देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 521–530
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 521–530
पृष्ठ 521
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५१२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २३
दितिपुत्रस्तथारिष्टो गजः कुवलयाभिधः ।
बलिपुत्री बकी ख्याता बकस्तदनुजः स्मृतः ॥ ४६
यमो रुद्रस्तथा कामः क्रोधश्चैव चतुर्थकः ।
तेषामंशैस्तु सञ्जातो द्रोणपुत्रो महाबलः ॥ ४७
अंशावतरणे पूर्वं दैतेया राक्षसास्तथा ।
जाताः सर्वे सुरांशास्ते क्षितिभारावतारणे ॥ ४८
एतेषां कथितं राजन्नंशावतरणं नृप ।
सुराणां चासुराणां च पुराणेषु प्रकीर्तितम् ॥ ४ ९
यदा ब्रह्मादयो देवाः प्रार्थनार्थं हरिं गताः ।
हरिणा च तदा दत्तौ केशौ खलु सितासितौ ॥ ५०
श्यामवर्णस्ततः कृष्णः श्वेतः सङ्कर्षणस्तथा ।
भारावतारणार्थं तौ जातौ देवांशसम्भवौ ॥ ५१
अंशावतरणं चैतच्छृणोति भक्तिभावतः ।
सर्वपापविनिर्मुक्तो मोदते स्वजनैर्वृतः ॥ ५२
दितिका पुत्र अरिष्टासुर कुवलयापीड नामक हाथी हुआ । बलिकी पुत्री पूतना ( बकी ) राक्षसी बनी और उसका छोटा भाई बकासुर कहलाया ॥ ४६ ॥
द्रोणपुत्र महाबली अश्वत्थामा यम, रुद्र, काम और क्रोध - इन चारोंके अंशसे उत्पन्न हुआ था ॥ ४७ ॥
पूर्वकालमें अंशावतारके समय जो दैत्य तथा राक्षस उत्पन्न हुए थे, पृथ्वीपरसे उनका भार उतारनेके लिये सभी देवता अपने - अपने अंशसे उत्पन्न हुए ॥ ४८ ॥
हे राजन्! पुराणोंमें इन देवताओं तथा असुरोंके अंशावतारोंका जो वर्णन किया गया है, वह सब मैंने आपसे कह दिया ॥ ४ ९ ॥ जब ब्रह्मा आदि देवता प्रार्थना करनेके लिये भगवान् विष्णुके पास गये थे तब विष्णुजीने उन्हें श्वेत तथा श्याम वर्णवाले दो केश प्रदान किये थे ॥५० ॥
तदनन्तर पृथ्वीका भार उतारनेके लिये भगवान् कृष्ण श्यामवर्ण विष्णुका अंश लेकर तथा बलरामजी श्वेतवर्ण शेषनागका अंश लेकर अवतरित हुए ॥ ५१ ॥
जो प्राणी भक्ति - भावनासे इस अंशावतारकी कथाका श्रवण करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर अपने । बन्धु - बान्धवोंके सहित आनन्दित रहता है ॥ ५२ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे देवदानवानामंशावतरणवर्णनं नाम द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥
IIII IIIIII III II अथ त्रयोविंशोऽध्यायः कंसके कारागारमें भगवान् श्रीकृष्णका अवतार, वसुदेवजीका उन्हें गोकुल पहुँचाना और वहाँसे योगमायास्वरूपा कन्याको लेकर आना, कंसद्वारा कन्याके वधका प्रयास, योगमायाद्वारा आकाशवाणी करनेपर कंसका अपने सेवकोंद्वारा नवजात शिशुओंका वध कराना व्यास उवाच व्यासजी बोले – [ हे राजन्! ] उग्रसेनपुत्र कंसके हतेषु षट्सु पुत्रेषु देवक्या औग्रसेनिना । द्वारा देवकीके छः पुत्रोंका वध कर दिये जानेपर तथा सप्तमे पतिते गर्भे वचनान्नारदस्य च ॥ १ सातवाँ गर्भ गिर जानेके पश्चात् वह राजा कंस नारदजी कथनानुसार अपनी मृत्युके सम्बन्धमें भलीभाँति अष्टमस्य च गर्भस्य रक्षणार्थमतन्द्रितः । विचार करते हुए सावधानीपूर्वक आठवें गर्भको प्रयत्नमकरोद्राजा मरणं स्वं विचिन्तयन् ॥ २ | [ गिरनेसे ] बचानेका प्रयत्न करने लगा ॥ १-२ ॥
पृष्ठ 522
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० २३ ] चतुर्थ ५१३
समये देवकीगर्भे प्रवेशमकरोद्धरिः ।
अंशेन वसुदेवे तु समागत्य यथाक्रमम् ॥
तदेयं योगमाया च यशोदायां यथेच्छया ।
प्रवेशमकरोद्देवी देवकार्यार्थसिद्धये ॥
रोहिण्यास्तनयो रामो गोकुले समजायत ।
यतः कंसभयोद्विग्ना संस्थिता सा च कामिनी ॥
कारागारे ततः कंसो देवकीं देवसंस्तुताम् ।
स्थापयामास रक्षार्थं सेवकान्समकल्पयत् ॥
वसुदेवस्तु कामिन्याः प्रेमतन्तुनियन्त्रितः ।
पुत्रोत्पत्तिं च सञ्चिन्त्य प्रविष्टः सह भार्यया ॥
देवकीगर्भगो विष्णुर्देवकार्यार्थसिद्धये ।
संस्तुतोऽमरसङ्घैश्च व्यवर्धत यथाक्रमम् ॥
सञ्जाते दशमे तत्र मासेऽथ श्रावणे शुभे ।
प्राजापत्यर्क्षसंयुक्ते कृष्णपक्षेऽष्टमीदिने ॥
कंसस्तु दानवान्सर्वानुवाच भयविह्वलः ।
रक्षणीया भवद्भिश्च देवकी गर्भमन्दिरे ॥
अष्टमो देवकीगर्भः शत्रुर्मे प्रभविष्यति ।
