देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 561–570
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 561–570
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५५२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ५
न मया तत्परिज्ञातं भावि दुःखं सुखं तथा ।
यद्भार्याहरणे प्राप्तं पुरा वासव वेत्सि हि ॥
शशिना मे हृता भार्या मित्रेणामित्रकर्शन ।
स्वाश्रमस्थेन सम्प्राप्तं दुःखं सर्वसुखापहम् ॥
बुद्धिमान्सर्वलोकेषु विदितोऽहं सुराधिप क्व मे गता तदा बुद्धिर्यदा भार्या हृता बलात् ॥ तस्मादुपायः कर्तव्यो बुद्धिमद्भिः सदा नरैः । कार्यसिद्धिः सदा नूनं दैवाधीना सुराधिप । व्यास उवाच
तच्छ्रुत्वा वचनं सत्यं गुरोः सार्थं शचीपतिः ।
ब्रह्माणं शरणं गत्वा नत्वा वचनमब्रवीत् ॥
पितामह सुराध्यक्ष दैत्यो महिषसंज्ञकः ।
ग्रहीतुकामः स्वर्गं मे बलोद्योगं करोत्यलम् ॥
अन्ये च दानवाः सर्वे तत्सैन्यं समुपस्थिताः ।
योद्धुकामा महावीर्याः सर्वे युद्धविशारदाः ॥
तेनाहं भीतभीतोऽस्मि त्वत्सकाशमिहागतः ।
सर्वज्ञोऽसि महाप्राज्ञ साहाय्यं कर्तुमर्हसि ॥
ब्रह्मोवाच
गच्छामः सर्व एवाद्य कैलासं त्वरिता वयम् ।
शङ्करं पुरतः कृत्वा विष्णुं च बलिनां वरम् ॥
ततो युद्धं प्रकर्तव्यं सर्वैः सुरगणैः सह ।
मिलित्वा मन्त्रमाधाय देशं कालं विचिन्त्य च ॥
बलाबलमविज्ञाय विवेकमपहाय च ।
साहसं तु प्रकुर्वाणो नरः पतनमृच्छति ॥
भविष्यमें आपको प्राप्त होनेवाले सुख या १० दुःखके विषयमें मुझे कोई भी ज्ञान नहीं है; क्योंकि हे वासव! आप यह बात भलीभाँति जानते हैं कि पूर्व समयमें अपनी भार्याके हरणके अवसरपर मुझे बहुत ही कष्ट उठाना पड़ा था ॥१० ॥
११ हे शत्रुनिषूदन! चन्द्रमाने मेरी पत्नीका हरण कर लिया था, जिसके फलस्वरूप अपने आश्रम में । रहते हुए मुझे सभी सुखोंका विनाश करनेवाला महान् १२ कष्ट झेलना पड़ा ॥११ ॥
हे सुराधिप! मैं सभी लोकोंमें परम बुद्धिमान्के रूपमें विश्रुत हूँ; किंतु जब मेरी भार्याका बलपूर्वक १३ हरण कर लिया गया था तो उस समय मेरी बुद्धि कहाँ चली गयी थी? ॥१२ ॥
अतएव हे सुराधिप! बुद्धिमान् लोगोंको सदा यत्नपरायण होना चाहिये । कार्यकी सिद्धि तो १४ निश्चितरूपसे सदा दैवके ही अधीन रहती है ॥ १३ ॥
व्यासजी बोले – गुरु बृहस्पतिका यह सत्य तथा अर्थयुक्त वचन सुनकर इन्द्र ब्रह्माजीकी शरणमें जाकर उन्हें प्रणाम करके बोले - ॥ १४ ॥
१५ हे पितामह! हे देवाध्यक्ष! इस समय महिषासुर नामक दैत्य मेरे स्वर्गलोकपर अपना अधिकार स्थापित करनेकी कामनासे सैन्यबलकी तैयारी कर रहा है ॥ १५ ॥
१६ अन्य दानव भी उसकी सेनामें सम्मिलित हो रहे हैं । वे सब - के - सब सदा युद्धके लिये आतुर रहनेवाले, महान् पराक्रमी तथा युद्धकलामें अत्यन्त प्रवीण हैं ॥ १६ ॥
१७ उस दानवसे भयभीत होकर मैं आपकी शरण में यहाँ आया हूँ । हे महाप्राज्ञ! आप तो सर्ववेत्ता हैं तथा मेरी सहायता करनेमें पूर्ण समर्थ हैं ॥ १७ ॥
ब्रह्माजी बोले- हमलोग इसी समय शीघ्रतापूर्वक कैलास चलें और वहाँसे शंकरजीको आगे करके १८ बलवानोंमें श्रेष्ठ विष्णुभगवान् के पास चलें । तत्पश्चात् सभी देवगणोंके साथ परस्पर मिलकर देश - कालके सम्बन्धमें भलीभाँति विचार करके एक समुचित १ ९ निर्णय लेकर ही युद्ध करना चाहिये । अपनी शक्ति तथा निर्बलताका सम्यक् ज्ञान किये बिना विवेकका त्याग करके दुःसाहसपूर्ण कार्य करनेवाला व्यक्ति २० । पतनको प्राप्त होता है ॥ १८–२० ॥
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अ ० ५ ] पञ्चम व्यास उवाच
तन्निशम्य सहस्राक्षः कैलासं निर्जगाम ह ।
ब्रह्माणं पुरतः कृत्वा लोकपालसमन्वितः ॥ २१ ।
तुष्टाव शङ्करं गत्वा वेदमन्त्रैर्महेश्वरम् ।
प्रसन्नं पुरतः कृत्वा ययौ विष्णुपुरं प्रति ॥ २२
स्तुत्वा तं देवदेवेशं कार्यं प्रोवाच चात्मनः ।
महिषात्तद्भयं चोग्रं वरदानमदोद्धतात् ॥ २३
तदाकर्ण्य भयं तस्य विष्णुर्देवानुवाच ह ।
करिष्यामो वयं युद्धं हनिष्यामस्तु दुर्जयम् ॥ २४
व्यास उवाच
इति ते निश्चयं कृत्वा ब्रह्मविष्णुहरीश्वराः ।
