देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 71–80
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 71–80
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६२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ५
अरुणोदयवेलायां स्नायाच्छौचं विधाय च ।
सन्ध्यातर्पणकार्यञ्च नित्यं संक्षेपतश्चरेत् ॥
कथाश्रवणयोग्यत्वसिद्धये गाश्च दापयेत् ।
समस्तविघ्नहर्तारमादौ गणपतिं यजेत् ॥
कलशांश्चापि संस्थाप्य पूजयेत्तत्र दिग्भवान् ।
वटुकं क्षेत्रपालञ्च योगिनीर्मातृकास्तथा ॥
तुलसीञ्चापि सम्पूज्य ग्रहान्विष्णुञ्च शङ्करम् ।
नवाक्षरेण मनुना पूजयेज्जगदम्बिकाम् ॥
सर्वोपचारैः सम्पूज्य श्रीभागवतपुस्तकम् ।
श्रीदेव्या वाङ्मयीं मूर्तिं यथावच्छोभनाक्षरम् ॥
कथाविघ्नोपशान्त्यर्थं वृणुयात्पञ्च वाडवान् ।
जाप्यो नवार्णमन्त्रस्तैः पाठ्यः सप्तशतीस्तवः ॥
प्रदक्षिणनमस्कारान्कृत्वान्ते स्तुतिमाचरेत् ।
कात्यायनि महामाये भवानि भुवनेश्वरि ॥
संसारसागरे मग्नं मामुद्धर कृपामये ।
ब्रह्मविष्णुशिवाराध्ये प्रसीद जगदम्बिके ॥
मनोऽभिलषितं देवि वरं देहि नमोऽस्तु ते ।
इति सम्प्रार्थ्य शृणुयात्कथां नियतमानसः ॥
वक्तारञ्चापि सम्पूज्य व्यासबुध्या यतात्मवान् ।
माल्यालङ्कारवस्त्राद्यैः सम्भूष्य प्रार्थयेच्च तम् ॥
सर्वशास्त्रेतिहासज्ञ व्यासरूप नमोऽस्तु ते ।
कथाचन्द्रोदयेनान्तस्तमः स्तोमं निराकुरु ॥
तदग्रे तु नवाहान्तं कर्तव्या नियमास्तदा ।
विप्रादीनुपवेश्यादौ सम्पूज्योपविशेत्स्वयम् ॥
उस दिन शौचादिसे निवृत्त हो अरुणोदयवेलामें २५ ही स्नान कर लेना चाहिये । सन्ध्या तथा तर्पण आदि नित्यकर्म संक्षेपमें ही करना चाहिये ॥ २५ ॥
तत्पश्चात् कथाश्रवणका अधिकारी बननेके २६ लिये गोदान करे और सब विघ्नोंको दूर करनेवाले श्रीगणेशजीका सर्वप्रथम पूजन करे । कलश स्थापन करके वहाँ दस दिक्पालों, बटुक, क्षेत्रपाल, सभी योगिनियों और मातृकाओंका भी पूजन करे । तुलसी, २७ नवग्रह, विष्णु तथा शिवजीका पूजन करके नवाक्षरमन्त्रसे जगदम्बाका पूजन करना चाहिये ॥ २६ - २८ ॥ २८ तत्पश्चात् सुन्दर अक्षरोंमें लिखी हुई भगवतीकी वाङ्मयी मूर्तिस्वरूप श्रीमद्देवीभागवत-पुस्तककी सभी उपचारोंसे विधिवत् पूजा करके कथाकी निर्विघ्न समाप्तिके लिये पाँच विद्वान् २ ९ ब्राह्मणोंका वरण करना चाहिये । उनसे निरन्तर नवार्णमन्त्रका जप एवं दुर्गासप्तशतीका पाठ कराना चाहिये ॥ २ ९ -३० ॥ ३० अन्तमें प्रदक्षिणा तथा नमस्कारके बाद इस प्रकार स्तुति करे - ' हे कात्यायनि! हे महामाये! हे भुवनेश्वरि! हे कृपामये! हे भवानि! मैं संसार-३१ सागरमें डूब रहा हूँ; मेरा उद्धार कीजिये तथा हे ब्रह्मा, विष्णु, महेशसे पूजनीया माता जगदम्बिके! मेरे ऊपर प्रसन्न होइये । हे देवि! आप मुझे मनोवांछित ३२ वर प्रदान कीजिये; आपको बार - बार प्रणाम है । इस प्रकार प्रार्थना करके स्वस्थचित्त होकर कथा सुने ॥ ३१–३३ ॥ ३३ उस समय संयतचित्त होकर वक्ताको साक्षात् व्यास समझकर विधिवत् उनकी पूजा करे और वस्त्राभूषण तथा माला आदि पहनाकर उनसे प्रार्थना करे - ' समस्त शास्त्र तथा पुराणेतिहासके ज्ञाता हे ३४ व्यासजी! आपको नमस्कार है । आप कथारूपी चन्द्रमाकी ज्योतिसे हमारे अन्तःकरणके अन्धकारसमूहको नष्ट कीजिये ' ॥ ३४-३५ ॥ ३५ इसके बाद नवाहके नियमोंका व्रत ले और ब्राह्मणोंका यथाशक्ति पूजन करके उन्हें पहले यथास्थान बैठा दे, तत्पश्चात् स्वयं भी अपने आसनपर बैठ ३६ | जाय ॥ ३६ ॥
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अ ० ५ ] श्रोतव्यं सावधानेन चतुर्वर्गफलाप्तये गृहपुत्रकलत्राप्तधनचिन्तामपास्य च सूर्योदयं समारभ्य किञ्चित्सूर्येऽवशेषिते मुहूर्तमात्रं विश्रम्य मध्याह्ने वाचयेत्सुधीः मलमूत्रजयायैषां लघु भोजनमिष्यते हविष्यान्नं वरं भोज्यं सकृदेव कथार्थिना अथवा स्यात्फलाहारी पयोभुग्वा घृताशनः यथा स्यान्न कथाविघ्नस्तथा कार्यं विचक्षणैः कथाश्रवणनिष्ठानां वक्ष्यामि नियमं द्विजाः ब्रह्मविष्णुमहेशानां मध्ये ये भेददर्शिनः देवभक्तिविहीना ये पाखण्डा हिंसकाः खलाः विप्रद्रुहो