देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 511–520

देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 511–520

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५०२ बिभेषि वीरस्त्वं भूत्वा भूतभाषितभाषया यशोमूलविघातार्थमुपायस्त्वरिणा कृतः पितृष्वसा न हन्तव्या विवाहसमये पुनः भवितव्यं महाराज भवेच्च कथमन्यथा एवं तैर्बोध्यमानोऽसौ निवृत्तो नाभवद्यदा तदा तं वसुदेवोऽपि नीतिज्ञः प्रत्यभाषत कंस सत्यं ब्रवीम्यद्य सत्याधारं जगत्त्रयम् । दास्यामि देवकीपुत्रानुत्पन्नांस्तव सर्वशः जातं जातं सुतं तुभ्यं न दास्यामि यदि प्रभो कुम्भीपाके तदा घोरे पतन्तु मम पूर्वजाः श्रुत्वा वचनं सत्यं पौरवा ये पुरः स्थिताः ऊचुस्ते त्वरिताः कंसं साधु साधु पुनः पुनः न मिथ्या भाषते क्वापि वसुदेवो महामनाः । केशं मुञ्च महाभाग स्त्रीहत्या पातकं तथा व्यास उवाच एवं प्रबोधितः कंसो यदुवृद्धैर्महात्मभिः । क्रोधं त्यक्त्वा स्थितस्तत्र सत्यवाक्यानुमोदितः ततो दुन्दुभयो नेदुर्वादित्राणि च सस्वनुः । जयशब्दस्तु सर्वेषामुत्पन्नस्तत्र संसदि प्रसाद्य कंसं प्रतिमोच्य देवकीं महायशाः शूरसुतस्तदानीम् । जगाम गेहं स्वजनानुवृत्तो नवोढया वीतभयस्तरस्वी ॥ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २० । तुम वीर होकर भी आकाशवाणीसे डर रहे हो ॥ ८० । तुम्हारे यशरूपी वृक्षको उखाड़ फेंकनेके लिये तुम्हां किसी शत्रुने ही यह चाल चली है ॥ ८० ॥

। जो कुछ भी हो, विवाहके इस अवसरपर तुम्हें ॥ ८१ बहनकी हत्या तो करनी ही नहीं चाहिये । हे महाराज! होनहार तो होगी ही, उसे कोई कैसे टाल । सकता है? ॥ ८१ ॥

॥ ८२ इस प्रकार उन वृद्ध यादवोंके समझानेपर भं जब वह कंस पापकर्मसे विरत नहीं हुआ, तब नीतिज्ञ वसुदेवजीने उससे कहा - हे कंस! तीनों ॥ ८३ लोक सत्यपर टिके हुए हैं, अतः मैं इस समय तुमसे सत्य बोल रहा हूँ । उत्पन्न होते ही देवकीके सभी । पुत्रोंको लाकर मैं आपको दे दूँगा । हे विभो! यदि ॥ ८४ क्रमसे उत्पन्न होते हुए ही प्रत्येक पुत्र आपको न दे दूँ तो मेरे पूर्वज भयंकर कुम्भीपाक नरकमें गिर । पड़ें ॥ ८२–८४ ॥ ॥ ८५ वसुदेवजीका यह सत्य वचन सुनकर वहाँ जो नागरिक सामने खड़े थे, वे कंससे तुरंत बोल उठे - ' बहुत ठीक, बहुत ठीक । महात्मा वसुदेव ॥ ८६ कभी भी झूठ नहीं बोलते । हे महाभाग! अब इस देवकीके केश छोड़ दीजिये; क्योंकि स्त्रीहत्या पाप है ' ॥ ८५-८६ ॥ व्यासजी बोले – उन महात्मा वृद्ध यादवोंके ॥ ८७ इस प्रकार समझानेपर कंसने क्रोध त्यागकर वसुदेवजीके सत्य वचनपर विश्वास कर लिया ॥ ८७ ॥

तब दुन्दुभियाँ तथा अन्य बाजे ऊँचे स्वरमें ॥ ८८ । बजने लगे और उस सभामें उपस्थित सभी लोगोंके मुखसे जय - जयकारकी ध्वनि होने लगी ॥ ८८ ॥

इस प्रकार उस समय महायशस्वी वसुदेवजी कंसको प्रसन्न करके उससे देवकीको छुड़ाकर उम् नवविवाहिता के साथ अपने इष्टजनोंसहित निर्भय ८ ९ । होकर शीघ्रतापूर्वक घर चले गये ॥८ ९ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे कृष्णावतारकथोपक्रमवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥

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अ ० २१ ] चतुर्थ स्कन्ध ५०३ अथैकविंशोऽध्यायः देवकीके प्रथम पुत्रका जन्म, वसुदेवद्वारा प्रतिज्ञानुसार उसे कंसको अर्पित करना और कंसद्वारा उस नवजात शिशुका वध व्यास उवाच अथ काले तु सम्प्राप्ते देवकी देवरूपिणी । गर्भं दधार दधार विधिवद्वसुदेवेन सङ्गता ॥

पूर्णेऽथ दशमे मासे सुषुवे सुतमुत्तमम् ।

रूपावयवसम्पन्नं देवकी प्रथमं यदा ॥

तदाह वसुदेवस्तां सत्यवाक्यानुमोदितः ।

भावित्वाच्च महाभागो देवकीं देवमातरम् ॥

वरोरु समयं मे त्वं जानासि स्वसुतार्पणे ।

मोचिता त्वं महाभागे शपथेन मया तदा ॥

इमं पुत्रं सुकेशान्ते दास्यामि भ्रातृसूनवे । ( खले कंसे विनाशार्थं दैवे किं वा करिष्यसि । ) विचित्रकर्मणां पाको दुर्ज्ञेयो ह्यकृतात्मभिः ॥

सर्वेषां किल जीवानां कालपाशानुवर्तिनाम् ।

भोक्तव्यं स्वकृतं कर्म शुभं वा यदि वाशुभम् ॥

प्रारब्धं सर्वथैवात्र जीवस्य विधिनिर्मितम् । देवक्युवाच स्वामिन् पूर्वं कृतं कर्म भोक्तव्यं सर्वथा नृभिः ॥

