देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 451–460

देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 451–460

पृष्ठ 451

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४४२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ९ न युक्तमेतत्तीर्थेऽस्मिन्नधर्माचरणं पुनः । का शक्तिस्तव युद्धेऽस्ति दर्शयाद्य तपोधन । व्यास उवाच

तदाकर्ण्य वचस्तस्य नरस्तं प्रत्युवाच ह ।

युद्धस्वाद्य मया सार्धं यदि ते मतिरीदृशी ॥

अद्य ते स्फोटयिष्यामि मूर्धानमसुराधम । ( युद्धे श्रद्धा न ते पश्चाद्भविष्यति कदाचन । ) व्यास उवाच तन्निशम्य वचस्तस्य दैत्येन्द्रः कुपितस्तदा ॥

प्रह्लादो बलवानत्र प्रतिज्ञामारुरोह सः ।

येन केनाप्युपायेन जेष्यामि तावुभावपि ॥

दान्तावृषी तपिसमन्वितौ । व्यास उवाच इत्युक्त्वा वचनं दैत्यः प्रतिगृह्य शरासनम् ॥

आकृष्य तरसा चापं ज्याशब्दञ्च चकार ह ।

नरोऽपि धनुरादाय शरांस्तीव्राञ्छिलाशितान् ॥

मुमोच बहुशः क्रोधात्प्रह्लादोपरि पार्थिव ॥

तान्दैत्यराजस्तपनीयपुङ्खै-श्चिच्छेद बाणैस्तरसा समेत्य ।

समीक्ष्य छिन्नांश्च नरः स्वसृष्टा-नन्यान्मुमोचाशु रुषान्वितो वै ॥

दैत्याधिपस्तानपि तीव्रवेगै-श्छित्त्वा जघानोरसि तं मुनीन्द्रम् । नरोऽपि तं पञ्चभिराशुगैश्च क्रुद्धोऽहनद्दैत्यपतिं बाहुदेशे ॥ सेन्द्राः सुरास्तत्र तयोर्हि युद्धं द्रष्टुं विमानैर्गगनस्थिताश्च । नरस्य वीर्यं युधि संस्थितस्य ते तुष्टुवुर्दैत्यपतेश्च भूयः ॥ वर्ष दैत्याधिप आत्तचापः शिलीमुखानम्बुधरो यथापः । आदाय शार्ङ्ग धनुरप्रमेयं मुमोच बाणाञ्छितहेमपुङ्खान् ॥ इस पवित्र तीर्थमें इस प्रकारका अधर्मपूर्ण आचरण १६ उचित नहीं है । हे तपोधन! आपमें कितनी शक्ति है, इसे युद्धमें अभी प्रदर्शित कीजिये ॥ १५-१६ ॥ व्यासजी बोले- तब प्रह्लादका वचन सुनकर ऋषि नरने उनसे कहा- यदि आपकी ऐसी ही १७ धारणा है तो मेरे साथ इसी समय युद्ध कर लीजिये । हे असुराधम! आज मैं तुम्हारा सिर विदीर्ण कर डालूँगा ( इसके बाद युद्ध करनेकी तुम्हारी कभी इच्छा नहीं होगी ) ॥ १७३ ॥

१८ व्यासजी बोले- तब ऋषि नरका वचन सुनकर दैत्यपति प्रह्लाद कुपित हो उठे । बलशाली उन १ ९ प्रह्लादने प्रतिज्ञा की कि जिस किसी भी उपायसे मैं इन दोनों जितेन्द्रिय तथा परम तपस्वी नर - नारायण ऋषियोंको जीतकर रहूँगा ॥ १८-१९ ३ ॥ व्यासजी बोले- ऐसा वचन बोलकर दैत्य २० प्रह्लादने धनुष उठाकर और शीघ्रतापूर्वक उसे खींचकर प्रत्यंचाकी टंकार की । हे राजन्! मुनि नरने भी धनुष २१ लेकर शिलापर घिसकर तेज किये हुए अनेक तीक्ष्ण २२ बाण प्रह्लादके ऊपर क्रोधपूर्वक छोड़े ॥ २०–२२ ॥ दैत्यराज प्रह्लादने अपने सुनहले पंखोंवाले बाणोंसे शीघ्र ही उन बाणोंको आते ही काट डाला । तब नर अपने द्वारा छोड़े गये बाणोंको प्रह्लादद्वारा छिन्न किया गया देखकर अत्यन्त कोपाविष्ट हो शीघ्रतासे उनपर २३ अन्य बाणोंसे प्रहार करने लगे ॥ २३ ॥

दैत्यपति प्रह्लादने उन बाणोंको भी अपने द्रुतगामी बाणोंसे काटकर उन मुनिराज नरके वक्षःस्थलपर प्रहार किया । नरने भी क्रुद्ध होकर अपने तीव्रगामी पाँच २४ बाणोंसे दैत्येन्द्र प्रह्लादके बाहुदेशपर प्रहार किया ॥ २४ ॥

इन्द्रसहित सभी देवगण उन दोनोंका युद्ध देखनेके लिये विमानोंमें बैठकर आकाशमण्डलमें स्थित हो गये । वे कभी समरांगणमें विराजमान नरके पराक्रमकी प्रशंसा करते थे और फिर कभी दैत्यपति २५ प्रह्लादके पराक्रमकी प्रशंसा करने लगते थे ॥ २५ ॥

धनुष धारण किये हुए दैत्यराज प्रह्लाद इस प्रकार बाणोंकी वर्षा कर रहे थे, मानो मेघ जल बरसा रहे हों । [ ऋषि नर भी अपना ] अप्रतिम शार्ङ्ग धनुष लेकर २६ तीक्ष्ण तथा सुनहले पंखवाले बाण छोड़ रहे थे ॥ २६ ॥

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अ ० ९ ] चतुर्थ बभूव युद्धं तुमुलं तयोस्तु जयैषिणोः पार्थिव देवदैत्ययोः । ववर्षुराकाशपथे स्थितास्ते पुष्पाणि दिव्यानि प्रहृष्टचित्ताः ॥ २७ चु दैत्याधिपतिर्हरौ स

मुमोच बाणानतितीव्रवेगान् ।

चिच्छेद तान्धर्मसुतः सुतीक्ष्णै-र्धनुर्विमुक्तैर्विशिखैस्तदाशु ॥ २८

ततो नारायणं बाणैः प्रह्लादश्चातिकर्षितैः । ववर्ष सुस्थितं वीरं धर्मपुत्रं सनातनम् । नारायणोऽपि तं वेगान्मुक्तैर्बाणैः शिलाशितैः । २ ९

