देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 491–500
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 491–500
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४८२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १७ कारणेन विना कार्यं न भवेदिति निश्चयः । कारणके बिना कार्य नहीं हो सकता है — यह कविभिः कथितं शास्त्रे स्थायीभावो रसः किल ॥ १२ सुनिश्चित है । कवियोंने शास्त्रमें कहा है कि स्थायीभाव ही रसस्वरूप है ॥१२ ॥
धन्यः सुचारुसर्वाङ्गः सभाग्योऽहं धरातले । समस्त सुन्दर अंगोंवाला मैं इस धरातलपर धन्य प्रीतिपात्रं यतो जातो भवतीनामकृत्रिमम् ॥ १३ तथा सौभाग्यशाली हूँ जो कि आपलोगोंका भवतीभिः कृपां कृत्वा रक्षणीयं व्रतं मम भविष्यामि महाभागाः पतिरप्यन्यजन्मनि अष्टाविंशे विशालाक्ष्यो द्वापरेऽस्मिन्धरातले देवानां कार्यसिद्ध्यर्थं प्रभविष्यामि सर्वथा तदा भवत्यो मद्दाराः प्राप्य जन्म पृथक्पृथक् भूपतीनां सुता भूत्वा पत्नीभावं गमिष्यथ इत्याश्वास्य हरिस्तास्तु प्रतिश्रुत्य परिग्रहम् व्यसर्जयत्स भगवाञ्जग्मुश्च विगतज्वराः ॥ एवं विसर्जितास्तेन गताः स्वर्गं तदाङ्गनाः शक्राय कथयामासुः कारणं सकलं पुनः
आश्रुत्य मघवांस्ताभ्यो वृत्तान्तं तस्य विस्तरात् ।
तुष्टाव तं महात्मानं नारीर्दृष्ट्वा तथोर्वशीः ॥
इन्द्र उवाच अहो धैर्यं मुनेः कामं तथैव च तपोबलम् । येनोर्वश्यः स्वतपसा तादृग्रूपाः प्रकल्पिताः
इति स्तुत्वा प्रसन्नात्मा बभूव सुरराट् ततः ।
नारायणोऽपि धर्मात्मा तपस्यभिरतोऽभवत् ॥
इत्येतत्सर्वमाख्यातं मुनेर्वृत्तान्तमद्भुतम् ।
नारायणस्य सकलं नरस्य च महामुनेः ॥
तौ हि कृष्णार्जुनौ वीरौ भूभारहरणाय च ।
जातौ तौ भरतश्रेष्ठ भृगोः शापवशादिह ॥
1897 श्रीमद्देवी..... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] - 16 B स्वाभाविक प्रीतिपात्र बन सका ॥ १३ ॥
। हे महाभागाओ! आपलोग कृपा करके मेरे ॥ १४ व्रतकी रक्षा करें । मैं दूसरे जन्ममें आपलोगोंका पति अवश्य बनूँगा ॥१४ ॥
। हे विशाल नेत्रोंवाली सुन्दरियो! देवताओंका ॥ १५ कार्य सिद्ध करनेके लिये मैं अट्ठाईसवें द्वापरमें इस धरातलपर निश्चितरूपसे अवतरित होऊँगा ॥ १५ ॥
। उस समय आपलोग भी राजाओंकी कन्याएँ होकर पृथक् - पृथक् जन्म ग्रहण करेंगी और मेरी ॥ १६ भार्याएँ बनकर पत्नी - भावको प्राप्त होंगी ॥ १६ ॥
। पाणिग्रहणका ऐसा आश्वासन देकर भगवान् नारायण- - मुनिने उन्हें विदा किया और वे अप्सराएँ भी १७ कामव्यथासे रहित होकर वहाँसे चली गयीं ॥ १७ ॥
इस प्रकार उनसे विदा पाकर वे अप्सराएँ स्वर्ग । पहुँचीं और फिर उन्होंने इन्द्रको सारा वृत्तान्त ॥ १८ बता दिया ॥ १८ ॥
तदनन्तर उन अप्सराओंसे नारायणमुनिका वृत्तान्त विस्तारपूर्वक सुनकर तथा साथमें आयी १ ९ उर्वशी आदि नारियोंको देखकर इन्द्र उन महात्मा नारायणकी प्रशंसा करने लगे ॥ १ ९ ॥ इन्द्र बोले – अहो, उन मुनिका ऐसा अपार धैर्य तथा तपोबल है,, जिन्होंने अपने तपके प्रभावसे ॥ २० उन्हीं अप्सराओंके सदृश रूपवाली अन्य उर्वशी आदि अप्सराएँ उत्पन्न कर दीं । नारायणमुनिकी यह प्रशंसा करके देवराज इन्द्रका मन प्रसन्नतासे परिपूर्ण २१ हो गया । उधर, धर्मात्मा नारायण भी तपस्यामें संलग्न हो गये ॥ २०-२१ ॥ [ हे राजन्! ] इस प्रकार मैंने आपसे मुनि नारायण और महामुनि नरके सम्पूर्ण अद्भुत वृत्तान्तका २२ वर्णन कर दिया ॥ २२ ॥
हे भरतश्रेष्ठ! वे ही नर - नारायण भृगुके शापवश पृथ्वीका भार उतारनेके लिये इस लोकमें पराक्रमी २३ । कृष्ण तथा अर्जुनके रूपमें अवतरित हुए थे ॥ २३ ॥
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अ ० १७ ] चतुर्थ राजोवाच
कृष्णावतारचरितं विस्तरेण वदस्व मे ।
सन्देहो मम चित्तेऽस्ति तं निवारय मानद ॥ २४
ययोः पुत्रत्वमापन्नौ हर्यनन्तौ महाबलौ ।
देवकीवसुदेवौ तौ दुःखभाजौ कथं मुने ॥ २५
कंसेन निगडे बद्धौ पीडितौ बहुवत्सरान् ।
ययोः पुत्रो हरिः साक्षात्तपसा तोषितोऽभवत् ॥ २६
जातोऽसौ मथुरायां तु गोकुले स कथं गतः ।
कंसं हत्वा द्वारवत्यां निवासं कृतवान्कथम् ॥ २७
पित्रादिसेवितं देशं समृद्धं पावनं किल ।
त्यक्त्वा देशान्तरेऽनार्ये गतवान्स कथं हरिः ॥ २८
कुलञ्च द्विजशापेन कथमुत्सादितं हरेः ।
