देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 471–480

देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 471–480

पृष्ठ 471

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४६२ वचनं कस्य मन्तव्यमुपदेशधियानघ । सर्वे लोभाभिभूतास्ते देवाश्च मुनयस्तदा व्यास उवाच

किं विष्णुः किं शिवो ब्रह्मा मघवा किं बृहस्पतिः ।

देहवान् प्रभवत्येव विकारैः संयुतस्तदा ॥

रागी विष्णुः शिवो रागी ब्रह्मापि रागसंयुतः । ( रागवान्किमकृत्यं वै न करोति नराधिप ) रागवानपि चातुर्याद्विदेह इव लक्ष्यते ॥

सम्प्राप्ते संकटे सोऽपि गुणैः सम्बाध्यते किल ।

कारणाद्रहितं कार्यं कथं भवितुमर्हति ॥

ब्रह्मादीनां च सर्वेषां गुणा एव हि कारणम् ।

पञ्चविंशत्समुद्भूता देहास्तेषां न चान्यथा ॥

काले मरणधर्मास्ते सन्देहः कोऽत्र ते नृप ।

परोपदेशे विस्पष्टं शिष्टाः सर्वे भवन्ति च ॥

विप्लुतिर्ह्यविशेषेण स्वकार्ये समुपस्थिते ।

कामः क्रोधस्तथा लोभद्रोहाहङ्कारमत्सराः ॥

देहवान्कः परित्यक्तुमीशो भवति तान्पुनः ।

संसारोऽयं महाराज सदैवैवंविधः स्मृतः ॥

नान्यथा प्रभवत्येव शुभाशुभमयः किल । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १३ हे पुण्यात्मन्! जब वे सब देवता और मुनिलोग् ॥ १४ भी लोभके वशीभूत हैं, तब उपदेश ग्रहण करनेके विचारसे किसका वचन प्रमाण माना जाय? ॥ १४ । व्यासजी बोले - [ हे राजन्! ] चाहे विष्णु. ब्रह्मा, शिव, इन्द्र और बृहस्पति ही क्यों न हों-१५ देहधारी तो विकारोंसे युक्त रहता ही है ॥ १५ ॥

ब्रह्मा, विष्णु और महेशतक आसक्तिसे ग्रस्त हैं । ( हे राजन्! आसक्त प्राणी कौन - सा अनर्थ नहीं कर बैठता ) आसक्तिसे युक्त प्राणी भी चतुराईके कारण १६ विरक्तकी भाँति दिखायी पड़ता है, किंतु संकट उपस्थित होनेपर वह [ सत्त्व, रज, तम ] गुणोंसे १७ आबद्ध हो जाता है । कोई भी कार्य बिना कारणके कैसे हो सकता है? ब्रह्मा आदि समस्त देवताओंके भी मूल कारण गुण ही हैं । उनके भी शरीर पचीस १८ तत्त्वोंसे बने हैं, इसमें सन्देह नहीं है । हे राजन्! समय आ जानेपर वे भी मृत्युको प्राप्त होते हैं, इसमें आपको संशय कैसा? ॥१६–१८३ ॥ १ ९ यह पूर्णरूपसे स्पष्ट है कि दूसरोंको उपदेश देनेमें सभी लोग शिष्ट बन जाते हैं, किंतु अपना कार्य २० पड़नेपर उस उपदेशका पूर्णतः लोप हो जाता है । जो काम, क्रोध, लोभ, द्रोह, अहंकार और डाह आदि विकार हैं; उन्हें छोड़नेमें कौन - सा देहधारी प्राणी २१ समर्थ हो सकता है? हे महाराज! यह संसार सदासे ही इसी प्रकार शुभाशुभसे युक्त कहा गया है, इसमें कदाचिद्भगवान्विष्णुस्तपश्चरति दारुणम् ॥२२ सन्देह नहीं है ॥ १ ९ –२१ ÷ ॥ कदाचिद्विविधान्यज्ञान्वितनोति सुराधिपः । कदाचित्तु रमारङ्गरञ्जितः रमारङ्गरञ्जितः परमेश्वरः ॥

रमते किल वैकुण्ठे तद्वशस्तरुणो विभुः ।

कदाचिद्दानवैः सार्धं युद्धं परमदारुणम् ॥

करोति करुणासिन्धुस्तद्बाणापीडितो भृशम् ।

कदाचिज्जयमाप्नोति दैवात्सोऽपि पराजयम् ॥

सुखदुःखाभिभूतोऽसौ भवत्येव न संशयः ।

शेषे शेते कदाचिद्वै योगनिद्रासमावृतः ॥

काले जागर्ति विश्वात्मा स्वभावप्रतिबोधितः । कभी भगवान् विष्णु घोर तपस्या करते हैं, कभी वे ही सुरेश्वर अनेक प्रकारके यज्ञ करते हैं, कभी वे २३ परमेश्वर विष्णु लक्ष्मीके प्रेम - रसमें सिक्त होकर उनके वशीभूत हो वैकुण्ठमें विहार करते हैं । वे करुणासागर विष्णु कभी दानवोंके साथ अत्यन्त भीषण युद्ध करते २४ हैं और उनके बाणोंसे आहत हो जाते हैं । [ उस युद्धमें ] वे कभी विजयी होते हैं और कभी दैववश २५ पराजित भी हो जाते हैं । इस प्रकार वे भी सुख तथा दुःखसे प्रभावित होते हैं; इसमें सन्देह नहीं है । वे विश्वात्मा कभी योगनिद्राके वशवर्ती होकर शेषशय्यापर २६ शयन करते हैं और कभी सृष्टिकाल आनेपर योगमायासे

प्रेरित होकर जाग भी जाते हैं । २२ - २६३ ॥

पृष्ठ 472

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अ ० १३ ] चतुर्थ शर्वो ब्रह्मा हरिश्चेति इन्द्राद्या ये सुरास्तथा ॥ २७

