देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 551–560

देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 551–560

पृष्ठ 551

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 551 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५४२ प्रणिधिं प्रेषयामास हयारिस्तु शचीपतिम् स सन्देशहरं शीघ्रमाहूयोवाच दैत्यराट् ॥ गच्छ वीर महाबाहो दूतत्वं कुरु मेऽनघ । ब्रूहि शक्रं दिवं गत्वा निःशङ्कः सुरसन्निधौ

मुञ्च स्वर्गं सहस्त्राक्ष यथेष्टं गच्छ मा चिरम् ।

सेवां वा कुरु देवेश महिषस्य महात्मनः ॥

स त्वां संरक्षयेन्नूनं राजा शरणमागतम् । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३ । महिषासुरने इन्द्रके पास अपना एक दूत भेजा । ९ उस दैत्यराजने दूतको बुलाकर उससे कहा- हे वीर! जाओ, हे महाबाहो! तुम मेरा दूतकार्य करो । हे अनघ! तुम निडर होकर स्वर्गमें देवताओंके पास ॥ १० जाकर वहाँ इन्द्रसे कहो – हे सहस्राक्ष! तुम स्वर्ग छोड़ दो और अपनी इच्छाके अनुसार जहाँ चाहो, शीघ्र चले जाओ । अथवा हे देवेश! महान् महिषासुर की ११ | सेवा करो ॥ ९ -११ ॥ यदि तुम राजा महिषासुरकी शरणागति स्वीकार कर लो तो वे तुम्हारी रक्षा अवश्य करेंगे । अतएव हे तस्मात्त्वं शरणं याहि महिषस्य शचीपते ॥ १२ इन्द्र! तुम महिषासुरकी शरणमें चले जाओ ॥ १२ ॥

नोचेद्वज्रं गृहाणाशु युद्धाय बलसूदन ।

पूर्वैर्जितोऽसि चास्माकं जानामि तव पौरुषम् ॥

अहल्याजार विज्ञातं बलं ते सुरसङ्घप ।

युध्यस्व व्रज वा कामं यत्र ते रमते मनः ॥

व्यास उवाच तच्छ्रुत्वा ' वचनं तस्य शक्रः क्रोधसमन्वितः । उवाच तं नृपश्रेष्ठ स्मितपूर्वं वचस्तदा ।

न जानेऽहं सुमन्दात्मन् यतस्त्वं मददर्पितः ।

चिकित्सां संकरिष्यामि रोगस्यास्य प्रभोस्तव ॥

अतः परं करिष्यामि मूलस्यास्य निमूलनम् ।

गच्छ दूत तथा ब्रूहि तस्याग्रे मम भाषितम् ॥

शिष्टैर्दूता न हन्तव्यास्तस्मात्त्वां विसृजाम्यहम् ।

युद्धेच्छा चेत्समागच्छ त्वरितो महिषीसुत ॥

हयारे त्वद्बलं ज्ञातं तृणादस्त्वं जडाकृतिः ।

शृङ्गयोस्ते करिष्यामि सुदृढं च शरासनम् ॥

दर्पः शृङ्गबलात्तेऽस्ति विदितं कारणं मया ।

विषाणे ते परिच्छिद्य संहरिष्यामि तद् बलम् ॥

अन्यथा हे बलसूदन! युद्धके लिये शीघ्र ही अपना वज्र उठा लो । हमारे पूर्वजोंने तुम्हें पराजित १३ किया है, अतएव हम तुम्हारा पुरुषार्थ जानते हैं ॥ १३ ॥

अहल्याके साथ अनाचार करनेवाले तथा देवसमुदायके अधिपति हे इन्द्र! मैं तुम्हारे बलसे १४ भलीभाँति परिचित हूँ । तुम मेरे साथ युद्ध करो अथवा जहाँ तुम्हारा मन करे, वहाँ चले जाओ ॥ १४ ॥

व्यासजी बोले – हे नृपश्रेष्ठ! दूतका वचन सुनकर इन्द्र कुपित हो उठे; फिर भी उन्होंने मुसकराकर १५ दूतसे कहा - हे मन्दबुद्धि! मैं यह नहीं जान पा रहा हूँ कि तुम अभिमानके मदमें इतना चूर क्यों हो गये हो! मैं तुम्हारे स्वामी महिषासुरके अभिमानरूपी इस १६ रोगकी चिकित्सा अवश्य करूँगा । इसके बाद मैं इस रोगको जड़से नष्ट कर दूँगा । हे दूत! अब तुम जाओ और उस महिषासुरसे मेरी कही गयी बात बता दो । १७ शिष्टजनोंको चाहिये कि दूतोंका वध न करें, अतः मैं तुम्हें छोड़ दे रहा हूँ ॥ १५ – १७३ ॥ [ वहाँ जाकर मेरी तरफसे उससे कह देना - ] १८ हे महिषीपुत्र! यदि तुम्हारी युद्ध करनेकी इच्छा हो तो शीघ्र आ जाओ । हे महिषासुर! तुम तो घास खानेवाले जड प्रकृतिके जीव हो । अतः मुझे तुम्हारा १ ९ बल ज्ञात है । मैं तुम्हारी सींगोंसे एक सुदृढ़ धनुष बनाऊँगा । तुम्हारे अभिमानका कारण मुझे विदित है । तुम्हें अपनी सींगोंके बलपर गर्व है, अतएव तुम्हारी २० सींगोंको काटकर मैं उस अभिमानबलको समाप्त कर

पृष्ठ 552

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 552 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ३ ]

