देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 501–510
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 501–510
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४ ९ २ महालक्ष्म्यै च विद्महे सर्वशक्त्यै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् मातर्नताः स्म भुवनार्तिहरे प्रसीद शन्नो विधेहि कुरु कार्यमिदं दयार्द्रे भारं हरस्व विनिहत्य सुरारिवर्गं मह्या महेश्वरि सतां कुरु शं भवानि यद्यम्बुजाक्षि दयसे न सुरान्कदाचित् किं ते क्षमा रणमुखेऽसिशरैः प्रहर्तुम् एतत्त्वयैव गदितं ननु यक्षरूपं धृत्वा तृणं दह हुताश पदाभिलाषैः कंसः कुजोऽथ यवनेन्द्रसुतश्च केशी बार्हद्रथो बकबकीखरशाल्वमुख्याः येऽन्ये तथा नृपतयो भुवि सन्ति तांस्त्वं हत्वा हरस्व जगतो भरमाशु मातः ॥ ये विष्णुना न निहताः किल शङ्करेण ये वा विगृह्य जलजाक्षि पुरन्दरेण । ते ते मुखं सुखकरं सुसमीक्षमाणाः संख्ये शरैर्विनिहता निजलीलया ते ॥ । शक्तिं विना हरिहरप्रमुखाः सुराश्च नैवेश्वरा विचलितुं तव देवदेवि । किं धारणाविरहितः प्रभुरप्यनन्तो धर्तुं धराञ्च रजनीशकलावतंसे ॥ इन्द्र उवाच वाचा विना विधिरलं भवतीह विश्वं कर्तुं हरिः किमु रमारहितोऽथ पातुम् । संहर्तुमीश उमयोज्झित ईश्वरः किं ते ताभिरेव सहिताः प्रभवः प्रजेशाः ॥ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १ ९ । प्रेरित करें । हम उन महालक्ष्मीको जानें । हम सर्वशक्तिमयी ॥ १३ भगवतीका ध्यान करते हैं । वे भगवती हमें [ सत्कर्ममें प्रवृत्त होनेकी ] प्रेरणा प्रदान करें ॥ १२-१३ ॥ संसारका कष्ट हरनेवाली हे माता! हम आपको । प्रणाम करते हैं, आप प्रसन्न होइये । हे दयासे आर्द्र हृदयवाली! हमारा कल्याण कीजिये हमारा यह कार्य सम्पन्न कर दीजिये । हे महेश्वरि! असुर समुदायका ॥ १४ संहार करके पृथ्वीका भार उतार दीजिये । हे भवानि! आप सज्जनोंका कल्याण करें ॥ १४ ॥
हे कमलनयने! यदि आप देवताओंपर दया । नहीं करेंगी तो वे समरांगणमें तलवारों तथा बाणोंसे [ दैत्योंपर ] प्रहार करनेमें समर्थ कैसे हो सकेंगे? ॥ १५ इस बातको आपने स्वयं [ यक्षोपाख्यान - प्रसंगमें ] यक्षरूप धारण करके ' हे हुताशन! आप इस तिनकेको जला दें ' इत्यादि पद- कथनोंके द्वारा व्यक्त कर दिया है ॥ १५ ॥
। हे माता! कंस, भौमासुर, कालयवन, केशी, बृहद्रथ - पुत्र जरासन्ध, बकासुर, पूतना, खर और १६ | शाल्व आदि तथा इनके अतिरिक्त और भी जो दुष्ट राजागण पृथ्वीपर हैं, उन्हें मारकर आप शीघ्र ही पृथ्वीका भार उतार दीजिये ॥ १६ ॥
हे कमलनयने! जिन दैत्योंको भगवान् विष्णु, शिव और इन्द्र भी [ कई बार ] युद्ध करके नहीं मार सके, वे दैत्य युद्धभूमिमें आपका सुखदायक १७ मुखमण्डल देखते हुए आपकी लीलासे आपके बाणोंके द्वारा मार डाले गये ॥१७ ॥
चन्द्रकलाको मस्तकपर धारण करनेवाली हे देवदेवि! विष्णु, शिव आदि प्रमुख देवता भी आपकी शक्तिके बिना हिलने - डुलनेतकमें समर्थ नहीं हैं । इसी १८ प्रकार क्या शेषनाग भी आपकी शक्तिके बिना पृथ्वीको धारण कर सकने में समर्थ हैं? ॥ १८ ॥
इन्द्र बोले – - [ हे माता! ] क्या सरस्वतीके बिना ब्रह्मा इस विश्वकी सृष्टि करनेमें, लक्ष्मीके बिना विष्णु पालन करनेमें और पार्वतीके बिना शिवजी संहार करनेमें समर्थ हो सकते हैं? वे महान् देवगण उन्हीं [ तीनों महाशक्तियों ] - के साथ अपना - अपना १ ९ । कार्य कर सकनेमें समर्थ होते हैं ॥१ ९ ॥
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अ ० १ ९ ] चतुर्थ विष्णुरुवाच कर्तुं प्रभुर्न द्रुहिणो न कदाचनाहं नापीश्वरस्तव कलारहितस्त्रिलोक्याः । कर्तुं प्रभुत्वमनघेऽत्र तथा विहर्तुं त्वं वै समस्तविभवेश्वरि भासि नूनम् ॥ २० व्यास उवाच
एवं स्तुता तदा देवी तानाह विबुधेश्वरान् ।
किं तत्कार्यं वदन्त्वद्य करोमि विगतज्वराः ॥ २१
असाध्यमपि लोकेऽस्मिंस्तत्करोमि सुरेप्सितम् ।
शंसन्तु भवतां दुःखं धरायाश्च सुरोत्तमाः ॥ २२
देवा ऊचुः
वसुधेयं भराक्रान्ता सम्प्राप्ता विबुधान्प्रति ।
रुदती वेपमाना च पीडिता दुष्टभूभुजैः ॥ २३
भारापहरणं चास्याः कर्तव्यं भुवनेश्वरि ।
देवानामीप्सितं कार्यमेतदेवाधुना शिवे ॥ २४