रक्षणीयः प्रयत्नेन मृत्युरूपः स बालकः ॥
हत्वैनं बालकं दैत्याः सुखं स्वप्स्यामि मन्दिरे ।
निवृत्तिवर्जिते दुःखे नाशिते चाष्टमे सुते ॥
खड्गप्रासधराः सर्वे तिष्ठन्तु धृतकार्मुकाः ।
निद्रातन्द्राविहीनाश्च सर्वत्र निहितेक्षणाः ॥
व्यास उवाच
इत्यादिश्यासुरगणान् कृशोऽतिभयविह्वलः ।
मन्दिरं स्वं जगामाशु न लेभे दानवः सुखम् ॥
उचित समय आनेपर भगवान् श्रीहरि अपने अंशके साथ वसुदेवमें प्रविष्ट होकर देवकीके गर्भमें विराजमान हो गये ॥ ३ ॥
उसी समय देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके उद्देश्यसे भगवती योगमायाने अपनी इच्छासे यशोदाके ४ गर्भमें प्रवेश किया ॥४ ॥
कंसके भय से उद्विग्न होकर गोकुलमें कालक्षेप कर रही वसुदेव - भार्या रोहिणीके गर्भ से पुत्ररूपमें ५ बलरामजी प्रकट हो चुके थे ॥५ ॥
तदनन्तर कंसने देववन्दिता देवकीको कारागारमें बन्द कर दिया और उनकी रखवालीके लिये बहुतसे ६ सेवक नियुक्त कर दिये ॥६ ॥
अपनी पत्नी देवकीके पुत्र - प्रसवकी बातको ध्यानमें रखते हुए तथा उनके प्रेमपाशमें आबद्ध ७ रहनेके कारण वसुदेवजी भी उनके साथ कारागारमें ही रहने लगे ॥७ ॥
देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये देवकीके ८ गर्भमें विराजमान भगवान् विष्णु देवसमुदायद्वारा स्तूयमान होते हुए धीरे - धीरे वृद्धिको प्राप्त होने लगे ॥ ८ ॥
श्रावणमासमें दसवाँ महीना पूर्ण हो जानेपर ९ ( भाद्रपद - मासके ) कृष्णपक्षमें रोहिणी नक्षत्रयुक्त शुभ अष्टमी तिथिके उपस्थित होनेपर भयसे व्याकुल कंसने सभी दानवोंसे कहा कि आपलोग इस समय १० गर्भकक्षमें विद्यमान देवकीकी रखवाली करें ॥ ९ -१० ॥ देवकीके आठवें गर्भसे उत्पन्न बालक मेरा शत्रु होगा । अतएव आपलोगोंको मेरे कालरूप उस बालककी यत्नपूर्वक रखवाली करनी चाहिये ॥ ११ ॥
११ हे दैत्यो! इस समय मैं अत्यन्त उद्वेगकारी तथा दुःखदायी आठवें गर्भसे उत्पन्न होनेवाले इस बालकका वध कर लेनेके बाद ही अपने महलमें सुखपूर्वक सो १२ सकूँगा ॥ १२ ॥
आप सभी लोग अपने हाथोंमें तलवार, भाला और धनुष धारण करके निद्रा तथा आलस्यसे रहित १३ होकर चारों ओर दृष्टि रखियेगा ॥१३ ॥
व्यासजी बोले – उन दैत्योंको यह आज्ञा देकर भयाकुल तथा [ चिन्ताके कारण ] अति दुर्बल दानव कंस तत्काल अपने महलमें चला गया, किंतु १४ वहाँ भी वह सुखकी नींद नहीं सो पा रहा था ॥ १४ ॥
1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] - 17 A
पृष्ठ 523
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५१४ निशीथे देवकी तत्र वसुदेवमुवाच ह किं करोमि महाराज प्रसवावसरो मम बहवो रक्षपालाश्च तिष्ठन्त्यत्र भयानकाः नन्दपल्या मया सार्धं कृतोऽस्ति समयः पुरा प्रेषितव्यस्त्वया पुत्रो मन्दिरे मम मानिनि पालयिष्याम्यहं तत्र तवातिमनसा किल अपत्यं ते प्रदास्यामि कंसस्य प्रत्ययाय वै किं कर्तव्यं प्रभो चात्र विषमे समुपस्थिते व्यत्ययः सन्ततेः शौरे कथं कर्तुं क्षमो भवेः दूरे तिष्ठस्व कान्ताद्य लज्जा मेऽतिदुरत्यया परावृत्य मुखं स्वामिन्नन्यथा किं करोम्यहम् श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २३ । तत्पश्चात् मध्यरात्रिमें देवकीने वसुदेवजीसं ॥ १५ कहा - महाराज! मेरे प्रसवका समय आ गया है, अव मैं क्या करूँ? ॥ १५ ॥
। यहाँपर बहुतसे भयंकर रक्षक नियुक्त हैं । यहाँ ॥ १६ आनेके पूर्व नन्दकी पत्नी यशोदासे मेरी यह बात निश्चित हुई थी । [ उन्होंने कहा था- ] ' हे मानिनि! । तुम अपने पुत्रको मेरे घर भेज देना, मैं मन लगाकर ॥ १७ तुम्हारे पुत्रका पालन - पोषण करूँगी । कंसको विश्वास दिलानेके लिये मैं तुम्हें इसके बदले अपनी सन्तान दे । दूँगी । ' अतः हे प्रभो! इस विषम परिस्थितिमें अब हमें ॥ १८ क्या करना चाहिये? हे शूरतनय! आप इन दोनों सन्तानोंकी अदला - बदली करनेमें कैसे समर्थ हो सकेंगे? । हे कान्त! आप अपना मुख फेरकर मुझसे दूर होकर ॥ १ ९ । बैठिये; क्योंकि दुस्तर लज्जाके कारण मैं संकोचमें पड़ रही हूँ । हे स्वामिन्! इसके अतिरिक्त यहाँ कुछ विशेष । कर ही क्या सकती हूँ ॥ १६-१९ ३ ॥ इत्युक्त्वा तं महाभागं देवकी देवसम्मतम् ॥ २० देवतुल्य महाभाग वसुदेवसे ऐसा कहकर देवकीने बालकं सुषुवे तत्र निशीथे परमाद्भुतम् । तं दृष्ट्वा विस्मयं प्राप देवकी बालकं शुभम् पतिं प्राह महाभागा हर्षोत्फुल्लकलेवरा पश्य पुत्रमुखं कान्त दुर्लभं हि तव प्रभो