तुतोदातीव पुरतो दैत्यानामधिपं स्थितम् ।

सन्निपातोऽम्बरे तत्र दिदृक्षूणां बभूव ह ॥३०

देवानां दानवानाञ्च कुर्वतां जयघोषणम् ।

उभयोः शरवर्षेण छादिते गगने तदा ॥ ३१

दिवापि रात्रिसदृशं बभूव तिमिरं महत् ।

ऊचुः परस्परं देवा दैत्याश्चातीव विस्मिताः ॥ ३२

अदृष्टपूर्वं युद्धं वै वर्ततेऽद्य सुदारुणम् ।

देवर्षयोऽथ गन्धर्वा यक्षकिन्नरपन्नगाः ॥ ३३

विद्याधराश्चारणाश्च विस्मयं परमं ययुः I नारदः पर्वतश्चैव प्रेक्षणार्थं स्थितौ मुनी ॥ ३४

नारदः पर्वतं प्राह नेदृशं चाभवत्पुरा ।

तारकासुरयुद्धञ्च तथा वृत्रासुरस्य च ॥ ३५

मधुकैटभयोर्युद्धं हरिणा चेदृशं कृतम् ।

प्रह्लादः प्रबलः शूरो यस्मान्नारायणेन च ॥ ३६

करोति सदृशं युद्धं सिद्धेनाद्भुतकर्मणा । व्यास उवाच दिने दिने तथा रात्रौ कृत्वा कृत्वा पुनः पुनः ॥ ३७ स्कन्ध ४४३ हे राजन्! इस प्रकार एक - दूसरेको जीतनेके इच्छुक उन ऋषि नर तथा दैत्यराज प्रह्लादके बीच भीषण युद्ध होने लगा । आकाशमार्ग में स्थित वे [ देवतागण ] प्रसन्नचित्त होकर उनके ऊपर दिव्य पुष्पोंकी वर्षा कर रहे थे ॥२७ ॥

अचानक प्रह्लाद कुपित हो उठे और उन्होंने अति तीव्रगामी बाण ऋषि नारायणपर छोड़े । धर्मपुत्र नारायणने शीघ्र ही उन बाणोंको अपने धनुषसे छोड़े ये अत्यन्त तीक्ष्ण बाणोंसे खण्ड - खण्ड कर डाला ॥ २८ ॥

दैत्यराज प्रह्लाद समरांगणमें डटकर खड़े अतीव पराक्रमी तथा सनातन धर्मपुत्र नारायणपर अपने अति तीक्ष्ण बाण बरसाने लगे । नारायणने भी सानपर चढ़ाकर तेज किये गये अपने वेगपूर्वक छोड़े गये बाणोंके द्वारा सम्मुख खड़े दैत्यपति प्रह्लादको अत्यन्त भीषण चोट पहुँचायी । उस युद्धका अवलोकन करनेके इच्छुक देवताओं तथा दैत्योंका एक विशाल समूह ' अपने - अपने पक्षका जयघोष करते हुए आकाशमें एकत्र हो गया ॥ २ ९ -३०३ ॥ दोनों पक्षोंकी बाणवर्षासे आकाशके आच्छादित हो जानेपर उस समय इतना घना अन्धकार हो गया कि दिन भी रातके समान प्रतीत होने लगा । इससे अति आश्चर्यचकित होकर देवता तथा दैत्य परस्पर कहने लगे कि यह अत्यन्त भयावह संग्राम हो रहा है । ऐसा भीषण युद्ध तो पहले कभी नहीं देखा गया । बड़े - बड़े देवर्षि, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर, नाग, विद्याधर तथा चारणगण इस युद्धको देखकर अत्यन्त विस्मयमें पड़ गये ॥ ३१–३३३ ॥ उस युद्धका अवलोकन करनेके लिये मुनि नारद तथा पर्वत भी आये हुए थे । नारदमुनिने पर्वतसे कहा- ऐसा घोर संग्राम पहले नहीं हुआ था; तारकासुरयुद्ध, वृत्रासुरका युद्ध यहाँतक कि मधु-कैटभका युद्ध भी वैसा नहीं हुआ था, जैसा कि इस समय नारायणके द्वारा किया गया । प्रह्लाद अत्यन्त वीर हैं जो कि वे अद्भुत कर्मवाले सिद्धिसम्पन्न नारायणके साथ यह बराबरीका युद्ध कर रहे हैं ॥ ३४-३६३ व्यासजी बोले- इस प्रकार प्रतिदिन तथा | प्रतिरात्रि बार- बार युद्ध करते हुए वे दोनों दैत्य तथा

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४४४

चक्रतुः परमं युद्धं तौ तदा दैत्यतापसौ ।

नारायणस्तु चिच्छेद प्रह्लादस्य शरासनम् ॥

तरसैकेन बाणेन स चान्यद्धनुराददे ।

नारायणस्तु तरसा मुक्त्वान्यञ्च शिलीमुखम् ॥

तदैव मध्यतश्चापं चिच्छेद लघुहस्तकः ।

छिन्नं छिन्नं पुनर्दैत्यो धनुरन्यत्समाददे ॥

नारायणस्तु चिच्छेद विशिखैराशु कोपितः ।

छिन्ने धनुषि दैत्येन्द्रः परिघं तु समाददे ॥

जघान धर्मजं तूर्णं बाह्वोर्मध्येऽतिकोपनः ।

तमायान्तं स बलवान्मार्गणैर्नवभिर्मुनिः ॥

चिच्छेद परिघं घोरं दशभिस्तमताडयत् ।

गदामादाय दैत्येन्द्रः सर्वायसमयीं दृढाम् ॥

जानुदेशे जघानाशु देवं नारायणं रुषा ।

गदया चापि गिरिवत्संस्थितः स्थिरमानसः ॥

धर्मपुत्रोऽतिबलवान्मुमोचाशु शिलीमुखान् ।

गदां चिच्छेद भगवांस्तदा दैत्यपतेर्दृढाम् ॥

विस्मयं परमं जग्मुः प्रेक्षका गगने स्थिताः । स तु शक्तिं समादाय प्रह्लादः परवीरहा ।