नास्तिका ये न ते योग्याः कथाश्रवे ब्रह्मस्वहरणे लुब्धाः परदारधनेषु च देवस्वहरणे तेषां नाधिकारः कथाश्रवे ब्रह्मचारी च भूशायी सत्यवक्ता जितेन्द्रियः कथासमाप्तौ भुञ्जीत पत्रावल्यां यतात्मवान् वृन्ताकञ्च कलिन्दञ्च तैलञ्च द्विदलं मधु दग्धमन्नं पर्युषितं भावदुष्टं त्यजेद् व्रती आमिषञ्च मसूरान्नमुदक्यादृष्टमेव च रसोनं मूलकं हिङ्गु पलाण्डुं गृञ्जनं तथा कूष्माण्डं नलिकाशाकं न भुञ्जीत कथाव्रती कामं क्रोधं मदं लोभं दम्भं मानञ्च वर्जयेत् विप्रध्रुक्पतितव्रात्यश्वपाकयवनान्त्यजैः उदक्यया वेदबाह्यैर्न वदेद्यः कथाव्रती माहात्म्य ६३ । तब सावधान मनसे चारों पुरुषार्थ ( धर्म, ॥ ३७ अर्थ, काम एवं मोक्ष ) - फलको प्राप्त करनेके लिये पुत्र - कलत्र, धन - धान्य तथा गृहकी चिन्ता छोड़कर । कथा सुने ॥ ३७ ॥
॥ ३८ विद्वान् वक्ताको चाहिये कि वह सूर्योदयसे आरम्भ करके पुनः दोपहर में दो घड़ी विश्राम करके सूर्यास्त के । कुछ समय पहलेतक कथा - वाचन करे ॥ ३८ ॥
मल - मूत्र वेगको रोकनेके लिये स्वल्पाहार ॥ ३ ९ उत्तम होता है । कथार्थीको दिन - रातमें केवल एक बार हविष्यान्नका भोजन करना ही ठीक । है; अथवा फलाहार करे या केवल दूध - घीके ॥ ४० आहारपर ही रहे । बुद्धिमान्को चाहिये कि ऐसा आहार ग्रहण करे, जिससे कथामें किसी प्रकारकी
।
बाधा न हो ॥ ३ ९ -४० ॥
॥ ४१ हे द्विजगण! अब मैं कथाश्रवणमें निष्ठा रखनेवालोंके नियम बताता हूँ । जो लोग ब्रह्मा, विष्णु । और शिवमें भेददृष्टि रखते हैं, देवीकी भक्तिसे रहित ॥ ४२ हैं, जो पाखण्डी, हिंसक तथा दुष्ट हैं और जो ब्राह्मणोंसे द्वेष रखनेवाले तथा नास्तिक हैं, वे । कथा श्रवणके योग्य नहीं हैं ॥ ४१-४२ ॥ ॥४३ जो परस्त्री, पराया धन, ब्राह्मणधन तथा देव-सम्पत्तिके हरणमें लुब्ध रहते हैं, उनका कथाश्रवणमें । अधिकार नहीं है ॥ ४३ ॥
॥ ४४ श्रोताको चाहिये कि वह ब्रह्मचर्यका पालन करे, पृथ्वीपर सोये, सत्य बोले, जितेन्द्रिय रहे तथा कथाकी । समाप्तिपर संयमपूर्वक पत्तलपर भोजन करे ॥ ४४ ॥
॥ ४५ व्रतीको बैगन, बहेड़ा ( कलिन्द ), तेल, दाल, मधु और जला हुआ, बासी तथा भावदूषित अन्नका । त्याग कर देना चाहिये ॥ ४५ ॥
कथा सुननेवाला व्रती मांस, मसूर, रजस्वला ॥ ४६ स्त्रीका देखा हुआ खाद्यान्न, लहसुन, मूली, हींग, प्याज, गाजर, कोहड़ा और करमीका साग न खाये ॥ काम, क्रोध, मद, लोभ, पाखण्ड और अहंकारको ॥ ४७ छोड़ दे ॥ ४६-४७ ॥ विप्रद्रोही, पतित, संस्कारहीन, चाण्डाल, यवन, 1 अन्त्यज, रजस्वला स्त्री और वेदविहीन मनुष्योंसे ॥ ४८ । कथाव्रतीको वार्तालाप नहीं करना चाहिये ॥ ४८ ॥
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वेदगोगुरुविप्राणां स्त्रीराज्ञां महतां तथा ।
देवानां देवभक्तानां न निन्दां शृणुयादपि ॥
विनयं चार्जवं शौचं दयां च मितभाषणम् ।
उदारं मानसञ्चैव कुर्याद्यस्तु कथाव्रती ॥
श्वित्री कुष्ठी क्षयी रुग्णो भाग्यहीनश्च पापकृत् दरिद्रश्चानपत्यश्च भक्तयेमां शृणुयात्कथाम् ॥ वन्ध्या वा काकवन्ध्या वा दुर्भगा वा मृतार्भका । पतद्गर्भाङ्गना या च ताभिः श्राव्या तथा कथा धर्मार्थकाममोक्षांश्च यो वाञ्छति विना श्रमम् भगवत्या भागवतं श्रोतव्यं तेन यत्नतः कथादिनानि चैतानि नवयज्ञैः समानि हि श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ५ श्रोताको चाहिये कि वह वेद, गौ, गुरु, ब्राह्मण, स्त्री, राजा, महापुरुष, देवताओं और देवभक्तोंकी ४ ९ निन्दा कभी न सुने ॥ ४ ९ ॥ जो कथाव्रती हो उसे सर्वदा विनयशील, सरलचित्त, पवित्र, दयालु, कम बोलनेवाला तथा उदार मनवाला ५० होना चाहिये ॥ ५० ॥
श्वेतकुष्ठी, कुष्ठी, क्षयरोगी, अभागा, पापी, । दरिद्र तथा सन्तानहीन मनुष्य इस कथाको भक्तिपूर्वक सुने ॥५१ ॥
५१ जो स्त्री वन्ध्या, काकवन्ध्या ( जिस स्त्रीको एक बार सन्तान होकर बन्द हो जाय ), अभागिन तथा मृतवत्सा हो और जिसका गर्भ गिर जाता हो, ॥ ५२ ऐसी सभी स्त्रियोंको इस देवीभागवतकथाका श्रवण करना चाहिये ॥ ५२ ॥
। जो मनुष्य बिना परिश्रमके ही धर्म, अर्थ, काम ॥ ५३ और मोक्ष प्राप्त करना चाहता है, वह यत्नपूर्वक इस देवीभागवतकी कथा अवश्य सुने ॥ ५३ ॥