मुनयश्च विनिर्माणैः स्वायुषो विचरन्ति हि ।

निशावसाने सञ्जाते जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥ २८

म्रियते नात्र सन्देहो नृप किञ्चित्कदापि च ।

स्वायुषोऽन्ते पद्मजाद्याः क्षयमृच्छन्ति पार्थिव ॥ २ ९

प्रभवन्ति पुनर्विष्णुहरशक्रादयः सुराः ।

तस्मात्कामादिकान्भावान्देहवान्प्रतिपद्यते ॥ ३०

नात्र ते विस्मयः कार्यः कदाचिदपि पार्थिव ।

संसारोऽयं तु सन्दिग्धः कामक्रोधादिभिर्नृप ॥ ३१

दुर्लभस्तद्विनिर्मुक्तः पुरुषः परमार्थवित् ।

यो बिभेतीह संसारे स दारान्न करोत्यपि ॥ ३२

विमुक्तः सर्वसङ्गेभ्यो विचरत्यविशङ्कितः ।

तस्माद् बृहस्पतेर्भार्या शशिना लम्भिता पुनः ॥ ३३

गुरुणा लम्भिता भार्या तथा भ्रातुर्यवीयसः ।

एवं संसारचक्रेऽस्मिन् रागलोभादिभिर्वृतः ॥ ३४

गार्हस्थ्यञ्च समास्थाय कथं मुक्तो भवेन्नरः ।

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन हित्वा संसारसारताम् ॥ ३५

आराधयेन्महेशानीं सच्चिदानन्दरूपिणीम् ।

तन्मायागुणतश्छन्नं जगदेतच्चराचरम् ॥ ३६

भ्रमत्युन्मत्तवत्सर्वं मदिरामत्तवन्नृप ।

तस्या आराधनेनैव गुणान्सर्वान्विमृद्य च ॥ ३७

मुक्तिं भजेत मतिमान्नान्यः पन्थास्त्वितः परः ।

आराधिता महेशानी न यावत्कुरुते कृपाम् ॥ ३८

तावद्भवेत्सुखं कस्मात्को ऽन्योऽस्ति दयया युतः ।

करुणासागरामेतां भजेत्तस्मादमायया ॥ ३ ९

यस्यास्तु भजनेनैव जीवन्मुक्तत्वमश्नुते । स्कन्ध ४६३ ब्रह्मा, विष्णु, महेश और इन्द्र आदि जो देवता तथा मुनिगण हैं - वे भी अपनी आयुके परिमाणकालतक ही जीवित रहते हैं । हे राजन्! अन्तकाल आनेपर स्थावर जंगमात्मक यह जगत् भी विनष्ट हो जाता है, इसमें कभी भी कुछ भी सन्देह नहीं करना चाहिये । हे भूपाल! अपनी आयुका अन्त हो जानेपर ब्रह्मा, विष्णु, महेश, इन्द्र आदि देवता भी विनष्ट हो जाते हैं और [ सृष्टिकाल आनेपर ] पुनः ये उत्पन्न भी हो जाते हैं ॥ २७–२९ ३ ॥ अतएव देहधारी प्राणी काम आदि भावोंसे ग्रस्त हो ही जाता है; हे राजन्! इस विषयमें आपको कभी भी विस्मय नहीं करना चाहिये । हे राजन्! यह संसार तो काम, क्रोध आदिसे ओतप्रोत है । इनसे पूर्णत: मुक्त तथा परम तत्त्वको जाननेवाला पुरुष दुर्लभ है ॥ ३०-३१ ॥ जो इस संसारमें [ काम, क्रोध आदि विकारोंसे ] डरता है, वह विवाह नहीं करता । वह समस्त प्रकारकी आसक्तियोंसे मुक्त होकर निर्भीकतापूर्वक विचरता है । इसके विपरीत संसारसे आबद्ध रहनेके कारण ही बृहस्पतिकी पत्नीको चन्द्रमाने रख लिया था और देवगुरु बृहस्पतिने अपने छोटे भाईकी पत्नीको अपना लिया था । इस प्रकार इस संसार - चक्रमें राग, लोभ आदिसे जकड़ा हुआ मनुष्य गृहस्थीमें आसक्त रहकर भला मुक्त कैसे हो सकता है? ॥ ३२-३४३ ॥ अतः पूर्ण प्रयत्नके साथ संसारमें आसक्तिका त्याग करके सच्चिदानन्दस्वरूपिणी भगवती महेश्वरीकी आराधना करनी चाहिये । हे राजन्! यह सम्पूर्ण चराचर जगत् उन्हींके मायारूपी गुणसे आच्छादित होकर उन्मत्त तथा मदिरापान करके मतवाले मनुष्यकी भाँति चक्कर काटता रहता है ॥ ३५-३६ ॥ उन्हींकी आराधनाके द्वारा [ सत्त्व आदि ] सभी गुणोंको पराभूत करके बुद्धिमान् मनुष्य मुक्ति प्राप्त कर सकता है, इसके अतिरिक्त कोई दूसरा मार्ग नहीं है । आराधित ---होकर महेश्वरी जबतक कृपा नहीं करतीं, तबतक सुख कैसे हो सकता है? उनके सदृश दयावान् दूसरा कौन है? अतः निष्कपट भावसे करुणासागर भगवतीकी आराधना करनी चाहिये, जिनके भजनसे मनुष्य जीते-जी मुक्ति प्राप्त कर सकता है ॥ ३७ – ३ ९ ३ ॥

पृष्ठ 473

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४६४ मानुष्यं दुर्लभं प्राप्य सेविता न महेश्वरी निःश्रेणिकाग्रात्पतिता अध इत्येव विद्महे अहङ्कारावृतं विश्वं गुणत्रयसमन्वितम् ॥ असत्येनापि सम्बद्धं मुच्यते कथमन्यथा हित्वा सर्वं ततः सर्वैः संसेव्या भुवनेश्वरी ॥ राजोवाच किं कृतं गुरुणा तत्र काव्यरूपधरेण च । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १३ ॥ ४० दुर्लभ मनुष्य- जन्म पाकर जिसने उन महेश्वरीकी उपासना नहीं की, वह मानो अन्तिम सीढ़ीसे फिसलकर । गिर गया - मैं तो यही धारणा रखता हूँ । सम्पूर्ण विश्व ४१ अहंकारसे आच्छादित है, तीनों गुणोंसे युक्त है तथा असत्यसे बँधा हुआ है, तब प्राणी मुक्त कैसे हो सकता । है? अतः सब कुछ छोड़कर सभी लोगोंको भगवती ४२ भुवनेश्वरीकी उपासना करनी चाहिये ॥ ४०–४२ ॥ राजा बोले- हे पितामह! शुक्राचार्यका रूप धारण करनेवाले देवगुरु बृहस्पतिने वहाँ दैत्योंके पास पहुँचकर क्या किया और शुक्राचार्य पुनः कब लौटे? वह हमें बताइये ॥ ४३ ॥

