देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 571–580

देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 571–580

पृष्ठ 571

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५६२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ७

एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्धं दैत्यसैन्यं समभ्यगात् ।

विसृजन्बाणजालानि क्रूराहिसदृशानि च ॥

कृत्वा हि माहिषं रूपं भूपतिः संस्थितस्तदा ।

देवदानवयोधानां निनादस्तुमुलोऽभवत् ॥

ज्याघातश्च तलाघातो मेघनादसमोऽभवत् ।

संग्रामे सुमहाघोरे देवदानवसेनयोः ॥

शृङ्गाभ्यां पार्वताञ्छृङ्गांश्चिक्षेप च महाबलः ।

जघान सुरसङ्घांश्च दानवो मदगर्वितः ॥

खुराघातैस्तथा देवान्पुच्छस्य भ्रमणेन च ।

स जघान रुषाविष्टो महिषः परमाद्भुतः ॥

ततो देवाः सगन्धर्वा भयमाजग्मुरुद्यताः ।

मघवा महिषं दृष्ट्वा पलायनपरोऽभवत् ॥

सङ्गरं सम्परित्यज्य गते शक्रे शचीपतौ ।

यमो धनाधिपः पाशी जग्मुः सर्वे भयातुराः ॥

महिषोऽपि जयं मत्वा जगाम स्वगृहं ततः ।

ऐरावतं गजं प्राप्य त्यक्तमिन्द्रेण गच्छता ॥

तथोच्चैःश्रवसं भानोः कामधेनुं पयस्विनीम् ।

स्वसैन्यसंवृतस्तूर्णं स्वर्गं गन्तुं मनो दधे ॥

तरसा देवसदनं गत्वा स महिषासुरः ।

जग्राह सुरराज्यं वै त्यक्तं देवैर्भयातुरैः ॥

इन्द्रासने तथा रम्ये दानवः समुपाविशत् ।

दानवान्स्थापयामास देवानां स्थानकेषु सः ॥

एवं वर्षशतं पूर्णं कृत्वा युद्धं सुदारुणम् ।

अवापैन्द्रपदं कामं दानवो मदगर्वितः ॥

निर्जरा निर्गता नाकात्तेन सर्वेऽतिपीडिताः ।

एवं बहूनि वर्षाणि बभ्रमुर्गिरिगह्वरे ॥

इतनेमें क्रूर सर्पोंके समान बाण - समूहोंकी वर्षा १२ करती हुई क्रुद्ध दानवी सेना वहाँ आ गयी ॥१२ ॥

वह दानवराज महिषका रूप धारण करके खड़ा था । उस समय देवता तथा असुर पक्षके योद्धाओंका १३ भीषण गर्जन होने लगा ॥१३ ॥

देवताओं तथा दानवोंके बीच हो रहे महाभयानक संग्राममें धनुषकी टंकार तथा ताल ठोंकनेकी ध्वनि १४ मेघ गर्जना जैसी प्रतीत हो रही थी ॥ १४ ॥

अभिमानमें चूर महाबली दैत्य महिषासुर अपनी सींगोंसे पर्वत - शिखर फेंक- फेंककर देवसमूहपर १५ प्रहार कर रहा था ॥ १५ ॥

क्रोधमें भरे हुए उस परम अद्भुत महिषासुरने अपने खुरोंके आघातसे तथा पूँछ घुमाकर बहुत - से १६ । देवताओंपर प्रहार किया ॥ १६ ॥

तत्पश्चात् लड़नेके लिये उद्यत देवता तथा गन्धर्व भयभीत हो गये और महिषासुरको देखकर १७ इन्द्र भी भाग गये ॥१७ ॥

संग्राम छोड़कर शचीपति इन्द्रके भाग जानेपर यमराज, धनाध्यक्ष कुबेर तथा वरुणदेव – ये सब भी १८ भयभीत होकर भाग चले ॥ १८ ॥

महिषासुर भी अपनी जीत मानकर अपने घर चला गया । इन्द्रके भाग जानेके बाद उनके द्वारा त्यक्त १ ९ ऐरावत हाथी, सूर्यका उच्चैःश्रवा घोड़ा तथा दूध देनेवाली कामधेनु गौको उसने हस्तगत कर लिया । २० तत्पश्चात् उसने शीघ्र ही सेनाको साथमें लेकर स्वर्ग

जानेका मनमें निश्चय किया । १ ९ - २० ॥

इसके बाद शीघ्र ही देवलोक पहुँचकर महिषासुरने २१ भयाक्रान्त देवताओंके द्वारा पहलेसे ही छोड़ दिये गये उनके राज्यपर आधिपत्य कर लिया ॥ २१ ॥

इसके बाद उस रमणीय इन्द्रासनपर महिषासुर २२ आसीन हुआ और उसने राज्य - संचालनार्थ देवताओंके स्थानपर दानवोंको स्थापित कर दिया ॥ २२ ॥

इस प्रकार पूरे सौ वर्षतक भीषण युद्ध करके २३ अभिमानमें चूर उस दैत्यने इन्द्रपद प्राप्त किया ॥ २३ ॥

सभी देवता उस महिषासुरसे प्रताड़ित होकर स्वर्गसे निकल गये और बहुत वर्षोंतक पर्वतकी २४ । गुफाओंमें घूमते - फिरते रहे ॥ २४ ॥

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अ ० ७ ]

श्रान्ताः सर्वे तदा राजन् ब्रह्माणं शरणं ययुः ।

प्रजापतिं जगन्नाथं रजोरूपं चतुर्मुखम् ॥

पद्मासनं वेदगर्भं सेवितं मुनिभिः स्वजैः ।

मरीचिप्रमुखैः शान्तैर्वेदवेदाङ्गपारगैः ॥

किन्नरैः सिद्धगन्धर्वैश्चारणोरगपन्नगैः ।

तुष्टुवुर्भयभीतास्ते देवदेवं जगद्गुरुम् ॥

देवा ऊचुः धातः किमेतदखिलार्तिहराम्बुजन्म जन्माभिवीक्ष्य न दयां कुरुषे सुरान् यत् । सम्पीडितान् रणजितानसुराधिपेन स्थानच्युतान् गिरिगुहाकृतसन्निवासान् ॥ पुत्रान्पिता किमपराधशतैः समेता-न्सन्त्यज्य लोभरहितः कुरुतेऽतिदुःस्थान् । यस्त्वं सुरांस्तव पदाम्बुजभक्तियुक्ता-न्दैत्यार्दितांश्च कृपणान् यदुपेक्षसेऽद्य ॥ अमरभुवनराज्यं तेन भुक्तं नितान्तं मखहविरपि योग्यं ब्राह्मणैराददाति । सुरतरुवरपुष्पं सेवतेऽसौ दुरात्मा जलनिधिनिधिभूतां गामसौ सेवते ताम् ॥ किं वा गृणीमः सुरकार्यमद्भुतं

