देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 481–490

देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 481–490

पृष्ठ 481

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 481 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४७२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १५ इत्युक्तस्तैस्तदा राजन् प्रह्लादः प्रबलारिहा सेनानीश्च तदा भूत्वा देवान्युद्धे समाह्वयत् तेऽपि तत्रासुरान्दृष्ट्वा संग्रामे समुपस्थितान् सर्वे सम्भृतसम्भारा देवास्तान्समयोधयन् ॥ संग्रामस्तु तदा घोरः शक्रप्रह्लादयोरभूत् पूर्णं वर्षशतं तत्र मुनीनां विस्मयावहः वर्तमाने महायुद्धे शुक्रेण प्रतिपालिताः जयमापुस्तदा दैत्याः प्रह्लादप्रमुखा नृप तदैवेन्द्रो गुरोर्वाक्यात्सर्वदुःखविनाशिनीम् संस्मार मनसा देवीं मुक्तिदां परमां शिवाम् इन्द्र उवाच जय देवि महामाये शूलधारिणि चाम्बिके शङ्खचक्रगदापद्मखड्गहस्ते ऽभयप्रदे नमस्ते भुवनेशानि शक्तिदर्शननायिके दशतत्त्वात्मिके मातर्महाबिन्दुस्वरूपिणि महाकुण्डलिनीरूपे सच्चिदानन्दरूपिणि । प्राणाग्निहोत्रविद्ये ते नमो दीपशिखात्मिके पञ्चकोशान्तरगते पुच्छब्रह्मस्वरूपिणि । आनन्दकलिके मातः सर्वोपनिषदर्चिते मातः प्रसीद सुमुखी भव हीनसत्त्वां-स्त्रायस्व नो जननि दैत्यपराजितान् वै त्वं देवि नः शरणदा भुवने प्रमाणा शक्तासि दुःखशमनेऽखिलवीर्ययुक्ते । हे राजन्! तब उन दैत्योंके ऐसा कहनेपर महाबली ॥ शत्रुओंको भी मार डालनेवाले प्रह्लादने उनका सेनाध्यक्ष बनकर देवताओंको युद्धके लिये ललकारा ॥ ६ ॥

दैत्योंको समरांगणमें डटे हुए देखकर उन सभी । देवताओंने भी अपनी पूरी तैयारी कर ली और वे ७ उनके साथ युद्ध करने लगे ॥७ ॥

तदनन्तर इन्द्र और प्रह्लादका वह भीषण संग्राम । पूरे सौ वर्षोंतक होता रहा । वह युद्ध मुनियोंको ॥ ८ विस्मित कर देनेवाला था ॥८ ॥

हे राजन्! शुक्राचार्यके द्वारा संरक्षित प्रह्लाद । आदि प्रधान दैत्योंने उस हो रहे महायुद्धमें विजय प्राप्त की ॥ ९ ॥

॥ तब इन्द्रने गुरु बृहस्पतिके दुःखों को दूर करनेवाली, मुक्ति । कल्याणस्वरूपिणी भगवतीका ॥ १० किया ॥ १० ॥

इन्द्र बोले – हे महामाये! अम्बिके! हे शंख, चक्र, गदा, । सुशोभित हाथोंवाली! हे अभय देवि! आपकी जय हो ॥११ ॥

वचनानुसार सम्पूर्ण देनेवाली तथा परम मन- -ही- -मन स्मरण हे शूलधारिणि! हे पद्म तथा खड्गसे प्रदान करनेवाली! हे ॥ ११ हे भुवनेश्वरि! हे शक्ति! हे शाक्तादि छ: दर्शनोंकी नायिकास्वरूपिणि! हे दस तत्त्वोंकी । अधिष्ठातृदेवि! हे महाबिन्दुस्वरूपिणि! हे माता! ॥ १२ आपको नमस्कार है ॥ १२ ॥

हे महाकुण्डलिनीस्वरूपे! हे सच्चिदानन्दरूपिणि! हे प्राणाग्निहोत्रविद्ये! हे दीपशिखात्मिके! हे [ अन्नमय, मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय, आनन्दमय ] पंचकोशोंमें ॥ १३ सदा विराजमान रहनेवाली! हे पुच्छब्रह्मस्वरूपिणि! हे आनन्दकलिके! सभी उपनिषदोंद्वारा स्तुत हे माता! आपको नमस्कार है ॥ १३-१४ ॥ ॥ १४ हे माता! आप हमपर प्रसन्न होनेकी कृपा करें और प्रफुल्लित मुखमण्डलवाली हो जायँ । हे जननि! दैत्योंसे पराजित हम निर्बलोंकी रक्षा कीजिये ॥ हे देवि! एकमात्र आप ही हमें शरण प्रदान करनेवाली हैं; आप संसारमें प्रमाणस्वरूपा हैं । हे समस्त पराक्रमोंसे युक्त भगवति! हमलोगोंका दुःख ॥ १५ । दूर करनेमें आप पूर्ण समर्थ हैं ॥१५ ॥

पृष्ठ 482

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 482 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० १५ ] ध्यायन्ति येऽपि सुखिनो नितरां भवन्ति दुःखान्विताविगतशोकभयास्तथान्ये मोक्षार्थिनो विगतमानविमुक्तसङ्गाः संसारवारिधिजलं प्रतरन्ति सन्तः त्वं देवि विश्वजननि प्रथितप्रभावा संरक्षणार्थमुदितार्तिहरप्रतापा संहर्तुमेतदखिलं किल कालरूपा को वेत्ति तेऽम्ब चरितं ननु मन्दबुद्धिः ब्रह्मा हरश्च हरिदश्वरथो हरिश्च इन्द्रो यमोऽथ वरुणोऽग्निसमीरणौ च ज्ञातुं क्षमा न मुनयोऽपि महानुभावा यस्याः प्रभावमतुलं निगमागमाश्च धन्यास्त एव तव भक्तिपरा महान्तः संसारदुःखरहिताः सुखसिन्धुमग्नाः ये भक्तिभावरहिता न कदापि दुःखा-म्भोधिं जनिक्षयतरङ्गमुमे तरन्ति ये वीज्यमानाः सितचामरैश्च क्रीडन्ति धन्याः शिबिकाधिरूढाः तैः पूजिता त्वं किल पूर्वदेहे नानोपहारैरिति चिन्तयामि ये पूज्यमाना वरवारणस्था विलासिनीवृन्दविलासयुक्ताः सामन्तकैश्चोपनतैर्व्रजन्ति मन्ये हि तैस्त्वं किल पूजितासि व्यास उवाच एवं स्तुता मघवता देवी विश्वेश्वरी तदा प्रादुर्बभूव तरसा सिंहारूढा चतुर्भुजा शङ्खचक्रगदापद्मान्बिभ्रती चारुलोचना रक्ताम्बरधरा देवी दिव्यमाल्यविभूषणा चतुर्थ स्कन्ध ४७३ जो भी आपका ध्यान करते हैं, वे परम सुखी हो जाते हैं; और [ आपकी उपासना न करनेवाले ] दूसरे लोग दुःखी तथा शोक और भयसे युक्त रहते हैं । मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले अहंकारशून्य ॥ १६ तथा आसक्तिरहित संतलोग संसार - सागरके असीम जलको पार कर लेते हैं ॥ १६ ॥