अद्यैनं कालरूपोऽसौ घातयिष्यति भ्रातृजः ।
वसुदेवस्तथेत्युक्त्वा तमादाय करे सुतम् ॥
अपश्यच्चाननं तस्य सुतस्याद्भुतकर्मणः वीक्ष्य पुत्रमुखं शौरिश्चिन्ताविष्टो बभूव ह
किं करोमि कथं न स्याद्दुःखमस्य कृते मम ।
एवं चिन्तातुरे तस्मिन्वागुवाचाशरीरिणी ॥
वसुदेवं समाभाष्य गगने विशदाक्षरा ।
वसुदेव गृहीत्वैनं गोकुलं नय सत्वरः ॥
रक्षपालास्तथा सर्वे मया निद्राविमोहिताः । विवृतानि कृतान्यष्ट कपाटानि च शृङ्खलाः मुक्त्वैनं नन्दगेहे त्वं योगमायां समानय । 1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] —17 B उसी अर्धरात्रिकी शुभ वेलामें एक परम अद्भुत बालकको जन्म दिया । उस सुन्दर बालकको देखकर ॥ २१ देवकीको महान् आश्चर्य हुआ ॥ २०-२१ ॥ [ पुत्रप्राप्तिके कारण ] हर्षातिरेकसे प्रफुल्लित | अंग - प्रत्यंगोंवाली महाभागा देवकीने पतिसे कहा-॥ २२ हे कान्त! अपने पुत्रका मुख तो देख लीजिये; क्योंकि हे प्रभो! इसका दर्शन आपके लिये फिर सर्वथा दुर्लभ हो जायगा । कालरूपी मेरा भाई कंस आज ही इसका २३ वध कर डालेगा । तब ' ठीक है ' - ऐसा कहकर वसुदेवजी उस पुत्रको अपने हाथोंमें लेकर अद्भुत कर्मशाली । अपने उस पुत्रका मुख निहारने लगे । तत्पश्चात् अपने ॥ २४ पुत्रका मुख देखकर वसुदेवजी इस चिन्तासे आकुल हो गये कि मैं कौन - सा उपाय करूँ, जिससे इस बालकके लिये मुझे विषाद न हो ॥ २२ - २४३ ॥ २५ वसुदेवजीके इस प्रकार चिन्तामग्न होनेपर उन्हें सम्बोधित करके आकाशमें स्पष्ट शब्दोंमें आकाश-वाणी हुई— हे वसुदेव! तुम इस बालकको लेकर २६ तत्काल गोकुल पहुँचा दो । सभी रक्षकगण मेरे द्वारा निद्रा अचेत कर दिये गये हैं, आठों फाटकों को खोल दिया गया है तथा जंजीरें तोड़ दी गयी हैं । इस ॥ २७ बालकको नन्दके घर छोड़कर वहाँसे तुम योगमायाको उठा लाओ ॥ २५-२७३ ॥
पृष्ठ 524
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० २३ ] चतुर्थ स्कन्ध ५१५ श्रुत्वैवं वसुदेवस्तु तस्मिन्कारागृहे गतः ॥
विवृतं द्वारमालोक्य बभूव तरसा नृप ।
तमादाय ययावाशु द्वारपालैरलक्षितः ॥
कालिन्दीतटमासाद्य पूरं दृष्ट्वा सुनिश्चितम् ।
तदैव कटिदघ्नी सा बभूवाशु सरिद्वरा ॥
योगमायाप्रभावेण ततारानकदुन्दुभिः ।
गत्वा तु गोकुलं शौरिर्निशीथे निर्जने पथि ॥
नन्दद्वारे स्थितः पश्यन्विभूतिं पशुसंज्ञिताम् ।
तदैव तत्र सञ्जाता यशोदा गर्भसम्भवा ॥
योगमायांशजा देवी त्रिगुणा दिव्यरूपिणी ।
जातां तां बालिकां दिव्यां गृहीत्वा करपङ्कजे ॥
तत्रागत्य ददौ देवी सैरन्ध्रीरूपधारिणी ।
वसुदेवः सुतं दत्त्वा सैरन्ध्रीकरपङ्कजे ॥
तामादाय ययौ शीघ्रं बालिकां मुदिताशयः ।
कारागारे ततो गत्वा देवक्याः शयने सुताम् ॥
निःक्षिप्य संस्थितः पार्श्वे चिन्ताविष्टो भयातुरः ।
रुरोद सुस्वरं कन्या तदैवागतसंज्ञकाः ॥
उत्तस्थुः सेवका राज्ञः श्रुत्वा तद्रुदितं निशि ।
तमूचुर्भूपतिं गत्वा त्वरितास्तेऽतिविह्वलाः ॥
देवक्याश्च सुतो जातः शीघ्रमेहि महामते ।
तदाकर्ण्य वचस्तेषां शीघ्रं भोजपतिर्ययौ ॥
प्रावृतं द्वारमालोक्य वसुदेवमथाह्वयत् । २८ यह वाणी सुनकर उस कारागृहमें निरुद्ध वसुदेवजी बाहरकी ओर गये । हे राजन्! इस प्रकार वसुदेवजी फाटकोंको खुला हुआ देखकर बड़ी शीघ्रतापूर्वक २ ९ उस बालकको लेकर द्वारपालोंकी दृष्टिसे बचते हुए तत्काल कारागारसे निकल पड़े ॥ २८-२९ ॥ यमुनाके किनारे पहुँचकर उन्होंने देखा कि इस पारसे उस पार अगाध जल आप्लावित हो रहा है । ३० उनका गोकुल जाना भी सुनिश्चित था । उनके जलमें उतरते ही नदियोंमें श्रेष्ठ यमुनाजीमें कमरभर पानी हो गया ॥ ३० ॥
३१ योगमायाके प्रभावसे वसुदेवजीने सहजता -पूर्व यमुनाजीको पार कर लिया और वे उस आधी रातमें सुनसान मार्गपर चलते हुए गोकुलमें पहुँचकर नन्दके द्वारपर विपुल गौ- सम्पदा देखते हुए वहाँ ३२ स्थित हो गये ॥ ३१३ ॥
