देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 591–600

देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 591–600

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५८२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १०

यदुक्तं स्त्रीस्वभावासि तद्विचारय मूढ किम् ।

पुमान्नाहं तत्स्वभावाभवं स्त्रीवेषधारिणी ॥

याचितं मरणं पूर्वं स्त्रिया त्वत्प्रभुणा यथा ।

तस्मान्मन्येऽतिमूर्खोऽसौ न वीररसवित्तमः ॥

कामिन्या मरणं क्लीबरतिदं शूरदुःखदम् ।

प्रार्थितं प्रभुणा तेन महिषेणात्मबुद्धिना ॥

तस्मात्स्त्रीरूपमाधाय कार्यं कर्तुमुपागता ।

कथं बिभेमि त्वद्वाक्यैर्धर्मशास्त्रविरोधकैः ॥

विपरीतं यदा दैवं तृणं वज्रसमं भवेत् ।

विधिश्चेत्सुमुखः कामं कुलिशं तूलवत्तदा ॥

किं सैन्यैरायुधैः किं वा प्रपञ्चैर्दुर्गसेवनैः ।

मरणं साम्प्रतं यस्य तस्य सैन्यैस्तु किं फलम् ॥

यदायं देहसम्बन्धो जीवस्य कालयोगतः ।

तदैव लिखितं सर्वं सुखं दुःखं तथा मृतिः ॥

यस्य येन प्रकारेण मरणं दैवनिर्मितम् ।

तस्य तेनैव जायेत नान्यथेति विनिश्चयः ॥

ब्रह्मादीनां यथा काले नाशोत्पत्ती विनिर्मिते ।

तथैव भवतः कामं किमन्येषां विचार्यते ॥

ये मृत्युधर्मिणस्तेषां वरदानेन दर्पिताः ।

मरिष्यामो न मन्यन्ते ते मूढा मन्दचेतसः ॥

हे मूर्ख! तुमने जो यह कहा कि ' तुम स्त्रीस्वभाववाली हो ', तो अब तुम इस बातपर ३२ जरा विचार करो कि क्या मैं पुरुष नहीं हूँ? वस्तुतः उसीके स्वभाववाली मैं इस समय स्त्रीवेषधारिणी हो गयी हूँ ॥३२ ॥

३३ तुम्हारे स्वामी महिषासुरने पूर्वकालमें जो स्त्रीसे मारे जानेका वरदान माँगा था, उसीसे मैं समझती हूँ कि वह महामूर्ख है । वह वीररसका थोड़ा भी जानकार नहीं है ॥ ३३ ॥

३४ स्त्रीके द्वारा मारा जाना पराक्रमहीनके लिये भले ही सुखकर हो, किंतु वीरके लिये यह कष्टप्रद होता है । महिषकी अपनी जो बुद्धि हो सकती है, उसीके अनुसार तुम्हारे स्वामीने ऐसा वरदान माँगा । इसीलिये ३५ मेँ स्त्री - रूप धारण करके अपना कार्य सिद्ध करनेके लिये यहाँ आयी हूँ । मैं तुम्हारे धर्मशास्त्र - विरोधी वचनोंसे क्यों डरूँ? ॥ ३४-३५ ॥ ३६ जब दैव प्रतिकूल होता है, तब एक तिनका भी वज्र - तुल्य हो जाता है और जब वह दैव अनुकूल होता है, तब वज्र भी तूल ( रूई ) - के समान कोमल हो जाता है ॥ ३६ ॥

३७ जिसकी मृत्यु सन्निकट हो उसके लिये सेना, अस्त्र - शस्त्र तथा किलेकी सुरक्षा, सैन्यबल आदि प्रपंचोंसे क्या लाभ! ॥ ३७ ॥

जब कालयोगसे देहके साथ जीवका सम्बन्ध ३८ स्थापित होता है, उसी समय विधाताके द्वारा सुख, दुःख तथा मृत्यु - सब कुछ निर्धारित कर दिया जाता है । दैवने जिस प्राणीकी मृत्यु जिस प्रकारसे निश्चित ३ ९ कर दी है, उसकी मृत्यु उसी प्रकारसे होगी, इसके विपरीत नहीं; यह पूर्ण सत्य है ॥ ३८-३९ ॥ जिस प्रकार से ब्रह्मा आदि देवताओंके भी जन्म और मृत्यु सुनिश्चित किये गये रहते हैं, समय आनेपर ४० उसी प्रकारसे उनका भी जन्म - मरण होता है तब अन्य लोगोंके विषयमें विचार ही क्या! उन ब्रह्मा आदि मरणधर्माके वरदानसे गर्वित होकर जो लोग यह समझते हैं कि ' हम नहीं मरेंगे ' वे मूर्ख तथा ४१ । अल्पबुद्धिवाले हैं ॥ ४०-४१ ॥

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अ ० १० ]