यद् बलेनातिपूर्णस्त्वं जातोऽसि बलदर्पितः ।

कुशलस्त्वं तदाघाते न युद्धे महिषाधम ॥

व्यास उवाच

इत्युक्तोऽसौ सुरेन्द्रेण स दूतस्त्वरितो गतः ।

जगाम महिषं मत्तं प्रणम्य प्रत्युवाच ह ॥

दूत उवाच

राजन्देवाधिपः कामं न त्वां विगणयत्यसौ ।

मन्यते स्वबलं पूर्णं देवसैन्यसमावृतः ॥

यदुक्तं तेन मूर्खेण कथमन्यद् ब्रवीम्यहम् ।

प्रियं सत्यं च वक्तव्यं भृत्येन पुरतः प्रभोः ॥

प्रियं सत्यं च वक्तव्यं प्रभोरग्रे शुभेच्छुना ।

इति नीतिर्महाराज जागर्ति शुभकारिणी ॥

केवलं चेत्प्रियं ब्रूयान्न ते कार्यं भविष्यति ।

परुषं च न वक्तव्यं कदाचिच्छुभमिच्छता ॥

यथा रिपुमुखाद्वाचः प्रसरन्ति विषोपमाः ।

तथा भृत्यमुखान्नाथ निःसरन्ति कथं गिरः ॥

यादृशानीह वाक्यानि तेनोक्तानि महीपते ।

तादृशानि न मे जिह्वा वक्तुमर्हति कर्हिचित् ॥

व्यास उवाच

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य हेतुगर्भं तृणाशनः ।

भृशं कोपपरीतात्मा बभूव महिषासुरः ॥

समाहूयाब्रवीद्दैत्यान्क्रोधसंरक्तलोचनः लाङ्गूलं पृष्ठदेशे च कृत्वा मूत्रं परित्यजन् ॥

भो भो दैत्याः सुरेन्द्रोऽसौ युद्धकामोऽस्ति सर्वथा ।

बलोद्योगं कुरुध्वं वै जेतव्योऽसौ सुराधमः ॥

पञ्चम स्कन्ध ५४३ दूँगा । हे महिषाधम! जिन सींगोंके बलपर तुम गर्वोन्मत्त २१ हो तथा अपनेको सर्वसमर्थ समझते हो, केवल उन्हींसे आघात करनेमें तुम कुशल हो; युद्ध करनेमें तुम दक्ष नहीं हो सकते ॥ १८–२१ ॥ व्यासजी बोले – देवराज इन्द्रके ऐसा कहनेपर वह दूत तत्काल वहाँसे चल दिया । वह उन्मत्त २२ महिषासुरके पास पहुँचा और उसे प्रणाम करके कहने लगा- ॥ २२ ॥।

दूत बोला- हे राजन्! वह देवराज इन्द्र आपको कुछ भी नहीं समझ रहा है । देवसेनासे सम्पन्न होनेके २३ कारण वह अपनेको पूर्ण बलवान् मानता है ॥२३ ॥

उस मूर्खने जो कुछ कहा है, उसके अतिरिक्त दूसरी बात मैं कैसे कहूँ? सेवकको अपने स्वामी २४ समक्ष सत्य तथा प्रिय वाणी बोलनी चाहिये ॥ २४ ॥

कल्याणकी इच्छा रखनेवाले सेवकको अपने स्वामीके आगे सदा सत्य तथा प्रिय वचन बोलना २५ चाहिये । हे महाराज! यही नीति संसारमें सदासे कल्याणप्रद होती आयी है ॥ २५ ॥

किंतु यदि केवल प्रिय लगनेवाली बात ही कहूँ २६ तो इससे आपका कार्य सिद्ध नहीं होगा । साथ ही अपना कल्याण चाहनेवाले सेवकको अपने स्वामीसे कठोर बात कभी नहीं कहनी चाहिये ॥ २६ ॥

२७ हे नाथ! शत्रुके मुखसे जिस तरहकी विषतुल्य बातें निकलती हैं, उस तरहकी बातें सेवकके मुखसे कैसे निकल सकती हैं? ॥ २७ ॥

हे पृथ्वीपते! इन्द्रने जिस प्रकारके वाक्य २८ बोले हैं, उन्हें कह सकनेमें मेरी जिह्वा कभी भी समर्थ नहीं है ॥२८ ॥

व्यासजी बोले - – उस दूतका रहस्यपूर्ण वचन सुनकर घास खानेवाले महिषासुरका मन पूर्णरूपसे २ ९ क्रोधके वशीभूत हो गया ॥ २ ९ ॥ सभी दैत्योंको बुलाकर क्रोधके मारे लाल आँखोंवाला महिषासुर अपनी पूँछ पीठपर रख ३० करके मूत्र त्याग करते हुए उनसे कहने लगा — हे दैत्यो! वह इन्द्र निश्चय ही युद्ध करना चाहता है । अतः तुमलोग सेना संगठित करो । हमें उस देवाधमको ३१ | जीतना है ॥ ३०-३१ ॥

पृष्ठ 553

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 553 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५४४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३

मदग्रे को भवेच्छूरः कोटिशश्चेत्तथाविधाः ।

न बिभेम्येकतः कामं हनिष्याम्यद्य सर्वथा ॥

शूरः शान्तेष्वसौ नूनं तपस्विषु बलाधिकः ।

बलकर्ता हि कुहको लम्पटः परदारहृत् ॥

अप्सरोबलसम्मत्तस्तपोविघ्नकरः खलः । छिद्रप्रहरण: पापो नित्यं विश्वासघातकः

नमुचिर्निहतो येन कृत्वा सन्धिं दुरात्मना ।

शपथान्विविधानादौ कृत्वा भीतेन छद्मना ॥

विष्णुस्तु कपटाचार्यः कुहकः शपथाकरः ।

नानारूपधरः कामं बलकृद्दम्भपण्डितः ॥

कृत्वा कोलाकृतिं येन हिरण्याक्षो निपातितः ।

हिरण्यकशिपुर्येन नृसिंहेन च घातितः ॥

नाहं तद्वशगो नूनं भवेयं दनुनन्दनाः ।

विश्वासं नैव गच्छामि देवानां कुत्र कर्हिचित् ॥

किं करिष्यति मे विष्णुरिन्द्रो वा बलवत्तरः ।

रुद्रो वापि न मे शक्तः प्रतिकर्तुं रणाङ्गणे ॥

त्रिविष्टपं ग्रहीष्यामि जित्वेन्द्रं वरुणं यमम् ।

धनदं पावकं चैव चन्द्रसूर्यौ विजित्य च ॥

यज्ञभागभुजः सर्वे भविष्यामो ऽद्य सोमपाः ।

जित्वा देवसमूहञ्च विहरिष्यामि दानवैः ॥

न मे भयं सुरेभ्यश्च वरदानेन दानवाः ।

मरणं न नरेभ्यश्च नारी किं मे करिष्यति ॥

मेरे सम्मुख भला कौन पराक्रमी बन सकता है? यदि उस इन्द्रके समान करोड़ों लोग मेरे सामने आ ३२ जायँ तो भी मैं नहीं डरूँगा, तब उस अकेले इन्द्रसे कैसे डर सकता हूँ? उसको तो मैं अब निश्चितरूपसे मार डालूँगा ॥३२ ॥

