कथा सुनाना और इस प्रसंगमें च्यवनॠषिके पाताललोक जानेका वर्णन सूत उवाच
इति पृष्टस्तदा विप्रो राज्ञा पारीक्षितेन वै ।
उवाच विस्तरात्सर्वं व्यासः सत्यवतीसुतः ॥ १
जनमेजयोऽपि धर्मात्मा निर्वेदं परमं गतः ।
चित्तं दुश्चरितं मत्वा वैराटीतनयस्य वै ॥२
तस्यैवोद्धरणार्थाय चकार सततं मनः ।
विप्रावमानपापेन यमलोकं गतस्य वै ॥ ३
पुन्नामनरकाद्यस्मात्त्रायते पितरं स्वकम् ।
पुत्रेति नाम सार्थं स्यात्तेन तस्य मुनीश्वराः ॥ ४
सर्पदष्टं नृपं श्रुत्वा हर्योपरि मृतं तथा ।
विप्रशापादौत्तरेयं स्नानदानविवर्जितम् ॥५
पितुर्गतिं निशम्यासौ निर्वेदं गतवान्नृपः ।
पारीक्षितो महाभागः सन्तप्तो भयविह्वलः ॥ ६
पप्रच्छाथ मुनिं व्यासं गृहागतमनिन्दितः ।
नरनारायणस्येमां कथां परमविस्तृताम् ॥ ७
व्यास उवाच
स यदा निहतो रौद्रो हिरण्यकशिपुर्नृप ।
अभिषिक्तस्तदा राज्ये प्रह्लादो नाम तत्सुतः ॥ ८
तस्मिञ्छासति दैत्येन्द्रे देवब्राह्मणपूजके ।
मखैर्भूमौ नृपतयो यजन्तः श्रद्धयान्विताः ॥ ९
ब्राह्मणाश्च तपोधर्मतीर्थयात्राश्च कुर्वते ।
वैश्याश्च स्वस्ववृत्तिस्था: शूद्राः शुश्रूषणे रताः ॥ १०
सूतजी बोले- परीक्षित् - पुत्र राजा जनमेजयके यह पूछनेपर सत्यवतीसुत विप्र व्यासजीने विस्तारपूर्वक सारा वृत्तान्त बताया ॥१ ॥
धर्मपरायण राजा जनमेजय भी उत्तरापुत्र अपने पिता परीक्षित्की कुत्सित चेष्टाको सोच - सोचकर अत्यन्त दुःखी हो गये थे ॥ २ ॥
विप्रको अपमानित करनेके परिणामस्वरूप पापके कारण यमलोकको प्राप्त अपने उन पिताके उद्धारके लिये वे निरन्तर अपने मनमें अनेक प्रकारके उपाय सोचा करते थे ॥ ३ ॥
हे मुनीश्वरो! जब पुत्र अपने पिताकी ‘ पुम् ' नामक नरकसे रक्षा कर देता है, तभी उसका ' पुत्र ' नाम सार्थक होता है ॥४ ॥
जब उन्हें यह विदित हुआ कि एक महलकी ऊपरी मंजिल में स्नान - दान किये बिना ही विप्रके शापवश सर्प दंशसे महाराज परीक्षित्की मृत्यु हुई थी, तब अपने पिताकी दुर्गति सुनकर वे राजा जनमेजय अत्यन्त दुःखित हुए और शोक सन्तप्त तथा भयसे व्याकुल हो उठे॥५-६ ॥ इसके अनन्तर निष्पाप राजा जनमेजयने अपने घरपर स्वतः आये हुए महामुनि व्याससे नर - नारायणकी अति विस्तृत इस कथाके विषयमें पूछा ॥७ ॥
व्यासजी बोले — हे राजन्! जब नृसिंहभगवान्के द्वारा उस भयानक हिरण्यकशिपुका वध हो गया, तब प्रह्लाद नामक उसके पुत्रका राज्याभिषेक किया गया ॥ ८ ॥
देवताओं तथा ब्राह्मणोंका पूजन- सम्मान करनेवाले उस दैत्यराज प्रह्लादके शासनकालमें पृथ्वी-लोकके सभी राजागण श्रद्धापूर्वक यज्ञादिका अनुष्ठान करने लगे॥९॥
