देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 601–610
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 601–610
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५ ९ २ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १२ एतान्देवगणान्हित्वा पशुं केन गुणेन वै वृणोम्यहं वृथा लोके गर्हणा मे भवेदिति
नाहं पतिंवरा नारी वर्तते मे पतिः प्रभुः ।
सर्वकर्ता सर्वसाक्षी ह्यकर्ता निःस्पृहः स्थिरः ॥
निर्गुणो निर्ममोऽनन्तो निरालम्बो निराश्रयः ।
सर्वज्ञः सर्वगः साक्षी पूर्ण: पूर्णाशयः शिवः ॥
सर्वावासक्षमः शान्तः सर्वदृक्सर्वभावनः ।
तं त्यक्त्वा महिषं मन्दं कथं सेवितुमुत्सहे ॥
प्रबुध्य युध्यतां कामं करोमि यमवाहनम् ।
अथवा मनुजानां वै करिष्ये जलवाहकम् ॥
जीवितेच्छास्ति चेत्पाप गच्छ पातालमाशु वै ।
समस्तैर्दानवैर्युक्तस्त्वन्यथा हन्मि सङ्गरे ॥
कामं सदृशयोर्योगः संसारे सुखदो भवेत् ।
अन्यथा दुःखदो भूयादज्ञानाद्यदि कल्पितः ॥
मूर्खस्त्वमसि यद् ब्रूषे पतिं मे भज भामिनि ।
क्वाहं क्व महिषः शृङ्गी सम्बन्धः कीदृशो द्वयोः ॥
गच्छ युध्यस्व वा कामं हनिष्येऽहं सबान्धवम् ।
यज्ञभागं देवलोकं नोचेत्त्यक्त्वा सुखी भव ॥
व्यास उवाच
इत्युक्त्वा सा तदा देवी जगर्ज भृशमद्भुतम् ।
कल्पान्तसदृशं नादं चक्रे दैत्यभयावहम् ॥
चकम्पे वसुधा चेलुस्तेन शब्देन भूधराः ।
गर्भाश्च दैत्यपत्नीनां सस्त्रंसुर्गर्जितस्वनात् ॥
। अग्निदेवको ही चाहती हूँ । जब मैंने इन देवताओंकी ॥ ५ उपेक्षा कर दी, तब भला मैं एक पशुका उसके किस गुणसे प्रसन्न होकर वरण करूँगी; इससे तो संसारमें मेरी निन्दा ही होगी! ॥ ४-५ ॥ मैं पतिका वरण करनेवाली साधारण स्त्री नहीं हूँ । मेरे पति तो साक्षात् प्रभु हैं । वे सब कुछ करनेवाले, सबके साक्षी, कुछ भी न करनेवाले, इच्छारहित, सदा रहनेवाले, निर्गुण, मोहरहित, अनन्त, ७ निरालम्ब, आश्रयरहित, सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, साक्षी, पूर्ण, पूर्ण आशयवाले, कल्याणकारी, सबको आश्रय देनेमें समर्थ, शान्त, सबको देखनेवाले तथा सबकी भावनाओंको ८ जाननेवाले हैं । उन प्रभुको छोड़कर मैं मूर्ख महिषको अपना पति क्यों बनाना चाहूँगी? ॥ ६-८ ॥ [ उससे कह देना – ] अब तुम उठकर युद्ध करो । मैं तुम्हें या तो यमका वाहन बना दूँगी अथवा ९ मनुष्योंके लिये पानी ढोनेवाला महिष बना दूँगी ॥ ९ ॥
अरे पापी! यदि जीवित रहनेकी तुम्हारी इच्छा हो तो शीघ्र ही समस्त दानवोंको साथ लेकर १० पाताललोक चले जाओ, अन्यथा मैं युद्धमें मार डालूँगी ॥ १० ॥
इस संसारमें समान कुल तथा आचारवालोंका ११ परस्पर सम्बन्ध सुखदायक होता है, इसके विपरीत बिना सोचे - समझे यदि सम्बन्ध हो जाता है, तो वह बड़ा दुःखदायी होता है ॥११ ॥
[ अरे महिष! ] तुम मूर्ख हो जो यह कहते हो १२ कि ' हे भामिनि! मुझे पतिरूपमें स्वीकार कर लो । ' कहाँ मैं और कहाँ तुम सींग धारण करनेवाले महिष! हम दोनोंका यह कैसा सम्बन्ध! अतः अब तुम १३ [ पाताललोक ] चले जाओ अथवा मुझसे युद्ध करो, मैं तुम्हें बन्धु - बान्धवोंसहित निश्चय ही मार डालूंगी, नहीं तो देवताओंका यज्ञभाग दे दो और देवलोक छोड़कर सुखी हो जाओ ॥ १२-१३ ॥ व्यासजी बोले- ऐसा कहकर देवीने बड़े जोरसे १४ अद्भुत गर्जन किया । वह गर्जन प्रलयकालीन भीषण ध्वनिके समान तथा दैत्योंको भयभीत कर देनेवाला था । उस नादसे पृथ्वी काँप उठी और पर्वत डगमगाने १५ लगे तथा दैत्योंकी पत्नियोंके गर्भ गिर गये ॥ १४-१५ ॥
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अ ० १२ ] पञ्चम स्कन्ध ५ ९ ३
ताम्रः श्रुत्वा च तं शब्दं भयत्रस्तमनास्तदा ।
पलायनं ततः कृत्वा जगाम महिषान्तिकम् ॥
नगरे तस्य ये दैत्यास्तेऽपि चिन्तामवाप्नुवन् ।
बधिरीकृतकर्णाश्च पलायनपरा नृप ॥
तदा क्रोधेन सिंहोऽपि ननाद भृशमुत्सटः ।
तेन नादेन दैतेया भयं जग्मुरपि स्फुटम् ॥
ताम्रं समागतं दृष्ट्वा हयारिरपि मोहितः ।