तस्माद् गच्छ नृपं ब्रूहि वचनं मम सत्वरम् ।

यदाज्ञापयते भूपस्तत्कर्तव्यं त्वया किल ॥

मघवा स्वर्गमाप्नोतु देवाः सन्तु हविर्भुजः ।

यूयं प्रयात पातालं यदि जीवितुमिच्छथ ॥

अन्यथा चेन्मतिर्मन्द महिषस्य दुरात्मनः ।

तद्युध्यस्व मया सार्धं मरणाय कृतादरः ॥

मन्यसे सङ्गरे भग्ना देवा विष्णुपुरोगमाः ।

दैवं हि कारणं तत्र वरदानं प्रजापतेः ॥

व्यास उवाच

इति देव्या वचः श्रुत्वा चिन्तयामास दानवः ।

किं कर्तव्यं मया युद्धं गन्तव्यं वा नृपं प्रति ॥

विवाहार्थमिहाज्ञप्तो राज्ञा कामातुरेण वै ।

तत्कथं विरसं कृत्वा गच्छेयं नृपसन्निधौ ॥

इयं बुद्धिः समीचीना यद् व्रजामि कलिं विना ।

यथागतं तथा शीघ्रं राज्ञे संवेदयाम्यहम् ॥

स प्रमाणं पुनः कार्ये राजा मतिमतां वरः ।

करिष्यति विचार्यैव सचिवैर्निपुणैः सह ॥

सहसा न मया युद्धं कर्तव्यमनया सह ।

जये पराजये वापि भूपतेरप्रियं भवेत् ॥

यदि मां सुन्दरी हन्यादहं वा हन्मि तां पुनः ।

येन केनाप्युपायेन स कुप्येत्पार्थिवः किल ॥

तस्मात्तत्रैव गत्वाहं बोधयिष्यामि तं नृपम् ।

यथाद्याभिहितं देव्या यथारुचि करोतु सः ॥

पञ्चम स्कन्ध ५८३ अतएव अब तुम शीघ्र जाओ और अपने राजासे ४२ मेरी बात कह दो । इसके बाद तुम्हारे राजा जैसी आज्ञा दें, तुम वैसा करो । इन्द्रको स्वर्ग प्राप्त हो जाय और देवताओंको यज्ञका भाग मिलने लगे । तुमलोग यदि जीवित रहना चाहते हो, तो पाताललोक चले ४३ जाओ और हे मूर्ख! यदि दुष्टात्मा महिषासुरका विचार विपरीत हो, तो वह मरनेके लिये तैयार होकर मेरे साथ युद्ध करे ॥ ४२–४४ ॥ ४४ यदि तुम यह मानते हो कि विष्णु आदि प्रधान देवता तो युद्धमें पहले ही परास्त किये जा चुके हैं, तो उस समय उसका कारण था - विपरीत भाग्य तथा ४५ ब्रह्माजीका वरदान ॥ ४५ ॥

व्यासजी बोले- देवीका यह वचन सुनकर वह दानव सोचने लगा- अब मुझे क्या करना चाहिये? मैं इसके साथ युद्ध करूँ या राजा महिषके पास लौट चलूँ ॥ ४६ ॥

४६ [ किंतु यह भी है कि ] कामातुर महाराज महिषने विवाह के लिये [ उसे राजी करनेकी ] मुझे आज्ञा दी है तो फिर रसभंग करके मैं राजाके पास ४७ लौटकर कैसे जाऊँ? ॥ ४७ ॥

अन्तमें अब मुझे यही विचार उचित प्रतीत होता है कि बिना युद्ध किये ही राजाके पास शीघ्र चला ४८ जाऊँ और जैसा सामने उपस्थित है, वैसा उनको बता दूँ । उसके बाद बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ राजा महिष अपने चतुर मन्त्रियोंसे विचार - विमर्श करके जो उचित ४ ९ समझेंगे, उसे करेंगे ॥ ४८-४९ ॥ मुझे अचानक इस स्त्रीके साथ युद्ध नहीं करना चाहिये; क्योंकि जय अथवा पराजय- इन दोनोंमें राजाका अप्रिय हो सकता है ॥ ५० ॥

५० यदि यह सुन्दरी मुझे मार डाले अथवा मैं ही जिस किसी उपायसे इसको मार डालूँ, तब भी राजा महिष निश्चितरूपसे कुपित होंगे । अतः ५१ अब मैं वहींपर चलकर इस सुन्दरीके द्वारा आज जो कुछ कहा गया है, वह सब राजा महिषको बता दूँगा । तत्पश्चात् उनकी जैसी रुचि होगी, वैसा ५२ | वे करेंगे ॥ ५१-५२ ॥

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५८४ व्यास उवाच

इति सञ्चिन्त्य मेधावी जगाम नृपसन्निधौ ।

प्रणम्य तमुवाचेदं कृताञ्जलिरमात्यकः ॥

मन्त्र्युवाच

राजन् देवी वरारोहा सिंहस्योपरि संस्थिता ।

अष्टादशभुजा रम्या वरायुधधरा परा ॥

सा मयोक्ता महाराज महिषं भज भामिनि ।

महिषी भव राज्ञस्त्वं त्रैलोक्याधिपतेः प्रिया ॥

पट्टराज्ञी त्वमेवास्य भविता नात्र संशयः ।

स तवाज्ञाकरो जातो वशवर्ती भविष्यति ॥

त्रैलोक्यविभवं भुक्त्वा चिरकालं वरानने । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १० व्यासजी बोले- ऐसा विचार करके वह बुद्धिमान् मन्त्री राजा ( महिष ) - के पास गया और उसे प्रणामकर ५३ दोनों हाथ जोड़कर कहने लगा- ॥५३ ॥

मन्त्री बोला- हे राजन्! सुन्दर रूपवाली वह देवी सिंहपर आरूढ है, उस मनोहर देवीकी अठारह भुजाएँ हैं और उस श्रेष्ठ देवीने उत्तम कोटिके आयुध धारण कर रखे हैं ॥५४ ॥

५४ हे महाराज! मैंने उससे कहा- हे भामिनि! तुम राजा महिषसे प्रेम कर लो और तीनों लोकोंके स्वामी उन महाराजकी प्रिय पटरानी बन जाओ । ५५ केवल तुम्हीं उनकी पटरानी बननेयोग्य हो; इसमें कोई संशय नहीं है । वे तुम्हारे आज्ञाकारी बनकर सदा तुम्हारे अधीन रहेंगे । हे सुमुखि! महाराज ५६ महिषको पतिरूपमें प्राप्त करके तुम चिरकालतक तीनों लोकोंके ऐश्वर्यका उपभोगकर समस्त स्त्रियों में सौभाग्यवती बन जाओ ॥ ५५–५७ ॥ महिषं पतिमासाद्य योषितां सुभगा भव ॥५७ मेरा यह वचन सुनकर विशाल नयनोंवाली

