देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 541–550
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 541–550
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५३२ यः सर्वात्मापि सर्वेशः सर्वसिद्धिप्रदः प्रभुः स कथं कृतवान्घोरं तपः प्राकृतवद्धरिः जगत्कर्तुं क्षमः कृष्णस्तथा पालयितुं क्षमः संहर्तुमपि कस्मात्स दारुणं तप आचरत् व्यास उवाच सत्यमुक्तं त्वया राजन् वासुदेवो जनार्दनः क्षमः सर्वेषु कार्येषु देवानां दैत्यसूदनः तथापि मानुषं देहमाश्रितः परमेश्वरः कृतवान्मानुषान्भावान्वर्णाश्रमसमाश्रितान् ॥ वृद्धानां पूजनं चैव गुरुपादाभिवन्दनम् ब्राह्मणानां तथा सेवा देवताराधनं तथा शोके शोकाभियोगश्च हर्षे हर्षसमुन्नतिः दैन्यं नानापवादाश्च स्त्रीषु कामोपसेवनम् ॥
कामः क्रोधस्तथा लोभः काले काले भवन्ति हि ।
तथा गुणमये देहे निर्गुणत्वं कथं भवेत् ॥
सौबलीशापजाद्दोषात्तथा ब्राह्मणशापजात् ।
निधनं यादवानां तु कृष्णदेहस्य मोचनम् ॥
हरणं लुण्ठनं तद्वत्तत्पत्नीनां नराधिप अर्जुनस्यास्त्रमोक्षे च क्लीबत्वं तस्करेषु च अज्ञत्वं हरणे गेहात्तत्प्रद्युम्नानिरुद्धयोः एवं मानुषदेहेऽस्मिन्मानुषं खलु चेष्टितम् विष्णोरंशावतारेऽस्मिन्नारायणमुनेस्तथा 1 अंशजे वासुदेवेऽत्र किं चित्रं शिवसेवने स हि सर्वेश्वरो देवो विष्णोरपि च कारणम् । सुषुप्तस्थाननाथः स विष्णुना च प्रपूजितः श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १ । सभी जीवोंकी आत्मा, सभीके ईश्वर और सभी ॥ १० प्रकारकी सिद्धियाँ देनेवाले हैं — उन भगवान् कृष्णने भी सामान्य प्राणियोंकी भाँति घोर तप क्यों किया? । भगवान् श्रीकृष्ण तो जगत्का सृजन, पालन तथा ॥ ११ संहार करनेमें समर्थ हैं; तब भी उन्होंने इतनी उग्र तपस्या किसलिये की? ॥ ९ - ११ ॥ व्यासजी बोले - हे राजन्! आपने सत्य कहा । है । दैत्यदमन भगवान् वासुदेव देवताओंके सभी कार्य ॥ १२ करनेमें समर्थ थे; फिर भी उन परमेश्वर श्रीकृष्णने मानव - देह धारण करनेके कारण वर्णाश्रमधर्मसे सम्बन्धित । मानवोचित कार्य सम्पादित किये थे । उन्होंने वृद्धजनोंकी १३ पूजा, गुरु - जनोंकी चरण - वन्दना, ब्राह्मणोंकी सेवा तथा देवताओंकी आराधना की । शोकके अवसरपर वे । शोकाकुल हुए तथा हर्षकी स्थितिमें हर्षित हुए । ॥ १४ । [ अवसरके अनुसार ] उन्होंने दीनताका प्रदर्शन किया, नानाविध लोकापवादोंको सहन किया तथा अपनी । स्त्रियोंके साथ लीला - विहार किया । जिस प्रकार १५ मानवमें समय - समयपर काम, क्रोध तथा लोभ होते रहते हैं, उसी प्रकारके भाव उनके भी मनमें जाग्रत् हुए; क्योंकि गुणमय देहमें निर्गुणत्व कैसे हो सकता १६ है? ॥१२–१६ ॥ ॥ सुबलसुता गान्धारी तथा ब्राह्मण अष्टावक्रके शापजनित दोषके कारण यादवोंका विनाश हुआ और १७ । भगवान् कृष्णको देह त्याग करना पड़ा ॥ १७ ॥
हे राजन्! उसी प्रकार उनकी स्त्रियोंका हरण । हुआ, उनका धन लूट लिया गया तथा अर्जुन उन ॥ १८ लुटेरोंपर अपना अस्त्र चलानेमें पुरुषार्थहीन हो गये ॥ १८ ॥
श्रीकृष्णको अपने घरसे प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध । हरणकी जानकारी नहीं हो पायी । इस प्रकार यह ॥ १ ९ मानव - शरीर पाकर उन्होंने साधारण प्राणीकी भाँति सभी मानवीय चेष्टाओंका प्रदर्शन किया ॥ १ ९ ॥ तब भगवान् विष्णुके अंशावतार तथा साक्षात् नारायणके अंशसे उत्पन्न इन श्रीकृष्णने यदि शिवजीकी ॥ २० उपासना की तो इसमें आश्चर्य क्या? ॥ २० ॥
वे प्रभु सबके ईश्वर हैं तथा विष्णुकी भी उत्पत्तिके कारण हैं । वे सुषुप्तस्थान ( कारण - देह ) -॥ २१ के स्वामी हैं । इसीलिये वे विष्णुके द्वारा भी पूजित
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अ ० [ १ ]
तदंशभूताः कृष्णाद्यास्तैः कथं न स पूज्यते ।
अकारो भगवान्ब्रह्माप्युकारः स्याद्धरिः स्वयम् ॥
मकारो भगवान् रुद्रोऽप्यर्धमात्रा महेश्वरी ।
उत्तरोत्तरभावेनाप्युत्तमत्वं स्मृतं बुधैः ॥
अतः सर्वेषु शास्त्रेषु देवी सर्वोत्तमा स्मृता ।