तीर्थैस्तपोभिर्दानैर्वा किं न याति क्षयं हि तत् ।

लिखितो धर्मशास्त्रेषु प्रायश्चित्तविधिर्नृप ॥

पूर्वार्जितानां पापानां विनाशाय महात्मभिः । ब्रह्महा हेमहारी च सुरापो गुरुतल्पगः

द्वादशाब्दव्रते चीर्णे शुद्धिं याति यतस्ततः ।

मन्वादिभिर्यथोद्दिष्टं प्रायश्चित्तं विधानतः ॥

व्यासजी बोले- हे राजन्! इसके बाद समय आनेपर देवस्वरूपिणी देवकीने वसुदेवके संयोगसे १ विधिवत् गर्भ धारण किया ॥१ ॥

दसवाँ माह पूर्ण होनेपर जब देवकीने अत्यन्त रूपसम्पन्न तथा सुडौल अंगोंवाले अत्युत्तम प्रथम २ पुत्रको जन्म दिया तब सत्यप्रतिज्ञासे बँधे हुए महाभाग वसुदेवने होनहारसे विवश होकर देवमाता देवकीसे कहा- ॥ २-३ ॥ ३ हे सुन्दरि! अपने सभी पुत्र कंसको अर्पित कर देनेकी मेरी प्रतिज्ञाको तुम भलीभाँति जानती हो । हे महाभागे! उस समय इसी प्रतिज्ञाके द्वारा मैंने तुम्हें ४ कंससे मुक्त कराया था । अतएव हे सुन्दर केशोंवाली! मैं यह पुत्र तुम्हारे चचेरे भाई कंसको अर्पित कर दे रहा हूँ । ( जब दुष्ट कंस अथवा प्रारब्ध विनाशके लिये उद्यत ही है तो तुम कर ही क्या सकोगी? ) अद्भुत कर्मोंका परिणाम आत्मज्ञानसे रहित प्राणियों के ५ लिये दुर्ज्ञेय होता है । कालके पाशमें बँधे हुए समस्त जीवोंको अपने द्वारा किये गये शुभ अथवा अशुभ कर्मोंका फल निश्चितरूपसे भोगना ही पड़ता है । ६ प्रत्येक जीवका प्रारब्ध निश्चित रूपसे विधिके द्वारा ही निर्मित है॥४–६३ ॥ देवकी बोली - हे स्वामिन्! मनुष्योंको अपने पूर्वजन्ममें किये गये कर्मोंका फल अवश्य भोगना ७ पड़ता है; किंतु क्या तीर्थाटन, तपश्चरण एवं दानादिसे वह कर्म - फल नष्ट नहीं हो सकता है? हे महाराज! पूर्व अर्जित पापोंके विनाशके लिये महात्माओंने ८ धर्मशास्त्रोंमें तो नानाविध प्रायश्चित्तके विधानका उल्लेख किया है ॥ ७-८ - ८ ३ 11 ब्रह्महत्या करनेवाला, स्वर्णका हरण करनेवाला, ॥ ९ सुरापान करनेवाला तथा गुरुपत्नीके साथ व्यभिचार करनेवाला महापापी भी बारह वर्षोंतक व्रतका अनुष्ठान कर लेनेपर शुद्ध हो जाता है । हे अनघ! उसी प्रकार १० | मनु आदिके द्वारा उपदिष्ट प्रायश्चित्तका विधानपूर्वक

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५०४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २१

तथा कृत्वा नरः पापान्मुच्यते वा न वानघ ।

विगीतवचनास्ते किं मुनयस्तत्त्वदर्शिनः ॥

याज्ञवल्क्यादयः सर्वे धर्मशास्त्रप्रवर्तकाः ।

भवितव्यं भवत्येव यद्येवं निश्चयः प्रभो ॥

आयुर्वेदः स मिथ्यैव मन्त्रवादास्तथाखिलाः ।

उद्यमस्तु वृथा सर्वमेवं चेद्दैवनिर्मितम् ॥

भवितव्यं भवत्येव प्रवृत्तिस्तु निरर्थिका ।

अग्निष्टोमादिकं व्यर्थं नियतं स्वर्गसाधनम् ॥

यदा तदा प्रमाणं हि वृथैव परिभाषितम् ।

वितथे तत्प्रमाणे तु धर्मोच्छेदः कुतो न हि ॥

उद्यमे च कृते सिद्धिः प्रत्यक्षेणैव साध्यते ।

तस्मादत्र प्रकर्तव्यः प्रपञ्चश्चित्तकल्पितः ॥

यथायं बालकः क्षेमं प्राप्नोति मम पुत्रकः । मिथ्या यदि प्रकर्तव्यं वचनं शुभमिच्छता । न तत्र दूषणं किञ्चित्प्रवदन्ति मनीषिणः । वसुदेव उवाच निशामय महाभागे सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥

उद्यमः खलु कर्तव्यः फलं दैववशानुगम् ।

त्रिविधानीह कर्माणि संसारेऽत्र पुराविदः ॥

प्रवदन्तीह जीवानां पुराणेष्वागमेषु च ।

सञ्चितानि च जीर्णानि प्रारब्धानि सुमध्यमे ॥

वर्तमानानि वामोरु त्रिविधानीह देहिनाम् ।

शुभाशुभानि कर्माणि बीजभूतानि यानि च ॥

बहुजन्मसमुत्थानि काले तिष्ठन्ति सर्वथा ।

पूर्वदेहं परित्यज्य जीवः कर्मवशानुगः ॥

स्वर्गं वा नरकं वापि प्राप्नोति स्वकृतेन वै ।

दिव्यं देहञ्च सम्प्राप्य यातनादेहमर्थजम् ॥

भुनक्ति विविधान् भोगान्स्वर्गे वा नरकेऽथवा । अनुष्ठान करके मनुष्य क्या पापसे मुक्त नहीं हो जाता ११ है? [ यदि प्रायश्चित्त - विधानके द्वारा पाप से मुक्ति नहीं मिलती है तो ] क्या याज्ञवल्क्य आदि धर्मशास्त्रप्रणेता तत्त्वदर्शी मुनियोंके वचन निरर्थक हो जायँगे? हे १२ स्वामिन्! होनी होकर ही रहती है - यदि यह निश्चित है तब तो सभी आयुर्वेद एवं सभी मन्त्रशास्त्र झूठे सिद्ध हो जायँगे और इस प्रकार भाग्यलेखके समक्ष १३ सभी उद्यम अर्थहीन हो जायँगे ॥ ९ –१३ ॥ ' जो होना है, वह अवश्य घटित होता है ' यदि १४ [ यही सत्य है ] तो सत्कर्मोंकी ओर प्रवृत्त होना व्यर्थ हो जायगा और अग्निष्टोम आदि स्वर्गप्राप्तिके शास्त्र - सम्मत साधन भी निरर्थक हो जायँगे । जब १५ वेद - शास्त्रादिके उपदेश ही व्यर्थ हो गये, तब उन प्रमाण झूठा हो जानेपर क्या धर्मका समूल नाश नहीं हो जायगा? ॥ १४-१५ ॥ १६ उद्यम करनेपर सिद्धिकी प्रत्यक्ष प्राप्ति हो जाती है | अतएव अपने मनमें भलीभाँति सोच करके कोई १७ ऐसा उपाय कीजिये, जिससे मेरा यह बालक पुत्र बच जाय । किसीके कल्याणकी इच्छासे यदि झूठ बोल दिया जाय तो इसमें किसी प्रकारका दोष नहीं होता है - ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं ॥ १६ - १७३ ॥ १८ वसुदेव बोले - हे महाभागे! सुनो, मैं तुमसे यह सत्य कह रहा हूँ । मनुष्यको उद्यम करना चाहिये, उसका फल दैवके अधीन रहता है । प्राचीन तत्त्ववेत्ताओंने १ ९ इस संसार में प्राणियोंके तीन प्रकारके कर्म पुराणों तथा शास्त्रोंमें बताये हैं । हे सुमध्यमे! संचित, प्रारब्ध और वर्तमान- ये तीन प्रकारके कर्म देहधारियोंके होते हैं । २० हे सुजघने! प्राणियोंद्वारा सम्पादित जो भी शुभाशुभ कर्म होते हैं, वे बीजका रूप धारण कर लेते हैं और २१ अनेक जन्मोंके उपार्जित वे कर्म समय पाकर फल देनेके लिये उपस्थित हो जाते हैं । १८ - २१३ ॥ जीव अपना पूर्व शरीर छोड़कर अपने द्वारा किये २२ गये कर्मोंके अधीन होकर स्वर्ग अथवा नरकमें जाता है । सुकर्म करनेवाला जीव दिव्य शरीर प्राप्त करके स्वर्गमें नानाविध सुखोंका उपभोग करता है तथा दुष्कर्म २३ करनेवाला विषयभोगजन्य यातना देह प्राप्त करके नरकमें अनेक प्रकारके कष्ट भोगता है ॥ २२-२३३ ॥

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अ ० २१ ] भोगान्ते च यदोत्पत्तेः समयस्तस्य जायते ॥

लिङ्गदेहेन सहितं जायते जीवसंज्ञितम् ।

तदैव सञ्चितेभ्यश्च कर्मभ्यः कर्मभिः पुनः ॥

योजयत्येव तं कालं कर्माणि प्राक्कृतानि च ।

देहेनानेन भाव्यानि शुभानि चाशुभानि च ॥

प्रारब्धानि च जीवेन भोक्तव्यानि सुलोचने ।

प्रायश्चित्तेन नश्यन्ति वर्तमानानि भामिनि ॥

सञ्चितानि तथैवाशु यथार्थं विहितेन च ।

प्रारब्धकर्मणां भोगात्संक्षयो नान्यथा भवेत् ॥

तेनायं ते कुमारो वै देयः कंसाय सर्वथा ।

न मिथ्या वचनं मेऽस्ति लोकनिन्दाभिदूषितम् ॥

अनित्येऽस्मिंस्तु संसारे धर्मसारे महात्मनाम् ।

दैवाधीनं हि सर्वेषां मरणं जननं तथा ॥

तस्माच्छोको न कर्तव्यो देहिना हि निरर्थकः ।

सत्यं यस्य गतं कान्ते वृथा तस्यैव जीवितम् ॥

इहलोको गतो यस्मात्परलोकः कुतस्ततः ।

अतो देहि सुतं सुभ्रु कंसाय प्रददाम्यहम् ॥

सत्यसंस्तरणाद्देवि शुभमग्रे भविष्यति ।

कर्तव्यं सुकृतं पुम्भिः सुखे दुःखे सति प्रिये ॥

( सत्यसंरक्षणाद्देवि शुभमेव भविष्यति ) व्यास उवाच

इत्युक्तवति कान्ते सा देवकी शोकसंयुता ।

ददौ पुत्रं प्रसूतं च वेपमाना मनस्विनी ॥

वसुदेवोऽपि धर्मात्मा आदाय स्वसुतं शिशुम् ।

जगाम कंससदनं मार्गे लोकैरभिष्टुतः ॥

चतुर्थ स्कन्ध ५०५ २४ इस प्रकार भोग पूर्ण हो जानेपर जब पुनः उसके जन्मका समय आता है, तब लिंगदेहके साथ संयोग होनेपर उसकी ' जीव ' संज्ञा हो जाती है । उसी समय २५ जीवका संचित कर्मोंसे सम्बन्ध हो जाता है और पुनः लिंगदेहके आविर्भावके समय परमात्मा उन कर्मोंके साथ जीवको जोड़ देते हैं । हे सुलोचने! इसी शरीरके २६ द्वारा जीवको संचित, वर्तमान और प्रारब्ध - इन तीन प्रकारके शुभ अथवा अशुभ कर्म भोगने पड़ते हैं । हे भामिनि! केवल वर्तमान कर्म ही प्रायश्चित्त आदिके २७ द्वारा नष्ट किये जा सकते हैं । इसी प्रकार समुचित शास्त्रोक्त उपायोंद्वारा संचित कर्मोंको भी विनष्ट किया जा सकता है, किंतु प्रारब्ध कर्मोंका क्षय तो भोगसे २८ । ही सम्भव है, अन्यथा नहीं ॥ २४ – २८ ॥ अतएव मुझे तुम्हारे इस पुत्रको हर प्रकारसे कंसको अर्पित कर ही देना चाहिये । ऐसा करनेसे मेरा २ ९ वचन भी मिथ्या नहीं होगा और लोकनिन्दाका दोष भी मुझे नहीं लगेगा ॥ २ ९ ॥ इस अनित्य संसारमें महापुरुषोंके लिये धर्म ही ३० एकमात्र सार तत्त्व है । इस लोकमें प्राणियोंका जन्म तथा मरण दैवके अधीन है । अतएव हे प्रिये! प्राणियोंको व्यर्थ शोक नहीं करना चाहिये । इस ३१ संसारमें जिसने सत्य छोड़ दिया उसका जीवन निरर्थक ही है ॥ ३०-३१ ॥ जिसका यह लोक बिगड़ गया, उसके लिये ३२ परलोक कहाँ? अतः हे सुन्दर भौंहोंवाली! यह बालक मुझे दे दो और मैं इसे कंसको सौंप दूँ ॥ ३२ ॥