इति मद्वचनं श्रुत्वा सा स्मयावेशमोहिता ।

मामुवाच विशालाक्षी स्मितपूर्वमिदं वचः ॥

महिषीगर्भसम्भूतं पशूनामधमं किल ।

बलिं दास्याम्यहं देव्यै सुराणां हितकाम्यया ॥

का मूढा कामिनी लोके महिषं वै पतिं भजेत् ।

मादृशी मन्दबुद्धे किं पशुभावं भजेदिह ॥

महिषी महिषं नाथं सशृङ्गा शृङ्गसंयुतम् ।

कुरुते क्रन्दमाना वै नाहं तत्सदृशी शठा ॥

करिष्येऽहं मृधे युद्धं हनिष्ये त्वां सुराप्रियम् ।

गच्छ वा दुष्ट पातालं जीवितेच्छा यदस्ति ते ॥

परुषं तु तया वाक्यमित्युक्तं नृप मत्तया ।

तच्छ्रुत्वाहं समायातः प्रविचिन्त्य पुनः पुनः ॥

वह सुन्दरी गर्वके आवेगसे विमोहित होकर मुसकराती हुई मुझसे यह बात बोली- मैं देवताओंका ५८ हित करनेके विचारसे महिषीके गर्भसे उत्पन्न उस अधम पशु ( महिष ) - को देवीके लिये बलि चढ़ा

दूँगी । ५८-५९ ॥

५ ९ हे मन्दबुद्धे! इस संसारमें भला कौन मूर्ख स्त्री महिषको पतिरूपमें स्वीकार कर सकती है? क्या मुझ जैसी स्त्री पशुस्वभाववाले उस महिषासुरसे प्रेम कर सकती है? ॥ ६० ॥

६० हे मूर्ख! सींगवाली तथा जोर - जोर से चिल्लानेवाली कोई महिषी ही उस शृंगधारी महिषको अपना पति बना सकती है; किंतु मैं वैसी मूर्ख नहीं हूँ । [ देवीने ६१ पुन: कहलाया है ] मैं तो देवताओंके शत्रु तुझ महिषासुर के साथ रणक्षेत्रमें युद्ध करूँगी और तुम्हें मार डालूंगी । हे दुष्ट! यदि जीवित रहनेकी तुम्हारी इच्छा ६२ है, तो अभी पाताललोक चले जाओ ॥ ६१-६२ ॥ हे राजन्! उस मदमत्त स्त्रीने ऐसी बहुत कठोर बात मुझसे कही । उसे सुनकर बार - बार विचार ६३ करनेके बाद मैं यहाँ लौट आया हूँ ॥६३ ॥

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अ ० ११ ] पञ्चम

रसभङ्गं विचिन्त्यैव न युद्धं तु मया कृतम् ।

आज्ञां विना तवात्यन्तं कथं कुर्यां वृथोद्यमम् ॥ ६४

सातीव च बलोन्मत्ता वर्तते भूप भामिनी ।

भवितव्यं न जानामि किं वा भावि भविष्यति ॥ ६५

कार्येऽस्मिंस्त्वं प्रमाणं नो मन्त्रोऽतीव दुरासदः ।

युद्धं पलायनं श्रेयो न जानेऽहं विनिश्चयम् ॥ ६६

स्कन्ध ५८५ आपका रसभंग न हो— यह सोचकर मैंने उसके साथ युद्ध नहीं किया और फिर आपकी आज्ञाके बिना मैं व्यर्थ ही युद्ध कैसे कर सकता था? ॥६४ ॥

हे राजन्! वह स्त्री सदा अपने बलसे अत्यन्त उन्मत्त रहती है । होनीके विषयमें मैं नहीं जानता; आगे न जाने क्या होगा! इस विषयमें आप ही प्रमाण हैं । इसमें परामर्श देना मेरे लिये अत्यन्त कठिन है । इस समय हमारे लिये युद्ध करना अथवा पलायन कर जाना – इन दोनोंमें कौन श्रेयस्कर होगा, इसका निर्णय । मैं नहीं कर पा रहा हूँ ॥ ६५-६६ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे मन्त्रीद्वारा महिषासुरेण देव्या सह विवाहप्रस्तावो नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥

अथैकादशोऽध्यायः महिषासुरका अपने मन्त्रियोंसे विचार - विमर्श व्यास उवाच

इति तस्य वचः श्रुत्वा महिषो मदविह्वलः ।

मन्त्रिवृद्धान् समाहूय राजा वचनमब्रवीत् ॥ १

राजोवाच

मन्त्रिणः किं च कर्तव्यं विश्रब्धं ब्रूत मा चिरम् ।

आगता देवविहिता मायेयं शाम्बरीव किम् ॥ २

कार्येऽस्मिन्निपुणा यूयमुपायेषु विचक्षणाः ।

सामादिषु च कर्तव्यः कोऽत्र मह्यं ब्रुवन्तु च ॥ ३

मन्त्रिण ऊचुः

सत्यं सदैव वक्तव्यं प्रियञ्च नृपसत्तम ।

कार्यं हितकरं नूनं विचार्य विबुधैः किल ॥ ४

सत्यं च हितकृद्राजन्प्रियं चाहितकृद्भवेत् ।

यथौषधं नृणां लोके ह्यप्रियं रोगनाशनम् ॥ ५

सत्यस्य श्रोता मन्ता च दुर्लभः पृथिवीपते ।

वक्तापि दुर्लभः कामं बहवश्चाटुभाषकाः ॥ ६

करना और ताम्रको भगवतीके पास भेजना व्यासजी बोले – मन्त्रीकी यह बात सुनकर मदोन्मत्त राजा महिषासुर अपने वयोवृद्ध मन्त्रियोंको बुलाकर उनसे यह वचन कहने लगा ॥१ ॥

राजा बोला- हे मन्त्रिगण! आपलोग निर्भीकता-पूर्वक मुझे शीघ्र बतायें कि इस समय मुझे क्या करना चाहिये? आपलोग इस कार्यमें प्रवीण हैं, साथ ही साम तथा दण्ड आदि नीतियोंमें भी कुशल हैं । कहीं देवताओंके द्वारा रची गयी शाम्बरी मायाके रूपमें तो यह नहीं आयी हुई है? अतः आपलोग मुझे यह बतायें कि इस समय किस नीतिका सहारा लिया जाय? ॥ २-३ ॥ मन्त्रिगण बोले – हे नृपश्रेष्ठ! बुद्धिमान् लोगोंको सदा सत्य और प्रिय बोलना चाहिये तथा सम्यक् विचार करके हितकर कार्य करना चाहिये ॥ ४ ॥