भारावतारणं कृत्वा वासुदेवः सनातनः ॥ २ ९
देहं मुमोच तरसा जगाम च दिवं हरिः ।
पापिष्ठानाञ्च भारेण व्याकुलाभूच्च मेदिनी ॥ ३०
ते हता वासुदेवेन पार्थेनामितकर्मणा ।
लुण्ठिता यैर्हरेः पन्यस्ते कथं न निपातिताः ॥ ३ ९
भीष्मो द्रोणस्तथा कर्णो बाह्लीकोऽप्यथ पार्थिवः ।
वैराटोऽथ विकर्णश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्थिवः ॥ ३२
सोमदत्तादयः सर्वे निहताः समरे नृपाः ।
तेषामुत्तारितो भारश्चौराणां न हृतः कथम् ॥ ३३
कृष्णपल्यः कथं दुःखं प्राप्ताः प्रान्ते पतिव्रताः ।
सन्देहोऽयं मुनिश्रेष्ठ चित्ते मे परिवर्तते ॥ ३४
वसुदेवस्तु धर्मात्मा पुत्रदुःखेन तापितः ।
त्यक्तवान्स कथं प्राणानपमृत्युं जगाम ह ॥ ३५
पाण्डवा धर्मसंयुक्ताः कृष्णे च निरताः सदा ।
ते कथं दुःखभोक्तारो ह्यभवन्मुनिसत्तम ॥ ३६
स्कन्ध ४८३ राजा बोले — हे मानद! अब आप कृष्णावतारकी कथा विस्तारके साथ मुझसे कहिये और मेरे मनमें जो सन्देह है, उसका निवारण कीजिये ॥ २४ ॥
हे मुने! महाबली श्रीकृष्ण और बलराम जिनके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए, उन वसुदेव और देवकीको दुःखका भागी क्यों होना पड़ा? ॥२५ ॥
जिनकी तपस्यासे सन्तुष्ट होकर साक्षात् भगवान् श्रीहरि उनके पुत्र बने थे, वे ही [ वसुदेव और देवकी ] बेड़ियोंमें बद्ध होकर कंसके द्वारा बहुत वर्षोंतक क्यों सताये गये? ॥२६ ॥
वे श्रीकृष्ण उत्पन्न तो मथुरामें हुए, किंतु गोकुल क्यों ले जाये गये? बादमें कंसका वध करके उन्होंने द्वारकामें निवास क्यों किया? अपने पिता आदिके द्वारा सेवित, समृद्धिसम्पन्न तथा पवित्र स्थानको छोड़कर वे भगवान् श्रीकृष्ण दूसरे अनार्य देशमें क्यों चले गये? ॥ २७-२८ ॥ एक ब्राह्मणके शापसे भगवान् श्रीकृष्णके वंशका नाश क्यों हो गया? पृथ्वीका भार उतारकर उन सनातन भगवान् श्रीकृष्णने तुरंत देहत्याग कर दिया और वे स्वर्ग चले गये । जिन पापियोंके भारसे पृथ्वी व्याकुल हो उठी थी, उन्हें तो अमित कर्मोंवाले भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनने मार डाला था, किंतु जिन चोरोंने भगवान् श्रीकृष्णकी पत्नियोंका अपहरण कर लिया था, उन्हें वे क्यों नहीं मार सके? ॥ २ ९ - ३१ ॥ भीष्म, द्रोण, कर्ण, राजा बाह्लीक, वैराट, विकर्ण, राजा धृष्टद्युम्न, सोमदत्त आदि सभी राजागण युद्धमें मार डाले गये । भगवान् श्रीकृष्णने उनका भार तो पृथ्वीपरसे उतार दिया, किंतु वे चोरोंका भार क्यों नहीं मिटा सके? कृष्णकी पतिव्रता पत्नियोंको निर्जन स्थानमें इस प्रकारका दुःख क्यों मिला? हे मुनिश्रेष्ठ! मेरे मनमें यह संदेह बार - बार हो रहा है॥३२–३४ ॥ धर्मात्मा वसुदेवने पुत्रशोकसे सन्तप्त होकर अपने प्राण त्याग दिये; इस प्रकार वे अकालमृत्युको क्यों प्राप्त हुए? ॥ ३५ ॥
हे मुनिवर! पाण्डव धर्मनिष्ठ थे और भगवान् कृष्णमें सदा तल्लीन रहते थे; फिर भी उन्हें दुःख । क्यों भोगना पड़ा? ॥ ३६ ॥
1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] -16 C
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४८४ द्रौपदी च महाभागा कथं दुःखस्य भागिनी । वेदीमध्याच्च सञ्जाता लक्ष्म्यंशसम्भवा किल सभायां सा समानीता रजोदोषसमन्विता । बाला दुःशासनेनाथ केशग्रहणकर्शिता
पीडिता सिन्धुराज्ञाथ वनमध्यगता सती ।
तथैव कीचकेनापि पीडिता रुदती भृशम् ॥
पुत्राः पञ्चैव तस्यास्तु निहता द्रौणिना गृहे ।
सुभद्रायाः सुतो युद्धे बाल एव निपातितः ॥
तथा च देवकीपुत्रा षट् कंसेन निषूदिताः । समर्थेनापि हरिणा दैवं न कृतमन्यथा
यादवानां तथा शापः प्रभासे निधनं पुनः ।
कुलक्षयस्तथा तीव्रस्तत्पत्नीनाञ्च लुण्ठनम् ॥
विष्णुना चेश्वरेणापि साक्षान्नारायणेन च ।
उग्रसेनस्य सेवा वै दासवत्सततं कृता ॥
सन्देहोऽयं महाभाग तत्र नारायणे मुनौ ।
सर्वजन्तुसमानत्वं व्यवहारे निरन्तरम् ॥ ॥
हर्षशोकादयो भावाः सर्वेषां सदृशाः कथम् ।
ईश्वरस्य हरेर्जाता कथमप्यन्यथा गतिः ॥
तस्माद्विस्तरतो ब्रूहि कृष्णस्य चरितं महत् ।
अलौकिकेन हरिणा कृतं कर्म महीतले ॥
हता आयुः क्षये दैत्याः क्लेशेन महता पुनः ।
क्वैश्वर्यशक्तिः प्रथिता हरिणा मुनिसत्तम ॥
रुक्मिणीहरणे नूनं गृहीत्वाथ पलायनम् ।
कृतं हि वासुदेवेन चौरवच्चरितं तदा ॥