कदा शुक्रः समायातस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ ४३ व्यासजी बोले - – हे राजन्! तब गोपनीय व्यास उवाच

शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि यत्कृतं गुरुणा तदा ।

कृत्वा काव्यस्वरूपञ्च प्रच्छन्नेन महात्मना ॥

गुरुणा बोधिता दैत्या मत्वा काव्यं स्वकं गुरुम् ।

विश्वासं परमं कृत्वा बभूवुस्तन्मयास्तदा ॥

विद्यार्थं शरणं प्राप्ता भृगुं मत्वातिमोहिताः ।

गुरुणा विप्रलब्धास्ते लोभात्को वा न मुह्यति ॥

दशवर्षात्मके काले सम्पूर्णसमये तदा ।

जयन्त्या सह क्रीडित्वा काव्यो याज्यानचिन्तयत् ॥

आशया मम मार्ग ते पश्यन्तः संस्थिताः किल ।

गत्वा तान्वै प्रपश्येऽहं याज्यानतिभयातुरान् ॥

मा देवेभ्यो भयं तेषां मद्भक्तानां भवेदिति ।

सञ्चिन्त्य बुद्धिमास्थाय जयन्तीं प्रत्युवाच ह ॥

देवानेवोपसंयान्ति पुत्रा मे चारुलोचने ।

समयस्तेऽद्य सम्पूर्णो जातोऽयं दशवार्षिकः ॥

तस्माद् गच्छाम्यहं देवि द्रष्टुं याज्यान्सुमध्यमे ।

पुनरेवागमिष्यामि तवान्तिकमनुद्रुतः ॥

ढंगसे शुक्राचार्यका स्वरूप बनाकर देवगुरुने जो कुछ किया, वह मैं बताता हूँ, आप सुनिये ॥ ४४ ॥

देवगुरु बृहस्पतिने दैत्योंको बोध प्रदान किया । ४४ तब शुक्राचार्यको अपना गुरु समझकर और उनपर पूर्ण विश्वास करके सभी दैत्य उन्हींके कथनानुसार व्यवहार करने लगे ॥ ४५ ॥

४५ अत्यधिक मोहितचित्त वे दैत्य बृहस्पतिको शुक्राचार्य समझकर विद्याप्राप्तिके लिये उनके शरणागत हुए । देवगुरु बृहस्पतिने भी उन्हें बहुत ४६ ठगा । [ यह सत्य है कि ] लोभसे कौन - सा प्राणी मोहमें नहीं पड़ जाता ॥ ४६ ॥

तब जयन्तीके साथ क्रीडा करते - करते निर्धारित ४७ प्रतिज्ञासम्बन्धी दस वर्षकी अवधि पूर्ण हो जानेपर शुक्राचार्य अपने यजमानोंके विषयमें विचार करने लगे कि मेरी राह देखते हुए वे आशान्वित हो बैठे होंगे । अतः अब मैं चलकर अपने उन अत्यन्त ४८ भयभीत यजमानोंको देखूँ । कहीं ऐसा न हो कि मेरे उन भक्तोंके सम्मुख देवताओंसे कोई भय उत्पन्न हो गया हो ॥ ४७-४८३ ॥ ४ ९ यह सोचकर अपनी बुद्धि स्थिर करके उन्होंने जयन्तीसे कहा - हे सुनयने! मेरे पुत्रसदृश दैत्यगण देवताओंके पास कालक्षेप कर रहे हैं । ५० प्रतिज्ञानुसार तुम्हारे साथ रहनेका दस वर्षका समय पूरा हो चुका है, अतः हे देवि! अब मैं अपने यजमानोंसे मिलने जा रहा हूँ । हे सुमध्यमे! मैं पुनः ५१ तुम्हारे पास शीघ्र ही लौट आऊँगा ॥ ४ ९ - ५१ ॥

पृष्ठ 474

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अ ० १३ ]

तथेति तमुवाचाथ जयन्ती धर्मवित्तमा ।

यथेष्टं गच्छ धर्मज्ञ न ते धर्मं विलोपये ॥

तच्छ्रुत्वा वचनं काव्यो जगाम त्वरितस्ततः ।

अपश्यद्दानवानां च पार्श्वे वाचस्पतिं तदा ॥

छद्मरूपधरं सौम्यं बोधयन्तं छलेन तान् ।

जैनं धर्मं कृतं स्वेन यज्ञनिन्दापरं तथा ॥

भो देवरिपवः सत्यं ब्रवीमि भवतां हितम् ।

अहिंसा परमो धर्मोऽहन्तव्या ह्याततायिनः ॥

द्विजैर्भोगरतैर्वेदे दर्शितं हिंसनं पशोः ।

जिह्वास्वादपरैः काममहिंसैव परा मता ॥

एवंविधानि वाक्यानि वेदशास्त्रपराणि च ।

ब्रुवाणं गुरुमाकर्ण्य विस्मितोऽसौ भृगोः सुतः ॥

चिन्तयामास मनसा मम द्वेष्यो गुरुः किल ।

वञ्चिताः किल धूर्तेन याज्या मे नात्र संशयः ॥

धिग्लोभं पापबीजं वै नरकद्वारमूर्जितम् ।

गुरुरप्यनृतं ब्रूते प्रेरितो येन पाप्मना ॥

प्रमाणं वचनं यस्य सोऽपि पाखण्डधारकः ।

गुरुः सुराणां सर्वेषां धर्मशास्त्रप्रवर्तकः ॥

किं किं न लभते लोभान्मलिनीकृतमानसः ।

अन्योऽपि गुरुरप्येवं जातः पाखण्डपण्डितः ॥

शैलूषचेष्टितं सर्वं परिगृह्य द्विजोत्तमः ।

वञ्चयत्यतिसम्मूढान्दैत्यान्याज्यान्ममाप्यसौ ॥

चतुर्थ स्कन्ध ४६५ परम धर्मपरायणा जयन्तीने उनसे कहा — हे ५२ धर्मज्ञ! बहुत ठीक है, आप स्वेच्छापूर्वक जाइये । मैं आपका धर्म लुप्त नहीं होने दूँगी ॥ ५२ ॥