हे देवि! सत्य - पथका अनुगमन करनेसे आगे ३३ कल्याण होगा । हे प्रिये! सुख अथवा दुःख - किसी भी परिस्थितिमें मनुष्योंको सत्कर्म ही करना चाहिये । ( हे देवि! सत्यकी भलीभाँति रक्षा करनेसे कल्याण ही होगा ) ॥ ३३ ॥

व्यासजी बोले — अपने प्रिय पतिके ऐसा कहनेपर शोक - सन्तप्त तथा काँपती हुई मनस्विनी देवकीने वह ३४ नवजात शिशु वसुदेवको दे दिया ॥ ३४ ॥

धर्मात्मा वसुदेव भी अपने पुत्र उस अबोध शिशुको लेकर कंसके महलकी ओर चल पड़े । मार्गमें ३५ । लोग उनकी प्रशंसा कर रहे थे ॥३५ ॥

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५०६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २१ लोका ऊचुः

पश्यन्तु वसुदेवं भो लोका एवं मनस्विनम् ।

स्ववाक्यमनुरुध्यैव बालमादाय यात्यसौ ॥

मृत्यवे दातुकामोऽद्य सत्यवागनसूयकः ।

सफलं जीवितं चास्य धर्मं पश्यन्तु चाद्भुतम् ॥

यः पुत्रं याति कंसाय दातुं कालात्मनेऽपि हि । व्यास उवाच इति संस्तूयमानस्तु प्राप्तः कंसालयं नृप ॥

ददावस्मै कुमारं तं जातमात्रममानुषम् ।

कंसोऽपि विस्मयं प्राप्तो दृष्ट्वा धैर्यं महात्मनः ॥

गृहीत्वा बालकं प्राह स्मितपूर्वमिदं वचः ।

धन्यस्त्वं शूरपुत्राद्य ज्ञातः पुत्रसमर्पणात् ॥

मम मृत्युर्न चायं वै गिरा प्रोक्तस्तु चाष्टमः ।

न हन्तव्यो मया कामं बालोऽयं यातु ते गृहम् ॥।

अष्टमस्तु प्रदातव्यस्त्वया पुत्रो महामते ।

इत्युक्त्वा वसुदेवाय ददावाशु खलः शिशुम् ॥

गच्छत्वयं गृहे बालः क्षेमं व्याहृतवान्नृपः ।

तमादाय तदा शौरिर्जगाम स्वगृहं मुदा ॥

कंसोऽपि सचिवानाह वृथा किं घातये शिशुम् ।

अष्टमाद्देवकीपुत्रान्मम मृत्युरुदाहृतः ॥

अतः किं प्रथमं बालं हत्वा पापं करोम्यहम् ।

साधु साध्विति तेऽप्युक्त्वा संस्थिता मन्त्रिसत्तमाः ॥

विसर्जितास्तु कंसेन जग्मुस्ते स्वगृहान्प्रति ।

गतेषु तेषु सम्प्राप्तो नारदो मुनिसत्तमः ॥

लोगोंने कहा- हे नागरिको! इस मनस्वी वसुदेवको देखो; इस अबोध बालकको लेकर ये ३६ द्वेषरहित एवं सत्यवादी वसुदेव अपने वचनकी रक्षा लिये आज इसे मृत्युको समर्पित करने जा रहे हैं 1 इनका जीवन सफल हो गया है । इनके इस अद्भुत धर्मपालनको देखो, जो साक्षात् कालस्वरूप कंसको ३७ अपना पुत्र देनेके लिये जा रहे हैं ॥ ३६-३७३ ॥ व्यासजी बोले- हे राजन्! इस प्रकार लोगोंद्वारा प्रशंसित होते हुए वे वसुदेव कंसके महलमें पहुँच गये और उस दिव्य नवजात शिशुको कंसको अर्पित ३८ कर दिया । महात्मा वसुदेवके इस धैर्यको देखकर कंस भी विस्मित हो गया ॥ ३८-३९ ॥ उस बालकको अपने हाथोंमें लेकर कंसने ३ ९ मुसकराते हुए यह वचन कहा - हे शूरसेनतनय! आप धन्य हैं; आज आपके इस पुत्र - समर्पणके कृत्यसे मैंने आपका महत्त्व जान लिया ॥ ४० ॥

४० यह बालक मेरी मृत्युका कारण नहीं है; क्योंकि आकाशवाणीके द्वारा देवकीका आठवाँ पुत्र मेरी मृत्युका कारण बताया गया है । अतएव मैं इस ४१ बालकका वध नहीं करूँगा, आप इसे अपने घर ले जाइये ॥ ४१ ॥

हे महामते! आप मुझे देवकीका आठवाँ पुत्र दे ४२ दीजियेगा । ऐसा कहकर उस दुष्ट कंसने तुरंत वह शिशु वसुदेवको वापस दे दिया ॥ ४२ ॥

राजा कंसने कहा कि यह बालक अपने घर जाय और सकुशल रहे । तत्पश्चात् उस बालकको ४३ लेकर शूरसेन- पुत्र वसुदेव प्रसन्नतापूर्वक अपने घरकी ओर चल पड़े ॥४३ ॥

इसके बाद कंसने भी अपने मन्त्रियोंसे कहा कि ४४ मैं इस शिशुकी व्यर्थ ही हत्या क्यों करता; क्योंकि मेरी मृत्यु तो देवकीके आठवें पुत्रसे कही गयी है, अतः देवकीके प्रथम शिशुका वध करके मैं पाप क्यों ४५ करूँ? तब वहाँ विद्यमान श्रेष्ठ मन्त्रिगण ‘ साधु, साधु ' – ऐसा कहकर और कंससे आज्ञा पाकर अपने - अपने घर चले गये । उनके चले जानेपर ४६ मुनिश्रेष्ठ नारदजी वहाँ आ गये॥४४–४६ ॥