अर्धमात्रास्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषतः ॥
विष्णोरप्यधिको रुद्रो विष्णुस्तु ब्रह्मणोऽधिकः ।
तस्मान्न संशयः कार्यः कृष्णेन शिवपूजने ॥
इच्छया ब्रह्मणो वक्त्राद्वरदानार्थमुद्बभौ ।
मूलरुद्रस्यांशभूतो रुद्रनामा द्वितीयकः ॥
सोऽपि पूज्योऽस्ति सर्वेषां मूलरुद्रस्य का कथा ।
देवीतत्त्वस्य सान्निध्यादुत्तमत्वं स्मृतं शिवे ॥
अवतारा हरेरेवं प्रभवन्ति युगे युगे ।
योगमायाप्रभावेण नात्र कार्या विचारणा ॥
या नेत्रपक्ष्मपरिसञ्चलनेन सम्य-विश्वं सृजत्यवति हन्ति निगूढभावा । सैषा करोति सततं द्रुहिणाच्युतेशान् नानावतारकल परिभूयमानान् ॥ सूतीगृहाद् व्रजनमप्यनया नियुक्तं संगोपितश्च भवने पशुपालराज्ञः । सम्प्रापितश्च मथुरां विनियोजितश्च श्रीद्वारकाप्रणयने ननु भीतचित्तः ॥ पञ्चम स्कन्ध ५३३ हैं । कृष्ण आदि उन्हीं विष्णुके अंशसे अवतीर्ण हैं तब वे शिवकी पूजा क्यों नहीं करेंगे? ॐकारका ' अ ' २२ ब्रह्माका रूप है, ' उ ' विष्णुका रूप है, ' म् ' भगवान् शिवका रूप है और अर्धमात्रा ( चन्द्रबिन्दु ) भगवती महेश्वरीका रूप है । ये उत्तरोत्तर क्रमसे एक- दूसरेसे २३ उत्तम हैं - ऐसा विद्वानोंने कहा है ॥ २१–२३ ॥ अतएव समस्त शास्त्रोंमें देवी सर्वोत्तम मानी गयी हैं । वे भगवती बिन्दुरूप नित्य अर्धमात्रामें स्थित हैं, जो [ अर्धमात्रा ] विशेषरूपसे उच्चारित नहीं की २४ जा सकती ॥२४ ॥
ब्रह्माजीसे भी बढ़कर विष्णु तथा विष्णुसे भी बढ़कर भगवान् शिव हैं । अतः श्रीकृष्णद्वारा शिवकी २५ आराधनामें किसी प्रकारका सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ २५ ॥
सृजन - कार्यके लिये जब ब्रह्माजीने शिवकी उपासना की तब इच्छापूर्वक उन्हें वरदान देनेके लिये २६ शिवजी उन्हींके मुखसे प्रकट हो गये, जो मूलरुद्र कहलाये । पुनः उन मूलरुद्रके अंशसे द्वितीय रुद्र उत्पन्न हुए । वे रुद्रदेव भी सबके पूजनीय हैं तो फिर २७ मूलरुद्रके विषयमें कहना ही क्या? देवीतत्त्वके सांनिध्य में रहने के कारण ही शिवजीमें उत्तमता कही गयी है ॥ २६-२७ ॥ भगवती योगमायाके ही प्रभावसे प्रत्येक युगमें २८ भगवान् विष्णुके विभिन्न अवतार होते रहते हैं; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ २८ ॥
अत्यन्त निगूढ रहस्योंवाली जो भगवती अप्रत्यक्षरूपसे नेत्रकी पलक झपनेमात्रमें भलीभाँति जगत्की उत्पत्ति, पालन तथा संहार कर देती हैं; वे ही ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवको अनेकविध रूपोंमें २ ९- अवतार ग्रहण करनेमें निरन्तर दुःखोंसे व्याकुल करती रहती हैं ॥ २ ९ ॥ इन्हीं योगमायाके द्वारा श्रीकृष्णको प्रसूतिगृहसे निकालकर गोपराज नन्दके भवनमें पहुँचाकर उनकी रक्षा की गयी । वे योगमाया ही कंसके विनाशार्थ श्रीकृष्णको मथुरा ले गयीं । जरासन्धसे अत्यन्त भयाक्रान्त चित्तवाले श्रीकृष्णको द्वारका बनानेकी ३० । प्रेरणा भी उन्हीं भगवतीने दी ॥ ३० ॥
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५३४ निर्माय षोडशसहस्त्रशतार्धकास्ता नार्योऽष्टसम्मततराः स्वकलासमुत्थाः तासां विलासवशगं तु विधाय कामं दासीकृतो हि भगवाननयाप्यनन्तः ॥ एकापि बन्धनविधौ युवती समर्था पुंसो यथा सुदृढलोहमयं तु दाम । किं नाम षोडशसहस्त्रशतार्धकाश्च तं स्वीकृतं शुकमिवातिनिबन्धयन्ति ॥ सात्राजितीवशगतेन मुदान्वितेन
प्राप्तं सुरेन्द्रभवनं हरिणा तदानीम् ।
कृत्वा मृधं मघवता विहृतस्तरुणा-मीशः प्रियासदनभूषणतां य आप ॥
यो भीमजां हि हृतवाञ्छिशुपालकादी-ञ्जित्वा विधिं निखिलधर्मकृतो विधित्सुः । जग्राह तां निजबलेन च धर्मपत्नीं कोऽसौ विधिः परकलत्रहृतौ विजातः ॥
अहङ्कारवशः प्राणी करोति च शुभाशुभम् ।
विमूढो मोहजालेन तत्कृतेनातिपातिना ॥
अहङ्काराद्धि सञ्जातमिदं स्थावरजङ्गमम् ।
मूलाद्धरिहरादीनामुग्रात्प्रकृतिसम्भवात् ॥
अहङ्कारपरित्यक्तो यदा भवति पद्मजः ।
तदा विमुक्तो भवति नोचेत्संसारकर्मकृत् ॥