उसका यह वचन सुनकर शुक्राचार्य वहाँसे ५३ शीघ्रतापूर्वक चल पड़े । वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा कि दैत्योंके पास विराजमान होकर बृहस्पति छद्मरूप धारण करके शान्तचित्त हो छलसे उन्हें अपने द्वारा रचित जिन - धर्म तथा यज्ञनिन्दापरक वचनोंकी शिक्षा ५४ इस प्रकार दे रहे हैं – ' हे देवताओंके शत्रुगण! मैं सत्य तथा आपलोगोंके हितकी बात बता रहा हूँ कि अहिंसा सर्वोपरि धर्म है । आततायियों को भी नहीं ५५ मारना चाहिये । भोगपरायण तथा अपनी जिह्वाके स्वादके लिये सदा तत्पर रहनेवाले द्विजोंने वेदमें पशुहिंसाका उल्लेख कर दिया है, किंतु सच्चाई यह है कि ५६ अहिंसाको ही सर्वोत्कृष्ट माना गया है ' ॥ ५३–५६ ॥ इस प्रकारकी वेद - शास्त्रविरोधी बातें कहते हुए देवगुरु बृहस्पतिको देखकर वे भृगुपुत्र ५७ शुक्राचार्य आश्चर्यचकित हो गये । वे मन - ही - मन सोचने लगे कि यह देवगुरु तो मेरा शत्रु है । इस धूर्तने मेरे यजमानोंको अवश्य ठग लिया है, इसमें ५८ सन्देह नहीं है ॥ ५७-५८ ॥ नरकके द्वारस्वरूप तथा पापके बीजरूप उस उग्र लोभको धिक्कार है, जिस लोभरूप पापसे प्रेरित ५ ९ होकर देवगुरु बृहस्पति भी झूठ बोल रहे हैं ॥ ५ ९ ॥ जिनका वचन प्रमाण माना जाता है और जो समस्त देवताओंके गुरु तथा धर्मशास्त्रोंके प्रवर्तक हैं, ६० वे भी पाखण्डके पोषक हो गये हैं ॥ ६० ॥

लोभसे विकृत मनवाला प्राणी क्या - क्या नहीं कर डालता । दूसरोंकी क्या बात, जबकि साक्षात् ६१ देवगुरु ही इस प्रकारके पाखण्डके पण्डित हो गये हैं । श्रेष्ठ ब्राह्मण होकर भी ये धूर्तोंकी सारी भाव-भंगिमाएँ बनाकर मेरे इन घोर अज्ञानी दैत्य यजमानोंको ६२ | ठग रहे हैं ॥ ६१-६२ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे शुक्ररूपेण गुरुणा दैत्यवञ्चनावर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥

पृष्ठ 475

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४६६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १४ अथ चतुर्दशोऽध्यायः शुक्राचार्यद्वारा दैत्योंको बृहस्पतिका पाखण्डपूर्ण कृत्य बताना, बृहस्पतिकी मायासे मोहित दैत्योंका उन्हें फटकारना, क्रुद्ध शुक्राचार्यका दैत्योंको शाप देना, बृहस्पतिका अन्तर्धान हो जाना, प्रह्लादका शुक्राचार्यजीसे क्षमा माँगना और शुक्राचार्यका उन्हें व्यास उवाच

इति सञ्चिन्त्य मनसा तानुवाच हसन्निव ।

वञ्चिता मत्स्वरूपेण दैत्याः किं गुरुणा किल ॥

अहं काव्यो गुरुश्चायं देवकार्यप्रसाधकः ।

अनेन वञ्चिता यूयं मद्याज्या नात्र संशयः ॥

मा श्रद्धध्वं वचोऽस्यार्या दाम्भिकोऽयं मदाकृतिः ।

अनुगच्छत मां याज्यास्त्यजतैनं बृहस्पतिम् ॥

इत्याकर्ण्य वचस्तस्य दृष्ट्वा तौ सदृशौ पुनः ।

विस्मयं परमं जग्मुः काव्योऽयमिति निश्चिताः ॥

स तान्वीक्ष्य सुसम्भ्रान्तान्गुरुर्वाक्यमुवाच ह ।

गुरुर्वो वञ्चयत्येव मद्रूपोऽयं बृहस्पतिः ॥

प्राप्तो वञ्चयितुं युष्मान्देवकार्यार्थसिद्धये ।

मा विश्वासं वचस्तस्य कुरुध्वं दैत्यसत्तमाः ॥

प्राप्ता विद्या मया शम्भोर्युष्मानध्यापयामि ताम् ।

देवेभ्यो विजयं नूनं करिष्यामि न संशयः ॥

इति श्रुत्वा गुरोर्वाक्यं काव्यरूपधरस्य ते 1 विश्वासं परमं जग्मुः काव्योऽयमिति निश्चयात् ॥ काव्येन बहुधा तत्र बोधिताः किल दानवाः । बुबुधुर्न गुरोर्मायामोहिताः कालपर्ययात् कालपर्ययात् ॥ ॥ प्रारब्धकी बलवत्ता समझाना व्यासजी बोले – मनमें ऐसा सोचकर उन दैत्योंसे शुक्राचार्यने हँसते हुए कहा - हे दैत्यगण! मेरा स्वरूप बनाये हुए इस देवगुरु बृहस्पतिने तुमलोगोंको १ ठग लिया क्या? शुक्राचार्य मैं हूँ और ये तो देवताओंका कार्य सिद्ध करनेवाले देवगुरु बृहस्पति हैं । हे मेरे यजमानो! इन्होंने तुम सबको अवश्य ठग २ लिया; इसमें सन्देह नहीं है । हे आर्यो! इनकी बातोंपर विश्वास मत करो । ये पाखण्डी हैं तथा मेरा स्वरूप बनाये हुए हैं । हे यजमानो! तुमलोग मेरा अनुसरण ३ करो और इन बृहस्पतिका त्याग कर दो ॥ १-३ ॥ उनका यह वचन सुनकर और फिर उन दोनोंको समान रूपवाला देखकर सभी दैत्य महान् आश्चर्यमें ४ पड़ गये । पुनः उन्होंने विचार किया कि हो सकता है ये ही शुक्राचार्य हों ॥४ ॥