हे देवि! हे विश्वजननि! आप विस्तृत प्रभाववाली हैं । भक्तोंकी रक्षाके लिये आप प्रकट हो जाती हैं । आप भक्तजनोंका दुःख दूर करनेमें समर्थप्रतापवाली ॥ १७ हैं । इस सम्पूर्ण जगत्का संहार करनेके लिये आप कालस्वरूपिणी हैं । हे अम्ब! कौन मन्दबुद्धि प्राणी आपका चरित्र जान सकता है? ॥ १७ ॥

। ब्रह्मा, विष्णु, महेश, सूर्य, इन्द्र, यम, वरुण, अग्नि, वायु, निगम, आगम तथा महातपस्वी मुनिगण ॥ १८ भी आपकी अनुपम महिमाको जाननेमें समर्थ नहीं हैं ॥ १८ ॥

हे उमे! जो आपकी भक्तिमें तत्पर हैं, वे ही परम । धन्य हैं और सांसारिक दुःखोंसे मुक्त होकर सुख समुद्रमें डूबे रहते हैं; किंतु जो लोग आपकी भक्तिभावनासे ॥१ ९ वंचित हैं, वे जन्म - मरणरूपी तरंगोंवाले दुःखमय भवसागरको कभी भी पार नहीं कर सकते ॥ १ ९ ॥ जिन भाग्यशाली लोगोंके ऊपर स्वच्छ । चँवर डुलाये जा रहे हैं, जो हास - विलासका सुख भोग रहे हैं तथा जो सुन्दर यानोंपर सवारी कर रहे हैं - उनके विषयमें मैं तो यही सोचता हूँ कि उन्होंने ॥ २० पूर्वजन्ममें अनेकविध पूजनोपचारोंसे निश्चय ही आपकी पूजा की है ॥ २० ॥

पूजित होते हुए जो लोग उत्तम हाथियोंपर विराजमान रहते हैं, जो रमणियोंके साथ आमोद-प्रमोदमें संलग्न हैं और जो विनम्र सामंतोंके साथ ॥ २१ । चलते हैं, मैं मानता हूँ कि उन्होंने अवश्य आपकी पूजा की है ॥ २१ ॥

व्यासजी बोले- तब इन्द्रके इस प्रकार स्तुति । करनेपर भगवती विश्वेश्वरी तुरंत प्रकट हो गयीं । उस ॥ २२ समय वे सिंहपर बैठी हुई थीं; वे चार भुजाओंसे युक्त थीं; उन्होंने शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण कर रखा था; | उनके नेत्र सुन्दर थे; वे लाल वस्त्र पहने हुए थीं और ॥ २३ । वे देवी दिव्य मालाओंसे विभूषित थीं ॥ २२-२३ ॥

पृष्ठ 483

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 483 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४७४ तानुवाच सुरान्देवी प्रसन्नवदना गिरा भयं त्यजन्तु भो देवाः शं विधास्ये किलाधुना इत्युक्त्वा सा तदा देवी सिंहारूढातिसुन्दरी जगाम तरसा तत्र यत्र दैत्या मदान्विताः प्रह्लादप्रमुखाः सर्वे दृष्ट्वा देवीं पुरःस्थिताम् ऊचुः परस्परं भीताः किं कर्तव्यमितस्तदा देवं नारायणं चात्र सम्प्राप्ता चण्डिका किल महिषान्तकरी नूनं चण्डमुण्डविनाशिनी निहनिष्यति नः सर्वानम्बिका नात्र संशयः । वक्रदृष्ट्या यया पूर्वं निहतौ मधुकैटभौ एवं चिन्तातुरान्वीक्ष्य प्रह्लादस्तानुवाच ह । योद्धव्यं नाथ गन्तव्यं पलाय्य दानवोत्तमाः

नमुचिस्तानुवाचाथ पलायनपरानिह ।

हनिष्यति जगन्माता रुषिता किल हेतिभिः ॥

तथा कुरु महाभाग यथा दुःखं न जायते ।

व्रजामोऽद्यैव पातालं तां स्तुत्वा तदनुज्ञया ॥

प्रह्लाद उवाच

स्तौमि देवीं महामायां सृष्टिस्थित्यन्तकारिणीम् ।

सर्वेषां जननीं शक्तिं भक्तानामभयङ्करीम् ॥

व्यास उवाच

इत्युक्त्वा विष्णुभक्तस्तु प्रह्लादः परमार्थवित् ।

तुष्टाव जगतां धात्रीं कृताञ्जलिपुटस्तदा ॥

मालासर्पवदाभाति यस्यां सर्वं चराचरम् ।

सर्वाधिष्ठानरूपायै तस्यै ह्रींमूर्तये नमः ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १५ । प्रसन्न मुखमण्डलवाली भगवतीने उन देवताओंसे ॥ २४ कहा- हे देवताओ! आपलोग भयका त्याग कर दें, अब मैं आपलोगोंका कल्याण अवश्य करूँगी ॥ २४ ॥