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अ ० २२ ] चतुर्थ

अभ्युत्थानार्घ्यपाद्यादि चकारोग्रसुतस्तदा ।

पप्रच्छ कुशलं राजा तत्रागमनकारणम् ॥ ४७

नारदस्तं तदोवाच स्मितपूर्वमिदं वचः ।

कंस कंस महाभाग गतोऽहं हेमपर्वतम् ॥ ४८

तत्र ब्रह्मादयो देवा मन्त्रं चक्रुः समाहिताः ।

देवक्यां वसुदेवस्य भार्यायां सुरसत्तमः ॥ ४ ९

वधार्थं तव विष्णुश्च जन्म चात्र करिष्यति ।

तत्कथं न हतः पुत्रस्त्वया नीतिं विजानता ॥ ५०

कंस उवाच अष्टमं च हनिष्येऽहं मृत्युं मे देवभाषितम् । नारद उवाच न जानासि नृपश्रेष्ठ राजनीतिं शुभाशुभाम् ॥ ५१

मायाबलं च देवानां न त्वं वेत्सि वदामि किम् ।

रिपुरल्पोऽपि शूरेण नोपेक्ष्यः शुभमिच्छता ॥ ५२

सम्मेलनक्रियायां तु सर्वे ते ह्यष्टमाः स्मृताः ।

मूर्खस्त्वमरिसन्त्यागः कृतोऽयं जानता त्वया ॥ ५३

इत्युक्त्वाशु गतः श्रीमान्नारदो देवदर्शनः ।

गतेऽथ नारदे कंसः समाहूयाथ बालकम् ।

पाषाणे पोथयामास सुखं प्राप च मन्दधीः ॥ ५४

स्कन्ध ५०७ उस समय उग्रसेन- पुत्र कंसने श्रद्धापूर्वक उठकर विधिवत् अर्घ्य, पाद्य आदि अर्पण किया और पुनः कुशल - क्षेम तथा उनके आगमनका कारण पूछा ॥ ४७ ॥

तब नारदजीने मुसकराकर कंससे यह वचन कहा — हे कंस! हे महाभाग! मैं सुमेरुपर्वतपर गया था । वहाँ ब्रह्मा आदि देवगण एकत्र होकर आपसमें मन्त्रणा कर रहे थे कि वसुदेवकी पत्नी देवकीके गर्भसे सुरश्रेष्ठ भगवान् विष्णु आप संहारके उद्देश्यसे अवतार लेंगे; तो फिर नीतिका ज्ञान रखते हुए भी आपने उस शिशुका वध क्यों नहीं किया? ॥ ४८ – ५० ॥ कंस बोला – आकाशवाणीके द्वारा बताये गये अपने मृत्यु - रूप [ देवकीके ] आठवें पुत्रका मैं वध करूँगा ॥५०३ ॥

नारदजी बोले - हे नृपश्रेष्ठ! आप शुभ तथा अशुभ राजनीतिको नहीं जानते हैं और देवताओंकी माया- शक्ति भी नहीं जानते हैं । अब मैं क्या बताऊँ? अपना कल्याण चाहनेवाले वीरको छोटे - से - छोटे शत्रुकी भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये ॥ ५१-५२ ॥ [ गणितशास्त्रकी ] सम्मेलन- क्रियाके आधारपर तो सभी पुत्र आठवें कहे जा सकते हैं । आप मूर्ख हैं; क्योंकि ऐसा जानते हुए भी आपने शत्रुको छोड़ दिया है ॥५३ ॥

ऐसा कहकर श्रीमान् देवदर्शन नारद वहाँसे शीघ्रतापूर्वक चले गये । नारदके चले जानेपर कंसने उस बालकको मँगवाकर उसे पत्थरपर पटक दिया और । उस मन्दबुद्धि कंसको महान् सुख प्राप्त हुआ ॥ ५४ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां कंसेन देवकीप्रथमपुत्रवधवर्णनं नामैकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥

अथ द्वाविंशोऽध्यायः देवकीके छः पुत्रोंके पूर्वजन्मकी कथा, सातवें पुत्रके रूपमें भगवान् संकर्षणका अवतार, देवताओं तथा दानवोंके अंशावतारोंका वर्णन जनमेजय उवाच जनमेजय बोले- हे पितामह! उस बालकने किं कृतं पातकं तेन बालकेन पितामह । ऐसा कौन - सा पापकर्म किया था, जिससे जन्म लेते यज्जातमात्रो निहतस्तथा तेन दुरात्मना ॥ १ ही उसको दुष्टात्मा कंसने मार डाला? ॥१ ॥

पृष्ठ 517

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५०८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २२

