देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 661–670
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 661–670
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६५२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २३ अथ त्रयोविंशोऽध्यायः भगवतीके श्रीविग्रहसे कौशिकीका प्राकट्य, देवीकी कालिकारूपमें परिणति, चण्ड - मुण्डसे देवीके अद्भुत सौन्दर्यको सुनकर शुम्भका सुग्रीवको दूत बनाकर भेजना, जगदम्बाका व्यास उवाच
एवं स्तुता तदा देवी दैवतैः शत्रुतापितैः ।
स्वशरीरात्परं रूपं प्रादुर्भूतं चकार ह ॥
पार्वत्यास्तु शरीराद्वै निःसृता चाम्बिका यदा ।
कौशिकीत समस्तेषु ततो लोकेषु पठ्यते ॥
निःसृतायां तु तस्यां सा पार्वती तनुव्यत्ययात् ।
कृष्णरूपाथ सञ्जाता कालिका सा प्रकीर्तिता ॥
मषीवर्णा महाघोरा दैत्यानां भयवर्धिनी ।
कालरात्रीति सा प्रोक्ता सर्वकामफलप्रदा ॥
अम्बिकायाः परं रूपं विरराज मनोहरम् ।
सर्वभूषणसंयुक्तं लावण्यगुणसंयुतम् ॥
ततोऽम्बिका तदा देवानित्युवाच ह सस्मिता ।
तिष्ठन्तु निर्भया यूयं हनिष्यामि रिपुनिह ॥
कार्यं वः सर्वथा कार्यं विहरिष्याम्यहं रणे ।
निशुम्भादीन्वधिष्यामि युष्माकं सुखहेतवे ॥
इत्युक्त्वा सा तदा देवी सिंहारूढा मदोत्कटा कालिकां पार्श्वतः कृत्वा जगाम नगरे रिपोः ॥
सा गत्वोपवने तस्थावम्बिका कालिकान्विता ।
जगावथ कलं तत्र जगन्मोहनमोहनम् ॥
विवाहके विषयमें अपनी शर्त बताना व्यासजी बोले - [ हे राजन्! ] तब शत्रुओंसे सन्त्रस्त देवताओंके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवतीने अपने शरीरसे एक दूसरा रूप प्रकट १ कर दिया ॥ १ ॥
जब भगवती पार्वतीके विग्रहकोशसे अम्बिका प्रकट हुईं, तब वे सम्पूर्ण जगत्में ' कौशिकी ' इस २ नामसे कही जाने लगीं । पार्वतीके शरीरसे उन भगवती कौशिकीके निकल जानेसे शरीर क्षीण हो जानेके कारण वे पार्वती कृष्णवर्णकी हो गयीं । अतः वे ३ कालिका नामसे विख्यात हुईं ॥ २-३ ॥ वे कालिका स्याहीके समान काले वर्णकी थीं तथा महाभयंकर प्रतीत होती थीं । दैत्योंके लिये भयवर्धिनी तथा [ भक्तोंके लिये ] समस्त मनोरथ पूर्ण ४ करनेवाली वे भगवती ' कालरात्रि ' इस नामसे पुकारी जाने लगीं ॥४ ॥
समस्त आभूषणोंसे मण्डित और लावण्यगुणसे ५ सम्पन्न वह भगवतीका दूसरा रूप ( कौशिकी ) अत्यन्त मनोहर प्रतीत हो रहा था ॥ ५ ॥
तदनन्तर अम्बिकाने मुसकराकर देवताओंसे यह कहा - आपलोग निर्भय रहें, मैं आपके शत्रुओंका वध ६ अभी कर डालूंगी । आपलोगोंका कार्य मुझे सम्यक् प्रकार से सम्पन्न करना है । मैं समरांगण में विचरण करूँगी और आपलोगोंके कल्याणके लिये निशुम्भ ७ आदि दानवोंका संहार करूँगी॥६-७ ॥ तब ऐसा कहकर गर्वोन्मत्त वे भगवती कौशिकी सिंहपर सवार हो गयीं और देवी कालिकाको साथमें लेकर शत्रुके नगरकी ओर चल पड़ीं ॥ ८ ॥
८ कालिकासहित देवी अम्बिका वहाँ पहुँचकर नगरके उपवनमें रुक गयीं । तत्पश्चात् उन्होंने जगत्को मोहमें डालनेवालेको भी मोहित करनेवाला गीत गाना ९ । आरम्भ कर दिया ॥ ९ ॥
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अ ० २३ ] पञ्चम
श्रुत्वा तन्मधुरं गानं मोहमीयुः खगा मृगाः ।
मुदञ्च परमां प्रापुरमरा गगने स्थिताः ॥ १०
तस्मिन्नवसरे तत्र दानवौ शुम्भसेवकौ ।
चण्डमुण्डाभिधौ घोरौ रममाणौ यदृच्छया ॥ ११
आगतौ ददृशाते तु तां तदा दिव्यरूपिणीम् ।
अम्बिकां गानसंयुक्तां कालिकां पुरतः स्थिताम् ॥ १२
दृष्ट्वा तां दिव्यरूपाञ्च दानवौ विस्मयान्वितौ ।
जग्मतुस्तरसा पार्श्वं शुम्भस्य नृपसत्तम ॥ १३
तौ गत्वा तं समासीनं दैत्यानामधिपं गृहे ।
ऊचतुर्मधुरां वाणीं प्रणम्य शिरसा नृपम् ॥ १४
राजन् हिमालयात्कामं कामिनी काममोहिनी ।
सम्प्राप्ता सिंहमारूढा सर्वलक्षणसंयुता ॥ १५
नेदृशी देवलोकेऽस्ति न गन्धर्वपुरे तथा ।
न दृष्टा न श्रुता क्वापि पृथिव्यां प्रमदोत्तमा ॥ १६
गानञ्च तादृशं राजन् करोति जनरञ्जनम् ।
मृगास्तिष्ठन्ति तत्पार्श्वे मधुरस्वरमोहिताः ॥ १७
ज्ञायतां कस्य पुत्रीयं किमर्थमिह चागता ।
गृह्यतां राजशार्दूल तव योग्यास्ति कामिनी ॥ १८
ज्ञात्वानय गृहे भार्यां कुरु कल्याणलोचनाम् ।