स्वानि स्वानि समारुह्य वाहनानि ययुः सुराः ॥ २५
ब्रह्मा हंससमारूढो विष्णुर्गरुडवाहनः ।
शङ्करो वृषभारूढो वृत्रहा गजसंस्थितः ॥ २६
मयूरवाहनः स्कन्दो यमो महिषवाहनः ।
कृत्वा सैन्यसमायोगं यावत्ते निर्ययुः सुराः ॥ २७
तावद्दैत्यबलं प्राप्तं दृप्तं महिषपालितम् ।
तत्राभूत्तुमुलं युद्धं देवदानवसैन्ययोः ॥ २८
बाणैः खड्गैस्तथा प्रासैर्मुसलैश्च परश्वधैः ।
गदाभिः पट्टिशैः शूलैश्चक्रैश्च शक्तितोमरैः ॥ २ ९
मुद्गरैर्भिन्दिपालैश्च हलैश्चैवातिदारुणैः ।
अन्यैश्च विविधैरस्त्रैर्निजघ्नुस्ते परस्परम् ॥ ३०
सेनानीश्चिक्षुरस्तस्य गजारूढो महाबलः ।
मघवन्तं पञ्चभिस्तैः सायकैः समताडयत् ॥ ३१
तुराषाडपि तांश्छित्त्वा बाणैर्बाणांस्त्वरान्वितः ।
हृदये चार्धचन्द्रेण ताडयामास तं कृती ॥ ३२
बाणाहतस्तु सेनानीः प्राप मूर्च्छा गजोपरि ।
करिणं वज्रघातेन स जघान करे ततः ॥ ३३
स्कन्ध ५५३ व्यासजी बोले- यह सुनकर इन्द्र ब्रह्माजीको आगे करके समस्त लोकपालोंके साथ कैलासकी ओर चल पड़े ॥ २१ ॥
कैलास पहुँचकर इन्द्रने वेदमन्त्रोंके द्वारा शिवजीकी स्तुति की । तत्पश्चात् [ स्तुतिगानसे ] अत्यन्त प्रसन्नताको प्राप्त भगवान् शंकरको आगे करके वे विष्णुलोक गये ॥ २२ ॥
उन देवाधिदेव भगवान् विष्णुकी स्तुति करके | उन्होंने वहाँ अपने आनेका उद्देश्य बताया तथा वरदान पानेके कारण गर्वोन्मत्त महिषासुरसे उत्पन्न उग्र भयके बारेमें उनसे कहा ॥ २३ ॥
उनके भयको सुनकर भगवान् विष्णुने देवताओंसे कहा कि हम देवगण युद्ध करेंगे और उस दुर्जयका वध कर डालेंगे ॥ २४ ॥
व्यासजी बोले- ऐसा निश्चय करके ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा इन्द्र आदि देवता अपने - अपने वाहनोंपर चढ़कर चल पड़े ॥ २५ ॥
ब्रह्माजी हंसपर चढ़े, विष्णुभगवान्ने गरुडको अपना वाहन बनाया, शंकरजी वृषभपर सवार हुए, इन्द्र ऐरावत हाथीपर बैठे, स्वामी कार्तिकेय मोरपर चढ़े और यमराज महिषपर आरूढ़ हुए । इस प्रकार अपनी सैन्य तैयारी करके देवता लोग ज्यों ही आगे बढ़े, तभी उन्हें महिषासुरके द्वारा पालित मदोन्मत्त दानवी - सेना सामने मिल गयी । इसके बाद वहींपर देवताओं तथा दानवोंकी सेनामें भयंकर युद्ध आरम्भ हो गया ॥ २६ - २८ ॥ वे एक - दूसरेपर बाण, तलवार, भाला, मूसल, परशु, गदा, पट्टिश, शूल, चक्र, शक्ति, तोमर, मुद्गर, भिन्दिपाल, हल तथा अन्य अति भयंकर शस्त्रोंसे प्रहार करने लगे ॥ २ ९ -३० ॥ महिषासुरके सेनापति महाबली चिक्षुरने हाथीपर चढ़कर इन्द्रपर पाँच बाणोंसे प्रहार किया ॥३१ ॥
युद्धकुशल इन्द्रने भी तत्काल अपने बाणोंसे उसके बाणोंको काटकर अपने अर्धचन्द्र नामक बाणसे उसके हृदय - स्थलपर आघात किया ॥३२ ॥
उस बाणसे आहत होकर सेनानायक चिक्षुर हाथीपर बैठे - बैठे ही मूच्छित हो गया । इसके बाद । इन्द्रने हाथीकी सूँड़पर वज्रसे प्रहार किया ॥३३ ॥
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५५४ तद्वज्राभिहतो नागो भग्नः सैन्यं जगाम ह दृष्ट्वा तं दैत्यराट् क्रुद्धो बिडालाख्यमथाब्रवीत्
गच्छ वीर महाबाहो जहीन्द्रं मदगर्वितम् ।
वरुणादीन्परान्देवान्हत्वागच्छ ममान्तिकम् ॥
व्यास उवाच
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य बिडालाख्यो महाबलः ।
आरुह्य वारणं मत्तं जगाम त्रिदशाधिपम् ॥
वासवस्तं समायान्तं दृष्ट्वा क्रोधसमन्वितः ।
जघान विशिखैस्तीक्ष्णैराशीविषसमप्रभैः ॥
स तु छित्त्वा शरांस्तूर्णं स्वशरैश्चापनिःसृतैः ।
पञ्चाशद्भिर्जघानाशु वासवञ्च शिलीमुखैः ॥
तथेन्द्रोऽपि च तान्बाणांश्छित्त्वा कोपसमन्वितः ।
जघान विशिखैस्तीक्ष्णैराशीविषसमप्रभैः ॥
स तु छित्त्वा शरांस्तूर्णं स्वशरैश्चापनिःसृतैः ।
गदया ताडयामास गजं तस्य करोपरि ॥
स्वकरे निहतो नागश्चकारार्तस्वरं मुहुः ।
परिवृत्य जघानाशु दैत्यसैन्यं भयातुरम् ॥
दानवस्तु गजं वीक्ष्य परावृत्य गतं रणात् ।
समाविश्य रथे रम्ये जगामाशु सुरान् रणे ॥
तुराषाडपि तं वीक्ष्य रथस्थं पुनरागतम् ।
अहनद्विशिखैस्तीक्ष्णैराशीविषसमप्रभैः ॥