मथुरामण्डलं त्यक्त्वा समृद्धं कुलसम्मतम् ।
जरासन्धभयात्तेन द्वारकागमनं कृतम् ॥
1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] —16 D श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १७ महाभागा द्रौपदीको दुःख क्यों सहने पड़े? ॥ ३७ वह तो साक्षात् लक्ष्मीके अंशसे उत्पन्न थी और वेदीके मध्यसे प्रकट हुई थी । रजोधर्मसे युक्त उस युवती द्रौपदीको उसके बाल पकड़कर घसीटते ॥ ३८ हुए दुःशासन सभामें ले आया था । वनमें गयी हुई उस पतिव्रताको सिन्धुराज जयद्रथने सताया, उसी प्रकार [ अज्ञातवासके समय ] कीचकने भी रोती-३ ९ कलपती उस द्रौपदीको बहुत पीड़ा पहुँचायी अश्वत्थामाने घरके अन्दर ही उसके पाँच पुत्रोंको मार डाला । सुभद्रापुत्र अभिमन्यु बाल्यावस्थामें ही ४० युद्धमें मार डाला गया । उसी प्रकार कंसने देवकीके छः पुत्रोंका वध कर दिया । किंतु [ सब कुछ करनेमें ] समर्थ होते हुए भी भगवान् श्रीकृष्ण प्रारब्धको नहीं । ४१ टाल सके ॥ ३७-४१ ॥ यादवोंको शाप मिला और इसके बाद प्रभास-क्षेत्रमें उनका निधन हो गया । इस प्रकार भयंकर ४२ कुलनाश हो गया और अन्तमें उनकी पत्नियोंका हरण भी हो गया । भगवान् कृष्ण स्वयं नारायण. ईश्वर और विष्णु थे; फिर भी उन्होंने दासकी भाँति ४३ उग्रसेनकी सदा सेवा की । हे महाभाग! मुनि नारायणके विषयमें मुझे यह सन्देह है कि आचार-४४ व्यवहारमें वे सदा साधारण प्राणियोंके समान ही रहते थे॥४२–४४ ॥ सभी प्राणियोंके समान हर्ष - शोकादि भाव उनमें ४५ भी क्यों थे? उन भगवान् श्रीकृष्णकी भी यह अन्यथा गति क्यों हुई? ॥ ४५ ॥
अतः आप श्रीकृष्णके महान् चरित्रका विस्तारपूर्वक ४६ वर्णन कीजिये और उन लोकोत्तर भगवान्के द्वारा पृथ्वीतलपर किये गये कर्मोंको भी बताइये ॥ ४६ ॥
हे मुनिश्रेष्ठ! भगवान् श्रीकृष्ण दैत्योंकी आयु ४७ समाप्त होनेपर भी बड़े कष्टसे उन्हें मार पाये । उस समय उनकी विख्यात ईश्वरीय शक्ति कहाँ थी? ॥ ४७ ॥
रुक्मिणीहरणके समय वे वासुदेव श्रीकृष्ण उसे ४८ लेकर भाग गये थे । उस समय तो उन्होंने चौर र - - तु तुल्य आचरण किया था ॥ ४८ ॥
समृद्धिशाली तथा अपने पूर्वजों द्वारा प्रतिष्ठित ४ ९ | किये गये मथुरामण्डलको छोड़कर वे श्रीकृष्ण जरासन्धके
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अ ० १८ ]
तदा केनापि न ज्ञातो भगवान्हरिरीश्वरः ।
किञ्चित्प्रब्रूहि मे ब्रह्मन् कारणं व्रजगोपनम् ॥
एते चान्ये च बहवः सन्देहा वासवीसुत ।
नाशयाद्य महाभाग सर्वज्ञोऽसि द्विजोत्तम ॥
गोप्यस्तथैकः सन्देहो हृदयान्न निवर्तते ।
पाञ्चाल्याः पञ्चभर्तृत्वं लोके किं न जुगुप्सितम् ॥
सदाचारं प्रमाणं हि प्रवदन्ति मनीषिणः ।
पशुधर्मः कथं तैस्तु समर्थैरपि संश्रितः ॥
भीष्मेणापि कृतं किं वा देवरूपेण भूतले ।
गोलकौ तौ समुत्पाद्य यत्तु वंशस्य रक्षणम् ॥
धिग्धर्मनिर्णयः कामं मुनिभिः परिदर्शितः ।
येन केनाप्युपायेन पुत्रोत्पादनलक्षणः ॥
चतुर्थ स्कन्ध ४८५ भयसे द्वारका चले गये थे । उस समय कोई भी नहीं ५० जान सका कि ये श्रीकृष्ण ही भगवान् विष्णु हैं । हे ब्रह्मन्! [ श्रीकृष्णके द्वारा अपनेको ] व्रजमें छिपाये रखनेका कुछ कारण आप मुझे बताइये ॥ ४ ९ -५० ॥ ५१ हे सत्यवतीनन्दन! ये तथा और भी दूसरे बहुत-से सन्देह हैं । हे महाभाग! हे द्विजवर! आप सर्वज्ञ हैं, अतः आज आप उन्हें दूर कर दीजिये ॥ ५१ ॥
५२ एक और गोपनीय सन्देह है जो मेरे मनसे नहीं निकल पा रहा है । क्या द्रौपदीके पाँच पतियोंका होना लोकमें निन्दनीय नहीं है? विद्वज्जन तो सदाचारको ही ५३ प्रमाण मानते हैं; तब समर्थ होकर भी उन पाण्डवोंने पशु - धर्म क्यों स्वीकार किया? ॥ ५२-५३ ॥ देवतास्वरूप भीष्मपितामहने भी भूतलपर दो गोलक ५४ सन्तानें उत्पन्न कराकर अपने वंशकी जो रक्षा की, क्या यह उचित है? मुनियोंके द्वारा जो धर्मनिर्णय प्रदर्शित किया गया है कि जिस किसी भी उपाय से पुत्रोत्पत्ति ५५ । करनी चाहिये, उसे धिक्कार है! ॥ ५४-५५ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे सुराङ्गनानां प्रति नारायणवरदानं नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
