देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 461–470
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 461–470
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४५२ व्यास उवाच तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य सर्वज्ञः शङ्करः शिवः चिन्तयामास मनसा किं कर्तव्यमतः परम् ॥ सुरेषु द्रोहबुद्ध्यासौ मन्त्रार्थमिह साम्प्रतम् प्राप्तः काव्यो गुरुस्तेषां दैत्यानां विजयाय च ॥ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ११ व्यासजी बोले – उनका वचन सुनकर सर्वज्ञ । और कल्याणकारी भगवान् शिव मनमें सोचने लगे २३ कि अब मुझे क्या करना चाहिये? ये दैत्यगुरु शुक्राचार्य देवताओंके प्रति द्रोह - बुद्धिसे युक्त होकर । उन दैत्योंकी विजयके लिये मन्त्रहेतु इस समय यहाँ २४ आये हैं, अतः मुझे देवताओंकी रक्षा करनी चाहिये— ऐसा सोचकर शिवजीने उन्हें यह अत्यन्त कठोर और रक्षणीया मया देवा इति सञ्चिन्त्य शङ्करः 1 दुष्कर व्रत करनेको कहा - पूरे एक हजार वर्षोंतक दुष्करं व्रतमत्युग्रं तमुवाच महेश्वरः
पूर्णं वर्षसहस्त्रं तु कणधूममवाक्छिराः ।
यदि पास्यसि भद्रं ते ततो मन्त्रानवाप्स्यसि ॥
इत्युक्तोऽसौ प्रणम्येशं बाढमित्यब्रवीद्वचः ।
व्रतं चराम्यहं देव त्वयाज्ञप्तः सुरेश्वर ॥
व्यास उवाच
इत्युक्त्वा शङ्करं काव्यश्चकार व्रतमुत्तमम् ।
धूमपानरतः शान्तो मन्त्रार्थं कृतनिश्चयः ॥
ततो देवाः परिज्ञाय काव्यं व्रतरतं तदा ।
दैत्यान्दम्भरतांश्चैव बभूवुर्मन्त्रतत्पराः ॥
विचार्य मनसा सर्वे संग्रामायोद्यता नृप ।
ययुर्धृतायुधास्तत्र यत्र ते दानवोत्तमाः ॥
तानागतान्समीक्ष्याथ सायुधान्दंशितांस्तथा ।
आसंस्ते भयसंविग्ना दैत्या देवान्समन्ततः ॥
उत्पेतुः सहसा ते वै सन्नद्धान्भयकर्शिताः ।
अब्रुवन्वचनं तथ्यं ते देवान्बलदर्पितान् ॥
न्यस्तशस्त्रे भयवति आचार्ये व्रतमास्थिते ।
दत्त्वाभयं पुरा देवाः सम्प्राप्ता नो जिघांसया ॥
1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] -15 D यदि आप सिर नीचे करके कणधूम ( भूसीके धुएँ ) -॥ २५ का पान करेंगे, तभी आपका कल्याण होगा और आप मन्त्र प्राप्त कर सकेंगे ॥ २३ - २६ ॥ शिवजीके ऐसा कहनेपर उन्होंने महेश्वरको २६ प्रणाम करके यह वचन कहा - ' बहुत अच्छा ', देव! हे सुरेश्वर! आपने मुझे जो आदेश दिया है, मैं हे उस व्रतका पालन करूँगा ॥२७ ॥
२७ व्यासजी बोले – शिवजीसे ऐसा कहकर मन्त्रप्राप्तिके लिये दृढ़संकल्प शुक्राचार्यजी शान्त होकर धुएँका सेवन करते हुए कठोर व्रत करने लगे ॥ २८ ॥
२८ तब उस समय शुक्राचार्यको व्रतमें संलग्न तथा दैत्योंको [ तपस्वी बनकर ] पाखण्डमें निरत देखकर देवता लोग आपसमें मन्त्रणा करने लगे ॥ २ ९ ॥ २ ९ हे राजन्! भलीभाँति विचार करके सभी देवता संग्रामके लिये उद्यत हो गये और शस्त्रास्त्र धारणकर वहाँ पहुँच गये, जहाँ वे बड़े - बड़े दानव ३० विद्यमान थे ॥ ३० ॥
तदनन्तर दैत्यगण उन आये हुए देवताओंको आयुधोंसे सज्जित और कवच धारण किये तथा अपनेको उनसे सब ओरसे घिरा देखकर भयसे ३१ व्याकुल हो उठे ॥ ३१ ॥
वे भयातुर दानव तुरंत उठकर खड़े हो गये और युद्धके लिये उद्यत बलाभिमानी देवताओंसे ३२ सारगर्भित वचन कहने लगे – हमने शस्त्र रख दिये हैं, हम भयभीत हैं और हमारे आचार्य इस समय व्रतमें संलग्न हैं । हे देवताओ! पहले अभयदान देकर ३३ भी आप लोग हमें मारनेकी इच्छासे आ गये । हे
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अ ० ११ ]
सत्यं वः क्व गतं देवा धर्मश्च श्रुतिनोदितः ।
न्यस्तशस्त्रा न हन्तव्या भीताश्च शरणं गताः ॥
देवा ऊचुः
भवद्भिः प्रेषितः काव्यो मन्त्रार्थं कुहकेन च ।
तपो ज्ञातं हि युष्माकं तेन युध्याम एव हि ॥
सज्जा भवन्तु युद्धाय संरब्धाः शस्त्रपाणयः ।
शत्रुरिछद्रेण हन्तव्य एष धर्मः सनातनः ॥
व्यास उवाच
तच्छ्रुत्वा वचनं दैत्या विचार्य च परस्परम् ।
पलायनपराः सर्वे निर्गता भयविह्वलाः ॥
शरणं दानवा जग्मुर्भीतास्ते काव्यमातरम् ।
