देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 581–590
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 581–590
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५७२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ८
नयनत्रितयं तस्या जज्ञे पावकतेजसा ।
कृष्णं रक्तं तथा श्वेतं वर्णत्रयविभूषितम् ॥ ६४
वक्रे स्निग्धे कृष्णवर्णे सन्ध्ययोस्तेजसा भ्रुवौ ।
जाते देव्याः सुतेजस्के कामस्य धनुषीव ते ॥ ६५
वायोश्च तेजसा शस्तौ श्रवणौ सम्बभूवतुः ।
नातिदीर्घौ नातिह्रस्वौ दोलाविव मनोभुवः ॥ ६६
तिलपुष्पसमाकारा नासिका सुमनोहरा ।
सञ्जाता स्निग्धवर्णा वै धनदस्य च तेजसा ॥ ६७
दन्ताः शिखरिणः श्लक्ष्णाः कुन्दाग्रसदृशाः समाः । सञ्जाताः सुप्रभा राजन् प्राजापत्येन तेजसा । ६८
अधरश्चातिरक्तोऽस्याः सञ्जातोऽरुणतेजसा ।
उत्तरोष्ठस्तथा रम्यः कार्तिकेयस्य तेजसा ॥ ६ ९
अष्टादशभुजाकारा बाहवो विष्णुतेजसा ।
वसूनां तेजसाङ्गुल्यो रक्तवर्णास्तथाभवन् ॥७०
सौम्येन तेजसा जातं स्तनयोर्युग्ममुत्तमम् ।
ऐन्द्रेणास्यास्तथा मध्यं जातं त्रिवलिसंयुतम् ॥ ७१
जङ्घोरू वरुणस्याथ तेजसा सम्बभूवतुः ।
नितम्बः स तु सञ्जातो विपुलस्तेजसा भुवः ॥ ७२
एवं नारी शुभाकारा सुरूपा सुस्वरा भृशम् ।
समुत्पन्ना तथा राजंस्तेजोराशिसमुद्भवा ॥ ७३
तां दृष्ट्वा सुष्ठुसर्वाङ्गीं सुदतीं चारुलोचनाम् ।
मुदं प्रापुः सुराः सर्वे महिषेण प्रपीडिताः ॥ ७४
विष्णुस्त्वाह सुरान्सर्वान्भूषणान्यायुधानि च ।
प्रयच्छन्तु शुभान्यस्यै देवाः सर्वाणि साम्प्रतम् ॥ ७५
स्वायुधेभ्यः समुत्पाद्य तेजोयुक्तानि सत्वराः ।
समर्पयन्तु सर्वेऽद्य देव्यै नानायुधानि वै ॥ ७६ ।
अग्निके तेजसे उन भगवतीके तीनों नेत्र बने । तीन प्रकारके वर्णोंसे सुशोभित वे नेत्र काले, लाल तथा श्वेत थे ॥ ६४ ॥
उनकी भौंहें दोनों सन्ध्याओंके तेजसे बनीं । वे टेढ़ी, चिकनी, काले रंगकी, अत्यन्त तेजोमय तथा कामदेव धनुषकी भाँति प्रतीत हो रही थीं ॥ ६५ ॥
उनके दोनों उत्तम कान वायुके तेजसे बने, जो न बहुत बड़े तथा न बहुत छोटे थे । वे कामदेवके झूले सदृश प्रतीत हो रहे थे । तिलके फूलके समान आकृतिवाली, अत्यन्त मनोहर और स्निग्ध नाक कुबेरके तेजसे उत्पन्न हुई ॥ ६६-६७ ॥ हे राजन्! उन देवीके नुकीले, चिकने, चमकीले, कुन्दके अग्रभागके सदृश तथा समान दाँत प्रजापतिके तेजसे उत्पन्न हुए ॥६८ ॥
उनका रक्तवर्ण अधरोष्ठ अरुणके तेजसे उत्पन्न हुआ तथा ऊपरका अत्यन्त मनोहर उत्तरोष्ठ ( ऊपरका ओष्ठ ) कार्तिकेयके तेजसे उत्पन्न हुआ ॥ ६ ९ ॥ उन देवीकी अठारह भुजाएँ विष्णुके तेजसे प्रकट हुईं तथा उनकी रक्तवर्णकी अँगुलियाँ वसुओंके तेजसे उत्पन्न हुईं । उनके दोनों उत्तम स्तन चन्द्रमाके तेजसे आविर्भूत हुए तथा तीन रेखाओंसे युक्त उनका मध्यभाग इन्द्रके तेजसे उत्पन्न हुआ । उनकी जाँघें तथा ऊरु-प्रदेश वरुणके तेजसे उत्पन्न हुए तथा उनका विशाल नितम्ब पृथ्वीके तेजसे उत्पन्न हुआ ॥ ७०-७२ ॥ हे राजन्! इस प्रकार उस तेजोराशिसे सुन्दर आकारवाली, दिव्य रूपसे सम्पन्न तथा मधुर स्वरवाली भगवती नारी - रूपमें प्रकट हुईं ॥ ७३ ॥
मनोहर अंग - प्रत्यंगवाली, सुन्दर दाँतोंवाली तथा भव्य नेत्रोंवाली उन देवीको देखकर महिषासुरसे पीड़ित समस्त देवता अत्यन्त आनन्दित हो उठे ॥७४ ॥
उसी समय भगवान् विष्णुने सभी देवताओंसे कहा-हे देवताओ! अब आपलोग अपने - अपने सभी शुभ भूषण एवं आयुध इन देवीको प्रदान करें । अपने - अपने आयुधों से नानाविध तेजस्वी शस्त्रास्त्र उत्पन्न करके सभी लोग शीघ्र ही देवीको अर्पित कर दें ॥ ७५-७६ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे देव्या: स्वरूपोद्भववर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
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अ ० ९ ] पञ्चम स्कन्ध ५७३ अथ नवमोऽध्यायः देवताओं द्वारा भगवतीको आयुध और आभूषण समर्पित करना तथा उनकी स्तुति करना, देवीका प्रचण्ड अट्टहास करना, जिसे सुनकर महिषासुरका उद्विग्न होकर अपने प्रधान अमात्यको देवीके पास भेजना व्यास उवाच
देवा विष्णुवचः श्रुत्वा सर्वे प्रमुदितास्तदा ।