चिक्षेप तरसा क्रुद्धो बलान्नारायणोरसि ।

तामापतन्तीं संवीक्ष्य बाणेनैकेन लीलया ॥

सप्तधा कृतवानाशु सप्तभिस्तं जघान ह ।

दिव्यवर्षशतं चैव तद्युद्धं परमं तयोः ॥

जातं विस्मयदं राजन् सर्वेषां तत्र चाश्रमे ।

तदाजगाम तरसा पीतवासाश्चतुर्भुजः ॥

प्रह्लादस्याश्रमं तत्र जगाम च गदाधरः । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ९ तपस्वी घोर संग्राममें तत्पर रहे । नारायणने एक ३८ बाणसे प्रह्लादका धनुष काट दिया । तब प्रह्लादने तत्काल दूसरा धनुष ले लिया । नारायणने हस्तकौशल दिखाते हुए पुन: बड़ी शीघ्रतासे दूसरा बाण चलाकर ३ ९ उस धनुषको भी बीचोबीचसे काट डाला । इस प्रकार नारायण बार - बार धनुष काटते जाते थे और प्रह्लाद दूसरा धनुष लेते जाते थे । अन्तमें नारायणने कुपित ४० होकर अपने बाणोंसे उसके धनुषको शीघ्रतासे पुनः काट दिया । उस धनुषके भी कट जानेपर दैत्यराज प्रह्लादने अपना परिघ उठा लिया और अत्यन्त क्रोधित ४१ होकर बड़ी फुर्तीसे धर्मपुत्र नारायणकी भुजाओंपर

प्रहार किया । ३७ –४१३ ॥

प्रतापी नारायणने अपनी ओर आते हुए उस ४२ | परिघको नौ बाणोंसे काट दिया और दस बाणोंसे प्रह्लादपर चोट की ॥४२ ३ ॥ तत्पश्चात् दैत्येन्द्र प्रह्लादने पूर्णतः लोहमयी ४३ सुदृढ़ गदा उठाकर क्रोधपूर्वक नारायणमुनिकी जाँघपर शीघ्रतापूर्वक प्रहार किया ॥ ४३३ ॥

उस गदा - प्रहारसे भी धर्मपुत्र नारायण पर्वतकी ४४ भाँति अविचल भावसे स्थिरचित्त होकर खड़े रहे । तदनन्तर परम पराक्रमी भगवान् नारायणने बड़ी तेजीसे अनेक बाण छोड़े और दैत्यपति प्रह्लादकी सुदृढ़ गदाको ४५ खण्ड - खण्ड कर दिया । आकाशमें स्थित होकर युद्ध देखनेवाले बड़े आश्चर्यमें पड़ गये ॥ ४४-४५ ३ ॥ तत्पश्चात् शत्रुओंका दमन करनेवाले प्रह्लादने ४६ शक्ति उठाकर कुपित हो बलपूर्वक बड़ी तेजीसे नारायणके वक्ष: स्थलपर प्रहार किया । तब सामने आती हुई उस ४७ शक्तिको देखकर नारायणने एक ही बाणसे बड़ी आसानीसे उसके सात खण्ड कर दिये और साथ ही सात बाणोंसे प्रह्लादपर प्रहार किया ॥ ४६-४७३ ॥ ४८ हे राजन्! इस प्रकार सबको विस्मित कर देनेवाला वह युद्ध एक सौ दिव्य वर्षतक चलता रहा । तदनन्तर चार भुजाओंसे शोभा पानेवाले पीताम्बरधारी ४ ९ भगवान् विष्णु शीघ्रतापूर्वक उस आश्रममें आ गये । तत्पश्चात् हाथोंमें शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करनेवाले वे चतुर्भुज लक्ष्मीपति विष्णु प्रह्लाद चतुर्भुजो रमाकान्तो रथाङ्गदरपद्मभृत् ॥५० आश्रमपर पहुँचे ॥ ४८–५० ॥

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अ ० १० ]

दृष्ट्वा तमागतं तत्र हिरण्यकशिपोः सुतः ।

प्रणम्य परया भक्त्या प्राञ्जलिः प्रत्युवाच ह ॥

प्रह्लाद उवाच देवदेव जगन्नाथ भक्तवत्सल माधव ।

कथं न जितवानाजावहमेतौ तपस्विनौ ।

संग्रामस्तु मया देव कृतः पूर्णं शतं समाः ॥

सुराणां न जितौ कस्मादिति मे विस्मयो महान् । विष्णुरुवाच सिद्धाविमौ मदशौ च विस्मयः कोऽत्र मारिष ।

तापसौ न जितात्मानौ नरनारायणौ जितौ ।

गच्छ त्वं वितलं राजन् कुरु भक्तिं ममाचलाम् ॥

नाभ्यां कुरु विरोधं त्वं तापसाभ्यां महामते । व्यास उवाच इत्याज्ञप्तो दैत्यराजो निर्ययावसुरैः सह ॥ नरनारायणौ भूयस्तपोयुक्तौ बभूवतुः ॥ चतुर्थ स्कन्ध ४४५ वहाँ उन्हें आये हुए देखकर हिरण्यकशिपुपुत्र ५१ प्रह्लाद बड़ी श्रद्धाके साथ उन्हें प्रणाम करके हाथ जोड़कर कहने लगे ॥ ५१ ॥

प्रह्लाद बोले — हे देवदेव! हे जगन्नाथ! हे भक्तवत्सल! हे माधव! मैं इन दोनों तपस्वियोंको युद्धमें क्यों नहीं जीत सका? हे देव! मैंने देवताओंके ५२ पूरे सौ वर्षतक इनके साथ युद्ध किया, फिर भी ये जीते न जा सके- मुझे यह महान् आश्चर्य है! ॥ ५२३ ॥

विष्णु बोले - हे आर्य! ये दोनों सिद्ध पुरुष हैं और मेरे अंशसे आविर्भूत हैं; अतः [ इन्हें न जीत ५३ पानेमें ] आश्चर्य क्या! नर - नारायण नामसे प्रसिद्ध इन जितात्मा तपस्वियोंको तुम नहीं जीत सकते । अत: हे राजन्! तुम अपने वितललोकको चले जाओ और ५४ वहाँ मेरी अविचल भक्ति करो । हे महामते! तुम इन । दोनों तपस्वियोंसे विरोध मत करो ॥ ५३ - ५४३ ॥ व्यासजी बोले – भगवान् विष्णुसे ऐसी आज्ञा ५५ पाकर दैत्यपति प्रह्लाद असुरोंके साथ वहाँसे प्रस्थित हो गये । तदनन्तर नर - नारायण पुनः तपस्यामें संलग्न ५६ | हो गये ॥ ५५-५६ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे प्रह्लादनारायणयोर्युद्धे विष्णोरागमनवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥

अथ दशमोऽध्यायः राजा जनमेजयद्वारा प्रह्लादके साथ नर - नारायणके युद्धका कारण पूछना, व्यासजीद्वारा उत्तरमें संसारके मूल कारण अहंकारका निरूपण करना तथा महर्षि भृगुद्वारा भगवान् विष्णुको शाप देनेकी कथा जनमेजय उवाच सन्देहोऽयं महानत्र पाराशर्य कथानके नरनारायणौ शान्तौ वैष्णवांशौ तपोधनौ तीर्थाश्रयौ सत्त्वयुक्तौ वन्याशनपरौ सदा धर्मपुत्रौ महात्मानौ तापसौ सत्यसंस्थितौ कथं रागसमायुक्तौ जातौ युद्धे परस्परम् जनमेजय बोले- हे व्यासजी! इस कथानकमें । मुझे यह महान् संशय हो रहा है कि जब वे नर-॥ १ नारायण शान्तस्वभाव, भगवान् विष्णुके अंशस्वरूप, तपको ही अपना सर्वस्व माननेवाले, तीर्थमें निवास । करनेवाले, सत्त्वगुणसम्पन्न, वनके फल- मूलका सदा ॥ २ आहार करनेवाले, धर्मपुत्र, महात्मा, तपस्वी तथा सत्यनिष्ठ थे; तब वे युद्धमें परस्पर राग - द्वेषसे ग्रस्त । कैसे हो गये और उन्होंने उत्कृष्ट तपस्याका त्याग संग्रामं चक्रतुः कस्मात्त्यक्त्वा तपिमनुत्तमाम् ॥ ३ करके संग्राम क्यों किया? ॥१–३ ॥

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४४६ प्रह्लादेन समं पूर्णं दिव्यवर्षशतं किल हित्वा शान्तिसुखं युद्धं कृतवन्तौ कथं मुनी कथं तौ चक्रतुर्युद्धं प्रह्लादेन समं मुनी कथयस्व महाभाग कारणं विग्रहस्य वै ( कामिनी कनकं कार्यं कारणं विग्रहस्य वै युद्धबुद्धिः कथं जाता तयोश्च तद्विरक्तयोः तथाविधं तपस्तप्तं ताभ्याञ्च केन हेतुना मोहार्थं सुखभोगार्थं स्वर्गार्थं वा परन्तप कृतमत्युत्कटं ताभ्यां तपः सर्वफलप्रदम् ॥ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १० । उन दोनों मुनियोंने शान्ति - सुखका त्याग ॥ ४ करके प्रह्लादके साथ पूरे सौ दिव्य वर्षोंतक युद्ध किसलिये किया? ॥४ ॥

। उन दोनों मुनियोंने प्रह्लादके साथ वह संग्राम ॥ ५ क्यों किया? हे महाभाग! आप मुझे उस युद्धका कारण बताइये ॥५ ॥

) ( स्त्री, धन तथा कोई कार्यविशेष ही प्रायः । युद्धके कारण होते हैं । ) उन विरक्त मुनियोंको युद्धका विचार क्यों उत्पन्न हुआ? हे परन्तप! उन्होंने उस ॥ ६ प्रकारका तप किसीको प्रसन्न करनेके लिये, सुखभोगके लिये अथवा स्वर्गके लिये - किस उद्देश्यसे किया । था? शान्त चित्तवाले उन मुनियोंने समस्त फल प्रदान ७ करनेवाला कठोर तप तो किया था, किंतु उन्होंने मुनिभ्यां शान्तचित्ताभ्यां प्राप्तं किं फलमद्भुतम् । कौन - सा अद्भुत फल प्राप्त किया? उन्होंने तपस्यासे तपसा पीडितो देहः संग्रामेण पुनः पुनः दिव्यवर्षशतं पूर्णं श्रमेण परिपीडितौ न राज्यार्थे धने वापि न दारेषु गृहेषु च किमर्थं तु कृतं युद्धं ताभ्यां तेन महात्मना निरीहः पुरुषः कस्मात्प्रकुर्याद्युद्धमीदृशम् दुःखदं सर्वथा देहे जानन्धर्मं सनातनम् सुबुद्धिः सुखदानीह कर्माणि कुरुते सदा न दुःखदानि धर्मज्ञ स्थितिरेषा सनातनी धर्मपुत्रौ हरेरंशौ सर्वज्ञौ सर्वभूषितौ कृतवन्तौ कथं युद्धं दुःखं धर्मविनाशकम् त्यक्त्वा तपः समाधीतं सुखारामं महत्फलम् संयुगं दारुणं कृष्ण नैव मूर्खोऽपि वाञ्छति श्रुतो मया ययातिस्तु च्युतः स्वर्गान्महीपतिः अहङ्कारभवात्पापात्पातितः पृथिवीतले यज्ञकृद्दानकर्ता च धार्मिकः पृथिवीपतिः शरीरको कष्ट दिया और पूरे सौ दिव्य वर्षोंतक बार-॥ ८ बार संग्राम करके परिश्रमके द्वारा अपनेको संतप्त किया । उन मुनियोंने न राज्यके लिये, न धनके लिये, । न स्त्रीके लिये और न तो गृहके लिये ही यह युद्ध ॥ ९ किया तो फिर उन्होंने महात्मा प्रह्लादके साथ किसलिये युद्ध किया? ॥ ६ – ९ ३ ॥ । युद्ध शरीरके लिये कष्टदायक होता है - इस ॥ १० सनातन बातको जानते हुए कोई तृष्णारहित पुरुष आखिर ऐसा युद्ध किसलिये करेगा? हे धर्मज्ञ! उत्तम । बुद्धिवाला मनुष्य इस लोकमें सदा सुखदायी कर्म ही ॥ ११ करता है, दुःखप्रद कर्म नहीं - यह सनातन सिद्धान्त है । तब धर्मपुत्र, भगवान् विष्णुके अंशस्वरूप, सर्वज्ञ । तथा सभी गुणोंसे विभूषित उन मुनियोंने वह दुःखदायक ॥ १२ तथा धर्मविनाशक युद्ध क्यों किया? हे व्यासजी! कोई मूर्ख भी अच्छी प्रकार आचरित, सुख तथा । आनन्द देनेवाले और महाफलदायी तपका त्याग ॥ १३ । करके दारुण युद्ध करना नहीं चाहता ॥ १०– - १३३ १ ॥ मैंने सुना है कि राजा ययाति स्वर्गसे च्युत हो । गये थे । अहंकारजन्य पापके कारण वे पृथ्वीतलपर ॥ १४ गिरा दिये गये थे । वे यज्ञकर्ता, दानी और धर्मनिष्ठ थे; किंतु केवल थोड़ेसे अहंकार भरे शब्दोंका उच्चारण । करनेके कारण वज्रपाणि इन्द्रने उन्हें [ स्वर्गसे पृथ्वीपर ] ॥ १५ । गिरा दिया था । यह निश्चित है कि बिना अहंकारके