दृष्ट्वा तानतिसन्तप्तानभयं च ददावथ ॥
काव्यमातोवाच
न भेतव्यं न भेतव्यं भयं त्यजत दानवाः ।
मत्सन्निधौ वर्तमानान्न भीर्भवितुमर्हति ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं दैत्याः स्थितास्तत्र गतव्यथाः ।
निरायुधा ह्यसंभ्रान्तास्तत्राश्रमवरेऽसुराः ॥
देवास्तान्विद्रुतान्वीक्ष्य दानवांस्ते पदानुगाः ।
अभिजग्मुः प्रसह्यैतानविचार्य बलाबलम् ॥
तत्रागताः सुराः सर्वे हन्तुं दैत्यान्समुद्यताः ।
वारिताः काव्यमात्रापि जघ्नुस्तानाश्रमस्थितान् ॥
हन्यमानान्सुरैर्दृष्ट्वा काव्यमातातिवेपिता ।
उवाच सर्वान्सनिद्रांस्तपसा वै करोम्यहम् ॥
चतुर्थ स्कन्ध ४५३ देवगण! आप लोगोंका सत्य और श्रुतिसम्मत वह ३४ धर्म कहाँ चला गया कि ' जो शस्त्र रख चुके हों, भयभीत हों और शरणागत हो गये हों, उन्हें नहीं मारना चाहिये ' ॥ ३२–३४ ॥ देवता बोले- आप लोगोंने छलसे शुक्राचार्यको मन्त्र प्राप्त करनेके लिये भेजा है । हम आपलोगों के ३५ तपको जान गये हैं, इसीलिये हमलोग युद्ध करनेके लिये उद्यत हुए हैं ॥ ३५ ॥
अब क्षुब्ध हुए आपलोग भी हाथोंमें शस्त्र ३६ धारणकर युद्धके लिये तैयार हो जाइये । यह सनातन सिद्धान्त है कि जब शत्रु दुर्बल हो, तभी उसे मार डालना चाहिये ॥ ३६ ॥
व्यासजी बोले – उनका वचन सुनकर सभी दैत्य आपसमें विचार करके भागनेके लिये तत्पर हो ३७ गये और भयसे व्याकुल होकर वहाँसे निकल भागे ॥ ३७ ॥
वे भयभीत दैत्य शुक्राचार्यकी माताकी शरणमें ३८ गये । उन दैत्योंको बहुत सन्तप्त देखकर उन्होंने अभय प्रदान कर दिया ॥ ३८ ॥
शुक्राचार्यकी माताने कहा - हे दानवगण! डरो मत, डरो मत; तुम लोग भय छोड़ दो । मेरे पास ३ ९ रहनेवालोंको भय हो ही नहीं सकता ॥ ३ ९ ॥ यह वचन सुनकर दैत्योंकी व्यथा दूर हो गयी और वे शस्त्रास्त्र त्यागकर पूर्ण रूपसे निश्चिन्त हो वहींपर उनके उत्तम आश्रममें रहने लगे ॥ ४० ॥
४० तब दैत्योंको पलायित देखकर वे देवता उनके पैरोंके चिह्नोंके पीछे - पीछे जाते हुए उनके बलाबलका बिना विचार किये हठात् उनके पास पहुँच गये ॥ ४१ ॥
४१ वहाँपर आये हुए सभी देवता आश्रममें रहनेवाले दैत्योंका वध करनेको उद्यत हो गये और शुक्राचार्यकी माताके रोकने पर भी उन दैत्योंको मारने लगे ॥ ४२ ॥
४२ इस प्रकार देवताओंके द्वारा उन्हें मारे जाते हुए देखकर शुक्राचार्यकी माता बहुत काँपने लगीं और बोलीं- मैं अभी समस्त देवताओंको अपने तपके ४३ । प्रभावसे निद्राग्रस्त कर दे रही हूँ ॥ ४३ ॥
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४५४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ११
इत्युक्त्वा प्रेरिता निद्रा तानागत्य पपात च ।
सेन्द्रा निद्रावशं याता देवा मूकवदास्थिताः ॥ ४४
इन्द्रं निद्राजितं दृष्ट्वा दीनं विष्णुरभाषत ।
मां त्वं प्रविश भद्रं ते नये त्वां च सुरोत्तम ॥ ४५
एवमुक्तस्ततो विष्णुं प्रविवेश पुरन्दरः ।
निर्भयो गतनिद्रश्च बभूव हरिरक्षितः ॥ ४६
रक्षितं हरिणा दृष्ट्वा शक्रं तत्र गतव्यथम् ।
काव्यमाता ततः क्रुद्धा वचनं चेदमब्रवीत् ॥ ४७
मघवंस्त्वां भक्षयामि सविष्णुं वै तपोबलात् ।
पश्यतां सर्वदेवानामीदृशं मे तपोबलम् ॥ ४८
व्यास उवाच
इत्युक्तौ तु तया देवौ विष्ण्वन्द्रौ योगविद्यया ।
अभिभूतौ महात्मानौ स्तब्धौ तौ सम्बभूवतुः ॥ ४ ९
विस्मितास्तु तदा देवा दृष्ट्वा तावतिबाधितौ ।
चक्रुः किलकिलाशब्दं ततस्ते दीनमानसाः ॥ ५०
क्रोशमानान्सुरान्दृष्ट्वा विष्णुं प्राह शचीपतिः ।
विशेषेणाभिभूतोऽस्मि त्वत्तोऽहं मधुसूदन ॥५१
जह्येनां तरसा विष्णो यावन्नौ न दहेत्प्रभो ।
तपसा दर्पितां दुष्टां मा विचारय माधव ॥ ५२
इत्युक्तो भगवान्विष्णुः शक्रेण प्रथितेन च ।
चक्रं सस्मार तरसा घृणां त्यक्त्वाथ माधवः ॥ ५३
स्मृतमात्रं तु सम्प्राप्तं चक्रं विष्णुवशानुगम् ।
दधार च करे क्रुद्धो वधार्थं शक्रनोदितः ॥ ५४ ।
ऐसा कहकर उन्होंने निद्राको प्रेरित किया । उस निद्राने देवताओंके पास आकर उनपर अपना प्रभाव डाल दिया, जिससे इन्द्रसहित सभी देवता निद्रा वशीभूत हो गये और गूँगेकी भाँति पड़े रहे ॥ ४४ ॥