उसी समय योगमायाके अंशसे जायमान दिव्यरूपमयी त्रिगुणात्मिका भगवतीने यशोदाके गर्भसे ३३ अवतार लिया था । तदनन्तर सैरन्ध्रीका रूप धारण करके स्वयं भगवतीने उत्पन्न उस अलौकिक बालिकाको अपने करकमलमें ग्रहण करके वहाँ ३४ जाकर वसुदेवजीको दे दिया । वसुदेवजी भी अपने पुत्रको देवीरूपा सैरन्ध्रीके करकमलमें रखकर योगमायास्वरूपा उस बालिकाको लेकर प्रसन्नतापूर्वक वहाँसे तत्काल चल पड़े॥३२–३४३ ॥ ३५ कारागारमें पहुँचकर उन्होंने देवकीकी शय्यापर बालिकाको लिटा दिया और भय तथा चिन्तासे युक्त होकर वे पासहीमें एक ओर जाकर बैठ गये ॥ ३५३ १ ॥ ३६ इतनेमें कन्याने उच्च स्वरमें रोना आरम्भ किया । तब प्रसवकालको सूचित करनेके लिये नियुक्त कंसके सेवकगण रातमें रोनेकी वह ध्वनि सुनकर जाग ३७ पड़े । आनन्दसे विह्वल वे सेवक तत्काल उसी समय जाकर राजासे बोले - हे महामते! देवकीका पुत्र उत्पन्न हो गया, आप शीघ्र चलिये ॥ ३६-३७३ ॥ उनका यह वचन सुनते ही भोजपति कंस ३८ तत्काल जा पहुँचा और वहाँपर दरवाजा खुला हुआ देखकर कंसने वसुदेवजीको बुलवाया ॥ ३८३ ॥
1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] - 17 C
पृष्ठ 525
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५१६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २३ कंस उवाच सुतमानय देवक्या वसुदेव महामते ॥ मुत्युर्मे चाष्टमो गर्भस्तन्निहन्मि रिपुं हरिम् । व्यास उवाच श्रुत्वा कंसवचः शौरिर्भयत्रस्तविलोचनः ॥
तामादाय सुतां पाणौ ददौ चाशु रुदन्निव ।
दृष्ट्वाथ दारिकां राजा विस्मयं परमं गतः ॥
देववाणी वृथा जाता नारदस्य च भाषितम् ।
वसुदेवः कथं कुर्यादनृतं सङ्कटे स्थितः ॥
रक्षपालाश्च मे सर्वे सावधाना न संशयः ।
कुतोऽत्र कन्यका कामं क्व गतः स सुतः किल ॥
सन्देहोऽत्र न कर्तव्यः कालस्य विषमा गतिः ।
इति सञ्चिन्त्य तां बालां गृहीत्वा पादयोः खलः ॥
पोथयामास पाषाणे निर्घृणः कुलपांसनः ।
सा करान्निःसृता बाला ययावाकाशमण्डलम् ॥
दिव्यरूपा तदा भूत्वा तमुवाच मृदुस्वना ।
किं मया हतया पाप जातस्ते बलवान् रिपुः ॥
हनिष्यति दुराराध्यः सर्वथा त्वां नराधमम् ।
इत्युक्त्वा सा गता कन्या गगनं कामगा शिवा ॥
कंसस्तु विस्मयाविष्टो गतो निजगृहं तदा ।
आनाय्य दानवान्सर्वानिदं वचनमब्रवीत् ॥
बकधेनुकवत्सादीन्क्रोधाविष्टो भयातुरः ।
गच्छन्तु दानवाः सर्वे मम कार्यार्थसिद्धये ॥
जातमात्राश्च हन्तव्या बालका यत्र कुत्रचित् ।
पूतनैषा व्रजत्वद्य बालघ्नी नन्दगोकुलम् ॥
जातमात्रान्विनिघ्नन्ती शिशूंस्तत्र ममाज्ञया ।
धेनुको वत्सकः केशी प्रलम्बो बक एव च ॥
सर्वे तिष्ठन्तु तत्रैव मम कार्यचिकीर्षया । 1897 श्रीमद्देवी..... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] -17 D कंस बोला - हे महामतिसम्पन्न वसुदेव! देवकीके ३ ९ पुत्रको यहाँ ले आओ । देवकीका आठवाँ गर्भ मेरी मृत्यु है, अतः मैं उस विष्णुरूप अपने शत्रुका वध करूँगा ॥ ३ ९ ३ ॥ व्यासजी बोले – कंसका वचन सुनकर ४० भयसे सन्त्रस्त नयनोंवाले वसुदेवजीने शीघ्र ही उस कन्याको ले जाकर कंसके हाथोंमें रोते हुए रख दिया । उस बालिकाको देखकर राजा कंस बड़ा ४१ विस्मित हुआ ॥ ४०-४१ ॥ आकाशवाणी तथा नारदजीका वचन - दोनों ही मिथ्या सिद्ध हुए और यहाँ संकटकी स्थितिमें ४२ पड़ा हुआ यह वसुदेव भी झूठी बात भला कैसे बना सकता है? मेरे सभी रक्षक भी सावधान थे; इसमें कोई सन्देह नहीं है । तब यह बालिका कहाँसे आ गयी और ४३ वह बालक कहाँ चला गया? कालकी बड़ी विषम गति होती है, अतएव इसके सम्बन्धमें अब किसी प्रकारका सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ ४२-४३३ ॥ ४४ ऐसा सोचकर उस दुष्ट, निर्मम तथा कुलकलंकी कंसने बालिकाके दोनों पैर पकड़कर पत्थरपर पटका । किंतु वह कन्या कंसके हाथसे छूटकर आकाशमें ४५ चली गयी । वहाँ दिव्य रूप धारण करके उस कन्याने मधुर स्वरमें उससे कहा - ' अरे पापी! मुझे मारनेसे ४६ तुम्हारा क्या लाभ होगा; तेरा महाबलशाली शत्रु तो जन्म ले चुका है । वे दुराराध्य परमपुरुष तुझ नराधमका वध अवश्य करेंगे । ' ऐसा कहकर स्वेच्छा-४७ विहारिणी तथा कल्याणकारिणी भगवतीस्वरूपा वह कन्या आकाशमें चली गयी ॥ ४४-४७ ॥ यह सुनकर आश्चर्यसे युक्त कंस अपने महलके ४८ लिये प्रस्थान कर गया । वहाँ बकासुर, धेनुकासुर तथा वत्सासुर आदि दानवोंको बुलवाकर अत्यन्त कुपित तथा भयाक्रान्त कंसने उनसे कहा- हे दानवो! मेरा ४ ९ कार्य सिद्ध करनेके लिये तुम सभी यहाँसे अभी प्रस्थान करो और जहाँ कहीं भी तुमलोगोंको नवजात शिशु मिलें, उन्हें अवश्य मार डालना । बालघातिनी ५० यह पूतना अभी नन्दराजके गोकुलमें चली जाय । वहाँ सद्यःप्रसूत जितने बालक मिलें, उन्हें यह पूतना मेरी आज्ञासे मार डाले । धेनुक, वत्सक, केशी, प्रलम्ब ५१ और बक- ये समस्त असुर मेरा कार्य सिद्ध करनेकी इच्छासे वहाँ निरन्तर विद्यमान रहें ॥ ४८ - ५१३ ॥