सोऽपि क्रुद्धश्चकारोग्रां बाणवृष्टिं महाबलः बभूव तुमुलं युद्धं तयोस्तत्र जयैषिणोः ॥ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ५ । उस वज्रके आघातसे हाथीकी सूँड़ कट गयी ॥ ३४ । और वह सेनाके बीच भाग खड़ा हुआ । उसे देखकर दानवराज महिषासुर कुपित हो गया और उसने बिडाल नामक दानवसे कहा - हे महाबाहो! हे वीर! तुम जाओ और बलके अभिमानमें चूर इन्द्रको मार ३५ डालो, साथ ही वरुण आदि अन्य देवताओंका भी वध करके शीघ्र ही मेरे पास लौट आओ ॥ ३४-३५ ॥ व्यासजी बोले – उसकी बात सुनकर वह महाबली बिडाल एक मतवाले हाथीपर सवार होकर ३६ युद्धके लिये इन्द्रकी ओर चल पड़ा ॥३६ ॥
उसे अपनी ओर आते देखकर इन्द्रने कुपित होकर विषधर सर्पतुल्य तीक्ष्ण बाणोंसे बिडालपर प्रहार किया ॥ ३७ ॥
३७ उस बिडालने शीघ्र ही अपने धनुषसे छूटे हुए बाणोंसे इन्द्रके बाण काटकर पुनः तत्काल अपने पचास बाणोंसे इन्द्रपर आघात किया ॥ ३८ ॥
३८ तब इन्द्रने भी क्रुद्ध होकर उसके उन बाणोंको काटकर अपने सर्पतुल्य तीक्ष्ण बाणोंसे उसपर प्रहार किया ॥ ३ ९ ॥ ३ ९ अपने धनुषसे छूटे हुए बाणोंसे उसके बाणोंको काटकर इन्द्रने अपनी गदासे उसके हाथीकी सूँड़पर प्रहार किया ॥ ४० ॥
४० अपनी सूँड़पर गदाके आघातसे वह हाथी बार-बार आर्तनाद करने लगा और पीछे घूमकर भागता हुआ वह दैत्य - सेनाको ही कुचलने लगा, जिससे दानवोंकी सेना भयाकुल हो उठी ॥ ४१ ॥
४१ तत्पश्चात् हाथीको युद्धभूमिसे भागा देखकर वह दानव बिडाल लौटकर चला गया और पुनः एक सुन्दर रथपर सवार होकर देवताओंके समक्ष रणमें ४२ उपस्थित हो गया ॥ ४२ ॥
इन्द्रने बिडालको रथपर सवार होकर पुनः समरांगणमें आया हुआ देखकर अपने सर्पतुल्य तीक्ष्ण बाणोंसे उसपर आघात करना आरम्भ कर दिया ॥ ४३ ॥
४३ वह महाबली बिडाल भी अत्यन्त कुपित होकर भयंकर बाण - वृष्टि करने लगा । इस प्रकार । विजयके इच्छुक उन दोनोंके बीच भीषण युद्ध ४४ | होने लगा ॥ ४४ ॥
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अ ० ५ ] पञ्चम स्कन्ध ५५५
इन्द्रस्तु बलिनं दृष्ट्वा कोपेनाकुलितेन्द्रियः ।
जयन्तमग्रतः कृत्वा युयुधे तेन संयुतः ॥ ४५
जयन्तस्तु शितैर्बाणैस्तं जघान स्तनान्तरे ।
पञ्चभिः प्रबलाकृष्टैरसुरं मदगर्वितम् ॥ ४६
स बाणाभिहतस्तावन्निपपात रथोपरि ।
अतिवाह्य रथं सूतो निर्जगाम रणाजिरात् ॥ ४७
तस्मिन्विनिर्गते दैत्ये बिडालाख्येऽथ मूर्च्छिते ।
जयशब्दो महानासीद्दुन्दुभीनां च निःस्वनः ॥ ४८
सुराः प्रमुदिताः सर्वे तुष्टुवुस्तं शचीपतिम् ।
जगुर्गन्धर्वपतयो ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥ ४ ९
चुकोप महिषः श्रुत्वा जयशब्दं सुरैः कृतम् ।
प्रेषयामास तत्रैव ताम्रं परमदापहम् ॥५०
ताम्रस्तु बहुभिः सार्धं समागम्य रणाजिरे ।
शरवृष्टिं चकाराशु तडित्वानिव सागरे ॥ ५१
वरुणः पाशमुद्यम्य जगाम त्वरितस्तदा ।
यमश्च महिषारूढो दण्डमादाय निर्ययौ ॥ ५२
तत्र युद्धमभूद् घोरं देवदानवयोर्मिथः ।
बाणैः खड्गैश्च मुसलैः शक्तिभिश्च परश्वधैः ॥ ५३
दण्डेन निहतस्ताम्रो यमहस्तोद्यतेन च ।
न चचाल महाबाहुः संग्रामाङ्गणतस्तदा ॥ ५४
चापमाकृष्य वेगेन मुक्त्वा तीव्राञ्छिलीमुखान् । इन्द्रादीनहनत्तूर्णं ताम्रस्तस्मिन् रणाजिरे । ५५
तेऽपि देवाः शरैर्दिव्यैर्निशितैश्च शिलाशितैः ।
निजघ्नुर्दानवान्क्रुद्धास्तिष्ठ तिष्ठेति चुकुशुः ॥ ५६
क्रोधके प्रभावसे व्याकुल इन्द्रियोंवाले इन्द्रने बिडालको विशेष बलवान् देखकर जयन्तको अपना अग्रणी बना लिया और अब उसके साथ मिलकर वे युद्ध करने लगे ॥ ४५ ॥
जयन्तने धनुषपर चढ़ाकर प्रबलतापूर्वक खींचे गये पाँच तीक्ष्ण बाणोंसे मदोन्मत्त उस दानव बिडालके वक्षःस्थलपर आघात किया ॥ ४६ ॥
उन बाणोंके आघातसे मूर्च्छित होकर बिडाल रथपर गिर पड़ा, तब उसका सारथि तत्काल रथ लेकर रण- - भूमिसे बाहर निकल गया ॥४७ ॥
उस बिडालके मूर्च्छित होकर युद्धभूमिसे बाहर चले जानेपर देवसेनामें महान् विजय घोष तथा दुन्दुभियोंकी ध्वनि होने लगी ॥ ४८ ॥
