देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 671–680
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 671–680
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६६२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २४
रतिजोऽथोत्साहजश्च पात्रभेदे विवक्षितः ।
रतिजस्त्वयि वामोरु शत्रोरुत्साहजः स्मृतः ॥
सुखदः प्रथमः कान्ते दुःखदश्चारिजः स्मृतः ।
जानाम्यहं वरारोहे भवत्या मानसं किल ॥
रतिसंग्रामभावस्ते हृदये परिवर्तते ।
इति तज्ज्ञं विदित्वा मां त्वत्सकाशं नराधिपः ॥
प्रेषयामास शुम्भोऽद्य बलेन महतावृतम् ।
चतुरासि महाभागे शृणु मे वचनं मृदु ॥
भज शुम्भं त्रिलोकेशं देवदर्पनिबर्हणम् ।
पट्टराज्ञी प्रिया भूत्वा भुंक्ष्व भोगाननुत्तमान् ॥
जेष्यति त्वां महाबाहुः शुम्भः कामबलार्थवित् ।
विचित्रान्कुरु हावांस्त्वं सोऽपि भावान्करिष्यति ॥
भविष्यति कालिकेयं तत्र वै नर्मसाक्षिणी ।
एवं सङ्गरयोगेन पतिर्मे परमार्थवित् ॥
जित्वा त्वां सुखशय्यायां परिश्रान्तां करिष्यति ।
रक्तदेहां नखाघातैर्दन्तैश्च खण्डिताधराम् ॥
स्वेदक्लिन्नां प्रभग्नां त्वां संविधास्यति भूपतिः ।
भविता मानसः कामो रतिसंग्रामजस्तव ॥
दर्शनाद्वश एवास्ते शुम्भः सर्वात्मना प्रिये ।
वचनं कुरु मे पथ्यं हितकृच्चापि पेशलम् ॥
भज शुम्भं गणाध्यक्षं माननीयातिमानिनी ।
मन्दभाग्याश्च ते नूनं ह्यस्त्रयुद्धप्रियाश्च ये ॥
तात्पर्य वह नहीं जान सका । हे मानिनि! संग्राम दो प्रकारका होता है— कामजनित और उत्साहजनित । ४ ९ पात्रभेदसे समय- समयपर इनका अलग - अलग अर्थ किया जाता है । है वामोरु! उन दोनोंमें आप - जैसी युवतीके साथ होनेवाले संग्रामको कामजनित संग्राम ५० और शत्रुके साथ होनेवाले संग्रामको उत्साहजनित संग्राम कहा गया है ॥ ४६–४९ ॥ हे कान्ते! उनमें प्रथम रतिजन्य संग्राम सुखदायक ५१ और शत्रुके साथ किया जानेवाला उत्साहजन्य संग्राम दुःखदायक कहा गया है । हे सुन्दरि! मैं तुम्हारे मनकी बात जानता हूँ; तुम्हारे मनमें रतिजन्य संग्रामका भाव है । मुझको यह सब जाननेमें निपुण समझकर ५२ ही महाराज शुम्भने विशाल सेनाके साथ इस समय मुझे आपके पास भेजा है ॥ ५०-५१ ॥ हे महाभागे! तुम बड़ी चतुर हो । मेरे मधुर ५३ वचन सुनो । देवताओंका अभिमान चूर्ण कर देनेवाले त्रिलोकाधिपति शुम्भको [ पतिरूपसे ] स्वीकार कर लो और उनकी प्रिय पटरानी बनकर अत्युत्तम सुखोंका उपभोग करो ॥ ५२-५३ ॥ ५४ कामसम्बन्धी बलका रहस्य जाननेवाले विशालबाहु शुम्भ तुम्हें जीत लेंगे । तुम उनके साथ विचित्र हाव - भाव करो, वे भी वैसे ही हाव - भाव ५५ प्रदर्शित करेंगे । यह कालिका [ उस अवसरपर ] हास - विलासकी साक्षी रहेगी । इस प्रकार कामतत्त्वके परमवेत्ता मेरे स्वामी शुम्भ कामयुद्धके द्वारा तुम्हें सुखशय्यापर जीतकर शिथिल कर देंगे । वे महाराज ५६ शुम्भ अपने नखोंके आघातसे तुम्हें रक्तरंजित शरीरवाली बना देंगे, दाँतोंसे काटकर तुम्हारे ओठोंको खण्डित कर देंगे, तुम्हें पसीनेसे तर कर देंगे और ५७ मर्दित कर डालेंगे; तब तुम्हारा रतिसंग्रामसम्बन्धी मनोरथ पूर्ण हो जायगा ॥५४–५७ ॥ हे प्रिये! तुम्हें देखते ही शुम्भ पूर्णरूपसे तुम्हारे वशीभूत हो जायँगे । अतएव मेरी उचित, कल्याणकारी ५८ और सुखकर बात मान लो । तुम माननीयोंमें अत्यन्त मानिनी हो, अतः गणाध्यक्ष शुम्भको स्वीकार कर लो । जो शस्त्र युद्ध से प्रेम रखते हैं, वे अवश्य ही ५ ९ । मन्दभाग्य हैं । रतिक्रीड़ामें प्रीति रखनेवाली हे कान्ते!