चिन्तयामास सचिवैः किं कर्तव्यमतः परम् ॥
दुर्गग्रहो वा कर्तव्यो युद्धं निर्गत्य वा पुनः ।
पलायने कृते श्रेयो भवेद्वा दानवोत्तमाः ॥
बुद्धिमन्तो दुराधर्षाः सर्वशास्त्रविशारदाः ।
मन्त्रः खलु प्रकर्तव्यः सुगुप्तः कार्यसिद्धये ॥
मन्त्रमूलं स्मृतं राज्यं यदि स स्यात्सुरक्षितः ।
मन्त्रिभिश्च सदाचारैर्विधेयः सर्वथा बुधैः ॥
मन्त्रभेदे विनाशः स्याद्राज्यस्य भूपतेस्तथा ।
तस्माद्भेदभयाद् गुप्तः कर्तव्यो भूतिमिच्छता ॥
तदत्र मन्त्रिभिर्वाच्यं वचनं हेतुमद्धितम् ।
कालदेशानुसारेण विचिन्त्य नीतिनिर्णयम् ॥
या योषात्र समायाता प्रबला देवनिर्मिता ।
एकाकिनी निरालम्बा कारणं तद्विचिन्त्यताम् ॥
युद्धं प्रार्थयते बाला किमाश्चर्यमतः परम् ।
श्रेयोऽत्र विपरीतं वा को वेत्ति भुवनत्रये ॥
उस शब्दको सुनकर ताम्रके मनमें भय व्याप्त हो गया और तब वह वहाँसे भागकर महिषासुर के १६ पास जा पहुँचा ॥१६ ॥
हे राजन्! उसके नगरमें जो भी दैत्य थे, वे सब बड़े चिन्तित हुए । वे उस ध्वनिके प्रभावसे बधिर हो १७ गये और वहाँसे भागने लगे ॥ १७ ॥
उसी समय देवीका सिंह भी क्रोधपूर्वक अपने अयालों ( गर्दनके बालों ) - को फैलाकर बड़े जोरसे दहाड़ा । उस गर्जनसे सभी दैत्य बहुत डर गये ॥ १८ ॥
१८ ताम्रको वापस आया हुआ देखकर महिषासुरको बहुत विस्मय हुआ । वह उसी समय मन्त्रियोंके साथ विचार - विमर्श करने लगा कि अब आगे क्या किया १ ९ | जाय? ॥ १ ९ ॥ [ उसने कहा- ] हे श्रेष्ठ दानवो! हमें आत्मरक्षार्थ किलेके भीतर ही रहना चाहिये अथवा बाहर निकलकर युद्ध करना चाहिये अथवा भाग जानेमें ही २० हमारा कल्याण है? ॥ २० ॥
आपलोग बुद्धिमान्, अजेय तथा सभी शास्त्रोंके विद्वान् हैं । अतः मेरे कार्यकी सिद्धिके लिये आपलोग २१ अत्यन्त गुप्त मन्त्रणा करें; क्योंकि मन्त्रणाको ही राज्यका मूल कहा गया है । यदि मन्त्रणा सुरक्षित ( गुप्त ) रहती है, तभी राज्यकी सुरक्षा सम्भव है । अतएव राजाको चाहिये कि बुद्धिमान् तथा सदाचारी २२ मन्त्रियोंके साथ सदा गुप्त मन्त्रणा करे ॥ २१-२२ ॥ मन्त्रणाके खुल जानेपर राज्य तथा राजा - इन दोनोंका विनाश हो जाता है । अत: अपने अभ्युदयकी २३ इच्छा करनेवाले राजाको चाहिये कि भेद खुल जानेके भयसे सदा गुप्त मन्त्रणा करे ॥ २३ ॥
अतः इस समय आप मन्त्रिगण नीति - निर्णयपर सम्यक् विचार करके देश - कालके अनुसार मुझे २४ सार्थक तथा हितकर परामर्श प्रदान करें ॥२४ ॥
देवताओं द्वारा निर्मित जो यह अत्यन्त बलवती स्त्री बिना किसी सहायताके अकेली ही यहाँ आयी हुई है, उसके रहस्यपर आपलोग विचार करें ॥ २५ ॥
२५ वह बाला हमें युद्धके लिये चुनौती दे रही है, इससे बढ़कर आश्चर्य और क्या हो सकता है? इसमें मेरी विजय होगी अथवा पराजय- इसे तीनों लोकों में २६ भला कौन जानता है? ॥ २६ ॥
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५ ९ ४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १२
न बहूनां जयोऽप्यस्ति नैकस्य च पराजयः ।
दैवाधीनौ सदा ज्ञेयौ युद्धे जयपराजयौ ॥
उपायवादिनः प्राहुर्दैवं किं केन वीक्षितम् ।
अदृष्टमिति यन्नाम प्रवदन्ति मनीषिणः ॥
तत्सत्त्वेऽपि प्रमाणं किं कातराशावलम्बनम् ।
न समर्थजनानां हि दैवं कुत्रापि लक्ष्यते ॥
उद्यमो दैवमेतौ हि शूरकातरयोर्मतम् ।
विचिन्त्याद्य धिया सर्वं कर्तव्यं कार्यमादरात् ॥
व्यास उवाच
इति राज्ञो वचः श्रुत्वा हेतुगर्भं महायशाः ।
बिडालाख्यो महाराजमित्युवाच कृताञ्जलिः ॥
राजन्नेषा विशालाक्षी ज्ञातव्या यत्नतः पुनः ।
किमर्थमिह सम्प्राप्ता कुतः कस्य परिग्रहः ॥
मरणं ते परिज्ञाय स्त्रिया सर्वात्मना सुरैः ।
प्रेषिता पद्मपत्राक्षी समुत्पाद्य स्वतेजसा ॥
तेऽपि छन्नाः स्थिताः खेऽत्र सर्वे युद्धदिदृक्षवः ।
समयेऽस्याः सहायास्ते भविष्यन्ति युयुत्सवः ॥
पुरतः कामिनीं कृत्वा ते वै विष्णुपुरोगमाः ।
वधिष्यन्ति च नः सर्वान्सा त्वां युद्धे हनिष्यति ॥
एतच्चिकीर्षितं तेषां मया ज्ञातं नराधिप ।
भवितव्यस्य न ज्ञानं वर्तते मम सर्वथा ॥