। तब ऐसा कहकर सिंहपर सवार वे परम सुन्दर ॥ २५ भगवती तुरंत वहाँ चल पड़ीं, जहाँ अभिमानी दानव विद्यमान थे ॥ २५ ॥

। प्रह्लाद आदि सभी प्रमुख दानव भगवतीको ॥ २६ सामने स्थित देखकर भयभीत हो आपसमें कहने लगे कि अब हमें क्या करना चाहिये? ॥ २६ ॥

। सम्भवतः यह चण्डिका भगवान् नारायणसे ॥ २७ मिलकर यहाँ आयी है । इसीने महिषासुरका वध किया था तथा चण्ड - मुण्डका विनाश किया था । जिसने पूर्वकालमें अपनी वक्रदृष्टिसे मधु - कैटभका ॥ २८ संहार कर डाला था, वह अम्बिका हम सबको

अवश्य मार डालेगी ॥। २७-२८ ॥

इस प्रकार उन्हें चिन्तासे व्याकुल देखकर प्रह्लादने उनसे कहा- हे श्रेष्ठ दानवो! इस समय हमें ॥ २ ९ युद्ध नहीं करना चाहिये, बल्कि भागकर यहाँसे चले जाना चाहिये ॥ २ ९ ॥ तब भागनेकी चेष्टा करनेवाले उन दैत्योंसे नमुचिने कहा — ये जगन्माता भगवती कुपित होकर ३० शस्त्रोंसे हमलोगोंका संहार अवश्य कर देंगी । [ इसके बाद उसने प्रह्लादसे कहा- ] हे महाभाग! आप ऐसा उपाय करें, जिससे हमलोगोंको दुःख न मिले । उन ३१ भगवतीकी स्तुति करके उनकी आज्ञासे हमलोग इसी क्षण पातालके लिये प्रस्थान कर दें ॥ ३०-३१ ॥ प्रह्लाद बोले - सृष्टि, पालन और संहार करनेवाली, सभी प्राणियोंकी माता तथा भक्तों को ३२ अभय प्रदान करनेवाली शक्तिस्वरूपा भगवती महामायाकी मैं स्तुति करता हूँ ॥ ३२ ॥

व्यासजी बोले- ऐसा कहकर परमार्थवेत्ता विष्णुभक्त प्रह्लाद दोनों हाथ जोड़कर जगज्जननी ३३ भगवतीकी स्तुति करने लगे -॥३३ ॥

जिनमें यह सम्पूर्ण चराचर जगत् मालामें सर्पकी भाँति प्रतीत हो रहा है, सबकी अधिष्ठानस्वरूपा उन ३४ । ' ह्रीं ' मूर्तिधारिणी भगवतीको नमस्कार है ॥ ३४ ॥

पृष्ठ 484

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 484 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० १५ ] चतुर्थ स्कन्ध ४७५

त्वत्तः सर्वमिदं विश्वं स्थावरं जङ्गमं तथा ।

अन्ये निमित्तमात्रास्ते कर्तारस्तव निर्मिताः ॥ ३५

नमो देवि महामाये सर्वेषां जननी स्मृता ।

को भेदस्तव देवेषु दैत्येषु स्वकृतेषु च ॥३६

मातुः पुत्रेषु को भेदोऽप्यशुभेषु शुभेषु च ।

तथैव देवेष्वस्मासु न कर्तव्यस्त्वयाधुना ॥ ३७

यादृशास्तादृशा मातः सुतास्ते दानवाः किल ।

यतस्त्वं विश्वजननी पुराणेषु प्रकीर्तिता ॥ ३८

तेऽपि स्वार्थपरा नूनं यथैव वयमप्युत ।

नान्तरं दैत्यसुरयोर्भेदोऽयं मोहसम्भवः ॥ ३ ९

धनदारादिभोगेषु वयं सक्ता दिवानिशम् ।

तथैव देवा देवेशि को भेदोऽसुरदेवयोः ॥ ४०

तेऽपि कश्यपदायादा वयं तत्सम्भवाः किल ।

कुतो विरोधसम्भूतिर्जाता मातस्तवाधुना ॥ ४१

न तथा विहितं मातस्त्वयि सर्वसमुद्भवे ।

साम्यतैव त्वया स्थाप्या देवेष्वस्मासु चैव हि ॥ ४२

गुणव्यतिकरात्सर्वे समुत्पन्नाः सुरासुराः ।

गुणान्विता भवेयुस्ते कथं देहभृतोऽमराः ॥ ४३

कामः क्रोधश्च लोभश्च सर्वदेहेषु संस्थिताः ।

वर्तन्ते सर्वदा तस्मात् को विरोधी भवेज्जनः ॥ ४४ ।

यह स्थावर - जंगमात्मक सम्पूर्ण विश्व आपसे ही उत्पन्न हुआ है । जो दूसरे कर्ता हैं, वे तो निमित्तमात्र हैं; क्योंकि वे भी आपके बनाये हुए हैं ॥ ३५ ॥

हे देवि! आपको नमस्कार है । हे महामाये! आप सभी प्राणियोंकी जननी कही गयी हैं । स्वयं आपके ही द्वारा बनाये गये देवताओं और दैत्योंमें आपका यह कैसा भेदभाव! ॥३६ ॥

पुत्र अच्छे हों अथवा बुरे, उनमें माताका कैसा भेदभाव? उसी प्रकार देवताओं और हम दैत्योंमें आपको इस समय भेदभाव नहीं करना चाहिये ॥ ३७ ॥

हे माता! दानव चाहे जिस किसी भी प्रकारके हों, किंतु वे आपके ही पुत्र हैं; क्योंकि आप पुराणोंमें विश्वजननी बतायी गयी हैं ॥ ३८ ॥

वे देवता भी तो निश्चितरूपसे वैसे ही स्वार्थी हैं जैसे हम दैत्यगण । देवताओं और दैत्योंमें अन्तर नहीं है । यह भेद केवल मोहजनित है ॥ ३ ९ ॥ जैसे हमलोग धन, स्त्री आदिके भोगोंमें दिन-रात आसक्त रहते हैं, वैसे ही देवता भी तो [ विषय-भोगोंमें लीन ] रहते हैं । अतः हे देवेश्वरि! असुरों और देवताओंमें भेद कैसा? ॥ ४० ॥