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अ ० १० ]

शब्दोच्चारणमात्रेण पातितो वज्रपाणिना ।

अहङ्कारमृते युद्धं न भवत्येव निश्चयः ॥

किं फलं तस्य युद्धस्य मुनेः पुण्यविनाशनम् । व्यास उवाच राजन् संसारमूलं हि त्रिविधः परिकीर्तितः ॥

अहङ्कारस्तु सर्वज्ञैर्मुनिभिर्धर्मनिश्चये ।

स कथं मुनिना त्यक्तुं योग्यो देहभृता किल ॥

कारणेन विना कार्यं न भवत्येव निश्चयः ।

तपो दानं तथा यज्ञाः सात्त्विकात्प्रभवन्ति ते ॥

राजसाद्वा महाभाग तामसात्कलहस्तथा ।

क्रिया स्वल्पापि राजेन्द्र नाहङ्कारं विना क्वचित् ॥

शुभा वाप्यशुभा वापि प्रभवत्यपि निश्चयः ।

अहङ्काराद् बन्धकारी नान्योऽस्ति जगतीतले ॥

येनेदं रचितं विश्वं कथं तद्रहितं भवेत् ।

ब्रह्मा रुद्रस्तथा विष्णुरहङ्कारयुतास्त्वमी ॥

अन्येषां चैव का वार्ता मुनीनां वसुधाधिप ।

अहङ्कारावृतं विश्वं भ्रमतीदं चराचरम् ॥

पुनर्जन्म पुनर्मृत्युः सर्वं कर्मवशानुगम् ।

देवतिर्यङ्मनुष्याणां संसारेऽस्मिन्महीपते ॥

रथाङ्गवदसर्वार्थं भ्रमणं सर्वदा स्मृतम् ।

विष्णोरप्यवताराणां संख्यां जानाति कः पुमान् ॥

विततेऽस्मिंस्तु संसारे उत्तमाधमयोनिषु ।

नारायणो हरिः साक्षान्मात्स्यं वपुरुपाश्रितः ॥

कामठं सौकरं चैव नारसिंहञ्च वामनम् ।

युगे युगे जगन्नाथो वासुदेवो जनार्दनः ॥

अवतारानसंख्यातान्करोति विधियन्त्रितः । चतुर्थ स्कन्ध ४४७ युद्ध हो ही नहीं सकता । अन्ततः मुनिको उस युद्धका १६ क्या फल मिला, उससे तो केवल उनका पुण्य ही नष्ट हुआ ॥ १४–१६ ÷ 11 व्यासजी बोले- हे राजन्! धर्मका निर्णय करते समय सर्वज्ञ मुनियोंने अहंकारको ही संसारका १७ मूल कारण कहा है और इसे [ सत्त्वादि भेदसे ] तीन प्रकारका बतलाया है । [ ऐसी स्थितिमें ] शरीरधारी होकर मुनि नारायण उस अहंकारका त्याग करनेमें १८ कैसे समर्थ हो सकते थे? यह निश्चित है कि बिना कारणके कार्य नहीं होता ॥ १७ - १८३ ॥ तप, दान तथा यज्ञ सात्त्विक अहंकारसे होते हैं । १ ९ हे महाभाग! राजस और तामस अहंकारसे कलह उत्पन्न होता है । हे राजेन्द्र! यह निश्चय है कि छोटी - सी भी क्रिया चाहे वह शुभ हो अथवा २० अशुभ - बिना अहंकारके कभी नहीं हो सकती । जगत्में अहंकारसे बढ़कर बन्धनमें डालनेवाला दूसरा २१ कोई पदार्थ नहीं है । अतः जिस अहंकारसे ही यह विश्व निर्मित है, उसके बिना यह संसार कैसे रह सकता है? ॥ १ ९ -२१ || २२ हे पृथ्वीपते! जब ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी अहंकारयुक्त रहते हैं, तब अन्य प्राणियों और मुनियोंकी बात ही क्या? यह चराचर जगत् अहंकारके वशीभूत २३ होकर भ्रमण करता रहता है । सभी जीव कर्मके अधीन हैं और उसीके अनुसार बार - बार उनका जन्म तथा मरण होता रहता है । हे महीपते! देवता, मनुष्य २४ और पशु - पक्षियोंका इस संसारमें बराबर चक्कर काटना रथके पहियेके भ्रमणके समान बताया गया है ॥ २२–२४३ ॥ २५ इस विस्तृत संसारमें उत्तम - अधम सभी योनियोंमें भगवान् विष्णुके अवतारोंकी संख्या कौन मनुष्य जान सकता है? साक्षात् नारायण श्रीहरिको मत्स्य, कच्छप, २६ वराह, नरसिंह और वामनतकका शरीर धारण करना पड़ा । वे जगत्प्रभु, वासुदेव, भगवान् जनार्दन भी २७ विधिके अधीन होकर विभिन्न युगों में असंख्य अवतार

धारण करते रहते हैं ॥। २५ - २७३ ॥

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४४८ वैवस्वते महाराज सप्तमे भगवान्हरिः ॥ मन्वन्तरेऽवतारान्वै चक्रे ताञ्छृणु तत्त्वतः । भृगुशापान्महाराज विष्णुर्देववरः प्रभुः अवताराननेकांस्तु कृतवानखिलेश्वरः । राजोवाच सन्देहोऽयं महाभाग हृदये मम जायते ।

भृगुणा भगवान्विष्णुः कथं शप्तः पितामह ।

हरिणा च मुनेस्तस्य विप्रियं किं कृतं मुने ॥

यद्रोषाद् भृगुणा शप्तो विष्णुर्देवनमस्कृतः । व्यास उवाच शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि भृगोः शापस्य कारणम् ॥