३३ वह इन्द्र शान्त स्वभाववाले लोगोंपर अपने पराक्रमका प्रदर्शन तथा तपस्वियोंपर अपने बलका प्रयोग करता है । वह मायावी, व्यभिचारी तथा दूसरेकी स्त्रीका हरण करनेवाला है ॥ ३३ ॥

॥ ३४ वह दुष्ट अपनी अप्सराओंके बलबूते दूसरोंकी तपस्या में विघ्न डालता है, शत्रुकी कमजोरी देखकर अवसरवादिताका लाभ उठाकर उसपर प्रहार करता ३५ है, वह सदासे पापकृत्योंमें रत रहनेवाला तथा घोर विश्वासघात करनेवाला है ॥ ३४ ॥

भयके मारे उस छली इन्द्रने पहले विश्वास-प्रदर्शनके लिये अनेक प्रकारकी शपथें खाकर नमुचि ३६ नामक दैत्यसे सन्धि स्थापित की, किंतु बादमें उस दुष्टात्माने छलपूर्वक नमुचिको मार डाला ॥ ३५ ॥

विष्णु तो कपटका आचार्य, मायावी, झूठी ३७ प्रतिज्ञाएँ करनेमें बड़ा ही कुशल, बहुरूपिया, सैन्य-बलका संचय करनेवाला तथा महान् पाखण्डी है उसीने सूकरका रूप धारणकर हिरण्याक्षका वध कर डाला और नृसिंहका रूप धारणकर हिरण्यकशिपुका ३८ | संहार किया ॥ ३६-३७ ॥ अतएव हे दनुके वंशजो! मैं उसका वशवर्ती कभी भी नहीं होऊँगा और देवताओंका कहीं भी कदापि विश्वास नहीं करूँगा ॥३८ ॥

३ ९ विष्णु तथा इन्द्र- ये दोनों मेरा क्या कर लेंगे? यहाँतक कि उनसे भी अधिक शक्तिशाली रुद्र भी युद्ध - भूमिमें मेरा प्रतीकार कर पानेमें समर्थ नहीं हैं । ४० इन्द्र, वरुण, यम, कुबेर, अग्नि, चन्द्रमा तथा सूर्यको जीतकर मैं स्वर्गपर अधिकार कर लूँगा ॥ ३ ९ -४० ॥ अब हमलोग यज्ञका भाग प्राप्त करेंगे तथा सोमरसका पान करनेवाले होंगे । मैं देवसमुदायको ४१ । जीतकर दानवोंके साथ विहार करूँगा ॥ ४१ ॥

हे दानवो! वरदानके कारण मुझे देवताओंका भय नहीं है । पुरुषसे मेरी मृत्यु हो ही नहीं सकती; ४२ तब भला स्त्री मेरा क्या कर लेगी? ॥। ४२ ॥

पृष्ठ 554

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 554 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ३ ] पातालपर्वतेभ्यश्च समाहूय वरान्वरान् दानवान्मम सैन्येशान्कुर्वन्तु त्वरिताश्चराः एकोऽहं सर्वदेवेशान्विजेतुं दानवाः क्षमः शोभार्थं वः समाहूय नयामि सुरसङ्गमे शृङ्गाभ्यां च खुराभ्यां च हनिष्येऽहं सुरान्किल न मे भयं सुरेभ्यश्च वरदानप्रभावतः अवध्योऽहं सुरगणैरसुरैर्मानवैस्तथा तस्मात्सज्जा भवन्त्वद्य देवलोकजयाय वै जित्वा सुरालयं दैत्या विहरिष्यामि नन्दने मन्दारकुसुमापीडा देवयोषित्समन्विताः कामधेनुपयोत्सिक्ताः सुधापानप्रमोदिताः देवगन्धर्वगीतादिनृत्यलास्यसमन्विताः उर्वशी मेनका रम्भा घृताची च तिलोत्तमा प्रमद्वरा महासेना मिश्रकेशी मदोत्कटा विप्रचित्तिप्रभृतयो नृत्यगीतविशारदाः रञ्जयिष्यन्ति वः सर्वान्नानासवनिषेवणैः सर्वे सज्जा भवन्त्वद्य रोचतां गमनं दिवि संग्रामार्थं सुरैः सार्धं कृत्वा मङ्गलमुत्तमम् रक्षणार्थं च सर्वेषां भार्गवं मुनिसत्तमम् समाहूय च सम्पूज्य स्थाप्य यज्ञे गुरुं परम् व्यास उवाच इति सन्दिश्य दैत्येन्द्रान्महिषः पापधीस्तदा जगाम त्वरितो राजन्भवनं स्वं मुदान्वितः पञ्चम स्कन्ध ५४५ । हे गुप्तचरो! पाताल तथा पर्वतोंपर रहनेवाले ॥ ४३ बड़े - बड़े दानव - वीरोंको तत्काल यहाँ बुलाकर उन्हें मेरी सेनाओंका अध्यक्ष बना दो ॥ ४३ ॥

। हे दानवो! मैं तो अकेला ही समस्त देवताओंको ॥ ४४ जीतनेमें समर्थ हूँ, फिर भी शोभा बढ़ानेकी दृष्टिसे आप सबको भी बुलाकर देवताओंके साथ होनेवाले । संग्राममें ले चलूँगा ॥ ४४ ॥

मैं अपनी सींगों तथा खुरोंसे देवताओंको ॥ ४५ निश्चितरूपसे मार डालूँगा । वरदानके प्रभावसे मुझे । देवताओंसे भय नहीं है ॥ ४५ ॥