तन्मुक्तस्तु विमुक्तो हि बद्धस्तद्वशतां गतः ।
न नारी न धनं गेहं न पुत्रा न सहोदराः ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १ उन्होंने ही अपनी कला - शक्तिसे सोलह हजार पचास रानियों तथा आठ पटरानियोंकी रचना करके । पुनः भगवान् श्रीकृष्णको उनके विलासके वशीभूत करके उन अनन्त शक्तिसम्पन्न श्रीकृष्णको उनका ३१ वशवर्ती बना दिया ॥ ३१ ॥
केवल एक ही युवती अपने लौहमय सुदृढ़ पाशमें पुरुषको बाँध सकनेमें समर्थ है तो फिर जिसकी सोलह हजार पचास भार्याएँ हों उसके विषयमें क्या कहना? वे सब तो उस पुरुषको पालित तोतेकी भाँति अपनी इच्छाके अनुरूप नियन्त्रित कर ३२ ही सकती हैं ॥ ३२ ॥
सत्राजित्की पुत्री सत्यभामाके वशीभूत श्रीकृष्ण उसके कहनेपर प्रसन्नतापूर्वक इन्द्रके भवनमें पहुँच गये । वहाँपर इन्द्रके साथ युद्ध करके उन्होंने तरुराज कल्पवृक्ष छीन लिया और उससे अपनी प्रिया सत्यभामाके महलको सुशोभित किया ॥ ३३ ॥
३३ समस्त धार्मिक अनुष्ठानोंको विधिपूर्वक करनेकी इच्छावाले भगवान् श्रीकृष्णने शिशुपाल आदि वीरोंको जीतकर [ पूर्वतः वाग्दत्ता ] रुक्मिणीका हरण कर लिया और अपने बलके प्रभावसे उसे अपनी धर्मपत्नीके रूपमें ग्रहण किया । किसी दूसरेकी भार्या हरण करनेकी यह कौन - सी विधि ३४ निर्मित हो गयी? ॥ ३४ ॥
अत्यन्त दारुण अध: पतन करानेवाले मोहजालसे विमोहित तथा अहंकारके वशीभूत मनुष्य नानाविध शुभ तथा अशुभ कार्य करता है ॥३५ ॥
३५ मूलप्रकृतिजन्य उग्र अहंकारसे ही इस स्थावर-जंगमात्मक जगत्की उत्पत्ति हुई है और इसीसे विष्णु, शिव आदि देवोंका भी प्रादुर्भाव हुआ है ॥ ३६ ॥
३६ जब ब्रह्माजी पूर्णरूपसे अहंकारसे रहित होते हैं, तब वे सृष्टिके निर्माण - कार्यसे मुक्त हो जाते हैं; अन्यथा अहंकारके वशवर्ती होकर वे सृष्टि-रचनामें प्रवृत्त रहते हैं ॥ ३७ ॥
३७ उस अहंकारसे मुक्त प्राणी सांसारिक बन्धनसे छूट जाता है और उसके वशीभूत हुआ प्राणी सांसारिक बन्धनमें पड़ जाता है । हे राजन्! स्त्री, धन, ३८ | घर, पुत्र तथा सहोदर भाई – ये सब बन्धनके मूल
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अ ० १ ] पञ्चम स्कन्ध ५३५ बन्धनं प्राणिनां राजन्नहङ्कारस्तु बन्धकः अहं कर्ता मया चेदं कृतं कार्यं बलीयसा करिष्यामि करोम्येवं स्वयं बध्नाति प्राणभृत् कारणेन विना कार्यं न सम्भवति कर्हिचित् यथा न दृश्यते जातो मृत्पिण्डेन विना घटः विष्णुः पालयिता विश्वस्याहङ्कारसमन्वितः अन्यथा सर्वदा चिन्ताम्बुधौ मग्नः कथं भवेत् अहङ्कारविमुक्तस्तु यदा भवति मानवः अवतारप्रवाहेषु कथं मज्जेच्छुभाशयः मोहमूलमहङ्कारः संसारस्तत्समुद्भवः अहङ्कारविहीनानां न मोहो न च संसृतिः त्रिविधः पुरुषः प्रोक्तः सात्त्विको राजसस्तथा तामसस्तु महाराज ब्रह्मविष्णुशिवादिषु त्रिविधस्त्रिषु राजेन्द्र काजेशादिषु सर्वदा अहङ्कारः सदा प्रोक्तो मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः अहङ्कारेण तेनैव बद्धा एते न संशयः मायाविमोहिता मन्दाः प्रवदन्ति मनीषिणः करोति स्वेच्छया विष्णुरवताराननेकशः मन्दोऽपि दुःखगहने गर्भवासेऽतिसङ्कटे न करोति मतिं विद्वान्कथं कुर्यात्स चक्रभृत् ॥ । कारण नहीं हैं, अपितु अहंकार ही प्राणियोंके लिये ॥ ३ ९ बन्धनकारी वस्तु है । मैं ही कर्ता हूँ, यह कार्य मैंने अपने ही सामर्थ्यसे पूरा किया है, यह कार्य पूरा कर लूँगा, यह कार्य अभी कर लेता हूँ – इन भावनाओंके । कारण प्राणी स्वयं बँधता चला जाता है । कोई भी ॥ ४० कार्य बिना कारणके कदापि नहीं होता है, जैसे मिट्टी के पिण्डके बिना घड़ा न तो बन सकता है, न । दिखायी पड़ सकता है ॥ ३८- -४० ॥ जब भगवान् विष्णु अहंकारके वशवर्ती होते ॥ ४१ हैं तभी वे विश्वका पालन करनेमें समर्थ होते हैं । नहीं तो वे सदा [ सृष्टिपालनके ] चिन्तारूपी समुद्रमें । डूबे क्यों रहते? ॥ ४१३ ॥
॥ ४२ अहंकारमुक्त होकर यदि वे मनुष्यरूप ग्रहण करें तो निर्मलचित्त हुए वे अवतार - प्रवाहमें होनेवाले । ( सुख - दुःखादि ) - में कैसे डूबें - उतराएँ? ॥ ४२३ ॥