पृष्ठ 526
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० २४ ] चतुर्थ स्कन्ध ५१७ इत्याज्ञाप्यासुरान्कंसो ययौ निजगृहं खलः ॥ ५२ इस प्रकार सभी दैत्योंको आदेश देकर वह दुष्ट कंस अपने भवनमें चला गया । अपने शत्रुरूप उस बालकके विषयमें बार- बार सोचकर वह अत्यन्त चिन्ताविष्टोऽतिदीनात्मा चिन्तयित्वैव तं पुनः ॥ ५३ चिन्तातुर तथा खिन्नमनस्क हो गया ॥ ५२-५३ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे कंसं प्रति योगमायावाक्यं नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥
अथ चतुर्विंशोऽध्यायः श्रीकृष्णावतारकी संक्षिप्त कथा, कृष्णपुत्रका प्रसूतिगृहसे हरण, कृष्णद्वारा भगवतीकी स्तुति, भगवती चण्डिकाद्वारा सोलह व्यास उवाच
प्रातर्नन्दगृहे जातः पुत्रजन्ममहोत्सवः ।
किंवदन्त्यथ कंसेन श्रुता चारमुखादपि ॥ १
जानाति वसुदेवस्य दारास्तत्र वसन्ति हि ।
पशवो दासवर्गश्च सर्वे ते नन्दगोकुले ॥ २
तेन शङ्कासमाविष्टो गोकुलं प्रति भारत ।
नारदेनापि तत्सर्वं कथितं कारणं पुरा ॥ ३
गोकुले ये च नन्दाद्यास्तत्पत्न्यश्च सुरांशजाः ।
देवकीवसुदेवाद्याः सर्वे ते शत्रवः किल ॥ ४
इति नारदवाक्येन बोधितोऽसौ कुलाधमः ।
जातः कोपमना राजन् कंसः परमपापकृत् ॥ ५
पूतना निहता तत्र कृष्णेनामिततेजसा ।
बको वत्सासुरश्चापि धेनुकश्च महाबलः ॥ ६
प्रलम्बो निहतस्तेन तथा गोवर्धनो धृतः ।
श्रुत्वैतत्कर्म कंसस्तु मेने मरणमात्मनः ॥ ७
तथा विनिहतः केशी ज्ञात्वा कंसोऽतिदुर्मनाः ।
धनुर्यागमिषेणाशु तावानेतुं प्रचक्रमे ॥ ८
वर्षके बाद पुनः पुत्रप्राप्तिका वर देना व्यासजी बोले - – [ हे राजन्! ] प्रातः काल नन्दजीके घरमें पुत्रजन्मका बड़ा भारी समारोह सम्पन्न हुआ, यह बात चारों ओर फैल गयी और कंसने भी किसी दूतके मुखसे यह सुन लिया ॥ १ ॥
कंस यह पहलेसे ही जानता था कि वसुदेवकी अन्य भार्या, पशु तथा सेवकगण- - सब - के - सब गोकुलमें नन्दके यहाँ रह रहे हैं । हे भारत! इस कारण से गोकुलके प्रति कंसका सन्देह और बढ़ गया । नारदजीने भी सभी कारण पहले ही बता दिये थे । उन्होंने कह दिया था कि गोकुलमें नन्द आदि गोप, उनकी पत्नियाँ, देवकी तथा वसुदेव आदि जो भी लोग हैं, वे सब देवताओंके अंशसे उत्पन्न हुए हैं; इसलिये वे निश्चितरूपसे तुम्हारे शत्रु हैं ॥ २-४ ॥ हे राजन्! देवर्षि नारदने जब यह बात बतायी थी तो बड़े - से - बड़े पापकर्मोंमें प्रवृत्त रहनेवाला वह कुलकलंकी कंस अत्यधिक कुपित हो गया था ॥ ५ ॥
अपरिमित तेजवाले श्रीकृष्णने पूतना, बकासुर, वत्सासुर, महाबली धेनुकासुर तथा प्रलम्बासुरको मार डाला और गोवर्धनपर्वतको उठा लिया - इस अद्भुत कर्मको सुनकर कंसने यह अनुमान लगा लिया कि मेरा भी मरण अब सुनिश्चित है ॥ ६-७ ॥ [ महान् बलशाली ] केशी भी मार डाला गया— यह जानकर कंस अत्यधिक खिन्नमनस्क हो गया, तब उसने धनुष - यज्ञके बहाने [ कृष्ण तथा बलराम ] । दोनोंको शीघ्र ही मथुरामें बुलानेकी योजना बनायी ॥ ८ ॥
पृष्ठ 527
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५१८ अक्रूरं प्रेषयामास क्रूरः पापमतिस्तदा आनेतुं रामकृष्णौ च वधायामितविक्रमौ रथमारोप्य गोपालौ गोकुलाद् गान्दिनीसुतः आगतो मथुरायां तु कंसादेशे स्थितः किल तावागत्य तदा तत्र धनुर्भङ्गञ्च चक्रतुः । हत्वाथ रजकं कामं गजं चाणूरमुष्टिकम्
शलं च तोशलं चैव निजघान हरिस्तदा ।
जघान कंसं देवेशः केशेष्वाकृष्य लीलया ॥
पितरौ मोचयित्वाथ गतदुःखौ चकार ह । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २४ । निर्दयी तथा पापबुद्धि कंसने असीम पराक्रमी ॥ ९ श्रीकृष्ण तथा बलरामका वध करनेके उद्देश्यसे उन्हें बुलानेके लिये अक्रूरको भेजा ॥ ९ ॥
