देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 681–690
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 681–690
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६७२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २६ निष्क्रान्ता च तदा काली ललाटफलकाद् द्रुतम् ॥
व्याघ्रचर्माम्बरा क्रूरा गजचर्मोत्तरीयका ।
मुण्डमालाधरा घोरा शुष्कवापीसमोदरा ॥
खड्गपाशधरातीव भीषणा भयदायिनी ।
खट्वाङ्गधारिणी रौद्रा कालरात्रिरिवापरा ॥
विस्तीर्णवदना जिह्वां चालयन्ती मुहुर्मुहुः ।
विस्तारजघना वेगाज्जघानासुरसैनिकान् ॥
करे कृत्वा महावीरांस्तरसा सा रुषान्विता ।
मुखे चिक्षेप दैतेयान्पिपेष दशनैः शनैः ॥
गजान्घण्टान्वितान्हस्ते गृहीत्वा निदधौ मुखे ।
सारोहान्भक्षयित्वाजौ साट्टहासं चकार ह ॥
तथैव तुरगानुष्ट्रांस्तथा सारथिभिः सह ।
निक्षिप्य वक्त्रे दशनैश्चर्वयत्यतिभैरवम् ॥
हन्यमानं बलं प्रेक्ष्य चण्डमुण्डौ महासुरौ ।
छादयामासतुर्देवीं बाणासारैरनन्तरैः ॥
चण्डश्चण्डकरच्छायं चक्रं चक्रधरायुधम् ।
चिक्षेप तरसा देवीं ननाद च मुहुर्मुहुः ॥
नदन्तं वीक्ष्य तं काली रथाङ्गञ्च रविप्रभम् ।
बाणेनैकेन चिच्छेद सुप्रभं तत्सुदर्शनम् ॥
तं जघान शरैस्तीक्ष्णैश्चण्डं चण्डी शिलाशितैः ।
मूर्च्छितोऽसौ पपातोर्व्यां देवीबाणार्दितो भृशम् ॥
३ ९ उसी समय देवीके ललाटपटलसे सहसा भगवती काली प्रकट हुईं । अत्यन्त क्रूर वे काली व्याघ्रचर्म पहने थीं और गजचर्मके उत्तरीय वस्त्रोंसे ४० सुशोभित थीं । उन भयानक कालीने गलेमें मुण्डमाला धारण कर रखी थी और उनका उदर सूखी बावलीके समान प्रतीत हो रहा था । अत्यन्त भीषण तथा भय प्रदान करनेवाली वे भगवती काली हाथमें खड्ग, ४१ पाश तथा खट्वांग धारण किये हुई थीं । रौद्र रूपवाली वे काली साक्षात् दूसरी कालरात्रिके समान प्रतीत हो रही थीं ॥ ३ ९ -४१ ॥ विशाल मुख तथा विस्तृत जघनप्रदेशवाली वे ४२ भगवती काली बार - बार जिह्वा लपलपाती हुई बड़े वेगसे असुर - सैनिकोंका संहार करने लगीं ॥ ४२ ॥
वे कुपित होकर बड़े - बड़े दैत्यवीरोंको हाथमें ४३ पकड़कर अपने मुखमें डाल लेती थीं और धीरे - धीरे उन्हें दाँतोंसे पीस डालती थीं ॥ ४३ ॥
घंटा तथा आरोहियोंसमेत हाथियोंको अपने हाथमें पकड़कर वे देवी उन्हें मुखमें डाल लेती थीं ४४ और उन्हें चबा - चबाकर अट्टहास करने लगती थीं । उसी प्रकार वे घोड़ों, ऊँटों और सारथियोंसहित रथोंको अपने मुखमें डालकर दाँतोंसे अत्यन्त भयानक ४५ रूपसे चबाने लगती थीं ॥ ४४-४५ ॥ अपनी सेनाको मारे जाते देखकर महान् असुर चण्ड - मुण्डने निरन्तर बाण - - व वृष्टिके द्वारा भगवतीको आच्छादित कर दिया ॥ ४६ ॥
४६ चण्डने सूर्यके समान तेजस्वी तथा भगवान् विष्णुके सुदर्शनचक्र के तुल्य प्रभाववाला चक्र बड़े वेगसे देवीपर चला दिया और वह बार - बार गरजने ४७ लगा ॥ ४७ ॥
उसे गर्जन करते देखकर कालीने अपने एक ही बाणसे उसके सूर्य - तुल्य तेजस्वी तथा सुदर्शनचक्र-सदृश प्रभावाले चक्रको काट डाला ॥ ४८ ॥
४८ तत्पश्चात् भगवती चण्डिकाने पत्थरकी सानपर चढ़ाये हुए अपने तीक्ष्ण बाणोंसे उस चण्डपर प्रहार किया । देवीके बाणोंसे अत्यधिक घायल होकर वह ४ ९ मूच्छित हो गया और पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ४ ९ ॥
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अ ० २६ ]