घातितस्तु पुरा मातस्त्वया महिषरूपभृत् ।
दानवोऽतिबलाक्रान्तस्तत्सहायाश्च कोटिशः ॥ २५
तथा शुम्भ निशुम्भश्च रक्तबीजस्तथापरः ।
चण्डमुण्डौ महावीर्यौ तथैव धूम्रलोचनः ॥ २६
दुर्मुखो दुःसहश्चैव करालश्चाति वीर्यवान् ।
अन्ये च बहवः क्रूरास्त्वयैव च निपातिताः ॥ २७
तथैव च सुरारींश्च जहि सर्वान्महीश्वरान् । ( भारं हर धरायाश्च दुर्धरं दुष्टभूभुजाम् । ) व्यास उवाच इत्युक्ता सा तदा देवी देवानाहाम्बिका शिवा ॥ २८ सम्प्रहस्यासितापाङ्गी मेघगम्भीरया गिरा श्रीदेव्युवाच मयेदं चिन्तितं पूर्वमंशावतरणं सुराः ॥ २ ९
भारावतरणं चैव यथा स्याद्दुष्टभूभुजाम् ।
मया सर्वे निहन्तव्या दैत्येशा ये महीभुजः ॥ ३०
स्कन्ध ४ ९ ३ विष्णु बोले - हे अनघे! आपकी कलासे रहित होकर न तो ब्रह्मा इस त्रिलोकीकी रचना कर सकनेमें, न तो मैं इसका पालन कर सकनेमें और न तो शिव इसका संहार कर सकनेमें समर्थ हैं । हे समस्त विभवोंकी स्वामिनि! इसका सृजन, पालन तथा संहार करनेमें समर्थ निश्चितरूपसे आप ही प्रतीत होती हैं ॥ २० ॥
व्यासजी बोले- इस जब देवीकी स्तुति की, तब कहा- वह कौन - सा कार्य है होकर बतायें, मैं अभी करूँगी द्वारा अभिलषित जो असाध्य करूँगी । हे श्रेष्ठ देवतागण! पृथ्वीका दुःख मुझे बताइये देवता बोले- दुष्ट प्रकार उन देवताओंने उन्होंने उन देवेश्वरोंसे ? आपलोग सन्तापरहित । इस संसारमें देवताओंके कार्य भी होगा, उसे मैं आपलोग अपना तथा ॥ २१-२२ ॥ राजाओंसे पीड़ित यह पृथ्वी उनके भारसे व्याकुल होकर रोती तथा थर - थर काँपती हुई हम देवताओंके पास आयी । हे भुवनेश्वरि! आप इसका भार उतार दें । हे शिवे! इस समय हम देवताओंका यही अभीष्ट कार्य है ॥ २३-२४ ॥ हे माता! पूर्वकालमें आप अत्यधिक बलसम्पन्न दानव महिषासुरका वध कर चुकी हैं । इसके अतिरिक्त आप उसके करोड़ों सहायकों, शुम्भ, निशुम्भ, रक्तबीज, महाबली चण्ड - मुण्ड, धूम्रलोचन, दुर्मुख, दु: सह, अतिशय बलवान् कराल तथा दूसरे भी अनेक क्रूर दानवोंको मार चुकी हैं । उसी प्रकार आप हम देवताओंके शत्रुरूप सभी दुष्ट: राजाओंका वध कीजिये । ( दुष्ट राजाओंका वध करके पृथ्वीका दुःसह भार उतार दीजिये ) ॥ २५ – २७३ ॥ व्यासजी बोले - – [ हे राजन्! ] देवताओंके ऐसा कहनेपर नीले नेत्रप्रान्तवाली कल्याणमयी भगवती हँसकर मेघके समान गम्भीर वाणीमें उनसे कहने लगीं - ॥ २८३ ॥
श्रीदेवी बोलीं- हे देवताओ! मैंने यह पहलेसे ही सोच रखा है कि मैं अंशावतार धारण करूँ, जिससे पृथ्वीपरसे दुष्ट राजाओंका भार उतर जाय । हे महाभाग देवताओ! मन्द तेजवाले जरासन्ध आदि | जो बड़े - बड़े दैत्य राजागण हैं, उन सबको मैं अपनी
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४ ९ ४ मागधाद्या महाभागाः स्वशक्त्या मन्दतेजसः भवद्भिरपि स्वैरंशैरवतीर्य धरातले मच्छक्तियुक्तैः कर्तव्यं भारावतरणं सुराः कश्यपो भार्यया सार्धं दिविजानां प्रजापतिः यादवानां कुले पूर्वं भवितानकदुन्दुभिः तथैव भृगुशापाद्वै भगवान्विष्णुरव्ययः अंशेन भविता तत्र वसुदेवसुतो हरिः तदाहं प्रभविष्यामि यशोदायां च गोकुले कार्यं सर्वं करिष्यामि सुराणां सुरसत्तमाः कारागारे गतं विष्णुं प्रापयिष्यामि गोकुले शेषं च देवकीगर्भात्प्रापयिष्यामि रोहिणीम् मच्छक्त्योपचितौ तौ च कर्तारौ दुष्टसंक्षयम् श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १ ९ । शक्तिसे मार डालूंगी । हे देवतागण! आपलोग भं ॥ ३१ अपने - अपने अंशोंसे पृथ्वीपर अवतार लेकर मेरी शक्तिसे युक्त होकर भार उतारें ॥ २ ९ - – ३१ ॥ । मेरे अवतार लेनेसे पूर्व देवताओंके प्रजापि || ३२ | कश्यप अपनी पत्नीके साथ यदुकुलमें वसुदेव नामसे अवतीर्ण होंगे । उसी प्रकार भृगुके शापसे अविनाशी । भगवान् विष्णु अपने अंशसे वहींपर वसुदेवके पुत्रके ॥ ३३ रूपमें उत्पन्न होंगे ॥ ३२-३३३ ॥ हे श्रेष्ठ देवताओ! उस समय मैं भी गोकुलमें । यशोदाके गर्भ से उत्पन्न होऊँगी और देवताओंका ॥ ३४ सारा कार्य सिद्ध करूँगी । कारागारमें अवतीर्ण हुए [ कृष्णरूपधारी ] विष्णुको मैं गोकुलमें पहुँचा दूँगी । और देवकीके गर्भसे शेषभगवान्को खींचकर रोहिणी के ॥ ३५ गर्भमें स्थापित कर दूँगी । मेरी शक्तिसे सम्पन्न होकर । वे दोनों ही दुष्टों का विनाश करेंगे । द्वापरके व्यतीत होते ही दुष्ट राजाओंका पूर्णरूपसे संहार बिलकुल ॥ ३६ निश्चित है ॥ ३४-३६३ ॥ दुष्टानां भूभुजां कामं द्वापरान्ते सुनिश्चितम् इन्द्रांशोऽप्यर्जुनः साक्षात्करिष्यति बलक्षयम् धर्मांशोऽपि महाराजो भविष्यति युधिष्ठिरः वाय्वंशो भीमसेनश्चाश्विन्यंशौ च यमावपि वसोरंशोऽथ गाङ्गेयः करिष्यति बलक्षयम् व्रजन्तु च भवन्तोऽद्य धरा भवतु सुस्थिरा भारावतरणं नूनं करिष्यामि सुरोत्तमाः कृत्वा निमित्तमात्रांस्तान्स्वशक्त्याहं न संशयः कुरुक्षेत्रे करिष्यामि क्षत्रियाणां च संक्षयम् । असूयेर्ष्या मतिस्तृष्णा ममताभिमता स्पृहा जिगीषा मदनो मोहो दोषैर्नक्ष्यन्ति यादवाः ब्राह्मणस्य च शापेन वंशनाशो भविष्यति भगवानपि शापेन त्यक्ष्यत्येतत्कलेवरम् । भवन्तोऽपि निजाङ्गैश्च सहायाः शार्ङ्गधन्वनः प्रभवन्तु सनारीका मथुरायां च गोकुले ॥ साक्षात् इन्द्रके अंशस्वरूप अर्जुन भी [ उन दुष्ट राजाओंके ] बलका नाश करेंगे । धर्मके अंशरूप ॥ ३७ महाराज युधिष्ठिर, वायुके अंशरूप भीमसेन तथा । दोनों अश्विनीकुमारोंके अंशरूप नकुल सहदेव भी ॥ ३८ उत्पन्न होंगे । [ उसी समय ] वसुके अंशसे अवतीर्ण गंगापुत्र भीष्म उन दुष्ट राजाओंकी शक्ति नष्ट । करेंगे ॥ ३७-३८३ ॥ ॥ ३ ९ हे श्रेष्ठ देवतागण! अब आपलोग जायँ और पृथ्वी भी निश्चिन्त होकर रहे । मैं उन अंशावतारी । लोगोंको निमित्तमात्र बनाकर अपनी शक्तिसे इस ॥ ४० पृथ्वीका भार दूर करूँगी, इसमें सन्देह नहीं है । मैं क्षत्रियोंका यह संहार कुरुक्षेत्रमें करूँगी ॥ ३ ९ -४०३ ॥ असूया, ईर्ष्या, बुद्धि, तृष्णा, ममता, अपनी प्रिय ॥ ४१ वस्तुकी इच्छा, स्पृहा, विजयकी अभिलाषा, काम और मोह – इन दोषोंके कारण सभी यादव नष्ट हो । जायँगे । ब्राह्मणके शापसे उनके वंशका नाश हो ॥ ४२ जायगा और उसी शापवश भगवान् श्रीकृष्ण भी अपने शरीरका त्याग कर देंगे । अब आपलोग भी अपनी शक्तिस्वरूपा भार्याओंसहित अपने - अपने अंशोंसे मथुरा ॥ ४३ । तथा गोकुलमें अवतरित हों और शार्ङ्गपाणि भगवान्
विष्णुके सहायक बनें ॥। ४१ - ४३३ ॥
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अ ० २० ] चतुर्थ स्कन्ध ४ ९ ५ व्यास उवाच इत्युक्त्वान्तर्दधे देवी योगमाया परात्मनः ॥ ४४
सधरा वै सुराः सर्वे जग्मुः स्वान्यालयानि च ।
धरापि सुस्थिरा जाता तस्या वाक्येन तोषिता ॥ ४५
ओषधीवीरुधोपेता बभूव जनमेजय ।
प्रजाश्च सुखिनो जाता द्विजाश्चापुर्महोदयम् ।
सन्तुष्टा मुनयः सर्वे बभूवुर्धर्मतत्पराः ॥ ४६
व्यासजी बोले- ऐसा कहकर परमात्माकी योगमाया भगवती अन्तर्धान हो गयीं । तदनन्तर पृथ्वीसहित सभी देवता अपने - अपने स्थानपर चले गये । पृथ्वी भी उन भगवतीकी वाणीसे सन्तुष्ट होकर शान्तचित्त हो गयी । हे जनमेजय! वह औषधियों और लताओंसे सम्पन्न हो गयी । प्रजाएँ सुखी हो गयीं, द्विजगणोंकी महान् उन्नति होने लगी और सभी मुनिगण सन्तुष्ट होकर धर्मपरायण हो गये ॥ ४४–४६ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे देवान् प्रति देवीवाक्यवर्णनं नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥ १ ९ ॥ अथ विंशोऽध्यायः व्यासजीद्वारा जनमेजयको भगवतीकी महिमा व्यास उवाच
शृणु भारत वक्ष्यामि भारावतरणं तथा ।
कुरुक्षेत्रे प्रभासे च क्षपितं योगमायया ॥ १
यदुवंशे समुत्पत्तिर्विष्णोरमिततेजसः ।
भृगुशापप्रतापेन महामायाबलेन च ॥ २
क्षितिभारसमुत्तारनिमित्तमिति मे मतिः ।
मायया विहितो योगो विष्णोर्जन्म धरातले ॥ ३
किं चित्रं नृप देवी सा ब्रह्मविष्णुसुरानपि ।
नर्तयत्यनिशं माया त्रिगुणानपरान्किमु ॥ ४
गर्भवासोद्भवं दुःखं विण्मूत्रस्नायुसंयुतम् ।
विष्णोरापादितं सम्यग्यया विगतलीलया ॥ ५
पुरा रामावतारेऽपि निर्जरा वानराः कृताः ।
विदितं ते यथा विष्णुर्दुः खपाशेन मोहितः ॥ ६
सुनाना तथा कृष्णावतारकी कथाका उपक्रम व्यासजी बोले - हे भारत! सुनिये, अब मैं आपको पृथ्वीका भार उतारने और कुरुक्षेत्र तथा प्रभासक्षेत्रमें योगमायाके द्वारा सेनाके संहारका वृत्तान्त बताऊँगा ॥ १ ॥