निश्चितं नास्ति संसारे नारी त्वेवंविधा किल ॥ १ ९
देवानां सर्वरत्नानि गृहीतानि त्वया नृप ।
कस्मान्नेमां वरारोहां प्रगृह्णासि नृपोत्तम ॥ २०
इन्द्रस्यैरावतः श्रीमान्पारिजाततरुस्तथा ।
गृहीतोऽश्वः सप्तमुखस्त्वया नृप बलात्किल ॥ २१
स्कन्ध ६५३ उस मधुर गानको सुनकर पशु - पक्षी भी मोहित हो गये और आकाशमण्डलमें स्थित देवतागण अत्यन्त आनन्दित हो उठे ॥ १० ॥
उसी समय शुम्भके चण्ड तथा मुण्ड नामक दो सेवक जो भयंकर दानव थे, स्वेच्छापूर्वक घूमते हुए वहाँ आ गये । उन्होंने देखा कि दिव्य स्वरूपवाली भगवती अम्बिका गायनमें लीन हैं और कालिका उनके सम्मुख विराजमान हैं ॥ ११-१२ ॥ हे नृपश्रेष्ठ! उन दिव्य रूपवाली भगवतीको देखकर दोनों दानव विस्मयमें पड़ गये । वे तुरंत शुभके पास जा पहुँचे ॥ १३ ॥
अपने महलमें बैठे हुए उस दानवराज शुम्भ पास जाकर उन दोनोंने सिर झुकाकर राजाको प्रणाम करके मधुर वाणीमें कहा— ॥१४ ॥
हे राजन्! कामदेवको भी मोहित कर देनेवाली एक सुन्दरी हिमालयसे यहाँ आयी हुई है । वह सिंहपर सवार है तथा सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न है ॥ १५ ॥
ऐसी उत्तम स्त्री न स्वर्गमें है और न गन्धर्वलोकमें । सम्पूर्ण पृथ्वीपर ऐसी सुन्दरी न तो कहीं देखी गयी और न सुनी ही गयी ॥ १६ ॥
हे राजन्! वह ऐसा गाती है कि उसके गानेपर सभी मुग्ध हो जाते हैं । उसके मधुर स्वरसे मोहित होकर मृग भी उसके पास बैठे रह जाते हैं ॥ १७ ॥
हे नृपश्रेष्ठ! अब आप यह पता लगाइये कि यह किसकी पुत्री है और किसलिये यहाँ आयी हुई है? [ उसके बाद ] उसे अपने यहाँ रख लीजिये; क्योंकि वह सुन्दरी आपके योग्य है ॥ १८ ॥
यह जानकारी प्राप्त करके आप उस सुन्दर नेत्रोंवाली स्त्रीको अपने घर ले आइये और अपनी भार्या बना लीजिये; क्योंकि ऐसी स्त्री निश्चितरूपसे संसारमें नहीं है ॥ १ ९ ॥ हे राजन्! आप देवताओंके सम्पूर्ण रत्न अपने अधिकारमें कर चुके हैं, तो फिर हे नृपश्रेष्ठ! इस सुन्दरीको भी आप अपने अधिकारमें क्यों नहीं कर | लेते? ॥ २० ॥
हे राजन्! आपने बलपूर्वक इन्द्रका ऐश्वर्ययुक्त ऐरावत हाथी, पारिजात वृक्ष और सप्तमुखवाला । उच्चैः श्रवा घोड़ा छीन लिया ॥ २१ ॥
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६५४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २३
विमानं वैधसं दिव्यं मरालध्वजसंयुतम् ।
त्वयात्तं रत्नभूतं तद्बलेन नृप चाद्भुतम् ॥
कुबेरस्य निधिः पद्मस्त्वया राजन् समाहृतः ।
छत्रं जलपतेः शुभ्रं गृहीतं तत्त्वया बलात् ॥
पाशश्चापि निशुम्भेन भ्रात्रा तव नृपोत्तम ।
गृहीतोऽस्ति हठात्कामं वरुणस्य जितस्य च ॥
अम्लानपङ्कजां तुभ्यं मालां जलनिधिर्ददौ ।
भयात्तव महाराज रत्नानि विविधानि च ॥
मृत्योः शक्तिर्यमस्यापि दण्डः परमदारुणः ।
त्वया जित्वा हृतः कामं किमन्यद्वर्ण्यते नृप ॥
कामधेनुर्गृहीताद्य वर्तते सागरोद्भवा ।
मेनकाद्या वशे राजंस्तव तिष्ठन्ति चाप्सराः ॥
एवं सर्वाणि रत्नानि त्वयात्तानि बलादपि ।
कस्मान्न गृह्यते कान्तारत्नमेषा वराङ्गना ॥
सर्वाणि ते गृहस्थानि रत्नानि विशदान्यथ ।
अनया सम्भविष्यन्ति रत्नभूतानि भूपते ॥
त्रिषु लोकेषु दैत्येन्द्र नेदृशी वर्तते प्रिया ।
तस्मात्तामानयाशु त्वं कुरु भार्यां मनोहराम् ॥
व्यास उवाच
इति श्रुत्वा तयोर्वाक्यं मधुरं मधुराक्षरम् ।
प्रसन्नवदनः प्राह सुग्रीवं सन्निधौ स्थितम् ॥
गच्छ सुग्रीव दूतत्वं कुरु कार्यं विचक्षण ।
वक्तव्यञ्च तथा तत्र यथाभ्येति कृशोदरी ॥
उपायौ द्वौ प्रयोक्तव्यौ कान्तासु सुविचक्षणैः ।
सामदाने इति प्राहुः शृङ्गाररसकोविदाः ॥
हे नृप! आपने ब्रह्माजीके हंसध्वजसम्पन्न, २२ दिव्य तथा रत्नमय अद्भुत विमानको बलपूर्वक अपने अधिकारमें कर लिया ॥ २२ ॥
हे राजन्! आपने बलपूर्वक कुबेरकी पद्म नामक निधिको छीन लिया है और वरुणके श्वेत छत्रको २३ अपने अधिकारमें कर लिया है ॥२३ ॥
हे नृपश्रेष्ठ! आपके भाई निशुम्भने भी वरुणको पराजित करके उसके पाशको हठपूर्वक २४ छीन लिया है ॥२४ ॥
हे महाराज! आपके भयसे समुद्रने कभी भी न मुरझानेवाली कमल- - पुष्पोंकी माला और विविध २५ प्रकारके रत्न आपको प्रदान किये हैं ॥ २५ ॥