ब्राह्मणलोग तपश्चरण, धर्मानुष्ठान तथा तीर्थाटनमें तत्पर हो गये; वैश्यसमुदाय अपने - अपने व्यावसायिक कार्योंमें लग गये तथा शूद्रगण सेवापरायण हो गये ॥ १० ॥
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अ ० ८ ] ४३७
नृसिंहेन च पाताले स्थापितः सोऽथ दैत्यराट् ।
राज्यं चकार तत्रैव प्रजापालनतत्परः ॥
कदाचिद् भृगुपुत्रोऽथ च्यवनाख्यो महातपाः ।
जगाम नर्मदां स्नातुं तीर्थं वै व्याहृतीश्वरम् ॥
रेवां महानदीं दृष्ट्वा ततस्तस्यामवातरत् ।
उत्तरन्तं प्रजग्राह नागो विषभयङ्करः ॥
गृहीतो भयभीतस्तु पाताले मुनिसत्तमः ।
सस्मार मनसा विष्णुं देवदेवं जनार्दनम् ॥
संस्मृते पुण्डरीकाक्षे निर्विषोऽभून्महोरगः ।
न प्राप च्यवनो दुःखं नीयमानो रसातलम् ॥
द्विजिह्वेन मुनित्यक्तो निर्विण्णेनातिशङ्किना ।
मां शपेत मुनिः क्रुद्धस्तापसोऽयं महानिति ॥
चचार नागकन्याभिः पूजितो मुनिसत्तमः ।
विवेशाप्यथ नागानां दानवानां महत्पुरम् ॥
कदाचिद् भृगुपुत्रं तं विचरन्तं पुरोत्तमे ।
ददर्श दैत्यराजोऽसौ प्रह्लादो धर्मवत्सलः ॥
दृष्ट्वा तं पूजयामास मुनिं दैत्यपतिस्तदा ।
पप्रच्छ कारणं किं ते पातालागमने वद ॥
प्रेषितोऽसि किमिन्द्रेण सत्यं ब्रूहि द्विजोत्तम ।
दैत्यविद्वेषयुक्तेन मम राज्यदिदृक्षया ॥
च्यवन उवाच
किं मे मघवता राजन् यदहं प्रेषितः पुनः ।
दूतकार्यं प्रकुर्वाणः प्राप्तवान्नगरे तव ॥
नृसिंहभगवान्ने उस दैत्यराज प्रह्लादको पाताललोकके ११ राजसिंहासनपर स्थापित कर दिया था और वे वहीं पर प्रजापालनमें तत्पर होकर राज्य करने लगे ॥ ११ ॥
एक बार भृगुके पुत्र महातपस्वी च्यवन नर्मदामें स्नान करनेके लिये व्याहृतीश्वर नामक तीर्थमें पहुँचे ॥ १२ ॥
१२ वहाँपर रेवा नामक महानदीको देखकर वे उसमें उतरने लगे । इसी बीच एक भयंकर विषधर सर्पने उतरते हुए मुनिको पकड़ लिया ॥ १३ ॥
१३ तदनन्तर उन महामुनि च्यवनको वह नागराज खींचकर पाताललोकमें ले गया । तब उन भयाक्रान्त मुनिने मन - ही - मन देवाधिदेव जनार्दन विष्णुका १४ स्मरण किया ॥ १४ ॥
मुनि च्यवनके द्वारा हृदयसे कमलनयन भगवान् विष्णुका स्मरण किये जानेपर वह भयंकर सर्प विषहीन हो गया । अतएव रसातलमें ले जाये गये उन १५ मुनिको कष्ट नहीं हुआ ॥ १५ ॥
तत्पश्चात् अत्यन्त दुःखी तथा सशंकित उस सर्पने यह सोचकर उन्हें छोड़ दिया कि ये महातपस्वी १६ मुनि क्रोधित होकर कहीं मुझे शाप न दे दें ॥ १६ ॥
वहाँकी नागकन्याओंद्वारा पूजित होते हुए मुनिश्रेष्ठ च्यवन पाताललोकमें विचरण करने लगे । वे १७ नागों तथा दानवोंके विशाल पुरमें भी आने - जाने लगे ॥ १७ ॥
एक बार उन धर्मानुरागी दैत्यराज प्रह्लादने अपनी श्रेष्ठ पुरीमें विचरण करते हुए उन भृगुपुत्र मुनि १८ च्यवनको देखा ॥१८ ॥