ददुश्च भूषणान्याशु वस्त्राणि स्वायुधानि च ॥ १
क्षीरोदश्चाम्बरे दिव्ये रक्ते सूक्ष्मे तथाजरे ।
निर्मलञ्च तथा हारं प्रीतस्तस्यै सुमण्डितम् ॥ २
ददौ चूडामणिं दिव्यं सूर्यकोटिसमप्रभम् ।
कुण्डले च तथा शुभ्रे कटकानि भुजेषु वै ॥ ३
केयूरान्कङ्कणान्दिव्यान्नानारत्नविराजितान् ।
ददौ तस्यै विश्वकर्मा प्रसन्नेन्द्रियमानसः ॥ ४
नूपुरौ सुस्वरौ कान्तौ निर्मलौ रत्नभूषितौ ।
ददौ सूर्यप्रतीकाशौ त्वष्टा तस्यै सुपादयोः ॥ ५
तथा ग्रैवेयकं रम्यं ददौ तस्यै महार्णवः ।
अङ्गुलीयकरत्नानि तेजोवन्ति च सर्वशः ॥ ६
अम्लानपङ्कजां मालां गन्धाढ्यां भ्रमरानुगाम् ।
तथैव वैजयन्तीञ्च वरुणः सम्प्रयच्छत ॥ ७
हिमवानथ सन्तुष्टो रत्नानि विविधानि च ।
ददौ च वाहनं सिंहं कनकाभं मनोहरम् ॥ ८
भूषणैर्भूषिता दिव्यैः सा रराज वरा शुभा ।
सिंहारूढा वरारोहा सर्वलक्षणसंयुता ॥ ९
विष्णुश्चक्रात्समुत्पाद्य ददावस्यै रथाङ्गकम् ।
सहस्त्रारं सुदीप्तञ्च देवारिशिरसां हरम् ॥ १०
व्यासजी बोले - [ हे राजन्! ] तब भगवान् विष्णुका यह वचन सुनकर सभी देवता बहुत प्रसन्न हुए । वे तुरंत महालक्ष्मीको वस्त्र, आभूषण और अपने - अपने आयुध प्रदान करने लगे ॥ १ ॥
क्षीरसागरने देवीको दिव्य, रक्तवर्णवाले, महीन तथा कभी भी जीर्ण न होनेवाले दो वस्त्र; निर्मल तथा मनोहर हार; करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान दिव्य चूडामणि; दो सुन्दर कुण्डल तथा कड़े प्रसन्नतापूर्वक दिये । विश्वकर्माने भुजाओंपर धारण करनेके लिये बाजूबन्द और अनेक प्रकारके रत्नजटित दिव्य कंकण प्रसन्नचित्त होकर उन्हें प्रदान किये । साथ ही त्वष्टाने मधुर ध्वनिवाले, चमकीले, स्वच्छ, रत्नजटित और सूर्यके समान प्रकाशमान दो नूपुर पैरोंमें पहननेके लिये उन्हें प्रदान किये ॥२-५ ॥ महासमुद्रने उन्हें गलेमें धारण करनेके लिये मनोहर कण्ठहार और रत्नोंसे निर्मित तेजोमय अँगूठियाँ प्रदान कीं ॥ ६ ॥
वरुणदेवने कभी न मुरझानेवाले कमलोंकी माला, जो सुगन्धसे परिपूर्ण थी तथा जिसपर भौरे मँडरा रहे थे और वैजयन्ती नामक माला भगवतीको प्रदान की ॥ ७ ॥
हिमवान्ने प्रसन्न होकर उन्हें नाना प्रकारके रत्न तथा सुवर्णके समान चमकीले वर्णवाला एक मनोहर सिंह वाहनके रूपमें प्रदान किया ॥ ८ ॥
सभी लक्षणोंसे सम्पन्न तथा सुन्दर रूपवाली वे कल्याणमयी श्रेष्ठ भगवती दिव्य आभूषणोंसे विभूषित होकर सिंहपर आरूढ़ होकर अत्यन्त सुशोभित हो रही थीं ॥ ९ ॥
तत्पश्चात् भगवान् विष्णुने अपने चक्रसे उत्पन्न करके सहस्र अरोंवाला, तेजसम्पन्न और दैत्योंका सिर काट लेनेकी सामर्थ्यवाला एक चक्र । उन्हें प्रदान किया ॥ १० ॥
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स्वत्रिशूलात्समुत्पाद्य शङ्करः शूलमुत्तमम् ।
ददौ देव्यै सुरारीणां कृन्तनं भयनाशनम् ॥
वरुणश्च प्रसन्नात्मा ददौ शङ्खं समुज्ज्वलम् ।
घोषवन्तं स्वशङ्खात्तु समुत्पाद्य सुमङ्गलम् ॥
हुताशनस्तथा शक्तिं शतघ्नीं सुमनोजवाम् ।
प्रायच्छत्तु प्रसन्नात्मा तस्यै दैत्यविनाशिनीम् ॥
इषुधिं बाणपूर्णञ्च चापं चाद्भुतदर्शनम् ।
मारुतो दत्तवांस्तस्यै दुराकर्षं खरस्वरम् ॥
स्ववज्राद्वज्रमुत्पाद्य ददाविन्द्रोऽतिदारुणम् ।
घण्टामैरावतात्तूर्णं सुशब्दां चातिसुन्दराम् ॥
ददौ दण्डं यमः कामं कालदण्डसमुद्भवम् ।
येनान्तं सर्वभूतानामकरोत्काल आगते ॥
ब्रह्मा कमण्डलुं दिव्यं गङ्गावारिप्रपूरितम् ।
ददावस्यै मुदा युक्तो वरुणः पाशमेव च ॥
कालः खड्गं तथा चर्म प्रायच्छत्तु नराधिप ।
परशुं विश्वकर्मा च तीक्ष्णमस्यै ददावथ ॥
धनदस्तु सुरापूर्णं पानपात्रं सुवर्णजम् ।
पङ्कजं वरुणश्चादाद्देव्यै दिव्यं मनोहरम् ॥
गदां कौमोदकीं त्वष्टा घण्टाशतनिनादिनीम् ।
अदात्तस्यै प्रसन्नात्मा सुरशत्रुविनाशिनीम् ॥
अस्त्राण्यनेकरूपाणि तथाभेद्यञ्च दंशनम् ।
ददौ त्वष्टा जगन्मात्रे निजरश्मीन्दिवाकरः ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ९ शंकरजीने अपने त्रिशूलसे उत्पन्न करके भगवतीको एक ऐसा उत्तम त्रिशूल अर्पण किया. ११ जो दानवोंको काट डालनेकी शक्तिसे सम्पन्न तथा देवताओंके भयका नाश करनेवाला था ॥११ ॥