॥ ४६ देवता, दानव तथा मनुष्य- सभीसे मैं अवध्य हूँ, अतः आप सब देवलोकपर विजय प्राप्त करनेके लिये । अब तैयार हो जायँ ॥ ४६ ॥

हे दैत्यो! देवलोकको जीतकर मैं नन्दनवनमें ॥ ४७ विहार करूँगा । मन्दारपुष्पकी मालाएँ धारण करके । आपलोग देवांगनाओंके साथ रहेंगे, कामधेनुके दुग्धका सेवन करेंगे, प्रसन्नतापूर्वक अमृत पान करेंगे और ॥ ४८ देवताओं तथा गन्धर्वोंके गीतों तथा मनमोहक हाव-। भाव - युक्त नृत्योंका आनन्द लेंगे ॥ ४७-४८ ॥ उर्वशी, मेनका, रम्भा, घृताची, तिलोत्तमा, प्रमद्वरा, ॥ ४ ९ महासेना, मिश्रकेशी, मदोत्कटा, विप्रचित्ति आदि नृत्य तथा गायन - कलामें अति निपुण अप्सराएँ विविध । प्रकारके मद्य पिलाकर आप सभीका मनोरंजन ॥ ५० करेंगी ॥ ४ ९ -५० ॥ । देवताओंके साथ युद्ध करनेके लिये देवलोकके लिये प्रस्थान करना यदि आपलोगोंको उचित लगे तो ॥ ५१ आप सब उत्तम मंगलाचार सम्पन्न करके आज ही चलनेके लिये तैयार हो जाइये ॥ ५१ ॥

। समस्त दानवोंकी रक्षाके लिये मुनिश्रेष्ठ शुक्राचार्यको ॥ ५२ बुलाकर उनका पूजन करके उन परम गुरुको यज्ञ-कार्यमें नियुक्त कीजिये ॥ ५२ ॥

व्यासजी बोले – हे राजन्! इस प्रकार दानववीरोंको । आदेश देकर वह पापबुद्धि महिषासुर प्रसन्नताके साथ ॥ ५३ । शीघ्र ही अपने भवनको चला गया ॥ ५३ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे भगवतीमाहात्म्ये दैत्यसैन्योद्योगो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] - 18 A

पृष्ठ 555

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 555 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५४६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४ अथ चतुर्थोऽध्यायः इन्द्रका देवताओं तथा गुरु बृहस्पतिसे परामर्श करना तथा बृहस्पतिद्वारा जय - पराजयमें व्यास उवाच गते दूते सुरेन्द्रोऽपि समाहूय सुरानथ यमवायुधनाध्यक्षवरुणानिदमूचिवान् महिषो नाम दैत्येन्द्रो रम्भपुत्रो महाबलः वरदर्पमदोन्मत्तो मायाशतविचक्षणः तस्य दूतोऽद्य सम्प्राप्तः प्रेषितस्तेन भोः सुराः स्वर्गकामेन लुब्धेन मामुवाचेदृशं वचः त्यज देवालयं शक्र यथेच्छं व्रज वासव सेवां वा कुरु दैत्यस्य महिषस्य महात्मनः

दयावान्दानवेन्द्रोऽसौ स ते वृत्तिं विधास्यति ।

नतेषु भृत्यभूतेषु न कुप्यति कदाचन ॥

नोचेद्युद्धाय देवेश सेनोद्योगं कुरु स्वयम् ।

गते मयि स दैत्येन्द्रस्त्वरितः समुपेष्यति ॥

इत्युक्त्वा स गतो दूतो दानवस्य दुरात्मनः ।

किं कर्तव्यमतः कार्यं चिन्तयध्वं सुरोत्तमाः ॥

दुर्बलोऽपि न चोपेक्ष्यः शत्रुर्बलवता सुराः ।

विशेषेण सदोद्योगी बलवान्बलदर्पितः ॥

उद्यमः किल कर्तव्यो यथाबुद्धि यथाबलम् ।

दैवाधीनो भवेन्नूनं जयो वाथ पराजयः ॥

1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] -18 B दैवकी प्रधानता बतलाना व्यासजी बोले - हे राजन्! दूतके चले जानेपर । इन्द्रने भी यम, वायु, कुबेर तथा वरुण - इन देवताओंको बुलाकर यह बात कही ॥ १ ॥

॥ १ रम्भका पुत्र महाबली दैत्यराज महिषासुर इस समय वरदानके अभिमानमें मदोन्मत्त हो गया है । वह । सैकड़ों प्रकारकी माया रचनेमें पारंगत है ॥ २ ॥

॥ २ हे देवताओ! स्वर्ग - प्राप्तिकी कामना करनेवाले उस लोभी महिषासुरके द्वारा भेजा गया दूत आज ही यहाँ आया था । उसने मुझसे इस प्रकारकी

बात कही - ॥ ३ ॥

॥। ३ हे शक्र! तुम तत्काल देवलोक छोड़ दो और अपनी इच्छाके अनुसार जहाँ जाना चाहो, वहाँ चले । जाओ; अथवा हे वासव! महान् महिषासुरका सेवकत्व स्वीकार कर लो ॥ ४ ॥

॥ ४ वे दैत्यराज महिषासुर बड़े दयालु हैं । वे आपके लिये किसी जीविकाका प्रबन्ध अवश्य कर देंगे । विनम्र सेवकोंपर वे कभी भी क्रोध नहीं ५ करते हैं ॥५ ॥

हे देवेश! यदि आपको यह स्वीकार नहीं है तो युद्धके लिये सेनाके संगठनमें जुट जाइये । मेरे वहाँ पहुँचते ही वे दैत्येन्द्र महिषासुर [ देवलोकपर ६ आक्रमणके लिये ] यहाँ शीघ्र आ पहुँचेंगे ॥ ६ ॥

ऐसा कहकर दुष्टात्मा दानव महिषासुरका वह दूत यहाँसे चला गया । हे श्रेष्ठ देवगण! आपलोग विचार कीजिये कि अब क्या करना चाहिये? ॥ ७ ॥