। इस नवाहकथाके नौ दिन नौ यज्ञोंके समान हैं 1 उनमें किया गया दान, हवन तथा जप अनन्त फल तेषु दत्तं हुतं जप्तमनन्तफलदं भवेत् ॥५४ देनेवाला होता है ॥५४ ॥
एवं व्रतं नवाहं तु कृत्वोद्यापनमाचरेत् महाष्टमीव्रतं यद्वत्तथा कार्यं फलेप्सुभिः निष्कामाः श्रवणेनैव पूता मुक्तिं व्रजन्ति हि भोगमोक्षप्रदा नॄणां यतो भगवती परा पुस्तकस्य च वक्तुश्च पूजा कार्या तु नित्यशः । वक्त्रा दत्तं प्रसादं तु गृह्णीयाद्भक्तिपूर्वकम् कुमारी: पूजयेन्नित्यं भोजयेत्प्रार्थयेच्च यः सुवासिनीश्च विप्रांश्च तस्य सिद्धिर्न संशयः गायत्र्या नाम साहस्त्रं समाप्तावथ वा पठेत् । विष्णोर्नामसहस्रञ्च सर्वदोषोपशान्तये इस प्रकार नवाहव्रत करके उसका उद्यापन । करना चाहिये । फलकी कामना करनेवाले पुरुषोंको ॥ ५५ महाष्टमीव्रतके उद्यापनकी भाँति नवाहव्रतका भी उद्यापन करना चाहिये ॥ ५५ ॥
। निष्काम व्यक्ति कथाके श्रवणमात्रसे पवित्र होकर मुक्ति पा जाते हैं; क्योंकि परा भगवती ॥ ५६ मनुष्योंको भोग और मोक्ष सब कुछ देनेवाली हैं ॥५६ ॥
पुस्तक और कथावाचक — दोनोंकी प्रतिदिन पूजा करनी चाहिये और वक्ताद्वारा दिया हुआ प्रसाद ॥ ५७ भक्तिपूर्वक ग्रहण करना चाहिये ॥५७ ॥
नवाह - यज्ञमें जो श्रोता नित्य कुमारी कन्याओं, । सुहागिन स्त्रियों तथा ब्राह्मणोंको भोजन कराता तथा उनसे प्रार्थना करता है, उसकी कार्यसिद्धि अवश्य हो ॥ ५८ जाती है, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ५८ ॥
सभी त्रुटियोंकी शान्तिके निमित्त कथासमाप्तिके दिन गायत्रीसहस्रनाम अथवा विष्णुसहस्रनामका पाठ ॥ ५ ९ करना चाहिये ॥ ५ ९ ॥
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अ ० ५ ]
यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु ।
न्यूनं सम्पूर्णतां याति तस्माद्विष्णुञ्च कीर्तयेत् ॥
देव्याः सप्तशतीमन्त्रैः समाप्तौ होममाचरेत् ।
देवीमाहात्म्यमूलेन नवार्णमनुनाथवा ॥
गायत्र्या त्वथवा होमः पायसेन ससर्पिषा ।
यतो भागवतं त्वेतद् गायत्रीमयमीरितम् ॥
वाचकं तोषयेत्सम्यग्वस्त्रभूषाधनादिभिः ।
प्रसन्ने वाचके सर्वाः प्रसन्नास्तस्य देवताः ॥
ब्राह्मणान्भोजयेद्भक्त्या दक्षिणाभिश्च तोषयेत् ।
पृथिव्यां देवरूपास्ते तुष्टेष्वेष्वीप्सितं फलम् ॥
सुवासिनी: कुमारीश्च देवीभक्त्या च भोजयेत् ।
ताभ्योऽपि दक्षिणां दत्त्वा प्रार्थयेत्सिद्धिमात्मनः ॥
दद्याद्दानानि चान्यानि सुवर्णं गाः पयस्विनीः ।
हयानिभान्मेदिनीञ्च तस्य स्यादक्षयं फलम् ॥
देवीभागवतं चैतल्लिखितं शोभनाक्षरम् ।
हेमसिंहासने स्थाप्य पट्टवस्त्रेण वेष्टितम् ॥
अष्टम्यां वा नवम्याञ्च वाचकायार्चिताय च ।
दद्यात्स भोगान्भुक्त्वेह दुर्लभं मोक्षमाप्नुयात् ॥
दरिद्रो दुर्बलो बालस्तरुणो जरठोऽपि वा ।
पुराणवेत्ता वन्द्यः स्यात्पूज्यो मान्यश्च सर्वदा ॥
सन्ति लोकस्य बहवो गुरवो गुणजन्मतः ।
सर्वेषामपि तेषाञ्च पुराणज्ञः परो गुरुः ॥
पौराणिको ब्राह्मणस्तु व्यासासनसमाश्रितः ।
आसमाप्ते प्रसङ्गे तु नमस्कुर्यान्न कस्यचित् ॥
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे । माहात्म्य ६५ जिनके स्मरण तथा नामकीर्तनसे तप, यज्ञ, ६० क्रिया आदिमें न्यूनता समाप्त हो जाती है, उन विष्णुभगवान्का नाम - कीर्तन करना चाहिये ॥ ६० ॥
कथासमाप्तिके दिन दुर्गासप्तशतीके मन्त्रोंसे ६१ अथवा देवीमाहात्म्यके मूलपाठसे या नवार्ण * मन्त्रसे होम करना चाहिये अथवा घृतसहित पायसद्वारा गायत्री मन्त्रका उच्चारण करके हवन करे; क्योंकि यह श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण गायत्रीमय कहा गया ६२ है ॥ ६१-६२ ॥ कथावाचकको वस्त्र, भूषण, धन आदिके द्वारा सन्तुष्ट करे; क्योंकि कथावाचकके प्रसन्न होनेपर ६३ सभी देवता उसपर प्रसन्न हो जाते हैं ॥६३ ॥
श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणोंको भोजन कराये और नानाविध दक्षिणाओंसे उन्हें सन्तुष्ट करे; क्योंकि वे विप्र ६४ पृथ्वीपर देवताके स्वरूप हैं । उनके सन्तुष्ट होनेपर वांछित फल प्राप्त होता है ॥ ६४ ॥