वरुणदेवने अपने शंखसे उत्पन्न करके १२ प्रसन्नचित्त होकर देवीजीको एक ऐसा शंख प्रदान किया; जो मंगलमय, अत्यन्त उज्ज्वल तथा तीव्र ध्वनि करनेवाला था ॥१२ ॥
अग्निदेवने प्रसन्नचित्त होकर सैकड़ों शत्रुओंका १३ संहार करनेवाली, मनके समान तीव्र गतिसे चलनेवाली तथा दैत्योंका विनाश करनेवाली एक शक्ति उन्हें प्रदान की ॥ १३ ॥
१४ पवनदेवने उन भगवती महालक्ष्मीको बाणोंसे भरा हुआ एक तरकस तथा देखनेमें अत्यन्त अद्भुत. कठिनाई से खींचा जा सकनेवाला और कर्कश टंकार करनेवाला धनुष प्रदान किया ॥ १४ ॥
१५ देवराज इन्द्रने अपने वज्रसे उत्पन्न करके एक अत्यन्त भयंकर वज्र तथा ऐरावत हाथीसे उतारकर एक परम सुन्दर तथा तीव्र ध्वनि करनेवाला घण्टा १६ तुरंत भगवतीको अर्पण किया ॥१५ ॥
यमराजने अपने कालदण्डसे आविर्भूत एक ऐसा दण्ड भगवतीको प्रदान किया, जिससे वे समय आनेपर सभी प्राणियोंका अन्त करते थे ॥ १६ ॥
१७ ब्रह्माजीने गंगाजलसे परिपूर्ण दिव्य कमण्डलु और वरुणदेवने अपना पाश उन्हें प्रसन्नतापूर्वक प्रदान किया ॥ १७ ॥
हे राजन्! कालने महालक्ष्मीको खड्ग तथा १८ ढाल दिये और विश्वकर्माने उन्हें तीक्ष्ण परशु अर्पण किया ॥ १८ ॥
कुबेरने भगवतीको एक सुवर्णमय पानपात्र तथा १ ९ वरुणने उन्हें दिव्य तथा मनोहर कमल - पुष्प प्रदान किया ॥ १ ९ ॥ प्रसन्न मनवाले त्वष्टाने सैकड़ों घण्टोंके समान ध्वनि करनेवाली और दानवोंका विनाश कर डालनेवाली २० कौमोदकी नामक गदा उन्हें प्रदान की । साथ ही उन त्वष्टाने जगज्जननी भगवती महालक्ष्मीको अनेक प्रकारके अस्त्र तथा अभेद्य कवच प्रदान किये और २१ । सूर्यदेवने उन्हें अपनी किरणें प्रदान कीं ॥ २०-२१ ॥
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अ ० ९ ] पञ्चम स्कन्ध ५७५ सायुधां भूषणैर्युक्तां दृष्ट्वा ते विस्मयं गताः तुष्टुवुस्तां सुरा देवीं त्रैलोक्यमोहिनीं शिवाम् देवा ऊचुः नमः शिवायै कल्याण्यै शान्त्यै पुष्ट्यै नमो नमः भगवत्यै नमो देव्यै रुद्राण्यै सततं नमः कालरात्र्यै तथाम्बायै इन्द्राण्यै ते नमो नमः सिद्ध्यै बुद्ध्यै तथा वृद्ध्यै वैष्णव्यै ते नमो नमः पृथिव्यां या स्थिता पृथ्व्या न ज्ञाता पृथिवीञ्च या अन्तःस्थिता यमयति वन्दे तामीश्वरीं पराम् मायायां या स्थिता ज्ञाता मायया न च तामजाम् अन्तः स्थिता प्रेरयति प्रेरयित्रीं नुमः शिवाम् कल्याणं कुरु भो मातस्त्राहि नः शत्रुतापितान् जहि पापं हयारिं त्वं तेजसा स्वेन मोहितम् खलं मायाविनं घोरं स्त्रीवध्यं वरदर्पितम् दुःखदं सर्वदेवानां नानारूपधरं शठम् त्वमेका सर्वदेवानां शरणं भक्तवत्सले पीडितान्दानवेनाद्य त्राहि देवि नमोऽस्तु ते व्यास उवाच एवं स्तुता तदा देवी सुरैः सर्वसुखप्रदा नानुवाच महादेवी स्मितपूर्वं शुभं वचः देव्युवाच भयं त्यजन्तु गीर्वाणा महिषान्मन्दचेतसः हनिष्यामि रणेऽद्यैव वरदृप्तं विमोहितम् । इस प्रकार सभी आयुधों तथा आभूषणोंसे युक्त उन भगवतीको देखकर देवतागण अत्यन्त विस्मित ॥ २२ हुए और त्रैलोक्यमोहिनी उन कल्याणकारिणी देवीकी स्तुति करने लगे ॥ २२ ॥
देवता बोले- शिवाको नमस्कार है । कल्याणी, । शान्ति और पुष्टि देवीको बार - बार नमस्कार है । ॥ २३ भगवतीको नमस्कार है । देवी रुद्राणीको निरन्तर नमस्कार है ॥२३ ॥
। आप कालरात्रि, अम्बा तथा इन्द्राणीको बार-बार नमस्कार है । आप सिद्धि, बुद्धि, वृद्धि तथा ॥ २४ वैष्णवीको बार - बार नमस्कार है ॥२४ ॥
पृथ्वीके भीतर स्थित रहकर जो पृथ्वीको नियन्त्रित । करती हैं, किंतु पृथ्वी जिन्हें नहीं जान पातीं, उन परा ॥ २५ परमेश्वरीकी मैं वन्दना करता हूँ ॥२५ ॥
जो मायाके अन्दर स्थित रहनेपर भी मायाके । द्वारा नहीं जानी जा सकीं तथा जो मायाके अन्दर ॥ २६ विराजमान रहकर उसे प्रेरणा प्रदान करती हैं, उन जन्मरहित तथा प्रेरणा प्रदान करनेवाली भगवती शिवाको हम नमस्कार करते हैं ॥ २६ ॥
। हे माता! आप हमारा कल्याण करें और ॥ २७ शत्रुओंसे संत्रस्त हम देवताओंकी रक्षा करें । आप अपने तेजसे इस मोहग्रस्त पापी महिषासुरका वध कर । डालें । यह महिषासुर दुष्ट, घोर मायावी, केवल ॥ २८ स्त्रीके द्वारा मारा जा सकनेवाला, वरदान प्राप्त करनेसे अभिमानी, समस्त देवताओंको दुःख देनेवाला तथा । अनेक रूप धारण करनेवाला महादुष्ट है । २७-२८ ॥ हे भक्तवत्सले! एकमात्र आप ही सभी देवताओंकी ॥ २ ९ शरण हैं; दानव महिषासुरसे पीड़ित हम देवताओंकी