पतितं भ्रातरं वीक्ष्य मुण्डो दुःखार्दितस्तदा ।
चकार शरवृष्टिञ्च कालिकोपरि कोपतः ॥
चण्डिका मुण्डनिर्मुक्तां शरवृष्टिं सुदारुणाम् ।
ईषिकास्त्रैर्बलान्मुक्तैश्चकार तिलशः क्षणात् ॥
अर्धचन्द्रेण बाणेन ताडयामास तं पुनः ।
पतितोऽसौ महावीर्यो मेदिन्यां मदवर्जितः ॥
हाहाकारो महानासीद्दानवानां बले तदा ।
जहर्षुरमराः सर्वे गगनस्था गतव्यथाः ॥
विहाय मूर्च्छा चण्डस्तु संगृह्य महतीं गदाम् ।
तरसा ताडयामास कालिकां दक्षिणे भुजे ॥
वञ्चयित्वा गदाघातं तं बबन्ध महासुरम् ।
तरसा बाणपाशेन मन्त्रमुक्तेन कालिका ॥
उत्थितस्तु तदा मुण्डो बद्धं दृष्ट्वानुजं बलात् ।
आजगाम सुसन्नद्धः शक्तिं कृत्वा ' करे ` दृढाम् ॥
आगच्छन्तं तदा काली दानवं वीक्ष्य सत्वरम् ।
बबन्ध तरसा तं तु द्वितीयं भ्रातरं भृशम् ॥
गृहीत्वा तौ महावीर्यौ चण्डमुण्डौ शशाविव ।
कुर्वती विपुलं हासमाजगामाम्बिकां प्रति ॥
आगत्य तामथोवाच गृहाणेमौ पशू प्रिये ।
रणयज्ञार्थमानीतौ दानवौ रणदुर्जयौ ॥
तावानीतौ तदा वीक्ष्य चण्डिका तौ वृकाविव ।
अम्बिका कालिकां प्राह माधुरीसंयुतं वचः ॥
वधं मा कुरु मा मुञ्च चतुरासि रणप्रिये ।
देवानां कार्यसंसिद्धिः कर्तव्या तरसा त्वया ॥
1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] -22 A पञ्चम स्कन्ध ६७३ उस समय अपने भाईको पृथ्वीपर गिरा हुआ ५० देखकर मुण्ड दुःखसे व्याकुल हो उठा और कुपित होकर कालिकाके ऊपर बाणोंकी वर्षा करने लगा ॥ ५० ॥
भगवती चण्डिकाने मुण्डके द्वारा की गयी ५१ अत्यन्त भीषण बाणवर्षाको अपने द्वारा छोड़े गये ईषिकास्त्रोंसे बलपूर्वक तिल - तिल करके क्षणभरमें ही नष्ट कर डाला ॥ ५१ ॥
५२ तत्पश्चात् चण्डिकाने एक अर्धचन्द्राकार बाणसे मुण्डपर पुनः प्रहार किया, जिससे वह महाशक्तिशाली दैत्य मदहीन होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ५२ ॥
[ यह देखकर ] उस समय दानवोंकी सेनामें महान् ५३ हाहाकार मच गया । आकाशमें विद्यमान सभी देवताओंकी व्यथा दूर हो गयी और वे हर्षसे भर उठे ॥ ५३ ॥
इसके बाद कुछ देरमें मूर्च्छा दूर होनेपर चण्डने ५४ एक विशाल गदा लेकर बड़े वेगसे कालिकाकी दाहिनी भुजापर प्रहार किया ॥ ५४ ॥
भगवती कालिकाने उसके गदाप्रहारको रोककर ५५ अभिमन्त्रित करके छोड़े गये बाण - पाशसे उस महान् असुरको शीघ्र ही बाँध लिया ॥ ५५ ॥
उधर जब मुण्ड चेतनामें आया तब अपने अनुजको ५६ पाशास्त्रमें बलपूर्वक बँधा देखकर कवच पहने हुए वह अपने हाथमें एक सुदृढ़ शक्ति लेकर आ गया ॥ ५६ ॥
तब भगवती कालीने उस दूसरे भाई दानव ५७ मुण्डको बड़े वेग से अपनी ओर आता हुआ देखकर उसे भी बड़ी मजबूती से बाँध लिया ॥५७ ॥
इस प्रकार महाबली चण्ड- ड - मुण्डको खरगोशकी ५८ तरह पकड़कर जोर - जोर से हँसती हुई वे कालिका अम्बिकाके पास जा पहुँची । उनके पास आकर कालिका कहने लगीं - हे प्रिये! मैं रणयज्ञमें पशुबलि लिये इन रणदुर्जय दानवोंको यहाँ ले आयी हूँ, आप ५ ९ इन्हें स्वीकार करें॥५८-५९ ॥ तब उन लाये गये दोनों दानवोंको भेड़ियेकी तरह दीन - हीन देखकर भगवती अम्बिकाने कालिकासे ६० मधुरताभरी वाणीमें कहा — हे रणप्रिये! न इनका वध करो और न छोड़ो ही । तुम चतुर हो अतः किसी उपायसे अब तुम्हें शीघ्र ही देवताओंका कार्य सिद्ध ६१ | करना चाहिये ॥ ६०-६१ ॥
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६७४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २७ व्यास उवाच