योद्धव्यं न त्वयाद्येति नाहं वक्तुं क्षमः प्रभो । प्रमाणं त्वं महाराज कार्येऽत्र देवनिर्मिते । न तो बहुत संख्यावालोंकी ही सदा विजय होती २७ है और न तो अकेला रहते हुए भी किसीकी पराजय ही होती है । युद्धमें जय तथा पराजयको सदा दैवके अधीन जानना चाहिये ॥ २७ ॥
पुरुषार्थवादी लोग कहते हैं कि दैव क्या है, २८ उसे किसने देखा है; इसीलिये तो बुद्धिमान् उसे 6 ' अदृष्ट ' कहते हैं । उसके होनेमें क्या प्रमाण है? वह केवल कायरोंको आशा बँधानेका साधन है, २ ९ सामर्थ्यवान् लोग उसे कहीं नहीं देखते । उद्यम और दैव- ये दोनों ही वीर तथा कायर लोगों की मान्यताएँ हैं । अतः बुद्धिपूर्वक सारी बातोंपर विचार करके हमें कर्तव्यका निश्चय करना ३० चाहिये ॥ २८-३० ॥ व्यासजी बोले - राजा महिषकी यह सारगर्भित बात सुनकर महायशस्वी बिडालाख्यने हाथ जोड़कर अपने महाराज महिषासुरसे यह वचन कहा — हे ३१ राजन्! विशाल नयनोंवाली इस स्त्रीके विषयमें सावधानीपूर्वक बार - बार यह पता लगाया जाना चाहिये कि यह यहाँ किसलिये और कहाँसे आयी हुई ३२ है तथा यह किसकी पत्नी है? ॥ ३१- ३२ ॥ [ मैं तो यह समझता हूँ कि ] ' स्त्रीके द्वारा ही आपकी मृत्यु होगी ' - ऐसा भलीभाँति जानकर सभी देवताओंने अपने तेजसे उस कमलनयनी स्त्रीका ३३ निर्माण करके यहाँ भेजा है ॥३३ ॥
युद्ध देखनेकी इच्छावाले वे देवता भी आकाशमें छिपकर विद्यमान हैं और अवसर आनेपर युद्धकी ३४ इच्छावाले देवता भी उसकी सहायता करेंगे ॥ ३४ ॥
उस स्त्रीको आगे करके वे विष्णु आदि प्रधान देवता युद्धमें हम सबका वध कर देंगे और वह स्त्री ३५ भी आपको मार डालेगी ॥ ३५ ॥
हे नरेश! मैंने तो यही समझा है कि उन देवताओंका यही अभीष्ट है, किंतु मुझे भविष्य में होनेवाले परिणामका बिलकुल ज्ञान नहीं है । हे प्रभो! ३६ मैं इस समय यह भी नहीं कह सकता कि आप युद्ध न करें । हे महाराज! देवताओंके द्वारा निर्मित इस कार्यमें कुछ भी निर्णय लेनेमें आप ही प्रमाण ३७ | हैं || ३६-३७ ॥
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अ ० १२ ] पञ्चम स्कन्ध ५ ९ ५
तदर्थेऽस्माभिरनिशं मर्तव्यं कार्यगौरवात् ।
विहर्तव्यं त्वया सार्धमेष धर्मोऽनुजीविनाम् ॥
विचारोऽत्र महानस्ति यदेका कामिनी नृप ।
युद्धं प्रार्थयतेऽस्माभिः ससैन्यैर्बलदर्पितैः ॥
दुर्मुख उवाच
राजन् युद्धे जयो नोऽद्य भविता वेद्मयहं किल ।
पलायनं न कर्तव्यं यशोहानिकरं नृणाम् ॥
इन्द्रादीनां संयुगेऽपि न कृतं यज्जुगुप्सितम् ।
एकाकिनीं स्त्रियं प्राप्य को हि कुर्यात्पलायनम् ॥
तस्माद्युद्धं प्रकर्तव्यं मरणं वा रणे जयः ।
यद्भावि तद्भवत्येव कात्र चिन्ता विपश्यतः ॥
मरणेऽत्र यशः प्राप्तिर्जीवने च तथा सुखम् ।
उभयं मनसा कृत्वा कर्तव्यं युद्धमद्य वै ॥
पलायने यशोहानिर्मरणं चायुषः क्षये ।
तस्माच्छोको न कर्तव्यो जीविते मरणे वृथा ॥
व्यास उवाच
दुर्मुखस्य वचः श्रुत्वा बाष्कलो वाक्यमब्रवीत् ।
प्रणतः प्राञ्जलिर्भूत्वा राजानं वाक्यकोविदः ॥
बाष्कल उवाच
राजंश्चिन्ता न कर्तव्या कार्येऽस्मिन्कातरप्रिये ।
अहमेको हनिष्यामि चण्डीं चञ्चललोचनाम् ॥
उत्साहस्तु प्रकर्तव्यः स्थायीभावो रसस्य च ।
भयानको भवेद्वैरी वीरस्य नृपसत्तम ॥
हम अनुयायियों का तो यही धर्म है कि अवसर आनेपर आपके लिये सदा मरनेको तैयार रहें अथवा ३८ आपके साथ आनन्दपूर्वक रहें ॥ ३८ ॥
हे राजन्! अद्भुत बात तो यह है कि बलाभिमानी और सेनासम्पन्न हमलोगोंको एक स्त्री युद्धके लिये ३ ९ चुनौती दे रही है ॥३ ९ ॥ दुर्मुख बोला- हे राजन्! मैं यह पूर्णरूपसे जानता हूँ कि आज युद्धमें विजय निश्चितरूपसे हमलोगोंकी होगी । हमलोगोंको पलायन नहीं करना चाहिये; क्योंकि युद्धसे भाग जाना पुरुषोंकी कीर्तिको ४० नष्ट करनेवाला होता है ॥ ४० ॥
इन्द्र आदि देवताओंके साथ भी युद्धमें जब हमलोगोंने यह निन्दनीय कार्य नहीं किया था, तब ४१ उस अकेली स्त्रीको सामने पाकर उससे डरकर भला कौन पलायन करेगा? ॥ ४१ ॥