आपने मृत्युको जीतकर उसकी शक्तिको तथा यमराजको जीतकर उसके अति भीषण दण्डको अपने २६ पूर्ण अधिकारमें कर लिया है । हे राजन्! आपके पराक्रमका और क्या वर्णन किया जाय? समुद्रसे प्रादुर्भूत कामधेनु आपने छीन ली, जो इस समय २७ आपके पास विद्यमान है । हे राजन्! मेनका आदि अप्सराएँ भी आपके अधीन पड़ी हुई हैं ॥ २६-२७ ॥ इस प्रकार जब आपने सभी रत्न बलपूर्वक छीन २८ लिये हैं, तब नारियोंमें रत्नस्वरूपा इस सुन्दरीको भी अपने अधिकारमें क्यों नहीं कर लेते? ॥ २८ ॥
हे भूपते! आपके गृहमें विद्यमान समस्त विपुल २ ९ रत्न इस सुन्दरीसे सुशोभित होकर यथार्थरूपमें रत्नस्वरूप हो जायँगे ॥ २ ९ ॥ हे दैत्यराज! तीनों लोकोंमें ऐसी सुन्दरी स्त्री ३० नहीं है । अतः आप उस मनोहारिणी स्त्रीको शीघ्र ले आइये और अपनी भार्या बना लीजिये ॥ ३० ॥
व्यासजी बोले – चण्ड - मुण्डके मधुमय अक्षरोंसे युक्त यह मधुर वचन सुनकर प्रसन्न मुखमण्डल-वाला शुम्भ अपने समीपमें बैठे हुए सुग्रीवसे ३१ कहने लगा – ॥३१ ॥
हे बुद्धिसम्पन्न सुग्रीव! तुम दूत बनकर जाओ और मेरा यह कार्य सम्पन्न करो । वहाँ तुम ऐसी बातचीत ३२ करना, जिससे वह कृशोदरी यहाँ आ जाय ॥ ३२ ॥
बुद्धिमान् पुरुषोंको स्त्रियोंके विषयमें साम और दान- - इन दो उपायोंका प्रयोग करना चाहिये- ऐसा ३३ । शृंगाररसके विद्वानोंने कहा है ॥ ३३ ॥
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अ ० २३ ] पञ्चम स्कन्ध ६५५
भेदे प्रयुज्यमानेऽपि रसाभासस्तु जायते ।
निग्रहे रसभङ्गः स्यात्तस्मात्तौ दूषितौ बुधैः ॥
सामदानमुखैर्वाक्यैः श्लक्ष्णैर्नर्मयुतैस्तथा ॥
का न याति वशे दूत कामिनी कामपीडिता ॥
व्यास उवाच
सुग्रीवस्तु वचः श्रुत्वा शुम्भोक्तं सुप्रियं पटु ।
जगाम तरसा तत्र यत्रास्ते जगदम्बिका ॥
सोऽपश्यत्सुमुखीं कान्तां सिंहस्योपरि संस्थिताम् ।
प्रणम्य मधुरं वाक्यमुवाच जगदम्बिकाम् ॥
दूत उवाच
वरोरु त्रिदशारातिः शुम्भः सर्वाङ्गसुन्दरः ।
त्रैलोक्याधिपतिः शूरः सर्वजिद्राजते नृपः ॥
तेनाहं प्रेषितः कामं त्वत्सकाशं महात्मना ।
त्वद्रूपश्रवणासक्तचित्तेनातिविदूयता ॥
वचनं तस्य तन्वङ्गि शृणु प्रेमपुरःसरम् ।
प्रणिपत्य यथा प्राह दैत्यानामधिपस्त्वयि ॥
देवा मया जिताः सर्वे त्रैलोक्याधिपतिस्त्वहम् ।
यज्ञभागानहं कान्ते गृह्णामीह स्थितः सदा ॥
हृतसारा कृता नूनं द्यौर्मया रत्नवर्जिता ।
यानि रत्नानि देवानां तानि चाहृतवानहम् ॥
भोक्ताहं सर्वरत्नानां त्रिषु लोकेषु भामिनि ।
वशानुगाः सुराः सर्वे मम दैत्याश्च मानवाः ॥
त्वद्गुणैः कर्णमागत्य प्रविश्य हृदयान्तरम् ।
त्वदधीनः कृतः कामं किङ्करोऽस्मि करोमि किम् ॥
भेदनीतिका प्रयोग करनेपर रसका आभासमात्र ३४ हो पाता है और दण्डनीतिका प्रयोग करनेपर रसभंग ही हो जाता है, अतः विद्वान् पुरुषोंने इन दोनोंको दोषपूर्ण बताया है ॥ ३४ ॥
दूत! ऐसी कौन स्त्री होगी, जो साम, दान-३५ इन मुख्य नीतियोंसे सम्पन्न, मधुर तथा हास-परिहाससे परिपूर्ण वाक्योंके द्वारा कामपीड़ित होकर वशमें न हो जाय ॥ ३५ ॥
व्यासजी बोले- शुम्भके द्वारा कही गयी ३६ अत्यन्त प्रिय तथा चातुर्यपूर्ण बात सुनकर सुग्रीव बड़े वेगसे उधर चल पड़ा, जहाँ जगदम्बिका विराजमान थीं ॥ ३६ ॥
३७ वहाँपर उसने देखा कि एक सुन्दर मुखवाली युवती सिंहपर सवार है । तब जगदम्बिकाको प्रणाम करके वह मधुर वाणीमें कहने लगा- ॥ ३७ ॥
दूत बोला -- हे सुजघने! देवताओंके शत्रु राजा शुम्भ सर्वांगसुन्दर और पराक्रमी हैं । सबको जीतकर ३८ वे तीनों लोकोंके अधिपति हो गये हैं ॥३८ ॥
आपके सौन्दर्यके विषयमें सुनकर आपपर आसक्त मनवाले उन्हीं महाराज शुम्भने व्याकुल ३ ९ होकर मुझे आपके पास भेजा है ॥ ३ ९ ॥ हे तन्वंग! दैत्यपति शुम्भने आपको प्रणाम करके जो प्रेमपूर्ण वचन कहा है, उनके उस वचनको ४० आप सुनें ॥ ४० ॥
हे कान्ते! मैंने सभी देवताओंको जीत लिया है, इस समय मैं तीनों लोकोंका स्वामी हूँ । मैं यहाँ रहते ४१ हुए सदा यज्ञभाग प्राप्त करता हूँ ॥४१ ॥
मैंने स्वर्गलोककी सभी सार वस्तुएँ छीन ली हैं और उसे रत्नविहीन कर दिया है । देवताओंके पास जो भी रत्न थे, उन सबको मैंने हर लिया है ॥ ४२ ॥