इति तस्या वचः श्रुत्वा कालिका प्राह तां पुनः ।
युद्धयज्ञेऽतिविख्याते खड्गयूपे प्रतिष्ठिते ॥ ६२
आलम्भञ्च करिष्यामि यथा हिंसा न जायते ।
इत्युक्त्वा सा तदा देवी खड्गेन शिरसी तयोः ॥ ६३
चकर्त तरसा काली पपौ च रुधिरं मुदा ।
एवं दैत्यौ हतौ दृष्ट्वा मुदितोवाच चाम्बिका ॥ ६४
कृतं कार्यं सुराणां ते ददाम्यद्य वरं शुभम् ।
चण्डमुण्डौ हतौ यस्मात्तस्मात्ते नाम कालिके ।
चामुण्डेति सुविख्यातं भविष्यति धरातले ॥ ६५
व्यासजी बोले – अम्बिकाकी यह बात सुनकर कालिकाने उनसे पुन: कहा- जिस प्रकार यज्ञभूमिमें यूप स्थापित किये जाते हैं, उसी प्रकार विख्यात युद्धयज्ञमें बलिदान - स्तम्भके रूपमें प्रतिष्ठित खड्गके द्वारा मैं आलम्भनपूर्वक इस तरह इनका वध करूँगी, जिससे हिंसा नहीं होगी ॥ ६२३ ॥
ऐसा कहकर देवी कालिकाने तुरंत तलवारसे उन दोनोंका सिर काट लिया और वे आनन्दपूर्वक रुधिरपान करने लगीं ॥ ६३३ ॥
इस प्रकार उन दोनों दैत्योंको मारा गया देखकर अम्बिकाने प्रसन्न होकर कहा- तुमने आज देवताओंका महान् कार्य किया है इसीलिये मैं तुम्हें एक शुभ वरदान दे रही हूँ । हे कालिके! चूँकि तुमने चण्ड - मुण्डका वध किया है, इसलिये अब तुम इस पृथ्वीलोकमें ' चामुण्डा ' - इस नामसे । अत्यधिक विख्यात होओगी ॥ ६४-६५ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे चण्डमुण्डवधेन देव्याश्चामुण्डेतिनामवर्णनं नाम षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥
अथ सप्तविंशोऽध्यायः शुम्भका रक्तबीजको भगवती अम्बिकाके व्यास उवाच
हतौ तौ दानवौ दृष्ट्वा हतशेषाश्च सैनिकाः ।
पलायनं ततः कृत्वा जग्मुः सर्वे नृपं प्रति ॥ १
भिन्नाङ्गा विशिखैः केचित्केचिच्छिन्नकरास्तथा । रुधिरस्त्रावदेहाश्च रुदन्तोऽभिययुः रुदन्तोऽभिययुः पुरे ॥ २
गत्वा दैत्यपतिं सर्वे चक्रुर्बुम्बारवं मुहुः ।
रक्ष रक्ष महाराज भक्षयत्यद्य कालिका ॥ ३
तया हतौ महावीरौ चण्डमुण्डौ सुरार्दनौ ।
भक्षिताः सैनिकाः सर्वे वयं भग्ना भयातुराः ॥ ४
भीतिदञ्च रणस्थानं कृतं कालिकया प्रभो ।
पातितैर्गजवीराश्वैर्दासेरकपदातिभिः ॥ ५
पास भेजना और उसका देवीसे वार्तालाप व्यासजी बोले - [ हे राजन्! ] उन दोनों दैत्योंको मारा गया देखकर मरनेसे बचे सभी सैनिक भागकर राजा शुम्भके पास गये । कुछ सैनिकोंके अंग बाणोंसे छिद गये थे, कुछके हाथ कट गये थे, उनके पूरे शरीरसे रक्त बह रहा था; वे सब रोते हुए नगरमें पहुँचे॥१-२ ॥ दैत्यराज शुम्भके पास जाकर वे सब बार - बार चीख - पुकार करने लगे - हे महाराज! हमें बचा लीजिये, बचा लीजिये; नहीं तो आज हमें कालिका खा जायगी । उसने देवताओंका मर्दन करनेवाले महावीर चण्ड-: - मुण्डको मार डाला और वह बहुत-से सैनिकोंको खा गयी । अंग - भंग हुए हमलोग इस समय भयसे व्याकुल हैं ॥ ३-४ ॥ हे प्रभो! मरे पड़े हाथियों, घोड़ों, ऊँटों तथा पैदल सैनिकोंसे उस कालिकाने युद्धभूमिको अत्यन्त डरावना बना दिया है ॥ ५ ॥
1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] -22 B
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अ ० २७ ] पञ्चम स्कन्ध ६७५
शोणितौघवहा कुल्या कृता मांसातिकर्दमा ।
भग्नरथचक्रविराजिता ॥
छिन्नबाह्वादिमत्स्याढ्या शीर्षतुम्बीफलान्विता ।
भयदा कातराणां वै सुराणां मोदवर्धिनी ॥