भृगुके शापके प्रताप तथा महामायाकी शक्तिसे ही अमित तेजस्वी भगवान् विष्णुका आविर्भाव यदुवंशमें हुआ था । मेरा यह मानना है कि पृथ्वीका भार उतारना तो निमित्तमात्र था, वस्तुतः योगमायाने ही इस संयोगका विधान कर दिया था कि धरातलपर भगवान् विष्णुका अवतार हो ॥ २-३ ॥ हे राजन्! इसमें आश्चर्य कैसा! वे भगवती योगमाया जब ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओंको भी निरन्तर नचाती रहती हैं, तब त्रिगुणात्मक सामान्यजनकी क्या बात! ॥ ४ ॥
उन भगवतीने अपनी रहस्यमयी लीलासे भगवान् विष्णुको भी सम्यक् रूपसे मल, मूत्र तथा स्नायुसे भरे गर्भवाससे होनेवाला दुःख भोगनेको विवश कर दिया था ॥ ५ ॥
पूर्वकालमें रामावतारके समय भी उन्हीं योगमायाने जिस प्रकार देवताओंको वानर बना दिया था और [ राम - रूप में अवतीर्ण ] भगवान् विष्णुको दुःखपाशसे व्यथित कर दिया था, वह तो आपको | विदित ही है ॥ ६ ॥
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४ ९ ६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २०
अहं ममेति पाशेन सुदृढेन नराधिप ।
योगिनो मुक्तसङ्गाश्च भुक्तिकामा मुमुक्षवः ॥
तामेव समुपासन्ते देवीं विश्वेश्वरीं शिवाम् ।
यद्भक्तिलेशलेशांशलेशलेशलवांशकम् ॥
लब्ध्वा मुक्तो भवेज्जन्तुस्तां न सेवेत को जनः ।
भुवनेशीत्येव वक्त्रे ददाति भुवनत्रयम् ॥
मां पाहीत्यस्य वचसो देयाभावादृणान्विता ।
विद्याविद्येति तस्याद्वे रूपे जानीहि पार्थिव ॥
विद्यया मुच्यते जन्तुर्बध्यते ऽविद्यया पुनः ।
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च सर्वे तस्या वशानुगाः ॥
अवताराः सर्व एव यन्त्रिता इव दामभिः ।
कदाचिच्च सुखं भुंक्ते वैकुण्ठे क्षीरसागरे ॥
कदाचित्कुरुते युद्धं दानवैर्बलवत्तरैः ।
हरिः कदाचिद्यज्ञान्वै विततान्प्रकरोति च ॥
कदाचिच्च तपस्तीव्रं तीर्थे चरति सुव्रत ।
कदाचिच्छयने शेते योगनिद्रामुपाश्रितः ॥
न स्वतन्त्रः कदाचिच्च भगवान्मधुसूदनः ।
तथा ब्रह्मा तथा रुद्रस्तथेन्द्रो वरुणो यमः ॥
कुबेरोऽग्नी रवीन्दू च तथान्ये सुरसत्तमाः ।
मुनयः सनकाद्याश्च वसिष्ठाद्यास्तथापरे ॥
सर्वेऽम्बावशगा नित्यं पाञ्चालीव नरस्य च ।
नसि प्रोता यथा गावो विचरन्ति वशानुगाः ॥
तथैव देवताः सर्वाः कालपाशनियन्त्रिताः ।
हर्षशोकादयो भावा निद्रातन्द्रालसादयः ॥
सर्वेषां सर्वदा राजन्देहिनां देहसंश्रिताः ।
अमरा निर्जराः प्रोक्ता देवाश्च ग्रन्थकारकैः ॥
हे महाराज! अहंता और ममताके इस सुदृढ़ ७ बन्धनसे सभी लोग आबद्ध हैं । अतः अनासक्त तथ मोक्षकी इच्छा रखनेवाले योगीजन और भोगकी कामना करनेवाले लोग भी उन्हीं कल्याणकारिणी ८ भगवती जगदम्बाकी उपासना करते हैं । जिन योगमायाकी भक्तिके लेशलेशांशके लेशलेशलवांशको प्राप्त करके प्राणी मुक्त हो जाता है, उनकी उपासना कौन व्यक्ति ९ नहीं करेगा? ' हे भुवनेशि! ' ऐसा उच्चारण करनेवालेको वे भगवती तीनों लोक प्रदान कर देती हैं और ' मेरी रक्षा कीजिये इस वाक्यके कहनेपर [ उसे पहले ही १० त्रिलोक दे देनेके कारण ] अब कुछ भी न दे पानेसे वे उस भक्तकी ऋणी हो जाती हैं । हे राजन्! आप उन भगवतीके विद्या तथा अविद्या- ये दो रूप ११ जानिये । विद्यासे प्राणी मुक्त होता है और अविद्यासे बन्धनमें पड़ता है ॥७- - १०३ ॥ ब्रह्मा, विष्णु और महेश – ये सब उनके अधीन १२ रहते हैं । भगवान् के सभी अवतार रस्सीसे बँधे हुएके समान भगवतीसे ही नियन्त्रित रहते हैं । भगवान् विष्णु १३ कभी वैकुण्ठमें और कभी क्षीरसागरमें आनन्द लेते हैं, कभी अत्यधिक बलशाली दानवोंके साथ युद्ध करते हैं, कभी बड़े - बड़े यज्ञ करते हैं, कभी तीर्थमें कठोर १४ तपस्या करते हैं और हे सुव्रत! कभी योगनिद्राके वशीभूत होकर शय्यापर सोते हैं । वे भगवान् मधुसूदन कभी भी स्वतन्त्र नहीं रहते ॥ ११ - १४३ ॥ १५ ऐसे ही ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र, वरुण, यम, कुबेर, अग्नि, सूर्य, चन्द्र, अन्य श्रेष्ठ देवतागण, सनक आदि मुनि और वसिष्ठ आदि महर्षि - ये सब - के-१६ सब बाजीगरके अधीन कठपुतलीकी भाँति सदा भगवतीके वशमें रहते हैं । जिस प्रकार नथे हुए बैल अपने स्वामीके अधीन रहकर विचरण करते हैं, १७ उसी प्रकार सभी देवता कालपाशमें आबद्ध रहते हैं ॥ १५–१७३ ॥ हे राजन्! हर्ष, शोक, निद्रा, तन्द्रा, आलस्य आदि १८ भाव सभी देहधारियोंके शरीरमें सदा विद्यमान रहते हैं । ग्रन्थकारोंने देवताओंको अमर ( मृत्युरहित ) तथा निर्जर ( बुढ़ापारहित ) कहा है, किंतु वे निश्चय ही केवल १ ९ नामसे अमर हैं, अर्थसे कभी भी वैसे नहीं हैं ।