अथाष्टादशोऽध्यायः पापभारसे व्यथित पृथ्वीका देवलोक जाना, इन्द्रका देवताओं और पृथ्वीके साथ ब्रह्मलोक जाना, ब्रह्माजीका पृथ्वी तथा इन्द्रादि देवताओंसहित विष्णुलोक जाकर विष्णुकी स्तुति करना, विष्णुद्वारा व्यास उवाच शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि कृष्णस्य चरितं महत् अवतारकारणं चैव देव्याश्चरितमद्भुतम् धरैकदा भराक्रान्ता रुदती चातिकर्शिता गोरूपधारिणी दीना भीतागच्छत्रिविष्टपम् पृष्टा शक्रेण किं तेऽद्य वर्तते भयमित्यथ केन वै पीडितासि त्वं किं ते दुःखं वसुन्धरे तच्छ्रुत्वेला तदोवाच शृणु देवेश मेऽखिलम् दुःखं पृच्छसि यत्त्वं मे भाराक्रान्तोऽस्मि मानद अपनेको भगवतीके अधीन बताना व्यासजी बोले- हे राजन्! सुनिये, अब मैं । श्रीकृष्णके महान् चरित्र, उनके अवतारके कारण और ॥ १ भगवतीके अद्भुत चरित्रका वर्णन करूँगा ॥ १ ॥
एक समयकी बात है - [ पापियोंके ] भारसे । व्यथित, अत्यधिक कृश, दीन तथा भयभीत पृथ्वी ॥ २ गौका रूप धारण करके रोती हुई स्वर्गलोक गयी ॥ २ ॥
वहाँ इन्द्रने पूछा — हे वसुन्धरे! इस समय तुम्हें । कौन- -सा भय है, तुम्हें किसने पीड़ा पहुँचायी है और ॥ ३ तुम्हें क्या दुःख है? ॥ ३ ॥
यह सुनकर पृथ्वीने कहा- हे देवेश! यदि आप । पूछ ही रहे हैं तो मेरा सारा दुःख सुन लीजिये । हे ॥ ४ । मानद! मैं भारसे दबी हुई हूँ ॥ ४ ॥
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४८६ जरासन्धो महापापी मागधेषु पतिर्मम । शिशुपालस्तथा चैद्यः काशिराजः प्रतापवान्
रुक्मी च बलवान्कंसो नरकश्च महाबलः ।
शाल्वः सौभपतिः क्रूरः केशी धेनुकवत्सकौ ॥
सर्वे धर्मविहीनाश्च परस्परविरोधिनः ।
पापाचारा मदोन्मत्ताः कालरूपाश्च पार्थिवाः ॥
तैरहं पीडिता शक्र भाराक्रान्ताक्षमा विभो ।
किं करोमि क्व गच्छामि चिन्ता मे महती स्थिता ॥
पीडिताहं वराहेण विष्णुना प्रभविष्णुना । शक्र जानीहि हरिणा दुःखाद्दुःखतरं गता
यतोऽहं दुष्टदैत्येन कश्यपस्यात्मजेन वै ।
हृताहं हिरण्याक्षेण मग्ना तस्मिन्महार्णवे ॥
तदा सूकररूपेण विष्णुना निहतोऽप्यसौ ।
उद्धृताहं वराहेण स्थापिता हि स्थिरा कृता ॥
नोचेद्रसातले स्वस्था स्थिता स्यां सुखशायिनी ।
न शक्तास्म्यद्य देवेश भारं वोढुं दुरात्मनाम् ॥
अग्रे दुष्टः समायाति ह्यष्टाविंशस्तथा कलिः ।
तदाहं पीडिता शक्र गन्तास्म्याशु रसातलम् ॥
तस्मात्त्वं देवदेवेश दुःखरूपार्णवस्य च ।
पारदो भव भारं मे हर पादौ नमामि ते ॥
इन्द्र उवाच
इले किं ते करोम्यद्य ब्रह्माणं शरणं व्रज ।
अहं तत्रागमिष्यामि स ते दुःखं हरिष्यति ॥
तच्छ्रुत्वा त्वरिता पृथ्वी ब्रह्मलोकं गता तदा ।
शक्रोऽपि पृष्ठतः प्राप्तः सर्वदेवपुरःसरः ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १८ मगधदेशका राजा महापापी जरासन्ध, चेदिनरेश ॥ ५ शिशुपाल, प्रतापी काशिराज, रुक्मी, बलवान् कंस, महाबली नरकासुर, सौभनरेश शाल्व, क्रूर केशी, धेनुकासुर और वत्सासुर - ये सभी राजागण धर्महीन, परस्पर विरोध रखनेवाले, पापाचारी, मदोन्मत्त और ६ साक्षात् कालस्वरूप हो गये हैं ॥ ५ - ७ ॥ इन्द्र! उनसे मुझे बहुत व्यथा हो रही है । मैं उनके भारसे दबी हुई हूँ और अब [ उनका भार ७ सहनेमें ] मैं असमर्थ हो गयी हूँ । हे विभो! मैं क्या करूँ और कहाँ जाऊँ? मुझे यही महान् चिन्ता है ॥ ८ ॥
हे इन्द्र! पूर्वमें मैं [ दानव हिरण्याक्षसे ] पीड़ित ८ थी । उस समय परम ऐश्वर्यशाली वराहरूपधारी भगवान् विष्णुने मेरा उद्धार किया था । यदि वे वराहरूप धारण करके मेरा उद्धार न किये होते तो ॥ ९ उससे भी अधिक दुःखकी स्थितिमें मैं न पहुँचती-आप ऐसा जानिये ॥ ९ ॥
कश्यपके पुत्र दुष्ट दैत्य हिरण्याक्षने मुझे १० । चुरा लिया था और उस महासमुद्रमें डुबो दिया था । उस समय भगवान् विष्णुने सूकरका रूप धारणकर उसका संहार किया और मेरा उद्धार किया । तदनन्तर ११ उन वराहरूपधारी विष्णुने मुझे स्थापित करके स्थिर कर दिया अन्यथा मैं इस समय पातालमें स्वस्थचित्त रहकर सुखपूर्वक सोयी रहती । हे देवेश! अब मैं दुष्टात्मा राजाओंका भार वहन करनेमें १२ समर्थ नहीं हूँ॥१०–१२ ॥ हे इन्द्र! अब आगे अट्ठाईसवाँ दुष्ट कलियुग आ रहा है । उस समय मैं और भी पीड़ित हो जाऊँगी १३ तब तो मैं शीघ्र ही रसातलमें चली जाऊँगी । अतएव हे देवदेवेश! इस दुःखरूपी महासागरसे मुझे पार कर दीजिये; मेरा बोझ उतार दीजिये, मैं आपके चरणों में १४ नमन करती हूँ॥१३-१४ ॥ इन्द्र बोले - हे वसुन्धरे! मैं इस समय तुम्हारे लिये क्या कर सकता हूँ! तुम ब्रह्माकी शरणमें जाओ, वे ही तुम्हारा दुःख दूर करेंगे, मैं भी वहाँ आ १५ जाऊँगा ॥ १५ ॥