नारदोऽपि मुनिश्रेष्ठो ज्ञानवान्धर्मतत्परः ।

कथमेवंविधं पापं कृतवान्ब्रह्मवित्तमः ॥

कर्ता कारयिता पापे तुल्यपापौ स्मृतौ बुधैः ।

स कथं प्रेरयामास मुनिः कंसं खलं तदा ॥

संशयोऽयं महान्मेऽत्र ब्रूहि सर्वं सविस्तरम् ।

येन कर्मविपाकेन बालको निधनं गतः ॥

व्यास उवाच

नारदः कौतुकप्रेक्षी सर्वदा कलहप्रियः ।

देवकार्यार्थमागत्य सर्वमेतच्चकार ह ॥

न मिथ्याभाषणे बुद्धिर्मुनेस्तस्य कदाचन ।

सत्यवक्ता सुराणां स कर्तव्ये निरतः शुचिः ॥

एवं षड् बालकास्तेन जाता जाता निपातिताः ।

षड् गर्भाः शापयोगेन सम्भूय मरणं गताः ॥

शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि तेषां शापस्य कारणम् ।

स्वायम्भुवेऽन्तरे पुत्रा मरीचेः षण्महाबलाः ॥

ऊर्णायां चैव भार्यायामासन्धर्मविचक्षणाः ।

ब्रह्माणं जहसुर्वीक्ष्य सुतां यभितुमुद्यतम् ॥

शशाप तांस्तदा ब्रह्मा दैत्ययोनिं विशन्त्वधः ।

कालनेमिसुता जातास्ते षड्गर्भा विशाम्पते ॥

अवतारे परे ते तु हिरण्यकशिपोः सुताः ।

जातास्ते ज्ञानसंयुक्ताः पूर्वशापभयान्नृप ॥

तस्मिञ्जन्मनि शान्ताश्च तपश्चक्रुः समाहिताः । तेषां प्रीतोऽभवद् ब्रह्मा षड्गर्भाणां वरान्ददौ । महान् ज्ञानी, धर्मपरायण तथा ब्रह्मवेत्ता होते २ हुए भी मुनिश्रेष्ठ नारदने इस प्रकारका पाप क्यों किया? विद्वज्जनोंने पाप करने तथा करानेवाले-इन दोनोंको समान पापी बताया है; तो फिर उन देवर्षि नारदने इस पापकर्मके लिये दुष्ट कंसको ३ प्रेरित क्यों किया? ॥ २-३ ॥ इस विषयमें मुझे यह महान् सन्देह हो गया है । जिस कर्मफलसे वह बालक मारा गया, उसके बारेमें ४ मुझे सब कुछ विस्तारपूर्वक बताइये ॥४ ॥

व्यासजी बोले - – देवर्षि नारदको कौतुक करना तथा कलह करा देना अत्यन्त प्रिय है । अतः देवताओंका कार्य साधनेके लिये ही उन्होंने उपस्थित ५ होकर यह सब किया था ॥ ५ ॥

उन मुनि नारदकी बुद्धि झूठ बोलनेमें कभी भी प्रवृत्त नहीं हो सकती । सत्यवादी तथा पवित्र ६ हृदयवाले वे सदा देवताओंका कार्य सिद्ध करनेमें तत्पर रहते हैं ॥६ ॥

इस प्रकार कंसने देवकीके छः पुत्रोंको बारी-बारीसे जन्म लेते ही मार डाला । पूर्वजन्ममें प्राप्त ७ शापके कारण वे छः बालक जन्म लेते ही मृत्युको प्राप्त हो गये ॥ ७ ॥

हे राजन्! सुनिये, अब मैं उनके शापका कारण ८ बताऊँगा । स्वायम्भुव मन्वन्तरमें मरीचिकी भार्या ऊर्णाके गर्भसे छः अत्यन्त बलशाली पुत्र उत्पन्न हुए; ये धर्मशास्त्रमें पूर्णरूपसे निष्णात थे ॥८३ ॥

९ एक बार ब्रह्माजीको अपनी पुत्री सरस्वतीके साथ समागमके लिये उद्यत देखकर वे हँस पड़े थे । तब ब्रह्माजीने उन्हें शाप दे दिया कि तुमलोगोंका पतन हो जाय और तुम सब दैत्ययोनिमें जन्म लो । हे १० महाराज! इस प्रकार वे छहों पुत्र कालनेमिके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए ॥ ९ -१० ॥ हे राजन्! अगले जन्ममें वे हिरण्यकशिपुके पुत्र ११ हुए । उनका पूर्वज्ञान अभी बना हुआ था । अतः वे सब पूर्वशापसे भयभीत होकर उस जन्ममें समाहितचित्त हो शान्तभावसे तप करने लगे । इससे ब्रह्माजीने अत्यधिक प्रसन्न होकर उन छहोंको वरदान दे १२ | दिया ॥ ११-१२ ॥

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अ ० २२ ] ब्रह्मोवाच

शप्ता यूयं मया पूर्वं क्रोधयुक्तेन पुत्रकाः ।

तुष्टोऽस्मि वो महाभागा ब्रुवन्तु वाञ्छितं वरम् ॥

व्यास उवाच

ते तु श्रुत्वा वचस्तस्य ब्रह्मणः प्रीतमानसाः ।

ब्रह्माणमब्रुवन्कामं सर्वे कार्यार्थतत्पराः ॥

गर्भा ऊचुः

पितामहाद्य तुष्टोऽसि देहि नो वाञ्छितं वरम् ।

अवध्या दैवतैः सर्वैर्मानवैश्च महोरगैः ॥

गन्धर्वसिद्धपतिभिर्वध माभूत्पितामह । व्यास उवाच तानुवाच ततो ब्रह्मा सर्वमेतद्भविष्यति ॥

गच्छन्तु वो महाभागाः सत्यमेव न संशयः ।

दत्त्वा वरं गतो ब्रह्मा मुदितास्ते तदाभवन् ॥

हिरण्यकशिपुः क्रुद्धस्तानुवाच कुरूद्वह ।

यस्माद्विहाय मां पुत्रास्तोषितो वै पितामहः ॥

वरेण प्रार्थितोऽत्यर्थं बलवन्तो यतोऽभवन् ।

युष्माभिर्हापितः स्नेहस्ततो युष्मांस्त्यजाम्यहम् ॥

यूयं व्रजन्तु पाताले षड्गर्भा विश्रुता भुवि ।

पाताले निद्रयाविष्टास्तिष्ठन्तु बहुवत्सरान् ॥

ततस्तु देवकीगर्भे वर्षे वर्षे पुनः पुनः । पिता वः कालनेमिस्तु तत्र कंसो भविष्यति स एव जातमात्रान्वो वधिष्यति सुदारुणः । व्यास उवाच एवं शप्तांस्तदा तेन गर्भे जातान्पुनः पुनः जघान देवकीपुत्रान्षड्गर्भाञ्छापनोदितः । शेषांश: सप्तमस्तत्र देवकीगर्भसंस्थितः चतुर्थ स्कन्ध ५० ९ ब्रह्माजी बोले- हे महाभाग पुत्रो! मैंने क्रोधमें आकर उस समय तुम लोगोंको शाप दे दिया था । मैं १३ तुम सभीपर परम प्रसन्न हूँ; अतएव अपना अभिलषित वर माँगो ॥१३ ॥

व्यासजी बोले- उन ब्रह्माका वचन सुनकर उनके मनमें अत्यधिक प्रसन्नता हुई । अपना कार्य सिद्ध १४ करनेमें तत्पर उन सबने ब्रह्माजीसे वर माँग लिया ॥१४ ॥