सभी देवता प्रसन्न होकर इन्द्रकी स्तुति करने लगे, गन्धर्व गाने लगे तथा अप्सराएँ नाचने लगीं ॥ ४ ९ ॥ तत्पश्चात् देवताओंके द्वारा किये गये उस विजय घोषको सुनकर महिषासुर कुपित हो उठा । उसने शत्रुओंके अभिमानको चूर - चूर कर देनेवाले ताम्र नामक दानवको युद्धक्षेत्रमें भेजा ॥ ५० ॥
ताम्र बहुत - से सैनिकोंके साथ समरांगणमें आकर | इस प्रकार वेगपूर्वक बाणोंकी वर्षा करने लगा मानो मेघ समुद्रमें जल बरसा रहा हो ॥ ५१ ॥
उस समय वरुणदेव पाश लेकर तथा यमराज हाथमें दण्ड धारण करके महिषपर चढ़कर [ युद्धभूमिमें ] शीघ्र ही पहुँच गये ॥ ५२ ॥
अब देवताओं तथा दानवोंमें परस्पर बाणों, तलवारों, मुसलों, बछियों तथा फरसोंसे भीषण संग्राम होने लगा ॥५३ ॥
यमराजके द्वारा अपने हाथसे फेंके गये दण्डसे ताम्र आहत हो गया, किंतु वह महाबाहु ताम्र समरांगणसे हिलातक नहीं ॥५४ ॥
ताम्र उस संग्रामभूमिमें वेगपूर्वक धनुषको खींच-खींचकर अति तीक्ष्ण बाण छोड़कर इन्द्र आदि । देवताओंपर शीघ्रता से प्रहार करने लगा ॥५५ ॥
वे देवता कुपित होकर पत्थरपर घिसकर नुकीले बनाये गये तीक्ष्ण दिव्य बाणोंसे दानवोंको मारने लगे । और ' ठहरो - ठहरो ' कहकर चिल्लाने लगे ॥ ५६ ॥
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५५६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ०६ निहतस्तैः सुरैर्दैत्यो मूर्च्छामाप रणाङ्गणे । उन देवताओंके प्रहारसे घायल होकर दैत्य ताम्र युद्धभूमिमें मूर्च्छित हो गया । तब भयाक्रान्त दैत्यसेनामें
हाहाकारो महानासीद्दैत्यसैन्ये भयातुरे ॥ ५७ । महान् हाहाकार मच गया ॥५७ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे दैत्यसैन्यपराजयो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
अथ षष्ठोऽध्यायः भगवान् विष्णु और शिवके साथ महिषासुरका भयानक युद्ध व्यास उवाच
ताम्रेऽथ मूर्च्छिते दैत्ये महिषः क्रोधसंयुतः ।
समुद्यम्य गदां गुर्वीं देवानुपजगाम ह ॥
तिष्ठन्त्वद्य सुराः सर्वे हन्म्यहं गदया किल ।
सर्वे बलिभुजः कामं बलहीनाः सदैव हि ॥
इत्युक्त्वासौ गजारूढं सम्प्राप्य मदगर्वितः ।
जघान गदया तूर्णं बाहुमूले महाभुजः ॥
सोऽपि वज्रेण घोरेण चिच्छेदाशु गदाञ्च ताम् ।
प्रहर्तुकामस्त्वरितो जगाम महिषं प्रति ॥
हयारिरपि कोपेन खड्गमादाय सुप्रभम् ।
ययाविन्द्रं महावीर्यं प्रहरिष्यन्निवान्तिकम् ॥
बभूव च तयोर्युद्धं सर्वलोकभयावहम् ।
आयुधैर्विविधैस्तत्र मुनिविस्मयकारकम् ॥
चकाराशु तदा दैत्यो मायां मोहकरीं किल ।
शाम्बरीं सर्वलोकघ्नीं मुनीनामपि मोहिनीम् ॥
कोटिशो महिषास्तत्र तद्रूपास्तत्पराक्रमाः ।
ददृशुः सायुधाः सर्वे निघ्नन्तो देववाहिनीम् ॥
व्यासजी बोले- इस प्रकार दानव ताम्रके मूच्छित हो जानेपर महिषासुर कुपित हो गया और १ एक विशाल गदा लेकर देवताओंके समक्ष जा डटा ॥ १ ॥
हे देवताओ! तुम सब ठहरो; मैं अभी अपनी गदासे तुम सभीको मार डालूँगा । बलिभाग २ ( हविष्य ) खानेवाले तुम सब तो सदासे बलहीन रहे हो - ऐसा कहकर अभिमानके मदमें चूर वह महाबाहु महिषासुर हाथीपर बैठे हुए इन्द्रके पास ३ पहुँचकर उसने उनके बाहुमूलपर अपनी गदासे तीव्र आघात किया ॥ २-३ ॥ इन्द्रने अपने भयंकर वज्रसे उस गदाको तुरंत काट दिया और वे महिषासुरको मारनेकी इच्छासे ४ बड़ी शीघ्रतापूर्वक उसकी ओर बढ़े ॥४ ॥
तत्पश्चात् वह महिषासुर भी कुपित होकर अपने हाथमें चमचमाती हुई तलवार लेकर प्रहार ५ करते हुए महाबली इन्द्रके सामने पहुँच गया ॥ ५ ॥
तब उन दोनोंमें नानाविध आयुधोंके द्वारा समस्त प्राणियोंको भयभीत कर देनेवाला तथा मुनिजनोंको भी विस्मित कर देनेवाला भीषण युद्ध छिड़ गया ॥ ६ ॥
६ तत्पश्चात् दैत्य महिषासुरने सम्पूर्ण जगत्को नष्ट कर देनेवाली तथा मुनियोंको भी मोहित कर देनेवाली मोहकारिणी शाम्बरी मायाका तत्काल प्रयोग किया ॥ ७ ॥
७ उस मायाके प्रभावसे महिषासुरके ही रूपवाले तथा उसीके समान पराक्रमी करोड़ों महिषासुर अनेक प्रकारके आयुध लेकर देवसेनाका संहार करते ८ । हुए दिखायी पड़े ॥ ८ ॥
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अ ० ६ ] पञ्चमं
मघवा विस्मितस्तत्र दृष्ट्वा तां दैत्यनिर्मिताम् ।
बभूवातिभयोद्विग्नो मायां मोहकरीं किल ॥