वे भी कश्यपजीकी संतान हैं और हम भी उन्हीं कश्यपजीसे उत्पन्न हुए हैं । हे माता! ऐसी स्थिति में हमारे प्रति आपके मनमें यह विरोधभाव कैसे उत्पन्न हो गया? ॥ ४१ ॥

हे माता! जब सबकी उत्पत्तिमें आप ही मूल कारण हैं, तो इस प्रकार भेद करना आपके लिये उचित नहीं है । देवताओं तथा हम दैत्योंमें आपको समान व्यवहार रखना चाहिये ॥ ४२ ॥

गुणोंसे सम्बन्ध होनेके कारण ही सम्पूर्ण देवता तथा दैत्य उत्पन्न हुए हैं । तब गुणोंसे युक्त केवल वे देहधारी देवता ही आपके प्रिय क्यों हैं? ॥४३ ॥

काम, क्रोध और लोभ सभी प्राणियोंके भीतर सदा विद्यमान रहते हैं । अतः कौन व्यक्ति विरोधभावसे शून्य रह सकता है? ॥४४ ॥

पृष्ठ 485

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 485 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४७६

त्वया मिथो विरोधोऽयं कल्पितः किल कौतुकात् ।

मन्यामहे विभेदेन नूनं युद्धदिदृक्षया ॥

अन्यथा खलु भ्रातॄणां विरोधः कीदृशोऽनघे । त्वं चेन्नेच्छसि चामुण्डे वीक्षितुं कलहं किल जानामि धर्मं धर्मज्ञे वेद्मि चाहं शतक्रतुम् । तथापि कलहोऽस्माकं भोगार्थं देवि सर्वदा

एकः कोऽपि न शास्तास्ति संसारे त्वां विनाम्बिके ।

स्पृहावतस्तु कः कर्तुं क्षमते वचनं बुधः ॥

देवासुरैरयं सिन्धुर्मथितः समये क्वचित् । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १५ मैं तो समझता हूँ कि अपने विनोदके लिये आपने ही युद्ध देखनेकी इच्छासे निश्चय ४५ ही [ हम दैत्यों तथा देवताओंके बीच ] भेद उत्पन्न करके परस्पर यह विरोधभाव पैदा कर दिया है । अन्यथा हे अनघे! भाइयोंमें परस्पर विरोध ॥ ४६ कैसा? हे चामुण्डे! यदि आप [ दैत्यों तथा देवताओंमें ] कलह देखना न चाहतीं तो यह विरोधभाव नहीं होता ॥ ४५-४६ ॥ धर्मज्ञे! मैं धर्मको जानता हूँ और इन्द्रको भी ॥ ४७ भलीभाँति जानता हूँ, तथापि हे देवि! भोगके लिये हमलोगों के बीच कलह सदासे होता रहा है ॥ ४७ ॥

हे अम्बिके! आपके अतिरिक्त संसारमें कोई ४८ भी एक शासक नहीं है । कौन बुद्धिमान् प्राणी किसी लोभीकी बातपर विश्वास करेगा? किसी समयकी बात है देवताओं और असुरोंने मिलकर इस समुद्रका मन्थन किया । किंतु विष्णुने अमृतरत्नके विष्णुना विहितो भेदः सुधारत्नच्छलेन वै ॥ ४ ९ विभाजनमें छलपूर्वक देवताओं और असुरोंमें भेदभाव

त्वयासौ कल्पितः शौरिः पालकत्वे जगद्गुरुः ।

तेन लक्ष्मीः स्वयं लोभाद् गृहीतामरसुन्दरी ॥

ऐरावतस्तथेन्द्रेण पारिजातोऽथ कामधुक् ।

उच्चैःश्रवाः सुरैः सर्वं गृहीतं वैष्णवेच्छया ॥

अनयं तादृशं कृत्वा जाता देवास्तु साधवः । ( अन्यायिनः सुरा नूनं पश्य त्वं धर्मलक्षणम् । ) संस्थापिताः सुरा नूनं विष्णुना बहुमानिना ॥

नूनं दैत्याः पराभूवन्पश्य त्वं धर्मलक्षणम् ।

क्व धर्म: कीदृशो धर्मः क्व कार्यं क्व च साधुता ॥

कथयामि च कस्याग्रे सिद्धं मैमांसिकं मतम् ।

तार्किका युक्तिवादज्ञा विधिज्ञा वेदवादकाः ॥

किया ॥ ४८-४९ ॥

आपने पालन - कार्यके लिये विष्णुको जगद्गुरु बनाया है, किंतु उन्होंने लोभवश दिव्य सुन्दरी ५० लक्ष्मीको स्वयं अपना लिया ॥५० ॥

उसी प्रकार विष्णुकी ही इच्छासे इन्द्रने ऐरावत हाथी, पारिजात, कामधेनु तथा उच्चैःश्रवा घोड़ेको ले लिया तथा अन्य देवताओंने शेष सब कुछ ५१ ग्रहण कर लिया ॥ ५१ ॥

इस प्रकारका अन्याय करके देवता साधु बन गये! ( यदि आप धर्मका लक्षण देखें तो उससे ज्ञात हो जायगा कि देवता निश्चितरूपसे अन्यायी हैं । ) महाभिमानी विष्णुने ऐसे अन्यायी देवताओंको उच्च ५२ स्थानोंपर प्रतिष्ठित किया । इसके विपरीत दैत्यगण पराभूत हुए; अब आप ही धर्मका लक्षण देख लीजिये | धर्म कहाँ है, धर्मका स्वरूप कैसा है, कैसा ५३ कार्य हुआ है और साधुता कहाँ है? ॥५२-५३ ॥ अब मैं किसके आगे अपनी बात कहूँ? मैमांसिक मत तो प्रसिद्ध ही है । [ मीमांसक निरीश्वर-वादका समर्थन करते हैं ] नैयायिक विद्वान् युक्तिवादके ५४ । ज्ञाता और वैदिक विद्वान् विधिके ज्ञाता कहे गये हैं ।

पृष्ठ 486

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 486 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० १५ ] चतुर्थ स्कन्ध ४७७