हे राजन्! सत्य वचन कल्याणकारी होता है और प्रिय वचन [ प्रायः ] अहितकर होता है । इस लोकमें अप्रिय वचन भी मनुष्योंके लिये उसी प्रकार हितकारक होता है, जैसे औषधि अरुचिकर होते हुए भी मनुष्योंके रोगोंका नाश करनेवाली होती है ॥ ५ ॥

हे पृथिवीपते! सत्य बातको सुनने तथा माननेवाला दुर्लभ है । सत्य बोलनेवाला तो परम दुर्लभ है; किंतु । चाटुकारितापूर्ण बातें करनेवाले बहुत - से लोग हैं ॥ ६ ॥

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५८६ कथं ब्रूमोऽत्र नृपते विचारे गहने त्विह । शुभं वाप्यशुभं वापि को वेत्ति भुवनत्रये राजोवाच

स्वस्वमत्यनुसारेण ब्रुवन्त्वद्य पृथक्पृथक् ।

येषां हि यादृशो भावस्तच्छ्रुत्वा चिन्तयाम्यहम् ॥

बहूनां मतमाज्ञाय विचार्य च पुनः पुनः ।

यच्छ्रेयस्तद्धि कर्तव्यं कार्यं कार्यविचक्षणैः ॥

व्यास उवाच तस्यैवं वचनं श्रुत्वा विरूपाक्षो महाबलः । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ११ हे राजन्! इस गूढ़ विषयमें हमलोग कुछ कैसे ॥ ७ कह सकते हैं, और फिर इस त्रिलोकीमें भविष्यमें होनेवाले शुभ अथवा अशुभ परिणामके विषयमें कौन जान सकता है? ॥ ७ ॥

राजा बोला – आपलोग अपनी - अपनी बुद्धिके अनुसार अलग - अलग विचार प्रकट करें । जिसका ८ जो भाव होगा, उसे सुनकर मैं स्वयं विचार करूँगा; क्योंकि बुद्धिमान् पुरुषोंको चाहिये कि अनेक लोगोंके मन्तव्य सुनकर और फिर उनपर बार - बार ९ विचार करके उनमेंसे अपने लिये जो कल्याणप्रद हो, उसी कामको करें ॥ ८ - ९ ॥ व्यासजी बोले – उसकी यह बात सुनकर महाबली विरूपाक्ष राजा महिषको प्रसन्न करते हुए उवाच तरसा वाक्यं रञ्जयन्पृथिवीपतिम् ॥१० शीघ्र कहने लगा ॥ १० ॥

विरूपाक्ष उवाच

राजन्नारी वराकीयं सा ब्रूते मदगर्विता ।

विभीषिकामात्रमिदं ज्ञातव्यं वचनं त्वया ॥

को बिभेति स्त्रियो वाक्यैर्दुरुक्तै रणदुर्मदैः ।

अनृतं साहसं चेति जानन्नारीविचेष्टितम् ॥

जित्वा त्रिभुवनं राजन्नद्य कान्ताभयेन वै दीनत्वेऽप्ययशो नूनं वीरस्य भुवने भवेत् ॥

तस्माद्याम्यहमेकाकी युद्धाय चण्डिकां प्रति ।

हनिष्ये तां महाराज निर्भयो भव साम्प्रतम् ॥

सेनावृतोऽहं गत्वा तां शस्त्रास्त्रैर्विविधैः किल ।

निषूदयामि दुर्मर्षां चण्डिकां चण्डविक्रमाम् ॥

बद्ध्वा सर्पमयैः पाशैरानयिष्ये तवान्तिकम् ।

वशगा तु सदा ते स्यात्पश्य राजन् बलं मम ॥

विरूपाक्ष बोला- हे राजन्! वह बेचारी स्त्री मदमत्त होकर जो कुछ बोल रही है, उन बातोंको आप केवल धमकीभर समझें ॥ ११ ॥

यह जानते हुए कि झूठ और साहस स्त्रियोंकी ११ आदत होती है, भला कौन एक स्त्रीके कहे हुए युद्धोन्मादी कठोर वाक्योंसे डरेगा? ॥ १२ ॥

हे राजन्! तीनों लोकोंपर विजय प्राप्त करके भी १२ आज आप स्त्रीके भयसे ग्रस्त हो गये हैं! उसकी अधीनता स्वीकार कर लेनेपर इस लोकमें अवश्य ही आप जैसे वीरकी अपकीर्ति होगी ॥ १३ ॥

१३ अतएव हे महाराज! मैं अकेला ही उस चण्डिकासे युद्ध करनेके लिये जा रहा हूँ और उसे निश्चितरूपसे मार डालूँगा । अब आप भयमुक्त हो जायँ ॥१४ ॥

१४ अपनी सेनाके साथ वहाँ जाकर अनेक प्रकारके शस्त्रास्त्रोंसे मैं उस दुःसह तथा प्रचण्ड पराक्रमसम्पन्न चण्डिकाका निश्चय ही वध कर दूँगा अथवा १५ उसे नागपाशमें बाँधकर जीवित दशामें ही आपके पास ले आऊँगा, जिससे वह सदाके लिये आपकी वशवर्तिनी हो जाय । हे राजन्! अब आप मेरा पराक्रम १६ | देखिये ॥ १५ - १६ ॥