७ हे देवताओ! स्वयं बलवान् होते हुए भी अत्यन्त दुर्बल शत्रुकी भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये । अपने बलका अभिमान करनेवाले, बलशाली तथा ८ सदा उद्यमशील शत्रुकी तो विशेषरूपसे उपेक्षा नहीं करनी चाहिये ॥ ८ ॥

अतः हमलोगोंको अपने बल तथा विवेकके अनुसार पुरुषार्थ अवश्य करना चाहिये । जीत अथवा ९ हार तो दैवके अधीन रहती है॥९॥

पृष्ठ 556

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 556 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ४ ]

सन्धियोगो न चात्रास्ति खले सन्धिर्निरर्थकः ।

सर्वथा साधुभिः कार्यं विचार्य च पुनः पुनः ॥

यानमप्यधुना नैव कर्तव्यं सहसा पुनः ।

प्रेक्षकाः प्रेषणीयाश्च शीघ्रगाः सुप्रवेशकाः ॥

इङ्गितज्ञाश्च निःसङ्गा निःस्पृहाः सत्यवादिनः ।

सेनाभियोगं प्रस्थानं बलसंख्यां यथार्थतः ॥

वीराणां च परिज्ञानं कृत्वायान्तु त्वरान्विताः ।

ज्ञात्वा दैत्यपतेस्तस्य सैन्यस्य च बलाबलम् ॥

करिष्यामि ततस्तूर्णं यानं वा दुर्गसंग्रहम् ।

विचार्य खलु कर्तव्यं कार्यं बुद्धिमता सदा ।

सहसा विहितं कार्यं दुःखदं सर्वथा भवेत् ॥

तस्माद्विमृश्य कर्तव्यं सुखदं सर्वथा बुधैः ।

नात्र भेदविधिर्न्याय्यो दानवेषु च सर्वथा ॥

एकचित्तेषु कार्येऽस्मिंस्तस्माच्चारा व्रजन्तु वै ।

ज्ञात्वा बलाबलं तेषां पश्चान्नीतिर्विचार्य च ॥

विधेया विधिवत्तज्ज्ञैस्तेषु कार्यपरेषु च ।

अन्यथा विहितं कार्यं विपरीतफलप्रदम् ॥

सर्वथा तद्भवेन्नूनमज्ञातमौषधं यथा । व्यास उवाच इति सञ्चिन्त्य तैः सर्वैः प्रणिधिं कार्यवेदिनम् ॥

प्रेषयामास देवेन्द्रः परिज्ञानाय पार्थिव ।

दूतस्तु त्वरितो गत्वा समागम्य सुराधिपम् ॥

पञ्चम स्कन्ध ५४७ इस परिस्थितिमें सन्धिकी भी सम्भावना नहीं है; क्योंकि नीचके साथ की गयी सन्धि व्यर्थ सिद्ध होती १० है । अतएव बार - बार विचार करके केवल सज्जनोंके साथ ही सन्धि करनी चाहिये ॥ १० ॥

इस समय अचानक आक्रमण करना भी उचित ११ । नहीं है । अतएव सर्वप्रथम शीघ्रगामी तथा सुगमतासे प्रवेश करनेमें दक्ष गुप्तचर वहाँ भेजे जाने चाहिये, जो शत्रुओंके अभिप्राय समझनेमें समर्थ, किसीके साथ अधिक भावासक्ति न रखनेवाले, निर्लोभी तथा १२ सत्यवादी हों । वे गुप्तचर शत्रु सेनाकी गतिविधि, प्रस्थान, सेनाकी ठीक - ठीक संख्या और शत्रुदलके वीरोंकी वास्तविक जानकारी करके शीघ्रतापूर्वक १३ वापस आ जायँ । इस प्रकार दैत्यपति महिषासुरकी सेनाके बलाबलको भलीभाँति जान लेनेके पश्चात् मैं शीघ्र ही आक्रमण अथवा किलेबन्दी करनेका प्रबन्ध करूँगा । सर्वदा भलीभाँति सोच - समझकर बुद्धिमान् मनुष्यको कार्य करना चाहिये; क्योंकि बिना विचार १४ किये अचानक किया गया कार्य हर तरहसे दुःखदायक ही होता है । अतएव बुद्धिमान् मनुष्योंको सम्यक् रूपसे विचार - विमर्श करके ऐसा कार्य करना चाहिये, जो सुखकर हो ॥ ११ – १४३ ॥ १५ दानवोंमें मतभेद पैदा करनेवाली भेदनीतिका आश्रय लेना भी उचित नहीं जान पड़ता; क्योंकि उनमें पूर्ण मतैक्य है T । अतएव इस कार्यके लिये पहले १६ गुप्तचर भेजे जायँ । उनके द्वारा उन दानवोंके बलाबलको जाननेके पश्चात् श्रेष्ठ नीतिविदोंसे भलीभाँति विचार करके उन कार्योंके लिये नीति निर्धारित की जानी चाहिये । नीतिसे हटकर किया गया कार्य अज्ञात १७ औषधिके सेवनसे उत्पन्न होनेवाले कष्टकी भाँति विपरीत फल देनेवाला होता है ॥ १५ – १७३ ॥ व्यासजी बोले – हे राजन्! इस प्रकार उन सभी देवताओंसे विचार - विमर्श करके देवराज इन्द्रने शत्रुपक्ष रहस्योंकी जानकारीके उद्देश्यसे एक कार्यकुशल १८ गुप्तचर भेजा ॥ १८३ ॥

उस दूतने तत्काल पहुँचकर शत्रुपक्षके सैन्य -बलाबलकी जानकारी प्राप्त की और पुनः इन्द्रके पास १ ९ । वापस आकर उनको सब कुछ बता दिया । शत्रुसेनाकी 1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] -18 C

पृष्ठ 557

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 557 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५४८ निवेदयामास तदा सर्वसैन्यबलाबलम् ज्ञात्वा तद्बलमुद्योगं तुराषाडतिविस्मितः देवानचोदयत्तूर्णं समाहूय पुरोहितम् मन्त्रं मन्त्रविदां श्रेष्ठं चकार त्रिदशेश्वरः उवाचाङ्गिरसश्रेष्ठं समासीनं वरासने इन्द्र उवाच भो भो देवगुरो विद्वकिं कर्तव्यं वदस्व नः