आप रक्षा कीजिये । हे देवि! आपको नमस्कार है ॥ २ ९ ॥
व्यासजी बोले- इस प्रकार सब देवताओंके । स्तुति करनेपर समस्त सुख प्रदान करनेवाली महादेवी ॥ ३० मुसकराकर उन देवताओंसे यह मंगलमय वचन कहने लगीं ॥३० ॥
देवी बोलीं- हे देवतागण! आपलोग मन्दबुद्धि महिषासुरका भय त्याग दें । मैं वर पानेके कारण । अभिमानमें चूर तथा मोहग्रस्त उस महिषासुरको आज ॥ ३१ ही रणमें मार डालूंगी ॥ ३१ ॥
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५७६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ०: व्यास उवाच
इत्युक्त्वा सा सुरान्देवी जहासातीव सुस्वरम् ।
चित्रमेतच्च संसारे भ्रममोहयुतं जगत् ॥
ब्रह्मविष्णुमहेशाद्याः सेन्द्राश्चान्ये सुरास्तथा ।
कम्पयुक्ता भयत्रस्ता वर्तन्ते महिषात्किल ॥
अहो दैवबलं घोरं दुर्जयं सुरसत्तमाः ।
कालः कर्तास्ति दुःखानां सुखानां प्रभुरीश्वरः ॥
सृष्टिपालनसंहारे समर्था अपि ते यदा ।
मुह्यन्ति क्लेशसन्तप्ता महिषेण प्रपीडिताः ॥
इति कृत्वा स्मितं देवी साट्टहासं चकार ह ।
उच्चैः शब्दं महाघोरं दानवानां भयप्रदम् ॥
चकम्पे वसुधा तत्र श्रुत्वा तच्छब्दमद्भुतम् ।
चेलुश्च पर्वताः सर्वे चुक्षोभाब्धिश्च वीर्यवान् ॥
मेरुश्चचाल शब्देन दिशः सर्वाः प्रपूरिताः ।
भयं जग्मुस्तदा श्रुत्वा दानवास्तत्स्वनं महत् ॥
जय पाहीति देवास्तामूचुः परमहर्षिताः ।
महिषोऽपि स्वनं श्रुत्वा चुकोप मदगर्वितः ॥
किमेतदिति तान्दैत्यान्पप्रच्छ स्वनशङ्कितः ।
गच्छन्तु त्वरिता दूता ज्ञातुं शब्दसमुद्भवम् ॥
कृतः केनायमत्युग्रः शब्दः कर्णव्यथाकरः ।
देवो वा दानवो वापि यो भवेत्स्वनकारकः ॥
गृहीत्वा तं दुरात्मानं मत्समीपं नयन्त्विह ।
हनिष्यामि दुराचारं गर्जन्तं स्मयदुर्मदम् ॥
क्षीणायुष्यं मन्दमतिं नयामि यमसादनम् ।
पराजिताः सुराः कामं न गर्जन्ति भयातुराः ॥
नासुरा मम वश्यास्ते कस्येदं मूढचेष्टितम् ।
त्वरिता मामुपायान्तु ज्ञात्वा शब्दस्य कारणम् ॥
व्यासजी बोले – देवताओंसे ऐसा कहकर वे भगवती अत्यन्त उच्च स्वरमें हँस पड़ी । [ ३२ | बोलीं- ] इस संसार में यह बड़ी विचित्र बात है कि यह सारा जगत् ही भ्रम तथा मोहसे ग्रसिन् है । ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र आदि तथा अन्य ३३ देवता भी महिषासुरसे भयभीत होकर काँपने लगते हैं ॥ ३२-३३ ॥ हे श्रेष्ठ देवताओ! दैवबल बड़ा ही भयानक ३४ और दुर्जय है । काल ही सुख और दुःखका कर्ता है 1 यही सबका प्रभु तथा ईश्वर है । सृष्टि, पालन तथा संहार करनेमें समर्थ रहते हुए भी वे ब्रह्मा आदि ३५ मोह - ग्रस्त हो जाते हैं, कष्ट भोगते हैं और महिषासुरके द्वारा सताये जाते हैं ॥ ३४-३५ ॥ ३६ मुसकराकर ऐसा कहनेके पश्चात् देवी अट्टहास करने लगीं । उस अट्टहासका महाभयानक गर्जन दानवोंको भयभीत कर देनेवाला था ॥ ३६ ॥
३७ उस अद्भुत शब्दको सुनकर पृथ्वी काँपने लगी. सभी पर्वत चलायमान हो उठे और अगाध महासमुद्र में विक्षोभ उत्पन्न होने लगा । उस शब्दसे सुमेरुपर्वत ३८ हिलने लगा और सभी दिशाएँ गूँज उठीं । उस तीव्र ध्वनिको सुनकर सभी दानव भयभीत हो गये । सभी देवता परम प्रसन्न होकर ' आपकी जय हो ', ' हमारी ३ ९ रक्षा करो ' – ऐसा उन देवीसे कहने लगे ॥ ३७-३८३ ॥ अभिमानमें चूर महिषासुर भी वह ध्वनि सुनकर क्रुद्ध हो उठा । उस ध्वनिसे सशंकित महिषासुरने ४० दैत्योंसे पूछा – यह कैसी ध्वनि है? इस ध्वनिके उद्गम - स्थलको जाननेके लिये दूतगण तत्काल यहाँसे ४१ जायँ । कानोंको पीड़ा पहुँचानेवाला यह अति भीषण शब्द किसने किया है? देवता या दानव जो कोई भी इस ध्वनिको उत्पन्न करनेवाला हो, उस दुष्टात्माको ४२ पकड़कर मेरे पास ले आयें । ऐसा गर्जन करनेवाले उस अभिमानके मदमें उन्मत्त दुराचारीको मैं मार डालूँगा । मैं क्षीण - आयु तथा मन्दबुद्धिवाले उस ४३ दुष्टको अभी यमपुरी पहुँचा दूँगा । देवता मुझसे पराजित होकर भयभीत हो गये हैं, अतः वे ऐसा गर्जन कर ही नहीं सकते । दानव भी ऐसा नहीं कर ४४ | सकते; क्योंकि वे सब तो मेरे अधीन हैं, तो फिर यह