इन्द्रको निद्रा द्वारा नियन्त्रित तथा दीन देखकर भगवान् विष्णुने कहा- हे देवश्रेष्ठ! तुम मुझमें प्रविष्ट हो जाओ, तुम्हारा कल्याण हो, मैं तुम्हें अन्यत्र पहुँचाता हूँ ॥४५ ॥
विष्णुके इस प्रकार कहनेपर इन्द्र उनमें प्रवेश कर गये और उन श्रीहरिसे रक्षित होकर वे निर्भय तथा निद्रारहित हो गये ॥ ४६ ॥
तब भगवान् विष्णुके द्वारा रक्षित इन्द्रको व्यथाशून्य देखकर शुक्राचार्यकी माता कुपित हो उठीं और यह वचन बोलीं- हे इन्द्र! सभी देवताओंके देखते - देखते मैं अपने तपोबलसे विष्णुसहित तुम्हें खा जाऊँगी; ऐसा मेरा तपोबल है ॥ ४७-४८ ॥ व्यासजी बोले- ऐसा कहकर उन्होंने अपनी योगविद्याके द्वारा इन्द्र तथा विष्णुको आक्रान्त कर दिया और वे दोनों महात्मा स्तब्ध हो गये ॥ ४ ९ ॥ उन दोनोंको बहुत बड़े संकटमें पड़ा देखकर देवताओंको महान् आश्चर्य हुआ और वे दुःखीचित्त हो जोर - जोर से चीखने - चिल्लाने लगे ॥ ५० ॥
देवताओंको चीखते - चिल्लाते देखकर इन्द्रने विष्णुसे कहा - हे मधुसूदन! मैं [ इस समय ] आपकी अपेक्षा अधिक आक्रान्त हूँ । अतः हे विष्णो! हे प्रभो! यह हमें जबतक भस्म न कर दे, आप तपस्याके अभिमानमें चूर इस दुष्टाको शीघ्रतापूर्वक मार डालिये । हे माधव! अब आप सोच - विचार न करें ॥ ५१-५२ ॥ कीर्तिमान् इन्द्रके ऐसा कहनेपर लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुने दया छोड़कर तत्काल सुदर्शन चक्रका स्मरण किया । विष्णुके वशमें रहनेवाला वह चक्र उनके स्मरण करते ही आ पहुँचा और इन्द्रसे प्रेरित होकर उन्होंने कुपित हो उसके वधके लिये चक्रको अपने हाथमें ले लिया ॥ ५३-५४ ॥
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अ ० १२ ] चतुर्थ
गृहीत्वा तत्करे चक्रं शिरश्चिच्छेद रंहसा ।
हतां दृष्ट्वा तु तां शक्रो मुदितश्चाभवत्तदा ॥ ५५
देवाश्चातीव सन्तुष्टा हरिं जय जयेति च ।
तुष्टुवुर्मुदिताः सर्वे सञ्जाता विगतज्वराः ॥ ५६
इन्द्रविष्णू तु सञ्जातौ तत्क्षणाद्धृदयव्यथौ ।
स्त्रीवधाच्छंकमानौ तु भृगोः शापं दुरत्ययम् ॥ ५७
स्कन्ध ४५५ उस चक्रको हाथमें लेकर भगवान् विष्णुने बड़े वेगसे उसका सिर काट दिया । तब उसे मृत देखकर इन्द्र हर्षित हो उठे । सभी देवता सन्तुष्ट होकर विष्णुकी जयकार करने प्रसन्न होकर उनकी स्तुति करने सन्तापरहित हो गये॥५५-५६ ॥ स्त्रीवधसे [ होनेवाले पाप ] तथा भीषण शापकी शंका करते हुए वे भगवान् | इन्द्र उसी समयसे दुःखीचित्त रहने लगे भी अत्यन्त लगे । वे लगे और भृगुमुनिके विष्णु तथा ॥ ५७ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे शुक्रमातुर्वधवर्णनं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
III III III IIII अथ द्वादशोऽध्यायः महात्मा भृगुद्वारा विष्णुको मानवयोनिमें जन्म लेनेका शाप देना, इन्द्रद्वारा अपनी पुत्री जयन्तीको शुक्राचार्यके लिये अर्पित करना, देवगुरु बृहस्पतिद्वारा शुक्राचार्यका रूप धारणकर दैत्योंका पुरोहित बनना व्यास उवाच
तं दृष्ट्वा तु वधं घोरं चुक्रोध भगवान्भृगुः ।
वेपमानोऽतिदुःखार्तः प्रोवाच मधुसूदनम् ॥ १
भृगुरुवाच
अकृत्यं ते कृतं विष्णो जानन्पापं महामते ।
वधोऽयं विप्रजाताया मनसा कर्तुमक्षमः ॥ २
आख्यातस्त्वं सत्त्वगुणः स्मृतो ब्रह्मा च राजसः ।
तथासौ तामसः शम्भुर्विपरीतं कथं स्मृतम् ॥ ३
तामसस्त्वं कथं जातः कृतं कर्मातिनिन्दितम् ।
अवध्या स्त्री त्वया विष्णो हता कस्मान्निरागसा ॥ ४
शपामि त्वां दुराचारं किमन्यत्प्रकरोमि ते ।
विधुरोऽहं कृतः पाप त्वयाहं शक्रकारणात् ॥ ५
न शपेऽहं तथा शक्रं शपे त्वां मधुसूदन ।
सदा छलपरोऽसि त्वं कीटयोनिर्दुराशयः ॥ ६
व्यासजी बोले - [ हे राजन्! ] उस भयानक वधको देखकर भगवान् भृगु अत्यन्त कुपित हुए और दुःखसे व्याकुल होकर काँपते हुए वे मधुसूदन विष्णुसे कहने लगे ॥ १ ॥
भृगु बोले - हे महाबुद्धिमान् विष्णो! जो नहीं करना चाहिये वह पाप आपने जान - बूझकर कर डाला । विप्र - स्त्रीके इस वधकी तो मनसे कल्पना करना भी अनुचित है ॥२ ॥