४२ हे भामिनि! तीनों लोकोंमें सभी रत्नोंका भोग करनेवाला एकमात्र मैं ही हूँ । देवता, दैत्य और मनुष्य – ये सब मेरे अधीन रहते हैं ॥ ४३ ॥
४३ तुम्हारे गुणोंने कानोंके मार्गसे मेरे हृदयमें प्रवेश करके मुझे पूर्णरूपसे तुम्हारे वशमें कर दिया है । अब मैं क्या करूँ? मैं तो तुम्हारा दास बन ४४ | गया हूँ ॥ ४४ ॥
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६५६ त्वमाज्ञापय रम्भोरु तत्करोमि वशानुगः दासोऽहं तव चार्वङ्गि रक्ष मां कामबाणतः भज मां त्वं मरालाक्षि तवाधीनं स्मराकुलम् । त्रैलोक्यस्वामिनी भूत्वा भुंक्ष्व भोगाननुत्तमान् तव चाज्ञाकरः कान्ते भवामि मरणावधि अवध्योऽस्मि वरारोहे सदेवासुरमानुषैः श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २३ । हे रम्भोरु! मैं तुम्हारे अधीन हूँ, तुम मुझे जो भी ॥ ४५ आज्ञा प्रदान करो, उसे मैं करूँगा । हे सुन्दर अंगोंवाली! मैं तुम्हारा दास हूँ, कामबाणसे मेरी रक्षा करो ॥ ४५ ॥
हे मरालाक्षि! तुम्हारे अधीन हुए मुझ कामातुरको ॥ ४६ तुम स्वीकार कर लो और तीनों लोकोंकी स्वामिनी बनकर उत्कृष्ट सुखोंका उपभोग करो ॥ ४६ ॥
। हे कान्ते! मैं मरणपर्यन्त तुम्हारी आज्ञाका ॥ ४७ पालन करूँगा । हे वरारोहे! मैं देवता, असुर तथा मनुष्योंसे अवध्य हूँ । हे सुमुखि! [ मुझे पति बनाकर ] सदा सौभाग्यसंयुक्ता भविष्यसि वरानने । तुम सदा सौभाग्यवती रहोगी । हे सुन्दरि! जहाँ यत्र ते रमते चित्तं तत्र क्रीडस्व सुन्दरि इति तस्य वचश्चित्ते विमृश्य मदमन्थरे वक्तव्यं यद्भवेत्प्रेम्णा तद् ब्रूहि मधुरं वचः शुम्भाय चञ्चलापाङ्गि तद् ब्रवीम्यहमाशु वै । व्यास उवाच तद्दूतवचनं श्रुत्वा स्मितं कृत्वा सुपेशलम् ॥ तं प्राह मधुरां वाचं देवी देवार्थसाधिका । देव्युवाच जानाम्यहं निशुम्भं च शुम्भं चातिबलं नृपम् ॥
जेतारं सर्वदेवानां हन्तारञ्चैव विद्विषाम् ।
राशिं सर्वगुणानाञ्च भोक्तारं सर्वसम्पदाम् ॥
दातारं चातिशूरं च सुन्दरं मन्मथाकृतिम् ।
द्वात्रिंशल्लक्षणैर्युक्तमवध्यं सुरमानुषैः ॥
ज्ञात्वा समागतास्म्यत्र द्रष्टुकामा महासुरम् ।
रत्नं कनकमायाति स्वशोभाधिकवृद्धये ॥
तत्राहं स्वपतिं द्रष्टुं दूरादेवागतास्मि वै ।
दृष्टा मया सुराः सर्वे मानवा भुवि मानदाः ॥
गन्धर्वा राक्षसाश्चान्ये ये चातिप्रियदर्शनाः ।
सर्वे शुम्भभयाद्भीता वेपमाना विचेतसः ॥
॥ ४८ तुम्हारा मन लगे, वहाँ विहार करना ॥ ४७-४८ ॥
मदसे अलसायी हुई हे कामिनि! [ मेरे स्वामी ] । उन शुम्भकी बातपर अपने मनमें भलीभाँति विचार ॥ ४ ९ करके तुम्हें जो कुछ कहना हो, उसे प्रेमपूर्वक मधुर वाणीमें कहो । हे चंचल कटाक्षवाली! मैं वह सन्देश तुरंत शुम्भसे निवेदन करूँगा ॥ ४ ९ ३ ॥ व्यासजी बोले - – दूतका वह वचन सुनकर ५० देवताओंका कार्य सिद्ध करनेवाली भगवती अत्यन्त मधुर मुसकान करके मीठी वाणीमें उससे कहने लगीं ॥ ५०३ ॥
देवी बोलीं- मैं महाबली राजा शुम्भ तथा ५१ निशुम्भ- दोनोंको जानती हूँ । उन्होंने सभी देवताओंको जीत लिया है और अपने शत्रुओंका संहार कर डाला है, वे सभी गुणोंकी राशि हैं और सब सम्पदाओंका ५२ भोग करनेवाले हैं । वे दानी, महापराक्रमी, सुन्दर, कामदेवसदृश रूपवाले, बत्तीस लक्षणोंसे सम्पन्न और देवताओं तथा मनुष्योंसे अवध्य हैं - यह जानकर मैं ५३ । उस महान् असुरको देखनेकी इच्छासे यहाँ आयी हूँ । जैसे रत्न अपनी शोभाको और अधिक बढ़ानेके लिये सुवर्णके पास आता है, वैसे ही मैं अपने पतिको ५४ देखनेके लिये दूरसे यहाँ आयी हूँ ॥ ५१ - ५४३ ॥ सभी देवताओं, पृथ्वीलोकमें मान प्रदान करनेवाले सभी मनुष्यों, गन्धर्वों, राक्षसों तथा देखनेमें सुन्दर ५५ लगनेवाले जो भी अन्य लोग हैं; उन सबको मैंने देख लिया है । सब - के - सब शुम्भके आतंकसे डरे हुए हैं, भयके मारे काँपते रहते हैं और सदा व्याकुल ५६ | रहते हैं॥५५-५६ ॥
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अ ० २४ ]
श्रुत्वा शुम्भगुणानत्र प्राप्तास्म्यद्य दिदृक्षया ।
गच्छ दूत महाभाग ब्रूहि शुम्भं महाबलम् ॥
निर्जने श्लक्ष्णया वाचा वचनं वचनान्मम ।