। तदनन्तर कंसका आदेश मानकर गान्दिनीपुत्र अक्रूर गोकुल गये और दोनों गोपालों- श्रीकृष्ण तथा ॥ १० बलरामको रथपर बैठाकर गोकुलसे मथुरा लौट आये ॥१० ॥
वहाँ पहुँचकर श्रीकृष्ण तथा बलरामने धनुषको ॥ ११ तोड़ा । पुनः रजक, कुवलयापीड हाथी, चाणूर और मुष्टिकका संहार करके भगवान् श्रीकृष्णने शल तथा तोशलका वध किया । तत्पश्चात् देवेश श्रीकृष्णने कंसके बाल पकड़कर लीलापूर्वक उसको भी मार १२ डाला ॥ ११-१२ ॥ तदनन्तर शत्रुविनाशक श्रीकृष्णने अपने माता-पिताको कारागारसे मुक्त कराकर उनका कष्ट दूर किया उग्रसेनाय राज्यं तद्ददावरिनिषूदनः ॥ १३ और उग्रसेनको उनका राज्य वापस दिला दिया ॥ १३ ॥।
वसुदेवस्तयोस्तत्र मौञ्जीबन्धनपूर्वकम् ।
कारयामास विधिवद् व्रतबन्धं महामनाः ॥
उपनीतौ तदा तौ तु गतौ सान्दीपनालयम् ।
विद्याः सर्वाः समभ्यस्य मथुरामागतौ पुनः ॥
जातौ द्वादशवर्षीयौ कृतविद्यौ महाबलौ ।
मथुरायां स्थितौ वीरौ सुतावानकदुन्दुभेः ॥
मागधस्तु जरासन्धो जामातृवधदुःखितः ।
कृत्वा सैन्यसमाजं स मथुरामागतः पुरीम् ॥
स सप्तदशवारं तु कृष्णेन कृतबुद्धिना ।
जितः संग्राममासाद्य मधुपुर्यां निवासिना ॥
पश्चाच्च प्रेरितस्तेन स कालयवनाभिधः ।
सर्वम्लेच्छाधिपः शूरो यादवानां भयङ्करः ॥
तदनन्तर महामना वसुदेवने उन दोनोंका मौंजी-बन्धन तथा उपनयन- संस्कार विधिपूर्वक सम्पन्न १४ करवाया ॥ १४ ॥
उपनयन संस्कार हो जानेके पश्चात् वे दोनों सान्दीपनिऋषिके आश्रम में विद्याध्ययनके लिये गये और समस्त विद्याओंका अध्ययन करके पुनः १५ मथुरा लौट आये ॥ १५ ॥
आनकदुन्दुभि ( वसुदेवजी ) - के पुत्र कृष्ण और बलराम बारह वर्षकी अवस्थामें ही सम्पूर्ण विद्याओंमें १६ निष्णात तथा महान् बलशाली होकर मथुरामें ही निवास करने लगे ॥ १६ ॥
उधर अपने जामाता कंसके वधसे मगधनरेश जरासन्ध अत्यन्त दुःखित हुआ और उसने विशाल १७ सेना संगठितकर मथुरापुरीपर आक्रमण कर दिया ॥ १७ ॥
किंतु मधुपुरी ( मथुरा ) -में निवास करनेवाले बुद्धिमान् श्रीकृष्णने समरांगणमें उपस्थित होकर सत्रह १८ बार उसे पराजित किया ॥ १८ ॥
इसके बाद जरासन्धने यादव - समुदाय के लिये भयदायक तथा सम्पूर्ण म्लेच्छोंके अधिपति कालयवन नामक योद्धाको श्रीकृष्णका सामना करनेके लिये १ ९ । प्रेरित किया ॥ १ ९ ॥
पृष्ठ 528
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० २४ ] श्रुत्वा यवनमायान्तं कृष्णः सर्वान् यदूत्तमान् आनाय्य च तथा राममुवाच मधुसूदनः भयं नोऽत्र समुत्पन्नं जरासन्धान्महाबलात् किं कर्तव्यं महाभाग यवनः समुपैति वै प्राणत्राणं प्रकर्तव्यं त्यक्त्वा गेहं बलं धनम् सुखेन स्थीयते यत्र स देशः खलु पैतृकः सदोद्वेगकरः कामं किं कर्तव्यः कुलोचितः शैलसागरसान्निध्ये स्थातव्यं सुखमिच्छता यत्र वैरिभयं न स्यात्स्थातव्यं तत्र पण्डितैः शेषशय्यां समाश्रित्य हरिः स्वपिति सागरे तथैव च भयाद्भीतः कैलासे त्रिपुरार्दनः तस्मान्नात्रैव स्थातव्यमस्माभिः शत्रुतापितैः द्वारवत्यां गमिष्यामः सहिताः सर्व एव वै कथिता गरुडेनाद्य रम्या द्वारवती पुरी रैवताचलसान्निध्ये सिन्धुकूले मनोहरा व्यास उवाच तच्छ्रुत्वा वचनं तथ्यं सर्वे यादवपुङ्गवाः गमनाय मतिं चक्रुः सकुटुम्बाः सवाहनाः शकटानि तथोष्ट्राश्च वाम्यश्च महिषास्तथा धनपूर्णानि कृत्वा ते निर्ययुर्नगराद् बहिः रामकृष्णौ पुरस्कृत्य सर्वे ते सपरिच्छदाः अग्रे कृत्वा प्रजाः सर्वाश्चेलुः सर्वे यदूत्तमाः कतिचिद्दिवसैः प्रापुः पुरीं द्वारवतीं किल शिल्पिभिः कारयामास जीर्णोद्धारं हि माधवः संस्थाप्य यादवांस्तत्र तावेतौ बलकेशवौ ५१ ९ । कालयवनको आता सुनकर मधुसूदन श्रीकृष्णने ॥ २० सभी प्रसिद्ध यादवों तथा बलरामको बुलाकर कहा— महाबलशाली जरासन्धसे हमलोगोंको यहाँ बराबर । भय बना हुआ है । [ उसीकी प्रेरणासे ] कालयवन ॥ २१ यहाँ आ रहा है । हे महाभाग! ऐसी स्थितिमें हमलोगों को क्या करना चाहिये? ॥ २०-२१ ॥ । इस समय घर, सेना और धन छोड़कर हमें प्राण ॥ २२ बचा लेना चाहिये । जहाँ भी सुखपूर्वक रहनेका प्रबन्ध हो जाय, वही पैतृक देश होता है ॥ २२ ॥