उक्ताः सकर्तृकं विश्वं विवदन्ते जडात्मकाः ।

कर्ता भवति चेदस्मिन्संसारे वितते किल ॥

विरोधः कीदृशस्तत्र चैककर्मणि वै मिथः ।

वेदे नैकमतिः कस्माच्छास्त्रेष्वपि तथा पुनः ॥

नैकवाक्यं वचस्तेषामपि वेदविदां पुनः ।

यतः स्वार्थपरं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥

निःस्पृहः कोऽपि संसारे न भवेन्न भविष्यति ।

शशिनाथ गुरोर्भार्या हृता ज्ञात्वा बलादपि ॥

गौतमस्य तथेन्द्रेण जानता धर्मनिश्चयम् ।

गुरुणानुजभार्या च भुक्ता गर्भवती बलात् ॥

शप्तो गर्भगतो बालः कृतश्चान्धस्तथा पुनः ।

विष्णुना च शिरश्छिन्नं राहोश्चक्रेण वै बलात् ॥

अपराधं विना कामं तदा सत्त्ववताम्बिके ।

पौत्रो धर्मवतां शूरः सत्यव्रतपरायणः ॥

यज्वा दानपतिः शान्तः सर्वज्ञः सर्वपूजकः ।

कृत्वाथ वामनं रूपं हरिणा छलवेदिना ॥

वञ्चितोऽसौ बलिः सर्वं हृतं राज्यं पुरा किल ।

तथापि देवान्धर्मस्थान्प्रवदन्ति मनीषिणः ॥

वदन्ति चाटुवादांश्च धर्मवादाञ्जयं गताः ।

एवं ज्ञात्वा जगन्मातर्यथेच्छसि तथा कुरु ॥

शरणा दानवाः सर्वे जहि वा रक्ष वा पुनः । श्रीदेव्युवाच सर्वे गच्छत पातालं तत्र वासं यथेप्सितम् ॥

कुरुध्वं दानवाः सर्वे निर्भया गतमन्यवः ।

कालः प्रतीक्ष्यो युष्माभिः कारणं स शुभेऽशुभे ॥

कुछ लोग विश्वको सकर्तृक मानते हैं । [ उनमें कुछ ५५ लोग विश्वका रचयिता ' पुरुष ' को और कुछ लोग ' प्रकृति ' को बताते हैं ] जड़वादी लोग इससे विपरीत प्रकारकी बात करते हैं । यदि इस विस्तृत संसारमें कोई ५६ एक कर्ता होता तो एक ही कर्मके विषयमें लोगोंमें परस्पर विरोध कैसे होता? वेदमें एक मत नहीं है और उसी प्रकार शास्त्रोंमें भी मतैक्य नहीं है । उन वेदविदोंके वचनमें भी एकवाक्यता नहीं है; क्योंकि ५७ यह समस्त स्थावर - जंगमात्मक जगत् ही स्वार्थपरायण है । संसारमें कोई भी न तो नि: स्पृह हुआ है और न होगा ॥ ५४–५७३ ॥ ५८ चन्द्रमाने जान- -बूझकर अपने गुरु बृहस्पतिकी भार्याका बलपूर्वक हरण कर लिया । उसी प्रकार ५ ९ धर्मका निर्णय जानते हुए भी इन्द्रने महर्षि गौतमकी पत्नीके साथ अनाचार किया । देवगुरु बृहस्पतिने अपने छोटे भाईकी गर्भवती भार्याके साथ रमण किया और गर्भस्थ शिशुको शाप दे दिया तथा उसे अन्धा ६० बना दिया ॥ ५८-५९ ३ ॥ हे अम्बिके! सत्त्व - सम्पन्न होते हुए भी विष्णुने बलपूर्वक सुदर्शनचक्र से निरपराध राहुका सिर काट ६१ लिया । मेरा पौत्र बलि धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ, वीर, सत्यव्रतमें संलग्न रहनेवाला, यज्ञकर्ता, महादानी, शान्त, सर्वज्ञ तथा सबका सम्मान करनेवाला था । ६२ पूर्वकालमें कपटज्ञानी विष्णुने वामनका रूप धारण करके उस बलिके साथ भी छल किया और उसका सारा राज्य छीन लिया । फिर भी विद्वान् लोग ६३ देवताओंको धर्मनिष्ठ कहते हैं और चाटुकारितापूर्ण वचन बोलते हैं कि धर्मवादी होनेके कारण ही देवता विजयको प्राप्त हुए । हे जगज्जननि! यह सब सोच-६४ समझकर आप जैसा चाहें, वैसा करें । सभी दानव आपकी शरणमें हैं, अब आप उनका संहार करें अथवा उनकी रक्षा करें ॥ ६०–६४३ ॥ श्रीदेवी बोलीं- हे दानवो! तुम सबलोग ६५ पाताल चले जाओ और वहाँपर निर्भय तथा शोकरहित होकर इच्छानुसार निवास करो । अभी तुमलोगोंको समयकी प्रतीक्षा करनी चाहिये । वह काल ही अच्छे ६६ । या बुरे कार्यमें कारण बनता है ॥ ६५-६६ ॥

पृष्ठ 487

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 487 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४७८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १६

सुनिर्वेदपराणां हि सुखं सर्वत्र सर्वदा ।

त्रैलोक्यस्य च राज्येऽपि न सुखं लोभचेतसाम् ॥

कृतेऽपि न सुखं पूर्णं सस्पृहाणां फलैरपि ।

तस्मात्त्यक्त्वा महीमेतां प्रयान्त्वद्य महीतलम् ॥

ममाज्ञां पुरतः कृत्वा सर्वे विगतकल्मषाः । व्यास उवाच तच्छ्रुत्वा वचनं देव्यास्तथेत्युक्त्वा रसातलम् ॥