वरुणोऽपि सुसन्त्रस्तस्तथैव धननायकः ।
यमो हुताशनः सूर्यः शीतरश्मिर्भयातुरः ॥ १०
पलायनपराः सर्वे बभूवुर्मोहिताः सुराः ।
ब्रह्मविष्णुमहेशानां स्मरणं चक्रुरुद्यताः ॥ ११
तत्राजग्मुश्च काजेशाः स्मृतमात्राः सुरोत्तमाः ।
हंसतार्क्ष्यवृषारूढास्त्रातुकामा वरायुधाः ॥ १२
शौरिस्तां मोहिनीं दृष्ट्वा सुदर्शनमथोज्ज्वलम् ।
मुमोच तत्तेजसैव माया सा विलयं गता ॥ १३
वीक्ष्य तान्महिषस्तत्र सृष्टिस्थित्यन्तकारिणः ।
योद्धुकामः समादाय परिघं समुपाद्रवत् ॥ १४
महिषाख्यो महावीरः सेनानीश्चिक्षुरस्तथा ।
उग्रास्यश्चोग्रवीर्यश्च दुद्रुवुर्युद्धकामुकाः ॥ १५
असिलोमात्रिनेत्रश्च बाष्कलोऽन्धक एव च ।
एते चान्ये च बहवो युद्धकामा विनिर्ययुः ॥ १६
सन्नद्धा धृतचापास्ते रथारूढा मदोद्धताः ।
परिवव्रुः सुरान्सर्वान्वृका इव सुवत्सकान् ॥ १७
बाणवृष्टिं ततश्चक्रुर्दानवा मदगर्विताः ।
सुराश्चापि तथा चक्रुः परस्परजिघांसवः ॥ १८
अन्धको हरिमासाद्य पञ्चबाणाञ्छिलाशितान् ।
मुमोच विषसन्दिग्धान्कर्णाकृष्टान्महाबलान् ॥ १ ९
वासुदेवोऽप्यसंप्राप्तान्विशिखानाशुगैस्तदा ।
चिच्छेद तान्पुनः पञ्च मुमोच रिपुनाशनः ॥ २०
स्कन्ध ५५७ तब दैत्य महिषासुरद्वारा उत्पन्न की गयी उस मोहकरी मायाको देखकर इन्द्र विस्मयमें पड़ गये तथा भयसे बहुत व्याकुल हो उठे ॥ ९ ॥
वरुण, कुबेर, यम, अग्नि, सूर्य तथा चन्द्रमा भी भयभीत हो गये और सभीके मनमें त्रास छा गया । सभी देवगण माया- विमोहित होकर भाग खड़े हुए और वे सावधान होकर ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवका स्मरण करने लगे ॥ १०-११ ॥ स्मरण करते ही उनकी रक्षाकी कामनासे श्रेष्ठ आयुध धारण करके सुरश्रेष्ठ ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश अपने - अपने वाहन हंस, गरुड तथा वृषभपर आरूढ होकर वहाँ आ गये ॥१२ ॥
मोहकारिणी उस आसुरी मायाको देखकर भगवान् विष्णुने अपना तेजोमय सुदर्शन चक्र चला दिया, जिसके प्रचण्ड तेजसे वह माया समाप्त हो गयी ॥ १३ ॥
तदनन्तर सृष्टि, पालन तथा संहार करनेवाले उन देवताओंको देखकर उनसे युद्ध करनेकी इच्छासे वह महिषासुर परिघ लेकर उनकी ओर दौड़ा ॥ १४ ॥
इसके बाद महावीर महिषासुर, सेनाध्यक्ष चिक्षुर, उग्रास्य, उग्रवीर्य, असिलोमा, त्रिनेत्र, बाष्कल तथा अन्धक - ये दानव एवं इनके अतिरिक्त अन्य बहुत - से दानव युद्धकी अभिलाषासे निकल पड़े ॥ १५-१६ ॥ उन कवचधारी, धनुष धारण करनेवाले, रथारूढ तथा मदोन्मत्त दानवोंने सभी देवताओंको उसी प्रकार घेर लिया, जिस प्रकार भेड़िये अत्यन्त कोमल बछड़ोंको घेर लेते हैं ॥१७ ॥
तदनन्तर एक - दूसरेको मार डालनेकी इच्छावाले वे मदोन्मत्त दानव तथा देवता बाण - वृष्टि करने लगे ॥ १८ ॥
इसी बीच अन्धकासुरने भगवान् विष्णुके समक्ष पहुँचकर सानपर चढ़ाये गये, विषमें दग्ध किये गये तथा कानतक खींचे गये अत्यन्त शक्तिशाली पाँच बाण छोड़े ॥१ ९ ॥ शत्रुदमन भगवान् विष्णुने भी बड़ी तत्परताके साथ अपने तीव्रगामी बाणोंसे अन्धकासुरके उन बाणोंको दूरसे ही काट डाला और फिर उसके ऊपर । पाँच बाण छोड़े ॥ २० ॥
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५५८ तयोः परस्परं युद्धं बभूव हरिदैत्ययोः बाणासिचक्रमुसलैर्गदाशक्तिपरश्वधैः महेशान्धकयोर्युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् पञ्चाशद्दिनपर्यन्तं बभूव च परस्परम् इन्द्रबाष्कलयोस्तद्वन्महिषासुररुद्रयोः यमत्रिनेत्रयोस्तद्वन्महाहनुधनेशयोः श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ६ । इस प्रकार विष्णु तथा अन्धकासुर - उन दोनों ॥ २१ बाण, तलवार, चक्र, मूसल, गदा, बर्धी तथा फरसोंमें भीषण युद्ध होने लगा ॥२१ ॥
। इसी प्रकार महेश्वर तथा अन्धकासुरके बीच ॥ २२ भीषण रोमांचकारी युद्ध निरन्तर पचास दिनोंतक होता रहा ॥२२ ॥