इस प्रकार उन दैत्योंको अत्यन्त विस्मित देखकर [ शुक्राचार्यरूपधारी ] गुरु बृहस्पतिने यह बात कही-५ मेरा स्वरूप बनाये हुए ये देवगुरु बृहस्पति तुम सबको धोखा दे रहे हैं । ये देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके निमित्त तुमलोगोंको ठगनेके लिये आये हुए हैं । हे श्रेष्ठ दैत्यगण! तुमलोग इनकी ६ बातपर विश्वास मत करो । मैंने शंकरजीसे विद्या प्राप्त कर ली है और उसे तुम सबको पढ़ा रहा हूँ । इस प्रकार मैं तुम्हें देवताओंपर विजय दिला ७ दूँगा; इसमें सन्देह नहीं है॥५–७ ॥ शुक्राचार्यका रूप धारण करनेवाले देवगुरु बृहस्पतिका यह वाक्य सुनकर उन दैत्योंको पूर्ण विश्वास हो गया कि ये ही निश्चितरूपसे ८ [ हमारे गुरु ] शुक्राचार्य हैं । उस समय शुक्राचार्यने उन्हें बहुत प्रकारसे समझाया फिर भी समय के फेरसे गुरु बृहस्पतिकी मायासे मोहित होनेके ९ ९ । कारण वे दैत्य समझ नहीं सके ॥ ८ - ९ ॥

पृष्ठ 476

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अ ० १४ ]

एवं ते निश्चयं कृत्वा ततो भार्गवमब्रुवन् ।

अयं गुरुर्नो धर्मात्मा बुद्धिदश्च हिते रतः ॥

दशवर्षाणि सततमयं नः शास्ति भार्गवः ।

गच्छ त्वं कुहको भासि नास्माकं गुरुरप्युत ॥

इत्युक्त्वा भार्गवं मूढा निर्भर्त्स्य च पुनः पुनः ।

जगृहस्तं गुरुं प्रीत्या प्रणिपत्याभिवाद्य च ॥

काव्यस्तु तन्मयान्दृष्ट्वा चुकोपाथ शशाप च ।

दैत्यान्विबोधितान्मत्वा गुरुणा चातिवञ्चितान् ॥

यस्मान्मया बोधिता वै गृह्णीयुर्न च मे वचः ।

तस्मात्प्रनष्टसंज्ञा वै पराभवमवाप्स्यथ ॥

मदवज्ञाफलं कामं स्वल्पे काले ह्यवाप्स्यथ ।

तदास्य कपटं सर्वं परिज्ञातं भविष्यति ॥

व्यास उवाच

इत्युक्त्वासौ जगामाशु भार्गवः क्रोधसंयुतः ।

बृहस्पतिर्मुदं प्राप्य तस्थौ तत्र समाहितः ॥

ततः शप्तान्गुरुर्ज्ञात्वा दैत्यांस्तान्भार्गवेण हि ।

जगाम तरसा त्यक्त्वा स्वरूपं स्वं विधाय च ॥

गत्वोवाच तदा शक्रं कृतं कार्यं मया ध्रुवम् ।

शप्ताः शुक्रेण ते दैत्या मया त्यक्ताः पुनः किल ॥

निराधाराः कृता नूनं यतध्वं सुरसत्तमाः ।

संग्रामार्थं महाभाग शापदग्धा मया कृताः ॥

इति श्रुत्वा गुरोर्वाक्यं मघवा मुदमाप्तवान् ।

जहृषुश्च सुराः सर्वे प्रतिपूज्य बृहस्पतिम् ॥

चतुर्थ स्कन्ध ४६७ ऐसा निश्चय करनेके उपरान्त उन्होंने शुक्राचार्यसे १० कहा — ये ही हमारे गुरु हैं । ये धर्मात्मा हमें बुद्धि प्रदान करनेवाले हैं और हमारा हित करनेमें तत्पर हैं । इन शुक्राचार्यजीने हमें निरन्तर दस वर्षतक शिक्षा दी है । तुम चले जाओ, तुम धूर्त जान पड़ते हो; तुम ११ हमारे गुरु बिलकुल नहीं हो सकते ॥ १०-११ ॥ ऐसा कहकर उन मूर्ख दैत्योंने शुक्राचार्यको बार - बार फटकारा और बृहस्पतिको प्रेमपूर्वक प्रणाम १२ तथा अभिवादन करके उन्हें ही अपना गुरु स्वीकार कर लिया ॥ १२ ॥

देवगुरु बृहस्पतिने इन दैत्योंको पूर्णरूपसे १३ सिखा - पढ़ा दिया है तथा इन्हें खूब ठगा है - ऐसा मानकर और इन्हें गुरु बृहस्पतिमें तन्मय देखकर शुक्राचार्य बहुत कुपित हुए और उन्होंने शाप दे १४ दिया कि मेरे बार - बार समझानेपर भी तुमलोगोंने मेरी बात नहीं मानी, इसलिये नष्ट बुद्धिवाले तुम सब पराभवको प्राप्त होओगे । तुमलोग थोड़े ही समयमें १५ मेरे तिरस्कारका फल पाओगे । तब इनका सारा कपट तुम सबको मालूम पड़ जायगा ॥ १३-१५ ॥ व्यासजी बोले- ऐसा कहकर क्रोधमें भरे शुक्राचार्य तत्काल चल दिये और [ शुक्राचार्यरूपधारी ] १६ बृहस्पति प्रसन्न होकर निश्चिन्तभावसे वहाँ रहने लगे ॥ १६ ॥

तदनन्तर शुक्राचार्यके द्वारा उन दैत्योंको शापित हुआ जानकर गुरु बृहस्पति तत्काल उन्हें छोड़कर १७ अपना रूप धारणकर वहाँसे चल पड़े । उन्होंने जाकर इन्द्रसे कहा- मैंने [ आपका ] सम्पूर्ण कार्य भलीभाँति बना दिया है । शुक्राचार्यने उन दैत्योंको १८ शाप दे दिया और बादमें मैंने भी उनका त्याग कर दिया । अब मैंने उन्हें पूर्णरूपसे असहाय बना दिया है । अतः हे श्रेष्ठ देवतागण! आपलोग युद्धके लिये अब उद्योग करें । हे महाभाग! मैंने उन दैत्योंको १ ९ शापसे दग्ध कर दिया है ॥ १७–१९ ॥ गुरु बृहस्पतिका यह वचन सुनकर इन्द्र बहुत आनन्दित हुए और सभी देवता भी हर्षित हो उठे । २० | तत्पश्चात् गुरु बृहस्पतिकी पूजा करके वे युद्धके लिये

पृष्ठ 477

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४६८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १४