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अ ० ९ ] अहं गत्वा हनिष्यामि तं पापं वितथश्रमम् । व्यास उवाच इत्युक्तास्तेन ते दूता देवीं सर्वाङ्गसुन्दरीम् ॥
अष्टादशभुजां दिव्यां सर्वाभरणभूषिताम् ।
सर्वलक्षणसम्पन्नां वरायुधधरां शुभाम् ॥
दधतीं चषकं हस्ते पिबन्तीं च मुहुर्मधु ।
संवीक्ष्य भयभीतास्ते जग्मुस्त्रस्ताः सुशङ्किताः ॥
सकाशे महिषस्याशु तमूचुः स्वनकारणम् । दूता ऊचुः देवी दैत्येश्वर प्रौढा दृश्यते काचिदङ्गना ॥
सर्वाङ्गभूषणा नारी सर्वरत्नोपशोभिता ।
न मानुषी नासुरी सा दिव्यरूपा मनोहरा ॥
सिंहारूढायुधधरा चाष्टादशकरा वरा ।
सा नादं कुरुते नारी लक्ष्यते मदगर्विता ॥
सुरापानरता कामं जानीमो न सभर्तृका ।
अन्तरिक्षस्थिता देवास्तां स्तुवन्ति मुदान्विताः ॥
जयेति पाहि नश्चेति जहि शत्रुमिति प्रभो ।
न जाने का वरारोहा कस्य वा सा परिग्रहः ॥
किमर्थमागता चात्र किं चिकीर्षति सुन्दरी ।
द्रष्टुं नैव समर्थाः स्मस्तत्तेजः परिधर्षिताः ॥
शृङ्गारवीरहासाढ्या रौद्राद्भुतरसान्विता ।
दृष्ट्वैवैवंविधां नारीमसम्भाष्य समागताः ॥
वयं त्वदाज्ञया राजन् किं कर्तव्यमतः परम् । पञ्चम स्कन्ध ५७७ मूर्खतापूर्ण चेष्टा किसकी हो सकती है? अब दूतगण इस शब्दके कारणका पता लगाकर मेरे पास शीघ्र आयें । तत्पश्चात् मैं स्वयं वहाँ जाकर ऐसा व्यर्थ कर्म ४५ करनेवाले उस पापीका वध कर दूँगा ॥ ३ ९ -४४३ ॥ व्यासजी बोले – महिषासुरके ऐसा कहनेपर वे दूत [ शब्दके कारणका पता लगाते - लगाते ] समस्त ४६ सुन्दर अंगोंवाली, अठारह भुजाओंवाली, दिव्य विग्रहमयी, सभी प्रकारके आभूषणोंसे अलंकृत, सम्पूर्ण शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, उत्तम आयुध धारण करनेवाली और हाथमें मधुपात्र लेकर बार - बार उसका पान ४७ करती हुई भगवतीके पास पहुँच गये । उन्हें देखकर वे भयभीत हो गये और व्याकुल तथा सशंकित होकर वहाँसे भाग चले । महिषासुर के पास आकर वे उससे ध्वनिका कारण बताने लगे ॥ ४५ - ४७३ ॥ ४८ दूत बोले – हे दैत्येन्द्र! वह कोई प्रौढा स्त्री और देवीकी भाँति दिखायी देती है । उस स्त्रीके सभी अंगोंमें आभूषण विद्यमान हैं तथा वह सभी प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित है । वह स्त्री ४ ९ न तो मानवी है और न तो आसुरी है । दिव्यविग्रहवाली वह स्त्री बड़ी मनोहर है । अठारह भुजाओंवाली वह श्रेष्ठ नारी नानाविध आयुध धारण करके ५० सिंहपर विराजमान है । वही स्त्री गर्जन कर रही है । वह मदोन्मत्त दिखायी दे रही है । वह निरन्तर मद्यपान कर रही है । हमें ऐसा जान पड़ता है कि वह अभी विवाहिता नहीं है ॥ ४८ - ५०३ ॥ ५१ देवतागण आकाशमें स्थित होकर प्रसन्नतापूर्वक उसकी इस प्रकार स्तुति कर रहे हैं - ' आपकी जय हो ', ' हमारी रक्षा करो ' और ' शत्रुओंका वध करो ' । ५२ हे प्रभो! मैं यह नहीं जानता कि वह सुन्दरी कौन है, किसकी पत्नी है, वह सुन्दरी यहाँ किसलिये आयी हुई है और वह क्या करना चाहती है? उस स्त्रीके ५३ तेजसे चकाचौंध हमलोग उसे देखनेमें समर्थ नहीं हो सके । वह स्त्री शृंगार, वीर, हास्य, रौद्र और अद्भुत— इन सभी रसोंसे परिपूर्ण थी । इस प्रकारकी अद्भुत स्वरूपवाली नारीको देखकर हमलोग बिना कुछ कहे ५४ ही आपके आज्ञानुसार लौट आये । हे राजन्! अब इसके बाद क्या करना है? ॥ ५१ – ५४३ ॥ 1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] -19 A
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५७८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ९ महिष उवाच गच्छ वीर मयादिष्टो मन्त्रिश्रेष्ठ बलान्वितः सामादिभिरुपायैस्त्वं समानय शुभाननाम् नायाति यदि सा नारी त्रिभिः सामादिभिस्त्विह अहत्वा तां वरारोहां त्वमानय ममान्तिकम् करोमि पट्टमहिषीं तां मरालभ्रुवं मुदा प्रीतियुक्ता समायाति यदि सा मृगलोचना रसभङ्गो यथा न स्यात्तथा कुरु ममेप्सितम् ॥ श्रवणान्मोहितोऽस्म्यद्य तस्या रूपस्य सम्पदा व्यास उवाच महिषस्य वचः श्रुत्वा पेशलं मन्त्रिसत्तमः