प्रणम्य दानवाः सर्वे गताः शक्त्याभिरक्षिताः ।

अन्तर्दधे ततो देवी देवाः स्वभुवनं गताः ॥

त्यक्त्वा वैरं स्थिताः सर्वे ते तदा देवदानवाः ।

एतदाख्यानमखिलं यः शृणोति वदत्यथ ॥

सर्वदुःखविनिर्मुक्तः प्रयाति पदमुत्तमम् ॥

परम सन्तोषी लोगोंको सभी जगह सदा सुख-६७ ही - सुख है, किंतु लोभयुक्त मनवाले लोगोंको तीनों लोकोंका राज्य मिल जानेपर भी सुख नहीं प्राप्त होता । सत्ययुगमें भी नानाविध भोगोंके रहते प्रबल ६८ कामनावाले लोगोंका सुख कभी पूरा नहीं हुआ । अतः सभी दैत्य मेरी आज्ञा मानकर इस पृथ्वीको छोड़कर अभी पातालमें चले जायँ और वहाँ निष्पाप होकर रहें ॥ ६७-६८ ॥ व्यासजी बोले- भगवतीका यह वचन सुनकर ६ ९ सभी दानवोंने ' ठीक है ' – ऐसा कहकर उन्हें प्रणाम किया और उनकी शक्तिसे रक्षित होकर वे वहाँसे चल पड़े । तत्पश्चात् भगवती अन्तर्धान हो गयीं और देवता अपने-७० अपने लोक चले गये । उस समय सभी देवता तथा दानव वैर - भाव छोड़कर रहने लगे ॥ ६ ९ -७० ॥ जो मनुष्य इस सम्पूर्ण कथानकको सुनता ७१ अथवा कहता है, वह सभी दुःखोंसे मुक्त होकर ७२ परमपद प्राप्त कर लेता है । ७१-७२ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे देवीकथनेन दानवानां रसातलं प्रति गमनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥

अथ षोडशोऽध्यायः भगवान् श्रीहरिके विविध जनमेजय उवाच

भृगुशापान्मुनिश्रेष्ठ हरेरद्भुतकर्मणः ।

अवताराः कथं जाताः कस्मिन्मन्वन्तरे विभो ॥ १

विस्तराद्वद धर्मज्ञ अवतारकथां हरेः ।

पापनाशकरीं ब्रह्मञ्छ्रुतां सर्वसुखावहाम् ॥ २

व्यास उवाच

शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि अवतारान् हरेर्यथा ।

यस्मिन्मन्वन्तरे जाता युगे यस्मिन्नराधिप ॥ ३

येन रूपेण यत्कार्यं कृतं नारायणेन वै ।

तत्सर्वं नृप वक्ष्यामि संक्षेपेण तवाधुना ॥ ४

धर्मस्यैवावतारोऽभूच्चाक्षुषे मनुसम्भवे ।

नरनारायणौ धर्मपुत्रौ ख्यातौ महीतले ॥ ५ ।

अवतारोंका संक्षिप्त वर्णन जनमेजय बोले- हे मुनिश्रेष्ठ! हे विभो! अद्भुत चरित्रवाले भगवान् विष्णुने भृगुके शापसे किस मन्वन्तरमें किस प्रकार अवतार ग्रहण किये । हे धर्मज्ञ! हे ब्रह्मन्! श्रवण करनेपर समस्त सुख सुलभ करानेवाली तथा पापोंका नाश कर देनेवाली भगवान् विष्णुकी अवतार - कथाका विस्तारसे वर्णन कीजिये ॥ १-२ ॥ व्यासजी बोले- हे राजन्! हे नराधिप! जिस मन्वन्तर तथा जिस युगमें जैसे - जैसे भगवान् विष्णु के अवतार हुए हैं, उन अवतारोंको मैं बता रहा हूँ, आप सुनें । हे नृप! भगवान् नारायणने जिस रूपसे जो कार्य किया, वह सब मैं आपको इस समय संक्षेपमें बताता हूँ॥३-४ ॥ चाक्षुष मन्वन्तरमें साक्षात् विष्णुका धर्मावतार हुआ था । उस समय वे धर्मपुत्र होकर नर - नारायण नामसे धरातलपर विख्यात हुए ॥ ५ ॥

पृष्ठ 488

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 488 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० १६ ] अथ वैवस्वताख्येऽस्मिन्द्वितीये तु युगे पुनः दत्तात्रेयावतारोऽत्रेः पुत्रत्वमगमद्धरिः ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्रस्त्रयोऽमी देवसत्तमाः पुत्रत्वमगमन्देवास्तस्यात्रेर्भार्यया वृताः अनसूयात्रिपत्नी च सतीनामुत्तमा सती यया सम्प्रार्थिता देवाः पुत्रत्वमगमंस्त्रयः ब्रह्माभूत्सोमरूपस्तु दत्तात्रेयो हरिः स्वयम् दुर्वासा रुद्ररूपोऽसौ पुत्रत्वं ते प्रपेदिरे नृसिंहस्यावतारस्तु देवकार्यार्थसिद्धये चतुर्थे तु युगे जातो द्विधारूपो मनोहरः हिरण्यकशिपोः सम्यग्वधाय भगवान् हरिः चक्रे रूपं नारसिंहं देवानां विस्मयप्रदम् बलेर्नियमनार्थाय श्रेष्ठे त्रेतायुगे तथा चकार रूपं भगवान् वामनं कश्यपान्मुनेः छलयित्वा मखे भूपं राज्यं तस्य जहार ह पाताले स्थापयामास बलिं वामनरूपधृक् युगे चैकोनविंशेऽथ त्रेताख्ये भगवान् हरिः जमदग्निसुतो जातो रामो नाम महाबलः क्षत्रियान्तकरः श्रीमान्सत्यवादी जितेन्द्रियः दत्तवान्मेदिनीं कृत्स्नां कश्यपाय महात्मने यो वै परशुरामाख्यो हरेरद्भुतकर्मणः अवतारस्तु राजेन्द्र कथितः पापनाशनः त्रेतायुगे रघोर्वंशे रामो दशरथात्मजः नरनारायणांशौ द्वौ जातौ भुवि महाबलौ चतुर्थ स्कन्ध ४७ ९ । इस वैवस्वत मन्वन्तरके दूसरे चतुर्युगमें ॥ ६ भगवान्‌का दत्तात्रेयावतार हुआ । वे भगवान् श्रीहरि महर्षि अत्रिके पुत्ररूपमें अवतीर्ण हुए ॥ ६ ॥

। उन अत्रिमुनिकी भार्या अनसूयाकी प्रार्थनापर ॥ ७ ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश- ये तीनों महान् देवता उनके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए थे ॥ ७ ॥