मुनिको देखकर दैत्यराज प्रह्लादने उनकी पूजा की और उनसे पूछा कि पाताललोकमें आपके ९९ आगमनका क्या कारण है, आप मुझे बताइये? ॥ १ ९ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ! क्या दैत्योंके प्रति द्वेष - - भाव : रखनेवाले इन्द्रने मेरे राज्यके विषयमें जानकारीके २० लिये आपको यहाँ भेजा है? आप मुझे सच - सच बताइये ॥ २० ॥
च्यवन बोले – हे राजन्! इन्द्रसे मेरा क्या प्रयोजन है, जो कि वे मुझे यहाँ भेजें और मैं उनके दूतका कार्य करता हुआ आपके नगरमें घूमता २१ | फिरूँ? ॥ २१ ॥
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४३८ विद्धि मां भृगुपुत्रं तं स्वनेत्रं धर्मतत्परम् मा शङ्कां कुरु दैत्येन्द्र वासवप्रेषितस्य वै स्नानार्थं नर्मदां प्राप्तः पुण्यतीर्थे नृपोत्तम नद्यामेवावतीर्णोऽहं गृहीतश्च महाहिना जातोऽसौ निर्विषः सर्पो विष्णोः संस्मरणादिव मुक्तोऽहं तेन नागेन प्रभावात्स्मरणस्य वै अत्रागतेन राजेन्द्र मयाप्तं तव दर्शनम् विष्णुभक्तोऽसि दैत्येन्द्र तद्भक्तं मां विचिन्तय व्यास उवाच तन्निशम्य वचः श्लक्ष्णं हिरण्यकशिपोः सुतः पप्रच्छ परया प्रीत्या तीर्थानि विविधानि च प्रह्लाद उवाच पृथिव्यां कानि तीर्थानि पुण्यानि मुनिसत्तम पाताले च तथाकाशे तानि नो वद विस्तरात् ॥ च्यवन उवाच मनोवाक्कायशुद्धानां राजंस्तीर्थं पदे पदे तथा मलिनचित्तानां गङ्गापि कीकटाधिका प्रथमं चेन्मनः शुद्धं जातं पापविवर्जितम् तदा तीर्थानि सर्वाणि पावनानि भवन्ति वै गङ्गातीरे हि सर्वत्र वसन्ति नगराणि च श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ८ । हे दैत्यराज! आप मुझे महर्षि भृगुका ॥ २२ धर्मनिष्ठ तथा ज्ञाननेत्रसम्पन्न पुत्र च्यवन जानिये । आप मेरे प्रति इन्द्रके द्वारा भेजे गये किसी दूतकी । शंका मत करें ॥ २२ ॥
॥ २३ हे नृपश्रेष्ठ! मैं नर्मदानदीमें स्नान करनेके लिये पुण्यतीर्थमें गया था । मैं नदीमें उतरा ही था कि एक
।
विशाल सर्पने मुझे पकड़ लिया ॥ २३ ॥
॥ २४
मेरे द्वारा भगवान् विष्णुका स्मरण करनेसे वह । सर्प विषहीन हो गया और विष्णुस्मरणके प्रभावसे मैं ॥ २५ उस नागसे मुक्त हो गया ॥२४ ॥
हे राजेन्द्र! यहाँ आनेसे मुझे आपका दर्शन प्राप्त हो गया । हे दैत्यराज! आप भगवान् विष्णुके भक्त हैं । और मुझे भी उनका भक्त ही समझिये ॥ २५ ॥
॥ २६ व्यासजी बोले – महर्षि च्यवनका मधुर वचन सुनकर हिरण्यकशिपुपुत्र प्रह्लाद अत्यन्त प्रेमपूर्वक नानाविध तीर्थोंके विषयमें उनसे पूछने लगे ॥ २६ ॥
। प्रह्लाद बोले - हे मुनिश्रेष्ठ! पृथ्वी, पाताल २७ तथा आकाशमें कौन - कौनसे पवित्र तीर्थ हैं? उनके सम्बन्धमें विस्तारपूर्वक मुझे बताइये ॥ २७ ॥