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अ ० ११ ] व्यास उवाच

विरूपाक्षवचः श्रुत्वा दुर्धरो वाक्यमब्रवीत् ।

सत्यमुक्तं वचो राजन् विरूपाक्षेण धीमता ॥

ममापि वचनं श्लक्ष्णं श्रोतव्यं धीमता त्वया ।

कामातुरैषा सुदती लक्ष्यते ऽप्यनुमानतः ॥

भवत्येवंविधा कामं नायिका रूपगर्विता ।

भीषयित्वा वरारोहा त्वां वशे कर्तुमिच्छति ॥

हावोऽयं मानिनीनां वै तं वेत्ति रसवित्तमः ।

वक्रोक्तिरेषा कामिन्याः प्रियं प्रति परायणम् ॥

वेत्ति कोऽपि नरः कामं कामशास्त्रविचक्षणः ।

यदुक्तं नाम बाणैस्त्वां वधिष्ये रणमूर्धनि ॥

हेतुगर्भमिदं वाक्यं ज्ञातव्यं हेतुवित्तमैः ।

बाणास्तु मानिनीनां वै कटाक्षा एव विश्रुताः ॥

पुष्पाञ्जलिमयाश्चान्ये व्यंग्यानि वचनानि च ।

का शक्तिरन्यबाणानां प्रेरणे त्वयि पार्थिव ॥

तादृशीनां न सा शक्तिर्बह्मविष्णुहरादिषु ।

ययोक्तं नेत्रबाणैस्त्वां हनिष्ये मन्द पार्थिवम् ॥

विपरीतं परिज्ञातं तेनारसविदा किल ।

पातयिष्यामि शय्यायां रणमय्यां पतिं तव ॥

विपरीतरतिक्रीडाभाषणं ज्ञेयमेव तत् करिष्ये विगतप्राणं यदुक्तं वचनं तया वीर्यं प्राणा इति प्रोक्तं तद्विहीनं न चान्यथा पञ्चम स्कन्ध ५८७ व्यासजी बोले- विरूपाक्षकी बात सुनकर दुर्धरने कहा - हे राजन्! बुद्धिमान् विरूपाक्षने यथार्थ बात कही है । प्रतिभासम्पन्न आप अब मेरी भी उत्तम १७ बात सुन लें । अनुमानसे ऐसा प्रतीत होता है कि सुन्दर दाँतोंवाली यह स्त्री कामातुर है । अपने रूपके गर्वमें चूर इस प्रकारकी नायिकाएँ अपने प्रियको डरा-१८ धमकाकर वशमें करनेका प्रयास करती हैं; वैसे ही यह सुन्दरी भी आपको धमकाकर अपने वशमें करना चाहती है ॥ १७ – १ ९ ॥ यह तो मानिनी स्त्रियोंका हाव - भाव होता है १ ९ और रसका महान् ज्ञाता ही उस हाव - भावको समझ पाता है । आसक्त प्रेमीके प्रति किसी स्त्रीकी ऐसी वक्रोक्ति होती ही है, जिसे कामशास्त्रका विद्वान् कोई २० विरला पुरुष ही समझ पाता है । जैसे उसने कहा है-' मैं तुम्हें युद्धक्षेत्रमें बाणोंसे मार डालूंगी ', इस कथनमें बहुत बड़ा रहस्य निहित है, जिसे रहस्यविद् ही २१ भलीभाँति समझ सकते हैं । मानिनी स्त्रियोंके बाण तो उनके कटाक्ष ही कहे गये हैं और हे राजन्! उनके व्यंग्यपूर्ण वचन दूसरे पुष्पांजलिमय बाण हैं; क्योंकि कटाक्षको छोड़कर वह अन्य प्रकारके बाण भला २२ आपपर क्या चला सकेगी? जब ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदिमें आपपर बाण चलानेकी शक्ति नहीं है, तब वैसी स्त्रियोंमें अन्य बाण चलानेकी शक्ति कहाँ है? २३ उसने अमात्यसे जो कहा था - ' हे मन्द! मैं तुम्हारे राजाको अपने नेत्रबाणोंसे बेध डालूंगी ' इस कथनका तात्पर्य उन रसज्ञानसे विहीन मन्त्रीने विपरीत ही समझ लिया था॥२०–२४३ ॥ २४ उसने प्रधान अमात्यसे जो यह कहा था कि ‘ मैं तुम्हारे स्वामीको रणमयी शय्यापर गिरा दूँगी ' -इस कथनका तात्पर्य उस स्त्रीके द्वारा विपरीत २५ रतिक्रीडाका किया जाना समझना चाहिये । साथ ही उसने जो यह बात कही थी कि ' मैं उन्हें प्राणहीन । कर दूँगी ' – तो [ हे राजन्! ] पुरुषोंमें वीर्यको ही प्राण कहा गया है, अतः उस स्त्रीके कथनका तात्पर्य ॥ २६ आपको वीर्यहीन कर देनेसे है, इसके अतिरिक्त दूसरी । बात नहीं ॥ २५-२६३ ॥

पृष्ठ 597

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५८८ व्यंग्याधिक्येन वाक्येन वरयत्युत्तमा नृप तद्वै विचारतो ज्ञेयं रसग्रन्थविचक्षणैः इति ज्ञात्वा महाराज कर्तव्यं रससंयुतम् ॥ सामदानद्वयं तस्या नान्योपायोऽस्ति भूपते रुष्टा वा गर्विता वापि वशगा मानिनी भवेत् ॥ तादृशैर्मधुरैर्वाक्यैरानयिष्ये तवान्तिकम् । किं बहूक्तेन मे राजन् कर्तव्या वशवर्तिनी गत्वा मयाधुनैवेयं किङ्करीव सदैव ते । व्यास उवाच इत्थं निशम्य तद्वाक्यं ताम्रस्तत्त्वविचक्षणः ॥

उवाच वचनं राजन्निशामय मयोदितम् ।

हेतुमद्धर्मसहितं रसयुक्तं नयान्वितम् ॥

नैषा कामातुरा बाला नानुरक्ता विचक्षणा । व्यंग्यानि नैव वाक्यानि तयोक्तानि तु मानद ।