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अ ० २० ]
अभिधानतश्चार्थतो न ते नूनं तादृशाः क्वचित् ।
उत्पत्तिस्थितिनाशाख्या भावा येषां निरन्तरम् ॥
अमरास्ते कथं वाच्या निर्जराश्च कथं पुनः ।
कथं दुःखाभिभूता वा जायन्ते विबुधोत्तमाः ॥
कथं देवाश्च वक्तव्या व्यसने क्रीडनं कथम् ।
क्षणादुत्पत्तिनाशश्च दृश्यतेऽस्मिन्न संशयः ॥
जलजानां च कीटानां मशकानां तथा पुनः ।
उपमा न कथं चैषामायुषो ऽन्ते मराः स्मृताः ॥
ततो वर्षायुषश्चापि शतवर्षायुषस्तथा ।
मनुष्या ह्यमरा देवास्तस्माद् ब्रह्मा परः स्मृतः ॥
रुद्रस्तथा तथा विष्णुः क्रमशश्च भवन्ति हि ।
नश्यन्ति क्रमशश्चैव वर्धन्ति चोत्तरोत्तरम् ॥
नूनं देहवतो नाशो मृतस्योत्पत्तिरेव च ।
चक्रवद् भ्रमणं राजन् सर्वेषां नात्र संशयः ॥
मोहजालावृतो जन्तुर्मुच्यते न कदाचन ।
मायायां विद्यमानायां मोहजालं न नश्यति ॥
उत्पित्सुकाल उत्पत्तिः सर्वेषां नृप जायते ।
तथैव नाशः कल्पान्ते ब्रह्मादीनां यथाक्रमम् ॥
निमित्तं यस्तु यन्नाशे स घातयति तं नृप ।
नान्यथा तद्भवेन्नूनं विधिना निर्मितं तु यत् ॥
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखं वा सुखमेव वा ।
तत्तथैव भवेत्कामं नान्यथेह विनिर्णयः ॥
चतुर्थ स्कन्ध ४ ९ ७ जिनमें सदा उत्पत्ति, स्थिति और विनाश नामक २० अवस्थाएँ रहती हैं, वे अमर और निर्जर कैसे कहे जा सकते हैं? वे देवता विबुध ( विशेष बुद्धिवाले ) होते हुए भी दुःखोंसे पीड़ित क्यों होते हैं? जब वे भी [ सामान्य लोगोंकी भाँति ] व्यसन तथा क्रीडामें २१ आसक्त रहते हैं, तब उन्हें देव क्यों कहा जाय? इसमें कोई सन्देह नहीं कि सामान्य जीवोंकी भाँति इनकी भी क्षणमें उत्पत्ति होती है और क्षणमें नाश २२ होता है । [ ऐसी स्थितिमें ] इनकी उपमा जलमें उत्पन्न होनेवाले कीटों और मच्छरोंसे क्यों न दी जाय? और जब आयुके समाप्त होनेपर वे भी मर जाते हैं, तब उन्हें [ अमर न कहकर ] ' मर ' क्यों न २३ कहा जाय? ॥ १८-२३ ॥ कुछ मनुष्य एक वर्षकी आयुवाले और कुछ सौ वर्षकी आयुवाले होते हैं, उनसे अधिक आयुवाले २४ | देवता होते हैं और उनसे भी अधिक आयुवाले ब्रह्मा कहे गये हैं । ब्रह्मासे अधिक आयुवाले शिव हैं और उनसे भी अधिक आयुवाले विष्णु हैं । अन्तमें वे भी नष्ट होते हैं और इसके बाद वे फिरसे क्रमशः उत्पन्न २५ होते हैं और उत्तरोत्तर बढ़ते हैं ॥ २४-२५ ॥ हे राजन्! निश्चितरूपसे सभी देहधारियोंकी मृत्यु होती है और मरे हुए प्राणीका जन्म होता है । इस प्रकार २६ पहियेकी भाँति सभी प्राणियोंका [ जन्म - मृत्युका ] चक्कर लगा रहता है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ २६ ॥
मोहके जालमें फँसा हुआ प्राणी कभी मुक्त नहीं होता; क्योंकि मायाके रहते मोहका बन्धन नष्ट २७ नहीं होता है ॥२७ ॥
हे राजन्! सृष्टिके समय ब्रह्मा आदि सभी देवताओं की उत्पत्ति होती है और कल्पके अन्तमें २८ क्रमशः उनका नाश भी हो जाता है ॥२८ ॥
हे नृप! जिसके नाशमें जो निमित्त बन चुका है, उसीके द्वारा उसकी मृत्यु होती है । विधाताने जो रच दिया है, वह अवश्य होता है; इसके विपरीत कुछ २ ९ नहीं होता ॥ २ ९ ॥ जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा, रोग, दुःख अथवा सुख-जो सुनिश्चित है, वह उसी रूपमें अवश्य प्राप्त होता ३० है; इसके विपरीत दूसरा सिद्धान्त है ही नहीं ॥ ३० ॥
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४ ९ ८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २०
सर्वेषां सुखदौ देवौ प्रत्यक्षौ शशिभास्करौ ।
न नश्यति तयोः पीडा क्वचित्तद्वैरिसम्भवा ॥
भास्करस्य सुतो मन्दः क्षयी चन्द्रः कलङ्कवान् ।
पश्य राजन् विधेः सूत्रं दुर्वारं महतामपि ॥
वेदकर्ता जगत्स्रष्टा बुद्धिदस्तु चतुर्मुखः ।
सोऽपि विक्लवतां प्राप्तो दृष्ट्वा पुत्रीं सरस्वतीम् ॥
शिवस्यापि मृता भार्या सती दग्ध्वा कलेवरम् ।