जानासि देवेश सुरारिचेष्टितम् ।

ज्ञानेन सर्वं त्वमशेषकार्यवि-त्तस्मात्प्रभो ते प्रणताः स्म पादयोः ॥

यत्रापि कुत्रापि गतान्सुरानसौ

नानाचरित्रः खलु पापमानसः ।

पीडां करोत्येव स दुष्टचेष्टित-स्त्रातासि देवेश विधेहि शं विभो ॥

पञ्चम स्कन्ध ५६३ हे राजन्! तब थके हुए सभी देवतागण ब्रह्माजीकी २५ शरणमें गये । उस महिषासुरके भयसे त्रस्त वे सभी देवता समस्त वेद - वेदांगोंके पारगामी विद्वान्, शान्त स्वभाववाले और स्वयं ब्रह्माके मनसे उत्पन्न मरीचि २६ आदि प्रमुख मुनियों एवं सिद्धों, किन्नरों, गन्धर्वों, चारणों, उरगों तथा पन्नगोंद्वारा निरन्तर सेवित, रजोगुणसे सम्पन्न, चार मुखवाले, जगन्नाथ, प्रजापति, वेदगर्भ, २७ कमलके आसनपर विराजमान तथा समस्त संसारके गुरु देवाधिदेव ब्रह्माजीकी स्तुति करने लगे ॥ २५–२७ ॥ देवता बोले – हे सम्पूर्ण दुःख दूर करनेवाले पद्मयोनि ब्रह्माजी! इस समय सभी देवता संग्राममें दानवेन्द्र महिषासुरसे पराजित होकर गिरि - कन्दराओंमें कालक्षेप कर रहे हैं । स्थानच्युत हो जानेके कारण उन्हें महान् कष्ट उठाना पड़ रहा है । हमारी ऐसी २८ दशा देखकर भी क्या आपको दया नहीं आती, यह कैसी विचित्र बात है! ॥ २८ ॥

क्या निर्लोभी पिता सैकड़ों अपराधोंसे युक्त अपने पुत्रोंको त्यागकर उन्हें कष्टमें पड़े रहना देख सकता है? तब फिर दैत्योंद्वारा सताये गये असहाय देवताओंकी, जो आपके चरणकमलकी भक्तिमें लगे २ ९ रहते हैं, उपेक्षा आज आप क्यों कर रहे हैं? ॥ २ ९ ॥ [ दुष्ट ] महिषासुर देवलोकका साम्राज्य भोग रहा है । ब्राह्मणोंद्वारा यज्ञमें दी हुई पवित्र हविको वह स्वयं ले लेता है । वह दुष्टात्मा असुर स्वर्गके पारिजातपुष्पोंको अपने उपभोगमें लाता है तथा ३० समुद्रकी निधिस्वरूपा उस कामधेनु गौका भी उपयोग कर रहा है ॥ ३० ॥

हे देवेश! हमलोग देवताओंकी विषम स्थितिका वर्णन कहाँतक करें? आप तो अपने ज्ञानसे दैत्योंकी सारी कुचेष्टा जानते हैं; आप सम्पूर्ण कार्योंको जाननेवाले हैं । अतः हे प्रभो! हम सभी देवता आपके ३१ चरणोंमें आ पड़े हैं ॥३१ ॥

हे देवेश! देवता जहाँ कहीं भी जाते हैं [ वहीं पहुँचकर ] विविध चरित्रोंवाला, पापमय विचारोंवाला तथा दुष्ट आचरणवाला वह महिषासुर उन्हें पीड़ित करने लगता है । हे विभो! अब आप ही हमारे रक्षक ३२ हैं; हमारा कल्याण कीजिये ॥ ३२ ॥

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५६४ नो चेद्वयं दावमहाग्निपीडिताः कं शान्तिकर्तारमनन्ततेजसम् यामः प्रजेशं शरणं सुरेष्टं धातारमाद्यं परिमुच्य कं शिवम् ॥ व्यास उवाच

इति स्तुत्वा सुराः सर्वे प्रणेमुस्तं प्रजापतिम् ।

बद्धाञ्जलिपुटाः सर्वे विषण्णवदना भृशम् ॥

तांस्तथा पीडितान्दृष्ट्वा तदा लोकपितामहः ।

उवाच श्लक्ष्णया वाचा सुखं सञ्जनयन्निव ॥

ब्रह्मोवाच

किं करोमि सुराः कामं दानवो वरदर्पितः ।

स्त्रीवध्योऽसौ न पुंवध्यो विधेयं तत्र किं पुनः ॥

व्रजामोऽद्य सुराः सर्वे कैलासं पर्वतोत्तमम् ।

शङ्करं पुरतः कृत्वा सर्वकार्यविशारदम् ॥

ततो व्रजाम वैकुण्ठं यत्र देवो जनार्दनः ।

मिलित्वा देवकार्यञ्च विमृशामो विशेषतः ॥

इत्युक्त्वा हंसमारुह्य ब्रह्मा कार्यसमुच्चये ।

देवांश्च पृष्ठतः कृत्वा कैलासाभिमुखो ययौ ॥

तावच्छिवोऽपि तरसा ज्ञात्वा ध्यानेन पद्मजम् ।

आगच्छन्तं सुरैः सार्धं निर्गतः स्वगृहाद् बहिः ॥

दृष्ट्वा परस्परं तौ तु कृताभिवादनौ भृशम् ।

प्रणतौ च सुरैः सर्वैः सन्तुष्टौ सम्बभूवतुः ॥

आसनानि पृथग्दत्त्वा देवेभ्यो गिरिजापतिः ।

उपविष्टेषु तेष्वेव निषसादासने स्वके ॥

कृत्वा तु कुशलप्रश्नं ब्रह्माणं वृषभध्वजः ।

पप्रच्छ कारणं देवान्कैलासागमने विभुः ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ७ यदि आप हमारी रक्षा नहीं करेंगे तो दैत्योंके । भीषण अत्याचाररूपी दावानलसे पीड़ित हमलोग आप सदृश शान्तिदाता, अनन्त तेजस्वी, प्रजापति, देवताओंके पूज्य, आदिपिता तथा कल्याणकारी प्रभुको ३३ छोड़कर किसकी शरणमें जायँ? ॥ ३३ ॥