। ॥ ८ श्रेष्ठ तीनों । ॥ ९ | विष्णु उनके । अत्रिकी पत्नी साध्वी अनसूया सती स्त्रियोंमें थीं, जिनके सम्यक् रूपसे प्रार्थना करनेपर वे देवता उनके पुत्ररूपमें अवतरित हुए ॥ ८ ॥

उनमें ब्रह्माजी सोम ( चन्द्रमा ) - रूपमें, साक्षात् दत्तात्रेयके रूपमें और शंकरजी दुर्वासाके रूपमें यहाँ पुत्रत्वको प्राप्त हुए॥९॥

देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये चौथे ॥ १० चतुर्युगमें दो प्रकारके रूपोंवाला मनोहर नृसिंहावतार हुआ । भगवान् श्रीविष्णुने उस समय हिरण्यकशिपुका । सम्यक् वध करनेके लिये ही देवताओंको भी चकित ॥ ११ कर देनेवाला नारसिंहरूप धारण किया था ॥ १०-११ ॥ भगवान् विष्णुने दैत्यराज बलिका शमन करनेके । उद्देश्यसे उत्तम त्रेतायुगमें कश्यपमुनिके यहाँ वामनरूपसे ॥ १२ अवतार धारण किया था । उन वामनरूपधारी विष्णुने यज्ञमें राजा बलिको छलकर उनका राज्य हर लिया । और उन्हें पातालमें स्थापित कर दिया ॥ १२-१३ ॥ ॥ १३ उन्नीसवें चतुर्युगके त्रेता नामक युगमें भगवान् विष्णु महर्षि जमदग्निके परशुराम नामक महाबली । पुत्रके रूपमें उत्पन्न हुए ॥१४ ॥

॥ १४ क्षत्रियोंका नाश कर डालनेवाले उन प्रतापी, सत्यवादी तथा जितेन्द्रिय परशुरामने सम्पूर्ण पृथ्वी । [ क्षत्रियोंसे छीनकर ] महात्मा कश्यपको दे दी थी ॥ १५ ॥

॥ १५ हे राजेन्द्र! मैंने अद्भुत कर्मवाले भगवान् विष्णुके पापनाशक ' परशुराम ' नामक अवतारका यह वर्णन । कर दिया ॥ १६ ॥

॥ १६ भगवान् विष्णुने त्रेतायुगमें रघुके वंशमें दशरथपुत्र रामके रूपमें अवतार धारण किया था ॥ इसी प्रकार अट्ठाईसवें द्वापरयुगमें साक्षात् नर तथा ॥ १७ । नारायणके अंशसे कल्याणप्रद तथा महाबली अर्जुन

पृष्ठ 489

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 489 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४८० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १६

अष्टाविंशे युगे शस्तौ द्वापरेऽर्जुनशौरिणौ ।

धराभारावतारार्थं जातौ कृष्णार्जुनौ भुवि ॥ १८

कृतवन्तौ महायुद्धं कुरुक्षेत्रेऽतिदारुणम् ।

एवं युगे युगे राजन्नवतारा हरेः किल ॥। १ ९

भवन्ति बहवः कामं प्रकृतेरनुरूपतः ।

प्रकृतेरखिलं सर्वं वशमेतज्जगत्त्रयम् ॥२०

यथेच्छति तथैवेयं भ्रामयत्यनिशं जगत् ।

पुरुषस्य प्रियार्थं सा रचयत्यखिलं जगत् ॥ २१

सृष्ट्वा पुरा हि भगवाञ्जगदेतच्चराचरम् ।

सर्वादिः सर्वगश्चासौ दुर्ज्ञेयः परमोऽव्ययः ॥ २२

निरालम्बो निराकारो निःस्पृहश्च परात्परः ।

उपाधितस्त्रिधा भाति यस्याः सा प्रकृतिः परा ॥ २३

उत्पत्तिकालयोगात्सा भिन्ना भाति शिवा तदा ।

सा विश्वं कुरुते कामं सा पालयति कामदा ॥ २४

कल्पान्ते संहरत्येव त्रिरूपा विश्वमोहिनी ।

तया युक्तोऽसृजद् ब्रह्मा विष्णुः पाति तयान्वितः ॥ २५

रुद्रः संहरते कामं तया सम्मिलितः शिवः ।

सा चैवोत्पाद्य काकुत्स्थं पुरा वै नृपसत्तमम् ॥ २६

कुत्रचित्स्थापयामास दानवानां जयाय च ।

एवमस्मिंश्च संसारे सुखदुःखान्विताः किल ॥ २७

भवन्ति प्राणिनः सर्वे विधितन्त्रनियन्त्रिताः ॥ २८ ।

और श्रीकृष्ण पृथ्वीतलपर अवतीर्ण हुए । श्रीकृष्ण तथा अर्जुनने पृथ्वीका भार उतारनेके लिये ही भूमण्डलपर अवतार लिया और कुरुक्षेत्रमें अत्यन्त भयंकर महायुद्ध किया ॥ १७-१८३ ॥ हे राजन्! इस प्रकार प्रकृतिके आदेशानुसार युग - युगमें भगवान् विष्णुके अनेक अवतार हुआ करते हैं । यह सम्पूर्ण त्रिलोकी प्रकृतिके अधीन रहती है । ये भगवती प्रकृति जैसे चाहती हैं वैसे ही जगत्‌को निरन्तर नचाया करती हैं । परमपुरुषकी प्रसन्नताके लिये ही वे समस्त संसारकी रचना करती हैं ॥ १ ९ - २१ ॥ प्राचीनकालमें इस चराचर जगत्का सृजन करके सबके आदिरूप, सर्वत्र गमन करनेवाले, दुर्ज्ञेय, महान्, अविनाशी, स्वतन्त्र, निराकार, निःस्पृह और परात्पर वे भगवान् जिन मायारूपिणी भगवतीके संयोगसे उपाधिरूपमें [ ब्रह्मा, विष्णु, महेश ] तीन प्रकारके प्रतीत होते हैं, वे ही ' परा प्रकृति ' हैं ॥ २२-२३ ॥ उत्पत्ति और कालके योगसे ही वे कल्याणमयी प्रकृति उस परमात्मासे भिन्न भासती हैं | सबका मनोरथ पूर्ण करनेवाली वे प्रकृति ही विश्वकी रचना करती हैं, सम्यक् रूपसे पालन करती हैं और कल्पके अन्तमें संहार भी कर देती हैं । इस प्रकार वे विश्वमोहिनी भगवती प्रकृति ही तीन रूपोंमें विराजमान रहती हैं । उन्हींसे संयुक्त होकर ब्रह्माने जगत्की सृष्टि की है, उन्हींसे सम्बद्ध होकर विष्णु पालन करते हैं और उन्हींके साथ मिलकर कल्याणकारी रुद्र संहार करते हैं॥२४-२५ || पूर्वकालमें उन भगवती परा प्रकृतिने ही ककुत्स्थवंशी नृपश्रेष्ठको उत्पन्न करके दानवोंको पराजित करनेके लिये उन्हें कहींपर स्थापित कर दिया । इस प्रकार इस संसारमें सभी प्राणी विधिके नियमोंमें बँधकर सदा सुख तथा दुःखसे युक्त रहते हैं | २६ - २८ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे हरेर्नानावतारवर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥

पृष्ठ 490

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 490 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० १७ ] चतुर्थ स्कन्ध ४८१ अथ सप्तदशोऽध्यायः श्रीनारायणद्वारा अप्सराओंको वरदान श्रीकृष्णावतारका चरित जनमेजय उवाच

वाराङ्गनास्त्वयाख्याता नरनारायणाश्रमे ।

एकं नारायणं शान्तं कामयानाः स्मरातुराः ॥ १

शप्तुकामस्तदा जातो मुनिर्नारायणश्च ताः ।

निवारितो नरेणाथ भ्रात्रा धर्मविदा नृप ॥ २

किं कृतं मुनिना तेन व्यसने समुपस्थिते ।

ताभिः संकल्पितेनाथ कामार्थाभिर्भृशं मुने ॥ ३

शक्रेणोत्पादिताभिश्च बहुप्रार्थनया पुनः ।

याचितेन विवाहार्थं किं कृतं तेन जिष्णुना ॥ ४

इत्येतच्छ्रोतुमिच्छामि चरितं तस्य मोक्षदम् ।

नारायणस्य मे ब्रूहि विस्तरेण पितामह ॥ ५

व्यास उवाच

शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि यथा तस्य महात्मनः ।

धर्मपुत्रस्य धर्मज्ञ विस्तरेण वदामि ते ॥ ६

शप्तुकामस्तु संदृष्टो नरेणाथ यदा हरिः ।

वारितोऽसौ समाश्वास्य मुनिर्नारायणस्तदा ॥ ७

शान्तकोपस्तदोवाच तास्तपस्वी महामुनिः ।

स्मितपूर्वमिदं वाक्यं मधुरं धर्मनन्दनः ॥ ८

अस्मिञ्जन्मनि चार्वंग्यः कृतसंकल्पवानहम् ।

आवाभ्याञ्च न कर्तव्यः सर्वथा दारसंग्रहः ॥ ९

तस्माद् गच्छन्तु त्रिदिवं कृपां कृत्वा ममोपरि ।

धर्मज्ञा न प्रकुर्वन्ति व्रतभङ्गं परस्य वै ॥ १०

शृङ्गारेऽस्मिन् रसे नूनं स्थायीभावो रतिः स्मृतः । कथं करोमि सम्बन्धं तदभावे सुलोचनाः । ११ । देना, राजा जनमेजयद्वारा व्यासजीसे सुनानेका निवेदन करना जनमेजय बोले- हे मुने! आप नर - नारायणके आश्रममें आयी हुई अप्सराओंकी चर्चा पहले ही कर चुके हैं, जो काम - पीड़ित होकर शान्तचित्त मुनि नारायणपर आसक्त हो गयी थीं । उसके बाद मुनि नारायण उन्हें शाप देनेको उद्यत हो गये । इसपर उनके भाई धर्मवेत्ता नरने उन्हें ऐसा करनेसे रोक दिया था ॥ १-२ ॥ हे मुने! अत्यन्त कामासक्त उन अप्सराओं के द्वारा [ अपने मनमें पतिरूपमें ] संकल्पित किये गये उन मुनि नारायणने इस विषम संकटके उपस्थित होनेपर क्या किया? इन्द्रके द्वारा प्रेषित उन वारांगनाओंके बार - बार बहुत प्रार्थना करके विवाहके लिये याचित उन भगवान् नारायणमुनिने क्या किया? हे पितामह! मैं उन नारायणमुनिका यह मोक्षदायक चरित्र सुनना चाहता हूँ; विस्तारके साथ मुझे बतायें ॥ ३५ ॥

व्यासजी बोले- हे राजन्! सुनिये, मैं बताऊँगा । हे धर्मज्ञ! उन महात्मा धर्मपुत्र नारायणका चरित्र विस्तारपूर्वक मैं आपको बता रहा हूँ ॥ ६ ॥

जब नरने मुनि नारायणको शाप देनेके लिये उद्यत देखा तब उन्होंने नारायणको आश्वासन देकर [ वैसा करनेसे ] रोक दिया ॥ ७ ॥

तत्पश्चात् क्रोधके शान्त हो जानेपर महामुनि तपस्वी धर्मपुत्र नारायण उन अप्सराओंसे मन्द - मन्द मुसकराते हुए यह मधुर वचन कहने लगे - ॥८ ॥

हे सुन्दरियो! हमने इस जन्ममें संकल्प कर रखा है कि हम दोनों कभी भी विवाह नहीं करेंगे । अतः

मेरे ऊपर कृपा करके आपलोग स्वर्ग लौट जायँ ।

धर्मज्ञ लोग दूसरेका व्रत भंग नहीं करते ॥ ९ - १० ॥

हे सुन्दर नेत्रोंवाली! इस शृंगार - रसमें रतिको ही स्थायी भाव कहा गया है । अत: [ ब्रह्मचर्यव्रत धारण करनेके कारण ] उसके अभावमें मैं सम्बन्ध कैसे कर सकता हूँ? ॥ ११ ॥

1897 श्रीमद्देवी... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] - 16 A