सोऽभवद्दुःखसन्तप्तः कामार्तश्च जनार्तिहा ॥
कामाग्निदग्धदेहस्तु कालिन्द्यां पतितः शिवः ।
सापि श्यामजला जाता तन्निदाघवशान्नृप ॥
कामार्तो रममाणस्तु नग्नः सोऽपि भृगोर्वनम् ।
गतः प्राप्तोऽथ भृगुणा शप्तः कामातुरो भृशम् ॥
पतत्वद्यैव ते लिङ्गं निर्लज्जेति भृशं किल ।
पपौ चामृतवापीञ्च दानवैर्निर्मितां मुदे ॥
इन्द्रोऽपि च वृषो भूत्वा वाहनत्वं गतः क्षितौ ।
आद्यस्य सर्वलोकस्य विष्णोरेव विवेकिनः ॥
सर्वज्ञत्वं गतं कुत्र प्रभुशक्तिः कुतो गता ।
यद्धेममृगविज्ञानं न ज्ञातं हरिणा किल ॥
राजन् मायाबलं पश्य रामो हि काममोहितः ।
रामो विरहसन्तप्तो रुरोद भृशमातुरः ॥
योऽपृच्छत्पादपान्मूढः क्व गता जनकात्मजा ।
भक्षिता वा हृता केन रुदन्नुच्चतरं ततः ॥
प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाले सूर्य तथा चन्द्रदे ३१ सबको सुख प्रदान करते हैं, किंतु उनके शत्रु [ राहु ] -के द्वारा उन्हें होनेवाली पीड़ा दूर नहीं होती । सूर्यपुत्र शनैश्चर ' मन्द ' और चन्द्रमा ' क्षयरोगी तथा कलंकी ' ३२ कहे जाते हैं । हे राजन्! देखिये, बड़े - बड़े देवताओंके भी विषयमें विधिका विधान अटल है ॥ ३१–३२ ब्रह्माजी वेदकर्ता, जगत् की सृष्टि करनेवाले तथ सबको बुद्धि देनेवाले हैं, किंतु वे भी सरस्वतीको ३३ देखकर विकल हो गये ॥ ३३ ॥
जब शिवजीकी भार्या सती अपने शरीरको दग्ध करके मर गयी, तब लोगोंका दुःख दूर ३४ करनेवाले होते हुए भी वे शिवजी शोकसन्तप्त तथा पीड़ित हो गये । उस समय कामाग्निसे जलते हुए देहवाले शिवजी यमुनानदीमें कूद पड़े । तब हे ३५ राजन्! उनके तापके कारण यमुनाजीका जल श्यामवर्णका हो गया॥३४-३५ ॥ भृगुके वनमें जाकर जब वे शिवजी दिगम्बर होकर विहार करने लगे, तब भृगुमुनिने अतीव ३६ आतुर उन शिवजीको यह शाप दे दिया - हे निर्लज्ज! तुम्हारा लिंग अभी कटकर गिर जाय । तब शान्ति लिये शिवजीने दानवोंके द्वारा निर्मित बावलीका ३७ अमृत पिया॥३६-३७ ॥ बैल बनकर इन्द्रको भी धरातलपर [ सूर्यवंशी राजा ककुत्स्थका ] वाहन बनना पड़ा । समस्त ३८ लोकके आदिपुरुष और महान् विवेकशील भगवान् विष्णुकी सर्वज्ञता तथा प्रभुशक्ति उस समय कहाँ चली गयी थी, जब [ रामावतारमें ] वे स्वर्णमृग-सम्बन्धी उस विशेष रहस्यको बिलकुल नहीं जान ३ ९ | सके!॥ ३८-३९ ॥ हे राजन्! मायाका बल तो देखिये कि भगवान् श्रीराम भी कामसे व्याकुल हुए । उन श्रीरामने सीताके वियोगसे संतप्त तथा व्याकुल होकर बहुत विलाप ४० किया था । वे विह्वल होकर जोर - जोर से रोते हुए वृक्षोंसे पूछते - फिरते थे कि सीता कहाँ चली गयी? उसे कोई [ हिंसक जन्तु ] खा गया या किसीने हर ४१ लिया? ॥ ४०-४१ ॥
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अ ० २० ]
लक्ष्मणाहं मरिष्यामि कान्ताविरहदुःखितः ।
त्वं चापि मम दुःखेन मरिष्यसि वनेऽनुज ॥
आवयोर्मरणं ज्ञात्वा माता मम मरिष्यति ।
शत्रुघ्नोऽप्यतिदुःखार्तः कथं जीवितुमर्हति ॥
सुमित्रा जीवितं जह्यात्पुत्रव्यसनकर्शिता ।
पूर्णकामाथ कैकेयी भवेत्पुत्रसमन्विता ॥
हा सीते क्व गतासि त्वं मां विहाय स्मरातुरा ।
एह्येहि मृगशावाक्षि मां जीवय कृशोदरि ॥
किं करोमि क्व गच्छामि त्वदधीनञ्च जीवितम् ।
समाश्वासय दीनं मां प्रियं जनकनन्दिनि ॥
एवं विलपता तेन रामेणामिततेजसा ।
वने वने च भ्रमता नेक्षिता जनकात्मजा ॥
शरण्यः सर्वलोकानां रामः कमललोचनः ।
शरणं वानराणां स गतो मायाविमोहितः ॥
सहायान्वानरान्कृत्वा बबन्ध वरुणालयम् ।
जघान रावणं वीरं कुम्भकर्णं महोदरम् ॥
आनीय च ततः सीतां रामो दिव्यमकारयत् ।
सर्वज्ञोऽपि हृतां मत्वा रावणेन दुरात्मना ॥
किं ब्रवीमि महाराज योगमायाबलं महत् ।
यया विश्वमिदं सर्वं भ्रामितं भ्रमते किल ॥
एवं नानावतारेऽत्र विष्णुः शापवशं गतः ।
करोति विविधाश्चेष्टा दैवाधीनः सदैव हि ॥
तवाहं कथयिष्यामि कृष्णस्यापि विचेष्टितम् ।
प्रभवं मानुषे लोके देवकार्यार्थसिद्धये ॥