आप तो सत्त्वगुणसे सम्पन्न कहे गये हैं, ब्रह्मा रजोगुणी और शिव तमोगुणी बताये गये हैं; तब आपने अपने गुणके विपरीत कार्य क्यों किया? आप तामसी कैसे हो गये, जिससे आपने यह घोर निन्दनीय कर्म कर डाला? हे विष्णो! आपने उस अवध्य तथा निरपराध स्त्रीको क्यों मार डाला? ॥ ३-४ ॥ [ उन्होंने क्रोधपूर्वक कहा कि ] अब मैं तुझ दुराचारीको शाप दे रहा हूँ, इसके अतिरिक्त तुम्हारा क्या प्रतीकार करूँ? अरे पापी! तुमने इन्द्रके हित लिये मुझे विधुर बना दिया । हे मधुसूदन! मैं इन्द्रको शाप नहीं दूँगा, बल्कि तुम्हें ही शाप दूँगा । कृष्ण सर्पसदृश दुरभिप्रायवाले तुम सदा छल करनेमें ही तत्पर रहते हो ॥ ५-६ ॥
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४५६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १२ ये च त्वां सात्त्विकं प्राहुस्ते मूर्खा मुनयः किल तामसस्त्वं दुराचारः प्रत्यक्षं मे जनार्दन अवतारा मृत्युलोके सन्तु मच्छापसम्भवाः प्रायो गर्भभवं दुःखं भुंक्ष्व पापाज्जनार्दन व्यास उवाच
ततस्तेनाथ शापेन नष्टे धर्मे पुनः पुनः ।
लोकस्य च हितार्थाय जायते मानुषेष्विह ॥
राजोवाच
भृगुभार्या हता तत्र चक्रेणामिततेजसा ।
गार्हस्थ्यञ्च पुनस्तस्य कथं जातं महात्मनः ॥
व्यास उवाच
इति शप्त्वा हरिं रोषात्तदादाय शिरस्त्वरन् ।
काये संयोज्य तरसा भृगुः प्रोवाच कार्यवित् ॥
अद्य त्वां विष्णुना देवि हतां सञ्जीवयाम्यहम् ।
यदि कृत्स्नो मया धर्मो ज्ञायते चरितोऽपि वा ॥
तेन सत्येन जीवेत यदि सत्यं ब्रवीम्यहम् ।
पश्यन्तु देवताः सर्वा मम तेजोबलं महत् ॥
अद्भिस्त्वां प्रोक्ष्य शीताभिर्जीवयामि तपोबलात् ।
सत्यं शौचं तथा वेदा यदि मे तपसो बलम् ॥
व्यास उवाच
अद्भिः सम्प्रोक्षिता देवी सद्यः सञ्जीविता तदा ।
उत्थिता परमप्रीता भृगोर्भार्या शुचिस्मिता ॥
ततस्तां सर्वभूतानि दृष्ट्वा सुप्तोत्थितामिव ।
साधु साध्विति तं तां तु तुष्टुवुः सर्वतो दिशम् ॥
एवं सञ्जीविता तेन भृगुणा वरवर्णिनी ।
विस्मयं परमं जग्मुर्देवाः सेन्द्रा विलोक्य तत् ॥
। हे जनार्दन! जो मुनि तुम्हें सात्त्विक कहते हैं. ॥ ७ वे निश्चय ही मूर्ख हैं । मैंने तो प्रत्यक्ष जान लिय कि तुम तमोगुणी तथा दुराचारी हो । अतः हे । जनार्दन! मेरे शापसे मृत्युलोकमें तुम्हारे अनेक अवतार ॥ ८ हों और [ इस स्त्री - वधजन्य ] पापके कारण बार-बार गर्भवाससे होनेवाले दुःखको भोगो ॥ ७-८ ॥ व्यासजी बोले – उसी शापके कारण भगवान् विष्णु धर्मका ह्रास होनेपर संसारके कल्याणके लिये ९ बार - बार मानवरूपोंमें प्रकट होते हैं ॥ ९ ॥
राजा बोले - [ हे व्यासजी! ] जब अमित तेजस्वी चक्रके द्वारा भृगुपत्नीका वध हो गया. उसके बाद महात्मा भृगुका गार्हस्थ्य - जीवन कैसे १० व्यतीत हुआ? ॥ १० ॥
व्यासजी बोले- इस प्रकार रोषपूर्वक भगवान् विष्णुको शाप देकर कार्यकुशल महर्षि भृगु तत्काल उस [ कटे ] सिरको लेकर शीघ्रतापूर्वक [ अपनी ११ | पत्नीके ] धड़में जोड़ करके बोले – हे देवि! विष्णुके द्वारा तुम मारी जा चुकी हो, किंतु अब मैं तुम्हें फिरसे जीवित कर रहा हूँ । यदि मैं सम्पूर्ण धर्म १२ जानता हूँ तथा उसका सम्यक् आचरण करता हूँ और सदा सत्य भाषण करता हूँ तो उसी सत्यके प्रभावसे तुम जीवित हो जाओ । सभी देवता मेरे १३ महान् तेज- बलको देख लें । यदि मुझमें सत्य, पवित्रता, वेदाध्ययन तथा तपस्याका बल होगा तो १४ मैं उन्हींके प्रभावसे शीतल जलसे तुम्हारा प्रोक्षण करके तुम्हें जीवित कर दूँगा ॥ ११–१४ ॥ व्यासजी बोले- तब जलसे प्रोक्षित करते ही मधुर मुसकानवाली वे भृगुपत्नी शीघ्र ही जीवित हो गयीं और बड़ी प्रसन्नतापूर्वक उठकर १५ खड़ी हो गयीं ॥ १५ ॥
तब सोकर उठी हुईके समान उसे देखकर सब ओरसे लोग ' साधु - साधु ' - ऐसा कहकर भृगुमुनि १६ तथा उनकी भार्या दोनोंकी स्तुति करने लगे ॥१६ ॥
इस प्रकार उन महर्षि भृगुने उस सुन्दरीको जीवित कर दिया । यह देखकर इन्द्रसहित सभी देवता १७ । अत्यन्त आश्चर्यचकित हो उठे ॥ १७ ॥