व्यासजी बोले- इस प्रकार स्तुति करके सम्पूर्ण देवता हाथ जोड़कर प्रजापति ब्रह्माको प्रणाम करने लगे । उन सबके मुखपर अत्यन्त उदासी छायी हुई ३४ थी । तब उन्हें इस प्रकार दुःखी देखकर लोकपितामह ब्रह्माजी उन्हें सुख पहुँचाते हुए मधुर वाणीमें कहने ३५ लगे- ॥ ३४-३५ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे देवताओ! मैं क्या करूँ? वर पानेके कारण वह दैत्य अभिमानी हो गया है ।

उसका वध कोई स्त्री ही कर सकती है, पुरुष नहीं ।

ऐसी परिस्थितिमें मैं क्या कर सकता हूँ? ॥ ३६ ॥

३६ हे देवताओ! हम सबलोग पर्वतश्रेष्ठ कैलासपर चलें । [ वहाँ विराजमान ] सम्पूर्ण कर्मोंके ज्ञाता भगवान् ३७ शंकरको आगे करके वहाँसे वैकुण्ठधामको चलें, जहाँ भगवान् विष्णु रहते हैं । उनसे मिलकर हमलोग देवताओंके कार्यके विषयमें विशेषरूप से विचार ३८ करेंगे ॥ ३७-३८ ॥ ऐसा कहकर ब्रह्माजी हंसपर सवार होकर कार्यसिद्धिके लिये देवताओंको साथ लेकर कैलासकी ३ ९ ओर चल पड़े ॥ ३ ९ ॥ तभी शिवजी अपने ध्यानयोगसे सभी देवताओं सहित ब्रह्माजीको आता हुआ जानकर अपने भवनसे बाहर ४० निकल आये ॥ ४० ॥

एक- दूसरेको देखकर उन्होंने परस्पर प्रणाम किया । उन सभी देवताओंने भी भगवान् शंकर ४ ९ तथा ब्रह्माको प्रणाम किया और वे दोनों अत्यन्त

प्रसन्न हो गये । ४१ ॥

शिवजी वहाँ सभी देवताओंको पृथक् - पृथक् ४२ आसन देकर सबके यथास्थान बैठ जानेपर स्वयं भी अपने आसनपर बैठ गये । तब ब्रह्माजीसे कुशल- प्रश्न करके भगवान् शिवने देवताओंसे कैलास आनेका ४३ | कारण पूछा ॥ ४२-४३ ॥

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अ ० ७ ] पञ्चम स्कन्ध ५६५ शिव उवाच

किमत्रागमनं ब्रह्मन् कृतं देवैः सवासवैः ।

भवता च महाभाग ब्रूहि तत्कारणं किल ॥ ४४

ब्रह्मोवाच

महिषेण सुरेशान पीडिताः स्वर्निवासिनः ।

भ्रमन्ति गिरिदुर्गेषु भयत्रस्ताः सवासवाः ॥ ४५

यज्ञभुग्महिषो जातस्तथान्ये सुरशत्रवः ।

पीडिता लोकपालाश्च त्वामद्य शरणं गताः ॥ ४६

मया ते भवनं शम्भो प्रापिताः कार्यगौरवात् ।

यद्युक्तं तद्विधत्स्वाद्य सुरकार्यं सुरेश्वर ॥ ४७

त्वयि भारोऽस्ति सर्वेषां देवानां भूतभावन । व्यास उवाच इति तद्वचनं श्रुत्वा शङ्करः प्रहसन्निव ॥ ४८ वचनं श्लक्ष्णया वाचा प्रोवाच पद्मजं प्रति । शिव उवाच भवतैव कृतं कार्यं वरदानात्पुरा विभो ॥ ४ ९

अनर्थदञ्च देवानां किं कर्तव्यमतः परम् ।

ईदृशो बलवाञ्छूरः सर्वदेवभयप्रदः ॥५०

का समर्था वरा नारी तं हन्तुं मददर्पितम् ।

न मे भार्या न ते भार्या संग्रामं गन्तुमर्हति ॥ ५१

गत्वैव ते महाभागे युयुधाते कथं पुनः ।

इन्द्राणी च महाभागा न युद्धकुशलास्ति हि ॥ ५२

कान्या हन्तुं समर्थास्ति तं पापं मददर्पितम् ।

ममेदं मतमद्यैव गत्वा देवं जनार्दनम् ॥ ५३

स्तुत्वा तं देवकार्याय प्रेरयामः सुसत्वरम् ।

सोऽतिबुद्धिमतां श्रेष्ठ विष्णुः सर्वार्थसाधने ॥ ५४

शिवजी बोले - हे ब्रह्मन्! इन्द्र आदि देवताओंके साथ आपके यहाँ आनेका क्या प्रयोजन है? हे महाभाग! वह कारण अवश्य बताइये ॥ ४४ ॥

ब्रह्माजी बोले – हे सुरेशान! महिषासुर स्वर्गमें रहनेवाले इन्द्रादि देवताओंको महान् कष्ट दे रहा है और उसके भयसे त्रस्त होकर ये देवगण पर्वतोंकी कन्दराओंमें घूम रहे हैं ॥ ४५ ॥

महिषासुर यज्ञ - भाग स्वयं ग्रहण कर रहा है । अन्य अनेक दैत्य भी देवताओंके शत्रु बन गये हैं । उन सबसे पीड़ित होकर ये सभी लोकपाल आपकी शरणमें आये हुए हैं I । हे शम्भो! इसी गुरुतर कार्यके लिये मैंने इन देवताओंको आपके भवनपर पहुँचा दिया है । अतः हे सुरेश्वर! अब इनके कार्यके विषयमें जो उचित जान पड़े, वह आप करें । हे भूतभावन! सम्पूर्ण देवताओंका भार अब आपपर है ॥ ४६-४७३ ॥ व्यासजी बोले – ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर भगवान् शंकर मुसकराते हुए कोमल वाणी में ब्रह्माजीसे यह वचन कहने लगे - ॥ ४८३ ॥