जगाम तरसा कामं गजाश्वरथसंयुतः ।
गत्वा दूरतरं स्थित्वा तामुवाच मनस्विनीम् ॥
विनयावनतः श्लक्ष्णं मन्त्री मधुरया गिरा । प्रधान उवाच कासि त्वं मधुरालापे किमत्रागमनं कृतम् पृच्छति त्वां महाभागे मन्मुखेन मम प्रभुः । स जेता सर्वदेवानामवध्यस्तु नरैः किल
ब्रह्मणो वरदानेन गर्वितश्चारुलोचने ।
दैत्येश्वरोऽसौ बलवान्कामरूपधरः सदा ॥
श्रुत्वा त्वां समुपायातां चारुवेषां मनोहराम् ।
द्रष्टुमिच्छति राजा मे महिषो नाम पार्थिवः ॥
मानुषं रूपमादाय त्वत्समीपं समेष्यति ।
यथा रुच्येत चार्वङ्गि तथा मन्यामहे वयम् ॥
तर्ह्येहि मृगशावाक्षि समीपं तस्य धीमतः ।
नो चेदिहानयाम्येनं राजानं भक्तितत्परम् ॥
1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] – 19 B महिषासुर बोला - हे वीर! हे मन्त्रिश्रेष्ठ! तुम ॥ ५५ मेरे आदेशसे सेना साथमें लेकर जाओ और साम आदि उपायोंसे उस सुन्दर मुखवाली स्त्रीको यहाँ ले । आओ । यदि वह स्त्री साम, दान और भेद - इन तीन ॥ ५६ उपायोंसे भी यहाँ न आये तो उस सुन्दरीको बिना मारे ही पकड़कर मेरे पास ले आओ, यदि वह मृगनयनी । प्रीतिपूर्वक आयेगी तो मैं हंसके समान भौंहोंवाली उस ॥ ५७ स्त्रीको प्रसन्नतापूर्वक अपनी पटरानी बनाऊँगा । मेरी इच्छा समझकर जिस प्रकार रसभंग न हो, वैसा । करना । मैं उसकी रूपराशिकी बात सुनकर मोहित हो ५८ गया हूँ ॥ ५५ - ५८३ ॥ व्यासजी बोले – महिषासुरकी यह कोमल । वाणी सुनकर वह श्रेष्ठ मन्त्री हाथी, घोड़े और रथ साथ लेकर तुरंत चल पड़ा । वहाँ पहुँचकर कुछ दूर ॥ ५ ९ खड़े होकर वह सचिव कोमल तथा मधुर वाणीमें विनम्रतापूर्वक उस दृढ़ निश्चयवाली नारीसे कहने लगा ॥ ५ ९ -६० ३ ॥ ६० प्रधान बोला- हे मधुरभाषिणि! तुम कौन हो और यहाँ क्यों आयी हो? हे महाभागे! मेरे मुखसे ऐसा कहलाकर मेरे स्वामीने तुमसे यह बात पूछी है ॥ ६१ ॥
॥ ६१ उन्होंने समस्त देवताओंको जीत लिया है और वे मनुष्योंसे अवध्य हैं । हे चारुलोचने! ब्रह्माजीसे वरदान पानेके कारण वे बहुत गर्वयुक्त रहते हैं । वे ॥ ६२ दैत्यराज महिष बड़े बलवान् हैं और अपनी इच्छाके अनुसार वे सदा विविध रूप धारण कर सकते हैं ॥ ६२-६३ ॥ ६३ सुन्दर वेष तथा मनोहर विग्रहवाली आप यहाँ आयी हुई हैं — ऐसा सुनकर मेरे प्रभु महाराज महिषासुर आपको देखना चाहते हैं । वे मनुष्यका ६४ रूप धारण करके आपके पास आयेंगे । हे सुन्दर अंगोंवाली! आपकी जो इच्छा होगी, हम उसीको मान लेंगे ॥ ६४-६५ ॥ ६५ हे बालमृगके समान नेत्रोंवाली! अब आप उन बुद्धिमान् राजा महिषके पास चलें और नहीं तो मैं स्वयं जाकर आपके प्रेममें लीन राजा महिषको यहाँ ६६ | ले आऊँ ॥ ६६ ॥
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अ ० १० ] पञ्चम स्कन्ध ५७ ९ तथा करोमि देवेशि यथा ते मनसेप्सितम् । हे देवेशि! आपके मनमें जैसी इच्छा होगी, वशगोऽसौ तवात्यर्थं रूपसंश्रवणात्तव ॥ ६७ मैं वही करूँगा । आपके रूपके विषयमें सुनकर वे पूर्णरूपसे आपके वशवर्ती हो गये हैं । हे करभोरु! आप शीघ्र बताएँ; मैं उसीके अनुसार
करभोरु वदाशु त्वं संविधेयं मया तथा ॥ ६८ । कार्य करूँगा ॥ ६७-६८ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे महिषमन्त्रिणा देवीवार्तावर्णनं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
अथ दशमोऽध्यायः देवीद्वारा महिषासुर अमात्यको अपना उद्देश्य बताना तथा अमात्यका वापस लौटकर देवीद्वारा कही गयी बातें महिषासुरको बताना व्यास उवाच इति तस्य वचः श्रुत्वा प्रहस्य प्रमदोत्तमा । तमुवाच महाराज मेघगम्भीरया गिरा । देव्युवाच
मन्त्रिवर्य सुराणां वै जननीं विद्धि मां किल ।
महालक्ष्मीमिति ख्यातां सर्वदैत्यनिषूदिनीम् ॥
प्रार्थिताहं सुरैः सर्वैर्महिषस्य वधाय च ।
पीडितैर्दानवेन्द्रेण यज्ञभागबहिष्कृतैः ॥
तस्मादिहागतास्म्यद्य तद्वधार्थं कृतोद्यमा ।
एकाकिनी न सैन्येन संयुता मन्त्रिसत्तम ॥
यत्त्वयाहं सामपूर्वं कृत्वा स्वागतमादरात् ।
उक्ता मधुरया वाचा तेन तुष्टास्मि तेऽनघ ॥
नोचेद्धन्मि दृशा त्वां वै कालाग्निसमया किल ।
कस्य प्रीतिकरं न स्यान्माधुर्यवचनं खलु ॥
गच्छ तं महिषं पापं वद मद्वचनादिदम् ।