। च्यवन बोले - हे राजन्! मन, वचन तथा ॥ २८ कर्मसे शुद्ध प्राणियोंके लिये तो पद - पदपर तीर्थ हैं, किंतु दूषित मनवाले प्राणियोंके लिये गंगा भी मगधसे । अधिक अपवित्र हो जाती हैं ॥ २८ ॥
॥ २ ९ यदि मनुष्यका मन शुद्ध तथा पापरहित हो गया तो उसके लिये सभी तीर्थ पवित्र हो जाते हैं । गंगा । तटपर तो सर्वत्र नानाविध नगर, गोष्ठ ( गायोंका व्रजाश्चैवाकरा ग्रामाः सर्वे खेटास्तथापरे ॥ ३० बाड़ा ), बाजार, गाँव तथा अनेक कस्बे वहाँ बसे हैं । निषादानां निवासाश्च कैवर्तानां तथापरे हूणबङ्गखसानां च म्लेच्छानां दैत्यसत्तम पिबन्ति सर्वदा गाङ्गं जलं ब्रह्मोपमं सदा स्नानं कुर्वन्ति दैत्येन्द्र त्रिकालं स्वेच्छया जनाः तत्रैकोऽपि विशुद्धात्मा न भवत्येव मारिष किं फलं तर्हि तीर्थस्य विषयोपहतात्मसु । हे दैत्यराज! निषादों, धीवरों, हूणों, बंगों, खसों तथा म्लेच्छ जातियोंका निवास भी वहाँ रहता है । है ॥ ३१ दैत्येन्द्र! वे सदैव ब्रह्मसदृश गंगाजलका पान करते हैं । और अपनी इच्छासे त्रिकाल गंगा स्नान भी करते हैं । ॥। ३२ किंतु हे धर्मात्मन्! उनमें से कोई एक भी शुद्ध अन्तःकरणवाला नहीं हो पाता । तब नानाविध वासनाओंसे । प्रदूषित चित्तवाले लोगोंके लिये तीर्थका क्या फल हो ॥ ३३ | सकता है? ॥ २ ९ -३३ ॥
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अ ० ८ ]
कारणं मन एवात्र नान्यद्राजन्विचिन्तय ।
मनःशुद्धिः प्रकर्तव्या सततं शुद्धिमिच्छता ॥
तीर्थवासी महापापी भवेत्तत्रात्मवञ्चनात् ।
तत्रैवाचरितं पापमानन्त्याय प्रकल्पते ॥
यथेन्द्रवारुणं पक्वं मिष्टं नैवोपजायते ।
भावदुष्टस्तथा तीर्थे कोटिस्नातो न शुध्यति ॥
प्रथमं मनसः शुद्धिः कर्तव्या शुभमिच्छता ।
शुद्धे मनसि द्रव्यस्य शुद्धिर्भवति नान्यथा ॥
तथैवाचारशुद्धिः स्यात्ततस्तीर्थं प्रसिध्यति ।
अन्यथा तु कृतं सर्वं व्यर्थं भवति तत्क्षणात् ॥
( हीनवर्णस्य संसर्गं तीर्थे गत्वा सदा त्यजेत् । )
भूतानुकम्पनं चैव कर्तव्यं कर्मणा धिया ।
यदि पृच्छसि राजेन्द्र तीर्थं वक्ष्याम्यनुत्तमम् ॥
प्रथमं नैमिषं पुण्यं चक्रतीर्थं च पुष्करम् ।
अन्येषां चैव तीर्थानां संख्या नास्ति महीतले ॥
पावनानि च स्थानानि बहूनि नृपसत्तम । व्यास उवाच तच्छ्रुत्वा वचनं राजा नैमिषं गन्तुमुद्यतः ॥ नोदयामास दैत्यान्वै हर्षनिर्भरमानसः । प्रह्लाद उवाच उत्तिष्ठन्तु महाभागा गमिष्यामो ऽद्य नैमिषम् ॥ द्रक्ष्यामः पुण्डरीकाक्षं पीतवाससमच्युतम् । चतुर्थ स्कन्ध ४३ ९ हे राजन्! आप यह निश्चित समझिये कि मन ही इसमें प्रमुख कारण है; इसके अतिरिक्त दूसरा कुछ ३४ नहीं । अतः शुद्धिकी इच्छा रखनेवाले प्राणीको निरन्तर अपने मनको शुद्ध बनाये रखना चाहिये ॥ ३४ ॥