शिवजी बोले- हे विभो! आपने ही तो पूर्वकालमें [ महिषासुरको ] वरदान देकर देवताओंके लिये ऐसा अनर्थकारी कार्य किया है । अब इसके बाद हमें क्या करना चाहिये? [ आपके वरके प्रभावसे ही ] वह इतना बली, पराक्रमी तथा सभी देवताओंके लिये भयदायक हो गया है ॥४ ९ -५० ॥ अभिमानमें चूर रहनेवाले उस दानवको मारनेमें कौन श्रेष्ठ स्त्री समर्थ हो सकती है? न तो मेरी भार्या ' रुद्राणी ' और न आपकी भार्या ' ब्रह्माणी ' ही संग्राममें जानेयोग्य हैं । महाभाग्यवती ये देवियाँ संग्रामभूमिमें जाकर भी भला युद्ध किस प्रकार करेंगी? इन्द्रकी पत्नी महाभागा इन्द्राणी भी युद्धकलामें कुशल नहीं हैं । तब दूसरी कौन - सी देवांगना उस मदोन्मत्त पापीको मारनेमें समर्थ है? ॥ ५१-५२३ ॥ अतः मेरा तो यह विचार है कि हमलोग इसी समय भगवान् विष्णुके पास चलकर और उनकी स्तुति करके देवताओंका कार्य करनेके लिये उन्हींको

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५६६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ८

मिलित्वा वासुदेवं वै कर्तव्यं कार्यचिन्तनम् ।

प्रपञ्चेन च बुद्ध्या स संविधास्यति साधनम् ॥

व्यास उवाच

इति रुद्रवचः श्रुत्वा ब्रह्माद्याः सुरसत्तमाः ।

उत्थितास्ते तथेत्युक्त्वा शिवेन सह सत्वराः ॥

स्वकीयैर्वाहनैः सर्वे ययुर्विष्णुपुरं प्रति ।

मुदिताः शकुनान्दृष्ट्वा कार्यसिद्धिकराञ्छुभान् ॥

ववुर्वाताः शुभाः शान्ताः सुगन्धाः शुभशंसिनः ।

पक्षिणश्च शिवा वाचस्तत्रोचुः पथि सर्वशः ॥

निर्मलं चाभवद्वयोम दिशश्च विमलास्तथा ।

गमने तत्र देवानां सर्वं शुभमिवाभवत् ॥

शीघ्रतापूर्वक प्रेरित करें । परम बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ वं ५५ विष्णु सम्पूर्ण कार्योंको सिद्ध करनेमें कुशल हैं । उन्हीं वासुदेवसे मिलकर इस कार्यके सम्बन्धमें विचार करना चाहिये । वे किसी प्रपंच अथवा बुद्धिसे कार्य सिद्ध होनेका उपाय बना देंगे ॥ ५३ - ५५ ॥ व्यासजी बोले- भगवान् शंकरकी यह बात ५६ | सुनकर ब्रह्मा आदि समस्त श्रेष्ठ देवता ‘ यह ठीक है ' – ऐसा कहकर उठ खड़े हुए और वे सब अपने-अपने वाहनोंपर सवार हो शिवजीके साथ तुरन्त ५७ वैकुण्ठकी ओर चल दिये । उस समय कार्यसिद्धिके सूचक अनेक शुभ शकुन देखकर वे सब अत्यन्त प्रसन्न हुए । शुभ सूचना देनेवाली शीतल, मन्द तथा सुगन्धित हवाएँ चलने लगीं और पवित्र पक्षी सर्वत्र ५८ मार्गमें मंगलमयी बोली बोलने लगे । आकाश निर्मल हो गया और दिशाएँ स्वच्छ हो गयीं । इस प्रकार देवताओंकी यात्रामें मानो सब मंगल ही मंगल ५ ९ | हो गया॥५६–५९ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे पराजितदेवतानां शङ्करशरणगमनवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥७ ॥

अथाष्टमोऽध्यायः ब्रह्माप्रभृति समस्त देवताओंके और उस तेजोराशिसे व्यास उवाच

तरसा तेऽथ सम्प्राप्य वैकुण्ठं विष्णुवल्लभम् ।

ददृशुः सर्वशोभाढ्यं दिव्यसद्मविराजितम् ॥ १

सरोवापीसरिद्भिश्च संयुतं सुखदं शुभम् ।

हंससारसचक्राह्वैः कूजद्भिश्च विराजितम् ॥

चम्पकाशोककह्लारमन्दारबकुलावृतैः मल्लिकातिलकाम्रातयुतैः कुरबकादिभिः ॥ ३

कोकिलारावसन्नादैः शिखण्डैर्नृत्यरञ्जितैः ।

भ्रमरारावरम्यैश्च दिव्यैरुपवनैर्युतम् ॥ ४

सुनन्दनन्दनाद्यैश्च पार्षदैर्भक्तितत्परैः ।

संस्तुवद्भिर्युतं भक्तैरनन्यभववृत्तिभिः ॥ ५

शरीरसे तेज: पुंजका निकलना भगवतीका प्राकट्य व्यासजी बोले – हे राजन्! उन देवताओंने शीघ्रतापूर्वक भगवान् विष्णुके प्रिय धाम वैकुण्ठमें पहुँचकर वहाँ उन श्रीहरिका विशाल सदन देखा, जो सम्पूर्ण शोभाओंसे युक्त तथा दिव्य महलोंसे सुशोभित था । सुन्दर तथा सुखदायक वह भवन सरोवर, बावली एवं नदियोंसे सुशोभित था, जिनमें हंस, सारस, चक्रवाक आदि पक्षी कलरव कर रहे थे । उस भवन चारों ओर सुशोभित हो रहे दिव्य उपवनोंमें चम्पा, अशोक, कह्लार, मन्दार, मौलसिरी, मालती, तिलक, आमड़ा और कुरबक आदि विविध प्रकारके वृक्ष लगे हुए थे । उपवनोंमें चारों ओर कोयलोंकी कूक सुनायी दे रही थी, मोर नृत्य कर रहे थे और भौरे गुंजार कर रहे थे । नन्द - सुनन्द आदि भक्तिपरायण पार्षद तथा

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अ ०८ ] पञ्चम स्कन्ध ५६७

प्रासादै रत्नखचितैः काञ्चनैश्चित्रमण्डितैः ।

अभ्रंलिहैर्विराजद्भिः संयुतं शुभसद्मकैः ॥

गायद्भिर्देवगन्धर्वैर्नृत्यद्भिरप्सरोगणैः रञ्जितं किन्नरैः शश्वद्रक्तकण्ठैर्मनोहरैः ॥