अतः अब हमें युद्ध आरम्भ कर देना चाहिये, ४२ । युद्धमें हमारी मृत्यु हो अथवा विजय । जो होना होगा वह तो होगा ही । यथार्थ ज्ञानवालेको इस विषय में चिन्ताकी क्या आवश्यकता? ॥ ४२ ॥
रणभूमिमें मरनेपर कीर्ति मिलेगी और विजयी ४३ होनेपर जीवनमें सुख मिलेगा । इन दोनों ही बातोंको मनमें स्थिर करके हमें आज ही युद्ध छेड़ देना चाहिये ॥ ४३ ॥
४४ युद्धसे पलायन कर जानेसे हमारा यश नष्ट हो जायगा । आयुके समाप्त हो जानेपर मृत्यु होनी तो निश्चित ही है । अतएव जीवन तथा मरणके लिये व्यर्थ चिन्ता नहीं करनी चाहिये ॥ ४४ ॥
व्यासजी बोले – दुर्मुखका विचार सुनकर बात ४५ करनेमें परम प्रवीण बाष्कल हाथ जोड़कर विनम्रतापूर्वक राजा महिषासुरसे यह वचन कहने लगा ॥ ४५ ॥
बाष्कल बोला - हे राजन्! कायर लोगों के लिये प्रिय इस [ पलायन ] कार्यके विषयमें आपको विचार नहीं करना चाहिये । मैं उस चंचल नेत्रोंवाली ४६ चण्डीको अकेला ही मार डालूँगा ॥ ४६ ॥
हमें सर्वदा उत्साहसे सम्पन्न रहना चाहिये; क्योंकि उत्साह ही वीररसका स्थायीभाव है । हे ४७ नृपश्रेष्ठ! भयानक रस तो वीररसका वैरी है ॥ ४७ ॥
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५ ९ ६ तस्मात्त्यक्त्वा भयं भूप करिष्ये ` युद्धमद्भुतम् नयिष्यामि नरेन्द्राहं चण्डिकां यमसादनम् न बिभेमि यमादिन्द्रात्कुबेराद्वरुणादपि वायोर्वह्नेस्तथा विष्णोः शङ्कराच्छशिनो रवेः एकाकिनी तथा नारी किं पुनर्मदगर्विता अहं तां निहनिष्यामि विशिखैश्च शिलाशितैः पश्य बाहुबलं मेऽद्य विहरस्व यथासुखम् भवतात्र न गन्तव्यं संग्रामेऽप्यनया समम् व्यास उवाच एवं ब्रुवति राजेन्द्रं बाष्कले मदगर्विते प्रणम्य नृपतिं तत्र दुर्धरो वाक्यमब्रवीत् दुर्धर उवाच महिषाहं विजेष्यामि देवीं देवविनिर्मिताम् अष्टादशभुजां रम्यां कारणाच्च समागताम् ॥ राजन् भीषयितुं त्वां वै मायैषा निर्मिता सुरैः विभीषिकेयं विज्ञाय त्यज मोहं मनोगतम् ॥ राजनीतिरियं राजन् मन्त्रिकृत्यं तथा शृणु सात्त्विका राजसाः केचित्तामसाश्च तथापरे मन्त्रिणस्त्रिविधा लोके भवन्ति दानवाधिप सात्त्विकाः प्रभुकार्याणि साधयन्ति स्वशक्तिभिः आत्मकृत्यं प्रकुर्वन्ति स्वामिकार्याविरोधत: एकचित्ता धर्मपरा मन्त्रशास्त्रविशारदाः राजसा भिन्नचित्ताश्च स्वकार्यनिरताः सदा कदाचित्स्वामिकार्यं ते प्रकुर्वन्ति यदृच्छया तामसा लोभनिरताः स्वकार्यनिरताः सदा प्रभुकार्यं विनाश्यैव स्वकार्यं साधयन्ति ते श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १२ । अतएव हे राजन्! भयका त्याग करके मैं अद्भुत ॥ ४८ युद्ध करूँगा । हे नरेन्द्र! मैं उस चण्डिकाको मारकर उसे यमपुरी पहुँचा दूँगा ॥ ४८ ॥
। मैं यम, इन्द्र, कुबेर, वरुण, वायु, अग्नि, विष्णु, ॥ ४ ९ शिव, चन्द्रमा और सूर्यसे भी नहीं डरता, तब उस अकेली तथा मदोन्मत्त स्त्रीसे भला क्यों डरूँगा? । पत्थरपर सान धरे हुए तीक्ष्ण बाणोंसे मैं उस स्त्रीका । ५० वध कर दूँगा । आज आप मेरा बाहुबल तो देखिये और इस स्त्रीके साथ युद्ध करनेके लिये आपको । संग्राममें जानेकी आवश्यकता नहीं है; आप केवल ॥ ५१ सुखपूर्वक विहार कीजिये ॥ ४ ९ –५१ ॥ व्यासजी बोले – दैत्यराज महिषसे मदोन्मत्त बाष्कलके ऐसा कहनेपर वहाँ उपस्थित दुर्धर अपने । राजा महिषासुरको प्रणाम करके कहने लगा । ५२ ॥ ॥ ५२ दुर्धर बोला – हे महाराज महिष! रहस्यमय ढंगसे आयी हुई उस देवनिर्मित अठारह भुजाओंवाली तथा मनोहर देवीपर मैं विजय प्राप्त करूँगा ॥ ५३ ॥
। हे राजन्! आपको भयभीत करनेके लिये ही देवताओंने इस मायाकी रचना की है । यह एक ५३ विभीषिकामात्र है - ऐसा जानकर आप अपने मनकी । व्याकुलता दूर कर दीजिये ॥ ५४ ॥