संग्रामाय मतिं चक्रुः संविचार्य मिथः पुनः ।

निर्ययुर्मिलिताः सर्वे दानवाभिमुखाः सुराः ॥

सुरान्समुद्यताञ्ज्ञात्वा कृतोद्योगान्महाबलान् ।

अन्तर्हितं गुरुं चैव बभूवुश्चिन्तयान्विताः ॥

परस्परमथोचुस्ते मोहितास्तस्य मायया ।

सम्प्रसाद्यो महात्मा च यातोऽसौ रुष्टमानसः ॥

वञ्चयित्वा गतः पापो गुरुः कपटपण्डितः ।

भ्रातृस्त्रीलम्भनः प्रायो मलिनोऽन्तर्बहिः शुचिः ॥

किं कुर्मः क्व च गच्छामः कथं काव्यं प्रकोपितम् ।

कुर्वीमहि सहायार्थं प्रसन्नं हृष्टमानसम् ॥

इति सञ्चिन्त्य ते सर्वे मिलिता भयकम्पिताः ।

प्रह्लादं पुरतः कृत्वा जग्मुस्ते भार्गवं पुनः ॥

प्रणेमुश्चरणौ तस्य मुनेर्मौनभृतस्तदा ।

भार्गवस्तानुवाचाथ रोषसंरक्तलोचनः ॥

मया प्रबोधिता यूयं मोहिता गुरुमायया ।

न गृहीतं वचो योग्यं तदा याज्या हितं शुचि ॥

तदावगणितश्चाहं भवद्भिस्तद्वशं गतैः ।

प्राप्तं नूनं मदोन्मत्तैर्ममावमानजं फलम् ॥

तत्र गच्छत सद्भ्रष्टा यत्रासौ कपटाकृतिः ।

वञ्चकः सुरकार्यार्थी नाहं तद्वद्धि वञ्चकः ॥

व्यास उवाच

एवं ब्रुवन्तं शुक्रं तु वाक्यसन्दिग्धया गिरा ।

प्रह्लादस्तं तदोवाच गृहीत्वा चरणौ ततः ॥

मन्त्रणा करने लगे । आपसमें भलीभाँति सोच - विचार करके सभी देवता एक साथ मिलकर दानवोंसे २१ लड़नेके लिये वहाँसे निकल पड़े ॥ २०-२१ ॥ उधर महाबली देवताओंको युद्धकी तैयारी करके आक्रमणके लिये उद्यत तथा शुक्राचार्यरूपधारी गुरु २२ बृहस्पतिको अन्तर्हित जान करके दैत्यगण बहुत चिन्तित हुए ॥ २२ ॥

अब उन देवगुरुकी मायासे मोहित वे दैत्य २३ आपसमें कहने लगे कि वे गुरु शुक्राचार्य कुपितमन होकर यहाँ से चले गये, अतः हमें उन महात्माको भलीभाँति मनाना चाहिये ॥ २३ ॥

वह पापी और कपटकार्यमें अत्यन्त प्रवीण २४ देवगुरु हमें ठगकर चला गया । अपने भाईकी पत्नीके साथ अनाचार करनेवाला वह भीतरसे कलुषित है तथा ऊपरसे पवित्र प्रतीत होता है ॥ २४ ॥

अब हम क्या करें और कहाँ जायँ? अत्यन्त २५ कुपित गुरु शुक्राचार्यको अपनी सहायताके लिये हम किस तरह हर्षित तथा प्रसन्नचित्त करें ॥ २५ ॥

ऐसा विचार करके वे सब एकजुट हुए । २६ प्रह्लादको आगे करके भयसे काँपते हुए वे दैत्य पुनः भृगुपुत्र शुक्राचार्यके पास गये । [ वहाँ पहुँचकर ] उन्होंने मौन धारण किये हुए उन मुनिके चरणोंमें २७ प्रणाम किया । तब क्रोधसे लाल नेत्रोंवाले शुक्राचार्य उनसे कहने लगे ॥ २६-२७ ॥ हे यजमानो! मैंने तुमलोगोंको बहुत समझाया, किंतु देवगुरुकी मायासे व्यामुग्ध रहनेके कारण २८ तुम - लोगोंने मेरा उचित, हितकर और निष्कपट वचन नहीं माना ॥ २८ ॥

उस समय उनके वशवर्ती हुए तुम सबने मेरी २ ९ अवहेलना की । मदसे उन्मत्त रहनेवाले तुम सबको मेरे अपमान करनेका फल अवश्य मिल गया ॥ २ ९ ॥ तुमलोगों का सर्वस्व छिन गया । अब तुमलोग ३० वहीं पर चले जाओ; जहाँ वह कपटी, छली और देवताओंका कार्य सिद्ध करनेवाला बृहस्पति विद्यमान है; मैं उसकी तरह वंचक नहीं हूँ ॥३० ॥

व्यासजी बोले- इस प्रकार संदेहयुक्त वाणीमें बोलते हुए शुक्राचार्यके दोनों पैर पकड़कर प्रह्लाद ३१ । उनसे कहने लगे – ॥ ३१ ॥

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अ ० १४ ] प्रह्लाद उवाच

भार्गवाद्य समायातान्याज्यानस्मांस्तथातुरान् ।

त्यक्तुं नार्हसि सर्वज्ञ त्वद्धितांस्तनयान्हि नः ॥

गते त्वयि तु मन्त्रार्थं शैलूषेण दुरात्मना ।

त्वद्वेषमधुरालापैर्वयं तेन प्रवञ्चिताः ॥

अज्ञानकृतदोषेण नैव कुप्यति शान्तिमान् ।

सर्वज्ञस्त्वं विजानासि चित्तं नः प्रवणं त्वयि ॥

ज्ञात्वा नस्तपसा भावं त्यज कोपं महामते ।

ब्रुवन्ति मुनयः सर्वे क्षणकोपा हि साधवः ॥

जलं स्वभावतः शीतं वह्नयातपसमागमात् ।

भवत्युष्णं वियोगाच्च शीतत्वमनुगच्छति ॥

क्रोधश्चाण्डालरूपो वै त्यक्तव्यः सर्वथा बुधैः ।

तस्माद्रोषं परित्यज्य प्रसादं कुरु सुव्रत ॥

यदि न त्यजसि क्रोधं त्यजस्यस्मान्सुदुःखितान् ।

त्वया त्यक्ता महाभाग गमिष्यामो रसातलम् ॥

व्यास उवाच

प्रह्लादस्य वचः श्रुत्वा भार्गवो ज्ञानचक्षुषा ।

विलोक्य सुमना भूत्वा तानुवाच हसन्निव ॥

न भेतव्यं न गन्तव्यं दानवा वा रसातलम् ।

रक्षयिष्यामि वो याज्यान्मन्त्रैरवितथैः किल ॥

हितं सत्यं ब्रवीम्यद्य शृणुध्वं तत्तु निश्चयम् ।

वचनं मम धर्मज्ञाः श्रुतं यद् ब्रह्मणः पुरा ॥

अवश्यम्भाविनो भावाः प्रभवन्ति शुभाशुभाः ।

दैवं न चान्यथा कर्तुं क्षमः कोऽपि धरातले ॥

चतुर्थ स्कन्ध ४६ ९ प्रह्लाद बोले - हे भार्गव! हे सर्वज्ञ! अत्यन्त दुःखी होकर आज पास आये हुए अपने पुत्रतुल्य तथा हितचिन्तक हम यजमानोंका आप त्याग न ३२ करें ॥ ३२ ॥