पुरा कश्यपदायादो हिरण्यकशिपुर्नृपः ।

यदा तदा सुरैः सार्धं कृतं संख्यं परस्परम् ॥

कृते संख्ये जगत्सर्वं व्याकुलं समजायत ।

हते तस्मिन्नृपे राजा प्रह्लादः समजायत ॥

देवान्स पीडयामास प्रह्लादः शत्रुकर्षणः ।

संग्रामो ह्यभवद् घोरः शक्रप्रह्लादयोस्तदा ॥

पूर्णं वर्षशतं राजल्लोकविस्मयकारकम् ।

देवैर्युद्धं कृतं चोग्रं प्रह्लादस्तु पराजितः ॥

निर्वेदं परमं प्राप्तो ज्ञात्वा धर्मं सनातनम् ।

विरोचनसुतं राज्ये प्रतिष्ठाप्य बलिं नृप ॥

जगाम स तपस्तप्तुं पर्वते गन्धमादने ।

प्राप्य राज्यं बलिः श्रीमान्सुरैर्वैरं चकार ह ॥

यतः परस्परं युद्धं जातं परमदारुणम् । ततः सुरैर्जिता दैत्या इन्द्रेणामिततेजसा । विष्णुना च सहायेन राज्यभ्रष्टाः कृता नृप । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १० २८ हे महाराज! सातवें वैवस्वत मन्वन्तरमें भगवान् श्रीहरिने जो - जो अवतार लिये थे, उन्हें आप ध्यानपूर्वक सुनें । हे महाराज! देवश्रेष्ठ और सबके स्वामी ॥ २ ९ भगवान् विष्णुको महर्षि भृगुके शापके कारण अनेक अवतार धारण करने पड़े थे ॥ २८-२९ ३ ॥ राजा बोले- हे महाभाग! हे पितामह! मेरे मनमें यह संदेह हो रहा है कि भृगुने भगवान्‌को ३० शाप क्यों दे दिया? हे मुने! भगवान् विष्णुने उन भृगुमुनिका कौन - सा अप्रिय कार्य कर दिया ३१ था, जिससे रुष्ट होकर महर्षि भृगुने सभी देवताओंद्वारा नमस्कार किये जानेवाले भगवान् विष्णुको शाप दे दिया । ३०-३१ || व्यासजी बोले – हे राजन्! सुनिये, मैं आपको ३२ भृगुके शापका कारण बताता हूँ । पूर्वकालमें कश्यपतनय हिरण्यकशिपु नामक एक राजा था । उस समय जब भी वह देवताओंके साथ परस्पर संघर्ष ३३ करने लगता था, तब युद्ध आरम्भ हो जानेपर सारा संसार व्याकुल हो उठता था ॥ ३२-३३३ ॥ बादमें हिरण्यकशिपुका वध हो जानेपर प्रह्लाद ३४ राजा बने । शत्रुओंको कष्ट पहुँचानेवाले वे प्रह्लाद भी देवताओंको पीड़ित करने लगे । अतः इन्द्र और प्रह्लादमें भयानक संग्राम आरम्भ हो गया । हे राजन्! ३५ पूरे सौ वर्षतक देवताओंने लोगोंको अचम्भेमें डाल देनेवाला भीषण युद्ध किया और प्रह्लादको पराजित कर दिया । हे राजन्! तब शाश्वत धर्मको समझकर ३६ वे महान् विरक्तिको प्राप्त हुए और विरोचनपुत्र बलिको राज्यपर प्रतिष्ठित करके तप करनेके लिये ३७ गन्धमादनपर्वतपर चले गये ॥ ३४– - ३७ ÷ ॥ राज्य प्राप्त करके ऐश्वर्यशाली राजा बलिने देवताओंसे शत्रुता कर ली, जिससे [ देवताओं और ३८ । दैत्योंमें ] पुनः परस्पर अत्यन्त भीषण युद्ध होने लगा । उसमें देवताओं तथा अमित तेजस्वी इन्द्रने दैत्योंको जीत लिया । हे राजन्! उस समय इन्द्रके सहायक ३ ९ बनकर भगवान् विष्णुने दैत्योंको राज्यसे च्युत कर दिया ॥ ३८-३९ ३ 11

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अ ० १० ] चतुर्थ स्कन्ध ४४ ९ ततः पराजिता दैत्याः काव्यस्य शरणं गताः