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अ ० २५ ] पञ्चम स्कन्ध ६६३ न तदर्हासि कान्ते त्वं सदा सुरतवल्लभे । तुम शस्त्रयुद्धके योग्य नहीं हो । जैसे कामिनीके अशोकं कुरु राजानं पादाघातविकासितम् ॥ ६० पदप्रहारसे अशोक, मुख मदिराके सेचनसे मौलसिरी और कुरबक प्रफुल्लित हो उठता है, उसी प्रकार तुम भी महाराज शुम्भको शोकरहित और आह्लादित
बकुलं सीधुसेकेन तथा कुरबकं कुरु ॥ ६१ । करो ॥ ५८–६१ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे देवीमाहात्म्ये देवीपार्श्वे धूम्रलोचनदूतप्रेषणं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥
अथ पञ्चविंशोऽध्यायः भगवती काली और धूम्रलोचनका संवाद, तथा शुम्भका चण्ड - मुण्डको व्यास उवाच
इत्युक्त्वा विररामासौ वचनं धूम्रलोचनः ।
प्रत्युवाच तदा काली प्रहस्य ललितं वचः ॥ १
विदूषकोऽसि जाल्म त्वं शैलूष इव भाषसे ।
वृथा मनोरथांश्चित्ते करोषि मधुरं वदन् ॥ २
बलवान्बलसंयुक्तः प्रेषितोऽसि दुरात्मना ।
कुरु युद्धं वृथा वादं मुञ्च मूढमतेऽधुना ॥ ३
हत्वा शुम्भं निशुम्भञ्च त्वदन्यान्वा बलाधिकान् ।
देवी क्रुद्धा शराघातैर्व्रजिष्यति निजालयम् ॥ ४
क्वासौ मन्दमतिः शुम्भः क्व वा विश्वविमोहिनी ।
अयुक्तः खलु संसारे विवाहविधिरेतयोः ॥ ५
सिंही किं त्वतिकामार्ता जम्बुकं कुरुते पतिम् ।
करिणी गर्दभं वापि गवयं सुरभिः किमु ॥ ६
गच्छ शुम्भं निशुम्भं च वद सत्यं वचो मम । कालीके हुंकारसे धूम्रलोचनका भस्म होना युद्धहेतु प्रस्थानका आदेश देना व्यासजी बोले – [ हे महाराज! ] यह बात कहकर धूम्रलोचन चुप हो गया । तब भगवती काली हँसकर सुन्दर वचन बोलीं- धूर्त! तुम तो पूरे विदूषक हो और नटों जैसी बात करते हो । मधुर बोलते हुए तुम व्यर्थ ही मनमें अनेकविध कामनाएँ कर रहे हो ॥ १-२ ॥ हे मूढमते! दुष्टात्मा शुम्भने तुझ बलवान्को सेनासे सुसज्जित करके युद्धहेतु भेजा है, अतः अब युद्ध करो और व्यर्थकी बातें छोड़ दो ॥३ ॥
ये देवी कुपित होकर शुम्भ, निशुम्भ तथा तुम्हारे अन्य बलवान् दैत्योंका अपने बाणोंके प्रहारसे संहार करके अपने धामको चली जायँगी ॥४ ॥
कहाँ वह मन्दमति शुम्भ और कहाँ ये विश्व-मोहिनी जगदम्बा! इन दोनोंका विवाह इस संसारमें सर्वथा अनुपयुक्त है ॥ ५ ॥
क्या अत्यधिक कामार्त होनेपर भी सिंहिनी सियारको, हथिनी किसी गर्दभको अथवा सुरभि किसी सामान्य वृषभको अपना पति बना सकती है? ॥ ६ ॥
अब तुम शुम्भ - निशुम्भके पास चले जाओ और उनसे मेरी यह सच्ची बात कह दो कि ' तुम मेरे साथ कुरु युद्धं न चेद्याहि पातालं तरसाधुना ॥ 61 युद्ध करो; अन्यथा इसी समय शीघ्र पाताललोक चले जाओ'॥७ ॥
व्यास उवाच व्यासजी बोले- हे महाभाग! देवी कालिकाका कालिकाया वचः श्रुत्वा स दैत्यो धूम्रलोचनः । यह वचन सुनते ही वह दैत्य धूम्रलोचन क्रोध तामुवाच महाभाग क्रोधसंरक्तलोचनः ॥ ८ मारे आँखें लाल करके उनसे कहने लगा-
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६६४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २५ दुर्दर्शे त्वां निहत्याजौ सिंहञ्च मदगर्वितम् गृहीत्वैनां गमिष्यामि राजानं प्रत्यहं किल रसभङ्गभयात्कालि बिभेमि त्विह साम्प्रतम् नोचेत्त्वां निशितैर्बाणैर्हन्म्यद्य कलहप्रिये कालिकोवाच किं विकत्थसि मन्दात्मन्नायं धर्मो धनुष्मताम् स्वशक्त्या मुञ्च विशिखान्गन्तासि यमसंसदि व्यास उवाच तच्छ्रुत्वा वचनं दैत्यः संगृह्य कार्मुकं दृढम् कालिकां तां शरासारैर्ववर्षातिशिलाशितैः देवास्तु प्रेक्षकास्तत्र विमानवरसंस्थिताः तां स्तुवन्तो जयेत्यूचुर्देवीं शक्रपुरोगमाः तयोः परस्परं युद्धं प्रवृत्तं चातिदारुणम् बाणखड्गगदाशक्तिमुसलादिभिरुत्कटम् कालिका बाणपातैस्तु हत्वा पूर्वं खरानथ बभञ्ज तद्रथं व्यूढं जहास च मुहुर्मुहुः स चान्यं रथमारूढः कोपेन प्रज्वलन्निव बाणवृष्टिं चकारोग्रां कालिकोपरि भारत सापि चिच्छेद तरसा तस्य बाणानसङ्गतान् मुमोचान्यानुग्रवेगान्दानवोपरि कालिका तैर्बाणैर्निहतास्तस्य पाष्णिग्राहाः सहस्रशः बभञ्ज च रथं वेगात्सूतं हत्वा खरानपि चिच्छेद तद्धनुः सद्यो बाणैरुरगसन्निभैः मुदं चक्रे सुराणां सा शङ्खनादं तथाकरोत् । दुर्दर्शे! अभी तुझे तथा इस मदोन्मत्त सिंहको युद्धमें ॥ ९ मारकर और इस स्त्रीको लेकर मैं राजा शुम्भके पास अवश्य चला जाऊँगा ॥ ८ - ९ ॥ । कलहमें अनुराग रखनेवाली हे काली! रसमें भंग पड़नेकी शंकासे मैं इस समय डर रहा हूँ, नहीं तो मैं ॥ १० अपने तीक्ष्ण बाणोंसे तुम्हें अभी मार डालता ॥ १० ॥