तीर्थमें निवास करनेवाला प्राणी भी आत्मवंचनाके ३५ कारण महापापी हो जाता है । वहाँ किया गया पाप अनन्तगुना हो जाता है ॥ ३५ ॥
जिस प्रकार इन्द्रवारुणका फल पक जानेपर भी मीठा नहीं होता, उसी प्रकार दूषित भावनाओंवाला मनुष्य ३६ तीर्थमें करोड़ों बार स्नान करके भी पवित्र नहीं हो पाता ॥ ३६ ॥
अतः कल्याणकी कामना करनेवाले पुरुषको ३७ सर्वप्रथम अपने मनको शुद्ध कर लेना चाहिये । मनके शुद्ध हो जानेपर द्रव्यशुद्धि स्वतः हो जाती है; इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है ॥ ३७ ॥
उसी प्रकार आचार - शुद्धि भी आवश्यक है; ३८ इसके अनन्तर ही तीर्थयात्राकी पूर्ण सिद्धि होती है । इसके विपरीत उसका किया हुआ सारा कर्म उसी क्षण व्यर्थ हो जाता है ॥ ३८ ॥
( तीर्थमें पहुँचकर नीच प्राणीके संसर्गका सर्वदाके लिये त्याग कर देना चाहिये । ) कर्म तथा बुद्धिसे ३ ९ प्राणियोंके प्रति सदा दयाभाव रखना चाहिये । फिर भी हे राजेन्द्र! यदि आप पूछते ही हैं तो मैं आपको प्रमुख तीर्थोंके विषयमें बता रहा हूँ ॥३ ९ ॥ ४० प्रथम श्रेणीका तीर्थ पुण्यमय नैमिषारण्य है । इसी प्रकार चक्रतीर्थ, पुष्करतीर्थ तथा अन्य भी अनेक तीर्थ पृथ्वीलोकमें हैं, जिनकी संख्या निश्चित नहीं है । हे नृपश्रेष्ठ! और भी बहुत - से पवित्र स्थान हैं ॥ ४० ॥
व्यासजी बोले- च्यवनऋषिका वचन सुनकर ४१ राजा प्रह्लाद नैमिषारण्यतीर्थ जानेको तैयार हो गये । हर्षातिरेकसे परिपूर्ण हृदयवाले प्रह्लादने अन्य दैत्योंको भी चलनेकी आज्ञा दी ॥ ४१३ ॥
प्रह्लाद बोले – हे महाभाग दैत्यगण! आपलोग उठिये, हम सभी लोग आज नैमिषारण्य चलेंगे । वहाँ ४२ हमलोग पीताम्बर धारण करनेवाले कमलनयन भगवान् अच्युत ( विष्णु ) - का दर्शन करेंगे ॥ ४२३ ॥
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४४० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ९ व्यास उवाच इत्युक्ता विष्णुभक्तेन सर्वे ते दानवास्तदा ॥ ४३
तेनैव सह पातालान्निर्ययुः परया मुदा ।
ते समेत्य च दैतेया दानवाश्च महाबलाः ॥ ४४
नैमिषारण्यमासाद्य स्नानं चक्रुर्मुदान्विताः ।
प्रह्लादस्तत्र तीर्थेषु चरन्दैत्यैः समन्वितः ॥ ४५
सरस्वतीं महापुण्यां ददर्श विमलोदकाम् ।
तीर्थे तत्र नृपश्रेष्ठ प्रह्लादस्य महात्मनः ॥ ४६
मनः प्रसन्नं सञ्जातं स्नात्वा सारस्वते जले ।
विधिवत्तत्र दैत्येन्द्रः स्नानदानादिकं शुभे ॥ ४७
चकारातिप्रसन्नात्मा तीर्थे परमपावने ॥ ४८