सुहागिन स्त्रियों तथा कुमारी कन्याओंको साक्षात् ६५ देवी समझकर उन्हें भोजन कराये और उन्हें दक्षिणा देकर अपने मनोरथकी सिद्धिके लिये प्रार्थना करे ॥ ६५ ॥
सुवर्ण, दूध देनेवाली गौ, हाथी, घोड़े और ६६ भूमिका दान करना चाहिये; क्योंकि उसका अक्षय फल होता है ॥ ६६ ॥
सुन्दर अक्षरोंमें लिखी देवीभागवतकी पुस्तकको ६७ रेशमी वस्त्रमें लपेटकर उसे सुवर्णनिर्मित सिंहासनपर रखकर अष्टमी या नवमी तिथिको विधिपूर्वक कथावाचकको दान करना चाहिये । ऐसा करनेसे वह ६८ इस संसारमें सभी सुखोंको भोगकर अन्तमें दुर्लभ मोक्ष प्राप्त करता है ॥ ६७-६८ ॥ पुराणको जाननेवाला वक्ता चाहे दरिद्र हो, ६ ९ दुर्बल हो, बालक हो, युवक हो अथवा वृद्ध हो, वह सर्वदा वन्दनीय पूज्य एवं मान्य होता है ॥ ६ ९ ॥ यद्यपि संसारमें जन्म अथवा गुणके कारण अनेक ७० गुरु हैं, परंतु पुराणका ज्ञाता उन सबमें श्रेष्ठ गुरु है ॥ ७० ॥
व्यासके आसनपर बैठा हुआ पौराणिक ब्राह्मण जबतक कथा समाप्त न हो जाय, तबतक किसीको ७१ भी प्रणाम न करे ॥ ७१ ॥
1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] -3 A
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६६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ५
पौराणिक कथां दिव्यां येऽपि शृण्वन्त्यभक्तितः ।
तेषां पुण्यफलं नास्ति दुःखदारिद्र्यभागिनाम् ॥
असम्पूज्य पुराणं तु ताम्बूलकुसुमादिभिः ।
ये शृण्वन्ति कथां देव्यास्ते दरिद्रा भवन्ति हि ॥
कीर्त्यमानां कथां त्यक्त्वा ये व्रजन्त्यन्यतो नराः ।
भोगान्तरे प्रणश्यन्ति तेषां दाराश्च सम्पदः ॥
ये च तुङ्गासनारूढाः कथां शृण्वन्ति दाम्भिकाः ।
ते वायसा भवन्त्यत्र भुक्त्वा निरययातनाम् ॥
ये चाढ्यासनसंस्थाश्च ये वीरासनसंस्थिताः ।
शृण्वन्ति च कथां दिव्यां ते स्युरर्जुनशाखिनः ॥
कथायां कीर्त्यमानायां ये वदन्ति दुरुत्तरम् ।
रासभास्ते भवन्तीह कृकलासास्ततः परम् ॥
निन्दन्ति ये पुराणज्ञान् कथां वा पापहारिणीम् ।
ते तु जन्मशतं दुष्टाः शुनकाः स्युर्न संशयः ॥
शृण्वन्ति कथां वक्तुः समानासनसंस्थिताः ।
गुरुतल्पसमं पापं लभन्ते नरकालयाः ॥
ये चाप्रणम्य शृण्वन्ति ते भवन्ति विषद्रुमाः ।
शयाना ये s पि शृण्वन्ति भवन्त्यजगराहयः ॥
ये कदाचन पौराणीं न शृण्वन्ति कथां नराः ।
ते घोरं नरकं भुक्त्वा भवन्ति वनसूकराः ॥
ये कथां नानुमोदन्ते विघ्नं कुर्वन्ति ये शठाः ।
कोट्यब्दं निरयं भुक्त्वा भवन्ति ` ग्रामसूकरा: ॥
आसनं भाजनं द्रव्यं फलं वस्त्राणि कम्बलम् ।
पुराणज्ञाय यच्छन्ति ते व्रजन्ति हरेः पदम् ॥
1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] – 3 B जो लोग इस दिव्य पौराणिक कथाको श्रद्धारहित ७२ होकर सुनते हैं, उन दुःख तथा दारिद्र्य - युक्त मनुष्योंको कथाश्रवणका पुण्य - फल प्राप्त नहीं होता ॥ ७२ ॥
जो लोग ताम्बूल, पुष्प आदि उपचारोंसे पुराणका पूजन किये बिना ही देवीकी कथा सुनते ७३ हैं, वे दरिद्र होते हैं और जो लोग कथाके बीचमें ही उसे छोड़कर अन्यत्र चले जाते हैं, कुछ ही समय बाद उनकी सम्पदाएँ एवं स्त्री आदि नष्ट हो ७४ जाती हैं ॥ ७३-७४ ॥ जो अभिमानवश व्याससे ऊँचे स्थानपर बैठकर कथा सुनते हैं, वे नरक - यातना भोगकर इस लोकमें ७५ कौएकी योनि पाते हैं ॥७५ ॥
जो बहुमूल्य आसनपर अथवा वीरासनसे बैठकर दिव्य कथाका श्रवण करते हैं, वे ' अर्जुन ' ७६ वृक्ष होते हैं ॥७६ ॥
कथा होते समय जो लोग व्यर्थ तर्क - वितर्क करते हैं, वे इस लोकमें पहले गर्दभयोनिमें ७७ तत्पश्चात् गिरगिटकी योनिमें जाते हैं ॥ ७७ ॥
जो लोग पुराण जाननेवालोंकी अथवा पापनाशिनी कथाकी निन्दा करते हैं, वे सैकड़ों जन्मतक दुष्ट ७८ कुत्ते होते हैं; इसमें सन्देह नहीं है ॥७८ ॥
जो लोग कथावाचकके बराबर आसनपर बैठकर कथा सुनते हैं, उन्हें गुरुके आसनपर बैठनेका पाप ७ ९ लगता है और वे नरकमें वास करते हैं । जो लोग वक्ताको प्रणाम किये बिना ही कथा सुनने लगते हैं, वे जन्मान्तरमें विषैले वृक्ष होते हैं । इसी प्रकार जो लोग लेटे - लेटे कथा सुनते हैं; वे अजगर, साँप ८० योनि पाते हैं ॥ ७ ९ -८० ॥ जो मनुष्य कभी भी पुराणकी कथा नहीं सुनते, वे घोर नरक भोगकर बनैले सूअरकी ८१ यौनिमें जाते हैं । जो शठ मनुष्य कथाका अनुमोदन नहीं करते अपितु उसमें विघ्न डाला करते हैं, वे करोड़ों वर्षोंतक नरक - यातना भोगकर अन्तमें ८२ ग्रामसूकर होते हैं ॥ ८१-८२ ॥ जो लोग पुराणवेत्ताको आसन, पात्र, द्रव्य, फल, वस्त्र तथा कम्बल प्रदान करते हैं, वे भगवान्के ८३ । परम पदको प्राप्त करते हैं ॥८३ ॥