त्वां ज्ञात्वा बलिनां श्रेष्ठं सुन्दराणां च सुन्दरम् ॥
दातारं गुणिनं शूरं सर्वविद्याविशारदम् ।
जेतारं सर्वदेवानां दक्षं चोग्रं कुलोत्तरम् ॥
भोक्तारं सर्वरत्नानां स्वाधीनं स्वबलोन्नतम् । पतिकामास्म्यहं सत्यं तव योग्या नराधिप ।
स्वेच्छया नगरे तेऽत्र समायाता महामते ।
ममास्ति कारणं किञ्चिद्विवाहे राक्षसोत्तम ॥
बालभावाद् व्रतं किञ्चित्कृतं राजन् मया पुरा ।
क्रीडन्त्या च वयस्याभिः सहैकान्ते यदृच्छया ॥
स्वदेहबलदर्पेण सखीनां पुरतो रहः ।
मत्समानबलः शूरो रणे मां जेष्यति स्फुटम् ॥
तं वरिष्याम्यहं कामं ज्ञात्वा तस्य बलाबलम् ।
जहसुर्वचनं श्रुत्वा सख्यो विस्मितमानसाः ॥
किमेतया कृतं क्रूरं व्रतमद्भुतमाशु वै । तस्मात्त्वमपि राजेन्द्र ज्ञात्वा मे हीदृशं बलम् । जित्वा मां स्वबलेनात्र वाञ्छितं कुरु चात्मनः ।
त्वं वा तवानुजो भ्राता समेत्य समराङ्गणं ।
जित्वा मां समरेणात्र विवाहं कुरु सुन्दर ॥
पञ्चम स्कन्ध ६५७ शुम्भके गुण सुनकर उन्हें देखनेकी इच्छासे मैं ५७ इस समय यहाँ आयी हुई हूँ । हे महाभाग्यशाली दूत! तुम जाओ और महाबली शुम्भसे एकान्त स्थानमें मधुर वाणीमें मेरे शब्दोंमें यह बात कहो - हे राजन्! आपको ५८ बलवानोंमें सबसे बली, सुन्दरोंमें अति सुन्दर, दानी, गुणी, पराक्रमी, सभी विद्याओंमें पारंगत, सभी देवताओंको जीत लेनेवाला, कुशल, प्रतापी, श्रेष्ठ कुलवाला, समस्त ५ ९ रत्नोंका भोग करनेवाला, स्वतन्त्र तथा अपनी शक्तिसे समृद्धिशाली बना हुआ जानकर मैं आपको पति बनानेकी ६० इच्छुक हूँ । हे नराधिप! मैं भी निश्चितरूपसे आपके योग्य हूँ । हे महामते! मैं आपके इस नगरमें अपनी इच्छासे आयी हूँ । किंतु हे राक्षस श्रेष्ठ! मेरे विवाहमें ६१ कुछ शर्त है । हे राजन्! पूर्वमें मैंने सखियोंके साथ खेलते समय बालस्वभाववश अपने शारीरिक बलके ६२ अभिमानके कारण संयोगसे उन सखियोंके समक्ष एकान्तमें यह प्रतिज्ञा कर ली थी कि मेरे समान पराक्रम रखनेवाला जो वीर रणमें मुझे स्पष्टरूपसे जीत लेगा, उसके ६३ बलाबलको जानकर ही मैं पतिरूपमें उसका वरण करूँगी । मेरी यह बात सुनकर सखियोंके मनमें बड़ा विस्मय हुआ और वे जोर - जोर से हँसने लगीं । [ वे ६४ कहने लगीं ] ' इसने शीघ्रतापूर्वक यह कैसी भीषण तथा अद्भुत प्रतिज्ञा कर ली । ' अतएव हे राजेन्द्र! आप ६५ भी मेरे ऐसे पराक्रमको जानकर यहीं पर अपने बलसे मुझे जीतकर अपना मनोरथ पूर्ण कर लीजिये । हे सुन्दर! आप अथवा आपका छोटा भाई समरांगणमें आकर युद्धके द्वारा मुझे जीतकर [ मेरे साथ ] विवाह ६६ कर लें ॥ ५७–६६ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे देव्या सुग्रीवदूताय स्वव्रतकथनं नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥
अथ चतुर्विंशोऽध्यायः शुम्भका धूम्रलोचनको देवीके पास भेजना और धूम्रलोचनका देवीको समझानेका प्रयास करना व्यास उवाच व्यासजी बोले – भगवतीका वह वचन सुनकर देव्यास्तद्वचनं श्रुत्वा स दूतः प्राह विस्मितः । वह दूत विस्मित हो गया और उसने देवीसे कहा— हे सुन्दर कटाक्षवाली! तुम स्त्रीस्वभावके कारण किं ब्रूषे रुचिरापाङ्गि स्त्रीस्वभावाद्धि साहसात् ॥ १ साहसपूर्वक यह क्या बोल रही हो? ॥ १ ॥
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६५८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २४
इन्द्राद्या निर्जिता येन देवा दैत्यास्तथापरे ।
तं कथं समरे देवि जेतुमिच्छसि भामिनि ॥ २
त्रैलोक्ये तादृशो नास्ति यः शुम्भं समरे जयेत् ।
का त्वं कमलपत्राक्षि तस्याग्रे युधि साम्प्रतम् ॥ ३
अविचार्य न वक्तव्यं वचनं क्वापि सुन्दरि ।
बलं स्वपरयोर्ज्ञात्वा वक्तव्यं समयोचितम् ॥ ४
त्रैलोक्याधिपतिः शुम्भस्तव रूपेण मोहितः ।
त्वाञ्च प्रार्थयते राजा कुरु तस्येप्सितं प्रिये ॥ ५
त्यक्त्वा मूर्खस्वभावं त्वं सम्मान्य वचनं मम ।
भज शुम्भ निशुम्भं वा हितमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ६
शृङ्गारः सर्वथा सर्वैः प्राणिभिः परया मुदा ।
सेवनीयो बुद्धिमद्धिर्नवानामुत्तमो यतः ॥ ७
नागमिष्यसि चेद् बाले संक्रुद्धः पृथिवीपतिः ।