कुलं रक्ष महाराज पातालं गच्छ सत्वरम् ।
क्रुद्धा देवी क्षयं सद्यः करिष्यति न संशयः ॥
सिंहोऽपि भक्षयत्याजौ दानवान्दनुजेश्वर ।
तथैव कालिका देवी हन्ति बाणैरनेकधा ॥
तस्मात्त्वमपि राजेन्द्र मरणाय मृषा मतिम् ।
करोषि सहितो भ्रात्रा शुम्भेन कुपिताशयः ॥
किं करिष्यति नार्येषा क्रूरा कुलविनाशिनी ।
यस्या हेतोर्महाराज हन्तुमिच्छसि बान्धवान् ॥
दैवाधीनौ महाराज लोके जयपराजयौ ।
अल्पार्थाय महद्दुःखं बुद्धिमान्न प्रकल्पयेत् ॥
चित्रं पश्य विधेः कर्म यदधीनं जगत् प्रभो ।
निहता राक्षसाः सर्वे स्त्रिया पश्यैकयानया ॥
जेता त्वं लोकपालानां सैन्ययुक्तो हि साम्प्रतम् । एका प्रार्थयते बाला युद्धायेति सुसम्भ्रमः ।
पुरा त्वया तपस्तप्तं पुष्करे देवतायने ।
वरदानाय सम्प्राप्तो ब्रह्मा लोकपितामहः ॥
धात्रोक्तस्त्वं महाराज वरं वरय सुव्रत ।
तदा त्वयामरत्वं च प्रार्थितं ब्रह्मणः किल ॥
उसने समरभूमिमें रक्तकी नदी बना डाली है, ६ जिसमें मांस कीचड़की भाँति, मस्तकके केश सेवारके सदृश और टूटे हुए रथोंके पहिये भँवरके समान, सैनिकोंके कटे हाथ आदि मछलीके समान और सिर तुम्बीफल तुल्य प्रतीत हो रहे हैं । वह [ रुधिर-७ नदी ] कायरोंको भयभीत करनेवाली तथा देवताओंके हर्षको बढ़ानेवाली है॥६-७ ॥ हे महाराज! अब आप दैत्यकुलकी रक्षा कीजिये ८ और शीघ्र पाताललोक चले जाइये; अन्यथा क्रोधमें भरी वह देवी आज ही [ सभी दानवोंका ] विनाश कर डालेगी, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ८ ॥
हे दानवेन्द्र! अम्बिकाका वाहन सिंह भी युद्धभूमिमें दानवोंको खाता जा रहा है और कालिकादेवी अपने बाणोंसे [ दैत्य सैनिकोंका ] अनेक तरहसे वध कर रही है । अतएव हे राजेन्द्र! आप भी कोपके १० वशीभूत होकर अपने भाई निशुम्भसहित मरनेका व्यर्थ विचार कर रहे हैं ॥ ९ -१० ॥ हे महाराज! राक्षसकुलका नाश करनेवाली यह ११ क्रूर स्त्री, जिसके लिये आप अपने बन्धुओंको मरवा डालना चाहते हैं, यदि आपको प्राप्त हो ही गयी तो यह आपको क्या सुख प्रदान करेगी? ॥ ११ ॥
हे महाराज! जगत्में जय तथा पराजय दैवके १२ अधीन होती है । बुद्धिमान्को चाहिये कि अल्प प्रयोजनके लिये भारी कष्ट न उठाये ॥ १२ ॥
हे प्रभो! जिसके अधीन यह सारा जगत् रहता है, उस विधाताका अद्भुत कर्म देखिये कि इस १३ स्त्रीने अकेले ही सम्पूर्ण राक्षसोंका संहार कर डाला ॥ १३ ॥
आप लोकपालोंको जीत चुके हैं और इस समय १४ | आपके पास बहुत - से सैनिक भी हैं तथापि एक स्त्री युद्धके लिये आपको ललकार रही है; यह महान् आश्चर्य है! ॥ १४ ॥
पूर्वकालमें आपने पुष्कर तीर्थमें एक देवालयमें १५ तप किया था । उस समय वर प्रदान करनेके लिये लोकपितामह ब्रह्माजी आपके पास आये थे । हे महाराज! जब ब्रह्माजीने आपसे कहा - ' हे सुव्रत! १६ | वर माँगो ' तब आपने ब्रह्माजीसे अमर होनेकी यह 1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] -22 C
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६७६
देवदैत्यमनुष्येभ्यो न भवेन्मरणं मम ।
सर्पकिन्नरयक्षेभ्यः पुंल्लिङ्गवाचकादपि ॥