चतुर्थ स्कन्ध ४ ९९ हे लक्ष्मण! मैं तो अपनी भार्याके वियोगसे ४२ दुःखित होकर मर जाऊँगा और हे अनुज! मेरे दुःखसे तुम भी इस वनमें मर जाओगे । इस प्रकार हम दोनोंकी मृत्यु जान करके मेरी माता कौसल्या मर ४३ जायँगी । शत्रुघ्न भी इस महान् दुःखसे पीड़ित होकर कैसे जीवित रह पायेगा? तब पुत्रमरणसे व्यथित होकर माता सुमित्रा भी अपने प्राण त्याग देंगी, किंतु ४४ अपने पुत्र भरतके साथ कैकेयीकी कामना अवश्य पूर्ण हो जायगी ॥ ४२–४४ ॥ ४५ गयी मुझे करूँ है । ४६ करो हा सीते! मुझे पीड़ित छोड़कर तुम कहाँ चली हो? हे मृगलोचने! आओ, आओ । हे कृशोदरि! जीवन प्रदान करो । हे जनकनन्दिनि! मैं क्या और कहाँ जाऊँ? मेरा जीवन तो तुम्हारे अधीन अपने प्रिय मुझ दुःखितको सान्त्वना प्रदान ॥ ४५-४६ ॥ इस प्रकार विलाप करते हुए तथा वन - वन भटक हु वे अमित तेजस्वी राम जनकपुत्री सीताको ४७ नहीं खोज पाये । तत्पश्चात् समस्त लोकोंको शरण देनेवाले वे कमलनयन श्रीराम मायासे मोहित होकर वानरोंकी शरण में गये । उन वानरोंको सहायक बनाकर ४८ उन्होंने समुद्रपर सेतु बाँधा और पराक्रमी रावण, कुम्भकर्ण तथा महोदरका संहार किया ॥ ४७–४९ ॥ तदनन्तर दुष्टात्मा रावणके द्वारा सीताको हरी ४ ९ गयी समझकर सर्वज्ञ होते हुए भी श्रीरामने उन्हें लाकर उनकी अग्निपरीक्षा करायी ॥ ५० ॥
हे महाराज! योगमायाकी महिमा बहुत बड़ी है । ५० मैं उन योगमायाके विषयमें क्या कहूँ, जिनके द्वारा नचाया हुआ यह सम्पूर्ण विश्व निरन्तर चक्कर काट रहा है ॥५१ ॥
५१ इस प्रकार शापके वशीभूत होकर भगवान् विष्णु इस लोक [ धारण किये गये ] अनेक अवतारोंमें दैवके अधीन होकर नाना प्रकारकी लीलाएँ ५२ करते हैं ॥ ५२ ॥
अब मैं आपसे देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये मनुष्य - लोकमें भगवान् श्रीकृष्णके अवतार ५३ । तथा उनकी लीलाका वर्णन करूँगा ॥५३ ॥
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५०० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २०
कालिन्दीपुलिने रम्ये ह्यासीन्मधुवनं पुरा ।
लवणो मधुपुत्रस्तु तत्रासीद्दानवो बली ॥
द्विजानां दुःखदः पापो वरदानेन गर्वितः ।
निहतोऽसौ महाभाग लक्ष्मणस्यानुजेन वै ॥
शत्रुघ्नेनाथ संग्रामे तं निहत्य मदोत्कटम् ।
वासिता मथुरा नाम पुरी परमशोभना ॥
स तत्र पुष्कराक्षौ द्वौ पुत्रौ शत्रुनिषूदनः ।
निवेश्य राज्ये मतिमान्काले प्राप्ते दिवं गतः ॥
सूर्यवंशक्षये तां तु यादवाः प्रतिपेदिरे ।
मथुरां मुक्तिदां राजन् ययातितनयः पुरा ॥
शूरसेनाभिधः शूरस्तत्राभून्मेदिनीपतिः ।
माथुराञ्छूरसेनांश्च बुभुजे विषयान्नृप ॥
तत्रोत्पन्नः कश्यपांशः शापाच्च वरुणस्य वै ।
वसुदेवोऽतिविख्यातः शूरसेनसुतस्तदा ॥
वैश्यवृत्तिरतः सोऽभून्मृते पितरि माधवः ।
उग्रसेनो बभूवाथ कंसस्तस्यात्मजो महान् ॥
अदितिर्देवकी जाता देवकस्य सुता तदा ।
शापाद्वै वरुणस्याथ कश्यपानुगता किल ॥
दत्ता सा वसुदेवाय देवकेन महात्मना ।
विवाहे रचिते तत्र वागभूद् गगने तदा ॥
कंस कंस महाभाग देवकीगर्भसम्भवः ।
अष्टमस्तु सुतः श्रीमांस्तव हन्ता भविष्यति ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं कंसो विस्मितोऽभून्महाबलः ।
देववाचं तु तां मत्वा सत्यां चिन्तामवाप सः ॥
किं करोमीति सञ्चिन्त्य विमर्शमकरोत्तदा ।
निहत्यैनां न मे मृत्युर्भवेदद्यैव सत्वरम् ॥
प्राचीन समयकी बात है - यमुनाके मनोहर ५४ तटपर मधुवन नामक एक वन था । वहाँ लवणासुर नामवाला एक बलवान् दानव रहता था, जो मधुका पुत्र था ॥ ५४ ॥
५५ वरप्राप्तिके कारण अभिमानमें चूर वह पापी दैत्य ब्राह्मणोंको दुःख देता था । हे महाभाग! लक्ष्मणके छोटे भाई शत्रुघ्नने संग्राममें उसका वध कर दिया । ५६ उस मदोन्मत्तको मारकर उन्होंने मथुरा नामक परम
सुन्दर नगरी बसायी ॥। ५५-५६ ॥
कमलके समान नेत्रोंवाले अपने दो पुत्रोंको ५७ राज्यकार्य में नियुक्त करके वे बुद्धिमान् शत्रुघ्न समय आ जानेपर स्वर्ग चले गये ॥ ५७ ॥