चित्रमत्र महाबाहो यदेका वरवर्णिनी ।

निरालम्बा समायाति चित्ररूपा मनोहरा ॥

अष्टादशभुजा नारी न श्रुता न च वीक्षिता ।

केनापि त्रिषु लोकेषु पराक्रमवती शुभा ॥

आयुधान्यपि तावन्ति धृतानि बलवन्ति च ।

विपरीतमिदं मन्ये सर्वं कालकृतं नृप ॥

स्वप्नानि दुर्निमित्तानि मया दृष्टानि वै निशि ।

तेन जानाम्यहं नूनं वैशसं समुपागतम् ॥

कृष्णाम्बरधरा नारी रुदती च गृहाङ्गणे ।

दृष्टा स्वप्नेऽप्युषः काले चिन्तितव्यस्तदत्ययः ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ११ ॥ २७ हे राजन्! व्यंग्यभरे इस कथनके द्वारा वह सुन्दरी आपको पतिके रूपमें वरण करना चाहती है ॥ रसशास्त्रके विद्वानोंको विचारपूर्वक इस कथनका २८ अभिप्राय भलीभाँति जान लेना चाहिये । हे महाराज ऐसा जानकर आपको उसके प्रति रसमय व्यवहार । करना चाहिये । हे राजन्! साम ( प्रिय वचन ) और २ ९ दान ( प्रलोभन आदि ) – ये ही दो उपाय उसे वशमें करनेके हैं, इनके अतिरिक्त कोई दूसरा उपाय नहीं है । रुष्ट अथवा मदगर्वित कोई भी मानिनी स्त्री इन ॥ ३० उपायोंसे वशवर्तिनी हो जाती है । उसी प्रकारके मधुर वचनोंसे प्रसन्न करके मैं उसे आपके पास ले आऊँगा । हे राजन्! बहुत कहनेसे क्या लाभ! अभी वहाँ जाकर मैं उस स्त्रीको एक दासीकी भाँति सदाके लिये आपके वशमें कर दूँगा ॥ २७ – ३०३ ॥ ३१ व्यासजी बोले – दुर्धरकी यह बात सुनकर तत्त्वविद् ताम्र बोला - हे राजन्! अब आप मेरेद्वारा कही गयी बात सुनिये जो तर्कयुक्त, धर्मसे ओतप्रोत, ३२ रसमय तथा नीतिसे भरी हुई है ॥ ३१-३२ ॥ हे मानद! यह बुद्धिसम्पन्न स्त्री न कामातुर है, न आपपर आसक्त है और न तो उसने व्यंग्यपूर्ण बातें ३३ ही कही हैं ॥ ३३ ॥

हे महाबाहो! यह तो महान् आश्चर्य है कि एक अत्यधिक रूपवती और मनोहर स्त्री बिना किसीका ३४ आश्रय लिये अकेली ही युद्धहेतु आयी हुई है । अठारह भुजाओंसे सम्पन्न ऐसी पराक्रमशालिनी तथा सुन्दर स्त्री किसी भी द्वारा तीनों लोकोंमें न तो देखी ३५ गयी और न तो सुनी ही गयी । उसने अनेक प्रकारके सुदृढ़ आयुध धारण कर रखे हैं । हे राजन्! इससे मैं तो यह मानता हूँ कि समयने सब कुछ हमारे विपरीत ३६ कर दिया है ॥ ३४–३६ ॥ मैंने रातमें अपशकुनसूचक अनेक स्वप्न देखे हैं, इससे मैं तो यह समझता हूँ कि अब निश्चय ही ३७ हमारा विनाश आ चुका है ॥३७ ॥

मैंने आज ही उषाकालमें स्वप्न देखा कि काले वस्त्र धारण किये एक स्त्री घरके आँगनमें रुदन कर ३८ । रही है । यह विनाशसूचक स्वप्न विचारणीय है ॥ ३८ ॥

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अ ० ११ ]

विकृताः पक्षिणो रात्रौ रोरुवन्ति गृहे गृहे ।

उत्पाता विविधा राजन् प्रभवन्ति गृहे गृहे ॥

तेन जानाम्यहं नूनं कारणं किञ्चिदेव हि ।

यत्त्वां प्रार्थयते बाला युद्धाय कृतनिश्चया ॥

नैषास्ति मानुषी नो वा गान्धर्वी न तथासुरी ।

देवैः कृतेयं ज्ञातव्या माया मोहकरी विभो ॥

कातरत्वं न कर्तव्यं ममैतन्मतमित्यलम् ।

कर्तव्यं सर्वथा युद्धं यद्भाव्यं तद्भविष्यति ॥

को वेद दैवकर्तव्यं शुभं वाप्यशुभं तथा ।

अवलम्ब्य धिया धैर्यं स्थातव्यं वै विचक्षणैः ॥

जीवितं मरणं पुंसां दैवाधीनं नराधिप ।

कोऽपि नैवान्यथा कर्तुं समर्थो भुवनत्रये ॥

महिष उवाच

गच्छ ताम्र महाभाग युद्धाय कृतनिश्चयः ।

तामानय वरारोहां जित्वा धर्मेण मानिनीम् ॥

न भवेद्वशगा नारी संग्रामे यदि सा तव ।

हन्तव्या नान्यथा कामं माननीया प्रयत्नतः ॥

वीरस्त्वमसि सर्वज्ञ कामशास्त्रविशारदः । येन केनाप्युपायेन जेतव्या वरवर्णिनी त्वरन्वीर महाबाहो सैन्येन महता वृतः तत्र गत्वा त्वया ज्ञेया विचार्य च पुनः पुनः किमर्थमागता चेयं ज्ञातव्यं तद्धि कारणम् । कामाद्वा वैरभावाच्च माया कस्येयमित्युत आदौ तन्निश्चयं कृत्वा ज्ञातव्यं तच्चिकीर्षितम् पश्चाद्युद्धं प्रकर्तव्यं यथायोग्यं यथाबलम् ॥ पञ्चम स्कन्ध ५८ ९ हे राजन्! आजकल घर - घरमें भयानक पक्षी ३ ९ रोया करते हैं और घर - घरमें विविध प्रकारके उपद्रव होते रहते हैं । इससे मैं तो यह समझता हूँ कि इसमें निश्चितरूपसे कुछ और ही कारण है, तभी तो युद्धके लिये कृतसंकल्प यह स्त्री आपको ४० ललकार रही है ॥ ३ ९ -४० ॥ हे राजन्! यह न तो मानुषी, न गान्धर्वी और न आसुरी ही है; अपितु इसे देवताओंकी रची हुई ४१ मोहकरी माया समझना चाहिये ॥ ४१ ॥