व्यासजी बोले – विष्णुभक्त प्रह्लादके ऐसा कहनेपर वे समस्त दानव परम प्रसन्नतापूर्वक उनके साथ पाताललोकसे निकल पड़े । उन महाबली दैत्यों तथा दानवोंने एक साथ नैमिषारण्य पहुँचकर आनन्दपूर्वक स्नान किया । दैत्योंके साथ वहाँके तीर्थोंमें भ्रमण करते हुए प्रह्लादने स्वच्छ जलसे परिपूर्ण तथा महापुण्यदायिनी सरस्वतीनदीका दर्शन किया । हे नृपश्रेष्ठ! उस पवित्र तीर्थमें सरस्वतीके जलमें स्नान करनेसे महात्मा प्रह्लादका मन प्रसन्न हो गया । दैत्येन्द्र प्रह्लादने उस शुभ तथा परम पावन तीर्थमें प्रसन्न मनसे स्नान, दान । आदि कर्म विधिवत् सम्पन्न किये ॥ ४३–४८ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे प्रह्लादतीर्थयात्रावर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
अथ नवमोऽध्यायः प्रह्लादजीका तीर्थयात्राके क्रममें नैमिषारण्य पहुँचना और वहाँ नर - नारायणसे उनका घोर युद्ध, भगवान् विष्णुका आगमन और उनके द्वारा प्रह्लादको नर व्यास उवाच
कुर्वंस्तीर्थविधिं तत्र हिरण्यकशिपोः सुतः ।
न्यग्रोधं सुमहच्छायमपश्यत्पुरतस्तदा ॥
ददर्श बाणानपरान्नानाजातीयकांस्तदा ।
गृध्रपक्षयुतांस्तीव्राञ्छिलाधौतान्महोज्ज्वलान् ॥
चिन्तयामास मनसा कस्येमे विशिखास्त्विह ।
ऋषीणामाश्रमे पुण्ये तीर्थे परमपावने ॥
एवं चिन्तयतानेन कृष्णाजिनधरौ मुनी ।
समुन्नतजटाभारौ दृष्टौ धर्मसुतौ तदा ॥
तयोरग्रे धृते शुभ्रे धनुषी लक्षणान्विते ।
शार्ङ्गमाजगवञ्चैव तथाक्षय्यौ महेषुधी ॥
- नारायणका परिचय देना व्यासजी बोले – [ हे राजन्! ] इस प्रकार तीर्थके कृत्य सम्पन्न करते हुए हिरण्यकशिपुपुत्र प्रह्लादको अपने समक्ष एक विशाल छायासम्पन्न १ वटवृक्ष दिखायी पड़ा ॥१ ॥
वहाँपर प्रह्लादने गीधोंके पंखोंसे सुसज्जित, नुकीले तथा शिलापर घर्षित करके अत्यन्त दीप्त २ एवं उज्ज्वल बनाये गये अनेक प्रकारके बाण देखे ॥२ ॥
उन्हें देखकर प्रह्लादने मनमें सोचा कि इस परम पवित्र तीर्थमें ऋषियोंके पुण्यमय आश्रममें ये बाण ३ किसके हैं? ॥३ ॥
इस प्रकार चिन्तन करते हुए प्रह्लादने कृष्ण-मृगचर्म धारण किये हुए तथा सिरपर विशाल जटाओंसे सुशोभित धर्मपुत्र नर - नारायण मुनियोंको ४ देखा ॥ ४ ॥
उनके आगे धनुर्वेदोक्त लक्षणोंसे सम्पन्न चमकीले शार्ङ्ग तथा आजगव नामक दो धनुष तथा ५ । दो अक्षय तरकस रखे हुए थे ॥ ५ ॥
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अ ० ९ ]
ध्यानस्थौ तौ महाभागौ नरनारायणावृषी ।
दृष्ट्वा धर्मसुतौ तत्र दैत्यानामधिपस्तदा ॥
क्रोधरक्तेक्षणस्तौ तु प्रोवाचासुरपालकः ।
किं भवद्भ्यां समारब्धो दम्भो धर्मविनाशनः ॥
न श्रुतं नैव दृष्टं हि संसारेऽस्मिन्कदापि हि ।
तपसश्चरणं तीव्रं तथा चापस्य धारणम् ॥