अन्यानाज्ञाकरान्प्रेष्य बलान्नेष्यति साम्प्रतम् ॥ ८
केशेष्वाकृष्य ते नूनं दानवा बलदर्पिताः ।
त्वां नयिष्यन्ति वामोरु तरसा शुम्भसन्निधौ ॥ ९
स्वलज्जां रक्ष तन्वङ्गि साहसं सर्वथा त्यज ।
मानिता गच्छ तत्पार्श्वे मानपात्रं यतोऽसि वै ॥ १०
क्व युद्धं निशितैर्बाणैः क्व सुखं रतिसङ्गजम् ।
सारासारं परिच्छेद्य कुरु मे वचनं पटु ॥ ११
भज शुम्भ निशुम्भं वा लब्धासि परमं सुखम् । हे भामिनि! हे देवि! जिन्होंने इन्द्र आदि देवताओं तथा अन्य दैत्योंको पराजित कर दिया है, उन्हें तुम संग्राममें जीतनेकी अभिलाषा कैसे रखती हो? ॥ २ ॥
त्रिलोकीमें वैसा कोई नहीं है, जो शुम्भको संग्राममें जीत सके; तब हे कमलसदृश नेत्रोंवाली! तुम कौन - सी सामर्थ्यशालिनी हो जो इस समय युद्धमें उनके सामने टिक सको? ॥ ३ ॥
हे सुन्दरि! बिना सोचे - समझे कोई बात नहीं बोलनी चाहिये, अपितु अपने तथा शत्रुके बलको जानकर ही समयके अनुसार बोलना चाहिये ॥४ ॥
तीनों लोकोंके अधिपति महाराज शुम्भ तुम्हारे रूपपर मोहित हो गये हैं और तुमसे प्रार्थना कर रहे हैं । अतः हे प्रिये! उनका मनोरथ पूर्ण करो ॥ ५ ॥
मूर्खतापूर्ण स्वभाव त्यागकर मेरी बातको मान करके तुम शुम्भ अथवा निशुम्भ किसीको [ पतिरूपमें ] स्वीकार कर लो; तुम्हारे लिये यह हितकर बात कह रहा हूँ ॥६ ॥
सभी बुद्धिमान् प्राणियोंको चाहिये कि बड़े हर्षके साथ शृंगाररसका उपभोग करें; क्योंकि यह । सभी नौ रसोंमें उत्तम माना गया है ॥ ७ ॥
हे बाले! यदि तुम मेरे साथ नहीं चलोगी तो राजा शुम्भ अत्यन्त कुपित होकर अन्य बहुत - से सेवकोंको अभी भेजकर तुम्हें बलपूर्वक पकड़वाकर ले जायँगे ॥ ८ ॥
हे वामोरु! वे बलाभिमानी दानव तुम्हारे केश-पाश पकड़कर बलपूर्वक तुम्हें निश्चय ही शुम्भ पास ले जायँगे ॥ ९ ॥
अतः हे कोमलांगी! अपनी लज्जाकी रक्षा करो और इस दुस्साहसको पूर्णरूपसे छोड़ दो । तुम सम्मानित होकर उनके पास चलो; क्योंकि तुम सम्मानकी पात्र हो ॥१० ॥
कहाँ तीक्ष्ण बाणोंसे होनेवाला युद्ध और कहाँ रतिक्रीड़ासे उत्पन्न होनेवाला सुख! सार - असार बातपर सही - सही विचार करके तुम मेरे हितकर वचनको मान लो और शुम्भ अथवा निशुम्भको अपना पति स्वीकार कर लो; इससे तुम परम सुख प्राप्त करोगी ॥ ११३ ॥
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अ ० २४ ] पञ्चम स्कन्ध ६५ ९ देव्युवाच सत्यं दूत महाभाग प्रवक्तुं निपुणो ह्यसि ॥
निशुम्भशुम्भौ जानामि बलवन्ताविति ध्रुवम् ।
प्रतिज्ञा मे कृता बाल्यादन्यथा सा कथं भवेत् ॥
तस्माद् ब्रूहि निशुम्भञ्च शुम्भं वा बलवत्तरम् ।
विना युद्धं न मे भर्ता भविता कोऽपि सौष्ठवात् ॥
जित्वा मां तरसा कामं करं गृह्णातु साम्प्रतम् । युद्धेच्छया समायातां विद्धि मामबलां नृप ।
युद्धं देहि समर्थोऽसि वीरधर्मं समाचर ।
बिभेषि मम शूलाच्चेत्पातालं गच्छ मा चिरम् ॥
त्रिदिवं च धरां त्यक्त्वा जीवितेच्छा यदस्ति ते ।
इति दूत वदाशु त्वं गत्वा स्वपतिमादरात् ॥
स विचार्य यथायुक्तं करिष्यति महाबलः ।
संसारे दूतधर्मोऽयं यत्सत्यं भाषणं किल ॥
शत्रौ पत्यौ च धर्मज्ञ तथा त्वं कुरु मा चिरम् । व्यास उवाच अथ तद्वचनं श्रुत्वा नीतिमद् बलसंयुतम् ॥
हेतुयुक्तं प्रगल्भञ्च विस्मितः प्रययौ तदा ।
गत्वा दैत्यपतिं दूतो विचार्य च पुनः पुनः ॥
प्रणम्य पादयोः प्रह्वः प्रत्युवाच नृपञ्च तम् ।
राजनीतिकरं वाक्यं मृदुपूर्वं प्रियं वचः ॥
दूत उवाच
सत्यं प्रियं च वक्तव्यं तेन चिन्तापरो ह्यहम् ।
सत्यं प्रियं च राजेन्द्र वचनं दुर्लभं किल ॥
अप्रियं वदतां कामं राजा कुप्यति सर्वथा ।
साक्षात्कुतः समायाता कस्य वा किंबलाबला ॥