अतः मेरा यह दृढ़ मत है कि इस समय कायरता नहीं प्रदर्शित करनी चाहिये, अपितु हर ४२ तरहसे युद्ध करना चाहिये; जो होना होगा वह होगा । भविष्य में विधाताके द्वारा किये जानेवाले शुभ या अशुभके बारेमें कौन जानता है? अतः विद्वान् ४३ पुरुषोंको चाहिये कि बुद्धिपूर्वक धैर्य धारण करके समयकी प्रतीक्षा करें ॥ ४२-४३ ॥ हे नरेश! प्राणियोंका जन्म तथा मरण दैवके ४४ अधीन है । तीनों लोकोंमें कोई भी व्यक्ति इसके विपरीत कुछ भी करनेमें समर्थ नहीं है ॥ ४४ ॥

महिष बोला— हे महाभाग! हे ताम्र! युद्धके लिये दृढ़ निश्चय करके तुम जाओ और धर्मपूर्वक ४५ उस मानिनी स्त्रीको जीतकर यहाँ ले आओ ॥ ४५ ॥

यदि संग्राममें वह स्त्री तुम्हारे अधीन न हो सके, तब तुम उसे मार डालना; नहीं तो जहाँतक सम्भव हो, प्रयत्नपूर्वक उसका सम्मान करना ॥ ४६ ॥

४६ हे सर्वज्ञ! तुम पराक्रमी तथा कामशास्त्रके पूर्ण विद्वान् हो, अतः किसी भी युक्तिसे उस सुन्दरीपर विजय प्राप्त करना ॥ ४७ ॥

॥ ४७ हे वीर! हे महाबाहो! विशाल सेनाके साथ तुम वहाँ शीघ्रतापूर्वक जाओ और वहाँ पहुँचकर बार-। बार चिन्तन - मनन करके इसका पता लगाओ कि यह ॥ ४८ किसलिये आयी हुई है? तुम यह भी ज्ञात करना कि वह कामभाव अथवा वैरभाव - किस भावसे आयी है और वह किसकी माया है? ॥ ४८-४९ ॥ ॥ ४ ९ आरम्भमें इन बातोंकी जानकारी कर लेनेपर तुम यह पता करना कि वह क्या करना चाहती है? । तत्पश्चात् उसकी सबलता तथा निर्बलताको भलीभाँति ५० । समझकर ही उसके साथ तुम युद्ध करना ॥ ५० ॥

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५ ९ ० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ११

कातरत्वं न कर्तव्यं निर्दयत्वं तथा न च ।

यादृशं हि मनस्तस्याः कर्तव्यं तादृशं त्वया ॥ ५१

व्यास उवाच

इति तद्भाषितं श्रुत्वा ताम्रः कालवशं गतः ।

निर्गतः सैन्यसंयुक्तः प्रणम्य महिषं नृपम् ॥ ५२

गच्छन्मार्गे दुरात्मासौ शकुनान्वीक्ष्य दारुणान् ।

विस्मयञ्च भयं प्राप यममार्गप्रदर्शकान् ॥५३

स गत्वा तां समालोक्य देवीं सिंहोपरिस्थिताम् ।

स्तूयमानां सुरैः सर्वैः सर्वायुधविभूषिताम् ॥ ५४

तामुवाच विनीतः सन् वाक्यं मधुरया गिरा ।

सामभावं समाश्रित्य विनयावनतः स्थितः ॥ ५५

देवि दैत्येश्वरः शृङ्गी त्वद्रूपगुणमोहितः ।

स्पृहां करोति महिषस्त्वत्पाणिग्रहणाय च ॥५६

भावं कुरु विशालाक्षि तस्मिन्नमरदुर्जये ।

पतिं तं प्राप्य मृद्वङ्गि नन्दने विहराद्भुते ॥ ५७

सर्वाङ्गसुन्दरं देहं प्राप्य सर्वसुखास्पदम् ।

सुखं सर्वात्मना ग्राह्यं दुःखं हेयमिति स्थितिः ॥ ५८

करभोरु किमर्थं ते गृहीतान्यायुधान्यलम् ।

पुष्पकन्दुकयोग्यास्ते करा: कमलकोमलाः ॥ ५ ९ ।

भ्रूचापे विद्यमानेऽपि धनुषा किं प्रयोजनम् ।

कटाक्षा विशिखाः सन्ति किं बाणैर्निष्प्रयोजनैः ॥ ६०

संसारे दुःखदं युद्धं न कर्तव्यं विजानता ।

लोभासक्ताः प्रकुर्वन्ति संग्रामञ्च परस्परम् ॥ ६१ ।

तुम उसके समक्ष न तो कायरता प्रदर्शित करना और न बिलकुल निर्दयताका ही व्यवहार करना । उसकी जैसी मनोदशा देखना, उसीके अनुसार उससे बर्ताव करना ॥ ५१ ॥

व्यासजी बोले – महिषासुर की यह बात सुनकर कालके वशीभूत वह ताम्र राजा महिषको प्रणाम करके सेनाके साथ चल पड़ा । चलते समय मार्गमें यमका द्वार दिखलानेवाले अत्यन्त भयानक अपशकुनोंको देख - देखकर वह बहुत विस्मित तथा भयभीत होता था ॥ ५२-५३ ॥ देवीके समीप पहुँचकर उसने देखा कि वे सिंहपर सवार हैं, वे विविध प्रकारके आयुधों से विभूषित हैं तथा सभी देवता उनकी स्तुति कर रहे हैं । तदनन्तर उस ताम्रने विनम्र भावसे खड़े होकर सामनीतिका आश्रय लेकर मधुर वाणीमें शान्तिपूर्वक देवीसे यह वचन कहा - हे देवि! दैत्योंके अधिपति तथा विशाल सींगोंवाले राजा महिष आपके रूप तथा गुणपर मोहित होकर आपसे विवाह करनेकी अभिलाषा रखते हैं ॥ ५४-५६ ॥ विशाल नयनों तथा सुकुमार अंगोंवाली हे सुन्दरि! देवताओंके लिये भी अजेय उन महिषसे आप प्रेम कीजिये और उन्हें पतिरूपमें प्राप्त करके अद्भुत नन्दनवनमें विहार कीजिये ॥ ५७ ॥