उसी तरह इन्द्र तथा बाष्कल, महिषासुर तथा ॥ २३ भगवान् रुद्र, यमराज तथा त्रिनेत्र, महाहनु तथा कुबेर एवं असिलोमा तथा वरुणके बीच महाभीषण असिलोमवरुणयोर्युद्धं परमदारुणम् । युद्ध हुआ । इसी बीच अन्धकासुरने अपनी गदासे गरुडं गदया दैत्यो जघान हरिवाहनम् स गदापातखिन्नाङ्गो निःश्वसन्नवतिष्ठत शौरिस्तं दक्षिणेनाशु हस्तेन परिसान्त्वयन् ॥ स्थिरं चकार देवेशो वैनतेयं महाबलम् समाकृष्य धनुः शार्ङ्गं मुमोच विशिखान्बहून् ॥ अन्धकोपरि कोपेन हन्तुकामो जनार्दनः दानवोऽपि च तान्बाणांश्चिच्छेद स्वशरैः शितैः
पञ्चाशद्भिर्हरिं कोपाज्जघान च शिलाशितैः ।
वासुदेवोऽपि तांस्तूर्णं वञ्चयित्वा शरोत्तमान् ॥
चक्रं मुमोच वेगेन सहस्त्रारं सुदर्शनम् ।
त्यक्तं सुदर्शनं दूरात्स्वचक्रेण न्यवारयत् ॥
ननाद च महाराज देवान्सम्मोहयन्निव ।
दृष्ट्वा तु विफलं जातं चक्रं देवस्य शार्ङ्गिणः ॥
जग्मुः शोकं सुराः सर्वे जहर्षुर्दानवास्तथा ।
वासुदेवोऽपि तरसा दृष्ट्वा देवाञ्छुचावृतान् ॥
गदां कौमोदकीं धृत्वा दानवं समुपाद्रवत् ।
तं जघानातिवेगेन मूर्ध्नि मायाविनं हरिः ॥
स गदाभिहतो भूमौ निपपातातिमूर्च्छितः । ॥ २४ भगवान् विष्णुके वाहन गरुडपर प्रहार किया । गदाके प्रहारसे घायल अंगोंवाले गरुड लम्बी साँस खींचते । हुए स्थित हो गये । तत्पश्चात् देवाधिदेव विष्णुने अपने दाहिने हाथ से सहलाकर महाबली गरुडको २५ सान्त्वना प्रदान करते हुए उन्हें स्वस्थचित्त किया ॥ तब भगवान् विष्णुने अन्धकका संहार करनेके २६ विचारसे अपना शार्ङ्गधनुष खींचकर उसके ऊपर बहुत - से बाण छोड़े ॥ २३ – २६३ ॥ । दानव अन्धकने अपने तीक्ष्ण बाणोंसे उन बाणोंको काट डाला और इसके बाद सानपर चढ़ाकर ॥ २७ तेज बनाये गये पचास बाण भगवान् विष्णुके ऊपर कुपित होकर एक ही साथ छोड़े । भगवान् विष्णुने भी उन उत्तम बाणोंको तत्क्षण निष्फल करके अपना २८ हजार अरोंवाला सुदर्शन चक्र अन्धकासुरके ऊपर वेगपूर्वक चलाया । तब अन्धकासुरने भगवान् विष्णुद्वारा छोड़े गये सुदर्शन चक्रको अपने चक्रसे काफी दूरसे २ ९ ही विफल कर दिया । हे महाराज [ जनमेजय ]! इसके बाद देवताओंको सम्मोहित करते हुए उसने भीषण गर्जना की ॥ २७–२९ ३ ॥ ३० तत्पश्चात् शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले भगवान् विष्णुके सुदर्शन चक्रको विफल हुआ देखकर सभी देवता शोकाकुल हो उठे तथा दानवगण हर्षित हो ३१ । गये । तब भगवान् विष्णु भी देवताओंको चिन्तामग्न देखकर अपनी कौमोदकी गदा लेकर दानव अन्धकपर झपट पड़े । श्रीहरिने बड़े वेगसे उस मायावीके मस्तकपर ३२ गदासे प्रहार किया । वह दैत्य गदाके प्रहारसे पूर्णरूपसे मूच्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ३० – ३२३ ॥
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अ ० ६ ] पञ्चम तं तथा पतितं वीक्ष्य हयारिरतिकोपनः ॥ ३३
आजगाम रमानाथं त्रासयन्नतिगर्जितैः ।
वासुदेवोऽपि तं दृष्ट्वा समायान्तं क्रुधान्वितम् ॥ ३४
चापज्यानिनदं चोग्रं चकार नन्दयन्सुरान् ।
शरवृष्टिं चकाराशु भगवान्महिषोपरि ॥ ३५
सोऽपि चिच्छेद बाणौघैस्ताञ्छरान्नगगनेरितान् ।
तयोर्युद्धमभूद्राजन् परस्परभयावहम् ॥ ३६
गदया ताडयामास केशवो मस्तकोपरि ।
स गदाभिहतो मूर्ध्नि पपातोर्व्यां सुमूर्च्छितः ॥ ३७
हाहाकारो महानासीत्सैन्ये तस्य सुदारुणः ।
स विहाय व्यथां दैत्यो मुहूर्तादुत्थितः पुनः ॥ ३८
गृहीत्वा परिघं शीर्षे जघान मधुसूदनम् ।
परिघेणाहतस्तेन मूर्च्छामाप जनार्दनः ॥ ३ ९
मूर्च्छितं तमुवाहाशु जगाम गरुडो रणात् ।
परावृत्ते जगन्नाथे देवा इन्द्रपुरोगमाः ॥ ४०
भयं प्रापुः सुदुःखार्ताश्चुक्रुशुश्च रणाजिरे ।
क्रन्दमानान्सुरान्वीक्ष्य शङ्करः शूलभृत्तदा ॥ ४१
महिषं तरसाभ्येत्य प्राहरद्रोषसंयुतः ।
सोऽपि शक्तिं मुमोचाथ शङ्करस्योरसि स्फुटम् ॥ ४२
जगर्ज स च दुष्टात्मा वञ्चयित्वा त्रिशूलकम् ।
शङ्करोऽपि तदा पीडां न प्रापोरसि ताडितः ॥ ४३