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अ ०५ ]
पुराणपुस्तकस्यापि ये पट्टवसनं नवम् ।
प्रयच्छन्ति शुभं सूत्रं ते नराः सुखभागिनः ॥
पुराणानां तु सर्वेषां श्रवणाद्यत्फलं लभेत् ।
तस्माच्छतगुणं पुण्यं देवीभागवताल्लभेत् ॥
यथा सरित्सु प्रवरा गङ्गा देवेषु शङ्करः ।
काव्ये रामायणं यद्वज्ज्योतिष्मत्सु यथा रविः ॥
आह्लादकानां चन्द्रश्च धनानाञ्च यथा यशः ।
क्षमावतां यथा भूमिर्गाम्भीर्ये सागरो यथा ॥
मन्त्राणां चैव सावित्री पापनाशे हरिस्मृतिः ।
अष्टादशपुराणानां देवीभागवतं तथा ॥
येन केनाप्युपायेन नवकृत्वः शृणोति चेत् ।
न शक्यं तत्फलं वक्तुं जीवन्मुक्तः स एव हि ॥
राजशत्रुभये प्राप्ते महामारीभये तथा ।
दुर्भिक्षे राष्ट्रभङ्गे च तच्छान्त्यै शृणुयादिदम् ॥
भूतप्रेतविनाशाय राज्यलाभाय शत्रुतः ।
पुत्रलाभाय शृणुयाद्देवीभागवतं द्विजाः ॥
श्रीमद्भागवतं यस्तु पठेद्वा शृणुयादपि ।
श्लोकार्थं श्लोकपादं वा स याति परमां गतिम् ॥
भगवत्या स्वयं देव्या श्लोकार्थेन प्रकाशितम् ।
शिष्यप्रशिष्यद्वारेण तदेव विपुलीकृतम् ॥
न गायत्र्याः परो धर्मो न गायत्र्याः परं तपः । न गायत्र्याः समो देवो न गायत्र्याः परो मनुः ।
गातारं त्रायते यस्माद् गायत्री तेन सोच्यते ।
सात्र भागवते देवी सरहस्या प्रतिष्ठिता ॥
अतो भागवतस्यास्य देव्याः प्रीतिकरस्य च ।
महान्त्यपि पुराणानि कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥
माहात्म्य ६७ जो मनुष्य पुराणपुस्तकके लिये नवीन ८४ रेशमी वस्त्र तथा सुन्दर सूत्रका दान करते हैं, वे सुखी रहते हैं ॥ ८४ ॥
सभी पुराणोंके सुननेसे जो फल प्राप्त होता है, ८५ उससे सौगुना पुण्य श्रीमद्देवीभागवतपुराणके श्रवणसे होता है ॥ ८५ ॥
जिस प्रकार नदियोंमें गंगा श्रेष्ठ हैं; देवताओंमें ८६ शिव, काव्योंमें वाल्मीकीय रामायण तथा तेजस्वियोंमें भगवान् सूर्य श्रेष्ठ हैं; और जैसे आनन्द देनेवालोंमें चन्द्रमा, सब धनोंमें सुयश, क्षमाशीलोंमें पृथ्वी, गम्भीरतामें ८७ समुद्र, मन्त्रोंमें गायत्री तथा पापनाशके उपायोंमें भगवत्स्मरण श्रेष्ठ है, उसी प्रकार अठारहों पुराणोंमें यह श्रीमद्देवीभागवतपुराण सर्वश्रेष्ठ है ॥ ८६ -८८ ॥ ८८ जिस किसी भी उपायसे यदि कोई मनुष्य इस महापुराणकी नौ आवृत्तियाँ सुन ले तो उसके फलका वर्णन नहीं किया जा सकता, वह तो जीवन्मुक्त ही ८ ९ हो जाता है ॥ ८ ९ ॥ किसी शत्रु राजासे भय होनेपर, महामारीके समय, अकाल पड़नेपर तथा राष्ट्र - भंगके अवसरपर ९ ० उसकी शान्तिके लिये यह पुराण सुनना चाहिये ॥ ९ ० ॥ हे विप्रो! भूत - प्रेतादिके शमनके लिये, शत्रुसे राज्य प्राप्त करनेके लिये और पुत्र - प्राप्तिके लिये ९ १ श्रीमद्देवीभागवतका श्रवण करना चाहिये ॥९ १ ॥ जो देवीभागवतके आधे श्लोक या चौथाई
श्लोकको भी प्रतिदिन सुनता या पढ़ता है, वह
९ २ परमगतिको प्राप्त होता है ॥ ९ २ ॥
स्वयं भगवती जगदम्बाने इस पुराणको सर्वप्रथम केवल आधे श्लोकमें ही प्रकाशित किया, वही बादमें ९ ३ शिष्य - प्रशिष्योंके द्वारा देवीभागवतके रूपमें विस्तृत कर दिया गया ॥ ९ ३ ॥ गायत्रीसे बढ़कर न कोई धर्म है, न तप है, न ९ ४ कोई देवता है और न कोई मन्त्र ही है ॥९ ४ ॥ भगवती अपना गुणगान करनेवालेकी रक्षा करती हैं, इसी कारणसे उन्हें गायत्री कहा जाता है । वे ९ ५ भगवती गायत्री इस पुराणमें अपने रहस्योंसहित विराजती हैं । अतः भगवतीको प्रसन्न करनेवाले इस देवीभागवतकी सोलहवीं कलाके समान भी अन्य ९ ६ महापुराण नहीं हो सकते॥९ ५ - ९ ६ ॥ 1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] -3 C