मन्त्र - प्राप्ति के लिये आपके चले जानेपर उस कपटी तथा दुष्टात्मा बृहस्पतिने आपकी वेश - भूषा ३३ तथा मधुर वाणीके द्वारा हमलोगोंको खूब ठगा ॥ ३३ ॥

शान्तिसम्पन्न व्यक्ति किसीके द्वारा अनजानमें किये गये अपराधसे कुपित नहीं होता । आप तो सर्वज्ञ ३४ हैं, अतः जानते ही हैं कि हमलोगोंका चित्त सदा आपमें ही अनुरक्त रहता है ॥ ३४ ॥

अतः हे महामते! अपने तपोबलसे हमलोगोंका भाव जानकर आप क्रोधका त्याग कर दीजिये; ३५ क्योंकि सभी मुनिगण कहा करते हैं कि साधुपुरुषोंका क्रोध क्षणभरके लिये ही होता है ॥ ३५ ॥

जल स्वभावसे शीतल होता है, किंतु अग्नि और ३६ धूपके संपर्कसे वह गर्म हो जाता है । वही जल आग तथा धूपका संयोग दूर होते ही पुन: शीतलता प्राप्त कर लेता है ॥ ३६ ॥

३७ क्रोध चाण्डालरूप होता है; बुद्धिमान् लोगोंको इसका पूर्णरूपसे त्याग कर देना चाहिये । अतः हे सुव्रत! क्रोध छोड़कर आप हमपर प्रसन्न हो जाइये ॥ ३७ ॥

हे महाभाग! यदि आप क्रोधका त्याग नहीं ३८ करते बल्कि अत्यन्त दुःखित हमलोगोंका ही त्याग कर देते हैं, तो आपसे परित्यक्त होकर हम सब रसातलमें चले जायँगे ॥ ३८ ॥

व्यासजी बोले – प्रह्लादका वचन सुनकर ३ ९ शुक्राचार्य ज्ञानदृष्टिसे सब कुछ देख करके प्रसन्नचित्त हो उनसे हँसते हुए बोले – ॥३ ९ ॥ हे दानवो! तुमलोगोंको अब न तो डरना है और ४० न रसातलमें ही जाना है । मैं अपने अचूक मन्त्रोंसे तुम सब यजमानोंकी निश्चय ही रक्षा करूँगा ॥ ४० ॥

हे धर्मज्ञो! पूर्वकालमें मैंने ब्रह्माजीसे जो सुना है, वह हितकर, सत्य तथा अटल बात मैं तुमलोगोंको ४१ बता रहा हूँ, मेरी वह बात सुनिये - ॥ ४१ ॥

निश्चित रूपसे होनेवाली शुभ या अशुभ घटनाएँ होकर रहती हैं । धरातलपर कोई भी प्राणी ४२ प्रारब्धको टाल पानेमें समर्थ नहीं है ॥ ४२ ॥

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४७० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १४

अद्य मन्दबला यूयं कालयोगादसंशयम् ।

देवैर्जिताः सकृच्चापि पातालं प्रतिपत्स्यथ ॥

प्राप्तः पर्यायकालो व इति ब्रह्माभ्यभाषत ।

भुक्तं राज्यं भवद्भिश्च पूर्णं सर्वं समृद्धिमत् ॥

युगानि दश पूर्णानि देवानाक्रम्य मूर्धनि ।

दैवयोगाच्च युष्माभिर्भुक्तं त्रैलोक्यमूर्जितम् ॥

सावर्णिके मनौ राज्यं पुनस्तत्तु भविष्यति ।

पौत्रस्त्रैलोक्यविजयी राज्यं प्राप्स्यति ते बलिः ॥

यदा वामनरूपेण हृतं देवेन विष्णुना ।

तदैव च भवत्पौत्रः प्रोक्तो देवेन जिष्णुना ॥

हृतं येन बले राज्यं देववाञ्छार्थसिद्धये ।

त्वमिन्द्रो भविता चाग्रे स्थिते सावर्णिके मनौ ॥

भार्गव उवाच

इत्युक्तो हरिणा पौत्रस्तव प्रह्लाद साम्प्रतम् ।

अदृश्यः सर्वभूतानां गुप्तश्चरति भीतवत् ॥

एकदा वासवेनासौ बलिर्गर्दभरूपभाक् ।

शून्ये गृहे स्थितः कामं भयभीतः शतक्रतोः ॥

पृष्टश्च बहुधा तेन वासवेन बलिस्तदा ।

किमर्थं गार्दभं रूपं कृतवान्दैत्यपुङ्गव ॥

भोक्ता त्वं सर्वलोकस्य दैत्यानां च प्रशासिता । ( न लज्जा खररूपेण तव राक्षससत्तम । ) तस्य तद्वचनं श्रुत्वा दैत्यराजो बलिस्तदा ॥

प्रोवाच वचनं शक्रं कोऽत्र शोकः शतक्रतो ।

यथा विष्णुर्महातेजा मत्स्यकच्छपतां गतः ॥

इसमें संदेह नहीं कि तुमलोग आज समयके ४३ फेरसे क्षीण बलवाले हो गये हो, अतः एक बार देवताओंसे पराजित होकर तुमलोगोंको पातालमें जाना ही पड़ेगा ॥४३ ॥

अब तुमलोगोंका समय - परिवर्तन उपस्थित हुआ ४४है, ऐसा ब्रह्माजीने कहा था । कुछ दिनों पूर्व तुमलोगोंने सब प्रकारसे समृद्ध राज्यसुखका भोग किया था । उस समय देवताओं पर आक्रमण करके उनके मस्तकपर ४५ चरण रखकर तुमलोगोंने दैवयोगसे पूरे दस युगों तक इस दिव्य त्रिलोकीपर शासन किया था ॥। ४४-४५ ॥ [ अब आगे आनेवाले ] सावर्णि मन्वन्तरमें तुम्हें ४६ वह राज्य पुनः प्राप्त होगा । तुम्हारा पौत्र बलि तीनों लोकोंमें विजयी होकर राज्यको पुनः प्राप्त कर लेगा ॥ ४६ ॥