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अ ० १२ ] चतुर्थ स्कन्ध ४५७
इन्द्रः सुरानथोवाच मुनिना जीविता सती ।
काव्यस्तप्त्वा तपो घोरं किं करिष्यति मन्त्रवित् ॥
व्यास उवाच
गता निद्रा सुरेन्द्रस्य देहेऽक्षेममभून्नृप ।
स्मृत्वा काव्यस्य वृत्तान्तं मन्त्रार्थमतिदारुणम् ॥
विमृश्य मनसा शक्रो जयन्तीं स्वसुतां तदा ।
उवाच कन्यां चार्वङ्गीं स्मितपूर्वमिदं वचः ॥
गच्छ पुत्रि मया दत्ता काव्याय त्वं तपस्विने ।
समाराधय तन्वङ्गि मत्कृते तं वशं कुरु ॥
उपचारैर्मुनिं तैस्तैः समाराध्य मनः प्रियैः ।
भयं मे तरसा गत्वा हर तत्र वराश्रमे ॥
सा पितुर्वचनं श्रुत्वा तत्रागच्छन्मनोरमा ।
तमपश्यद्विशालाक्षी पिबन्तं धूममाश्रमे ॥
तस्य देहं समालोक्य स्मृत्वा वाक्यं पितुस्तदा ।
कदलीदलमादाय वीजयामास तं मुनिम् ॥
निर्मलं शीतलं वारि समानीय सुवासितम् ।
पानाय कल्पयामास भक्त्या परमया लघु ॥
छायां वस्त्रातपत्रेण भास्करे मध्यगे सति ।
रचयामास तन्वङ्गी स्वयं धर्मे स्थिता सती ॥
फलान्यानीय दिव्यानि पक्वानि मधुराणि च ।
मुमोचाग्रे मुनेस्तस्य भक्षार्थं विहितानि च ॥
कुशा: प्रादेशमात्रा हि हरिताः शुकसन्निभाः ।
दधाराग्रेऽथ पुष्पाणि नित्यकर्मसमृद्धये ॥
निद्रार्थं कल्पयामास संस्तरं पल्लवान्वितम् ।
तस्मिन्मुनौ चादरस्था चकार व्यजनं शनैः ॥
तत्पश्चात् इन्द्रने देवताओंसे कहा- - भृगुमुनिने १८ अपनी साध्वी भार्याको जीवित कर दिया । साथ ही मन्त्रज्ञानी शुक्राचार्य कठोर तपस्या करके [ शिवसे मन्त्र प्राप्तकर ] पता नहीं क्या कर डालेंगे! ॥ १८ ॥
व्यासजी बोले - हे राजन्! मन्त्रप्राप्तिके लिये शुक्राचार्यके अत्यन्त कठोर तपका स्मरण करके १ ९ इन्द्रकी नींद समाप्त हो गयी और उनके शरीरमें व्याकुलता होने लगी ॥ १ ९ तब मनमें भली - भाँति विचार करके इन्द्रने २० सुन्दर स्वरूपवाली अपनी पुत्री जयन्तीसे मुसकराते हुए कहा - हे पुत्र! मैंने तुम्हें तपस्वी शुक्राचार्यको सौंप दिया । अतः हे तन्वंगि! अब तुम जाओ और २१ मेरे कल्याणके लिये उनकी सेवा करो और उन्हें वशमें कर लो । उस उत्तम आश्रममें शीघ्र जाकर उनके मनको प्रिय लगनेवाले विविध उपचारोंसे उन्हें २२ प्रसन्न करके मेरा भय दूर करो ॥ २० - २२ ॥ विशाल नयनोंवाली वह सुन्दर कन्या पिताकी बात सुनकर [ शुक्राचार्यके ] आश्रममें गयी और २३ वहाँपर उसने मुनिको [ नीचेकी ओर सिर करके ] धुएँका सेवन करते हुए देखा ॥ २३ ॥
तब उनके [ तपोरत ] शरीरको देखकर और २४ पिताकी बात याद करके वह केलेका एक पत्ता लेकर मुनिको पंखा झलने लगी ॥ २४ ॥
तबसे वह उनके पीनेके लिये अत्यन्त स्वच्छ, २५ शीतल, सुगन्धित तथा रुचिकर जल ले आकर [ उनके समक्ष ] श्रद्धापूर्वक उपस्थित किया करती । सूर्यके मध्य आकाशमें होते ही वह सुन्दरी उनके ऊपर वस्त्रसे २६ । छतरी बनाकर छाया कर देती थी । वह साध्वी सदा पातिव्रत्य धर्मका पालन करती थी ॥ २५-२६ ॥ वह शास्त्रविहित दिव्य, पके तथा मीठे फल २७ लाकर खानेके लिये उन मुनिके समक्ष रख देती थी । वह कन्या उनके नित्यकर्मके सम्पादनार्थ पुष्प और तोते वर्णके समान प्रादेशमात्र मापवाले हरे - हरे कुश २८ उनके आगे प्रस्तुत कर देती थी । उनके शयनके लिये वह कोमल - कोमल पत्तोंका बिछौना तैयार करती थी
और फिर उन मुनिके प्रति आदरभाव रखकर धीरे-२ ९ । धीरे पंखा झलने लगती थी॥२७–२९ ॥
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४५८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १२
हावभावादिकं किञ्चिद्विकारजननं च तत् ।
न चकार जयन्ती सा शापभीता मुनेस्तदा ॥ ३०
स्तुतिं चकार तन्वङ्गी गीर्भिस्तस्य महात्मनः ।
सुभाषिण्यनुकूलाभिः प्रीतिकर्त्रीभिरप्युत ॥ ३१
प्रबुद्धे जलमादाय दधाराचमनाय च ।
मनोऽनुकूलं सततं कुर्वन्ती व्यचरत्तदा ॥ ३२
इन्द्रोऽपि सेवकांस्तत्र प्रेषयामास चातुरः ।
प्रवृत्तिं ज्ञातुकामो वै मुनेस्तस्य जितात्मनः ॥ ३३
एवं बहूनि वर्षाणि परिचर्यापराभवत् ।
निर्विकारा जितक्रोधा ब्रह्मचर्यपरा सती ॥ ३४
पूर्णे वर्षसहस्त्रे तु परितुष्टो महेश्वरः ।