तं जघान त्रिशूलेन कोपादरुणलोचनः । स्कन्ध ५५ ९ उसे इस प्रकार गिरा हुआ देखकर महिषासुर अत्यन्त क्रोधित हो उठा और अपनी घोर गर्जनासे भयभीत करता हुआ भगवान् विष्णुके सामने आ गया । भगवान् विष्णुने भी उस महिषासुरको कुपित होकर अपने समक्ष आया देखकर देवताओंको आनन्दित करते हुए अपने धनुषकी प्रत्यंचासे भयानक टंकार उत्पन्न की । तत्पश्चात् भगवान् विष्णु महिषासुरके ऊपर शीघ्रतापूर्वक बाणोंकी बौछार करने लगे । उसने भी अपने बाणसमूहों से उन आते हुए बाणोंको आकाशमें ही काट डाला । हे राजन्! इस प्रकार उन दोनोंमें परस्पर अति भीषण युद्ध हुआ ॥ ३३–३६ ॥ भगवान् विष्णुने गदासे महिषासुर के मस्तकपर प्रहार किया । मस्तकपर उस गदाके आघातसे मूच्छित होकर वह पृथ्वीपर गिर पड़ा । [ यह देखकर ] उसकी सेनामें अति भीषण हाहाकार मच गया । कुछ ही क्षणोंमें अपनी वेदनाको भूलकर वह दैत्य फिर उठकर खड़ा हो गया । उसने तत्काल एक परिघ लेकर मधुसूदन श्रीविष्णुके सिरपर प्रहार किया । उस परिघके प्रहारसे आहत होकर भगवान् विष्णु मूर्च्छाको प्राप्त हो गये । तब गरुड मूर्च्छाको प्राप्त उन भगवान् विष्णुको युद्धस्थलसे लेकर बाहर चले गये । इस प्रकार जगत्पति विष्णुके समरांगणसे लौट जानेपर इन्द्र आदि प्रधान देवता भयभीत हो गये और दुःखसे पीड़ित होकर युद्धभूमिमें चीखने-चिल्लाने लगे ॥ ३७–४०३ ॥ तत्पश्चात् शूलधारी भगवान् शंकरने देवताओंको इस प्रकार करुण क्रन्दन करते हुए देखकर अत्यन्त क्रोधके साथ महिषासुरके पास द्रुतगति से पहुँचकर उसपर भीषण प्रहार किया । उस महिषासुरने भी भगवान् शंकरके वक्षःस्थलपर अपनी शक्ति ( ब ) - से तेज प्रहार किया और उनके त्रिशूलप्रहारको विफल करके उस दुष्टात्माने बड़ी तेज गर्जना की । वक्षपर प्रहार होनेपर भी भगवान् शंकरको कोई पीड़ा नहीं हुई और क्रोधसे आँखें लाल करके उन्होंने उसपर अपने त्रिशूलसे प्रहार किया ॥ ४१-४३३ ॥
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५६० संलग्नं शङ्करं दृष्ट्वा महिषेण दुरात्मना ॥
आजमाम हरिस्तावत्त्यक्त्वा मूर्च्छा प्रहारजाम् ।
महिषस्तु तदा वीक्ष्य सम्प्राप्तौ हरिशङ्करौ ॥
युद्धकामौ महावीर्यौ चक्रशूलधरौ वरौ ।
कोपयुक्तो बभूवासौ दृष्ट्वा तौ समुपागतौ ॥
जगाम सम्मुखस्तावत्संग्रामार्थं महाभुजः ।
माहिषं वपुरास्थाय धुन्वन्पुच्छं समुत्कटम् ॥
चकार भैरवं नादं त्रासयन्नमरानपि ।
धुन्वञ्छृङ्गे महाकायो दारुणो जलदो यथा ॥
शृङ्गाभ्यां पर्वताञ्छृङ्गांश्चिक्षेप भृशमुत्कटान् ।
दृष्ट्वा तौ तु महावीर्यौ दानवं देवसत्तमौ ॥
चक्रतुर्बाणवृष्टिं च दानवोपरि दारुणाम् ।
कुर्वाणौ बाणवृष्टिं तौ दृष्ट्वा हरिहरौ हरिः ॥
चिक्षेप गिरिशृङ्गं तु पुच्छेनावृत्य दारुणम् ।
आपतन्तं गिरिं वीक्ष्य भगवान्सात्वतां पतिः ॥
विशिखैः शतधा चक्रे चक्रेणाशु जघान तम् ।
हरिचक्राहतः संख्ये मूर्च्छामाप स दैत्यराट् ॥
उत्तस्थौ च क्षणान्नूनं मानुषं वपुरास्थितः ।
गदापाणिर्महाघोरो दानवः पर्वतोपमः ॥
मेघनादं ननादोच्चैर्भीषयन्नमरानपि । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ६ ४४ इसी बीच दुष्टात्मा महिषासुरके साथ भगवान् शंकरको इस प्रकार युद्धरत देखकर प्रहारजनित मूर्च्छाका त्याग करके वहाँ भगवान् विष्णु आ गये I । उस समय ४५ युद्धके लिये उत्सुक महापराक्रमी विष्णु तथा शिवको श्रेष्ठ सुदर्शन चक्र तथा त्रिशूल धारण करके लड़नेके लिये अपने समक्ष उपस्थित देखकर वह महाबली ४६ महिषासुर अत्यन्त कुपित हो उठा । तत्पश्चात् वह विशालबाहु दैत्य उन दोनों देवताओंको अपने समीप आया हुआ देखकर महिषका रूप धारण करके पूँछ ४७ हिलाता हुआ युद्ध करनेके लिये उनके समक्ष पहुँच गया । देवताओंको आतंकित करते हुए उस विशालकाय तथा भयावह महिषासुरने अपनी सींगें फटकारते हुए ४८ मेघकी भाँति भीषण गर्जना की तथा वह अपनी सींगोंसे पर्वतोंकी बड़ी - बड़ी चट्टानें उखाड़ - उखाड़कर फेंकने लगा ॥ ४४–४८३ ॥ ४ ९ उस दानवको देखकर महापराक्रमी देवश्रेष्ठ विष्णु तथा शंकर उसके ऊपर भीषण बाण- -वृष्टि करने लगे । भगवान् विष्णु तथा शिवको अपने ऊपर बाण - - त वृष्टि ५० करते हुए देखकर महिषासुरने अपनी पूँछमें एक भयानक पर्वतशिखर लपेटकर उनके ऊपर फेंका । उस पर्वत-५१ शिखरको आते देखकर भगवान् विष्णुने अपने बाणोंसे उसके सैकड़ों टुकड़े कर दिये और फिर सुदर्शन चक्रसे उसके ऊपर शीघ्रतासे प्रहार किया । भगवान् विष्णुके ५२ | चक्रसे आहत होकर वह दैत्यराज महिषासुर युद्धमें मूच्छित हो गया । किंतु थोड़ी ही देरमें वह मनुष्यका शरीर धारण करके उठ खड़ा हुआ । पर्वतके समान ५३ शरीरवाला वह महाभयानक दैत्य हाथमें गदा धारणकर देवताओंको भयभीत करता हुआ मेघके समान जोर-जोरसे गरजने लगा ॥ ४ ९ –५३३ ॥ तच्छ्रुत्वा भगवान्विष्णुः पाञ्चजन्यं समुज्वलम् ॥५४ उस नादको सुनकर भगवान् विष्णुने तीव्रतर ध्वनि पूरयामास तरसा शब्दं कर्तुं खरस्वरम् । उत्पन्न करनेके लिये बड़ी तेजीसे अपना देदीप्यमान पांचजन्य नामक शंख बजाया । शंखकी उस ध्वनिसे तेन शब्देन शङ्खस्य भयत्रस्ताश्च दानवाः । समस्त दानव भयभीत हो गये और तपोधन ऋषिगण बभूवुर्मुदिता देवा ऋषयश्च तपोधनाः ॥ ५५ तथा देवता आनन्दमग्न हो गये ॥ ५४-५५ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे महिषासुरस्येन्द्रादिदेवैः सह युद्धवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
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अ ० ७ ] पञ्चम स्कन्ध ५६१ अथ सप्तमोऽध्यायः महिषासुरको अवध्य जानकर त्रिदेवोंका अपने - अपने लोक लौट जाना, देवताओंकी पराजय तथा महिषासुरका स्वर्गपर आधिपत्य, इन्द्रका ब्रह्मा और शिवजीके साथ विष्णुलोकके लिये प्रस्थान व्यास उवाच
असुरान्महिषो दृष्ट्वा विषण्णमनसस्तदा ।
त्यक्त्वा तन्माहिषं रूपं बभूव मृगराडसौ ॥
कृत्वा नादं महाघोरं विस्तार्य च महासटाम् । पपात सुरसेनायां त्रासयन्नखदर्शनैः
गरुडञ्च नखाघातैः कृत्वा रुधिरविप्लुतम् ।
जघान च भुजे विष्णुं नखाघातेन केसरी ॥
वासुदेवोऽपि तं दृष्ट्वा चक्रमुद्यम्य वेगवान् । हन्तुकामो हरिः काममवापाशु क्रुधान्वितः
यावद्धयरिपुं वेगाच्चक्रेणाभिजघान तम् ।
तावत्सोऽतिबलः शृङ्गी शृङ्गाभ्यां न्यहनद्धरिम् ॥
वासुदेवो विषाणाभ्यां ताडितोरसि विह्वलः ।
पलायनपरो वेगाज्जगाम भुवनं निजम् ॥
गतं दृष्ट्वा हरिं कामं शङ्करोऽपि भयान्वितः । अवध्यं तं परं मत्वा ययौ कैलासपर्वतम्
ब्रह्मापि च निजं धाम त्वरितः प्रययौ भयात् ।
मघवा वज्रमालम्ब्य तस्थावाजौ महाबलः ॥
वरुणः शक्तिमालम्ब्य धैर्यमालम्ब्य संस्थितः ।
यमो ऽपि दण्डमादाय यत्तः समरतत्परः ॥
ततो यक्षाधिपः कामं बभूव रणतत्परः ।
पावकः शक्तिमादाय तत्राभूद्युद्धमानसः ॥
नक्षत्राधिपतिः सूर्यः समवेतौ स्थितावुभौ ।
वीक्ष्य तं दानवश्रेष्ठं युद्धाय कृतनिश्चयौ ॥
व्यासजी बोले - [ हे महाराज जनमेजय! ] महिषासुरने समस्त दानवोंको खिन्नमनस्क देखकर १ महिषका वह रूप छोड़कर तत्काल सिंहका रूप धारण कर लिया ॥ १ ॥
तत्पश्चात् भयानक गर्जन करके गर्दनके बाल ॥ २ ( अयाल ) फैलाकर अपने तीक्ष्ण नख दिखाकर देवताओंको भयभीत करता हुआ वह देवसेनापर टूट पड़ा ॥ २ ॥
उसने गरुडके ऊपर अपने नाखूनोंसे आघात करके ३ उन्हें रक्तसे लथपथ कर दिया । पुनः सिंहरूपधारी उस दानवने विष्णुकी भुजापर अपने नखोंसे प्रहार किया ॥ ३ ॥
भगवान् विष्णुने उसे देखकर कुपित हो तत्काल ॥ ४ अपना सुदर्शन चक्र लेकर उस दैत्यको मार डालनेकी इच्छासे बड़े वेगसे उसपर चला दिया ॥ ४ ॥।
भगवान् विष्णुने उस महिषासुरपर ज्यों ही अपने ५ चक्रसे तेज प्रहार किया त्यों ही वह महान् शक्तिशाली महिषका रूप धारणकर भगवान् विष्णुको अपनी सींगोंसे मारने लगा ॥ ५ ॥
६ वक्षःस्थलपर सींगके आघातसे व्याकुल होकर भगवान् विष्णु बड़े वेग से भागकर अपने लोक चले गये । विष्णुको पलायित देखकर शंकरजी भी बहुत ॥ ७ भयभीत हो गये और उसे सर्वथा अवध्य मानकर कैलासपर्वतपर चले गये । ब्रह्माजी भी उसके डरसे तत्काल अपने लोक चले गये ॥ ६-७३ ॥ ८ महाबली इन्द्र वज्र धारण किये हुए समरांगणमें डटे रहे । वरुणदेव अपना पाशास्त्र लेकर धैर्यपूर्वक खड़े रहे । यमराज अपना दण्ड धारण किये युद्ध ९ करनेके लिये सावधान होकर खड़े थे । यक्षाधिपति कुबेर युद्ध करनेके लिये पूर्णरूपसे उद्यत थे और अग्निदेव बर्धी लेकर युद्ध करनेके विचारसे स्थित थे । १० नक्षत्रोंके नायक चन्द्रमा तथा भगवान् सूर्य - दोनों एक साथ युद्ध करनेके लिये खड़े हो गये और उस दानवश्रेष्ठ महिषासुरको देखकर उन्होंने युद्ध करनेका ११ | निश्चय कर लिया ॥ ८-११ ॥