सूर्यवंशके नष्ट हो जानेपर उस मुक्तिदायिनी ५८ मथुराको यादवोंने अधिकारमें कर लिया । हे राजन्! पूर्वकालमें राजा ययातिका शूरसेन नामक एक पराक्रमी पुत्र था, जो वहाँका राजा हुआ । हे राजन्! उसने ५ ९ मथुरा और शूरसेन दोनों ही राज्योंके विषयोंका भोग किया ॥ ५८-५९ ॥ वहाँपर वरुणदेवके शापवश महर्षि कश्यपके ६० अंशस्वरूप परम यशस्वी वसुदेवजी शूरसेनके पुत्र होकर उत्पन्न हुए । पिताके मर जानेपर वे वसुदेवजी वैश्यवृत्तिमें संलग्न होकर जीवन - यापन करने लगे । ६१ उस समय वहाँके राजा उग्रसेन थे और उनका कंस नामक एक प्रतापी पुत्र था ॥ ६०-६१ ॥ ६२ वरुणदेवके ही शापके कारण कश्यपकी अनुगामिनी अदिति भी राजा देवककी पुत्री देवकीके रूपमें उत्पन्न हुईं । महात्मा देवकने उस देवकीको वसुदेवको ६३ सौंप दिया । विवाह सम्पन्न हो जानेके पश्चात् वहाँ आकाशवाणी हुई- हे महाभाग कंस! इस देवकीके गर्भसे उत्पन्न होनेवाला आठवाँ ऐश्वर्यशाली पुत्र ६४ तुम्हारा संहारक होगा ॥६२–६४ ॥ उस आकाशवाणीको सुनकर महाबली कंस आश्चर्यचकित हो गया । उस आकाशवाणीको सत्य ६५ मानकर वह चिन्तामें पड़ गया । ' अब मैं क्या करूँ ' ऐसा भलीभाँति सोच - विचारकर उसने यह निश्चय किया कि यदि मैं देवकीको इसी समय शीघ्र मार डालूँ ६६ तो मेरी मृत्यु नहीं होगी । मृत्युका भय उत्पन्न करनेवाले
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अ ० २० ]
उपायो नान्यथा चास्मिन्कार्ये मृत्युभयावहे ।
इयं पितृष्वसा पूज्या कथं हन्मीत्यचिन्तयत् ॥
पुनर्विचारयामास मरणं मेऽस्त्यहो स्वसा ।
पापेनापि प्रकर्तव्या देहरक्षा विपश्चिता ॥
प्रायश्चित्तेन पापस्य शुद्धिर्भवति सर्वदा ।
प्राणरक्षा प्रकर्तव्या बुधैरप्येनसा तथा ॥
विचिन्त्य मनसा कंसः खड्गमादाय सत्वरः ।
जग्राह तां वरारोहां केशेष्वाकृष्य पापकृत् ॥
कोशात्खड्गमुपाकृष्य हन्तुकामो दुराशयः ।
पश्यतां सर्वलोकानां नवोढां तां चकर्ष ह ॥
हन्यमानाञ्च तां दृष्ट्वा हाहाकारो महानभूत् ।
वसुदेवानुगा वीरा युद्धायोद्यतकार्मुकाः ॥
मुञ्च मुञ्चेति प्रोचुस्तं ते तदाद्भुतसाहसाः ।
कृपया मोचयामासुर्देवकीं देवमातरम् ॥
तद्युद्धमभवद् घोरं वीराणाञ्च परस्परम् ।
वसुदेवसहायानां कंसेन च महात्मना ॥
वर्तमाने तथा युद्धे दारुणे लोमहर्षणे ।
कंसं निवारयामासुर्वृद्धा ये यदुसत्तमाः ॥
पितृष्वसेयं ते वीर पूजनीया च बालिशा ।
न हन्तव्या त्वया वीर विवाहोत्सवसङ्गमे ॥
स्त्रीहत्या दुःसहा वीर कीर्तिघ्नी पापकृत्तमा ।
भूतभाषितमात्रेण न कर्तव्या विजानता ॥
अन्तर्हितेन केनापि शत्रुणा तव चास्य वा ।
उदितेति कुतो न स्याद्वागनर्थकरी विभो ॥
यशसस्ते विघाताय वसुदेवगृहस्य च ।
अरिणा रचिता वाणी गुणमायाविदा नृप ॥
चतुर्थ स्कन्ध ५०१ इस विषम अवसरपर दूसरा कोई उपाय नहीं है, किंतु ६७ यह मेरी पूज्य चचेरी बहन है । अतः इसकी हत्या कैसे करूँ, वह ऐसा सोचने लगा ॥ ६५-६७ ॥ उसने पुनः सोचा - अरे! यही बहन तो मेरी ६८ मृत्युस्वरूपा है । बुद्धिमान् मनुष्यको पापकर्मसे भी अपने शरीरकी रक्षा कर लेनी चाहिये | बादमें प्रायश्चित्त कर लेनेसे उस पापकी शुद्धि हो जाती है । अतः ६ ९ चतुर लोगोंको चाहिये कि पापकर्मसे भी अपने प्राणकी रक्षा कर लें ॥६८-६९ ॥ मनमें ऐसा सोचकर पापी कंसने बाल ७० खींचकर उस सुन्दरी देवकीको तुरंत पकड़ लिया । तत्पश्चात् म्यानसे तलवार निकालकर उसे मारनेकी इच्छासे बुरे विचारोंवाला कंस सभी लोगोंके ७१ सामने ही उस नवविवाहिता देवकीको अपनी ओर खींचने लगा ॥ ७०-७१ ॥ उसे मारी जाती देखकर लोगोंमें महान् हाहाकार ७२ मच गया । वसुदेवजीके वीर साथीगण धनुष लेकर युद्धके लिये तैयार हो गये । अद्भुत साहसवाले वे सब कंससे कहने लगे- कृपा करके इसे छोड़ दो, ७३ छोड़ दो । वे देवमाता देवकीको कंससे छुड़ाने लगे ॥ ७२-७३ ॥ तब शक्तिशाली कंसके साथ वसुदेवजीके पराक्रमी ७४ सहायकोंका घोर युद्ध होने लगा । उस भीषण लोमहर्षक युद्धके निरन्तर होते रहनेपर जो श्रेष्ठ तथा वृद्ध यदुगण थे, उन्होंने कंसको युद्ध करनेसे रोक दिया ॥ ७४-७५ ॥ ७५ [ उन्होंने कंससे कहा— ] हे वीर! यह तुम्हारी पूजनीय चचेरी बहन है । इस विवाहोत्सवके शुभ अवसरपर ७६ तुम्हें इस अबोध देवकीकी हत्या नहीं करनी चाहिये । हे वीर! स्त्रीहत्या दु: सह कार्य है; यह यशका नाश करनेवाली है और इससे घोर पाप लगता है । केवल ७७ | आकाशवाणी सुनकर तुम - जैसे बुद्धिमान्को बिना सोचे-समझे यह हत्या नहीं करनी चाहिये ॥ ७६-७७ ॥ हे विभो! हो - न- हो तुम्हारे या इन वसुदेवके ७८ किसी गुप्त शत्रुने यह अनर्थकारी वाणी बोल दी हो । हे राजन्! तुम्हारा यश और वसुदेवका गार्हस्थ्य नष्ट करनेके लिये किसी मायावी शत्रुने यह कृत्रिम वाणी ७ ९ | घोषित कर दी हो॥७८-७९ ॥