बालक बोले- हे पितामह! यदि आज आप हमपर प्रसन्न हैं तो हमें मनोवांछित वरदान दीजिये । हमलोगोंको सभी देवता, मानव और महानाग न मार सकें । हे पितामह! यहाँतक कि गन्धर्व तथा बड़े - से-१५ बड़े सिद्ध पुरुषोंसे भी हमारा वध न हो सके ॥ १५३ ॥

व्यासजी बोले- तब ब्रह्माजीने उनसे कहा कि यह सब पूर्ण होगा । हे महाभाग्यशाली बालको! अब तुमलोग जाओ । यह सत्य होकर रहेगा; इसमें १६ सन्देह नहीं है । जब ब्रह्माजी वरदान देकर चले गये, तब वे सब परम प्रसन्न हुए ॥ १६-१७ ॥ हे कुरुश्रेष्ठ! [ वरदानकी बात जानकर ] हिरण्य-१७ कशिपु कुपित होकर उनसे बोला — हे पुत्रो! तुमलोगोंने मेरी उपेक्षा करके अपनी तपस्यासे ब्रह्माको प्रसन्न किया है । उनसे प्रार्थना करके वरदान पाकर तुमलोग १८ अत्यधिक बलशाली हो गये हो । तुम सभीने अपने पिताके स्नेहको अपमानित किया है; अतएव मैं तुमलोगोंका परित्याग करता हूँ ॥ १८-१९ ॥ १ ९ अब तुमलोग पाताललोक चले जाओ । इस पृथ्वीपर तुमलोग ' षड्गर्भ ' नामसे विख्यात होओगे । पाताललोकमें तुमलोग बहुत वर्षोंतक निद्राके वशीभूत २० रहोगे । तत्पश्चात् तुमलोग क्रमसे प्रतिवर्ष देवकीके गर्भसे उत्पन्न होते रहोगे और पूर्वजन्मका तुम्हारा पिता कालनेमि उस समय कंस नामसे उत्पन्न होगा । ॥ २ ९ वह अत्यन्त क्रूर कंस तुमलोगोंको उत्पन्न होते ही मार डालेगा ॥ २०-२१३ ॥ व्यासजी बोले- इस प्रकार हिरण्यकशिपुसे शापित होकर वे क्रमसे एक - एक करके देवकीके ॥ २२ गर्भमें आते गये और कंस पूर्वशापसे प्रेरित होकर उन षड्गर्भरूप देवकीके पुत्रोंका वध करता गया । इसके बाद शेषनागके अंशावतार बलभद्रजी देवकीके सातवें ॥ २३ गर्भमें आये ॥ २२-२३ ॥

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५१० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २२

विस्त्रंसितश्च गर्भोऽसौ योगेन योगमायया ।

नीतश्च रोहिणीगर्भे कृत्वा संकर्षणं बलात् ॥ २४

पतितः पञ्चमे मासि लोकख्यातिं गतस्तदा ।

कंसोऽपि ज्ञातवांस्तत्र देवकीगर्भपातनम् ॥ २५

मुदं प्राप स दुष्टात्मा श्रुत्वा वार्तां सुखावहाम् ।

अष्टमे देवकीगर्भे भगवान्सात्वतां पतिः ॥ २६

उवास देवकार्यार्थं भारावतरणाय च । राजोवाच वसुदेवः कश्यपांशः शेषांशश्च तदाभवत् ॥ २७

हरेरंशस्तथा प्रोक्तो भवता मुनिसत्तम ।

अन्ये च येंऽशा देवानां तत्र जातास्तु तान्वद ॥ २८

भारावतरणार्थं वै क्षितेः प्रार्थनयानघ । व्यास उवाच सुराणामसुराणां च ये येंऽशा भुवि विश्रुताः ॥ २ ९

तानहं सम्प्रवक्ष्यामि संक्षेपेण शृणुष्व तान् ।

वसुदेवः कश्यपांशो देवकी च तथादितिः ॥ ३०

बलदेवस्त्वनन्तांशो वर्तमानेषु तेषु च ।

योऽसौ धर्मसुतः श्रीमान्नारायण इति श्रुतः ॥ ३१

तस्यांशो वासुदेवस्तु विद्यमाने मुनौ तदा ।

नरस्तस्यानुजो यस्तु तस्यांशोऽर्जुन एव च ॥३२

युधिष्ठिरस्तु धर्मांशो वाय्वंशो भीम इत्युत ।

अश्विन्यंशौ ततः प्रोक्तौ माद्रीपुत्रौ महाबलौ ॥ ३३

सूर्यांश: कर्ण आख्यातो धर्मांशो विदुरः स्मृतः ।

द्रोणो बृहस्पतेरंशस्तत्सुतस्तु शिवांशजः ॥ ३४ ।

तत्पश्चात् योगमायाने अपने योगबलसे उस गर्भको च्युत कर दिया और हठात् खींचकर उसे रोहिणीके गर्भ में स्थापित कर दिया ॥ २४ ॥

इसी बीच लोगोंको यह बात मालूम हो गयी कि पाँचवें महीनेमें ही देवकीका गर्भस्राव हो गया । कंस भी देवकीके गर्भपातका समाचार जान गया । अपने लिये यह सुखद समाचार सुनकर वह दुरात्मा कंस बहुत प्रसन्न हुआ ॥ २५३ ॥

उधर देवताओंके कार्यको सिद्ध करने तथा पृथ्वीका भार उतारनेके लिये जगत्पति भगवान् विष्णु देवकीके आठवें गर्भमें विराजमान हो गये ॥ २६३ ॥