मुनिभिश्च तथा शान्तैर्वेदपाठकृतादरैः ।

स्तुवद्भिः श्रुतिसूक्तैश्च मण्डितं सदनं हरेः ॥

ते च विष्णुगृहं प्राप्य द्वारपालौ शुभाकृती ।

वीक्ष्योचुर्जयविजय हेमयष्टिधरौ स्थितौ ॥

गत्वैकोऽप्युभयोर्मध्ये निवेदयतु सङ्गतान् ।

द्वारस्थान् ब्रह्मरुद्रादीन्विष्णुदर्शनलालसान् ॥

व्यास उवाच

विजयस्तद्वचः श्रुत्वा गत्वाथ विष्णुसन्निधौ ।

सर्वान्समागतान्देवान्प्रणम्योवाच सत्वरः ॥

विजय उवाच

देवदेव महाराज रमाकान्त सुरारिहन् ।

समागताः सुराः सर्वे द्वारि तिष्ठन्ति वै विभो ॥

ब्रह्मा रुद्रस्तथेन्द्रश्च वरुणः पावको यमः ।

स्तुवन्ति वेदवाक्यैस्त्वाममरा दर्शनार्थिनः ॥

व्यास उवाच

तच्छ्रुत्वा वचनं विष्णुर्विजयस्य रमापतिः ।

निर्जगाम गृहात्तूर्णं सुरान्समधिकोत्सवः ॥

गत्वा वीक्ष्य हरिर्देवान्द्वारस्थाञ्छ्रमकर्शितान् ।

प्रीतिप्रवणया दृष्ट्या प्रीणयामास दुःखितान् ॥

प्रणेमुस्ते सुराः सर्वे देवदेवं जनार्दनम् ।

तुष्टुवुश्च सुरारिघ्नं वाग्भिर्वेदविनिश्चितम् ॥

त्याग - वृत्तिसम्पन्न अनन्य भक्त भगवान् विष्णुकी ६ स्तुति कर रहे थे । वहाँ रत्नजटित महल बने हुए थे, जिनपर सुनहरे चित्र बने हुए थे; सुन्दर - सुन्दर कक्षोंसे सुशोभित वे महल ऊँचाईमें आकाशको छू रहे थे ७ वहाँ देवता और गन्धर्व गा रहे थे, अप्सराएँ नाच रही थीं और वह मनको मुग्ध करनेवाले तथा मधुर कण्ठध्वनिवाले किन्नरोंसे मण्डित था । वैदिक सूक्तोंके ८ द्वारा आदरपूर्वक भगवान् विष्णुकी स्तुति करते हुए शान्त स्वभाववाले वेदपाठपरायण मुनियोंसे वह भवन अत्यन्त सुशोभित हो रहा था॥१-८ ॥ ९ भगवान् विष्णुके भवनपर पहुँचकर देवताओंने सुन्दर स्वरूपवाले तथा हाथमें स्वर्णकी छड़ी धारण किये हुए जय - विजय नामक द्वारपालोंको देखकर १० उनसे कहा कि आप दोनोंमेंसे कोई एक जाकर भगवान् विष्णुसे कह दे कि आपके दर्शनकी अभिलाषासे ब्रह्मा, रुद्र आदि देवता द्वारपर खड़े हैं ॥ ९ -१० ॥ व्यासजी बोले- उनकी बात सुनकर विजयने तुरन्त भगवान् विष्णुके पास जाकर उन्हें प्रणाम करके ११ । सभी देवताओंके आगमनकी बात उनको बतायी ॥ ११ ॥

विजयने कहा - – हे देवाधिदेव! हे महाराज! हे दैत्योंका दमन करनेवाले लक्ष्मीकान्त! हे विभो! इस समय सभी देवता आये हुए हैं और वे द्वारपर १२ खड़े हैं । आपके दर्शनके इच्छुक ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र, वरुण, अग्नि, यम आदि देवता वेदवाक्योंसे आपकी स्तुति कर रहे हैं ॥ १२-१३ ॥ १३ व्यासजी बोले – लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु विजयकी बात सुनकर देवोंसे मिलनेहेतु अत्यधिक उत्साहित होकर शीघ्रतापूर्वक अपने भवनसे बाहर निकल आये ॥ १४ ॥

१४ वहाँ जाकर भगवान् विष्णुने द्वारपर स्थित उन देवताओंको थकानसे व्याकुल तथा दुःखित देखकर अपनी प्रेमभरी दृष्टिसे उन्हें आनन्दित किया ॥ १५ ॥

१५ उन सभी देवताओंने दैत्योंका संहार करनेवाले तथा वेदोंके द्वारा सुनिश्चित किये गये ( तत्त्वस्वरूप ) देवाधिदेव भगवान् विष्णुको प्रणाम किया और मधुर १६ वाणीमें उनकी स्तुति की ॥ १६ ॥

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५६८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ८ देवा ऊचुः

देवदेव जगन्नाथ सृष्टिस्थित्यन्तकारक ।

दयासिन्धो महाराज त्राहि नः शरणागतान् ॥

विष्णुरुवाच

विशन्तु निर्जराः सर्वे कुशलं कथयन्तु वः ।

आसनेषु किमर्थं वै मिलिताः समुपागताः ॥

चिन्तातुराः कथं जाता विषण्णा दीनमानसाः ।

ब्रह्मरुद्रेण सहिताः कार्यं प्रब्रूत सत्वरम् ॥

देवा ऊचुः महिषेण महाराज पीडिताः पापकर्मणा । असाध्येनातिदुष्टेन वरदृप्तेन वरदृप्तेन पापिना ॥