किं त्वं न कुरुषे ब्रह्मन् साहाय्यं नः प्रतापवान् ।

स्थातुं न शक्नुमो ह्यत्र प्रविशामो रसातलम् ॥

यदि त्वं न सहायोऽसि त्रातुं मन्त्रविदुत्तम व्यास उवाच इत्युक्तः सोऽब्रवीद्दैत्यान्काव्यः कारुणिको मुनिः मा भैष्ट धारयिष्यामि तेजसा स्वेन भोऽसुराः मन्त्रैस्तथौषधीभिश्च साहाय्यं वः सदैव हि करिष्यामि कृतोत्साहा भवन्तु विगतज्वराः व्यास उवाच ततस्ते निर्भया जाता दैत्याः काव्यस्य संश्रयात् देवैः श्रुतस्तु वृत्तान्तः सर्वैश्चारमुखात्किल तत्र संमन्त्र्य ते देवाः शक्रेण च परस्परम् ॥ मन्त्रं चक्रुः सुसंविग्नाः काव्यमन्त्रप्रभावतः योद्धुं गच्छामहे तूर्णं यावन्न च्यावयन्ति वै प्रसह्य हत्वा शिष्टांस्तु पातालं प्रापयामहे दैत्याञ्जग्मुस्ततो देवाः संरुष्टाः शस्त्रपाणयः जग्मुस्तान्विष्णुसहिता दानवान् हरिणोदिताः वध्यमानास्तु ते दैत्याः सन्त्रस्ता भयपीडिताः काव्यस्य शरणं जग्मू रक्ष रक्षेति चाब्रुवन् ताञ्छुक्रः पीडितान्दृष्ट्वा देवैर्दैत्यान्महाबलान् मा भैष्टेति वचः प्राह मन्त्रौषधिबलाद्विभुः दृष्ट्वा काव्यं सुराः सर्वे त्यक्त्वा तान्प्रययुः किल ॥ ४० तदनन्तर हारे हुए दैत्य [ अपने गुरु ] शुक्राचार्यकी शरणमें गये । [ सभी दैत्य उनसे कहने लगे - ] हे ब्रह्मन्! आप प्रतापशाली होते हुए भी हमारी सहायता ४१ क्यों नहीं कर रहे हैं? हे मन्त्रज्ञोंमें श्रेष्ठ! यदि हमारी रक्षाहेतु आप सहायक न हुए तो हमलोग यहाँ नहीं । रह पायेंगे और निश्चय ही हमें पातालमें जाना पड़ेगा ॥ ४०-४१३ ॥ व्यासजी बोले- दैत्योंके ऐसा कहनेपर दयालु ॥ ४२ शुक्राचार्यमुनिने उनसे कहा - हे असुरो! डरो मत । मैं अपने तेजसे [ तुमलोगोंको धरातलपर ] स्थापित करूँगा । और मन्त्रों तथा औषधियोंसे सर्वदा तुमलोगों की ॥ ४३ सहायता करूँगा । तुमलोग चिन्तामुक्त होकर उत्साह बनाये रखो ॥ ४२-४३३ ॥ । व्यासजी बोले- इस प्रकार शुक्राचार्यका आश्रय पाकर वे दैत्य निर्भय हो गये । उधर देवताओंने ॥ ४४ गुप्तचरोंसे यह समाचार सुन लिया । तत्पश्चात् शुक्राचार्य मन्त्रके प्रभावको समझकर अत्यन्त घबराये । हुए देवताओंने इन्द्रके साथ परस्पर मन्त्रणा करके यह ४५ योजना बनायी कि जबतक शुक्राचार्यके मन्त्रके प्रभावसे दैत्य हमें राज्यच्युत करें, उसके पहले ही । हमलोग युद्ध करनेके लिये शीघ्रतापूर्वक प्रस्थान कर ॥ ४६ दें और बलपूर्वक उनका वध करके बचे हुए दैत्योंको पाताल भेज दें ॥४४–४६३ ॥ । तदनन्तर अत्यधिक रोषमें भरे देवताओंने हाथों में शस्त्र धारणकर दैत्योंपर चढ़ाई कर दी । इन्द्रकी ॥ ४७ प्रेरणासे भगवान् विष्णुसहित सभी देवता उनपर टूट । पड़े । तब देवताओंके द्वारा मारे जा रहे वे दैत्य आतंकित तथा भयभीत होकर शुक्राचार्यकी शरणमें ॥ ४८ गये और ' रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये ' – ऐसा बार-बार कहने लगे ॥ ४७-४८३ ॥ । देवताओंके द्वारा पीड़ित किये गये उन महाबली ॥ ४ ९ दैत्योंको देखकर मन्त्र और औषधिके प्रभावसे शक्तिशाली बने शुक्राचार्यने उनसे ' डरो मत ' - ऐसा वचन कहा ॥ तब शुक्राचार्यको देखते ही सभी देवता उन दैत्योंको ॥ ५० छोड़कर चले गये ॥ ४ ९ -५० ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे भृगुशापकारणवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥

1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] -15 A

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४५० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ११ अथैकादशोऽध्यायः मन्त्रविद्याकी प्राप्तिके लिये शुक्राचार्यका तपस्यारत होना, देवताओंद्वारा दैत्योंपर आक्रमण, शुक्राचार्यकी माताद्वारा दैत्योंकी रक्षा और इन्द्र तथा विष्णुको संज्ञाशून्य कर देना, विष्णुद्वारा शुक्रमाताका वध व्यास उवाच तथा गतेषु देवेषु काव्यस्तान्प्रत्युवाच ह ब्रह्मणा पूर्वमुक्तं यच्छृणुध्वं दानवोत्तमाः विष्णुर्दैत्यवधे युक्तो हनिष्यति जनार्दनः वाराहरूपं संस्थाय हिरण्याक्षो यथा हतः यथा नृसिंहरूपेण हिरण्यकशिपुर्हतः तथा सर्वान्कृतोत्साहो हनिष्यति न चान्यथा न मे मन्त्रबलं सम्यक्प्रतिभाति यथा हरिम् जेतुं यूयं समर्थाः स्थ मया त्राताः सुरानथ तस्मात्कालं प्रतीक्षध्वं कियन्तं दानवोत्तमाः अहमद्य महादेवं मन्त्रार्थं प्रव्रजामि वै प्राप्य मन्त्रान्महादेवादागमिष्यामि साम्प्रतम् युष्मभ्यं तान्प्रदास्यामि यथार्थं दानवोत्तमाः दैत्या ऊचुः पराजिताः कथं स्थातुं पृथिव्यां मुनिसत्तम शक्ता भवामोऽप्यबलास्तावत्कालं प्रतीक्षितुम् निहता बलिनः सर्वे केचिच्छिष्टाश्च दानवाः । नाद्य युक्ताश्च संग्रामे स्थातुमेवं सुखावहाः शुक्र उवाच यावदहं मन्त्रविद्यामानयिष्यामि शङ्करात् । तावद्भवद्भिः स्थातव्यं तपोयुक्तैः शमान्वितैः

सामदानादयः प्रोक्ता विद्वद्भिः समयोचिताः ।

देशं कालं बलं वीरैर्ज्ञात्वा शक्तिं बलं बुधैः ॥

1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] -15 B व्यासजी बोले- तत्पश्चात् देवताओंके चले । जानेपर शुक्राचार्यने उन दैत्योंसे कहा- हे श्रेष्ठ ॥ १ दानवो! पूर्वकालमें ब्रह्माजीने मुझसे जो कहा था, उसे तुमलोग सुनो । दैत्योंके वधके लिये भगवान् विष्णु । सदा प्रयत्नरत रहते हैं, वे दैत्योंका वध अवश्य करेंगे । ॥ २ जैसे वाराहका रूप धारण करके उन्होंने हिरण्याक्षका वध किया और नृसिंहरूपसे हिरण्यकशिपुको मारा, । उसी प्रकार उत्साहसम्पन्न होकर वे सब दैत्योंका ॥ ३ संहार करेंगे; इसमें सन्देह नहीं है॥१–३ ॥ । मुझे जान पड़ता है कि वैसा समुचित मन्त्रबल अभी मेरे पास नहीं है, जिससे मेरे द्वारा सुरक्षित होकर ॥ ४ तुमलोग इन्द्र तथा देवताओंको जीतनेमें समर्थ हो । सको । अतः हे श्रेष्ठ दानवगण! तुमलोग कुछ ॥ ५ समयतक प्रतीक्षा करो । मैं मन्त्रसिद्धिके लिये आज ही भगवान् शिवके पास जा रहा हूँ । हे श्रेष्ठ दानवो! । महादेवजीसे मन्त्र लेकर मैं तत्काल आऊँगा और ॥ ६ यथावत् रूपमें तुमलोगोंको सिखा दूँगा॥४–६ ॥ दैत्योंने कहा – हे मुनिश्रेष्ठ! देवताओंसे पराजित । होकर हमलोग अत्यन्त निर्बल हो गये हैं, अत: उतने ॥ ७ समयतक प्रतीक्षा करनेके लिये हम पृथ्वीपर रहनेमें कैसे समर्थ हो सकते हैं? सभी पराक्रमी दानव मारे जा चुके हैं और जो शेष बचे हुए हैं, सुखकी इच्छा करनेवाले ॥ ८ वे अब युद्धमें ठहरनेमें समर्थ नहीं हैं ॥ ७-८ ॥ शुक्राचार्य बोले- जबतक मैं शिवजीसे मन्त्रविद्या लेकर नहीं आता हूँ, तबतक तुमलोग शान्ति और तपस्यासे युक्त होकर यहीं रुके रहो ॥ ९ ॥