सर्वज्ञोऽसि समुत्पन्ने कार्ये त्वं गतिरद्य नः ।

दानवो महिषो नाम महावीर्यो मदान्वितः ॥

योद्धुकामः समायाति बहुभिर्दानवैर्वृतः ।

तत्र प्रतिक्रिया कार्या त्वया मन्त्रविदाधुना ॥

तेषां शुक्रस्तथा त्वं मे विघ्नहर्ता सुसंयतः । व्यास उवाच श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४ । तैयारीके विषयमें जानकर इन्द्रको महान् आश्चर्य ॥ २० हुआ और उन्होंने देवताओंको तैयारीमें लगनेक आज्ञा दे दी । तत्पश्चात् मन्त्रविदोंमें श्रेष्ठ पुरोध: । देवगुरु बृहस्पतिको बुलाकर इन्द्र उनके साथ परामर्श ॥ २१ करने लगे । उत्तम आसनपर विराजमान श्रेष्ठ अंगिरापुत्र बृहस्पतिसे इन्द्रने कहा ॥ १ ९ –२१३ ॥ । इन्द्र बोले - हे देवगुरो! हे विद्वन्! हमलोगोंको क्या करना चाहिये, हमें बताइये । आप सर्वज्ञ हैं । ॥ २२ आज उत्पन्न इस विषम परिस्थितिमें एकमात्र आप ही हमारे अवलम्ब हैं । महाबली तथा मदोन्मत्त दानव महिषासुर बहुतसे दानवोंको अपने साथ २३ लेकर हम सबसे युद्ध करनेके लिये यहाँ आ रहा है । आप मन्त्रणाविद् हैं, अतएव इस समय कोई २४ प्रतिक्रियात्मक युक्ति बतानेकी कृपा करें । जैसे शुक्राचार्य दानवोंकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार हम देवताओंके कष्टका निवारण करने हेतु आप सदा उद्यत रहते हैं ॥ २२–२४३ ॥ तच्छ्रुत्वा वचनं प्राह तुरासाहं बृहस्पतिः ॥ २५ व्यासजी बोले- यह वचन सुनकर अपने मनमें विचिन्त्य मनसा कामं कार्यसाधनतत्परः । गुरुरुवाच स्वस्थो भव सुरेन्द्र त्वं धैर्यमालम्ब्य मारिष ॥

व्यसने च समुत्पन्ने न त्याज्यं धैर्यमाशु वै ।

जयाजयौ सुराध्यक्ष दैवाधीनौ सदैव हि ॥

स्थातव्यं धैर्यमालम्ब्य तस्माद् बुद्धिमता सदा ।

भवितव्यं भवत्येव जानन्नेव शतक्रतो ॥

उद्यमः सर्वथा कार्यों यथापौरुषमात्मनः ।

मुनयोऽपि हि मुक्त्यर्थमुद्यमैकरताः सदा ॥

दैवाधीनं च जानन्तो योगध्यानपरायणाः ।

तस्मात्सदैव कर्तव्यो व्यवहारोदितोद्यमः ॥

सुखं भवतु वा मा वा दैवे का परिदेवना ।

विना पुरुषकारेण कदाचित्सिद्धिमाप्नुयात् ॥

1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] -18 D भलीभाँति सोचकर सदा कार्यसिद्धिके लिये तत्पर रहनेवाले बृहस्पति इन्द्रसे कहने लगे ॥ २५३ ॥

गुरु बोले – - हे देवेन्द्र! आप निश्चिन्त हो २६ जाइये | हे महानुभाव! धैर्य धारण कीजिये, विषम परिस्थिति आ जानेपर सहसा धैर्य नहीं खोना चाहिये 1 । हे सुराध्यक्ष! हार तथा जीत सदा दैवाधीन २७ होती हैं, अतएव बुद्धिमान् प्राणीको चाहिये कि वह सदैव धैर्य धारण करके स्थित रहे । हे शतक्रतो! होनी होकर रहती है, ऐसा समझते हुए मनुष्यको २८ अपनी सामर्थ्यके अनुसार सदा उद्यम करना चाहिये । सब कुछ दैवके अधीन है - यह जानते २ ९ हुए भी योगध्यानपरायण मुनिगण भी मुक्ति - प्राप्ति हेतु निरन्तर उद्यमशील रहते हैं । अतएव मनुष्यको अपने सामर्थ्यानुसार सदैव उद्योग करते रहना ३० चाहिये ॥ २६-३० ॥ सुख मिले अथवा न मिले - इस दैवाधीन विषयमें चिन्ताकी क्या आवश्यकता? बिना पुरुषार्थ किये ही ३१ संयोगसे सिद्धि मिल जाय - ऐसा मानकर अन्धे तथा

पृष्ठ 558

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 558 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ४ ] पञ्चम स्कन्ध ५४ ९