यज्ञभागानसौ भुंक्ते ब्राह्मणैः प्रतिपादितान् ।

अमरा गिरिदुर्गेषु भ्रमन्ति च भयातुराः ॥

वरदानेन धातुः स दुर्जयो मधुसूदन ।

तस्मात्त्वां शरणं प्राप्ता ज्ञात्वा तत्कार्यगौरवम् ॥

समर्थोऽसि समुद्धर्तुं दैत्यमायाविशारद ।

कुरु कृष्ण वधोपायं तस्य दानवमर्दन ॥

धात्रा तस्मै वरो दत्तो ह्यवध्योऽसि नरैः किल ।

का स्त्री त्वेवंविधा बाला या हन्यात्तं शठं रणे ॥

उमा मा वा शची विद्या का समर्थास्य घातने ।

महिषस्यातिदुष्टस्य वरदानबलादपि ॥

विचिन्त्य बुद्धया यत्सर्वं मरणस्यास्य कारणम् ।

कुरु कार्यं च देवानां भक्तवत्सल भूधर ॥

व्यास उवाच

श्रुत्वा तद्वचनं विष्णुस्तानुवाच हसन्निव ।

युद्धं कृतं पुरास्माभिस्तथापि न मृतो ह्यसौ ॥

देवता बोले- हे देवदेव! हे जगन्नाथ! हे सृष्टि, पालन तथा संहार करनेवाले! हे दयासिन्धो! १७ हे महाराज! हम शरणागतोंकी रक्षा कीजिये ॥ १७ ॥

विष्णु बोले- हे देवताओ! आप सभी लोग आसनोंपर बैठ जाइये और फिर अपना कुशल - क्षेम बताइये । आपलोग एक साथ मिलकर यहाँ किसलिये १८ आये हुए हैं? ब्रह्मा तथा शिवसहित आप सभी देवता चिन्तामग्न, दुःखित और उदास क्यों हो गये हैं? आपलोग अपना प्रयोजन शीघ्र बताएँ ॥ १८-१९ ॥ १ ९ देवता बोले- हे महाराज! पापकर्ममें संलग्न, अजेय, महादुष्ट, वरदान पाकर अभिमानमें चूर तथा पापी महिषासुरसे हमलोग पीड़ित हैं ॥ २० ॥

ब्राह्मणोंद्वारा देवताओंको दिये गये यज्ञभागोंको २० वह स्वयं ग्रहण कर लेता है । हम सभी देवता उससे भयभीत होकर पर्वतोंकी कन्दराओंमें भटकते फिरते हैं ॥ २१ ॥

२१ हे मधुसूदन! ब्रह्माजीके वरदानसे वह अजेय बन गया है, अतः इस कार्यको अत्यन्त गुरुतर जानकर हमलोग आपकी शरणमें आये हैं । दानवोंकी २२ मायाको जाननेवाले तथा दानवोंका वध करनेवाले हे कृष्ण! आप ही देवताओंका उद्धार करनेमें समर्थ हैं, अतः उसके वधका कोई उपाय कीजिये ॥ २२-२३ ॥ २३ विधाताने उसे वर दे दिया है कि तुम पुरुषमात्रसे सदा अवध्य रहोगे । तब ऐसी कौन स्त्री होगी जो रणमें उस शठको मार सके? ॥ २४ ॥

२४ क्या भगवती पार्वती, लक्ष्मी, इन्द्राणी अथवा सरस्वती भी इस अत्यन्त दुष्ट तथा वरदानके कारण अत्यन्त अभिमानी महिषासुरका वध करनेमें समर्थ २५ होंगी? अतएव हे भक्तवत्सल! हे भूधर! आप अपनी बुद्धिसे भलीभाँति विचार करके उसके मरणका जो भी उपाय हो उसके द्वारा हमलोगोंका यह कार्य २६ सम्पन्न कर दीजिये | २५-२६ ॥ व्यासजी बोले – यह बात सुनकर भगवान् विष्णु मुसकराते हुए उनसे कहने लगे- पहले भी हमलोगोंने महिषासुरसे युद्ध किया था, किंतु वह नहीं २७ | मारा जा सका ॥२७ ॥

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अ ० ८ ] पञ्चम

अद्य सर्वसुराणां वै तेजोभी रूपसम्पदा ।

उत्पन्ना चेद्वरारोहा सा हन्यात्तं रणे बलात् ॥ २८

हयारिं वरदृप्तञ्च मायाशतविशारदम् ।

हन्तुं योग्या भवेन्नारी शक्त्यंशैर्निर्मिता हि नः ॥ २ ९

प्रार्थयन्तु च तेजोऽशास्त्रियो ऽस्माकं तथा पुनः ।

उत्पन्नैस्तैश्च तेजों ऽशैस्तेजोराशिर्भवेद्यथा ॥ ३०

आयुधानि वयं दद्मः सर्वे रुद्रपुरोगमाः ।

तस्यै सर्वाणि दिव्यानि त्रिशूलादीनि यानि च ॥३१

सर्वायुधधरा नारी सर्वतेजः समन्विता ।

हनिष्यति दुरात्मानं तं पापं मदगर्वितम् ॥ ३२

व्यास उवाच

इत्युक्तवति देवेशे ब्रह्मणो वदनात्ततः ।

स्वयमेवोद्बभौ तेजोराशिश्चातीव दुःसहः ॥ ३३

रक्तवर्णं शुभाकारं पद्मरागमणिप्रभम् ।

किञ्चिच्छीतं तथा चोष्णं मरीचिजालमण्डितम् ॥ ३४

निःसृतं हरिणा दृष्टं हरेण च महात्मना ।

विस्मितौ तौ महाराज बभूवतुरुरुक्रमौ ॥ ३५

शङ्करस्य शरीरात्तु निःसृतं महदद्भुतम् ।

रौप्यवर्णमभूत्तीव्रं दुर्दर्शं दारुणं महत् ॥ ३६

भयङ्करञ्च दैत्यानां देवानां विस्मयप्रदम् ।

घोररूपं गिरिप्रख्यं तमोगुणमिवापरम् ॥ ३७

ततो विष्णुशरीरात्तु तेजोराशिमिवापरम् ।

नीलं सत्त्वगुणोपेतं प्रादुरास महाद्युति ॥ ३८

ततश्चेन्द्रशरीरात्तु चित्ररूपं दुरासदम् ।

आविरासीत्सुसंवृत्तं तेजः सर्वगुणात्मकम् ॥ ३ ९

स्कन्ध ५६ ९ अब एक ही उपाय है कि यदि सभी देवताओंके तेजसे कोई श्रेष्ठ रूपवती सुन्दरी उत्पन्न की जाय तो वही समरांगणमें उसे अपने पराक्रमसे मार सकती है । हम सबकी शक्तिके अंशोंसे निर्मित कोई वीर नारी ही सैकड़ों प्रकारकी माया रचनेमें निपुण और वरप्राप्तिके कारण अभिमानमें चूर उस महिषासुरका वध करनेमें समर्थ होगी ॥ २८-२९ ॥ अब आप सभी देवतागण तेजांशोंसे प्रार्थना करें; साथ ही हमारी स्त्रियाँ भी प्रार्थना करें, जिससे कि उन आविर्भूत तेजांशोंके द्वारा एक तेजोराशि उत्पन्न हो जाय ॥ ३० ॥