। इसके विपरीत उत्तम कुलके निवास करनेयोग्य ॥ २३ पैतृक भूमिमें भी यदि सदा अशान्ति बनी रहती हो तो ऐसे स्थानपर रहनेसे क्या लाभ? अतः सुखकी । कामना करनेवालेको पर्वत या समुद्रके पास निवास ॥। २४ कर लेना चाहिये ॥ २३ ॥
जिस स्थानपर शत्रुओंका भय नहीं रहता, । ऐसे स्थानपर ही विज्ञजनोंको रहना चाहिये । भगवान् ॥ २५ विष्णु शेषशय्याका आश्रय लेकर समुद्रमें शयन करते हैं और इसी प्रकार त्रिपुरदमन भगवान् शंकर भी । कैलासपर्वतपर निवास करते हैं । अतएव शत्रुओं द्वारा ॥ २६ । निरन्तर सन्तप्त किये गये हमलोगोंको अब यहाँ नहीं रहना चाहिये । अब हम सभी लोग एक साथ । द्वारकापुरी चलेंगे । गरुडने मुझसे बताया है कि द्वारकापुरी अत्यन्त रमणीक तथा मनोहर है, जो समुद्रके तटपर ॥ २७ तथा रैवतपर्वतके समीप विराजमान है ॥ २४–२६ 11 व्यासजी बोले- श्रीकृष्णकी यह युक्तिपूर्ण । बात सुनकर सभी श्रेष्ठ यादवोंने अपने परिवारजनों ॥ २८ तथा वाहनोंके साथ जानेका निश्चय कर लिया । गाड़ियों, ऊँटों, घोड़ियों और भैंसोंपर धन - सामग्री । लादकर तथा श्रीकृष्ण और बलरामको आगे करके ॥ २ ९ वे सभी यादवश्रेष्ठ अपने परिजनोंको साथ लेकर नगरसे बाहर हो गये । समस्त प्रजाजनोंको आगे - आगे । करके सभी श्रेष्ठ यादव चल पड़े । वे सब कुछ ही ॥ ३० दिनोंमें द्वारकापुरी पहुँच गये॥२७-३० ॥ श्रीकृष्णने कुशल शिल्पकारोंसे द्वारकापुरीका । जीर्णोद्धार कराया, सभी यादवोंको वहाँ बसाकर वे ॥ ३१ । श्रीकृष्ण और बलराम तत्काल मथुरा लौटकर उस
पृष्ठ 529
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५२० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २४
तरसा मथुरामेत्य संस्थितौ निर्जनां पुरीम् ।
तदा तत्रैव सम्प्राप्तो बलवान् यवनाधिपः ॥
ज्ञात्वैनमागतं कृष्णो निर्ययौ नगराद् बहिः ।
पदातिरग्रे तस्याभूद्यवनस्य जनार्दनः ॥
पीताम्बरधरः श्रीमान्प्राहसन्मधुसूदनः ।
तं दृष्ट्वा पुरतो यान्तं कृष्णं कमललोचनम् ॥
यवनोऽपि पदातिः सन्पृष्ठतोऽनुगतः खलः ।
प्रसुप्तो यत्र राजर्षिर्मुचुकुन्दो महाबलः ॥
प्रययौ भगवांस्तत्र सकालयवनो हरिः ।
तत्रैवान्तर्दधे विष्णुर्मुचुकुन्दं समीक्ष्य च ॥
तत्रैव यवनः प्राप्तः सुप्तभूतमपश्यत ।
मत्वा तं वासुदेवं स पादेनाताडयन्नृपम् ॥
प्रबुद्धः क्रोधरक्ताक्षस्तं ददाह महाबलः ।
तं दग्ध्वा मुचुकुन्दोऽथ ददर्श कमलेक्षणम् ॥
वासुदेवं सुदेवेशं प्रणम्य प्रस्थितो वनम् ।
जगाम द्वारकां कृष्णो बलदेवसमन्वितः ॥
उग्रसेनं नृपं कृत्वा विजहार यथारुचि ।
अहरद्रुक्मिणीं कामं शिशुपालस्वयंवरात् ॥
राक्षसेन विवाहेन चक्रे दारविधिं हरिः ।
ततो जाम्बवतीं सत्यां मित्रविन्दाञ्च भामिनीम् ॥
कालिन्दीं लक्ष्मणां भद्रां तथा नाग्नजितीं शुभाम् ।
पृथक्पृथक्समानीयाप्युपयेमे जनार्दनः ॥
अष्टावेव महीपाल पत्न्यः परमशोभनाः ।
प्रासूत रुक्मिणी पुत्रं प्रद्युम्नं चारुदर्शनम् ॥
जातकर्मादिकं तस्य चकार मधुसूदनः ।
हृतोऽसौ सूतिकागेहाच्छम्बरेण बलीयसा ॥
नीतश्च स्वपुरीं बालो मायावत्यै समर्पितः । निर्जन पुरीमें रहने लगे । उसी समय शक्तिशाली ३२ कालयवन भी वहाँ आ गया । कालयवनको आया जानकर वे पीताम्बरधारी तथा ऐश्वर्यसम्पन्न मधुसूदन भगवान् जनार्दन नगरसे बाहर निकल पड़े और जोर-३३ जोर हँसते हुए उसके आगे - आगे पैदल ही चलने लगे ॥ ३१-३३३ ॥॥ उन कमललोचन श्रीकृष्णको अपने आगे जाता ३४ देखकर वह दुष्ट कालयवन उनके पीछे - पीछे पैदल ही चलता रहा । तत्पश्चात् भगवान् श्रीकृष्ण कालयवनसहित वहाँ पहुँच गये, जहाँ महाबली ३५ राजर्षि मुचुकुन्द शयन कर रहे थे । मुचुकुन्दको देखकर भगवान् कृष्ण वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ ३४-३६ ॥ वह कालयवन भी वहीं पहुँच गया । उसने देखा ३६ कि कोई सो रहा है । राजर्षि मुचुकुन्दको कृष्ण समझकर कालयवनने उनके ऊपर पैरसे प्रहार किया ॥ ३७ ॥