५४ हे राजन्! यह सब तो राजनीतिकी बात हुई, अब आप मन्त्रियोंका कर्तव्य सुनिये । हे दानवेन्द्र! । तीन प्रकारके मन्त्री संसारमें होते हैं । उनमें कुछ ॥ ५५ सात्त्विक, कुछ राजस तथा अन्य तामस होते हैं । सात्त्विक मन्त्री अपनी पूरी शक्तिसे अपने स्वामीका । कार्य सिद्ध करते हैं । वे अपने स्वामी कार्यमें बिना ॥ ५६ कोई अवरोध उत्पन्न किये अपना कार्य करते हैं । ऐसे मन्त्री एकाग्रचित्त, धर्मपरायण तथा मन्त्रशास्त्रों ( मन्त्रणासे । सम्बन्धित शास्त्र ) - के विद्वान् होते हैं ॥ ५५-५७ ॥ ॥ ५७ राजस प्रकृतिके मन्त्री चंचल चित्तवाले होते हैं और वे सदा अपना कार्य साधनेमें लगे रहते हैं । जब । कभी उनके मनमें आ जाता है, तब वे अपने स्वामीका ॥ ५८ भी काम कर देते हैं ॥ ५८ ॥
तामस प्रकृतिके मन्त्री लोभपरायण होते हैं और । वे सदैव अपना कार्य सिद्ध करनेमें संलग्न रहते हैं । ॥ ५ ९ । वे अपने स्वामीका कार्य विनष्ट करके भी अपना
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अ ० १३ ] पञ्चम स्कन्ध ५ ९ ७
समये ते विभिद्यन्ते परैस्तु परिवञ्चिताः ।
स्वच्छिद्रं शत्रुपक्षीयान्निर्दिशन्ति गृहस्थिताः ॥
कार्यभेदकरा नित्यं कोशगुप्तासिवत्सदा ।
संग्रामेऽथ समुत्पन्ने भीषयन्ति प्रभुं सदा ॥
विश्वासस्तु न कर्तव्यस्तेषां राजन् कदाचन ।
विश्वासे कार्यहानिः स्यान्मन्त्रहानिः सदैव हि ॥
खलाः किं किं न कुर्वन्ति विश्वस्ता लोभतत्पराः ।
तामसाः पापनिरता बुद्धिहीनाः शठास्तथा ॥
तस्मात्कार्यं करिष्यामि गत्वाहं रणमस्तके ।
चिन्ता त्वया न कर्तव्या सर्वथा नृपसत्तम ॥
गृहीत्वा तां दुराचारामागमिष्यामि सत्वरः ।
पश्य मेऽद्य बलं धैर्यं प्रभुकार्यं स्वशक्तितः ॥
कार्य सिद्ध करते हैं । वे समय आनेपर परपक्षके ६० लोगोंसे प्रलोभन पाकर अपने स्वामीका भेद खोल देते हैं और घरमें बैठे - बैठे अपनी कमजोरी शत्रुपक्ष लोगोंको बता देते हैं । ऐसे मन्त्री म्यानमें छिपी तलवारकी भाँति अपने स्वामीके कार्यमें बाधा डालते ६१ हैं और संग्रामकी स्थिति उत्पन्न होनेपर सदा उन्हें डराते रहते हैं ॥ ५ ९ –६१ ॥ हे राजन्! उन मन्त्रियोंका कभी विश्वास नहीं ६२ करना चाहिये; क्योंकि उनका विश्वास करनेपर काम बिगड़ जाता है और गुप्त भेद भी खुल जाता है । लोभी, तमोगुणी, पापी, बुद्धिहीन, शठ तथा खल ६३ मन्त्रियों का विश्वास कर लेनेपर वे क्या - क्या अनर्थ नहीं कर डालते? ॥ ६२-६३ ॥ अतएव हे नृपश्रेष्ठ! मैं स्वयं युद्धभूमिमें जाकर आपका कार्य सम्पन्न करूँगा । आप किसी भी ६४ तरहकी चिन्ता न करें । मैं उस दुराचारिणी स्त्रीको पकड़कर आपके पास शीघ्र ले आऊँगा । आप मेरा बल तथा धैर्य देखें । मैं अपनी पूरी शक्तिसे अपने ६५ । स्वामीका कार्य सिद्ध करूँगा ॥ ६४-६५ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे देवीपराजयकरणाय दुर्धरप्रबोधवचनं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
अथ त्रयोदशोऽध्यायः बाष्कल और दुर्मुखका रणभूमिमें आना, देवीसे उनका वार्तालाप और युद्ध तथा देवीद्वारा उनका वध व्यास उवाच
इत्युक्त्वा तौ महाबाहू दैत्यौ बाष्कलदुर्मुखौ ।
जग्मतुर्मददिग्धाङ्गौ सर्वशस्त्रास्त्रकोविदौ ॥
तौ गत्वा समरे देवीमूचतुर्वचनं तदा ।
दानवौ च मदोन्मत्तौ मेघगम्भीरया गिरा ॥
देवि देवा जिता येन महिषेण महात्मना ।
वरय त्वं वरारोहे सर्वदैत्याधिपं नृपम् ॥
व्यासजी बोले- हे राजन्! ऐसा कहकर अभिमानसे चूर अंगोंवाले तथा सभी शस्त्रास्त्रों के विशारद वे दोनों महाबाहु दैत्य बाष्कल तथा दुर्मुख १ समरांगणकी ओर चल पड़े ॥ १ ॥
इसके बाद वे दोनों मदोन्मत्त दानव समरभूमिमें पहुँचकर मेघ गर्जनके समान गम्भीर वाणीमें २ देवीसे कहने लगे ॥ २ ॥
हे देवि! हे सुन्दरि! जिन महान् महिषासुरने सभी देवताओं पर विजय प्राप्त कर ली है; सभी दैत्योंके अधिष्ठाता उन नरेश महिषासुरका आप ३ वरण कर लें ॥३ ॥
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५ ९ ८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १३
स कृत्वा मानुषं रूपं सर्वलक्षणसंयुतम् ।
भूषितं भूषणैर्दिव्यैस्त्वामेष्यति रहः किल ॥
त्रैलोक्यविभवं कामं त्वमेष्यसि शुचिस्मिते ।
महिषे परमं भावं कुरु कान्ते मनोगतम् ॥
कृत्वा पतिं महावीरं संसारसुखमद्भुतम् ।