उस समय रुद्र आदि हम सब मुख्य देवतागण त्रिशूल आदि जो भी दिव्य आयुध हैं, वह सब उसे दे देंगे । तत्पश्चात् सभी प्रकारके आयुध धारण करनेवाली तथा सम्पूर्ण तेजसे सम्पन्न वह देवी उस दुराचारी, पापी तथा मदोन्मत्त दानवको मार डालेगी ॥ ३१-३२ ॥ व्यासजी बोले- भगवान् विष्णुके ऐसा कहते ही ब्रह्माजीके मुखसे अपने आप एक अत्यन्त असह्य तेज: पुंज निकल पड़ा । वह तेज लाल रंगका था, उसकी आकृति सुन्दर थी, वह पद्मराग मणिके समान प्रभावाला था । उसमें कुछ शीतलता एवं ऊष्णता भी थी और वह अनेक किरणोंसे सुशोभित था । हे महाराज! भगवान् विष्णु और शिवने भी उस निःसृत तेजको देखा । [ उसे देखकर ] अमित पराक्रमवाले वे दोनों आश्चर्यचकित हो गये॥३३-३५ ॥ तत्पश्चात् शंकरजीके शरीरसे भी चाँदीके सदृश वर्णवाला, अत्यन्त अद्भुत, तीव्र, देखनेमें असह्य तथा महाप्रचण्ड तेज निकला जो दैत्योंको भयभीत कर देनेवाला तथा देवताओंको आश्चर्यमें डाल देनेवाला था । वह भयानक रूपवाला, पर्वतके समान विशाल तथा साक्षात् दूसरे तमोगुण जैसा था ॥ ३६-३७ ॥ तदनन्तर भगवान् विष्णुके शरीरसे सत्त्वगुण-सम्पन्न, नीलवर्ण और अत्यन्त दीप्तिमान् दूसरी तेजोराशि प्रकट हुई ॥ ३८ ॥

इसके बाद इन्द्रके शरीरसे विचित्र आकारवाला, असह्य, पूर्ण गोलाकार और सर्वगुणात्मक तेज प्रादुर्भूत | हुआ ॥ ३ ९ ॥

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५७० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ८ कुबेरयमवह्नीनां शरीरेभ्यः समन्ततः निश्चक्राम महत्तेजो वरुणस्य तथैव च अन्येषां चैव देवानां शरीरेभ्योऽतिभास्वरम् निर्गतं तन्महातेजोराशिरासीन्महोज्ज्वलः तं दृष्ट्वा विस्मिताः सर्वे देवा विष्णुपुरोगमाः तेजोराशिं महादिव्यं हिमाचलमिवापरम् पश्यतां तत्र देवानां तेजःपुञ्जसमुद्भवा बभूवातिवरा नारी सुन्दरी विस्मयप्रदा त्रिगुणा सा महालक्ष्मीः सर्वदेवशरीरजा अष्टादशभुजा रम्या त्रिवर्णा विश्वमोहिनी श्वेतानना कृष्णनेत्रा संरक्ताधरपल्लवा ताम्रपाणितला कान्ता दिव्यभूषणभूषिता अष्टादशभुजा देवी सहस्त्रभुजमण्डिता सम्भूतासुरनाशाय तेजोराशिसमुद्भवा जनमेजय उवाच कृष्ण देव महाभाग सर्वज्ञ मुनिसत्तम विस्तरं ब्रूहि तस्यास्त्वं शरीरस्य समुद्भवम् ॥ एकीभूतं च सर्वेषां तेजः किं वा पृथक् स्थितम् अङ्गानि चैव तस्यास्तु सर्वतेजोमयानि वा भिन्नभागविभागेन जातान्यङ्गानि यानि तु मुखनासाक्षिभेदेन सर्वत्रैकभवानि च

ब्रूहि तद्विस्तरं व्यास शरीराङ्गसमुद्भवम् ।

बभूव यस्य देवस्य तेजसोऽङ्गं यदद्भुतम् ॥

आयुधाभरणादीनि दत्तानि यैर्यथा यथा तत्सर्वं श्रोतुकामोऽस्मि त्वन्मुखाम्बुजनिर्गतम् । कुबेर, यम, अग्नि तथा वरुणके भी शरीरोंसे ॥ ४० । सभी ओर महान् तेज निकलने लगा । इसी प्रकार अन्य देवताओंके शरीरोंसे भी अतिशय प्रदीप्त तेज । निकला । वह महान् तेजोराशि अत्यन्त दीप्तिमान् ॥ ४१ थी ॥ ४०-४१ ॥ दूसरे हिमालयपर्वतके सदृश उस महादिव्य । तेजोराशिको देखकर विष्णु आदि सभी प्रधान देवता ॥ ४२ आश्चर्यचकित हो गये ॥ ४२ ॥

उसी क्षण वहाँ सभी देवताओंके देखते - देखते । उस तेज: पुंजसे अत्यन्त श्रेष्ठ, सुन्दर तथा सबको ॥ ४३ विस्मित कर देनेवाली एक स्त्री प्रकट हो गयी ॥ ४३ ॥

सभी देवताओंके शरीरसे आविर्भूत वह नारी । त्रिगुणात्मिका, अठारह भुजाओंवाली, मनोहर, त्रिवर्णा ॥ ४४ तथा विश्वको मोहमें डाल देनेवाली साक्षात् महालक्ष्मी थीं । वे उज्ज्वल मुखवाली, कृष्णवर्णके । नेत्रोंवाली, अत्यन्त लाल अधरोष्ठसे सुशोभित, ताम्रवर्णकी हथेलीसे सुन्दर लगनेवाली, कान्तिसे सम्पन्न तथा ॥ ४५ दिव्य आभूषणोंसे अलंकृत थीं॥४४-४५ ॥ । देवताओंके शरीरसे उत्पन्न तेजोराशिसे प्रकट वे अठारह भुजाओंवाली भगवती असुरोंका विनाश करनेके ॥ ४६ लिये हजारों भुजाओंसे सुशोभित हो गयीं ॥ ४६ ॥