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६८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ५ श्रीमद्भागवतं पुराणममलं यद् ब्राह्मणानां धनं धर्मो धर्मसुतेन यत्र गदितो नारायणेनामलः । गायत्र्याश्च रहस्यमत्र च मणिद्वीपश्च संवर्णितः श्रीदेव्या हिमभूभृते भगवती गीता च गीता स्वयम् ॥ ९ ७
तस्मान्नास्य पुराणस्य लोकेऽन्यत्सदृशं परम् ।
अतः सदैव संसेव्यं देवीभागवतं द्विजाः ॥ ९ ८
यस्याः प्रभावमखिलं न हि वेद धाता
नो वा हरिर्न गिरिशो न हि चाप्यनन्तः ।
अंशांशका अपि च ते किमुतान्यदेवा-स्तस्यै नमोऽस्तु सततं जगदम्बिकायै ॥ ९९
यत्पादपङ्कजरजः समवाप्य विश्वं
ब्रह्मा सृजत्यनुदिनञ्च बिभर्ति विष्णुः ।
रुद्रश्च संहरति नेतरथा समर्था-स्तस्यै नमोऽस्तु सततं जगदम्बिकायै ॥ १००
सुधाकूपारान्तस्त्रिदशतरुवाटीविलसिते मणिद्वीपे चिन्तामणिमयगृहे चित्ररुचिरे । विराजन्तीमम्बां परशिवहृदि स्मेरवदनां नरो ध्यात्वा भोगं भजति खलु मोक्षञ्च लभते ॥ १०१ ब्रह्मेशाच्युतशक्राद्यैर्महर्षिभिरुपासिता I जगतां श्रेयसे सास्तु मणिद्वीपाधिदेवता ॥ १०२ । श्रीमद्देवीभागवतपुराण अत्यन्त निर्मल है । जो ब्राह्मणोंका अमूल्य धन है और जिसमें स्वयं धर्मपुत्र नारायणने पवित्र धर्मका वर्णन किया है । इसमें श्रीगायत्रीदेवीका रहस्य एवं मणिद्वीपका सम्यक् वर्णन किया गया है । साथ ही इसमें हिमालयके प्रति स्वयं भगवतीद्वारा कही गयी देवीगीता विद्यमान है ॥ ९ ७ ॥ इस कारण हे विप्रो! इस महापुराणके सदृश दूसरा कोई उत्तम पुराण लोकमें नहीं है, अतः आपलोग सदा इस श्रीमद्देवीभागवतका भलीभाँति सेवन करें ॥ ९ ८ ॥ जिनके सम्पूर्ण प्रभावको ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा भगवान् शेष भी भलीभाँति नहीं जान सकते जबकि वे उन्हींके अंशज भी हैं, कैसे जान सकेंगे? उन भगवती निरन्तर प्रणाम है ॥ ९९ ॥
जिनके चरण - कमलोंकी समस्त संसारकी रचना करते निरन्तर पालन करते हैं और रुद्र किसी उपायसे वे अपना - अपना तब दूसरे देवता उन्हें जगदम्बिकाको मेरा धूलि पाकर ब्रह्मा हैं, भगवान् विष्णु संहार करते हैं; दूसरे कार्य करनेमें समर्थ नहीं हो सकते – ऐसी उन भगवती जगदम्बिकाको मेरा सतत प्रणाम है ॥ १०० ॥
अमृत - सागरके तटपर कल्पवृक्षकी वाटिकासे सुशोभित मणिद्वीपमें स्थित बहुवर्णचित्रित चिन्ता-मणिमय भवनमें तथा परम शिवके हृदयमें विराजमान रहनेवाली और मन्द - मन्द मुसकानयुक्त मुखमण्डलवाली जगदम्बाका ध्यान करके मनुष्य सांसारिक सुखों का उपभोग करता है और अन्तमें निश्चय ही मोक्ष प्राप्त करता है ॥ १०१ ॥
इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र - आदि देवताओं एवं समस्त महर्षियोंद्वारा पूजित मणि-द्वीपनिवासिनी वे भगवती संसारका कल्याण करती रहें ॥ १०२ ॥
इति श्रीस्कन्दपुराणे मानसखण्डे श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्ये देवीभागवत-श्रवणविधिवर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
॥ समाप्तमिदं श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्यम् ॥ 1897 श्रीमद्देवी .... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] – 3 D
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॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण [ पूर्वार्ध ] प्रथमः स्कन्धः अथ प्रथमोऽध्यायः महर्षि शौनकका सूतजीसे श्रीमद्देवीभागवतपुराण सुनानेकी प्रार्थना करना
ॐ सर्वचैतन्यरूपां तामाद्यां विद्यां च धीमहि ।
बुद्धिं या नः प्रचोदयात् ॥ १
शौनक उवाच
सूत सूत महाभाग धन्योऽसि पुरुषर्षभ ।
यदधीतास्त्वया सम्यक् पुराणसंहिताः शुभाः ॥ २
अष्टादश पुराणानि कृष्णेन मुनिनानघ ।
कथितानि सुदिव्यानि पठितानि त्वयानघ ॥
पञ्चलक्षणयुक्तानि सरहस्यानि मानद ।
त्वया ज्ञातानि सर्वाणि व्यासात्सत्यवतीसुतात् ॥ ४
अस्माकं पुण्ययोगेन प्राप्तस्त्वं क्षेत्रमुत्तमम् ।
दिव्यं विश्वसनं पुण्यं कलिदोषविवर्जितम् ॥ ५
समाजोऽयं मुनीनां हि श्रोतुकामोऽस्ति पुण्यदाम् ।
पुराणसंहितां सूत ब्रूहि त्वं नः समाहितः ॥ ६
दीर्घायुर्भव सर्वज्ञ तापत्रयविवर्जितः ।
कथाद्य महाभाग पुराणं ब्रह्मसम्मितम् ॥ ७
श्रोत्रेन्द्रिययुताः सूत नराः स्वादविचक्षणाः ।