अन्धवत्पङ्गवत्कामं न तथा मुदमावहेत् ।

कृते पुरुषकारेऽपि यदि सिद्धिर्न जायते ॥

न तत्र दूषणं तस्य दैवाधीने शरीरिणि ।

कार्यसिद्धिर्न सैन्येऽस्ति न मन्त्रे न च मन्त्रणे ॥

न रथे नायुधे नूनं दैवाधीना सुराधिप ।

बलवान्क्लेशमाप्नोति निर्बलः सुखमश्नुते ॥

बुद्धिमान्क्षुधितः शेते निर्बुद्धिभगवान्भवेत् ।

कातरो जयमाप्नोति शूरो याति पराजयम् ॥

दैवाधीने तु संसारे कामं का परिदेवना ।

उद्यमे योजयेन्नूनं भवितव्यं सुराधिप ॥

दुःखदे सुखदे वापि तत्र तौ न विचिन्तयेत् ।

दुःखे दुःखाधिकान्पश्येत्सुखे पश्येत्सुखाधिकम् ॥

आत्मानं हर्षशोकाभ्यां शत्रुभ्यामिव नार्पयेत् ।

धैर्यमेवावगन्तव्यं हर्षशोकोद्भवे बुधैः ॥

अधैर्याद्यादृशं दुःखं न तु धैर्येऽस्ति तादृशम् ।

दुर्लभं सहनत्वं वै समये सुखदुःखयोः ॥

हर्षशोकोद्भवो यत्र न भवेद् बुद्धिनिश्चयात् ।

किं दुःखं कस्य वा दुःखं निर्गुणोऽहं सदाव्ययः ॥

लँगड़ेकी भाँति अकर्मण्य होकर प्रसन्नतापूर्वक पड़े ३२ रहना उचित नहीं है । पुरुषार्थ करनेपर भी यदि सिद्धि नहीं मिलती है तो इसमें उस व्यक्तिका कोई अपराध नहीं है; क्योंकि प्रत्येक शरीरधारी सदा दैवके अधीन रहता है । कार्यकी सिद्धि न सेनासे, न मन्त्रसे, न ३३ मन्त्रणासे, न रथसे और न तो आयुधसे ही मिलती है । हे सुरेन्द्र! सफलता तो निश्चितरूपसे दैवके अधीन रहती है ॥३१ - ३३३ ॥ [ ऐसा भी देखा जाता है कि ] बलशाली कष्ट ३४ पाता है तथा बलहीन सुखोपभोग करता है, बुद्धिमान् भूखा ही सो जाता है तथा बुद्धिहीन अनेक उत्तम भोज्य पदार्थों का सेवन करता है, कायर व्यक्तिकी जीत हो जाती है तथा वीर पराजित हो जाता है । है ३५ सुराधिप! यह समस्त जगत् ही दैवके अधीन है, तो फिर चिन्ताकी आवश्यकता ही क्या? ऐसा दृढ़ विश्वास करके भाग्यको उद्योगके साथ संयोजित कर देना चाहिये ॥ ३४–३६ ॥ ३६ उद्योग करनेके बाद सुख प्राप्त हो अथवा दुःख – इन दोनोंके विषयमें किसी प्रकारकी चिन्ता नहीं करनी चाहिये । दुःख आनेपर अपनेसे अधिक दुःखीजनोंको तथा सुख आनेपर अधिक सुखी व्यक्तिको ३७ देखना चाहिये ॥ ३७ ॥

अपने आपको शत्रुतुल्य हर्ष तथा शोकको अर्पित नहीं करना चाहिये । बुद्धिमान् पुरुषोंको हर्ष या शोकके उपस्थित होनेपर धैर्यका अवलम्बन करना ३८ | चाहिये ॥ ३८ ॥

अधीर हो जानेसे जैसा दुःख प्राप्त होता है, वैसा दुःख धैर्य धारण करनेसे कभी नहीं होता । किंतु सुख तथा दुःखके अवसरपर सहनशील बने रहना ३ ९ । अति दुर्लभ है ॥ ३ ९ ॥ जब हर्ष अथवा शोक उत्पन्न हों तब अपनी बुद्धिसे निश्चय करके उनसे अप्रभावित बने रहना चाहिये । वैसी परिस्थितिमें सोचना चाहिये कि दुःख ४० क्या है; और यह दुःख किसे होता है? मैं तो सदा

पृष्ठ 559

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 559 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५५० चतुर्विंशातिरिक्तोऽस्मि किं मे दुःखं सुखञ्च किम् प्राणस्य क्षुत्पिपासे द्वे मनसः शोकमूर्च्छने जरामृत्यू शरीरस्य षडूर्मिरहितः शिवः शोकमोहौ शरीरस्य गुणौ किं मेऽत्र चिन्तने शरीरं नाहमथवा तत्सम्बन्धी न चाप्यहम् सप्तैकषोडशादिभ्यो विभिन्नोऽहं सदा सुखी प्रकृतिर्विकृतिर्नाहं किं मे दुःखं सदा पुनः इति मत्वा सुरेश त्वं मनसा भव निर्ममः उपाय: प्रथमोऽयं ते दुःखनाशे शतक्रतो ममता परमं दुःखं निर्ममत्वं परं सुखम् सन्तोषादपरं नास्ति सुखस्थानं शचीपते अथवा यदि न ज्ञानं ममत्वनाशने किल ततो विवेकः कर्तव्यो भवितव्ये सुराधिप । प्रारब्धकर्मणां नाशो नाभोगाल्लक्ष्यते किल

यद्भावि तद्भवत्येव का चिन्ता सुखदुःखयोः ।

सुरैः सर्वैः सहायैर्वा बुद्धया वा तव सत्तम ॥

सुखं क्षयाय पुण्यस्य दुःखं पापस्य मारिष ।

तस्मात्सुखक्षये हर्षः कर्तव्यः सर्वथा बुधैः ॥

अथवा मन्त्रयित्वाद्य कुरु यत्नं यथाविधि ।

कृते यने महाराज भवितव्यं भविष्यति ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ०४ । गुणोंसे रहित और अविनाशी हूँ । मैं तो चौबीस ॥ ४१ तत्त्वोंसे भिन्न आत्मतत्त्व हूँ, तब सुख अथवा दु: खसे मेरा क्या प्रयोजन? भूख तथा प्यासका सम्बन्ध प्राणसे, शोक तथा मोहका सम्बन्ध मनसे एवं जरा । तथा मृत्युका सम्बन्ध शरीरसे है । मैं तो इन छहों ॥ ४२ ऊर्मियोंसे रहित कल्याणस्वरूप हूँ । शोक तथा मोह शरीरके गुण हैं; इनके विषयमें सोचनेकी मुझे क्या । आवश्यकता? ॥ ४०– - ४२ ॥ ॥ ४३ मैं न शरीर हूँ और न तो इससे मेरा कोई सम्बन्ध है । मैं तो महदादि सात विकृतियों, एक । प्रकृति तथा सोलह विकारोंसे पृथक् रहनेवाला सदा सुखस्वरूप हूँ । मैं न प्रकृति हूँ और न तो विकृति ॥ ४४ हूँ; तब मुझे दुःख किस बातका? हे देवेश! अपने मनमें ऐसा निश्चय करके आप ममतारहित हो । जाइये । हे शतयज्ञकर्ता इन्द्र! आपके दुःखनाशका ॥ ४५ यही प्रधान उपाय है; क्योंकि ममता है तथा निर्ममता सबसे बड़ा सुख हे शचीपते! सन्तोषसे बढ़कर । स्थान नहीं है । अथवा हे देवराज! ॥ ४६ ममताको नष्ट करनेवाले ज्ञानका प्रारब्धके विषयमें विवेकका आश्रय है । बिना भोगके प्रारब्ध कर्मोंका ॥ ४७ हो सकता ॥ ४६-४७ ॥ सबसे बड़ा दुःख है ॥ ४३–४५ ॥ सुखका कोई भी यदि आपके पास अभाव हो तो लेना परमावश्यक नाश कभी नहीं हे आर्य! सभी देवता आपके सहायक हों अथवा केवल आपकी बुद्धि सहायक बने – जो होना है वह होकर रहेगा, तब सुख अथवा दुःखके विषयमें ४८ चिन्ता क्या? ॥ ४८ ॥