कालिका बोलीं- हे मन्दबुद्धि! तुम अनर्गल प्रलाप क्यों कर रहे हो, धनुर्धर वीरोंका यह धर्म नहीं । है । तुम अपनी पूरी शक्तिसे बाण चलाओ । तुम तो ॥ ११ अभी यमलोक जानेवाले हो ॥११ ॥
व्यासजी बोले – यह वचन सुनकर वह दैत्य धूम्रलोचन अपना सुदृढ़ धनुष लेकर भगवती कालिकाके ऊपर पत्थरकी सानपर चढ़ाकर तेज किये गये । बाणोंकी घोर वर्षा करने लगा ॥ १२ ॥
॥ १२ उस समय इन्द्र आदि प्रधान देवता उत्तम विमानोंमें बैठकर यह युद्ध देख रहे थे । वे देवीकी । स्तुति करते हुए उनकी जयकार कर रहे थे ॥ १३ ॥
॥ १३ परस्पर उन दोनोंमें बाण, खड्ग, गदा, शक्ति तथा मुसल आदि शस्त्रोंसे अत्यन्त भीषण तथा उग्र । युद्ध होने लगा ॥ १४ ॥
भगवती कालिकाने पहले अपने बाण - प्रहारोंसे ॥१४ [ उसके रथमें जुते ] खच्चरोंको मारकर बादमें उसके सुदृढ़ रथको भी चूर्ण कर दिया, फिर वे बार - बार
।
अट्टहास करने लगीं ॥ १५ ॥
॥ १५ हे भारत! क्रोधाग्निमें जलता हुआ - सा वह दानव धूम्रलोचन दूसरे रथपर सवार हो गया और । कालिकाके ऊपर भयंकर बाण - -वृष्टि करने लगा ॥ १६ ॥
॥ १६ उसके बाण भगवतीके पास पहुँच भी नहीं पाते थे कि वे उन बाणोंको काट डालती थीं । तत्पश्चात् । वे कालिका अन्य तीव्रगामी बाण उस दानवके ऊपर ॥ १७ छोड़ने लगीं ॥ १७ ॥
उन बाणोंसे उसके हजारों सहायक सैनिक मारे । गये । तत्पश्चात् देवी कालिकाने उसके खच्चरों तथा सारथिको शीघ्रतापूर्वक मारकर उस रथको भी नष्ट ॥ १८ कर दिया । उसके बाद देवीने अपने सर्प - सदृश बाणोंसे शीघ्रतापूर्वक उसका धनुष काट डाला । ऐसा करके । देवीने देवताओंको आनन्दित कर दिया और वे शंखनाद ॥ १ ९ | करने लगीं ॥ १८-१९ ॥
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अ ० २५ ] पञ्चम
विरथः परिघं गृह्य सर्वलोहमयं दृढम् ।
आजगाम रथोपस्थं कुपितो धूम्रलोचनः ॥ २०
वाचा निर्भर्त्सयन्कालीं करालः कालसन्निभः ।
अद्यैव त्वां हनिष्यामि कुरूपे पिङ्गलोचने ॥ २१
इत्युक्त्वा सहसागत्य परिघं क्षिपते यदा ।
हुङ्कारेणैव तं भस्म चकार तरसाम्बिका ॥ २२
दृष्ट्वा भस्मीकृतं दैत्यं सैनिका भयविह्वलाः ।
चक्रुः पलायनं सद्यो हा तातेत्यब्रुवन्पथि ॥ २३
देवास्तं निहतं दृष्ट्वा दानवं धूम्रलोचनम् ।
मुमुचुः पुष्पवृष्टिं ते मुदिता गगने स्थिताः ॥ २४
रणभूमिस्तदा राजन् दारुणा समपद्यत ।
निहतैर्दानवैरश्वैः खरैश्च वारणैस्तथा ॥ २५
गृध्राः काका वटाः श्येना वरफा जम्बुकास्तथा ।
ननृतुश्चुक्रुशुः प्रेतान्पतितान् रणभूमिषु ॥ २६
अम्बिका तद्रणस्थानं त्यक्त्वा दूरं स्थलान्तरे ।
गत्वा चकार चाप्युग्रं शङ्खनादं भयप्रदम् ॥ २७
तं श्रुत्वा दरशब्दं तु शुम्भः सद्मनि संस्थितः ।
दृष्ट्वाथ दानवान्भग्नानागतान् रुधिरोक्षितान् ॥ २८
छिन्नपादकराक्षांश्च मञ्चकारोपितानपि ।
भग्नपृष्ठकटिग्रीवान्क्रन्दमानाननेकशः ॥२ ९
वीक्ष्य शुम्भ निशुम्भश्च क्व गतो धूम्रलोचनः ।
कथं भग्नाः समायाता नानीता किं वरानना ॥ ३०
सैन्यं कुत्र गतं मन्दाः कथयन्तु यथोचितम् ।
कस्यायं शङ्खनादोऽद्य श्रूयते भयवर्धनः ॥ ३१
स्कन्ध ६६५ अब रथसे विहीन वह धूम्रलोचन कुपित होकर एक लोहमय मजबूत परिघ लेकर देवीके रथके सन्निकट आ गया ॥ २० ॥
कालसदृश भयंकर वह धूम्रलोचन वाणीसे भगवती कालीको फटकारते हुए कहने लगा— ' कुरूपा तथा पिंगलनेत्रोंवाली! मैं तुम्हें अभी मार डालूँगा ' ऐसा कहकर वह ज्यों ही कालिकापर परिघ चलानेको उद्यत हुआ, देवीने अपने हुंकारमात्रसे उसे तुरंत भस्म कर दिया॥२१-२२ ॥ तब दैत्य धूम्रलोचनको भस्म हुआ देखकर सभी सैनिक भयाक्रान्त होकर ' हा तात ' - ऐसा कहते हुए तुरंत मार्ग पकड़कर भाग चले ॥ २३ ॥