जनमेजय बोले- हे कृष्णद्वैपायन! हे महाभाग! हे सर्वज्ञ! हे मुनिवर! अब आप उन भगवतीके । शरीरकी उत्पत्तिका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये । उन ४७ सब देवताओंके शरीरसे निकला हुआ तेज बादमें एकत्र हो गया अथवा पृथक् - पृथक् ही रहा? उनके । अंग - प्रत्यंग विभिन्न देवताओंके तेजसे सम्पन्न थे ॥ ४८ अथवा नहीं? उनके शरीरके विभिन्न अंग - मुख, नासिका, नेत्र आदि अलग - अलग देवताओंके तेजसे । निर्मित थे अथवा सब तेज एक साथ मिलकर बने ॥ ४ ९ । थे? हे व्यासजी! उनके शरीरके अंगों की उत्पत्तिके विषयमें विस्तारपूर्वक बताइये । जिस देवताके तेजसे उनका जो - जो अद्भुत अंग बना, वह सब मुझे ५० | बताइये ॥ ४७ – ५० ॥ जिन - जिन देवताओंने उन भगवतीको जो - जो । आयुध तथा आभूषण आदि समर्पित किये, आपके ॥ ५१ मुखारविन्दसे निकली सारी बात मैं सुनना चाहता हूँ ।

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अ ०८ ]

न हि तृप्याम्यहं ब्रह्मन् सुधामयरसं पिबन् ।

चरितञ्च महालक्ष्म्यास्त्वन्मुखाम्भोजनिःसृतम् ॥

सूत उवाच

इति तस्य वचः श्रुत्वा राज्ञः सत्यवतीसुतः ।

उवाच मधुरं वाक्यं प्रीणयन्निव भूपतिम् ॥

व्यास उवाच

शृणु राजन्महाभाग विस्तरेण ब्रवीमि ते ।

यथामति कुरुश्रेष्ठ तस्या देहसमुद्भवम् ॥

न ब्रह्मा न हरिः साक्षान्न रुद्रो न च वासवः ।

याथातथ्येन तद्रूपं वक्तुमीशः कदाचन ॥

कथं जानाम्यहं देव्या यद्रूपं यादृशं यतः ।

वाचारम्भणमात्रं तदुत्पन्नेति ब्रवीमि यत् ॥

सा नित्या सर्वदैवास्ते देवकार्यार्थसिद्धये ।

नानारूपा त्वेकरूपा जायते कार्यगौरवात् ॥

यथा नटो रङ्गगतो नानारूपो भवत्यसौ ।

एकरूपस्वभावोऽपि लोकरञ्जनहेतवे ॥

तथैषा देवकार्यार्थमरूपापि स्वलीलया ।

करोति बहुरूपाणि निर्गुणा सगुणानि च ॥

कार्यकर्मानुसारेण नामानि प्रभवन्ति हि ।

धात्वर्थगुणयुक्तानि गौणानि सुबहून्यपि ॥

तद्वै बुद्धयनुसारेण प्रब्रवीमि नराधिप ।

यथा तेजःसमुद्भूतं रूपं तस्या मनोहरम् ॥

शङ्करस्य च यत्तेजस्तेन तन्मुखपङ्कजम् ।

श्वेतवर्णं शुभाकारमजायत महत्तरम् ॥

केशास्तस्यास्तथा स्निग्धा याम्येन तेजसाभवन् ।

वक्राग्राश्चातिदीर्घा वै मेघवर्णा मनोहराः ॥

पञ्चम स्कन्ध ५७१ हे ब्रह्मन्! आपके मुखकमलसे निकले महालक्ष्मीके ५२ चरित्ररूपी अमृतमय रसका पान करते हुए मैं तृप्त नहीं हो पा रहा हूँ ॥ ५१-५२ ॥ सूतजी बोले – [ हे मुनिवृन्द! ] उन राजा जनमेजयका यह वचन सुनकर सत्यवतीपुत्र श्रीव्यासजी ५३ उन्हें प्रसन्न करते हुए यह मधुर वचन कहने लगे ॥ ५३ ॥

व्यासजी बोले – हे राजन्! हे महाभाग! हे कुरुश्रेष्ठ! सुनिये, मैं अपनी बुद्धिके अनुसार उनके शरीरकी उत्पत्तिके विषयमें विस्तारपूर्वक आपसे ५४ कहता हूँ ॥५४ ॥

स्वयं ब्रह्मा, विष्णु, महेश और इन्द्र भी भगवतीके यथार्थ रूपको बता पानेमें कभी भी ५५ समर्थ नहीं हैं तब देवीका जो रूप है, जैसा है और जिस उद्देश्यसे बना है, उसे मैं कैसे जान सकता हूँ? बस, मेरी वाणी इतना ही कह सकती है कि वे ५६ भगवती प्रकट हुईं ॥ ५५-५६ ॥ वे देवी नित्यस्वरूपा हैं और सदा ही सर्वत्र विराजमान रहती हैं । वे एक होती हुई भी गुरुतर कार्य ५७ पड़नेपर देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये नाना प्रकारके रूप धारण कर लेती हैं ॥ ५७ ॥

जिस प्रकार नाटकका कोई नट एक होता हुआ ५८ भी रंगमंचपर जाकर लोगोंके मनोरंजनहेतु अनेक रूप धारण कर लेता है, उसी प्रकार रूपरहित तथा निर्गुणा होती हुई भी ये भगवती देवताओंका कार्य सम्पन्न ५ ९ करनेके लिये अपनी लीलासे अनेक सगुण रूप धारण कर लिया करती हैं और किये जानेवाले कर्मके अनुसार धात्वर्थ- गुणसंयुक्त उनके अनेक गौण नाम ६० पड़ जाते हैं ॥ ५८- ६० ॥ हे राजन्! देवताओंके तेजसमूहसे उन भगवतीका मनोहर रूप जिस प्रकार उत्पन्न हुआ, उसे मैं अपनी ६१ । बुद्धिके अनुसार बता रहा हूँ ॥ ६१ ॥

भगवान् शंकरका जो तेज था, उससे उन भगवतीका गौरवर्ण, सुन्दर आकारवाला तथा अत्यन्त ६२ विशाल मुखकमल निर्मित हुआ ॥ ६२ ॥

यमराजके तेजसे उनके कोमल, घुँघराले, बहुत लम्बे, मेघके समान कृष्ण वर्णवाले और मनोहर ६३ | केश बने ॥ ६३ ॥