वरेण छन्दयामास काव्यं प्रीतमना हरः ॥ ३५
ईश्वर उवाच
यच्च किञ्चिदपि ब्रह्मन्विद्यते भृगुनन्दन ।
प्रतिपश्यसि यत्सर्वं यच्च वाच्यं न कस्यचित् ॥ ३६
सर्वाभिभावकत्वेन भविष्यसि न संशयः ।
अवध्यः सर्वभूतानां प्रजेशश्च द्विजोत्तमः ॥ ३७
व्यास उवाच
एवं दत्त्वा वराञ्छम्भुस्तत्रैवान्तरधीयत ।
काव्यस्तामथ संवीक्ष्य जयन्तीं वाक्यमब्रवीत् ॥ ३८
कासि कस्यासि सुश्रोणि ब्रूहि किं ते चिकीर्षितम् ।
किमर्थमिह सम्प्राप्ता कार्यं वद वरोरु मे ॥ ३ ९
किं वाञ्छसि करोम्यद्य दुष्करं चेत्सुलोचने ।
प्रीतोऽस्मि त्वत्कृतेनाद्य वरं वरय सुव्रते ॥ ४०
मुनिके शापसे भयभीत होकर वह जयन्ती उनके मनमें विकार उत्पन्न करनेवाला कोई हाव - भाव प्रदर्शित नहीं करती थी ॥ ३० ॥
सुकुमार अंगोंवाली तथा मृदुभाषण करनेवाली वह कन्या उन महात्माके मनके अनुकूल तथा प्रीति उत्पन्न करनेवाले शब्दोंसे उनकी स्तुति करती थी । तत्पश्चात् उनके जाग जानेपर आचमनके लिये जल लाकर रख देती थी । इस प्रकार सदा उनके मनके अनुकूल कार्य करती हुई उनके साथ व्यवहार करती थी ॥ ३१-३२ ॥ चिन्तासे व्याकुल इन्द्र भी उन जितेन्द्रिय मुनिकी प्रवृत्ति जाननेकी इच्छासे अपने सेवक भेजते रहते थे ॥ ३३ ॥
इस प्रकार वह साध्वी कन्या क्रोधपर विजय प्राप्त करके, निर्विकार होकर तथा ब्रह्मचर्यपरायण रहती हुई बहुत वर्षोंतक मुनिकी सेवामें संलग्न रही ॥ ३४ ॥
तदनन्तर हजार वर्ष पूर्ण होनेपर महेश्वर शिव प्रसन्न हो गये और प्रसन्नतापूर्वक वे शुक्राचार्यसे वर माँगनेके लिये कहने लगे ॥ ३५ ॥
ईश्वर बोले - हे ब्रह्मन्! हे भृगुनन्दन! जगत्में जो कुछ भी विद्यमान है, आप जो सब देख रहे हैं तथा जो किसीकी भी वाणीका विषय नहीं है— उन सबके स्वामित्वसे आप युक्त हो जायँगे; इसमें कोई सन्देह नहीं है । आप सभी प्राणियोंसे अवध्य होंगे । आप प्रजाओंके स्वामी तथा श्रेष्ठ ब्राह्मणके रूपमें प्रतिष्ठित होंगे ॥ ३६-३७ ॥ व्यासजी बोले- इस प्रकार वर प्रदान करके शिवजी वहीं अन्तर्धान हो गये । तत्पश्चात् जयन्तीको देखकर शुक्राचार्यने उससे कहा- हे सुश्रोणि! तुम कौन हो और किसकी पुत्री हो; मुझे अपनी अभिलाषा बताओ । हे सुन्दरि! तुम यहाँ किसलिये आयी हो, अपना कार्य बताओ । हे सुनयने! तुम क्या चाहती हो; यदि वह कार्य दुष्कर भी हो तो भी मैं उसे अभी कर दूँगा । हे सुव्रते! आज मैं तुम्हारी सेवासे प्रसन्न हूँ, अतः वर माँग लो ॥ ३८-४० ॥
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अ ० १२ ] चतुर्थ स्कन्ध ४५ ९
ततः सा तु मुनिं प्राह जयन्ती मुदितानना ।
चिकीर्षितं मे भगवंस्तपसा ज्ञातुमर्हसि ॥
शुक्र उवाच
ज्ञातं मया तथापि त्वं ब्रूहि यन्मनसेप्सितम् ।
करोमि सर्वथा भद्रं प्रीतोऽस्मि परिचर्यया ॥
जयन्त्युवाच
शक्रस्याहं सुता ब्रह्मन् पित्रा तुभ्यं समर्पिता ।
जयन्ती नामतश्चाहं जयन्तावरजा मुने ॥
सकामास्मि त्वयि विभो वाञ्छितं कुरु मेऽधुना ।
रंस्ये त्वया महाभाग धर्मतः प्रीतिपूर्वकम् ॥
शुक्र उवाच
मया सह त्वं सुश्रोणि दशवर्षाणि भामिनि ।
सर्वैर्भूतैरदृश्या च रमस्वेह यदृच्छया ॥
व्यास उवाच
एवमुक्त्वा गृहं गत्वा जयन्त्याः पाणिमुद्वहन् ।
तया सहावसद्देव्या दशवर्षाणि भार्गवः ॥
अदृश्यः सर्वभूतानां मायया संवृतः प्रभुः ।
दैत्यास्तमागतं श्रुत्वा कृतार्थं मन्त्रसंयुतम् ॥
अभिजग्मुर्गृहे तस्य मुदितास्ते दिदृक्षवः ।
नापश्यन् रममाणं ते जयन्त्या सह संयुतम् ॥
तदा विमनसः सर्वे जाता भग्नोद्यमाश्च ते ।
चिन्तापरातिदीनाश्च वीक्षमाणाः पुनः पुनः ॥
अदृष्ट्वा तं तु संवृत्तं प्रतिजग्मुर्यथागतम् ।
स्वगृहान्दैत्यवर्यास्ते चिन्ताविष्टा भयातुराः ॥
रममाणं तथा ज्ञात्वा शक्रः प्रोवाच तं गुरुम् ।
बृहस्पतिं महाभागं किं कर्तव्यमितः परम् ॥
तदनन्तर प्रसन्न मुखमण्डलवाली जयन्तीने मुनिसे ४१ कहा— हे भगवन्! आप तो अपनी तपस्यासे मेरा अभिलषित जान लेने में समर्थ हैं ॥ ४१ ॥
शुक्राचार्य बोले- वह तो मैंने जान लिया, फिर भी जो तुम्हारा मनोभिलषित है, उसे तुम मुझे बताओ । मैं हर तरहसे तुम्हारा कल्याण करूँगा; ४२ क्योंकि मैं तुम्हारी सेवासे प्रसन्न हूँ ॥४२ ॥