यह सुनकर पृथ्वीने तत्काल ब्रह्मलोकके लिये प्रस्थान कर दिया । उसके पीछे - पीछे इन्द्र भी सभी १६ । देवताओंके साथ वहाँ पहुँच गये ॥१६ ॥
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अ ० १८ ]
सुरभीमागतां तत्र दृष्ट्वोवाच प्रजापतिः ।
महीं ज्ञात्वा महाराज ध्यानेन समुपस्थिताम् ॥
कस्माद्रुदसि कल्याणि किं ते दुःखं वदाधुना ।
पीडितासि च केन त्वं पापाचारेण भूर्वद ॥
धरोवाच
कलिरायाति दुष्टोऽयं बिभेमि तद्भयादहम् ।
पापाचाराः प्रजास्तत्र भविष्यन्ति जगत्पते ॥
राजानश्च दुराचाराः परस्परविरोधिनः ।
चौरकर्मरताः सर्वे राक्षसाः पूर्णवैरिणः ॥
तान्हत्वा नृपतीन्भारं हर मेऽद्य पितामह ।
पीडितास्मि महाराज सैन्यभारेण भूभृताम् ॥
ब्रह्मोवाच
नाहं शक्तस्तथा देवि भारावतरणे तव ।
गच्छावः सदनं विष्णोर्देवदेवस्य चक्रिणः ॥
स ते भारापनोदं वै करिष्यति जनार्दनः ।
पूर्वं मयापि ते कार्यं चिन्तितं सुविचार्य च ॥
तत्र गच्छ सुरश्रेष्ठ यत्र देवो जनार्दनः । व्यास उवाच इत्युक्त्वा वेदकर्तासौ पुरस्कृत्य सुरांश्च गाम् ॥
जगाम विष्णुसदनं हंसारूढश्चतुर्मुखः ।
तुष्टाव वेदवाक्यैश्च भक्तिप्रवणमानसः ॥
ब्रह्मोवाच
सहस्त्रशीर्षास्त्वमसि सहस्राक्षः सहस्रपात् ।
त्वं वेदपुरुषः पूर्वं देवदेवः सनातनः ॥
भूतपूर्वं भविष्यच्च वर्तमानं च यद्विभो ।
अमरत्वं त्वया दत्तमस्माकं च रमापते ॥
एतावान्महिमा तेऽस्ति को न वेत्ति जगत्त्रये ।
त्वं कर्ताप्यविता हन्ता त्वं सर्वगतिरीश्वरः ॥
चतुर्थ स्कन्ध ४८७ हे महाराज! उस आयी हुई धेनुको अपने १७ सम्मुख उपस्थित देखकर तथा ध्यान - दृष्टिद्वारा उसे पृथ्वी जान करके ब्रह्माजीने कहा- हे कल्याणि! तुम किसलिये रो रही हो और तुम्हें कौन - सा दुःख है; १८ मुझे अभी बताओ । हे पृथ्वि! किस पापाचारीने तुम्हें पीड़ा पहुँचायी है, मुझे बताओ ॥ १७-१८ ॥ धरा बोली- हे जगत्पते! यह दुष्ट कलि अब आनेवाला है । मैं उसीके आतंकसे डर रही हूँ; क्योंकि १ ९ उस समय सभी लोग पापाचारी हो जायँगे । सभी राजालोग दुराचारी हो जायँगे, आपसमें विरोध करनेवाले होंगे और चोरीके कर्ममें संलग्न रहेंगे । वे राक्षसके २० रूपमें एक - दूसरेके पूर्णरूपसे शत्रु बन जायँगे । हे पितामह! उन राजाओंका वध करके मेरा भार उतार दीजिये | हे महाराज! मैं राजाओंकी सेनाके भारसे २१ दबी हुई हूँ ॥ १ ९ –२१ ॥ ब्रह्माजी बोले – हे देवि! तुम्हारा भार उतारनेमें मैं सर्वथा समर्थ नहीं हूँ । अब हम दोनों चक्रधारी देवाधिदेव भगवान् विष्णुके धाम चलते हैं । वे जनार्दन २२ तुम्हारा भार अवश्य उतार देंगे । मैंने पहलेसे ही भलीभाँति विचार करके तुम्हारा कार्य करनेकी योजना बनायी है । [ उन्होंने इन्द्रसे कहा - ] हे सुरश्रेष्ठ! २३ जहाँपर भगवान् जनार्दन विद्यमान हैं, अब आप वहींपर चलें ॥२२-२३३ ॥ व्यासजी बोले- ऐसा कहकर वे वेदकर्ता चतुर्मुख ब्रह्माजी हंसपर आरूढ़ हुए और देवताओं २४ तथा गोरूपधारिणी पृथ्वीको साथमें लेकर विष्णुलोकके लिये प्रस्थित हो गये । [ वहाँ पहुँचकर ] भक्तिसे परिपूर्ण हृदयवाले ब्रह्माजी वेदवाक्योंसे उनकी स्तुति २५ करने लगे ॥ २४-२५ ॥ ब्रह्माजी बोले- आप हजार मस्तकोंवाले, हजार नेत्रोंवाले और हजार पैरोंवाले हैं । आप देवताओंके भी २६ आदिदेव तथा सनातन वेदपुरुष हैं । हे विभो! हे रमापते! भूतकाल, भविष्यकाल तथा वर्तमानकालका जो भी हमारा अमरत्व है, उसे आपने ही हमें प्रदान २७ किया है । आपकी इतनी बड़ी महिमा है कि उसे त्रिलोकीमें कौन नहीं जानता? आप ही सृष्टि करनेवाले, पालन करनेवाले और संहार करनेवाले हैं । आप २८ । सर्वव्यापी और सर्वशक्तिसम्पन्न हैं ॥ २६–२८ ॥
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४८८ व्यास उवाच इतीडितः प्रभुर्विष्णुः प्रसन्नो गरुडध्वजः दर्शनञ्च ददौ तेभ्यो ब्रह्मादिभ्योऽमलाशयः
पप्रच्छ स्वागतं देवान्प्रसन्नवदनो हरिः ।
ततस्त्वागमने तेषां कारणञ्च सविस्तरम् ॥
तमुवाचाब्जजो नत्वा धरादुःखञ्च संस्मरन् ।
भारावतरणं विष्णो कर्तव्यं ते जनार्दन ॥
भुवि धृत्वावतारं त्वं द्वापरान्ते समागते । हत्वा दुष्टान्नृपानुर्व्या हर भारं दयानिधे विष्णुरुवाच