तस्मात्त्वां हन्तुकामैषा प्राप्ता योषिद्वरा प्रभो । युद्धं मा कुरु राजेन्द्र विचार्यैवं धियाधुना देवी ह्येषा महामाया प्रकृतिः परमा मता । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २७ प्रार्थना की थी- ' देवता, दैत्य, मनुष्य, सर्प, किन्नर, १७ यक्ष और पुरुषवाचक जो भी प्राणी हैं- इनमें किसीसे भी मेरी मृत्यु न हो ' ॥ १५–१७ ॥ हे प्रभो! इसी कारणसे यह श्रेष्ठ स्त्री आपका वध करनेकी इच्छासे आयी हुई है । अतएव हे ॥ १८ राजेन्द्र! बुद्धिसे ऐसा विचार करके अब आप युद्ध मत कीजिये ॥ १८ ॥
इन देवी अम्बिकाको ही महामाया और परमा कल्पान्तकाले राजेन्द्र सर्वसंहारकारिणी ॥ १ ९ प्रकृति कहा गया है । हे राजेन्द्र! कल्पके अन्तमें ये उत्पादयित्री लोकानां देवानामीश्वरी शुभा त्रिगुणा तामसी देवी सर्वशक्तिसमन्विता अजय्या चाक्षया नित्या सर्वज्ञा च सदोदिता वेदमाता च गायत्री सन्ध्या सर्वसुरालया निर्गुणा सगुणा सिद्धा सर्वसिद्धिप्रदाव्यया । आनन्दानन्ददा गौरी देवानामभयप्रदा एवं ज्ञात्वा महाराज वैरभावं त्यजानया शरणं व्रज राजेन्द्र देवी त्वां पालयिष्यति आज्ञाकरो भवैतस्याः सञ्जीवय निजं कुलम् हतशेषाश्च ये दैत्यास्ते भवन्तु चिरायुषः व्यास उवाच इति तेषां वचः श्रुत्वा शुम्भः सुरबलार्दनः उवाच वचनं तथ्यं वीरवर्यगुणान्वितम् शुम्भ उवाच मौनं कुर्वन्तु भो मन्दा यूयं भग्ना रणाजिरात् शीघ्रं गच्छत पातालं जीविताशा बलीयसी भगवती ही सम्पूर्ण सृष्टिका संहार करती हैं ॥ १ ९ ॥ सबपर शासन करनेवाली ये कल्याणमयी देवी । सम्पूर्ण लोकों तथा देवताओंको भी उत्पन्न करनेवाली ॥ २० हैं । ये देवी तीनों गुणोंसे युक्त हैं, फिर भी ये विशेषरूपसे तमोगुणसे युक्त और सभी प्रकारकी शक्तियोंसे सम्पन्न हैं । ये अजेय, विनाशरहित, नित्य, । सर्वज्ञ तथा सदा विराजमान रहती हैं । वेदमाता गायत्री ॥ २१ और सन्ध्याके रूपमें प्रतिष्ठित ये देवी सम्पूर्ण देवताओंको आश्रय प्रदान करती हैं । ये देवी निर्गुण तथा सगुण-रूपवाली, स्वयं सिद्धिस्वरूपिणी, सम्पूर्ण सिद्धियोंको देनेवाली, अविनाशिनी, आनन्दस्वरूपा, सबको आनन्द ॥ २२ देनेवाली, गौरी नामसे विख्यात तथा देवताओंको अभय प्रदान करनेवाली हैं ॥ २० - २२ ॥ । हे महाराज! ऐसा जानकर आप इनके साथ ॥ २३ वैरभावका परित्याग कर दीजिये । हे राजेन्द्र! आप इनकी शरणमें चले जाइये; ये भगवती आपकी रक्षा करेंगी । आप इनके सेवक बन जाइये [ और । इस प्रकार ] अपने कुलका जीवन बचा लीजिये; ॥ २४ मरने से बचे हुए जो दैत्य हैं, वे भी दीर्घजीवी हो जायँ ॥ २३-२४ ॥ व्यासजी बोले – उनका यह वचन सुनकर । देवसेनाका मर्दन करनेवाले शुम्भने महान् वीरोंके पराक्रम- - गुणसे सम्पन्न यथार्थ वचन कहना आरम्भ ॥ २५ किया ॥ २५ ॥
शुम्भ बोला- अरे मूर्खो! चुप रहो; तुमलोग युद्धभूमिसे भाग आये हो । तुम्हें यदि जीवित । रहनेकी प्रबल अभिलाषा है तो तुम सब अभी ॥ २६ । पाताललोक चले जाओ ॥ २६ ॥
1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] - 22 D
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अ ० २७ ] पञ्चम स्कन्ध ६७७
दैवाधीनं जगत्सर्वं का चिन्तात्र जये मम ।
देवास्तथैव ब्रह्माद्या दैवाधीना वयं यथा ॥
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रोऽयं यमो ऽग्निर्वरुणस्तथा ।
सूर्यश्चन्द्रस्तथा शक्रः सर्वे दैववशाः किल ॥
का चिन्ता तर्हि मे मन्दा यद्भावि तद्भविष्यति ।
उद्यमस्तादृशो भूयाद्यादृशी भवितव्यता ॥
सर्वथैवं विचार्यैव न शोचन्ति बुधाः क्वचित् ।
स्वधर्मं न त्यजन्तीह ज्ञानिनो मरणाद्भयात् ॥
सुखं दुःखं तथैवायुर्जीवितं मरणं नृणाम् ।