त्वं प्राप्स्यसि पिकालापे योषितां खलु वाञ्छितम् ॥
देव्युवाच
जाल्म त्वं किं विजानासि नारीयं काममोहिता ।
मन्दबुद्धिबलात्यर्थं भजेयं महिषं शठम् ॥
कुलशीलगुणैस्तुल्यं तं भजन्ति कुलस्त्रियः ।
अधिकं रूपचातुर्यबुद्धिशीलक्षमादिभिः ॥
का नु कामातुरा नारी भजेच्च पशुरूपिणम् ।
पशूनामधमं नूनं महिषं देवरूपिणी ॥
गच्छतं महिषं तूर्णं भूपं बाष्कलदुर्मुखौ ।
वदतं मद्वचो दैत्यं गजतुल्यं विषाणिनम् ॥
पातालं गच्छ वाभ्येत्य संग्रामं कुरु वा मया ।
रणे जाते सहस्त्राक्षो निर्भयः स्यादिति ध्रुवम् ॥
हत्वाहं त्वां गमिष्यामि नान्यथा गमनं मम ।
इत्थं ज्ञात्वा सुदुर्बुद्धे यथेच्छसि तथा कुरु ॥
मामनिर्जित्य भूभागे न स्थानं ते कदाचन ।
भविष्यति चतुष्पाद दिवि वा गिरिकन्दरे ॥
व्यास उवाच
इत्युक्तौ तौ तथा दैत्या कोपाकुलितलोचनौ ।
धनुर्बाणधरौ वीरौ युद्धकामौ बभूवतुः ॥
वे सभी लक्षणोंसे सम्पन्न मनुष्य रूप धारण ४ करके तथा दिव्य आभूषणोंसे अलंकृत होकर एकान्तमें आपसे मिलनेके लिये आयेंगे ॥ ४ ॥
हे सुन्दर मुसकानवाली देवि! [ उन्हें पतिके रूपमें स्वीकार कर लेनेपर ] आपको तीनों लोकोंका वैभव निश्चय ही प्राप्त हो जायगा । अतः हे कान्ते! उन महिषासुर के प्रति आप अपने मनमें परम प्रेमभाव रखिये ॥ ५ ॥
६ हे कोकिलभाषिणि! महान् पराक्रमी महिषासुरको अपना पति बनाकर आप स्त्रियोंके लिये अभीष्ट अद्भुत सांसारिक सुख प्राप्त करेंगी ॥ ६ ॥
देवी बोलीं- अरे दुष्ट! क्या तुम यह समझ ७ रहे हो कि यह कोई काममोहित, बुद्धिहीन तथा बलरहित नारी है? मैं उस मूर्ख महिषासुरकी सेवा कैसे कर सकती हूँ? ॥ ७ ॥
८ कुलीन स्त्रियाँ कुल, चरित्र तथा गुणमें समानता रखनेवाले एवं रूप, चतुरता, बुद्धि, व्यवहार, क्षमा आदि विशेषरूपसे सम्पन्न पुरुषको ही स्वीकार करती हैं ॥ ८ ॥
९ ऐसी कौन देवरूपिणी नारी होगी, जो कामातुर होकर पशुरूपधारी तथा पशुओंमें भी अधम महिषको अपना पति बनाना चाहेगी? ॥ ९ ॥
१० हे बाष्कल और दुर्मुख! तुम लोग तत्काल अपने राजा महिषासुर के पास जाओ और हाथीके समान विशाल शरीरवाले तथा शृङ्गधारी उस दानवसे मेरा १ ९ सन्देश कह दो – ' तुम पाताललोक चले जाओ अथवा यहाँ आकर मेरे साथ युद्ध करो । संग्राम होनेपर ही इन्द्र निर्भय हो सकते हैं - यह निश्चित है । १२ मैं तुम्हारा वध करके ही जाऊँगी, बिना तुम्हें मारे मेँ नहीं जा सकती । हे महामूर्ख! यह समझकर अब तुम जो चाहते हो वैसा करो । हे चतुष्पाद! बिना मुझको पराजित किये पृथ्वीके किसी भी भाग में, अन्तरिक्ष या १३ पर्वतकी गुफामें कहीं भी अब तुम्हें शरण नहीं मिलेगी ' ॥ १० - १३ ॥ व्यासजी बोले- देवीके ऐसा कहनेपर क्रोधसे तमतमाये नेत्रोंवाले वे दोनों दैत्य धनुष - बाण लेकर १४ । युद्ध करनेके लिये तैयार हो गये ॥ १४ ॥
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अ ० १३ ] पञ्चम स्कन्ध ५ ९९
कृत्वा सुविपुलं नादं देवी सा निर्भया स्थिता ।
उभौ च चक्रतुस्तीव्रां बाणवृष्टिं कुरूद्वह ॥
भगवत्यपि बाणौघान्मुमोच दानवौ प्रति ।
कृत्वातिमधुरं नादं देवकार्यार्थसिद्धये ॥
तयोस्तु बाष्कलस्तूर्ण सम्मुखोऽभूद् रणाङ्गणे ।
दुर्मुखः प्रेक्षकस्तत्र देवीमभिमुखः स्थितः ॥
तयोर्युद्धमभूद् घोरं देवीबाष्कलयोस्तदा ।
बाणासिपरिघाघातैर्भयदं मन्दचेतसाम् ॥
ततः क्रुद्धा जगन्माता दृष्ट्वा तं युद्धदुर्मदम् । जघान पञ्चभिर्बाणैः कर्णाकृष्टैः शिलाशितैः ।
दानवोऽपि शरान्देव्याश्चिच्छेद निशितैः शरैः ।
सप्तभिस्ताडयामास देवीं सिंहोपरिस्थिताम् ॥
सापि तं दशभिस्तीक्ष्णैः सुपीतैः सायकैः खलम् ।
जघान तच्छरांश्छित्त्वा जहास च मुहुर्मुहुः ॥
अर्धचन्द्रेण बाणेन चिच्छेद च शरासनम् ।
बाष्कलोऽपि गदां गृह्य देवीं हन्तुमुपाययौ ॥
आगच्छन्तं गदापाणिं दानवं मदगर्वितम् ।
चण्डिका स्वगदापातैः पातयामास भूतले ॥
बाष्कलः पतितो भूमौ मुहूर्तादुत्थितः पुनः ।
चिक्षेप च गदां सोऽपि चण्डिकां चण्डविक्रमः ॥
तमागच्छन्तमालोक्य देवी शूलेन वक्षसि ।