नाहं स्वतन्त्र एवात्र न ब्रह्मा न शिवस्तथा ।
नेन्द्रोऽग्निर्न यमस्त्वष्टा न सूर्यो वरुणस्तथा ॥
योगमायावशे सर्वमिदं स्थावरजङ्गमम् ।
ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं ग्रथितं गुणसूत्रतः ॥
यथा सा स्वेच्छया पूर्वं कर्तुमिच्छति सुव्रत ।
तथा करोति सुहिता वयं सर्वेऽपि तद्वशाः ॥
यद्यहं स्यां स्वतन्त्रो वै चिन्तयन्तु धिया किल ।
कुतोऽभवं मत्स्यवपुः कच्छपो वा महार्णवे ॥
तिर्यग्योनिषु को भोगः का कीर्तिः किं सुखं पुनः ।
किं पुण्यं किं फलं तत्र क्षुद्रयोनिगतस्य मे ॥
कोलो वाथ नृसिंहो वा वामनो वाभवं कुतः ।
जमदग्निसुतः कस्मात्सम्भवेयं पितामह ॥
नृशंसं वा कथं कर्म कृतवानस्मि भूतले ।
क्षतजैस्तु ह्रदान्सर्वान्पूरयेयं कथं पुनः ॥
तत्कथं जमदग्नेश्च पुत्रो भूत्वा द्विजोत्तमः ।
क्षत्रियान्हतवानाजौ निर्दयो गर्भगानपि ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १८ व्यासजी बोले- इस प्रकार स्तुति करनेपर । पवित्र हृदयवाले वे गरुडध्वज भगवान् विष्णु प्रसन्न ॥ २ ९ हो गये और उन्होंने ब्रह्मा आदि देवताओंको अपने दर्शन दिये । प्रसन्न मुखमण्डलवाले भगवान् विष्णुने देवताओंका स्वागत किया और विस्तारपूर्वक उनके ३० आगमनका कारण पूछा ॥२ ९ -३० ॥ तदनन्तर पद्मयोनि ब्रह्माजीने उन्हें प्रणाम करनेके उपरान्त पृथ्वीके दुःखका स्मरण करते हुए उनसे ३१ कहा - हे विष्णो! हे जनार्दन! अब पृथ्वीका भार दूर कर देना आपका कर्तव्य है । अतः हे दयानिधे! द्वापरका अन्तिम समय उपस्थित होनेपर आप पृथ्वीपर ॥ ३२ अवतार लेकर दुष्ट राजाओंको मारकर पृथ्वीका भार उतार दीजिये ॥ ३१-३२ ॥ विष्णु बोले- इस विषयमें मैं ( विष्णु ), ब्रह्मा. शंकर, इन्द्र, अग्नि, यम, त्वष्टा, सूर्य और वरुण– ३३ कोई भी स्वतन्त्र नहीं है । यह सम्पूर्ण चराचर जगत् योगमायाके अधीन रहता है । ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त सब कुछ [ सात्त्विक, राजस, तामस ] गुणोंके सूत्रोंद्वारा ३४ उन्हींमें गुँथा हुआ है॥३३-३४ ॥ हे सुव्रत! वे हितकारिणी भगवती सर्वप्रथम स्वेच्छापूर्वक जैसा करना चाहती हैं, वैसा ही करती ३५ हैं । हमलोग भी सदा उनके ही अधीन रहते हैं ॥ ३५ ॥
अब आपलोग स्वयं अपनी बुद्धिसे विचार करें कि यदि मैं स्वतन्त्र होता तो महासमुद्रमें मत्स्य और कच्छपरूपधारी क्यों बनता? तिर्यक् - योनियोंमें ३६ कौन - सा भोग प्राप्त होता है, क्या यश मिलता है, कौन - सा सुख होता है और कौन - सा पुण्य प्राप्त होता है? [ इस प्रकार ] क्षुद्रयोनियोंमें जन्म लेनेवाले ३७ मुझ विष्णुको क्या फल मिला? ॥३६-३७ ॥ यदि मैं स्वतन्त्र होता तो सूकर, नृसिंह और वामन क्यों बनता? इसी प्रकार हे पितामह! मैं जमदग्निपुत्र ३८ ( परशुराम ) - के रूपमें उत्पन्न क्यों होता? इस भूतलपर मैं [ क्षत्रियोंके संहार जैसा ] नृशंस कर्म क्यों करता और उनके रुधिरसे समस्त सरोवरोंको क्यों भर डालता? ३ ९ उस समय मैं जमदग्निपुत्र परशुरामके रूपमें जन्म लेकर एक श्रेष्ठ ब्राह्मण होकर भी युद्धमें क्षत्रियोंका संहार क्यों करता और घोर निर्दयी बनकर गर्भस्थ ४० । शिशुओंतकको भला क्यों मारता? ॥ ३८--४० ॥
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अ ० १८ ]
रामो भूत्वाथ देवेन्द्र प्राविशद्दण्डकं वनम् ।
पदातिश्चीरवासाश्च जटावल्कलवान्पुनः ॥
असहायो ह्यपाथेयो भीषणे निर्जने वने ।
कुर्वन्नाखेटकं तत्र व्यचरं विगतत्रपः ॥
न ज्ञातवान्मृगं हैमं मायया पिहितस्तदा ।
उटजे जानकीं त्यक्त्वा निर्गतस्तत्पदानुगः ॥
लक्ष्मणोऽपि च तां त्यक्त्वा निर्गतो मत्पदानुगः ।
वारितोऽपि मयात्यर्थं मोहितः प्राकृतैर्गुणैः ॥
भिक्षुरूपं ततः कृत्वा रावणः कपटाकृतिः ।
जहार तरसा रक्षो जानकीं शोककर्शिताम् ॥
दुःखार्तेन मया तत्र रुदितञ्च वने वने ।
सुग्रीवेण च मित्रत्वं कृतं कार्यवशान्मया ॥
अन्यायेन हतो वाली शापाच्चैव निवारितः ।
सहायान्वानरान् कृत्वा लङ्कायां चलितः पुनः ॥
बद्धोऽहं नागपाशैश्च लक्ष्मणश्च ममानुजः ।
विसंज्ञौ पतितौ दृष्ट्वा वानरा विस्मयं गताः ॥
गरुडेन तदागत्य मोचितौ भ्रातरौ किल ।
चिन्ता मे महती जाता दैवं किं वा करिष्यति ॥