काले भवति सम्प्राप्ते सर्वथा दैवनिर्मितम् ॥
ब्रह्मा पतति काले स्वे विष्णुश्च पार्वतीपतिः ।
नाशं गच्छन्त्यायुषोऽन्ते सर्वे देवाः सवासवाः ॥
तथाहमपि कालस्य वशग: सर्वथाधुना ।
नाशं जयं वा गन्तास्मि स्वधर्मपरिपालनात् ॥
आहूतोऽप्यनया कामं युद्धायाबलया किल ।
कथं पलायनपरो जीवेयं शरदां शतम् ॥
करिष्याम्यद्य संग्रामं यद्भावि तद्भवत्विह ।
जयो वा मरणं वापि स्वीकरोमि यथा तथा ॥
दैवं मिथ्येति विद्वांसो वदन्त्युद्यमवादिनः ।
युक्तियुक्तं वचस्तेषां ये जानन्त्यभिभाषितम् ॥
उद्यमेन विना कामं न सिध्यन्ति मनोरथाः ।
कातरा एव जल्पन्ति यद्भाव्यं तद्भविष्यति ॥
अदृष्टं बलवन्मूढाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ।
प्रमाणं तस्य सत्त्वे किमदृश्यं दृश्यते कथम् ॥
जब यह सारा संसार ही दैवके अधीन है, तब २७ विजयके सम्बन्धमें मुझे क्या चिन्ता हो सकती है? जैसे हमलोग दैवके अधीन हैं, वैसे ही ब्रह्मा आदि देवता भी सदा दैवके अधीन रहते हैं । ब्रह्मा, विष्णु, महेश, यम, अग्नि, वरुण, सूर्य, चन्द्र और इन्द्र – ये २८ सब देवता सदा दैवके अधीन हैं । हे मूर्खो! तब मुझे किस बात की चिन्ता? जो होना होगा, वह तो होकर रहेगा । जैसी भवितव्यता होती है, उसी प्रकारका २ ९ उद्यम भी आरम्भ हो जाता है । सब प्रकारसे ऐसा विचार करके विद्वान् लोग कभी शोक नहीं करते । ज्ञानी लोग मृत्युके भयसे अपने धर्मका त्याग नहीं ३० | करते ॥ २७–३० ॥ समय आनेपर दैवकी प्रेरणासे मनुष्योंको सुख, दुःख, आयु, जीवन तथा मरण - ये सब निश्चितरूपसे ३१ प्राप्त होते हैं । अपना - अपना समय पूरा हो जानेपर ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी नष्ट हो जाते हैं । इन्द्रसहित सभी देवता भी अपनी आयुके अन्तमें विनाशको प्राप्त ३२ होते हैं । उसी प्रकार मैं भी सर्वथा कालका वशवर्ती हूँ । अतः अब मुझे विनाश अथवा विजय जो भी प्राप्त होगी, उसे मैं अपने धर्मका सम्यक् पालन करते हुए ३३ स्वीकार करूँगा ॥ ३१–३३ ॥ जब इस स्त्रीने मुझे युद्धके लिये ललकारा है, तब [ उसके भयसे ] भागकर मैं सैकड़ों वर्ष जीवित रहनेकी आशा क्यों करूँ? मैं आज ही उसके साथ ३४ युद्ध करूँगा, फिर जो होना है वह होवे । युद्धमें विजय अथवा मृत्यु जो भी प्राप्त होगी, उसे मैं स्वीकार करूँगा ॥ ३४-३५ ॥ ३५ ' दैव मिथ्या है ' – ऐसा उद्यमवादी विद्वान् कहते हैं । इस प्रकार जो शास्त्रको जानते हैं, उन उद्यमवादी विद्वानोंकी बात युक्तियुक्त भी है ॥ ३६ ॥
३६ बिना उद्यम किये मनोरथ कभी सिद्ध नहीं होते । केवल कायर लोग ही कहते हैं कि जो होना होगा, वह तो होकर रहेगा । अदृष्ट - प्रारब्ध बलवान् होता ३७ है- ऐसी बात मूर्ख कहते हैं न कि पण्डितजन । प्रारब्धकी सत्ता है - इसमें क्या प्रमाण हो सकता है? क्योंकि जो स्वयं अदृष्ट है, वह भला कैसे दिखायी
३८ | पड़ सकता है? ॥। ३७-३८ ॥
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६७८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २७
अदृष्टं क्वापि दृष्टं स्यादेषा मूर्खविभीषिका ।
अवलम्बं विनैवैषा दुःखे चित्तस्य धारणा ॥
चक्रीसमीपे संविष्टा संस्थिता पिष्टकारिणी ।
उद्यमेन विना पिष्टं न भवत्येव सर्वथा ॥
उद्यमे च कृते कार्यं सिद्धिं यात्येव सर्वथा ।
कदाचित्तस्य न्यूनत्वे कार्यं नैव भवेदपि ॥