जयन्ती बोली – हे ब्रह्मन्! मैं इन्द्रकी पुत्री हूँ और पिताजीने मुझे आपको सौंप दिया है । हे मुने! मेरा नाम जयन्ती है और मैं जयन्तकी छोटी बहन ४३ हूँ ॥ ४३ ॥
हे विभो! मैं आपपर आसक्त हूँ, अतः मेरी अभिलाषा पूर्ण कीजिये । हे महाभाग! मैं पातिव्रत-४४ धर्मके अनुसार प्रेमपूर्वक आपके साथ विहार करूँगी ॥ ४४ ॥
शुक्राचार्य बोले - हे सुश्रोणि! हे भामिनि! तुम सभी प्राणियोंसे अदृश्य रहती हुई दस वर्षोंतक ४५ इच्छानुसार मेरे साथ यहाँ विहार करो ॥ ४५ ॥
व्यासजी बोले- ऐसा कहकर शुक्राचार्यने घर जाकर जयन्तीके साथ विवाह किया । तत्पश्चात् मायासे आच्छादित होकर सभी प्राणियोंसे अदृश्य ४६ रहते हुए वे ऐश्वर्यसम्पन्न मुनि शुक्राचार्य देवी जयन्तीके साथ दस वर्षोंतक वहाँ रहे ॥ ४६ ॥
गुरु शुक्राचार्यको अपने उद्देश्यमें सफल हो ४७ मन्त्रसे युक्त होकर आया हुआ सुनकर सभी दैत्य उनके दर्शनकी इच्छासे प्रसन्नतापूर्वक उनके घर गये, किंतु वे उन्हें देख न सके; क्योंकि उस समय वे ४८ जयन्तीके साथ विहार कर रहे थे ॥ ४७-४८ ॥ इससे उन सभी दैत्योंका मन उदास हो गया और उनके सभी उद्योग व्यर्थ हो गये । वे बहुत ४ ९ चिन्तित और दु: खी होकर उन्हें बार - बार खोजते रहे । अन्तमें [ मायासे ] आच्छादित उन मुनिको न देखकर वे चिन्तित तथा भयभीत दैत्य जैसे आये थे ५० वैसे ही अपने घर लौट गये ॥४ ९ -५० ॥ तत्पश्चात् शुक्राचार्यको विहार करता हुआ जानकर इन्द्रने अपने गुरु महाभाग बृहस्पतिसे ५१ कहा- अब क्या किया जाय? ॥ ५१ ॥
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४६० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १३
गच्छाद्य दानवान्ब्रह्मन्मायया त्वं प्रलोभय ।
अस्माकं कुरु कार्यं त्वं बुद्ध्या सञ्चिन्त्य मानद ॥ ५२
तच्छ्रुत्वा वचनं काव्यं रममाणं सुसंवृतम् ।
ज्ञात्वा तद्रूपमास्थाय दैत्यान्प्रति ययौ गुरुः ॥ ५३
गत्वा तत्रातिभक्त्यासौ दानवान्समुपाह्वयत् ।
आगतास्तेऽसुराः सर्वे ददृशुः काव्यमग्रतः ॥ ५४
प्रणम्य संस्थिताः सर्वे काव्यं मत्वातिमोहिताः ।
न विदुस्ते गुरोर्मायां काव्यरूपविभाविनीम् ॥ ५५
तानुवाच गुरुः काव्यरूपः प्रच्छन्नमायया ।
स्वागतं मम याज्यानां प्राप्तोऽहं वो हिताय वै ॥ ५६
अहं वो बोधयिष्यामि विद्यां प्राप्ताममायया ।
तपसा तोषितः शम्भुर्युष्मत्कल्याणहेतवे ॥ ५७
तच्छ्रुत्वा प्रीतमनसो जातास्ते दानवोत्तमाः ।
कृतकार्यं गुरुं मत्वा जहृषुस्ते विमोहिताः ॥ ५८
प्रणेमुस्ते मुदा युक्ता निरातङ्का गतव्यथाः ।
देवेभ्यश्च भयं त्यक्त्वा तस्थुः सर्वे निरामयाः ॥ ५ ९
हे ब्रह्मन्! आप दानवोंके पास जाइये और मायाके द्वारा उन्हें मोहमें डाल दीजिये । हे मानद! बुद्धिसे भलीभाँति विचार करके आप हमारा कार्य सिद्ध कर दीजिये ॥ ५२ ॥
इन्द्रकी बात सुनकर देवगुरु बृहस्पति शुक्राचार्यको मायाच्छादित होनेके कारण [ अदृश्य हो जयन्तीके साथ ] क्रीडा करते जानकर उन्हींका रूप धारण करके दैत्योंके पास गये ॥ ५३ ॥
वहाँ पहुँचकर उन्होंने बड़े आदरके साथ दानवोंको बुलवाया । तब सभी दानव आ गये और उन्होंने शुक्राचार्यको अपने सम्मुख देखा ॥५४ ॥
मायासे विमोहित सभी दैत्य [ उन छद्मवेषधारी देवगुरु बृहस्पतिको ही ] शुक्राचार्य समझकर उन्हें प्रणाम करके उनके समक्ष खड़े हो गये । वे शुक्राचार्यका कृत्रिम रूप प्रकट करनेवाली देवगुरु बृहस्पतिकी मायाको नहीं जान सके ॥ ५५ ॥
तत्पश्चात् छद्म मायासे शुक्राचार्यका रूप धारण करनेवाले गुरु बृहस्पतिने उनसे कहा- मेरे यजमानोंका स्वागत है । मैं आपलोगोंके हितके लिये अब आ गया हूँ । मैंने आप सबके कल्याणके लिये तपस्याके द्वारा भगवान् शिवको प्रसन्न कर लिया और अब मैं उनसे प्राप्त विद्याको निष्कपट भावसे आपलोगोंको बता दूँगा ॥ ५६-५७ ॥ यह सुनकर वे श्रेष्ठ दानव प्रसन्नचित्त हो गये । गुरु शुक्राचार्यको अपने उद्देश्यमें सफल समझकर वे मोहग्रस्त दानव बहुत हर्षित हुए और उन्होंने बड़ी प्रसन्नताके साथ उन्हें प्रणाम किया । वे भयमुक्त तथा सन्तापरहित हो गये । अब देवताओंका भय छोड़कर वे । सभी दैत्य स्वस्थचित्त होकर रहने लगे ॥ ५८-५९ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे जयन्त्या शुक्रसहवासवर्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