हृतं राज्यं वने वासो मृतस्तातः प्रिया हृता युद्धं कष्टं ददात्येवमग्रे किं वा करिष्यति प्रथमं तु महद्दुःखमराज्यस्य वनाश्रयम् राजपुत्र्यान्वितस्यैव धनहीनस्य मे सुराः वराटिकापि पित्रा मे न दत्ता वननिर्गमे पदातिरसहायोऽहं धनहीनश्च निर्गतः चतुर्दशैव वर्षाणि नीतानि च तदा मया क्षात्रं धर्मं परित्यज्य व्याधवृत्त्या महावने चतुर्थ स्कन्ध ४८ ९ हे देवेन्द्र! रामका अवतार लेकर मुझे दण्डकवनमें पैदल विचरण करना पड़ा, गेरुआ वस्त्र धारण करना ४१ पड़ा और जटा - वल्कलधारी बनना पड़ा । उस निर्जन वनमें असहाय रहते हुए तथा पासमें बिना किसी ४२ भोज्य - सामग्रीके ही निर्लज्ज होकर आखेट करते हुए मैं इधर - उधर भटकता रहा॥४१-४२ ॥ उस समय मायासे आच्छादित रहनेके कारण मैं उस मायावी स्वर्ण - मृगको नहीं पहचान सका और ४३ जानकीको पर्णकुटीमें छोड़कर उस मृगके पीछे-पीछे निकल पड़ा ॥ ४३ ॥
मेरे बहुत मना करनेपर भी प्राकृत गुणोंसे ४४ व्यामुग्ध होनेके कारण लक्ष्मण भी उस सीताको छोड़कर मेरे पदचिह्नोंका अनुसरण करते हुए वहाँसे निकल पड़े ॥४४ ॥
४५ तदनन्तर कपटस्वभाव राक्षस रावणने भिक्षुकका रूप धारण करके शोकसे व्याकुल जानकीका तत्काल हरण कर लिया ॥ ४५ ॥
तब दुःखसे व्याकुल होकर मैं वन - वन भटकता ४६ हुआ रोता रहा और अपना कार्य सिद्ध करनेके लिये मैंने सुग्रीवसे मित्रता की । मैंने अन्यायपूर्वक वालीका वध किया तथा उसे शापसे मुक्ति दिलायी ४७ | और इसके बाद वानरोंको अपना सहायक बनाकर लंकाकी ओर प्रस्थान किया । ४६-४७ ॥ [ वहाँ युद्धमें ] मैं तथा मेरा छोटा भाई लक्ष्मण ४८ दोनों ही नागपाशोंसे बाँध दिये गये । हम दोनोंको अचेत पड़ा देखकर सभी वानर आश्चर्यचकित हो गये । तब गरुड़ने आकर हम दोनों भाइयोंको छुड़ाया । उस समय मुझे ४ ९ महान् चिन्ता होने लगी कि दैव अब न जाने क्या करेगा? राज्य छिन गया, वनमें वास करना पड़ा, पिताकी मृत्यु हो । गयी और प्रिय सीता हर ली गयी । युद्ध कष्ट दे ही रहा ॥ ५० है, अब आगे दैव न जाने क्या करेगा! ॥ ४८–५० ॥ हे देवतागण! सर्वप्रथम दुःख तो मुझ । राज्यविहीनका वनवास हुआ; वनके लिये चलते ॥ ५१ समय राजकुमारी सीता मेरे साथ थीं और मेरे पास । धन भी नहीं था । वन जाते समय पिताजीने मुझे एक ॥ ५२ वराटिका ( कौड़ी ) भी नहीं दी; असहाय तथा धनविहीन मैं पैदल ही निकल पड़ा । उस समय । क्षत्रियधर्मका त्याग करके व्याधवृत्तिके द्वारा मैंने उस ॥ ५३ । महावनमें चौदह वर्ष व्यतीत किये ॥ ५१ - ५३ ॥
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४ ९ ० दैवाद्युद्धे जयः प्राप्तो निहतोऽसौ महासुरः आनीता च पुनः सीता प्राप्तायोध्या मया तथा वर्षाणि कतिचित्तत्र सुखं संसारसम्भवम् प्राप्तं राज्यञ्च सम्पूर्णं कोसलानधितिष्ठता ॥
पुरैवं वर्तमानेन प्राप्तराज्येन वै तदा ।
लोकापवादभीतेन त्यक्ता सीता वने मया ॥
कान्ताविरहजं दुःखं पुनः प्राप्तं दुरासदम् ।
पातालं सा गता पश्चाद्धरां भित्त्वा धरात्मजा ॥
एवं रामावतारेऽपि दुःखं प्राप्तं निरन्तरम् ।
परतन्त्रेण मे नूनं स्वतन्त्रः को भवेत्तदा ॥
पश्चात्कालवशात्प्राप्तः स्वर्गो मे भ्रातृभिः सह ।
परतन्त्रस्य का वार्ता वक्तव्या विबुधेन वै ॥
परतन्त्रोऽस्म्यहं नूनं पद्मयोने निशामय ।
तथा त्वमपि रुद्रश्च सर्वे चान्ये सुरोत्तमाः ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १ ९ । तदनन्तर भाग्यवश युद्धमें मुझे विजय प्राप्त हुई ॥ ५४ और वह महान् असुर रावण मारा गया । इसके बाद मैं सीताको ले आया और मुझे अयोध्या फिरसे प्राप्त । हो गयी । इस प्रकार जब मुझे सम्पूर्ण राज्य मिल गया, तब कोसलदेशपर अधिष्ठित रहते हुए मैंन ५५ वहाँपर कुछ वर्षोंतक सांसारिक सुखका भोग किया ॥ ५४-५५ ॥ इस प्रकार पूर्वकालमें जब मुझे राज्य प्राप्त हो ५६ गया तब मैंने लोकनिन्दाके भयसे वनमें सीताका परित्याग कर दिया । इसके बाद मुझे पुनः पत्नी-वियोगसे होनेवाला भयंकर दुःख प्राप्त हुआ । वह ५७ धरानन्दिनी सीता पृथ्वीको भेदकर पातालमें चली गयी ॥ ५६-५७ ॥ इस प्रकार रामावतारमें भी मैं परतन्त्र होकर ५८ निरन्तर दुःख पाता रहा । तब भला दूसरा कौन स्वतन्त्र हो सकता है? तत्पश्चात् कालके वशीभूत होकर मुझे अपने भाइयोंके साथ स्वर्ग जाना ५ ९ पड़ा । अतः कोई भी विद्वान् पराधीन व्यक्तिकी क्या बात करेगा? हे कमलोद्भव! आप यह जान लीजिये कि जैसे मैं परतन्त्र हूँ वैसे ही आप, शंकर तथा अन्य सभी बड़े - बड़े देवता भी निश्चितरूपसे ६० | परतन्त्र हैं ॥ ५८- ६० ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे ब्रह्माणं प्रति विष्णुवाक्यं नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