जघान बाष्कलं क्रुद्धा पपात च ममार सः ॥
वे भगवती जगदम्बा भी गम्भीर गर्जना करके निर्भीक भावसे विराजमान थीं । हे कुरुनन्दन! वे दोनों १५ दैत्य घनघोर बाण - वृष्टि करने लगे ॥ १५ ॥
भगवती जगदम्बा भी देवताओंकी कार्य - सिद्धिके निमित्त अत्यन्त मधुर नाद करती हुई उन दोनों दानवोंपर १६ बाण - समूह बरसाने लगीं ॥१६ ॥
उन दोनोंमेंसे बाष्कल शीघ्रतापूर्वक समरभूमिमें देवीके सामने आ गया । उस समय दुर्मुख केवल दर्शक १७ बनकर देवीकी ओर मुख करके खड़ा रहा ॥१७ ॥
अब भगवती तथा बाष्कलके बीच बाणों, तलवार तथा परिघके प्रहारसे भीषण युद्ध होने लगा, जो उत्साहहीन चित्तवाले लोगोंके लिये १८ भयदायक था ॥ १८ ॥
तत्पश्चात् युद्धके लिये उन्मत्त उस बाष्कलको देखकर जगदम्बिका कुपित हो गयीं और उन्होंने १ ९ पत्थरकी सानपर चढ़ाकर तीखे बनाये गये तथा कानोंतक खींचे गये पाँच बाणोंसे उसपर प्रहार किया ॥ १ ९ ॥ उस दानवने भी अपने तीक्ष्ण बाणोंसे देवीके २० बाणोंको काट दिया और पुनः सिंहपर विराजमान भगवतीपर सात बाणोंसे प्रहार किया ॥ २० ॥
देवी भगवतीने उसके बाणोंको काटकर पानी २१ चढ़ाकर तीक्ष्ण किये हुए दस बाणोंसे उस दुष्टपर प्रहार किया और वे बार- बार जोर - जोर से हँसने लगीं ॥ २१ ॥
जगदम्बाने अपने अर्धचन्द्राकार बाणसे उसका २२ धनुष काट डाला । तब बाष्कल भी गदा लेकर देवीको मारनेके लिये उनकी ओर दौड़ा ॥ २२ ॥
अभिमानमें चूर उस दानवको हाथमें गदा लिये २३ | आता हुआ देखकर देवी चण्डिकाने अपनी गदा प्रहारसे उसे धराशायी कर दिया ॥ २३ ॥
बाष्कल मुहूर्तभर पृथ्वीपर पड़ा रहा, इसके बाद वह फिर उठ खड़ा हुआ और प्रचण्ड, पराक्रमी उस २४ वीरने भी भगवतीपर गदा चला दी ॥ २४ ॥
उस दैत्यको सामने आते देखकर भगवतीने कुपित होकर बाष्कलके वक्षःस्थलपर त्रिशूलसे प्रहार २५ । किया, जिससे वह गिर पड़ा और मर गया ॥ २५ ॥
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६०० पतिते बाष्कले सैन्यं भग्नं तस्य दुरात्मनः जयेति च मुदा देवाश्चुक्रुशुर्गगने स्थिताः तस्मिंश्च निहते दैत्ये दुर्मुखोऽतिबलान्वितः आजगाम रणे देवीं क्रोधसंरक्तलोचनः तिष्ठ तिष्ठाबले सोऽपि भाषमाणः पुनः पुनः धनुर्बाणधरः श्रीमारथस्थः कवचावृतः तमागच्छन्तमालोक्य देवी शङ्खमवादयत् कोपयन्ती दानवं तं ज्याघोषञ्च चकार ह
सोऽपि बाणान्मुमोचाशु तीक्ष्णानाशीविषोपमान् ।
स्वबाणैस्तान्महामाया चिच्छेद च ननाद च ॥
तयोः परस्परं युद्धं बभूव तुमुलं नृप । बाणशक्तिगदाघातैर्मुसलैस्तोमरैस्तथा
रणभूमौ तदा जाता रुधिरौघवहा नदी ।
पतितानि तदा तीरे शिरांसि प्रबभुस्तदा ॥
यथा सन्तरणार्थाय यमकिङ्करनायकैः ।
तुम्बीफलानि नीतानि नवशिक्षापरैर्मुदा ॥
रणभूमिस्तदा घोरा बभूवातीव दुर्गमा । शरीरैः पतितैर्भूमौ खाद्यमानैर्वृकादिभिः
गोमायुसारमेयाश्च काकाः कङ्का अयोमुखाः ।
गृध्राः श्येनाश्च खादन्ति शरीराणि दुरात्मनाम् ॥
ववौ वायुश्च दुर्गन्धो मृतानां देहसङ्गतः ।
अभूत्किलकिलाशब्दः खगानां पलभक्षिणाम् ॥
तदा चुकोप दुष्टात्मा दुर्मुखः कालमोहितः ।
देवीमुवाच गर्वेण कृत्वा चोर्ध्वकरं शुभम् ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १३ । बाष्कलके गिरते ही उस दुरात्माकी सेना भाग ॥ २६ गयी और आकाशमण्डलमें विद्यमान देवता प्रसन्नतापूर्वक भगवतीकी जय - जयकार करने लगे ॥ २६ ॥
। उस दैत्यके मार दिये जानेपर महाबली दुर्मुख ॥ २७ क्रोधसे आँखें लाल किये रणभूमिमें देवीके समक्ष आया ॥ २७ ॥
। उस समय वह वैभवशाली दैत्य ' अरी अबले! ठहरो, ठहरो ' – ऐसा बार - बार कहते हुए धनुष - बाण ॥ २८ धारण करके कवच पहने हुए रथपर सवार था ॥ २८ ॥
। उस दानवको अपनी ओर आते देखकर देवीने ॥ २ ९ शंखध्वनि की और उसे कुपित करती हुई वे अपने धनुषकी टंकार करने लगीं ॥ २ ९ ॥ दुर्मुख भी बड़ी तेजीसे सर्पके समान विषैले तीक्ष्ण बाण छोड़ने लगा । तब महामायाने अपने ३० बाणोंसे उन बाणोंको काट डाला और वे गर्जन करने लगीं ॥ ३० ॥