न शृण्वन्ति पुराणानि वञ्चिता विधिना हि ते ॥ ८
यथा जिह्वेन्द्रियाह्लादः षड्रसैः प्रतिपद्यते ।
तथा श्रोत्रेन्द्रियाह्लादो वचोभिः सुधियां स्मृतः ॥ ९
जो सर्वचेतनास्वरूपा, आदिशक्ति तथा ब्रह्मविद्या-स्वरूपिणी भगवती जगदम्बा हैं, उनका हम ध्यान करते हैं । वे हमारी बुद्धिको प्रेरणा प्रदान करें ॥ १ ॥
शौनक बोले- हे पुरुषोंमें श्रेष्ठ तथा भाग्यवान् सूतजी! आप धन्य हैं; क्योंकि संसारमें अत्यन्त दुर्लभ पुराण - संहिताओं का आपने भलीभाँति अध्ययन किया है । हे पुण्यात्मन्! हे मानद! आपने कृष्णद्वैपायन व्यासरचित अठारह महापुराणोंका सम्यक् अध्ययन किया है, जो पंच लक्षणोंसे युक्त तथा गूढ रहस्योंसे समन्वित हैं और जिनका आपने सत्यवतीपुत्र व्यासजीसे ज्ञान प्राप्त किया है । २-४ ॥ हमारे पुण्यसे ही आप इस उत्तम, मुनियोंके निवास - योग्य, दिव्य, पुण्यप्रद तथा कलिके दोषोंसे रहित क्षेत्रमें पधारे हुए हैं । हे सूतजी! मुनियोंका यह समुदाय परम पुण्यदायिनी पुराण - संहिताका श्रवण करना चाहता है । अतः आप समाहितचित्त होकर हमलोगों से उसका वर्णन कीजिये ॥ ५-६ ॥ हे सर्वज्ञ! आप तीनों तापों ( दैहिक, दैविक, भौतिक ) - से रहित होकर दीर्घजीवी हों । हे महाभाग! ब्रह्मप्रतिपादक देवीभागवतमहापुराणका वर्णन करें ॥ ७ ॥
सूतजी! जो मनुष्य श्रवणेन्द्रिययुक्त होते हुए भी केवल जिह्वाके स्वादमें ही लगे रहते हैं और पुराणोंकी कथाएँ नहीं सुनते, वे निश्चित ही अभागे हैं । जैसे षड्रसके स्वादसे जिह्वाको आह्लाद होता है, वैसे विद्वज्जनोंके वचनोंसे कर्णेन्द्रियको आनन्द प्राप्त | होता है ॥८ - ९ ॥
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७० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १
अश्रोत्राः फणिनः कामं मुह्यन्ति हि नभोगुणैः ।
सकर्णा ये न शृण्वन्ति तेऽप्यकर्णाः कथं न च ॥
अतः सर्वे द्विजाः सौम्य श्रोतुकामाः समाहिताः ।
वर्तन्ते नैमिषारण्ये क्षेत्रे कलिभयार्दिताः ॥
येन केनाप्युपायेन कालातिवाहनं स्मृतम् ।
व्यसनैरिह मूर्खाणां बुधानां शास्त्रचिन्तनैः ॥
शास्त्राण्यपि विचित्राणि जल्पवादयुतानि च । ( त्रिविधानि पुराणानि शास्त्राणि विविधानि च । वितण्डाच्छलयुक्तानि गर्वामर्षकराणि च ॥ ) नानार्थवादयुक्तानि हेतुमन्ति बृहन्ति च ॥
सात्त्विकं तत्र वेदान्तं मीमांसा राजसं मतम् ।
तामसं न्यायशास्त्रं च हेतुवादाभियन्त्रितम् ॥
तथैव च पुराणानि त्रिगुणानि कथानकैः ।
कथितानि त्वया सौम्य पञ्चलक्षणवन्ति च ॥
तत्र भागवतं पुण्यं पञ्चमं वेदसम्मितम् ।
कथितं यत्त्वया पूर्वं सर्वलक्षणसंयुतम् ॥
उद्देशमात्रेण तदा कीर्तितं परमाद्भुतम् ।
मुक्तिप्रदं मुमुक्षूणां कामदं धर्मदं तथा ॥
विस्तरेण तदाख्याहि पुराणोत्तममादरात् ।
श्रोतुकामा द्विजाः सर्वे दिव्यं भागवतं शुभम् ॥
त्वं तु जानासि धर्मज्ञ पौराणीं संहितां किल ।
कृष्णोक्तां गुरुभक्तत्वात् सम्यक् सत्त्वगुणाश्रयः ॥
श्रुतान्यन्यानि सर्वज्ञ त्वन्मुखान्निःसृतानि च ।
नैव तृप्तिं व्रजामोऽद्य सुधापाने मरा यथा ॥
जब कर्णहीन सर्प भी मधुर ध्वनि सुनकर मोहित १० हो जाते हैं, तब भला कर्णयुक्त मानव यदि कथा नहीं सुनते तो उन्हें बधिर क्यों न कहा जाय? ॥ १० ॥
अतः हे सौम्य! समाहितचित्त होकर कथा सुननेकी इच्छासे सभी द्विजगण कलिकालके भयसे ११ पीड़ित हो इस नैमिषारण्यमें उपस्थित हैं ॥११ ॥
जिस किसी प्रकार से समय तो बीतता ही रहता है, किंतु मूर्खोका समय व्यर्थ दुर्व्यसनोंमें बीतता है १२ और विद्वानोंका समय शास्त्र - चिन्तनमें जाता है ॥ १२ ॥
शास्त्र भी विचित्र प्रकारके तर्क - वितर्कसे युक्त हैं । ( पुराण तीन प्रकारके तथा शास्त्र विविध प्रकारके हैं, जो नानाविध वाद - विवाद तथा छल - प्रपंचसे युक्त हैं और अहंकार तथा अमर्ष उत्पन्न करनेवाले हैं ) वे अनेक अर्थवाद तथा हेतुवादसे युक्त और बहुत १३ विस्तारवाले हैं ॥ १३ ॥
उन शास्त्रोंमें वेदान्तशास्त्र सात्त्विक, मीमांसा राजस तथा न्यायशास्त्र तामस कहा गया है; क्योंकि १४ वह हेतुवादसे परिपूर्ण है ॥१४ ॥