उस धूम्रलोचनको मारा गया देखकर आकाशमें विद्यमान देवगण प्रसन्न होकर भगवतीपर पुष्प बरसाने लगे ॥ २४ ॥
हे राजन्! मरे हुए दानवों, घोड़ों, खच्चरों और हाथियोंसे [ पट जानेके कारण ] वह रणभूमि उस समय बड़ी भयानक लग रही थी । युद्धभूमिमें पड़े हुए मृत दानवोंको देखकर गीध, कौए, बाज, सियार और पिशाच नाचने तथा कोलाहल करने लगे ॥ २५-२६ ॥ अब भगवती अम्बिकाने उस रणभूमिको छोड़कर वहाँसे कुछ दूरीपर जाकर अत्यन्त तीव्र तथा भयदायक शंखनाद किया ॥ २७ ॥
अपने महलमें स्थित शुम्भको भी वह भयानक शंख - ध्वनि सुनायी पड़ी । उसी समय उसने भागकर आये हुए बहुत - से दैत्योंको देखा । उनमें से बहुतों के अंग भंग हो गये थे और वे रक्तसे लथपथ थे । अनेक दैत्योंके हाथ - पैर कट गये थे और नेत्र भग्न हो गये थे । कुछ दैत्य तो शय्या आदिपर लादकर लाये जा रहे थे; बहुतोंकी पीठ, कमर और गर्दन टूट गयी थी । सब- -के- - सब जोर - जोर से चीख रहे थे । उन्हें देखकर शुम्भ - निशुम्भने सैनिकोंसे पूछा - ' धूम्रलोचन कहाँ गया? तुमलोग इस तरह अंग - भंग होकर क्यों आये हो और उस सुन्दर मुखवाली स्त्रीको क्यों नहीं ले आये? हे मूर्खो! सही - सही बताओ कि मेरी सेना कहाँ गयी और भयको बढ़ानेवाला यह किसका शंखनाद । इस समय सुनायी पड़ रहा है? ' ॥ २८–३१ ॥
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६६६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २५ गणा ऊचुः
बलञ्च पातितं सर्वं निहतो धूम्रलोचनः ।
कृतं कालिकया कर्म रणभूमावमानुषम् ॥
शङ्खनादोऽम्बिकायास्तु गगनं व्याप्य राजते ।
हर्षदः सुरसङ्घानां दानवानाञ्च शोककृत् ॥
यदा निपातिताः सर्वे तेन केसरिणा विभो ।
रथा भग्ना हयाश्चैव बाणपातैर्विनाशिताः ॥
गगनस्थाः सुराश्चक्रुः पुष्पवृष्टिं मुदान्विताः ।
दृष्ट्वा भग्नं बलं सर्वं पातितं धूम्रलोचनम् ॥
निश्चयस्तु कृतोऽस्माभिर्जयो नैव भवेदिति ।
विचारं कुरु राजेन्द्र मन्त्रिभिर्मन्त्रवित्तमैः ॥
विस्मयोऽयं महाराज यदेका जगदम्बिका ।
भवद्भिः सह युद्धाय संस्थिता सैन्यवर्जिता ॥
निर्भयैकाकिनी बाला सिंहारूढा मदोत्कटा ।
चित्रमेतन्महाराज भासतेऽद्भुतमञ्जसा ॥
सन्धिर्वा विग्रहो वाद्य स्थानं निर्याणमेव च ।
मन्त्रयित्वा महाराज कुरु कार्यं यथारुचि ॥
तत्सन्निधौ बलं नास्ति तथापि शत्रुतापन ।
पाणिग्राहाः सुराः सर्वे भविष्यन्ति किलापदि ॥
समये तत्समीपस्थौ ज्ञातौ च हरिशङ्करौ ।
लोकपालाः समीपेऽद्य वर्तन्ते गगने स्थिताः ॥
रक्षोगणाश्च गन्धर्वाः किन्नरा मानुषास्तथा ।
तत्सहायाश्च मन्तव्याः समये सुरतापन ॥
अस्माकं मतिमानेन ज्ञायते सर्वथेदृशम् ।
अम्बिकायाः सहायाशा तत्कार्याशा न काचन ॥
एका नाशयितुं शक्ता जगत्सर्वं चराचरम् ।
का कथा दानवानां तु सर्वेषामिति निश्चयः ॥
गण बोले – सम्पूर्ण सेना मार डाली गयी और धूम्रलोचनका भी संहार कर दिया गया । रणभूमिमें यह ३२ अमानुषिक कार्य कालिकाके द्वारा किया गया है ॥ ३२ ॥
उसी अम्बिकाकी यह शंखध्वनि है, जो सम्पूर्ण नभमण्डलको व्याप्त करके सुशोभित हो रही है । यह ३३ ध्वनि देवगणोंके लिये हर्षप्रद और दानवोंके लिये कष्टदायक है ॥ ३३ ॥
हे विभो! जब देवीके सिंहने सारे सैनिकोंका ३४ विनाश कर डाला और उनके बाण - प्रहारोंसे दैत्योंके रथ टूट गये तथा घोड़े मार डाले गये, तब आकाशमें स्थित देवता प्रसन्न होकर पुष्प वृष्टि करने लगे ॥ ३४३ ॥
३५ इस प्रकार समस्त सेनाका विनाश तथा धूम्रलोचनका वध देखकर हमलोगोंने निश्चय कर लिया कि अब हमारी विजय नहीं हो सकती । अतएव हे राजेन्द्र! अब ३६ आप मन्त्रणाका उत्तम ज्ञान रखनेवाले अपने मन्त्रियोंसे इस विषयपर विचार कर लीजिये | हे महाराज! यह ३७ आश्चर्य है कि जगदम्बास्वरूपिणी वह मदमत्त बाला बिना किसी सेनाके ही सिंहपर सवार होकर निर्भयभावसे आपसे युद्ध करनेके लिये रणभूमिमें अकेली खड़ी है । हे महाराज! हमें तो यह सब बड़ा विचित्र और ३८ अद्भुत प्रतीत हो रहा है । अतएव अब आप शीघ्र मन्त्रणा करके सन्धि, युद्ध, उदासीन होकर स्थित रहना ३ ९ अथवा पलायन – इनमेंसे अपनी रुचिके अनुसार जो चाहें, वह कार्य करें ॥ ३५-३९ ॥ हे शत्रुतापन! यद्यपि उसके पास सेना नहीं है ४० फिर भी उसकी विपत्तिमें सभी देवता उसके सहायक बनकर उपस्थित हो जायँगे । ज्ञात हुआ है कि भगवान् विष्णु और शिव भी समयानुसार उसके ४१ पासमें विद्यमान रहते हैं; सभी लोकपाल आकाशमें रहते हुए भी इस समय उस देवीके पास विद्यमान हैं । हे सुरतापन! राक्षसगण, गन्धर्व, किन्नर और मनुष्य-४२ इन सबको समय आनेपर उसका सहायक समझना चाहिये ॥ ४० – ४२ ॥ हमारी बुद्धिसे तो हर तरहसे ऐसा जान पड़ता ४३ है कि वे अम्बिका किसीसे भी कोई सहायता अथवा कार्यकी अपेक्षा नहीं रखतीं । वे अकेली ही सम्पूर्ण चराचर जगत्का नाश करनेमें समर्थ हैं, तो फिर सब ४४ । दानवोंकी बात ही क्या - यह सत्य है ॥४३-४४ ॥
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अ ० २५ ] पञ्चम स्कन्ध ६६७
इति ज्ञात्वा महाभाग यथारुचि तथा कुरु ।
हितं सत्यं मितं वाक्यं वक्तव्यमनुयायिभिः ॥ ४५
व्यास उवाच
तच्छ्रुत्वा वचनं तेषां शुम्भः परबलार्दनः ।
कनीयांसं समानीय पप्रच्छ रहसि स्थितः ॥ ४६
भ्रातः कालिकयाद्यैव निहतो धूम्रलोचनः ।
बलञ्च शातितं सर्वं गणा भग्नाः समागताः ॥ ४७
अम्बिका शङ्खनादं वै करोति मदगर्विता ।
ज्ञानिनां चैव दुर्ज्ञेया गतिः कालस्य सर्वथा ॥ ४८
तृणं वज्रायते नूनं वज्रं चैव तृणायते ।
बलवान्बलहीनः स्याद्दैवस्य गतिरीदृशी ॥ ४ ९
पृच्छामि त्वां महाभाग किं कर्तव्यमितः परम् ।
अभोग्या चाम्बिका नूनं कारणादत्र चागता ॥ ५०
युक्तं पलायनं वीर युद्धं वा वद सत्वरम् ।
लघु ज्येष्ठं विजानामि त्वामहं कार्यसङ्कटे ॥ ५१
निशुम्भ उवाच
न वा पलायनं युक्तं न दुर्गग्रहणं तथा ।
युद्धमेव परं श्रेयः सर्वथैवानयानघ ॥५२
ससैन्योऽहं गमिष्यामि रणे तु प्रवराश्रितः ।
हत्वा तामागमिष्यामि तरसा त्वबलामिमाम् ॥ ५३
अथवा बलवद्दैवादन्यथा चेद्भविष्यति ।
मृते मयि त्वया कार्यं विमृश्य च पुनः पुनः ॥ ५४
हे महाभाग! यह सब भलीभाँति समझ-बूझकर आपकी जैसी रुचि हो, वैसा कीजिये । सेवकोंको तो अपने स्वामीसे हितकर, सत्य और नपी - तुली बात कहनी चाहिये ॥ ४५ ॥
व्यासजी बोले — उनकी बात सुनकर शत्रुसेनाको विनष्ट कर डालनेवाले शुम्भने अपने छोटे भाई निशुम्भको एकान्त स्थानमें ले जाकर वहाँ स्थित हो उससे पूछा - हे भाई! आज कालिकाने अकेले ही धूम्रलोचनको मार डाला, सारी सेना नष्ट कर दी और शेष सैनिक अंग भंग होकर भाग आये हैं । अभिमानमें चूर रहनेवाली वही अम्बिका शंखनाद कर रही है ॥ ४६-४७३ ॥ कालकी गतिको पूर्णरूप से समझना ज्ञानियोंके लिये भी अत्यन्त कठिन है । [ कालकी प्रेरणासे ] तृण वज्र बन जाता है, वज्र तृण बन जाता है और बलशाली प्राणी बलहीन हो जाता है; दैवकी ऐसी विचित्र गति है ॥ ४८-४९ ॥ हे महाभाग! मैं तुमसे पूछता हूँ कि अब आगे मुझे क्या करना चाहिये? ऐसा लगता है कि यह अम्बिका किसी उद्देश्यसे यहाँ आयी हुई है | अतः निश्चय ही वह हमारे भोगके योग्य नहीं है ॥५० ॥
हे वीर! तुम मुझे शीघ्र बताओ कि इस समय भाग जाना उचित है या युद्ध करना? यद्यपि तुम छोटे हो, फिर भी इस संकटके समय मैं तुम्हें बड़ा मान रहा हूँ ॥५१ ॥
निशुम्भ बोला - हे अनघ! इस समय न तो भागना उचित है और न तो किलेमें छिपना ही ठीक है । अब तो इस स्त्रीके साथ हर प्रकारसे युद्ध करना ही श्रेयस्कर है ॥ ५२ ॥
श्रेष्ठ सेनापतियोंको लेकर मैं अपनी सेनाके साथ युद्धभूमिमें जाऊँगा और उस कालिकाको मारकर तथा अबला अम्बिकाको पकड़कर शीघ्र यहाँ ले आऊँगा और यदि बलवान् दैवके कारण इसके विपरीत हो जाय तो मेरे मर जानेपर बार- बार सोच - विचारकर ही । आप कोई कार्य कीजियेगा ॥ ५३-५४ ॥
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६६८ इति तस्य वचः श्रुत्वा शुम्भः प्रोवाच चानुजम् तिष्ठ त्वं चण्डमुण्डौ द्वौ गच्छेतां बलसंयुतौ शशकग्रहणायात्र न युक्तं गजमोचनम् चण्डमुण्डौ महावीरौ तां हन्तुं सर्वथा क्षमौ इत्युक्त्वा भ्रातरं शुम्भः सम्भाष्य च महाबलौ उवाच वचनं राजा चण्डमुण्डौ पुरः स्थितौ गच्छतं चण्डमुण्डौ द्वौ स्वसैन्यपरिवारितौ हन्तुं तामबलां शीघ्रं निर्लज्जां मदगर्विताम् गृहीत्वाथ निहत्याजौ कालिकां पिङ्गलोचनाम् । आगम्यतां महाभागौ कृत्वा कार्यं महत्तरम्