अहंकार ही अज्ञानका मूल कारण है तथा ॥ ४३ उसीसे इस जगत्की उत्पत्ति हुई है । अहंकारसे विहीन प्राणीको अज्ञानता तथा सांसारिक बन्धन - दोनों ही । नहीं होते ॥ ४३३ ॥
हे महाराज! इस जगत् में सत्त्वगुणी, रजोगुणी ॥ ४४ तथा तमोगुणी - ये तीन प्रकारके पुरुष कहे गये हैं । हे राजेन्द्र! सृष्टि, पालन तथा संहारकार्य सम्पन्न । करनेवाले ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि तीनों देवताओंमें ॥ ४५ भी ये तीन गुण सदा विद्यमान रहते हैं । तत्त्वदर्शी मुनियोंने अहंकारको ही जगत्की उत्पत्तिका परम । कारण बताया है । अतएव इसमें सन्देह नहीं है कि ये ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश भी उसी अहंकारसे आबद्ध ॥ ४६ हैं ॥ ४४–४६ ॥ मायासे विमोहित मन्द बुद्धिवाले कुछ । मनीषी कहते हैं कि भगवान् विष्णु अपनी इच्छासे ॥ ४७ नानाविध अवतार ग्रहण करते हैं, किंतु जब कोई मन्दमति प्राणी भी अतिशय दुःखप्रद गर्भमें निवास करना पसन्द नहीं करता तो फिर सर्वविद्या-। सम्पन्न वे चक्रधारी भगवान् विष्णु अवतार ग्रहण ४८ करना क्यों चाहेंगे? ॥ ४७-४८ ॥
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५३६ कौसल्यादेवकीगर्भे विष्ठामलसमाकुले स्वेच्छया प्रवदन्त्यद्धा गतो हि मधुसूदनः वैकुण्ठसदनं त्यक्त्वा गर्भवासे सुखं नु किम् चिन्ताकोटिसमुत्थाने दुःखदे विषसम्मिते
तपस्तप्त्वा क्रतून्कृत्वा दत्त्वा दानान्यनेकशः ।
न वाञ्छन्ति यतो लोका गर्भवासं सुदुःखदम् ॥
स कथं भगवान्विष्णुः स्ववशश्चेज्जनार्दनः ।
गर्भवासरुचिर्भूयाद्भवेत्स्ववशता यदि ॥
जानीहि त्वं महाराज योगमायावशे जगत् ।
ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं देवमानुषतिर्यगम् ॥
मायातन्त्रीनिबद्धा ये ब्रह्मविष्णुहरादयः ।
भ्रमन्ति बन्धमायान्ति लीलया चोर्णनाभवत् ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २ । कुछ लोग कहते हैं कि भगवान् विष्णु अपनी ॥ ४ ९ इच्छासे कौसल्या तथा देवकीके मल - मूत्रसे परिपूर्ण गर्भमें आये थे । किंतु वैकुण्ठ - भवन छोड़कर करोड़ों चिन्ताओंके आगार विषतुल्य दुःखदायक । गर्भवासमें आनेसे उन्हें कौन - सा सुख प्राप्त हुआ ॥ ५० होगा? ॥ ४ ९ -५० ॥ जब साधारण प्राणी भी तपस्या करके, विविध प्रकारके यज्ञ सम्पन्न करके तथा नाना प्रकारके दान ५१ देकर अत्यन्त दुःखद गर्भवास नहीं चाहते तब यदि भगवान् विष्णु स्वतन्त्र होते तो उस गर्भवासको क्यों चाहते? यदि वे अपने वशमें होते तो गर्भवासके प्रति उनकी रुचि क्यों होती? ॥ ५१-५२ ॥ ५२ अतः हे महाराज! आप यह जान लीजिये कि ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त सम्पूर्ण जगत्, सभी देव, मानव तथा पशु - पक्षी योगमाया आदिशक्ति भगवतीके ५३ वशमें हैं ॥ ५३ ॥
मकड़ीके तन्तुजालमें फँसे कीटकी भाँति ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश आदि ये सभी देव उन भगवतीकी लीलासे मायारूपी बन्धनमें पड़ जाते हैं और आवागमन ५४ । चक्रमें भ्रमण करते रहते हैं ॥५४ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे योगमायाप्रभाववर्णनं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
अथ द्वितीयोऽध्यायः महिषासुरके जन्म, तप राजोवाच
योगेश्वर्याः प्रभावोऽयं कथितश्चातिविस्तरात् ।
ब्रूहि तच्चरितं स्वामिञ्छ्रोतुं कौतूहलं मम ॥
महादेवीप्रभावं वै श्रोतुं को नाभिवाञ्छति ।
यो जानाति जगत्सर्वं तदुत्पन्नं चराचरम् ॥
व्यास उवाच
शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि विस्तरेण महामते ।
श्रद्दधानाय शान्ताय न ब्रूयात्स तु मन्दधीः ॥
और वरदान - प्राप्तिकी कथा राजा बोले- हे स्वामिन्! आपने भगवती योगेश्वरीका यह प्रभाव विस्तारपूर्वक कहा । अब १ आप उन महामायाका चरित्र कहिये, उसे सुननेकी मेरी बड़ी उत्सुकता है । जो मनुष्य इस बातको भलीभाँति जानता है कि यह स्थावर - जंगमात्मक संसार उन्हींसे उत्पन्न हुआ है, वह उन महादेवीके २ प्रभावको क्यों नहीं सुनना चाहेगा? ॥ १-२ ॥ व्यासजी बोले - हे राजन्! सुनिये, मैं विस्तारके साथ वर्णन करूँगा । हे महामते! जो वक्ता श्रद्धालु एवं शान्तचित्त श्रोतासे भगवतीकी कथा नहीं कहता, ३ । वह तो मन्द बुद्धिका होता है ॥३ ॥