देवी बोलीं- हे महाभाग दूत! तुम बात १२ करनेमें निपुण हो; यह सत्य है । शुम्भ और निशुम्भ निश्चय ही बलवान् हैं — यह मैं जानती हूँ । किंतु मैंने बाल्यकाल से ही जो प्रतिज्ञा कर रखी है, उसे मिथ्या १३ | कैसे किया जाय? अत: तुम निशुम्भसे अथवा उससे भी बलवान् शुम्भसे कह दो कि बिना युद्ध किये मात्र सौन्दर्यके बलपर कोई भी मेरा पति नहीं बन सकेगा । १४ मुझे अपने बलसे जीतकर वह अभी पाणिग्रहण कर ले । हे राजन्! आप यह जान लीजिये कि मैं अबला १५ होती हुई भी युद्धकी इच्छासे यहाँ आयी हूँ । यदि तुम समर्थ हो तो मेरे साथ युद्ध करो और वीरधर्मका पालन करो । इसके अतिरिक्त यदि मेरे त्रिशूलसे डरते १६ हो और यदि जीनेकी तुम्हारी अभिलाषा है तो स्वर्ग और पृथ्वीलोकको छोड़कर अविलम्ब पाताललोक चले जाओ । हे दूत! अभी जाकर अपने स्वामीसे १७ आदरपूर्वक ये बातें कह दो । इसके बाद वे महाबली शुम्भ विचार करके जो उचित होगा, उसे करेंगे । संसारमें यही दूतधर्म है कि जो सच्ची बात हो, उसे १८ वैसा - का वैसा शत्रु और स्वामी — दोनोंके प्रति अवश्य कह दे I । हे धर्मज्ञ! तुम भी वैसा ही व्यवहार करो; विलम्ब मत करो ॥ १२ - – १८३ ॥ व्यासजी बोले - – उस समय भगवती जगदम्बाके १ ९ नीतियुक्त, शक्तिसम्पन्न, हेतुपूर्ण और ओजस्वी वचन सुनकर वह दूत आश्चर्यचकित हो गया और वहाँसे लौट गया । दैत्यपति शुम्भके पास पहुँचकर बार - बार २० विचार करके वह दूत विनम्र भावसे अपने राजाको प्रणाम करके उनसे नीतिपूर्ण, मधुरतासे युक्त तथा २१ मनोहर बात कहने लगा ॥ १ ९ –२१ ॥ दूत बोला - हे राजेन्द्र! सत्य और प्रिय बात कहनी चाहिये, इसीलिये मैं अत्यन्त चिन्तामें पड़ा हुआ हूँ; क्योंकि जो सत्य हो और प्रिय भी हो, वैसा २२ वचन निश्चय ही दुर्लभ है । अप्रिय बोलनेवाले दूतोंपर राजा सर्वथा कुपित हो सकते हैं, [ तथापि अपना धर्मपालन करते हुए मैं सच्ची बात कह रहा हूँ ] वह २३ स्त्री कहाँसे आयी है, किसकी पुत्री है और कितनी
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६६० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २४
न ज्ञानगोचरं किञ्चित्किं ब्रवीमि विचेष्टितम् ।
युद्धकामा मया दृष्टा गर्विता कटुभाषिणी ॥
तया यत्कथितं सम्यक् तच्छृणुष्व महामते ।
मया बाल्यात्प्रतिज्ञेयं कृता पूर्वं विनोदतः ॥
सखीनां पुरतः कामं विवाहं प्रति सर्वथा ।
यो मां युद्धे जयेदद्धा दर्पञ्च विधुनोति वै ॥
तं वरिष्याम्यहं कामं पतिं समबलं किल ।
न मे प्रतिज्ञा मिथ्या सा कर्तव्या नृपसत्तम ॥
तस्माद्युध्यस्व धर्मज्ञ जित्वा मां स्ववशं कुरु ।
तयेति व्याहृतं वाक्यं श्रुत्वाहं समुपागतः ॥
यथेच्छसि महाराज तथा कुरु तव प्रियम् ।
सा युद्धार्थं कृतमतिः सायुधा सिंहगामिनी ॥
निश्चला वर्तते भूप यद्योग्यं तद्विधीयताम् । व्यास उवाच इत्याकर्ण्य वचस्तस्य सुग्रीवस्य नराधिपः ॥ पप्रच्छ भ्रातरं शूरं समीपस्थं महाबलम् । शुम्भ उवाच भ्रातः किमत्र कर्तव्यं ब्रूहि सत्यं महामते ॥
नार्येका योद्धुकामास्ति समाह्वयति साम्प्रतम् ।
अहं गच्छामि संग्रामे त्वं वा गच्छ बलान्वितः ॥
यद्रोचते निशुम्भात्र तत्कर्तव्यं मया किल । निशुम्भ उवाच न मया न त्वया वीर गन्तव्यं रणमूर्धनि ॥
प्रेषयस्व महाराज त्वरितं धूम्रलोचनम् ।
स गत्वा तां रणे जित्वा गृहीत्वा चारुलोचनाम् ॥
आगमिष्यति शुम्भात्र विवाहः संविधीयताम् । सबल अथवा निर्बल है – इनमें से कुछ भी मैं नहीं २४ जान सका, तब मैं उसके मनकी बात क्या बताऊँ! मुझे तो वह घमण्डी, कटु बोलनेवाली और सदा युद्धके लिये उत्सुक दिखायी पड़ती थी । २२ -२४ ॥ २५ हे महामते! उस स्त्रीने जो कुछ कहा है, उसे आप भलीभाँति सुनें— ' मैंने पहले ही बाल्यावस्थामें सखियोंके समक्ष विनोदवश विवाहके विषयमें यह २६ प्रतिज्ञा कर ली थी कि जो युद्धमें मुझे जीत लेगा और मेरे अभिमानको चूर्ण कर देगा, उसी समान बलवालेका मैं पतिरूपसे वरण करूँगी । हे नृपश्रेष्ठ! मेरी वह २७ प्रतिज्ञा मिथ्या नहीं की जानी चाहिये । अतः हे धर्मज्ञ! मेरे साथ युद्ध करो और मुझे जीतकर अपने अधीन कर लो ' ॥ २५–२७३ ॥ २८ उस स्त्रीके द्वारा कही गयी यह बात सुनकर मैं आपके पास आया हूँ । हे महाराज! अब आप जैसे भी अपना हित समझते हों, वैसा ही करें । २ ९ आयुधोंसे सुसज्जित तथा सिंहपर सवार वह युद्धके लिये दृढ़ संकल्प किये हुए है । हे भूप! वह अपनी बातपर अडिग है, अतः जो उचित हो उसे आप करें ॥ २८-२९ ३ ॥ ३० व्यासजी बोले- अपने दूत सुग्रीवका यह वचन सुनकर राजा शुम्भने पासमें ही बैठे हुए शूरवीर तथा महाबली भाई निशुम्भसे पूछा ॥ ३०३ ॥