इसी प्रकार हे सौम्य! आपके द्वारा कहे गये पुराण कथा - भेदसे तीन गुणोंवाले तथा पाँच लक्षणोंसे समन्वित हैं ॥ १५ ॥
१५ आपने यह भी बताया है कि उन पुराणोंमें यह श्रीमद्देवीभागवत पाँचवाँ पुराण है, पवित्र है, वेदके समान है और सभी लक्षणोंसे युक्त है ॥ १६ ॥
१६ उस समय आपने प्रसंगवश अत्यन्त अद्भुत, मुमुक्षुजनोंके लिये मुक्तिप्रद, मनोरथ पूर्ण करनेवाले, धर्ममें रुचि उत्पन्न करनेवाले जिस पुराणको संक्षेपमें १७ कहा था, उस उत्तम पुराणको विस्तारपूर्वक कहिये । उस दिव्य तथा कल्याणमय श्रीमद्देवीभागवतपुराणको हम सभी द्विजगण आदरपूर्वक सुननेकी इच्छा रखते हैं ॥ १७-१८ ॥ १८ हे धर्मज्ञ! गुरुभक्त एवं सत्त्वगुणसे सम्पन्न होनेके कारण आप कृष्णद्वैपायनके द्वारा कही गयी इस प्राचीन संहिताका ज्ञान प्राप्त कर चुके हैं ॥ १ ९ ॥ १ ९ जिस प्रकार देवतालोग अमृतपान करते हुए तृप्त नहीं होते, उसी प्रकार हमलोगोंने भी यहाँ आपके मुखारविन्दसे निकली अन्यान्य कथाएँ सुनीं, किंतु २० । अभी भी हम तृप्त नहीं हुए हैं ॥ २० ॥
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अ ० २ ] प्रथम
धिक्सुधां पिबतां सूत मुक्तिर्नैव कदाचन ।
पिबन्भागवतं सद्यो नरो मुच्येत सङ्कटात् ॥ २१
सुधापाननिमित्तं यत् कृता यज्ञाः सहस्रशः ।
न शान्तिमधिगच्छामः सूत सर्वात्मना वयम् ॥ २२
मखानां हि फलं स्वर्गः स्वर्गात्प्रच्यवनं पुनः ।
एवं संसारचक्रेऽस्मिन्भ्रमणं च निरन्तरम् ॥ २३
विना ज्ञानेन सर्वज्ञ नैव मुक्तिः कदाचन ।
भ्रमतां कालचक्रेऽत्र नराणां त्रिगुणात्मके ॥ २४
अतः सर्वरसोपेतं पुण्यं भागवतं वद ।
पावनं मुक्तिदं गुह्यं मुमुक्षूणां सदा प्रियम् ॥ २५
स्कन्ध ७१ हे सूतजी! उस अमृतको धिक्कार है, जिसके पीनेसे कभी मुक्ति नहीं होती, परंतु इस भागवतरूपी कथा- - सुधाके पानसे तो मनुष्य शीघ्र ही भवसंकटसे मुक्त हो जाता है ॥ २१ ॥
हे सूतजी! अमृतपानके लिये जो हजारों प्रकारके यज्ञ किये गये हैं, उनसे भी सर्वदाके लिये हमें शान्ति नहीं मिली । यज्ञोंका फल तो केवल स्वर्ग है, [ पुण्य क्षीण होनेपर ] पुनः स्वर्गसे मृत्युलोकमें लौटना ही पड़ता है । इस प्रकार निरन्तर आवागमनके चक्र में आना - जाना लगा रहता है ॥ २२-२३ ॥ हे सर्वज्ञ! त्रिगुणात्मक कालचक्रमें भ्रमण करते हुए मनुष्योंकी ज्ञानके बिना मुक्ति कदापि सम्भव नहीं है । इसलिये सब प्रकारके रसोंसे परिपूर्ण तथा पुण्यप्रद श्रीमद्देवीभागवतपुराण कहिये; जो पवित्र, मुक्तिदायक, गोपनीय तथा मुमुक्षुजनोंको सर्वदा प्रिय है ॥ २४-२५ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे शौनकप्रश्नो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
अथ द्वितीयोऽध्यायः सूतजीद्वारा श्रीमद्देवीभागवतके निरूपण और उसमें सूत उवाच
धन्योऽहमतिभाग्योऽहं पावितोऽहं महात्मभिः ।
यत्पृष्टं सुमहत्पुण्यं पुराणं वेदविश्रुतम् ॥
तदहं सम्प्रवक्ष्यामि सर्वश्रुत्यर्थसम्मतम् ।
रहस्यं सर्वशास्त्राणामागमानामनुत्तमम् ॥
नत्वा तत्पदपङ्कजं सुललितं मुक्तिप्रदं योगिनां ब्रह्माद्यैरपि सेवितं स्तुतिपरैर्थ्येयं मुनीन्द्रैः सदा । वक्ष्याम्यद्य सविस्तरं बहुरसं श्रीमत्पुराणोत्तमं भक्त्या सर्वरसालयं भगवतीनाम्ना प्रसिद्धं द्विजाः ॥ स्कन्ध, अध्याय तथा श्लोकसंख्याका प्रतिपादित विषयोंका वर्णन सूतजी बोले - [ हे मुनिजनो! ] मैं धन्य और महान् भाग्यशाली हूँ, जो कि आप महात्माओंने वेदविश्रुत तथा अत्यन्त पुण्यप्रद श्रीमद्देवीभागवत महापुराणके १ सम्बन्धमें प्रश्न करके मुझे पवित्र बना दिया ॥ १ ॥
इसलिये मैं सभी वेदोंके तात्पर्यसे युक्त, सभी शास्त्रों और आगमोंके रहस्यरूप सर्वोत्तम श्रीमद्देवी-भागवतपुराणको आपलोगोंसे कहता हूँ ॥२ ॥
२ हे द्विजगण! ब्रह्मा - विष्णु - महेशसे सेवित, स्तुतिपरायण मुनिजनोंके सतत ध्यान करनेयोग्य तथा योगियोंको मुक्ति देनेवाले भगवतीके सुन्दर एवं कोमल चरणकमलोंमें प्रणाम करके मैं अब उस उत्तम पुराणका भक्तिपूर्वक विस्तारसे वर्णन करूँगा; जो सभी रसोंसे युक्त, शोभासम्पन्न, सभी रसोंका निधान ३ । एवं श्रीमद्देवीभागवतके नामसे प्रसिद्ध है ॥ ३ ॥