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अ ० २ ] पञ्चम
पुरा युद्धमभूद् घोरं देवदानवसेनयोः ।
पृथिव्यां पृथिवीपाल महिषाख्ये महीपतौ ॥ ४
महिषो नाम राजेन्द्र चकार तप उत्तमम् ।
गत्वा हेमगिरौ चोग्रं देवविस्मयकारकम् ॥ ५
वर्षाणामयुतं पूर्णं चिन्तयन्हृदि देवताम् ।
तस्य तुष्टो महाराज ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ ६
तत्रागत्याब्रवीद्वाक्यं हंसारूढश्चतुर्मुखः ।
वरं वरय धर्मात्मन्ददामि तव वाञ्छितम् ॥ ७
महिष उवाच
अमरत्वं देवदेव वाञ्छामि द्रुहिण प्रभो ।
यथा मृत्युभयं न स्यात्तथा कुरु पितामह ॥ ८
ब्रह्मोवाच
उत्पन्नस्य ध्रुवं मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।
सर्वथा मरणोत्पत्ती सर्वेषां प्राणिनां किल ॥
नाशः कालेन सर्वेषां प्राणिनां दैत्यपुङ्गव ।
महामहीधराणां च समुद्राणां च सर्वथा ॥ १०
एकं स्थानं परित्यज्य मरणस्य महीपते ।
प्रब्रूहि तं वरं साधो यस्ते मनसि वर्तते ॥ ११
महिष उवाच
न देवान्मानुषाद्दैत्यान्मरणं मे पितामह ।
पुरुषान्न च मे मृत्युर्योषा मां का हनिष्यति ॥ १२
तस्मान्मे मरणं नूनं कामिन्याः कुरु पद्मज ।
अबला हन्त मां हन्तुं कथं शक्ता भविष्यति ॥ १३
ब्रह्मोवाच यदा कदापि दैत्येन्द्र नार्यास्ते मरणं ध्रुवम् । न नरेभ्यो महाभाग मृतिस्ते महिषासुर । १४ स्कन्ध ५३७ हे राजन्! प्राचीन कालकी बात है, जिस समय भूतलपर महिषासुर नामक राजा राज्य करता था, उस समय देवताओं और दैत्योंकी सेनाओंमें भीषण युद्ध छिड़ गया ॥४ ॥
हे राजेन्द्र! उन्हीं दिनों सुमेरुपर्वतपर जाकर उस महिष नामक दानवने हृदयमें अपने इष्ट देवताका ध्यान करते हुए पूरे दस हजार वर्षोंतक देवताओंतकको चकित कर देनेवाला उत्तम तथा कठोर तप किया ॥ ५ || हे महाराज! उसकी तपस्यासे लोकपितामह ब्रह्माजी प्रसन्न हो गये, अतः हंसपर सवार होकर वे चतुर्मुख ब्रह्मा वहाँ प्रकट होकर उससे बोले — हे धर्मात्मन्! वर माँगो, मैं तुम्हारी अभिलाषा पूर्ण करूँगा ॥ ६-७ ॥ महिष बोला – - हे देवदेव! हे ब्रह्मन्! हे प्रभो! मैं अमरत्व चाहता हूँ । हे पितामह! आप ऐसा वर दीजिये, जिससे मुझे मृत्युका भय न रहे ॥ ८ ॥
ब्रह्माजी बोले -- - [ इस जगत् में ] उत्पन्न हुएका मरना और मरे हुएका जन्म लेना निश्चित है । समस्त जीवोंका जन्म और मरण अनिवार्यरूपसे होता रहता है । हे दैत्यप्रवर! समयानुसार सम्पूर्ण प्राणियोंका नाश हो जाता है, यहाँतक कि बड़े - बड़े पर्वतों एवं समुद्रोंका भी नाश हो जाता है ॥९ -१० ॥ अतः हे राजन्! मृत्युसम्बन्धी अपनी यह धारणा छोड़कर हे साधो! दूसरा जो भी वर तुम्हारे मनमें हो, वह माँग लो ॥ ११ ॥
महिष बोला- हे पितामह! देव, दानव और मानव- इनमें किसी भी पुरुषसे मेरी मृत्यु न हो । इस प्रकार जब पुरुषसे मेरी मृत्यु नहीं होगी, तब भला कौन - सी स्त्री मुझे मार सकेगी? अतएव हे कमलयोने! मेरी मृत्यु किसी स्त्रीके हाथ होनेका वरदान दीजिये; क्योंकि कोई अबला भला मुझे मारनेमें कैसे समर्थ हो सकेगी? ॥ १२-१३ ॥ ब्रह्माने कहा – हे दानवेन्द्र! जब भी तुम्हारी मृत्यु होगी किसी स्त्रीसे ही होगी । हे महाभाग महिषासुर! पुरुषसे तुम्हारी मृत्यु नहीं होगी ॥ १४ ॥
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५३८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २ व्यास उवाच एवं दत्त्वा वरं तस्मै ययौ ब्रह्मा निजालयम् । सोऽपि दैत्यवरः प्राप निजं स्थानं मुदान्वितः राजोवाच
महिषः कस्य पुत्रोऽसौ कथं जातो महाबली ।
कथं च माहिषं रूपं प्राप्तं तेन महात्मना ॥
व्यास उवाच
दनोः पुत्रौ महाराज विख्यातौ क्षितिमण्डले ।
रम्भश्चैव करम्भश्च द्वावास्तां दानवोत्तमौ ॥
तावपुत्रौ महाराज पुत्रार्थं तेपतुस्तपः ।