सा नायाति गृहीतापि गर्विता चाम्बिका यदि ।
तदा बाणैर्महातीक्ष्णैर्हन्तव्याहवमण्डिता ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २६ । छोटे भाई निशुम्भकी यह बात सुनकर शुम्भने ॥ ५५ उससे कहा - अभी तुम ठहरो, पहले पराक्रमी चण्ड - मुण्ड जायँ । खरगोश पकड़नेके लिये हाथी । छोड़ना उचित नहीं है । चण्ड - मुण्ड बड़े वीर हैं, ॥ ५६ अतः ये दोनों उसे मार डालनेमें हर तरहसे समर्थ हैं ॥ ५५-५६ ॥ । अपने भाई निशुम्भसे ऐसा कहकर और उससे ॥ ५७ परामर्श करके राजा शुम्भने समक्ष बैठे हुए महान् बलशाली चण्ड- - मुण्डसे कहा- - हे चण्ड - मुण्ड! तुम । दोनों अपनी सेना लेकर उस निर्लज्ज और मदोन्मत्त ॥ ५८ अबलाका वध करनेके लिये शीघ्र जाओ । हे महाभागो! रणभूमिमें पिंग - नेत्रोंवाली उस कालिकाको मारकर और अम्बिकाको पकड़कर - यह महान् ॥ ५ ९ कार्य करके यहाँ लौट आओ । यदि वह मदोन्मत्त अम्बिका पकड़ी जानेपर भी नहीं आती तो अपने अत्यन्त तीक्ष्ण बाणोंसे उस रणभूषिताका भी वध ६० कर देना ॥ ५७–६० ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे देव्या सह युद्धाय चण्डमुण्डप्रेषणं नाम पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥
अथ षड्विंशोऽध्यायः भगवती अम्बिकासे चण्ड - मुण्डका संवाद और युद्ध, देवी कालिकाद्वारा व्यास उवाच
इत्याज्ञप्तौ तदा वीरौ चण्डमुण्डौ महाबलौ ।
जग्मतुस्तरसैवाजौ सैन्येन महतान्वितौ ॥
दृष्ट्वा तत्र स्थितां देवीं देवानां हितकारिणीम् ।
ऊचतुस्तौ महावीर्यौ तदा सामान्वितं वचः ॥
बाले त्वं किं न जानासि शुम्भं सुरबलार्दनम् ।
निशुम्भञ्च महावीर्यं तुराषाड्विजयोद्धतम् ॥
त्वमेकासि वरारोहे कालिकासिंहसंयुता ।
जेतुमिच्छसि दुर्बुद्धे शुम्भं सर्वबलान्वितम् ॥
चण्ड - मुण्डका वध व्यासजी बोले - – [ हे महाराज! ] तदनन्तर शुम्भसे ऐसा आदेश पाकर महाबली चण्ड - मुण्ड विशाल सेना १ साथ बड़े वेग से रणभूमिकी ओर चल पड़े ॥ १ ॥
तब देवताओंका हित करनेवाली देवीको वहाँ युद्धभूमिमें विद्यमान देखकर वे दोनों महापराक्रमी २ दानव उनसे सामनीतियुक्त वचन बोले - ॥ २ ॥
हे बाले! क्या तुम देवताओंकी सेनाका नाश करनेवाले शुम्भ तथा इन्द्रपर विजय प्राप्त करने के कारण उद्धत स्वभाववाले महापराक्रमी निशुम्भको नहीं जानती हो? ॥३ ॥
हे सुन्दरि! तुम यहाँ अकेली हो । हे दुर्बुद्धे! तुम मात्र कालिका और सिंहको साथ लेकर सभी प्रकारकी ४ सेनाओंसे सम्पन्न शुम्भको जीतना चाहती हो! ॥ ४ ॥
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अ ० २६ ] पञ्चम स्कन्ध ६६ ९
मतिदः कोऽपि ते नास्ति नारी वापि नरोऽपि वा ।
देवास्त्वां प्रेरयन्त्येव विनाशाय तवैव ते ॥
विमृश्य कुरु तन्वङ्गि कार्यं स्वपरयोर्बलम् ।
अष्टादशभुजत्वात्त्वं गर्वञ्च कुरुषे मृषा ॥
किं भुजैर्बहुभिर्व्यर्थैरायुधैः किं श्रमप्रदैः ।
शुम्भस्याग्रे सुराणां वै जेतुः समरशालिनः ॥
ऐरावतकरच्छेत्तुर्दन्तिदारणकारिणः जयिनः सुरसङ्घानां कार्यं कुरु मनोगतम् ॥
वृथा गर्वायसे कान्ते कुरु मे वचनं प्रियम् ।
हितं तव विशालाक्षि सुखदं दुःखनाशनम् ॥
दुःखदानि च कार्याणि त्याज्यानि दूरतो बुधैः ।
सुखदानि च सेव्यानि शास्त्रतत्त्वविशारदैः ॥
चतुरासि पिकालापे पश्य शुम्भबलं महत् ।
प्रत्यक्षं सुरसङ्घानां मर्दनेन महोदयम् ॥
प्रत्यक्षञ्च परित्यज्य वृथैवानुमितिः किल ।
सन्देहसहिते कार्ये न विपश्चित्प्रवर्तते ॥
शत्रुः सुराणां परमः शुम्भः समरदुर्जयः ।
तस्मात्त्वां प्रेरयन्त्यत्र देवा दैत्येशपीडिताः ॥
तस्मात्तद्वचनैः स्निग्धैर्वञ्चितासि शुचिस्मिते ।
दुःखाय तव देवानां शिक्षा स्वार्थस्य साधिका ॥
क्या कोई स्त्री या पुरुष तुम्हें सत्परामर्श ५ देनेवाला नहीं है? देवतालोग तो तुम्हारे विनाश के लिये ही तुम्हें प्रेरित कर रहे हैं ॥५ ॥
हे सुकुमार अंगोंवाली! तुम अपने तथा शत्रुके बलके विषयमें सम्यक् विचार करके ही कार्य करो । ६ अठारह भुजाओंके कारण तुम अपनेपर व्यर्थ ही अभिमान करती हो ॥६ ॥