हे महाभाग! सुखके उपभोगसे पुण्यका क्षय होता है और दुःख भोगनेसे पापका नाश होता है । ४ ९ | अतएव बुद्धिमान् पुरुषोंको सुख - क्षयकी स्थितिमें हर प्रकारसे प्रसन्नताका अनुभव करना चाहिये ॥ ४ ९ ॥ अथवा हे महाराज! यदि आपकी इच्छा हो तो

विधिवत् परामर्श करके आप यत्न करनेमें तत्पर हो जाइये ।

५० । प्रयत्न करनेपर भी जो होना होगा, वही होगा ॥ ५० ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे भयातुरेन्द्रादिदेवैः सुरगुरुणा सह परामर्शवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

पृष्ठ 560

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 560 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ५ ] पञ्चम स्कन्ध ५५१ अथ पञ्चमोऽध्यायः इन्द्रका ब्रह्मा, शिव और विष्णुके युद्धस्थलमें आना तथा चिक्षुर, व्यास उवाच

इति श्रुत्वा सहस्राक्षः पुनराह बृहस्पतिम् ।

युद्धोद्योगं करिष्यामि हयारेर्नाशनाय वै ॥

नोद्यमेन विना राज्यं न सुखं न च वै यशः ।

निरुद्यमं न शंसन्ति कातरा न च सोद्यमाः ॥

यतीनां भूषणं ज्ञानं सन्तोषो हि द्विजन्मनाम् ।

उद्यमः शत्रुहननं भूषणं भूतिमिच्छताम् ॥

उद्यमेन हतस्त्वाष्ट्रो नमुचिर्बल एव च ।

तथैनं निहनिष्यामि महिषं मुनिसत्तम ॥

बलं देवगुरुस्त्वं मे वज्रमायुधमुत्तमम् ।

सहायस्तु हरिर्नूनं तथोमापतिरव्ययः ॥

रक्षोघ्नान्पठ मे साधो करोम्यद्य समुद्यमम् ।

स्वसैन्याभिनिवेशञ्च महिषं प्रति मानद ॥

व्यास उवाच

इत्युक्तो देवराजेन वाचस्पतिरुवाच ह ।

सुरेन्द्रं युद्धसंरक्तं स्मितपूर्वं वचस्तदा ॥

बृहस्पतिरुवाच

प्रेरयामि न चाहं त्वां न च निर्वारयाम्यहम् ।

सन्दिग्धेऽत्र जये कामं युध्यतश्च पराजये ॥

न तेऽत्र दूषणं किञ्चिद्भवितव्ये शचीपते ।

सुखं वा यदि वा दुःखं विहितं च भविष्यति ॥

पास जाना, तीनों देवताओंसहित इन्द्रका बिडाल और ताम्रको पराजित करना व्यासजी बोले - हे महाराज! यह सुनकर सहस्रनेत्र इन्द्रने बृहस्पतिसे कहा कि मैं महिषासुरके १ विनाशके लिये अब युद्धकी तैयारी अवश्य करूँगा; क्योंकि उद्योगके बिना न राज्य, न सुख और न तो यशकी ही प्राप्ति होती है । उद्यमहीनकी प्रशंसा न तो कायर लोग करते हैं और न उद्योगपरायण ॥ १-२ ॥ २ संन्यासियोंका आभूषण ज्ञान है तथा ब्राह्मणोंका आभूषण सन्तोष है; किंतु अपनी उन्नतिकी आकांक्षा रखनेवाले लोगोंके लिये उद्योगपरायण रहते हुए शत्रुसंहारका कार्य ही आभूषण है ॥ ३ ॥

हे मुनिश्रेष्ठ! उद्यमका आश्रय लेकर ही मैंने वृत्रासुर, नमुचि तथा बल आदि दैत्योंका ४ संहार किया था; उसी प्रकार मैं महिषासुरका भी वध करूँगा ॥४ ॥

आप देवगुरु बृहस्पति तथा श्रेष्ठ आयुध वज्र ५ मेरे महान् बलके रूपमें सुलभ हैं । साथ ही भगवान् विष्णु तथा अविनाशी शिवजी मेरी सहायता अवश्य करेंगे ॥ ५ ॥

हे मानद! अब मैं महिषासुरके साथ युद्ध ६ करनेके लिये सेनाकी तैयारीके उद्योगमें लग रहा हूँ । हे साधो! अब आप मेरे कल्याणार्थ रक्षोघ्न मन्त्रोंका पाठ कीजिये ॥ ६ ॥

व्यासजी बोले — हे राजन्! देवराज इन्द्रके ७ ऐसा कहनेपर युद्धके लिये सर्वथा तत्पर उन सुरेन्द्रसे मुसकराकर बृहस्पतिने यह वचन कहा - ॥७ ॥

बृहस्पति बोले- इस समय मैं आपको युद्धके लिये न तो प्रेरित करूँगा और न तो इससे आपको रोकूँगा ही; क्योंकि युद्ध करनेवालेकी हार तथा ८ जीत दोनों ही अनिश्चित रहती हैं ॥८ ॥

हे शचीपते! इस होनहारके विषयमें आपका कोई दोष नहीं है । जो भी सुख - दुःख पूर्वतः निर्धारित ९ है, वह तो अवश्य ही प्राप्त होगा ॥९ ॥