अथैकोनविंशोऽध्यायः देवताओं द्वारा भगवतीका स्तवन, भगवतीद्वारा श्रीकृष्ण और अर्जुनको निमित्त बनाकर अपनी शक्तिसे पृथ्वीका भार दूर करनेका आश्वासन देना व्यास उवाच इत्युक्त्वा भगवान्विष्णुः पुनराह प्रजापतिम् यन्मायामोहितः सर्वस्तत्त्वं जानाति नो जनः वयं मायावृताः कामं न स्मरामो जगद्गुरुम् परमं पुरुषं शान्तं सच्चिदानन्दमव्ययम् व्यासजी बोले - [ हे राजन्! ] ऐसा कहनेके । उपरान्त भगवान् विष्णुने ब्रह्माजीसे फिर कहा— ॥ १ जिन भगवतीकी मायासे मोहित रहनेके कारण सभी लोग परमतत्त्वको नहीं जान पाते, उन्हींकी मायासे आच्छादित रहनेके कारण हम लोग भी जगद्गुरु, । शान्तस्वरूप, सच्चिदानन्द तथा अविनाशी परमपुरुषका ॥ २ स्मरण नहीं कर पाते॥१-२ ॥
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अ ० १ ९ ]
अहं विष्णुरहं ब्रह्मा शिवोऽहमिति मोहिताः ।
न जानीमो वयं धातः परं वस्तु सनातनम् ॥
यन्मायामोहितश्चाहं सदा वर्ते परात्मनः ।
परवान्दारुपाञ्चाली मायिकस्य यथा वशे ॥
भवतापि तथा दृष्टा विभूतिस्तस्य चाद्भुता ।
कल्पादौ भवयुक्तेन मयापि च सुधार्णवे ॥
मणिद्वीपेऽथ मन्दारविटपे रासमण्डले ।
समाजे तत्र सा दृष्टा श्रुता न वचसापि च ॥
तस्मात्तां परमां शक्तिं स्मरन्त्वद्य सुराः शिवाम् ।
सर्वकामप्रदां मायामाद्यां शक्तिं परात्मनः ॥
व्यास उवाच इत्युक्ता हरिणा देवा ब्रह्माद्या भुवनेश्वरीम् । चतुर्थ स्कन्ध ४ ९ १ हे ब्रह्मन्! मैं विष्णु हूँ, मैं ब्रह्मा हूँ, मैं शिव हूँ— ३ इसी [ अभिमानसे ] मोहित हमलोग उस सनातन परम - तत्त्वको नहीं जान पाते ॥३ ॥
उस परमात्माकी मायासे मोहित मैं उसी प्रकार ४ सदा उसके अधीन रहता हूँ, जैसे कठपुतली बाजीगरके अधीन रहती है ॥ ४ ॥
कल्पके आरम्भमें आप ( ब्रह्मा ) - ने, शिवने ५ तथा मैंने भी सुधासागरमें उस परमात्माकी अद्भुत विभूतिका दर्शन किया था । मणिद्वीपमें मन्दारवृक्षके नीचे चल रहे रासमण्डलमें एकत्रित सभामें भी वह विभूति साक्षात् देखी गयी थी; न कि वह केवल ६ कही - सुनी गयी बात है ॥५-६ ॥ अतएव इस अवसरपर सभी देवता उसी परमा शक्ति, कल्याणकारिणी, सभी कामनाएँ पूर्ण करनेवाली, ७ माया -स्वरूपिणी तथा परमात्माकी आद्याशक्ति भगवतीका स्मरण करें ॥ ७ ॥
व्यासजी बोले – भगवान् विष्णुके ऐसा कहनेपर ब्रह्मा आदि देवता सदा विराजमान रहनेवाली भगवती सस्मरुर्मनसा देवीं योगमायां सनातनीम् ॥ ८ योगमायाका एकाग्र मनसे ध्यान करने लगे ॥८ ॥
स्मृतमात्रा तदा देवी प्रत्यक्षं दर्शनं ददौ ।
पाशाङ्कुशवराभीतिधरा देवी जपारुणा ।
दृष्ट्वा प्रमुदिता देवास्तुष्टुवुस्तां सुदर्शनाम् ॥
देवा ऊचुः
ऊर्णनाभाद्यथा तन्तुर्विस्फुलिङ्गा विभावसोः ।
तथा जगद्यदेतस्या निर्गतं तां नता वयम् ॥
यन्मायाशक्तिसंक्लृप्तं जगत्सर्वं चराचरम् ।
तां चितं भुवनाधीशां स्मरामः करुणार्णवाम् ॥
यदज्ञानाद्भवोत्पत्तिर्यज्ज्ञानाद्भवनाशनम् संविद्रूपां च तां देवीं स्मरामः सा प्रचोदयात् ॥ उनके स्मरण करते ही भगवतीने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन प्रदान किया । उस समय वे देवी जपाकुसुमके समान रक्तवर्णसे सुशोभित थीं और उन्होंने पाश, अंकुश, वर तथा अभय मुद्रा धारण कर रखी थी । उन ९ परम सुन्दर भगवतीको देखकर सभी देवता अत्यन्त प्रसन्न हुए और उनकी स्तुति करने लगे ॥ ९ ॥
देवता बोले- जिस प्रकार मकड़ीकी नाभिसे तन्तु तथा अग्निसे चिनगारियाँ निकलती हैं, उसी प्रकार यह जगत् जिनसे प्रकट हुआ है, उन भगवतीको १० हम नमस्कार करते हैं ॥ १० ॥
जिनकी मायाशक्तिसे सम्पूर्ण चराचर जगत् पूर्णत: ओत - प्रोत है, उन चित्स्वरूपिणी करुणासिन्धु ११ भुवनेश्वरीका हम स्मरण करते हैं ॥११ ॥
जिन्हें न जाननेसे संसारमें बार - बार जन्म होता रहता है और जिनका ज्ञान हो जानेसे भव - बन्धनका नाश हो जाता है, उन ज्ञानस्वरूपिणी भगवतीका हम १२ । स्मरण करते हैं । हमें [ सन्मार्गपर चलनेके लिये ]