विरोधोऽयं युगे चाद्ये कथं युक्तं कलिप्रियम् ।
ब्राह्मणस्य तपो युक्तं तत्र किं चापधारणम् ॥
क्व जटाधारणं देहे क्वेषुधी च विडम्बनौ ।
धर्मस्याचरणं युक्तं युवयोर्दिव्यभावयोः ॥
व्यास उवाच
इति तस्य वचः श्रुत्वा नरः प्रोवाच भारत ।
का ते चिन्तात्र दैत्येन्द्र वृथा तपसि चावयोः ॥
सामर्थ्ये सति यत्कुर्यात्तत्संपद्येत तस्य हि ।
आवां कार्यद्वये मन्द समर्थौ लोकविश्रुतौ ॥
युद्धे तपसि सामर्थ्यं त्वं पुनः किं करिष्यसि ।
गच्छ मार्गे यथाकामं कस्मादत्र विकत्थसे ॥
ब्रह्मतेजो दुराराध्यं न त्वं वेद विमोहितः ।
विप्रचर्चा न कर्तव्या प्राणिभिः सुखमीप्सुभिः ॥
प्रह्लाद उवाच
तापसौ मन्दबुद्धी स्थो मृषा वां गर्वमोहितौ ।
मयि तिष्ठति दैत्येन्द्रे धर्मसेतुप्रवर्तके ॥
चतुर्थ स्कन्ध ४४१ उन महाभाग धर्मपुत्र नर - नारायण ऋषियोंको उस समय ध्यानावस्थित देखकर क्रोधसे लाल आँखें ६ किये हुए दैत्याधिपति असुररक्षक प्रह्लादने उनसे कहा- आप दोनोंने धर्मको नष्ट करनेवाला यह कैसा पाखण्ड कर रखा है? ॥ ६-७ ॥ ७ इस प्रकारकी घोर तपस्या तथा धनुष - धारण करना - ऐसा तो इस संसारमें न कभी सुना गया और न देखा ही गया ॥ ८ ॥
ये तो परस्पर विरोधी स्थितियाँ हैं । कलियुग ८ लिये प्रिय यह विरोधभाव भला सत्ययुगमें किस प्रकार उचित है? ब्राह्मणके लिये तो तपश्चरण ही उचित है, उन्हें धनुष धारण करनेकी क्या आवश्यकता है? ॥ ९ कहाँ तो मस्तकपर जटा धारण करना और कहाँ यह तरकस रखना - ये दोनों बातें आडम्बरमात्र हैं । दिव्य भावनावाले आप दोनोंके लिये धर्मका आचरण १० ही उचित है ॥ १० ॥
व्यासजी बोले -- हे भारत! प्रह्लादका यह वचन सुनकर मुनिवर नरने कहा - हे दैत्येन्द्र! हम दोनोंकी तपस्याके विषयमें आप यह व्यर्थ चिन्ता क्यों कर रहे हैं? ॥ ११ ॥
११ सामर्थ्यसम्पन्न हो जानेपर व्यक्ति जो कुछ करता है, उसका वह सब कुछ पूर्ण हो जाता है । हे मन्दबुद्धि! हम इन दोनों प्रकारके कार्योंको [ एक १२ साथ ] करनेमें समर्थ हैं; इसके लिये हम लोकमें प्रसिद्ध हैं ॥१२ ॥
युद्ध तथा तपस्या दोनोंमें हम समान रूपसे समर्थ हैं । फिर इस विषयमें आप पूछकर क्या करेंगे? १३ आप इच्छानुसार अपने रास्ते चले जाइये, यहाँ व्यर्थकी बात क्यों कर रहे हैं? ॥ १३ ॥
मोहग्रस्त होनेके कारण आप अत्यन्त कठिनतासे १४ प्राप्त किये जानेवाले ब्रह्मतेजको नहीं जानते । सुखकी कामना करनेवाले प्राणियोंको ब्राह्मणोंसे बहस नहीं करनी चाहिये ॥१४ ॥
प्रह्लाद बोले- आप दोनों तपस्वी मन्द बुद्धिवाले हैं और व्यर्थ ही अहंकारके वशवर्ती हो गये हैं । १५ | धर्मसेतुका प्रवर्तन करनेवाले मुझ दैत्येन्द्र प्रह्लादके रहते