बहून्वर्षगणान्कामं पुण्ये पञ्चनदे जले ॥
करम्भस्तु जले मग्नश्चकार परमं तपः ।
वृक्षं रसालवटं प्राप्य रम्भोऽग्निमसेवत ॥
पञ्चाग्निसाधनासक्तः स रम्भस्तु यदाभवत् ।
ज्ञात्वा शचीपतिर्दुःखमुद्ययौ दानवौ प्रति ॥
गत्वा पञ्चनदे तत्र ग्राहरूपं चकार ह ।
वासवस्तु करम्भं तं तदा जग्राह पादयोः ॥
निजघान च तं दुष्टं करम्भं वृत्रसूदनः ।
भ्रातरं निहतं श्रुत्वा रम्भः कोपं परं गतः ॥
स्वशीर्षं पावके होतुमैच्छच्छित्त्वा करेण ह ।
केशपाशे गृहीत्वाशु वामेन क्रोधसंयुतः ॥
दक्षिणेन करेणोग्रं गृहीत्वा खड्गमुत्तमम् ।
छिनत्ति शीर्षं तत्तावद्वह्निना प्रतिबोधितः ॥
उक्तश्च दैत्य मूर्खोऽसि स्वशीर्षं छेत्तुमिच्छसि ।
आत्महत्यातिदुःसाध्या कथं त्वं कर्तुमुद्यतः ॥
वरं वरय भद्रं ते यस्ते मनसि वर्तते ।
मा म्रियस्व मृतेनाद्य किं ते कार्यं भविष्यति ॥
व्यासजी बोले – हे राजन्! इस प्रकार उसे वरदान देकर ब्रह्माजी अपने लोकको चले गये और ॥ १५ वह दैत्य श्रेष्ठ महिषासुर भी प्रसन्न होकर अपने घर लौट गया ॥१५ ॥
राजा बोले- वह महिषासुर किसका पुत्र था, वह महान् बलशाली कैसे हो गया था और उस महान् १६ दैत्यको महिषका रूप कैसे मिला था? ॥ १६ ॥
व्यासजी बोले – हे महाराज! दनुके रम्भ और करम्भ – नामक दो पुत्र थे । वे दोनों दानवश्रेष्ठ भूमण्डलपर बहुत प्रसिद्ध थे ॥१७ ॥
१७ हे महाराज! वे दोनों सन्तानहीन थे, अतः वे पुत्र - प्राप्ति के लिये तपस्या करने लगे । उनमें करम्भने पवित्र पंचनदके जलमें डूबकर अनेक वर्षोंतक कठोर १८ तप किया और रम्भ दूधवाले वटवृक्षके नीचे जाकर पंचाग्निका सेवन करने लगा ॥ १८-१९ ॥। बहुत कालतक जब रम्भ पंचाग्नि - - स साधना करता १ ९ रह गया, तब यह जानकर इन्द्र बहुत चिन्तित हुए और वे उन दोनों दानवोंके पास पहुँच गये ॥ २० ॥
पंचनदके जलमें प्रविष्ट होकर इन्द्रने ग्राहका २० रूप धारण कर लिया और उस करम्भको दोनों पैरोंसे पकड़ लिया । इस प्रकार वृत्रासुरका वध करनेवाले इन्द्रने उस करम्भको मार डाला ॥ २१ ॥
२१ तब अपने भाईका वध सुनकर रम्भ अत्यधिक कुपित हुआ । उसने अपने हाथसे अपना सिर काटकर उसे अग्निमें होम कर देनेकी इच्छा की । तदुपरान्त २२ वह तत्काल अत्यन्त क्रोधके साथ बायें हाथसे अपने केशपाश पकड़कर दाहिने हाथमें तीक्ष्ण २३ तलवार लेकर जैसे ही अपना सिर काटनेको उद्यत हुआ, तभी अग्निदेव [ प्रकट होकर ] उसे समझाने लगे ॥ २२–२४ ॥ २४ [ अग्निदेव उससे ] बोले- हे दैत्य! तुम अपना ही सिर काटना चाहते हो; तुम तो बड़े मूर्ख हो । आत्महत्या अत्यन्त ही दुःसाध्य कर्म है । इसे करनेके २५ लिये तुम कैसे तैयार हो गये? ॥ २५ ॥
तुम्हारा कल्याण हो । तुम्हारे मनमें जो हो, वह वरदान माँग लो । मरो मत, मरनेसे तुम्हारा कौन - सा २६ । कार्य हो जायगा? ॥ २६ ॥
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अ ० २ ] व्यास उवाच
तच्छ्रुत्वा वचनं रम्भः पावकस्य सुभाषितम् ।
ततोऽब्रवीद्वचो रम्भस्त्यक्त्वा केशकलापकम् ॥
यदि तुष्टोऽसि देवेश देहि मे वाञ्छितं वरम् ।
त्रैलोक्यविजयी पुत्रः स्यान्नः परबलार्दनः ॥
अजेयः सर्वथा स स्याद्देवदानवमानवैः ।
कामरूपी महावीर्यः सर्वलोकाभिवन्दितः ॥
पावकस्तं तथेत्याह भविष्यति तवेप्सितम् ।
पुत्रस्तव महाभाग मरणाद्विरमाधुना ॥
यस्यां चित्तं तु रम्भ त्वं प्रमदायां करिष्यसि ।
तस्यां पुत्रो महाभाग भविष्यति बलाधिकः ॥
व्यास उवाच इत्युक्तो वह्निना रम्भो वचनं चित्तरञ्जनम् । श्रुत्वा प्रणम्य प्रययौ वह्निं तं दानवोत्तमः
यक्षैः परिवृतं स्थानं रमणीयं श्रियान्वितम् ।
दृष्ट्वा चक्रे तदा भावं महिष्यां दानवोत्तमः ॥
मत्तायां रूपपूर्णायां विहायान्याञ्च योषितम् ।
सा समागाच्च तरसा कामयन्ती मुदान्विता ॥
रम्भोऽपि गमनं चक्रे भवितव्यप्रणोदितः सा तु गर्भवती जाता महिषी तस्य वीर्यतः ॥
तां गृहीत्वाथ पातालं प्रविवेश मनोहरम् ।
महिषेभ्यश्च तां रक्षन्प्रियामनुमतां किल ॥