राजा बोले- हे मुनिश्रेष्ठ! आपने यह बता दिया कि वसुदेवजी महर्षि कश्यपके अंशावतार थे और उनके यहाँ शेषनाग तथा भगवान् विष्णु अपने - अपने अंशोंसे उत्पन्न हुए । हे अनघ! देवताओंके अन्य जो-जो अंशावतार पृथ्वीकी प्रार्थनापर उसका भार उतारनेके लिये हुए हैं, उन्हें भी बताइये ॥ २७-२८३ ॥ व्यासजी बोले – हे राजन्! देवताओं तथा असुरोंके जो - जो अंश लोकमें विख्यात हुए हैं, उनके विषयमें मैं संक्षिप्तरूपमें बता रहा हूँ; आप उन्हें सुनिये - वसुदेव कश्यपके अंशसे तथा देवकी अदिति अंशसे उत्पन्न थीं ॥ २ ९ -३० ॥ बलदेवजी शेषनागके अंश थे । इन सभी अवतरित हो जानेपर जिन धर्मपुत्र श्रीमान् नारायणके विषयमें कहा जा चुका है, उन्हींके अंशसे ही साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णने अवतार लिया । मुनिवर नारायणके श्रीकृष्णरूपमें प्रकट हो जानेपर उनके नर नामक जो छोटे भाई हैं, उनके अंशस्वरूप अर्जुनका प्राकट्य हुआ ॥ ३१-३२ ॥ महाराज युधिष्ठिर धर्मके अंश, भीमसेन पवनदेव अंश तथा माद्रीके दोनों महाबली पुत्र नकुल एवं सहदेव दोनों अश्विनीकुमारोंके अंश कहे गये हैं ॥ ३३ ॥

कर्ण सूर्यके अंशसे प्रकट हुए और विदुरको धर्मका अंश बताया गया है । द्रोणाचार्य बृहस्पतिके अंशसे तथा उनका पुत्र अश्वत्थामा शिवके अंशसे उत्पन्न थे ॥३४ ॥

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अ ० २२ ] समुद्रः शन्तनुः प्रोक्तो गङ्गा भार्या मता बुधैः देवकस्तु समाख्यातो गन्धर्वपतिरागमे वसुर्भीष्मो विराटस्तु मरुद्गण इति स्मृतः अरिष्टस्य सुतो हंसो धृतराष्ट्रः प्रकीर्तितः मरुद्गणः कृपः प्रोक्तः कृतवर्मा तथापरः दुर्योधनः कलेरंशः शकुनिं विद्धि द्वापरम् ॥ सोमपुत्रः सुवर्चाख्यः सोमप्ररुरुदाहृतः पावकांशो धृष्टद्युम्नः शिखण्डी राक्षसस्तथा सनत्कुमारस्यांशस्तु प्रद्युम्नः परिकीर्तितः द्रुपदो वरुणस्यांशो द्रौपदी च रमांशजा द्रौपदीतनयाः पञ्च विश्वेदेवांशजाः स्मृताः कुन्तिः सिद्धिर्धृतिर्माद्री मतिर्गान्धारराजजा कृष्णपन्यस्तथा सर्वा देववाराङ्गनाः स्मृताः राजानश्च तथा सर्वे असुराः शक्रनोदिताः हिरण्यकशिपोरंशः शिशुपाल उदाहृतः विप्रचित्तिर्जरासन्धः शल्यः प्रह्लाद इत्यपि कालनेमिस्तथा कंसः केशी हयशिरास्तथा अरिष्टो बलिपुत्रस्तु ककुद्मी गोकुले हतः अनुह्लादो धृष्टकेतुर्भगदत्तोऽथ बाष्कलः लम्बः प्रलम्बः सञ्जातः खरोऽसौ धेनुकोऽभवत् वाराहश्च किशोरश्च दैत्यौ परमदारुणौ मल्लौ तावेव सञ्जातौ ख्यातौ चाणूरमुष्टिकौ चतुर्थ स्कन्ध ५११ । विद्वानोंका मानना है कि समुद्रके अंशसे महाराज ॥ ३५ शन्तनु तथा गंगाके अंशसे उनकी भार्या उत्पन्न हुई थीं । पुराणप्रसिद्ध गन्धर्वराजके अंशसे महाराज देवक उत्पन्न हुए थे ॥ ३५ ॥

। भीष्मपितामहको वसुका तथा राजा विराटको ॥ ३६ मरुद्गणोंका अंशावतार बताया गया है । महाराज धृतराष्ट्र अरिष्टनेमिके पुत्र हंसके अंशसे उत्पन्न कहे । गये हैं ॥ ३६ ॥

३७ कृपाचार्यको किसी एक मरुद्गणका अंश तथा कृतवर्माको किसी दूसरे मरुद्गणका अंश बताया गया । है । [ हे राजन्! ] दुर्योधनको कलिका अंश तथा शकुनिको द्वापरका अंश समझिये ॥३७ ॥

॥ ३८ प्रसिद्ध सोमनन्दन सुवर्चा पृथ्वीपर सोमप्ररु नामसे विख्यात हुए । धृष्टद्युम्न अग्नि तथा शिखण्डी राक्षसके । अंशसे उत्पन्न हुए ॥ ३८ ॥

॥ ३ ९ प्रद्युम्न सनत्कुमारके अंश कहे गये हैं । द्रुपद वरुणके अंश थे तथा द्रौपदी साक्षात् लक्ष्मीके अंशसे । उत्पन्न थीं ॥ ३ ९ ॥ ॥ ४० द्रौपदीके पाँचों पुत्र विश्वेदेवके अंशसे उत्पन्न माने गये हैं । कुन्ती सिद्धिके अंशसे, माद्री धृति अंशसे तथा गान्धारी मतिके अंशसे उत्पन्न हुई थीं ॥ ४० ॥

। भगवान् कृष्णकी सभी पत्नियाँ देवताओंकी ॥ ४१ रमणियोंके अंशसे उत्पन्न कही गयी हैं । इन्द्रके द्वारा भेजे हुए सब दैत्य धरातलपर आकर दुराचारी नरेश । बने थे ॥ ४१ ॥

॥ ४२ शिशुपालको हिरण्यकशिपुका अंश कहा गया है । जरासन्ध विप्रचित्तिका तथा शल्य प्रह्लादका अंशावतार था ॥ ४२ ॥

। कालनेमि कंस हुआ तथा हयशिराको केशीका ॥ ४३ जन्म प्राप्त हुआ । बलिपुत्र ककुद्मी अरिष्टासुर बना, जो गोकुलमें मारा गया ॥४३ ॥

। अनुह्लाद धृष्टकेतु बना और बाष्कल भगदत्तके रूपमें उत्पन्न हुआ । लम्बने प्रलम्बासुरके रूपमें जन्म ॥ ४४ लिया तथा खर धेनुकासुर हुआ ॥ ४४ ॥

। अत्यन्त भयंकर वाराह और किशोर नामक दोनों दैत्य चाणूर और मुष्टिक नामक पहलवानोंके ॥ ४५ । रूपमें प्रख्यात हुए ॥ ४५ ॥