सभी प्रकारके सुखोंके निधानस्वरूप इस सर्वांगसुन्दर शरीरको प्राप्त करके हर तरह सुख भोगना चाहिये और दुःखका तिरस्कार करना चाहिये, यही बात सर्वमान्य है ॥५८ ॥

हे करभोरु! आपने अपने हाथोंमें ये आयुध किसलिये धारण कर रखे हैं? कमलके समान कोमल आपके ये हाथ तो पुष्पोंके गेंद धारण करनेयोग्य हैं ॥ ५ ९ ॥ भौंहरूपी धनुषके रहते आपको यह धनुष धारण करनेसे क्या प्रयोजन है और जब आपके पास ये कटाक्षरूपी बाण हैं तो फिर व्यर्थ बाणोंको धारण करनेसे क्या लाभ? ॥६० ॥

इस संसारमें युद्ध दुःखदायी होता है, अतः ज्ञानीजनको युद्ध नहीं करना चाहिये । राज्य तथा धनके लोलुप लोग ही परस्पर युद्ध करते हैं ॥ ६१ ॥

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अ ० १२ ] पञ्चम

पुष्पैरपि न योद्धव्यं किं पुनर्निशितैः शरैः ।

भेदनं निजगात्राणां कस्य तज्जायते मुदे ॥ ६२

तस्मात्त्वमपि तन्वङ्गि प्रसादं कर्तुमर्हसि ।

भर्तारं भज मे नाथं देवदानवपूजितम् ॥६३

स तेऽत्र वाञ्छितं सर्वं करिष्यति मनोरथम् ।

त्वं पट्टमहिषी राज्ञः सर्वथा नात्र संशयः ॥ ६४

वचनं कुरु मे देवि प्राप्स्यसे सुखमुत्तमम् ।

संग्रामे जयसन्देहः कष्टं प्राप्य न संशयः ॥ ६५

जानासि राजनीतिं त्वं यथावद्वरवर्णिनि ।

भुंक्ष्व राज्यसुखं पूर्णं वर्षाणामयुतायुतम् ॥ ६६

पुत्रस्ते भविता कान्तः सोऽपि राजा भविष्यति ।

यौवने क्रीडयित्वान्ते वार्धक्ये सुखमाप्स्यसि ॥ ६७

स्कन्ध ५ ९ १ पुष्पोंसे भी युद्ध नहीं करना चाहिये, फिर तीक्ष्ण बाणोंसे युद्धकी बात ही क्या? अपने अंगोंका छिद जाना भला किसकी प्रसन्नताका कारण बन सकता है? अतएव हे तन्वंगि! आप कृपा करें और देवताओं तथा दानवोंके द्वारा पूजित मेरे स्वामी महिषको पतिके रूपमें स्वीकार कर लें ॥ ६२-६३ ॥ वे आपके सभी वांछित मनोरथ पूर्ण कर देंगे और उन्हें पतिरूपमें पाकर आप सदाके लिये उनकी पटरानी बन जायँगी; इसमें सन्देह नहीं है ॥६४ ॥

हे देवि! आप मेरी बात मान लें, इससे आपको उत्तम सुख मिलेगा । कष्ट पाकर भी संग्राममें विजयका सन्देह बना रहता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ६५ ॥

हे सुन्दरि! आप राजनीति भलीभाँति जानती हैं, अतः हजारों - हजारों वर्षोंतक राज्यसुखका भोग करें ॥६६ ॥

आपको तेजस्वी पुत्र प्राप्त होगा; वह भी राजा बनेगा । इस प्रकार आप युवावस्थामें क्रीड़ासुख प्राप्त । करके वृद्धावस्थामें आनन्द प्राप्त करेंगी ॥ ६७ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे ताम्रकृतं देवीं प्रति विस्त्रंसनवचनवर्णनं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥

अथ द्वादशोऽध्यायः देवीके अट्टहाससे भयभीत होकर ताम्रका महिषासुरके पास भाग आना, महिषासुरका अपने मन्त्रियोंके साथ पुनः विचार - विमर्श तथा दुर्धर, दुर्मुख व्यास उवाच

तन्निशम्य वचस्तस्य ताम्रस्य जगदम्बिका ।

मेघगम्भीरया वाचा हसन्ती तमुवाच ह ॥

देव्युवाच

गच्छ ताम्र पतिं ब्रूहि मुमूर्षु मन्दचेतसम् ।

महिषं चातिकामार्तं मूढं ज्ञानविवर्जितम् ॥

यथा ते महिषी माता प्रौढा यवसभक्षिणी ।

नाहं तथा शृङ्गवती लम्बपुच्छा महोदरी ॥

न कामयेऽहं देवेशं नैव विष्णुं न शङ्करम् ।

धनदं वरुणं नैव ब्रह्माणं न च पावकम् ॥

और बाष्कलकी गर्वोक्ति व्यासजी बोले – उस ताम्रकी वह बात सुनकर भगवती जगदम्बिका मेघके समान गम्भीर वाणीमें १ उससे हँसते हुए कहने लगीं ॥१ ॥

देवी बोलीं- हे ताम्र! तुम अपने स्वामी महिषके पास जाओ और मरनेको उद्यत मन्दबुद्धि, अति २ कामातुर तथा ज्ञानशून्य उस मूर्खसे कहो कि जिस प्रकार तुम्हारी माता महिषी घास खानेवाली, प्रौढा, विशाल सींगोंवाली, लम्बी पूँछवाली तथा महान् ३ उदरवाली है; वैसी मैं नहीं हूँ॥२-३ ॥ मैं न देवराज इन्द्रको, न विष्णुको, न शिवको, ४ न कुबेरको, न वरुणको, न ब्रह्माको और न तो