कदाचिन्महिषश्चान्यः कामार्तस्तामुपाद्रवत् । स्वयमागत्य तं हन्तुं दानवः समुपाद्रवत् पञ्चम स्कन्ध ५३ ९ व्यासजी बोले- अग्निदेवका सुन्दर वचन सुनकर रम्भने अपना केशपाश छोड़कर कहा - हे देवेश! यदि २७ आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे यही वांछित वरदान दीजिये कि मुझे तीनों लोकोंपर विजय प्राप्त करनेवाला तथा शत्रु सेनाका विनाश करनेवाला पुत्र प्राप्त हो । वह देवता, दानव तथा मनुष्य - इन सभीसे सर्वथा २८ अजेय हो । वह महापराक्रमी, अपने इच्छानुसार कोई भी रूप धारण करनेमें समर्थ तथा सभी लोगोंके लिये वन्दनीय हो ॥ २७–२९ ॥ २ ९ अग्निदेवने उससे कहा कि जैसी तुम्हारी अभिलाषा है, वैसा ही होगा । हे महाभाग! तुम्हें वैसा ही पुत्र प्राप्त होगा, किंतु अब तुम मरनेका ३० विचार छोड़ दो ॥ ३० ॥
हे महाभाग! हे रम्भ! जिस भी स्त्रीके प्रति तुम्हारे मनमें आसक्ति - भाव आ जायगा, उसीसे तुम्हें ३१ वह महाबलशाली पुत्र उत्पन्न होगा ॥३१ ॥
व्यासजी बोले- हे राजन्! अग्निदेवने उससे ऐसा कहा । तब उनका मनमोहक वचन सुनकर दानवश्रेष्ठ रम्भ अग्निको प्रणाम करके वहाँसे चला गया और एक ऐसे स्थानपर जा पहुँचा जो ॥ ३२ रमणीक, समृद्धियोंसे सम्पन्न तथा यक्षोंसे घिरा हुआ था ॥ ३२३ ॥
वहाँ एक रूपवती तथा मदमत्त महिषीको ३३ देखकर वह दानवश्रेष्ठ किसी अन्य स्त्रीको छोड़कर उसीपर आसक्त हो गया । वह महिषी भी उसे प्रसन्नतापूर्वक चाहती हुई तत्काल उसके साथ रमणके ३४ । लिये तैयार हो गयी । होनहारसे प्रेरित होकर रम्भने उसके साथ समागम किया और उसके वीर्यसे वह । महिषी गर्भवती हो गयी ॥ ३३-३५ ॥ तत्पश्चात् उसे अपने साथ लेकर रम्भने मनोहर ३५ पाताललोकमें प्रवेश किया और वहाँपर महिषोंसे अपने मनोनुकूल उस प्रियतमाकी रक्षा करता हुआ वह सुखपूर्वक रहने लगा ॥३६ ॥
३६ किसी दिन एक दूसरे महिषने कामासक्त होकर उस महिषीको दौड़ा लिया । यह देखकर दानव रम्भ स्वयं वहाँ आकर ॥ ३७ । उसे मारनेके लिये दौड़ा और उसके पास पहुँचकर
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५४० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २
स्वरक्षार्थं समागत्य महिषं समताडयत् ।
सोऽपि तं निजघानाशु शृङ्गाभ्यां काममोहितः ॥ ३८
ताडितस्तेन तीक्ष्णाभ्यां शृङ्गाभ्यां हृदये भृशम् ।
भूमौ पपात तरसा ममार च विमूर्च्छितः ॥ ३ ९
मृते भर्तरि सा दीना भयार्ता विद्रुता भृशम् ।
सा वेगात्तं वरं प्राप्य यक्षाणां शरणं गता ॥ ४०
पृष्ठतस्तु गतस्तत्र महिषः कामपीडितः ।
कामयानस्तु तां कामी बलवीर्यमदोद्धतः ॥ ४१
रुदती सा भृशं दीना दृष्टा यक्षैर्भयातुरा ।
धावमानं च तं वीक्ष्य यक्षास्त्रातुं समाययुः ॥ ४२
युद्धं समभवद् घोरं यक्षाणां च हयारिणा ।
शरेण ताडितस्तूर्णं पपात धरणीतले ॥ ४३
मृतं रम्भं समानीय यक्षास्ते परमं प्रियम् ।
चितायां रोपयामासुस्तस्य देहस्य शुद्धये ॥ ४४
महिषी सा पतिं दृष्ट्वा चितायां रोपितं तदा ।
प्रवेष्टुं सा मतिं चक्रे पतिना सह पावकम् ॥ ४५
वार्यमाणापि यक्षैः सा प्रविवेश हुताशनम् ।
ज्वालामालाकुलं साध्वी पतिमादाय वल्लभम् ॥ ४६
महिषस्तु चितामध्यात्समुत्तस्थौ महाबलः ।
रम्भोऽप्यन्यद्वपुः कृत्वा निःसृतः पुत्रवत्सलः ॥ ४७
रक्तबीजोऽप्यसौ जातो महिषोऽपि महाबलः ।
अभिषिक्तस्तु राज्येऽसौ हयारिरसुरोत्तमैः ॥ ४८
एवं स महिषो जातो रक्तबीजश्च वीर्यवान् ।
अवध्यस्तु सुरैर्दैत्यैर्मानवैश्च नृपोत्तम ॥ ४ ९
अपनी रक्षाके लिये रम्भने उस महिषपर कठोर प्रहार किया । तब उस कामातुर महिषने भी अपनी सींगोंसे रम्भपर शीघ्रतासे प्रहार करना आरम्भ कर दिया ॥ ३७-३८ ॥ उस महिषके द्वारा तीक्ष्ण सींगोंसे हृदयस्थलमें गहरी चोट पहुँचानेके कारण रम्भ शीघ्र ही मूच्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा और मर गया ॥ ३ ९ ॥ पतिके मर जानेपर अत्यन्त शोकाकुल तथा भयग्रस्त वह महिषी वहाँसे भाग चली । वेगपूर्वक भागती हुई वह एक वटवृक्षके नीचे पहुँचकर वहाँ रहनेवाले यक्षोंकी शरणमें जा पहुँची ॥ ४० ॥