शुभ बोला- हे भाई! इस स्थितिमें मुझे क्या करना चाहिये, हे महामते! सच - सच बताओ । एक ३१ स्त्री युद्ध करनेकी अभिलाषा रखती है, इस समय [ हमें युद्धके लिये ] बुला रही है । अतः युद्धस्थलमें मैं जाऊँ अथवा सेना लेकर तुम जाओगे? हे निशुम्भ! ३२ इस विषयमें तुम्हें जो अच्छा लगेगा, निश्चय ही मैं वही करूँगा ॥ ३१-३२३ ॥ निशुम्भ बोला - हे वीर! अभी रणक्षेत्रमें न मुझे और न तो आपको ही जाना चाहिये । हे ३३ महाराज! शीघ्र ही धूम्रलोचनको भेज दीजिये । वहाँ जाकर युद्धमें उस सुन्दर नेत्रोंवाली स्त्रीको जीतकर और उसे पकड़कर वह यहाँ ले आयेगा । तत्पश्चात् ३४ हे शुम्भ! आप उसके साथ सम्यक् विवाह कर लीजिये ॥ ३३-३४३ ॥
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अ ० २४ ] व्यास उवाच तन्निशम्य वचस्तस्य शुम्भो भ्रातुः कनीयसः ॥ कोपात्सम्प्रेषयामास पार्श्वस्थं धूम्रलोचनम् । शुम्भ उवाच धूम्रलोचन गच्छाशु सैन्येन महतावृतः ॥
गृहीत्वानय तां मुग्धां स्ववीर्यमदमोहिताम् ।
देवो वा दानवो वापि मनुष्यो वा महाबलः ॥
तत्पाणिग्राहतां प्राप्तो हन्तव्यस्तरसा त्वया ।
तत्पार्श्ववर्तिनीं कालीं हत्वा संगृह्य तां पुनः ॥
शीघ्रमत्र समागच्छ कृत्वा कार्यमनुत्तमम् ।
रक्षणीया त्वया साध्वी मुञ्चन्ती मृदुमार्गणान् ॥
यत्नेन महता वीर मृदुदेहा कृशोदरी ।
तत्सहायाश्च हन्तव्या ये रणे शस्त्रपाणयः ॥
सर्वथा सा न हन्तव्या रक्षणीया प्रयत्नतः । व्यास उवाच इत्यादिष्टस्तदा राज्ञा तरसा धूम्रलोचनः ॥
प्रणम्य शुम्भं सैन्येन वृतः शीघ्रं ययौ रणे ।
असाधूनां सहस्राणां षष्ट्या तेषां वृतस्तथा ॥
स ददर्श ततो देवीं रम्योपवनसंस्थिताम् ।
दृष्ट्वा तां मृगशावाक्षीं विनयेन समन्वितः ॥
उवाच वचनं श्लक्ष्णं हेतुमद्रसभूषितम् ।
शृणु देवि महाभागे शुम्भस्त्वद्विरहातुरः ॥
दूतं प्रेषितवान्पार्श्वे तव नीतिविशारदः ।
रसभङ्गभयोद्विग्नः सामपूर्वं त्वयि स्वयम् ॥
तेनागत्य वचः प्रोक्तं विपरीतं वरानने ।
वचसा तेन मे भर्ता चिन्ताविष्टमना नृपः ॥
बभूव रसमार्गज्ञे शुम्भः कामविमोहितः ।
दूतेन तेन न ज्ञातं हेतुगर्भं वचस्तव ॥
यो मां जयति संग्रामे यदुक्तं कठिनं वचः ।
न ज्ञातस्तेन संग्रामो द्विविधः खलु मानिनि ॥
पञ्चम स्कन्ध ६६१ व्यासजी बोले- अपने छोटे भाईकी वह बात ३५ सुनकर शुम्भने पासमें ही बैठे हुए धूम्रलोचनको जानेके लिये क्रोधपूर्वक आदेश दिया ॥ ३५३ ॥
शुम्भ बोला- हे धूम्रलोचन! तुम एक विशाल सेना लेकर अभी जाओ और अपने बलके मदमें चूर ३६ रहनेवाली उस मूढ़ स्त्रीको पकड़कर ले आओ । देवता, दानव या महाबली मनुष्य – कोई भी जो ३७ उसकी सहायताके लिये उपस्थित हो, उसे तुम तुरंत मार डालना । उसके साथमें रहनेवाली कालीको भी मारकर पुनः उस सुन्दरीको पकड़ करके और इस ३८ प्रकार मेरा यह अत्युत्तम कार्य सम्पन्नकर यहाँ शीघ्र आ जाओ । हे वीर! कोमल बाणोंको छोड़ती ३ ९ हुई उस सुकोमल शरीरवाली कृशोदरी साध्वी स्त्रीकी तुम प्रयत्नपूर्वक रक्षा करना । हाथमें शस्त्र धारण किये ४० हुए उसके जो भी सहायक रणमें हों, उन्हें मार डालना, किंतु उसे मत मारना; सब तरहसे प्रयत्नपूर्वक उसकी रक्षा करना ॥ ३६–४० ३ ॥ व्यासजी बोले - अपने राजा शुम्भका यह आदेश ४१ पाकर धूम्रलोचन उसे प्रणाम करके सेना साथ लेकर तुरंत युद्धभूमिकी ओर चल पड़ा । उसके साथमें साठ ४२ हजार राक्षस थे ॥ ४१-४२ ॥ वहाँ पहुँचकर उसने एक मनोहर उपवनमें विराजमान भगवती जगदम्बाको देखा । हरिणके बच्चे के ४३ समान नेत्रोंवाली देवीको देखकर वह विनम्रतापूर्वक उनसे मधुर, हेतुयुक्त तथा सरस वचन कहने लगा-४४ हे महाभाग्यवती देवि! सुनो, शुम्भ तुम्हारे विरहसे अत्यन्त व्याकुल हैं । नीतिनिपुण महाराजने रसभंग होनेके भयसे उद्विग्न होकर शान्तिपूर्वक तुम्हारे पास ४५ स्वयं एक दूत भेजा था ॥ ४३ – ४५ ॥ हे सुमुखि! उसने लौटकर विपरीत बात कह ४६ दी । उस बात से मेरे स्वामी महाराज शुम्भके मनमें बहुत चिन्ता व्याप्त हो गयी है । हे रसतत्त्वको जाननेवाली! शुम्भ इस समय कामसे विमोहित ४७हो गये हैं । वह दूत तुम्हारे सहेतुक वचनोंको नहीं समझ सका । तुमने जो यह कठिन वचन कहा ४८ था कि ' जो मुझे संग्राममें जीतेगा, उस संग्रामका