देशं कालञ्च विज्ञाय स्वबलं शत्रुजं बलम् ।
कृतं कार्यं भवत्येव बृहस्पतिवचो यथा ॥
व्यास उवाच
इति निश्चित्य दैत्येन्द्रो रक्तबीजं महासुरम् ।
प्रेषयामास संग्रामे सैन्येन महतावृतम् ॥
शुम्भ उवाच
रक्तबीज महाबाहो गच्छ त्वं समराङ्गणे ।
कुरु युद्धं महाभाग यथा ते बलमाहितम् ॥
रक्तबीज उवाच
महाराज न ते कार्या चिन्ता स्वल्पतरापि वा ।
अहमेनां हनिष्यामि करिष्यामि वशे तव ॥
पश्य मे युद्धचातुर्यं क्वेयं बाला सुरप्रिया ।
दासीं तेऽहं करिष्यामि जित्वेमां समरे बलात् ॥
व्यास उवाच
इत्याभाष्य कुरुश्रेष्ठ रक्तबीजो महासुरः ।
जगाम रथमारुह्य स्वसैन्यपरिवारितः ॥
हस्त्यश्वरथपादातवृन्दैश्च परिवेष्टितः ।
निर्जगाम रथारूढो देवीं शैलोपरिस्थिताम् ॥
तमागतं समालोक्य देवी शङ्खमवादयत् ।
भयदं सर्वदैत्यानां देवानां मोदवर्धनम् ॥
अदृष्टको कभी किसीने देखा भी है क्या? ३ ९ यह तो मूर्खोंके लिये विभीषिकामात्र है । इसका कोई आधार नहीं है; केवल कष्टकी स्थिति में मनको ढाँढ़स देनेके लिये वह सहारामात्र अवश्य ४० बन जाता है ॥ ३ ९ ॥ आटा पीसनेवाली कोई स्त्री चक्कीके पास चुपचाप बैठी रहे, तो बिना उद्यम किये किसी प्रकार ४१ भी आटा तैयार नहीं हो सकता ॥ ४० ॥
उद्यम करनेपर ही हर प्रकारसे कार्य सिद्ध होता है । जब कभी उद्यम करनेमें कमी रह जाती है, तब ४२ कार्य किसी तरह सिद्ध नहीं हो पाता है ॥ ४१ ॥
देश, काल, अपना बल तथा शत्रुका बल— इन सबकी पूरी जानकारी करके किया गया कार्य निश्चय ही सिद्ध होता है - यह आचार्य बृहस्पतिका वचन है ॥ ४२ ॥
४३ व्यासजी बोले- ऐसा निश्चय करके दैत्यराज शुम्भने महान् असुर रक्तबीजको विशाल सेनाके साथ समरभूमिमें जानेकी आज्ञा दी ॥४३ ॥
४४ शुभ बोला- हे विशाल भुजाओंवाले रक्तबीज! तुम युद्धभूमिमें जाओ; और हे महाभाग! अपनी पूरी शक्ति लगाकर युद्ध करो ॥४४ ॥
रक्तबीज बोला- हे महाराज! आपको तनिक भी चिन्ता नहीं करनी चाहिये । मैं इस स्त्रीको या तो ४५ मार डालूँगा और या तो इसे आपके अधीन कर दूँगा । आप मेरा बुद्धिचातुर्य देखें । [ मेरे आगे ] देवताओंकी प्रिय यह बाला है ही क्या? मैं इसे युद्धमें बलपूर्वक ४६ जीतकर आपकी दासी बना दूँगा ॥ ४५-४६ ॥ व्यासजी बोले – हे कुरुश्रेष्ठ! ऐसा कहकर महान् असुर रक्तबीज रथपर आरूढ होकर अपनी सेनाके साथ चल पड़ा ॥४७ ॥
४७ हाथी, घोड़े, रथ तथा पैदल सैनिकोंसे चारों ओरसे आवृत हुआ रक्तबीज रथपर आरूढ़ होकर पर्वत पर विराजमान भगवतीकी ओर चल ४८ दिया ॥ ४८ ॥
उसे आया हुआ देखकर देवीने शंख बजाया । वह शंखनाद सभी दैत्योंके लिये भयदायक तथा ४ ९ । देवताओंके लिये हर्षवर्धक था ॥ ४ ९ ॥
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अ ० २७ ] पञ्चम
श्रुत्वा शङ्खस्वनं चोग्रं रक्तबीजोऽतिवेगवान् ।
गत्वा समीपे चामुण्डां बभाषे वचनं मृदु ॥५०
रक्तबीज उवाच
बाले किं मां भीषयसि मत्वा त्वं कातरं किल ।
शङ्खनादेन तन्वङ्गि वेत्सि किं धूम्रलोचनम् ॥ ५१
रक्तबीजोऽस्मि नाम्नाहं त्वत्सकाशमिहागतः ।
युद्धेच्छा चेत्पिकालापे सज्जा भव भयं न मे ॥ ५२
पश्याद्य मे बलं कान्ते दृष्टा ये कातरास्त्वया ।
नाहं पङ्क्तिगतस्तेषां कुरु युद्धं यथेच्छसि ॥ ५३
वृद्धाश्च सेविताः पूर्वं नीतिशास्त्रं श्रुतं त्वया ।
पठितं चार्थविज्ञानं विद्वद्गोष्ठी कृताथ वा ॥५४
साहित्यतन्त्रविज्ञानं चेदस्ति तव सुन्दरि ।