४७ जिस समय वामनरूप धारण करके भगवान् विष्णुने [ राजा बलिका राज्य ] छीन लिया था, उस समय भगवान् विष्णुने आपके पौत्र बलिसे कहा ४८ था - हे बले! मैंने तुम्हारा यह राज्य देवताओंकी अभिलाषा पूरी करनेके लिये छीना है, किंतु आगे सावर्णि मन्वन्तरके उपस्थित होनेपर तुम इन्द्र होओगे ॥ ४७-४८ ॥ ४ ९ शुक्राचार्य बोले - हे प्रह्लाद! भगवान् विष्णुके द्वारा ऐसा कहा गया तुम्हारा पौत्र बलि इस समय सभी प्राणियोंसे अदृश्य रहकर डरे हुएकी भाँति गुप्तरूपसे विचरण कर रहा है ॥ ४ ९ ॥ ५० एक समयकी बात है – इन्द्रसे भयभीत बलि गर्दभका रूप धारण करके एक सूने घरमें स्थित थे, तभी [ वहाँ पहुँचकर ] इन्द्र उन बलिसे बार - बार ५१ पूछने लगे - हे दैत्यश्रेष्ठ! आपने गर्दभका रूप क्यों धारण किया है? आप तो समस्त लोकोंका भोग करनेवाले और दैत्योंके शासक हैं । ( हे राक्षसश्रेष्ठ! क्या गर्दभका रूप धारण करनेमें आपको लज्जा नहीं ५२ लगती? ) ॥ ५०-५१ || तब इन्द्रकी वह बात सुनकर बलिने इन्द्रसे यह वचन कहा- - हे शतक्रतो! इसमें शोक कैसा? जैसे ५३ महान् तेजस्वी भगवान् विष्णुने मत्स्य और कच्छपका

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अ ० १५ ] चतुर्थ स्कन्ध ४७१

तथाहं खररूपेण संस्थितः कालयोगतः ।

यथा त्वं कमले लीनः संस्थितो ब्रह्महत्यया ॥

पीडितश्च तथा ह्यद्य स्थितोऽहं खररूपधृक् । दैवाधीनस्य किं दुःखं किं सुखं पाकशासन । कालः करोति वै नूनं यदिच्छति यथा तथा । भार्गव उवाच इति तौ बलिदेवेशौ कृत्वा संविदमुत्तमाम् ॥

प्रबोधं प्रापतुः कामं यथास्थानञ्च जग्मतुः ।

इत्येतत्ते समाख्याता मया दैवबलिष्ठता ॥

दैवाधीनं जगत्सर्वं सदेवासुरमानुषम् ॥

रूप धारण किया था, उसी प्रकार मैं भी समयके ५४ फेरसे गर्दभरूपसे स्थित हूँ । जिस प्रकार तुम ब्रह्महत्यासे दुःखी होकर कमलमें छिपकर पड़े रहे, उसी तरह मैं भी आज गर्दभका रूप धारण करके स्थित हूँ । हे ५५ पाकशासन! दैवके अधीन रहनेवालोंको क्या दुःख और क्या सुख? दैव जिस रूपमें जो चाहता है, वैसा निश्चितरूपसे करता है ॥ ५२ – ५५३ ॥ शुक्राचार्य बोले- इस प्रकार बलि और देवराज ५६ इन्द्रने परस्पर उत्तम बातें करके परम सन्तुष्टि प्राप्त की और इसके बाद वे अपने - अपने स्थानको चले गये । यह मैंने तुमसे प्रारब्धकी बलवत्ताका भलीभाँति ५७ वर्णन कर दिया । देवताओं, असुरों और मानवोंसे युक्त ५८ । सम्पूर्ण जगत् दैवके अधीन है॥५६–५८ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे प्रह्लादेन शुक्रकोपसान्त्वनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥

अथ पञ्चदशोऽध्यायः देवता और दैत्योंके युद्धमें दैत्योंकी विजय, इन्द्रद्वारा भगवतीकी स्तुति, भगवतीका प्रकट होकर दैत्योंके पास जाना, प्रह्लादद्वारा भगवतीकी स्तुति, देवीके आदेश से दैत्योंका पातालगमन व्यास उवाच इति तस्य वचः श्रुत्वा भार्गवस्य महात्मनः प्रह्लादस्तु सुसंहृष्टो बभूव नृपनन्दनः ज्ञात्वा दैवं बलिष्ठञ्च प्रह्लादस्तानुवाच ह कृतेऽपि युद्धे न जयो भविष्यति कदाचन तदा ते जयिनः प्रोचुर्दानवा मदगर्विताः संग्रामस्तु प्रकर्तव्यो दैवं किं न विदामहे निरुद्यमानां दैवं हि प्रधानमसुराधिप केन दृष्टं क्व वा दृष्टं कीदृशं केन निर्मितम् ॥ तस्माद्युद्धं करिष्यामो बलमास्थाय साम्प्रतम् । भवाग्रे दैत्यवर्य त्वं सर्वज्ञोऽसि महामते व्यासजी बोले – उन महात्मा शुक्राचार्यका । यह वचन सुनकर राजकुमार प्रह्लाद अत्यन्त ॥ १ हर्षित हुए । प्रारब्धको बलवान् मानकर प्रह्लादने उन दैत्योंसे कहा- युद्ध करनेपर भी विजय कभी नहीं । होगी ॥ १-२ ॥ ॥ २ तदनन्तर विजयकी अभिलाषा रखनेवाले उन । दानवोंने अभिमानसे चूर होकर कहा- हमें तो ॥ ३ निश्चितरूपसे संग्राम करना चाहिये । दैव क्या है! इसे हमलोग नहीं जानते । हे दानवेश्वर! उद्यमरहित । लोगोंके लिये ही दैव प्रधान होता है । दैवको किसने ४ देखा है, कहाँ देखा है, दैव कैसा है और उसे किसने बनाया है! अतएव अब हमलोग बलका आश्रय लेकर युद्ध करेंगे । हे दैत्यश्रेष्ठ! हे महामते! आप ॥ ५ सर्वज्ञ हैं, आप केवल हमारे आगे रहें ॥ ३–५ ॥