वह कामार्त और बल तथा वीर्यसे मदोन्मत्त कामासक्त महिष भी उसकी कामना करता हुआ उसके पीछे - पीछे गया ॥४१ ॥
यक्षोंने उस महिषसे पीड़ित तथा भयभीत होकर रोती हुई उस महिषीको देख लिया और महिषको दौड़ता हुआ देखकर उस महिषीकी रक्षाके लिये वे यक्ष वहाँ आ गये ॥ ४२ ॥
अब उस महिषके साथ यक्षोंका विकराल युद्ध होने लगा और अन्तमें बाणसे आहत होकर वह महिष शीघ्र ही भूमिपर गिर पड़ा ॥ ४३ ॥
तदनन्तर उन यक्षोंने परम प्रिय मृत रम्भको लाकर उसकी देह - शुद्धिके लिये उसे चितापर रख दिया । तब उस महिषीने अपने पतिको चितापर रखा हुआ देखकर उसके साथ स्वयं भी अग्निमें प्रवेश करनेका निश्चय किया ॥ ४४-४५ ॥ यक्षोंके मना करनेपर भी अपने प्रिय पतिके साथ वह महिषी विकराल लपटोंवाली अग्निमें प्रविष्ट हो गयी ॥ ४६ ॥
उसी समय एक महाबली महिष चिताके मध्यसे प्रकट हो गया तथा अन्य शरीर धारण करके वह पुत्रप्रेमी रम्भ भी चिताके मध्यभागसे निकल पड़ा । इस प्रकार रक्तबीज तथा महान् बलशाली महिषासुर उत्पन्न हुए । तदनन्तर श्रेष्ठ दानवोंने उस महिषासुरका राज्याभिषेक कर दिया ॥ ४७-४८ ॥ हे नृपश्रेष्ठ! इस प्रकार महिषासुर तथा पराक्रमी रक्तबीज उत्पन्न हुए । वह महिषासुर देवताओं, दानवों तथा मनुष्योंसे अवध्य था ॥४ ९ ॥
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अ ० ३ ] पञ्चम स्कन्ध ५४१ इत्येतत्कथितं राजन् जन्म तस्य महात्मनः । हे राजन्! इस प्रकार मैंने आपको उस महान् महिषासुरके जन्म तथा उससे सम्बन्धित वरदान-वरप्रदानञ्च तथा प्रोक्तं सर्वं सविस्तरम् ॥ ५० प्राप्तिका प्रसंग विस्तारपूर्वक बता दिया ॥ ५० ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे महिषासुरोत्पत्तिर्नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
अथ तृतीयोऽध्यायः महिषासुरका दूत भेजकर इन्द्रको स्वर्ग खाली करनेका आदेश देना, दूतद्वारा इन्द्रका युद्धहेतु आमन्त्रण प्राप्तकर महिषासुरका दानववीरोंको युद्धके लिये सुसज्जित व्यास उवाच
एवं स महिषो नाम दानवो वरदर्पितः ।
प्राप्य राज्यं जगत्सर्वं वशे चक्रे महाबलः ॥ १
पृथिवीं पालयामास सागरान्तां भुजार्जिताम् ।
एकच्छत्रां निरातङ्कां वैरिवर्गविवर्जिताम् ॥ २
सेनानीश्चिक्षुरस्तस्य महावीर्यो मदोत्कटः ।
धनाध्यक्षस्तथा ताम्रः सेनायुतसमावृतः ॥ ३
असिलोमा तथोदर्को बिडालाख्यश्च बाष्कलः ।
त्रिनेत्रोऽथ तथा कालबन्धको बलदर्पितः ॥ ४
एते सैन्ययुताः सर्वे दानवा मेदिनीं तदा ।
आवृत्य संस्थिताः काममृद्धां सागरमेखलाम् ॥ ५
करदाश्च कृताः सर्वे भूमिपालाः पुरातनाः निहता ये बलोदग्राः क्षात्रधर्मव्यवस्थिताः ॥ ६ ब्राह्मणा वशगा जाता यज्ञभागसमर्पकाः । महिषस्य महाराज निखिले क्षितिमण्डले । ७
एकातपत्रं तद्राज्यं कृत्वा स महिषासुरः ।
स्वर्गं जेतुं मनश्चक्रे वरदानेन गर्वितः ॥ ८
होनेका आदेश देना व्यासजी बोले- इस प्रकार वरदान पानेके कारण अभिमानयुक्त उस महाबली दानव महिषासुरने राज्य प्राप्त करके सम्पूर्ण जगत्को अपने अधीन कर लिया ॥ १ ॥
उसने समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीको अपने बाहुबलसे जीतकर शत्रु- समुदाय से रहित कर दिया तथा वह निर्भय होकर एकच्छत्र राज्य करने लगा ॥२ ॥
उसका सेनाध्यक्ष चिक्षुर महापराक्रमी एवं मदमत्त था । ताम्र उसका कोषाध्यक्ष था, जिसके पास दस हजार सैनिक थे ॥ ३ ॥
उस समय असिलोमा, उदर्क, बिडालाख्य, बाष्कल, त्रिनेत्र तथा बलोन्मत्त कालबन्धक — इन | दानवोंने अपनी - अपनी विशाल सेनाओंके साथ सागरान्त समृद्धिशालिनी पृथ्वीको घेरकर राज्य स्थापित किया ॥ ४-५ ॥ जो पुराने नरेश थे, वे भी अब महिषासुरको कर देने लगे । उनमें भी जो स्वाभिमानी थे और क्षात्र-धर्मानुसार जिन्होंने उसका सामना किया, वे मार डाले गये ॥६ ॥
हे महाराज! सम्पूर्ण भूमण्डलपर ब्राह्मणलोग महिषासुर के अधीन हो गये और उसे यज्ञभाग देने लगे ॥ ७ ॥
इस प्रकार एकच्छत्र राज्य स्थापित करके वरदानसे गर्वित वह महिषासुर स्वर्गपर भी विजय प्राप्त करनेकी अभिलाषा करने लगा ॥८ ॥