अथ त्रयोदशोऽध्यायः शुक्राचार्यरूपधारी बृहस्पतिका दैत्योंको उपदेश देना राजोवाच राजा बोले - [ हे व्यासजी! ] तत्पश्चात् किं कृतं गुरुणा पश्चाद् भृगुरूपेण वर्तता । शुक्राचार्यका रूप धारण करनेवाले बुद्धिमान् गुरु बृहस्पति छलपूर्वक दैत्योंका पुरोहित बनकर
छलेनैव हि दैत्यानां पौरोहित्येन धीमता ॥ १ । क्या किया? ॥ १ ॥
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अ ० १३ ]
गुरुः सुराणामनिशं सर्वविद्यानिधिस्तथा ।
सुतोऽङ्गिरस एवासौ स कथं छलकृन्मुनिः ॥
धर्मशास्त्रेषु सर्वेषु सत्यं धर्मस्य कारणम् ।
कथितं मुनिभिर्येन परमात्मापि लभ्यते ॥
वाचस्पतिस्तथा मिथ्यावक्ता चेद्दानवान्प्रति ।
कः सत्यवक्ता संसारे भविष्यति गृहाश्रमी ॥
आहारादधिकं भोज्यं ब्रह्माण्डविभवेऽपि न ।
तदर्थं मुनयो मिथ्या प्रवर्तन्ते कथं मुने ॥
शब्दप्रमाणमुच्छेदं शिष्टाभावे गतं न किम् ।
छलकर्मप्रवृत्ते वाविगीतत्वं गुरौ कथम् ॥
देवाः सत्त्वसमुद्भूता राजसा मानवाः स्मृताः ।
तिर्यञ्चस्तामसाः प्रोक्ता उत्पत्तौ मुनिभिः किल ॥
अमराणां गुरुः साक्षान्मिथ्यावादी स्वयं यदि । तदा कः सत्यवक्ता स्याद्राजसस्तामसः पुनः क्व स्थितिस्तस्य धर्मस्य सन्देहोऽयं ममात्मनः । का गतिः सर्वजन्तूनां मिथ्याभूते जगत्त्रये हरिर्ब्रह्मा शचीकान्तस्तथान्ये सुरसत्तमाः सर्वे छलविधौ दक्षा मनुष्याणाञ्च का कथा कामक्रोधाभिसन्तप्ता लोभोपहतचेतसः छले दक्षाः सुराः सर्वे मुनयश्च तपोधनाः वसिष्ठो वामदेवश्च विश्वामित्रो गुरुस्तथा एते पापरता: कात्र गतिर्धर्मस्य मानद इन्द्रोऽग्निश्चन्द्रमा वेधाः परदाराभिलम्पटाः आर्यत्वं भुवनेष्वेषु स्थितं कुत्र मुने वद चतुर्थ स्कन्ध ४६१ वे तो देवताओंके गुरु हैं, सदासे सभी विद्याओंके निधान हैं और महर्षि अंगिराके पुत्र हैं; तब उन मुनिने छल क्यों किया? ॥२ ॥
मुनियोंने समस्त धर्मशास्त्रोंमें सत्यको ही धर्मका मूल बताया है, जिससे परमात्मातक प्राप्त ३ किये जा सकते हैं ॥ ३ ॥
जब बृहस्पति भी दानवोंसे झूठ बोले, तब संसारमें कौन गृहस्थ सत्य बोलनेवाला हो सकेगा? ॥४ ॥
४ हे मुने! सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका वैभव पासमें हो जानेपर भी [ कोई व्यक्ति अपने ] आहारसे अधिक नहीं खा सकता, तब उसीके निमित्त मुनिलोग भी ५ मिथ्या - भाषण में किसलिये प्रवृत्त हो जाते हैं? ॥ ५ ॥
इस प्रकारके अशिष्ट आचरणसे देवगुरु बृहस्पतिके वचनोंकी प्रामाणिकता क्या नष्ट नहीं हो ६ गयी और इस छलकर्ममें लिप्त होनेसे उन्हें निष्कलंक कैसे कहा जा सकता है? ॥ ६ ॥
मुनियोंने देवताओंको सत्त्वगुणसे, मनुष्योंको ७ रजोगुणसे तथा पशु - पक्षियोंको तमोगुणसे उत्पन्न बतलाया है ॥७ ॥
यदि स्वयं देवगुरु बृहस्पति ही साक्षात् मिथ्या-॥ ८ भाषणमें प्रवृत्त हो गये, तब रजोगुण तथा तमोगुणसे युक्त कौन प्राणी सत्यवादी हो सकेगा? ॥ ८ ॥
इस प्रकार तीनों लोकोंके मिथ्यापरायण हो जानेपर धर्मकी स्थिति कहाँ होगी और सभी प्राणियोंकी ॥ क्या दशा होगी? यही मेरा संदेह है ॥ ९ ॥
। भगवान् विष्णु, ब्रह्मा, इन्द्र तथा और भी दूसरे महान् देवतागण - सब छलकार्यमें निपुण हैं, तब ॥ १० मनुष्योंकी बात ही क्या? ॥१० ॥
सभी देवता और तपोधन मुनिगण भी काम तथा । क्रोधसे सन्तप्त और लोभसे व्याकुलचित्त होकर ॥ ११ छल - प्रपंचमें तत्पर रहते हैं ॥ ११ ॥
हे मानद! जब वसिष्ठ, वामदेव, विश्वामित्र । और गुरु बृहस्पति - ये लोग भी पाप - कर्ममें संलग्न ॥ १२ हो गये, तब धर्मकी क्या दशा होगी? ॥१२ ॥
इन्द्र, अग्नि, चन्द्रमा और ब्रह्मातक कामके । वशीभूत हो गये, तब हे मुने! आप ही बतायें कि इन ॥ १३ । भुवनोंमें शिष्टता कहाँ रह गयी? ॥१३ ॥