गच्छ पातालमधुना जीवितेच्छा यदस्ति ते ॥
नोचेत्कृतागसं दुष्टं हनिष्यामि रणाङ्गणे ।
मद्बाणक्षुण्णदेहस्त्वं गन्तासि यमसादनम् ॥
दयालुत्वं ममेदं त्वं विदित्वा गच्छ सत्वरम् ।
हते त्वयि सुरा मूढ स्वर्गं प्राप्स्यन्ति सत्वरम् ॥
1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] —19 C व्यासजी बोले- हे महाराज! उसकी यह बात सुनकर नारी श्रेष्ठ भगवती जोर से हँसकर मेघके समान १ गम्भीर वाणीमें उससे कहने लगीं ॥१ ॥
देवी बोलीं- हे मन्त्रिवर! मुझे देवमाताके रूपमें जानो । मैं सभी दैत्योंका नाश करनेवाली तथा महालक्ष्मी नामसे विख्यात हूँ ॥२ ॥
२ दानवेन्द्र महिषासुरसे पीड़ित और यज्ञभागसे बहिष्कृत सभी देवताओंने उसके संहारके लिये मुझसे ३ प्रार्थना की है । मन्त्रि श्रेष्ठ! इसलिये उसके वधके लिये पूर्णरूपसे तत्पर होकर मैं बिना किसी सेनाके अकेली ही आज यहाँ आयी हूँ ॥ ३-४ ॥ ४ हे अनघ! तुमने जो शान्तिपूर्वक आदरके साथ मेरा स्वागत करके मधुर वाणीमें मुझसे बात की है, उससे मैं बहुत प्रसन्न हूँ; अन्यथा अपनी कालाग्निके ५ समान दृष्टिसे तुम्हें भस्म कर देती । मधुरतासे युक्त वचन भला किसके लिये प्रीतिकारक नहीं होता! ॥ ५-६ ॥ ६ अब तुम जाओ और मेरे शब्दोंमें उस पापी महिषासुरसे कह दो – यदि तुम्हें जीवित रहनेकी अभिलाषा हो तो अभी पाताललोकमें चले जाओ, ७ नहीं तो मैं तुझ पापी तथा दुष्टको रणभूमिमें मार डालूंगी । मेरे बाणोंसे छिन्न - भिन्न शरीरवाले होकर ८ तुम यमपुरी चले जाओगे ॥ ७-८ ॥ हे मूर्ख! इसे मेरी दयालुता समझकर तुम यहाँसे शीघ्र चले जाओ, नहीं तो तुम्हारे मार दिये जानेपर ९ देवतागण निश्चय ही तत्काल स्वर्गका राज्य पा
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तस्माद् गच्छस्व त्यक्त्वैको मेदिनीञ्च ससागराम् ।
पातालं तरसा मन्द यावद् बाणा न मेऽपतन् ॥
युद्धेच्छा चेन्मनसि ते त हि त्वरितोऽसुर ।
वीरैर्महाबलैः सर्वैर्नयामि यमसादनम् ॥
युगे युगे महामूढ हतास्त्वत्सदृशाः किल । असंख्यातास्तथा त्वां वै हनिष्यामि रणाङ्गणे साफल्यं कुरु शस्त्राणां धारणे तु श्रमोऽन्यथा तद्युध्यस्व मया सार्धं समरे स्मरपीडितः मा गर्वं कुरु दुष्टात्मन् यन्मेऽस्ति ब्रह्मणो वरः । स्त्रीवध्यत्वे त्वया मूढ पीडिताः सुरसत्तमाः कर्तव्यं वचनं धातुस्तेनाहं त्वामुपागता स्त्रीरूपमतुलं कृत्वा सत्यं हन्तुं कृतागसम् ॥ यथेच्छं गच्छ वा मूढ पातालं पन्नगावृतम् । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १० जायँगे । इसलिये हे दुष्ट! जबतक मेरे बाण तुझपर नहीं १० गिरते, उसके पूर्व ही तुम शीघ्रतापूर्वक समुद्रसहित पृथ्वीका त्याग करके पाताललोक चले जाओ ॥ ९ -१० ॥ हे असुर! यदि तुम्हारे मनमें युद्धकी इच्छा हो तो अपने सभी महाबली वीरोंको साथ लेकर शीघ्र आ ११ जाओ । मैं सबको यमपुरी पहुँचा दूँगी ॥ ११ ॥
हे महामूढ! मैंने युग - युगमें तुम्हारे - जैसे असंख्य दैत्योंका संहार किया है, उसी प्रकार मैं तुम्हें भी रणमें ॥ १२ मार डालूँगी । [ मेरा सामना करके ] तुम मेरे शस्त्र धारण करनेके परिश्रमको सफल करो, नहीं तो यह । श्रम व्यर्थ हो जायगा । कामपीड़ित तुम रणभूमिमें मेरे ॥ १३ साथ युद्ध करो ॥ १२-१३ ॥ हे दुरात्मन्! तुम इस बातपर अभिमान मत करो कि मुझे ब्रह्माका वर प्राप्त हो गया है । हे मूढ़! केवल ॥ १४ स्त्रीके द्वारा वध्य होनेके कारण तुमने श्रेष्ठ देवताओंको बहुत पीड़ित किया है ॥ १४ ॥
। अतः ब्रह्माजीका वचन सत्य करना है, इसीलिये स्त्रीका अनुपम रूप धारण करके मैं तुझ पापीका संहार १५ करनेके लिये यहाँ आयी हूँ । हे मूढ! यदि जीवित रहने की तुम्हारी इच्छा हो तो इसी समय देवलोक छोड़कर तुम सर्पोंसे भरे पाताललोकको अथवा जहाँ हित्वा भूसुरसद्माद्य जीवितेच्छा यदस्ति ते ॥ १६ तुम्हारी इच्छा हो वहाँ चले जाओ ॥ १५-१६ ॥ व्यास उवाच
इत्युक्तः स ततो देव्या मन्त्रिश्रेष्ठो बलान्वितः ।
प्रत्युवाच निशम्यासौ वचनं हेतुगर्भितम् ॥
देवि स्त्रीसदृशं वाक्यं ब्रूषे त्वं मदगर्विता । क्वासौ क्व त्वं कथं युद्धमसम्भाव्यमिदं किल
एकाकिनी पुनर्बाला प्रारब्धयौवना मृदुः ।