॥ विद्वानोंने कहा है कि समयानुसार साम, दान आदिका प्रयोग करना चाहिये । बुद्धिमान् तथा वीर पुरुष देश, काल, बल, शक्ति और सेनाकी जानकारी १० । करके ही अपना सामर्थ्य दिखाते हैं ॥ १० ॥

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अ ० ११ ]

सेवाथ समये कार्या शत्रूणां शुभकाम्यया ।

स्वशक्त्युपचये काले हन्तव्यास्ते मनीषिभिः ॥

तदद्य विनयं कृत्वा सामपूर्वं छलेन वै ।

तिष्ठध्वं स्वनिकेतेषु मदागमनकाङ्क्षया ॥

प्राप्य मन्त्रान्महादेवादागमिष्यामि दानवाः ।

युध्यामहे पुनर्देवान्मान्त्रमास्थाय वै बलम् ॥

इत्युक्त्वाथ भृगुस्तेभ्यो जगाम कृतनिश्चयः ।

महादेवं महाराज मन्त्रार्थं मुनिसत्तमः ॥

दानवाः प्रेषयामासुः प्रह्लादं सुरसन्निधौ ।

सत्यवादिनमव्यग्रं सुराणां प्रत्ययप्रदम् ॥

प्रह्लादस्तु सुरान्प्राह प्रश्रयावनतो नृपः ।

असुरैः सहितस्तत्र वचनं नम्रतायुतम् ॥

न्यस्तशस्त्रा वयं सर्वे निः सन्नाहास्तथैव च ।

देवास्तपश्चरिष्यामः संवृता वल्कलैर्युताः ॥

प्रह्लादस्य वचः श्रुत्वा सत्याभिव्याहृतं तु तत् ।

ततो देवा न्यवर्तन्त विज्वरा मुदिताश्च ते ॥

न्यस्तशस्त्रेषु दैत्येषु विनिवृत्तास्तदा सुराः ।

विश्रब्धाः स्वगृहानगत्वा क्रीडासक्ताः सुसंस्थिताः ॥

दैत्या दम्भं समालम्ब्य तापसास्तपिसंयुताः ।

कश्यपस्याश्रमे वासं चक्रुः काव्यागमेच्छया ॥

काव्य गत्वाथ कैलासं महादेवं प्रणम्य च ।

उवाच विभुना पृष्टः किं ते कार्यमिति प्रभुः ॥

मन्त्रानिच्छाम्यहं देव ये न सन्ति बृहस्पतौ ।

पराजयाय देवानामसुराणां जयाय च ॥

चतुर्थ स्कन्ध ४५१ बुद्धिमान् पुरुषोंको चाहिये कि अपने कल्याणकी ११ इच्छासे समयपर शत्रुओंकी भी सेवा करे और अपनी शक्तिका संचय हो जानेपर उन्हें मार डाले ॥११ ॥

अतः देवताओंकी विनती करके छलपूर्वक सामनीतिका प्रयोग करते हुए मेरे लौटने की प्रतीक्षाके १२ साथ अपने - अपने घरोंमें रहो ॥१२ ॥

हे दानवो! महादेवजीसे मन्त्र प्राप्त करके मैं आऊँगा और तब उसी मन्त्रबलका आश्रय लेकर १३ हमलोग देवताओंसे युद्ध करेंगे ॥ १३ ॥

हे महाराज! उन दानवोंसे ऐसा कहकर दृढ़ संकल्पवाले मुनिश्रेष्ठ शुक्राचार्य मन्त्रप्राप्तिके लिये १४ शिवजीके पास चले गये ॥१४ ॥

तदनन्तर दैत्योंने सत्यवादी, धैर्यवान् तथा देवताओंके विश्वासपात्र प्रह्लादको देवताओंके पास भेजा ॥ १५ ॥

१५ असुरोंके साथ वहाँ जाकर राजा प्रह्लाद विनय-सम्पन्न होकर देवताओंसे नम्रतायुक्त वचन बोले । हे देवताओ! हम सभी लोगोंने शस्त्र रख दिये हैं और १६ कवचका त्याग कर दिया है । अब हम वल्कल धारण करके तपस्या करेंगे ॥ १६-१७ ॥ प्रह्लादका वचन सुनकर देवताओंने उसे सत्य १७ मान लिया और इसके बाद वे निश्चिन्त होकर प्रसन्नतापूर्वक वहाँसे लौट गये ॥ १८ ॥

तब दैत्योंके शस्त्र त्याग देनेपर देवता युद्धसे १८ विरत हो गये और चिन्तारहित होकर अपने - अपने घर जाकर स्वस्थचित्त हो क्रीडाविलासमें संलग्न हो गये ॥ १ ९ ॥ १ ९ उस समय दैत्यगण पाखण्डका सहारा लेकर तपस्वीके रूपमें तपस्यारत होकर शुक्राचार्यके आगमनकी प्रतीक्षा करते हुए कश्यपमुनिके आश्रममें २० रहने लगे ॥ २० ॥

उधर, मुनि शुक्राचार्यने कैलासपर्वतपर पहुँचकर शंकरजीको प्रणाम किया । भगवान् शिवके २१ पूछनेपर कि ' आपका क्या कार्य है? ' – उन्होंने कहा — हे देव! मैं देवताओंकी पराजय और असुरोंकी विजयके लिये उन मन्त्रोंको चाहता हूँ, जो बृहस्पति

२२ भी पास न हों ॥। २१ - २२ ॥

1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] - 15 C