[ कालयवनद्वारा पाद - प्रहार किये जानेसे ] वे ३७ जग गये और क्रोधसे आँखें लाल किये हुए महाबली मुचुकुन्दने [ उसकी ओर दृष्टिपात करके ] उसे भस्म कर दिया । उसे जलानेके बाद मुचुकुन्दने अपने समक्ष ३८ कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णको उपस्थित देखा । तदनन्तर देवाधिदेव वासुदेवको प्रणाम करके वे वनकी ३ ९ ओर प्रस्थान कर गये । भगवान् श्रीकृष्ण भी बलरामको साथ लेकर द्वारकापुरी चले गये ॥ ३८-३९ ॥ इस प्रकार उग्रसेनको पुनः राजा बनाकर वे ४० इच्छापूर्वक विहार करने लगे । इसके बाद शिशुपालके साथ रुक्मिणीके सुनिश्चित किये गये विवाहहेतु आयोजित स्वयंवरसे भगवान् श्रीकृष्णने रुक्मिणीका हरण कर ४१ लिया और उसके साथ राक्षसविधिसे विवाह कर लिया । तत्पश्चात् जाम्बवती, सत्यभामा, मित्रविन्दा, कालिन्दी, लक्ष्मणा, भद्रा तथा नाग्नजिती - इन दिव्य सुन्दरियोंको ४२ बारी - बारीसे ले आकर श्रीकृष्णने उनके साथ भी पाणिग्रहण किया । हे भूपाल! श्रीकृष्णकी ये ही परम सुन्दर आठ पत्नियाँ थीं । इनमें रुक्मिणीने देखनेमें परम ४३ सुन्दर पुत्र प्रद्युम्नको जन्म दिया॥४०–४३ ॥ मधुसूदन भगवान् श्रीकृष्णने उस बालकके जातकर्म आदि संस्कार किये । महाबली शम्बरासुरने ४४ प्रसवगृहसे उस बालकका हरण कर लिया और उसे अपनी नगरीमें ले जाकर मायावतीको सौंप दिया ॥ ४४३ ॥
पृष्ठ 530
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० २४ ] चतुर्थ वासुदेवो हृतं दृष्ट्वा पुत्रं शोकसमन्वितः ॥ ४५
जगाम शरणं देवीं भक्तियुक्तेन चेतसा ।
वृत्रासुरादयो दैत्या लीलयैव यया हताः ॥ ४६
ततोऽसौ योगमायायाश्चकार परमां स्मृतिम् ।
वचोभिः परमोदारैरक्षरैः स्तवनैः शुभैः ॥ ४७
श्रीकृष्ण उवाच मातर्मयातितपसा परितोषिता त्वं प्राग्जन्मनि प्रसुमनादिभिरर्चितासि । धर्मात्मजेन बदरीवनखण्डमध्ये किं विस्मृतो जननि ते त्वयि भक्तिभावः ॥ ४८ सूतीगृहादपहृतः किमु बालको मे केनापि दुष्टमनसाप्यथ कौतुकाद्वा । मानापहारकरणाय ममाद्य नूनं लज्जा तवाम्ब खलु भक्तजनस्य युक्ता ॥ ४ ९ दुर्गे महानतितरां नगरी सुगुप्ता तत्रापि मेऽस्ति सदनं किल मध्यभागे । अन्तःपुरे च पिहितं ननु सूतिगेहं बालो हृतः खलु तथापि ममैव दोषात् ॥ ५० नाहं गतः परपुरं न च यादवाश्च रक्षावतीव नगरी किल वीरवर्यैः । माया तवैव जननि प्रकटप्रभावा मे बालकः परिहृतः कुहकेन केन ॥ ५१ नो वेद्मयहं जननि ते चरितं सुगुप्तं को वेद मन्दमतिरल्पविदेव देही । क्वासौ गतो मम भटैर्न च वीक्षितो वा हर्ताम्बिके जवनिका तव कल्पितेयम् ॥ ५२ स्कन्ध ५२१ उधर, अपने पुत्रका हरण देखकर शोक सन्तप्त वासुदेव श्रीकृष्णने भक्तिभावयुक्त हृदयसे उन भगवती योगमायाकी शरण ली, जिन्होंने वृत्रासुर आदि दैत्योंका लीलामात्रसे वध कर दिया था ॥ ४५-४६ ॥ तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण अत्यन्त सारगर्भित अक्षरों तथा वाक्योंसे युक्त मंगलमय स्तवनोंके द्वारा योगमायाका पुण्य स्मरण करने लगे ॥ ४७ ॥
श्रीकृष्ण बोले- हे माता! पूर्वकालमें मैंने धर्मपुत्र नारायणके रूपमें बदरिकाश्रममें घोर तपस्या करके तथा पुष्प आदिसे आपकी विधिवत् पूजा करके आपको प्रसन्न किया था । हे जननि! क्या अपने प्रति मेरे उस भक्तिभावको आपने विस्मृत कर दिया? ॥ ४८ ॥
किस कुत्सित हृदयवाले दुराचारीने प्रसूतिगृहसे मेरे पुत्रका हरण कर लिया? अथवा किसीने मेरा अभिमान दूर करनेके लिये कौतूहलवश यह प्रपंच रच दिया है । हे अम्ब! चाहे जो हो, किंतु आज अपने भक्तजनकी लाज रखना आपका परमोचित कर्तव्य है ॥ ४ ९ ॥ चारों ओर दुस्तर खाइयोंसे अति सुरक्षित मेरी नगरी है, उसमें भी मेरा भवन मध्य भागमें स्थित है और उस भवनके अन्तः पुरमें प्रसूतिगृह स्थित है, जिसके दरवाजे बन्द रहते हैं; फिर भी मेरे पुत्रका हरण हो गया । यह तो मेरे दोषके ही कारण हुआ ॥५० ॥
मैं द्वारकापुरी छोड़कर किसी अन्य नगरमें नहीं गया और यादवगण भी वहाँसे कहीं नहीं गये थे । महान् वीरोंके द्वारा नगरीकी पूर्ण सुरक्षा की गयी थी । हे माता! इसमें तो मुझे आपकी ही मायाका प्रत्यक्ष प्रभाव परिलक्षित हो रहा है, जिसकी प्रेरणा से किसी मायावीने मेरे पुत्रका हरण कर लिया है ॥ ५१ ॥
हे माता! जब मैं आपके अत्यन्त गुप्त चरित्रको नहीं जान पाया तो फिर मन्दबुद्धि तथा अल्पज्ञ ऐसा कौन प्राणी होगा, जो आपके चरित्रको जान सकता है । मेरे पुत्रका हरण करनेवाला कहाँ चला गया, जिसे मेरे सैनिक देखतक नहीं पाये, हे अम्बिके! यह आपकी ही रची हुई मायाका प्रभाव है ॥५२ ॥