महिषोऽसौ महाकायो दुर्विभाव्यं हि सङ्गतम् ॥
सैन्यं बहुविधं तस्य हस्त्यश्वरथसंकुलम् ।
पदातिगणसंविद्धं नानायुधविराजितम् ॥
व्यासजी बोले – देवीने उससे ऐसा कहा, तब उनकी बात सुनकर वह पराक्रमशाली मन्त्रि श्रेष्ठ उनसे सारगर्भित वचन कहने लगा- ॥१७ ॥
१७ हे देवि! आप अभिमानमें चूर होकर एक साधारण स्त्रीके समान बात कर रही हैं । कहाँ वे महिषासुर और कहाँ आप, यह युद्ध तो असम्भव ही दीखता है ॥१८ ॥
॥ १८ आप यहाँ अकेली हैं और उसपर भी सद्यः युवावस्थाको प्राप्त सुकुमार बाला हैं । [ इसके विपरीत ] वे महिषासुर विशाल शरीरवाले हैं; ऐसी स्थिति में १ ९ । उनकी और आपकी तुलना कल्पनातीत है ॥ १ ९ ॥ उनके पास हाथी - घोड़े और रथसे परिपूर्ण, पैदल सैनिकोंसे सम्पन्न तथा अनेक प्रकारके आयुधों २० । सज्जित अनेक प्रकारकी सेना है ॥ २० ॥
1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] -19 D
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अ ० १० ] पञ्चम स्कन्ध ५८१
कः श्रमः करिराजस्य मालतीपुष्पमर्दने ।
मारणे तव वामोरु महिषस्य तथा रणे ॥
यदि त्वां परुषं वाक्यं ब्रवीमि स्वल्पमप्यहम् ।
शृङ्गारे तद्विरुद्धं हि रसभङ्गाद् बिभेम्यहम् ॥
राजास्माकं सुररिपुर्वर्तते त्वयि भक्तिमान् ।
साममेव मया वाच्यं दानयुक्तं तथा वचः ॥
नोचेद्धन्म्यहमद्यैव बाणेन त्वां मृषावदाम् ।
मिथ्याभिमानचतुरां रूपयौवनगर्विताम् ॥
स्वामी मे मोहितः श्रुत्वा रूपं ते भुवनातिगम् ।
तत्प्रियार्थं प्रियं कामं वक्तव्यं त्वयि यन्मया ॥
राज्यं तव धनं सर्वं दासस्ते महिषः किल ।
कुरु भावं विशालाक्षि त्यक्त्वा रोषं मृतिप्रदम् ॥
पतामि पादयोस्तेऽहं भक्तिभावेन भामिनि ।
पट्टराज्ञी महाराज्ञो भव शीघ्रं शुचिस्मिते ॥
त्रैलोक्यविभवं सर्वं प्राप्स्यसि त्वमनाविलम् ।
सुखं संसारजं सर्वं महिषस्य परिग्रहात् ॥
देव्युवाच
शृणु साचिव वक्ष्यामि वाक्यानां सारमुत्तमम् ।
शास्त्रदृष्टेन मार्गेण चातुर्यमनुचिन्त्य च ॥
महिषस्य प्रधानस्त्वं मया ज्ञातं धिया किल ।
पशुबुद्धिस्वभावोऽसि वचनात्तव साम्प्रतम् ॥
मन्त्रिणस्त्वादृशा यस्य स कथं बुद्धिमान्भवेत् ।
उभयोः सदृशो योगः कृतोऽयं विधिना किल ॥
मालतीके पुष्पों को कुचल डालनेमें गजराजको २१ भला कौन - सा परिश्रम करना पड़ता है । हे सुजघने! उसी प्रकार युद्धमें आपको मारनेमें महिषासुरको कुछ भी प्रयास नहीं करना पड़ेगा ॥ २१ ॥
यदि मैं आपको थोड़ा भी कठोर वचन कह दूँ २२ तो वह श्रृंगाररसके विरुद्ध होगा; और मैं रसभंगसे डरता हूँ ॥२२ ॥
हमारे राजा महिषासुर देवताओंके शत्रु हैं, किंतु २३ वे आपके प्रति अनुरागयुक्त हैं । [ मेरे राजाने कहा है कि ] मैं आपसे साम तथा दाननीतियोंसे पूर्ण वचन ही बोलूँ, अन्यथा मैं झूठ बोलनेवाली, मिथ्या अभिमानमें २४ भरकर चतुरता दिखानेवाली और रूप तथा यौवनके अभिमानमें चूर रहनेवाली आपको इसी समय अपने बाणसे मार डालता ॥ २३-२४ ॥ आपके अलौकिक रूपके विषयमें सुनकर मेरे २५ स्वामी मोहित हो गये हैं । उनकी प्रसन्नताके लिये ही मुझे प्रिय वचन बोलना पड़ रहा है ॥ २५ ॥
उनका सम्पूर्ण राज्य तथा धन आपका है; २६ क्योंकि वे महाराज महिषासुर निश्चय ही आपके दास हो चुके हैं । अतः हे विशालनयने! इस मृत्युदायक रोषका त्याग करके उनके प्रति प्रेमभाव प्रदर्शित कीजिये ॥ २६ ॥
२७ हे भामिनि! मैं भक्तिभावसे आपके चरणोंपर गिर रहा हूँ । हे पवित्र मुसकानवाली! आप शीघ्र ही महाराज महिषकी पटरानी बन जाइये ॥ २७ ॥
२८ महिषासुरको स्वीकार कर लेनेसे आपको तीनों लोकोंका सम्पूर्ण उत्तम वैभव तथा समस्त सांसारिक सुख प्राप्त हो जायगा ॥ २८ ॥
देवी बोलीं- हे सचिव! सुनो, मैं बुद्धिचातुर्यसे २ ९ सम्यक् विचार करके तथा शास्त्रप्रतिपादित मार्गसे निर्णय करके सारभूत बातें बताऊँगी ॥ २ ९ ॥ तुम्हारी बातोंसे मैंने अपनी बुद्धिद्वारा जान लिया कि तुम महिषासुरके प्रधानमन्त्री हो और तुम भी ३० [ उसीकी तरह ] पशुबुद्धिस्वभाववाले हो ॥३० ॥
जिस राजाके तुम्हारे - जैसे मन्त्री हों, वह बुद्धिमान् कैसे हो सकता है? ब्रह्माने निश्चय ही तुम दोनों ३१ । यह समान योग रचा है ॥ ३१ ॥