देवताओंको जीतनेवाले तथा समरभूमिमें पराक्रम दिखानेवाले शुम्भके समक्ष तुम्हारी इन ७ बहुत - सी व्यर्थ भुजाओं तथा श्रम प्रदान करनेवाले आयुधोंसे क्या लाभ? अत: तुम ऐरावतकी सूँड़ काट डालनेवाले, हाथियोंको विदीर्ण करनेवाले और ८ देवताओंको जीत लेनेवाले शुम्भका मनोवांछित कार्य करो ॥ ७-८ ॥ हे कान्ते! तुम वृथा गर्व करती हो । हे विशालाक्षि! तुम मेरी प्रिय बात मान लो, जो तुम्हारे लिये हितकर, ९ सुखद तथा दुःखोंका नाश करनेवाली है ॥ ९ ॥
शास्त्रोंका तत्त्व जाननेवाले विद्वान् तथा बुद्धिमान् पुरुषोंको चाहिये कि दुःख देनेवाले कार्योंका दूरसे ही त्याग कर दें और सुख प्रदान करनेवाले कार्यों का १० सेवन करें ॥ १० ॥
हे कोयलके समान मधुर बोलनेवाली! तुम तो बड़ी चतुर हो । तुम देवताओंके मर्दनसे अभ्युदयको ११ प्राप्त तथा महान् शुम्भबलको प्रत्यक्ष देख लो । प्रत्यक्ष प्रमाणका त्याग करके अनुमानका आश्रय लेना बिलकुल व्यर्थ है । किसी सन्देहात्मक कार्यमें विद्वान् पुरुष प्रवृत्त नहीं होते ॥ ११-१२ ॥ १२ शुभ देवताओंके महान् शत्रु हैं । वे संग्राममें अजेय हैं । इसीलिये दैत्येन्द्र शुम्भके द्वारा प्रताड़ित किये गये देवता तुम्हें युद्धके लिये प्रेरित कर रहे १३ हैं ॥ १३ ॥
हे सुन्दर मुसकानवाली! तुम देवताओंके मधुर वचनोंसे ठग ली गयी हो । तुम्हारे प्रति देवताओंकी यह शिक्षा उनका कार्य सिद्ध करनेवाली तथा तुम्हें १४ । दुःख प्रदान करनेवाली है ॥ १४ ॥
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६७० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २६
कार्यमित्रं परिक्षिप्य धर्ममित्रं समाश्रयेत् ।
देवाः स्वार्थपराः कामं त्वामहं सत्यमब्रवम् ॥
भज शुम्भं सुरेशानं जेतारं भुवनेश्वरम् ।
चतुरं सुन्दरं शूरं कामशास्त्रविशारदम् ॥
ऐश्वर्यं सर्वलोकानां प्राप्स्यसे शुम्भशासनात् ।
निश्चयं परमं कृत्वा भर्तारं भज शोभनम् ॥
व्यास उवाच
इति तस्य वचः श्रुत्वा चण्डस्य जगदम्बिका ।
मेघगम्भीरनिनदं जगर्ज पुनरब्रवीत् ॥
गच्छ जाल्म मृषा किं त्वं भाषसे वञ्चकं वचः ।
त्यक्त्वा हरिहरादींश्च शुम्भं कस्माद्भजे पतिम् ॥
न मे कश्चित्पतिः कार्यो न कार्यं पतिना सह ।
स्वामिनी सर्वभूतानामहमेव निशामय ॥
शुभा मे बहवो दृष्टा निशुम्भाश्च सहस्रशः ।
घातिताश्च मया पूर्वं शतशो दैत्यदानवाः ॥
ममाग्रे देववृन्दानि विनष्टानि युगे युगे ।
नाशं यास्यन्ति दैत्यानां यूथानि पुनरद्य वै ॥
काल एवागतोऽस्त्यत्र दैत्यसंहारकारकः ।
वृथा त्वं कुरुषे यत्नं रक्षणायात्मसन्ततेः ॥
कुरु युद्धं वीरधर्मरक्षायै त्वं महामते ।
मरणं भावि दुस्त्याज्यं यशो रक्ष्यं महात्मभिः ॥
किं ते कार्यं निशुम्भेन शुम्भेन च दुरात्मना ।
वीरधर्मं परं प्राप्य गच्छ स्वर्गं सुरालयम् ॥
शुम्भ निशुम्भश्चैवान्ये ये चात्र तव बान्धवाः ।
सर्वे तवानुगाः पश्चादागमिष्यन्ति साम्प्रतम् ॥
अपना ही कार्य साधनेमें तत्पर रहनेवाले मित्रका त्यागकर धर्ममार्गपर चलनेवाले मित्रका ही अवलम्बन १५ करना चाहिये । देवता बड़े ही स्वार्थी हैं, मैंने तुमसे यह सत्य कहा है, अत: तुम देवताओंके १६ शासक, विजेता, तीनों लोकोंके स्वामी, चतुर, सुन्दर, वीर और कामशास्त्रमें प्रवीण शुम्भको स्वीकार कर लो । शुम्भके अधीन रहनेसे तुम समस्त लोकोंका वैभव प्राप्त करोगी । अतएव दृढ़ निश्चय १७ करके तुम सौन्दर्यसम्पन्न शुम्भको अपना पति बना लो॥१५–१७ ॥ व्यासजी बोले – चण्डकी यह बात सुनकर जगदम्बाने मेघके समान गम्भीर ध्वनिमें गर्जना १८ की और वे बोलीं- धूर्त! भाग जाओ; तुम यह छलयुक्त बात व्यर्थ क्यों बोल रहे हो? विष्णु, शिव आदिको छोड़कर मैं शुम्भको अपना पति किसलिये १ ९ बनाऊँ? ॥ १८-१९ ॥ न तो मुझे किसीको पति बनाना है और न तो पतिसे मेरा कोई काम ही है; क्योंकि जगत्के सभी २० प्राणियोंकी स्वामिनी मैं ही हूँ; इसे तुम सुन लो ॥ २० ॥
मैंने हजारों - हजार शुम्भ तथा निशुम्भ देखे हैं और पूर्वकालमें मैंने सैकड़ों दैत्यों तथा दानवोंका २१ वध किया है ॥ २१ ॥