हे राजन्! बाण, शक्ति, गदा, मूसल और तोमर ॥ ३१ आदिके प्रहारसे उन दोनोंमें परस्पर भयंकर युद्ध होने लगा ॥ ३१ ॥
उस समय रणभूमिमें रुधिरकी नदी बह ३२ चली । उसके तटपर गिरे हुए मस्तक इस प्रकार सुशोभित हो रहे थे, मानो वैतरणी पार करनेके लिये तैरना सीखनेवाले यमदूतोंके द्वारा प्रसन्नतापूर्वक ३३ तुम्बीफल लाकर रख दिये गये हों॥३२-३३ ॥ भूमिपर कटकर गिरे शवों तथा उन्हें खानेवाले भेड़िये आदि जन्तुओं से वह रणभूमि अत्यन्त भयंकर ॥ ३४ तथा दुर्गम हो गयी थी ॥ ३४ ॥
सियार, कुत्ते, कौए, कंक, अयोमुख नामक पक्षी, गिद्ध और बाज उन दुष्ट दानवोंके शरीरको ३५ [ नोच - नोचकर ] खा रहे थे ॥३५ ॥
मृतकों के शरीरके संसर्गसे दुर्गन्धित हवा चल रही थी और मांसाहारी पक्षियोंकी किलकिला ध्वनि ३६ | हो रही थी ॥ ३६ ॥
तब कालसे मोहित वह दुरात्मा दुर्मुख अत्यन्त क्रुद्ध हो उठा और गर्वके साथ अपनी सुन्दर भुजा ३७ । उठाकर देवीसे कहने लगा -॥३७ ॥
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अ ० १३ ]
गच्छ चण्डि हनिष्यामि त्वामद्यैव सुबालिशे ।
दैत्यं वा भज वामोरु महिषं मदगर्वितम् ॥
देव्युवाच
आसन्नमरणः कामं प्रलपस्यद्य मोहितः ।
अद्यैव त्वां हनिष्यामि यथायं बाष्कलो हतः ॥
गच्छ वा तिष्ठ वा मन्द मरणं यदि रोचते ।
हत्वा त्वां वै वधिष्यामि बालिशं महिषीसुतम् ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या दुर्मुखो मर्तुमुद्यतः ।
मुमोच बाणवृष्टिं तु चण्डिकां प्रति दारुणाम् ॥
सापि तां तरसा छित्त्वा बाणवृष्टिं शितैः शरैः ।
जघान दानवं क्रुद्धा वृत्रं वज्रधरो यथा ॥
तयोः परस्परं युद्धं सञ्जातं चातिकर्कशम् ।
भयदं कातराणाञ्च शूराणां बलवर्धनम् ॥
देवी चिच्छेद तरसा धनुस्तस्य करे स्थितम् ।
तथैव पञ्चभिर्बाणैर्बभञ्ज रथमुत्तमम् ॥
रथे भग्ने महाबाहुः पदातिर्दुर्मुखस्तदा ।
गदां गृहीत्वा दुर्धर्षां जगाम चण्डिकां प्रति ॥
चकार स गदाघातं सिंहमौलौ महाबलः । न चचाल हरिः स्थानात्ताडितोऽपि महाबलः
अम्बिका तं समालोक्य गदापाणिं पुरः स्थितम् ।
खड्गेन शितधारेण शिरश्चिच्छेद मौलिमत् ॥
छिन्ने च मस्तके भूमौ पपात दुर्मुखो मृतः । जयशब्दं तदा चक्रुर्मुदिता निर्जरा भृशम् पञ्चम स्कन्ध ६०१ हे चण्डिके! हे मूर्ख बाले! भाग जाओ, नहीं तो मैं तुम्हें अभी मार डालूँगा अथवा हे वामोरु! ३८ मदसे मत्त महिषासुरको स्वीकार कर लो ॥३८ ॥
देवी बोलीं- अब तुम्हारी मृत्यु समीप है, तभी तुम मोहित होकर ऐसा प्रलाप कर रहे हो । अभी मैं तुम्हें भी उसी प्रकार मार डालूंगी, जैसे मैंने ३ ९ इस बाष्कलको मारा है ॥३ ९ ॥ हे मूर्ख! भाग जाओ और यदि तुम्हें मृत्यु अच्छी लगती हो तो रुके रहो । तुम्हें मारनेके बाद मैं ४० मूर्ख महिषासुरका भी संहार कर दूँगी ॥ ४० ॥
देवीका वह वचन सुनकर मरणोन्मुख दुर्मुख भगवती चण्डिकाके ऊपर भीषण बाण - वृष्टि करने
लगा ॥। ४१ ॥
४१ भगवतीने भी कुपित होकर अपने तीक्ष्ण बाणोंसे उस बाण - वृष्टिको तत्काल व्यर्थ करके उस दैत्यपर उसी प्रकार आघात किया, जैसे इन्द्रने वृत्रासुरपर ४२ किया था ॥ ४२ ॥
अब उन दोनोंमें बड़ा भीषण युद्ध आरम्भ हो गया, जो कायरोंके लिये भयदायक तथा वीरोंके लिये ४३ उत्साहवर्धक था ॥४३ ॥
देवीने बड़ी फुर्ती के साथ उसके हाथमें स्थित धनुषको काट डाला और उसी तरह अपने पाँच बाणोंसे उसके उत्तम रथको छिन्न - भिन्न कर दिया ॥ ४४ ॥
४४ रथके नष्ट हो जानेपर महाबाहु दुर्मुख अपनी भयानक गदा लेकर पैदल ही भगवती चण्डिकाकी ओर दौड़ा ॥४५ ॥
४५ [ उनके पास पहुँचकर ] उस महाबली दैत्यने सिंहके मस्तकपर गदासे प्रहार कर दिया, किंतु महाशक्तिशाली सिंह गदासे मारे जानेपर भी अपने ॥ ४६ स्थानसे विचलित नहीं हुआ ॥४६ ॥
उसी समय जगदम्बाने हाथमें गदा लिये हुए उस दुर्मुखको सम्मुख उपस्थित देखकर अपनी तीक्ष्ण धारवाली तलवारसे उसके किरीटयुक्त मस्तकको ४७ काट दिया ॥ ४७ ॥
मस्तक कट जानेपर दुर्मुख जमीनपर गिर पड़ा और मर गया । तब देवता परम प्रसन्न होकर देवी की ॥ ४८ जय - जयकार करने लगे ॥ ४८ ॥