प्रत्येक युगमें अनेक देवसमुदाय मेरे सामने ही नष्ट हो चुके हैं । दैत्योंके समूह अब फिर विनाशको २२ प्राप्त होंगे । दैत्योंका विनाशकारी समय अब आ ही गया है । अतएव तुम अपनी सन्ततिकी रक्षाके लिये व्यर्थ प्रयत्न कर रहे हो ॥ २२-२३ ॥ २३ हे महामते! तुम वीरधर्मकी रक्षाके लिये मेरे साथ युद्ध करो । मृत्यु तो अवश्यम्भावी है, इसे टाला नहीं जा सकता । अतः महात्मा लोगोंको यशकी २४ रक्षा करनी चाहिये ॥ २४ ॥
दुराचारी शुम्भ तथा निशुम्भसे तुम्हारा क्या प्रयोजन सिद्ध हो सकता है? अतः अब तुम श्रेष्ठ २५ वीरधर्मका आश्रय लेकर देवलोक स्वर्ग चले जाओ ॥२५ ॥
अब शुम्भ, निशुम्भ तथा तुम्हारे जो अन्य बन्धु - बान्धव हैं, वे सब भी बादमें तुम्हारा अनुसरण २६ । करते हुए वहाँ पहुँचेंगे ॥ २६ ॥
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अ ० २६ ]
क्रमशः सर्वदैत्यानां करिष्याम्यद्य संक्षयम् ।
विषादं त्यज मन्दात्मन् कुरु युद्धं विशांपते ॥
त्वामहं निहनिष्यामि भ्रातरं तव साम्प्रतम् ।
ततः शुम्भं निशुम्भं च रक्तबीजं मदोत्कटम् ॥
अन्यांश्च दानवान्सर्वान्हत्वाहं समराङ्गणे ।
गमिष्यामि यथास्थानं तिष्ठ वा गच्छ वा द्रुतम् ॥
गृहाणास्त्रं वृथापुष्ट कुरु युद्धं मयाधुना ।
किं जल्पसि मृषा वाक्यं सर्वथा कातरप्रियम् ॥
व्यास उवाच
तयेत्थं प्रेरितौ दैत्यौ चण्डमुण्डौ क्रुधान्वितौ ।
ज्याशब्दं तरसा घोरं चक्रतुर्बलदर्पितौ ॥
सापि शङ्खस्वनं चक्रे पूरयन्ती दिशो दश ।
सिंहोऽपि कुपितस्तावन्नादं समकरोद् बली ॥
तेन नादेन शक्राद्या जहर्षुरमरास्तदा ।
मुनयो यक्षगन्धर्वाः सिद्धाः साध्याश्च किन्नराः ॥
युद्धं परस्परं तत्र जातं कातरभीतिदम् ।
चण्डिकाचण्डयोस्तीव्रं बाणखड्गगदादिभिः ॥
चण्डमुक्ताञ्छरान्देवी चिच्छेद निशितैः शरैः ।
मुमोच पुनरुग्रान्सा बाणांश्च पन्नगानिव ॥
गगनं छादितं तत्र संग्रामे विशिखैस्तदा ।
शलभैरिव मेघान्ते कर्षकाणां भयप्रदैः ॥
मु ो
s पि सैनिकैः सार्धं पपात तरसा रणे ।
मुमोच बाणवृष्टिं वै क्रुद्धः परमदारुणः ॥
बाणजालं महद् दृष्ट्वा क्रुद्धा तत्राम्बिका भृशम् ।
कोपेन वदनं तस्या बभूव घनसन्निभम् ॥
कदलीपुष्पनेत्रञ्च भृकुटीकुटिलं तदा । पञ्चम स्कन्ध ६७१ हे मन्दात्मन्! मैं अब क्रमशः सभी दैत्योंका २७ संहार कर डालूंगी । हे विशांपते! अब विषाद त्यागो और मेरे साथ युद्ध करो ॥ २७ ॥
मैं इसी समय तुम्हारा तथा तुम्हारे भाईका वध २८ कर दूँगी । तत्पश्चात् शुम्भ, निशुम्भ, मदोन्मत्त रक्तबीज तथा अन्य दानवोंको रणभूमिमें मारकर मैं अपने धामको चली जाऊँगी । अब तुम यहाँ ठहरो अथवा शीघ्र भाग जाओ ॥ २८-२९ ॥ २ ९ व्यर्थ ही स्थूल शरीर धारण करनेवाले हे दैत्य! तुरंत शस्त्र उठा लो और मेरे साथ अभी युद्ध करो । कायरोंको सदा प्रिय लगनेवाली व्यर्थ बातें क्यों बोल ३० रहे हो? ॥३० ॥
व्यासजी बोले – देवीके इस प्रकार उत्तेजित करनेपर दैत्य चण्ड - मुण्ड क्रोधसे भर उठे और अपने बलके अभिमानमें चूर उन दोनोंने वेगपूर्वक अपने ३१ धनुषकी प्रत्यंचाकी भीषण टंकार की ॥ ३१ ॥
उसी समय दसों दिशाओंको गुंजित करती हुई भगवतीने भी शंखनाद किया और बलवान् सिंहने भी ३२ कुपित होकर गर्जन किया । उस गर्जनसे इन्द्र आदि देवता, मुनि, यक्ष, गन्धर्व, सिद्ध, साध्य और किन्नर बहुत हर्षित हुए ॥ ३२-३३ ॥ ३३ तदनन्तर चण्डिका और चण्डमें परस्पर बाण, तलवार, गदा आदिके द्वारा भीषण संग्राम होने लगा; जो कायरोंके लिये भयदायक था ॥ ३४ ॥
३४ चण्डिकाने दैत्य चण्डके द्वारा छोड़े गये बाणोंको अपने तीक्ष्ण बाणोंसे काट दिया और फिर वे चण्डपर अपने सर्पसदृश भयंकर बाण छोड़ने लगीं ॥ ३५ ॥
३५ उस समय संग्राममें आकाशमण्डल बाणोंसे उसी प्रकार आच्छादित हो गया, जैसे वर्षाऋतु अन्तमें किसानोंको भय प्रदान करनेवाली टिड्डियोंसे ३६ आकाश छा जाता है ॥ ३६ ॥
उसी समय अतीव भयंकर मुण्ड भी सैनिकोंके साथ बड़ी तेजीसे रणभूमिमें आ पहुँचा और क्रोधित ३७ होकर बाणोंकी वर्षा करने लगा ॥३७ ॥
तब [ मुण्डके द्वारा प्रक्षिप्त ] महान् बाण-समूहको देखकर अम्बिका बहुत कुपित हुईं । क्रोधके ३८ कारण उनका मुख मेघके समान काला, आँखें केलेके पुष्पके समान लाल और भौंहें टेढ़ी हो गयीं ॥ ३८३ ॥