शृणु मे वचनं पथ्यं तथ्यं प्रमितिबृंहितम् ॥ ५५
रसानाञ्च नवानां वै द्वावेव मुख्यतां गतौ ।
शृङ्गारकः शान्तिरसो विद्वज्जनसभासु च ॥५६
तयोः शृङ्गार एवादौ नृपभावे प्रतिष्ठितः ।
विष्णुर्लक्ष्म्या सहास्ते वै सावित्र्या चतुराननः ॥ ५७
शच्येन्द्रः शैलसुतया शङ्करः सह शेरते ।
वल्ल्या वृक्षो मृगो मृग्या कपोत्या च कपोतकः ॥ ५८
एवं सर्वे प्राणभृतः संयोगरसिका भृशम् ।
अप्राप्तभोगविभवा ये चान्ये कातरा नराः ॥ ५ ९
भवन्ति यतयस्ते वै मूढा दैवेन वञ्चिताः ।
असंसाररसज्ञास्ते वञ्चिता वञ्चनापरैः ॥ ६०
मधुरालापनिपुणै रताः शान्तिरसे हि ते ।
क्व ज्ञानं क्व च वैराग्यं वर्तमाने मनोभवे ॥ ६१ ।
स्कन्ध ६७ ९ उस भीषण शंखध्वनिको सुनकर वह रक्तबीज बड़े वेगसे देवी चामुण्डाके पास पहुँचकर मधुर वाणीमें उनसे कहने लगा ॥५० ॥
रक्तबीज बोला- हे बाले! क्या तुम कायर समझकर अपने शंखनादसे मुझको डरा रही हो? हे कोमलांगि! क्या तुमने मुझे धूम्रलोचन समझ रखा है? ॥५१ ॥
मेरा नाम रक्तबीज है । मैं यहाँ तुम्हारे ही पास आया हूँ । हे पिकभाषिणि! यदि तुम्हारी युद्ध करनेकी इच्छा हो तो तैयार हो जाओ; मुझे तुमसे भय नहीं है ॥५२ ॥
हे कान्ते! अब तुम मेरा पराक्रम देखो । अभीतक तुमने जिन - जिन कायर दैत्योंको देखा है, उनकी श्रेणीका मैं नहीं हूँ । तुम जिस तरहसे चाहो, वैसे लड़ लो ॥५३ ॥
हे सुन्दरि! यदि तुमने वृद्धजनोंकी सेवा की हो, नीतिशास्त्रका अध्ययन किया हो, अर्थशास्त्र पढ़ा हो, विद्वानोंकी गोष्ठीमें भाग लिया हो और यदि तुम्हें साहित्य तथा तन्त्रविज्ञानका ज्ञान हो, तो मेरी हितकर, यथार्थ तथा प्रामाणिक बात सुन लो ॥ ५४-५५ ॥ विद्वानों की सभाओंमें नौ रसोंके अन्तर्गत शृंगाररस तथा शान्तिरस – ये दो रस ही मुख्य माने गये हैं । उन दोनोंमें भी शृंगाररस रसोंके राजाके रूपमें प्रतिष्ठित है । [ इसीके प्रभावसे ] विष्णु लक्ष्मी साथ, ब्रह्मा सावित्रीके साथ, इन्द्र शचीके साथ और भगवान् शिव पार्वतीके साथ निवास करते हैं; उसी प्रकार वृक्ष लताके साथ, मृग मृगीके साथ और कपोत कपोतीके साथ आनन्दपूर्वक रहते हैं॥५६–५८ ॥ इस प्रकार जगत् के समस्त जीवधारी संयोगजनित सुखका अत्यधिक उपभोग करते हैं । जो लोग भोग तथा वैभवका सुख नहीं प्राप्त कर सके हैं और अन्य जो कातर मनुष्य हैं, वे निश्चय ही मूर्ख हैं और दैवसे वंचित होकर यति हो जाते हैं । संसारके रसका ज्ञान न रखनेवाले वे लोग मीठी - मीठी बात बोलनेमें निपुण धूर्तों तथा वंचकोंद्वारा ठग लिये जाते हैं और सदा शान्तरसमें निमग्न रहते हैं; किंतु काम, लोभ, भयंकर क्रोध और बुद्धिनाशक मोहके उत्पन्न होते ही
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६८० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २८
लोभे क्रोधे च दुर्धर्षे मोहे मतिविनाशके ।
तस्मात्त्वमपि कल्याणि कुरु कान्तं मनोहरम् ॥
शुम्भं सुराणां जेतारं निशुम्भं वा महाबलम् । व्यास उवाच
इत्युक्त्वा रक्तबीजोऽसौ विरराम पुरः स्थितः ।
श्रुत्वा जहास चामुण्डा कालिका चाम्बिका तथा ॥
कहाँ ज्ञान रह जाता है और कहाँ वैराग्य! अतएव ६२ हे कल्याणि! तुम भी देवताओंपर विजय प्राप्त कर लेनेवाले मनोहर तथा महाबली शुम्भ अथवा निशुम्भको पति बना लो ॥ ५ ९ –६२३ ॥ व्यासजी बोले- इतना कहकर वह रक्तबीज देवीके सामने चुपचाप खड़ा हो गया । उसकी बातें सुनकर ६३ । चामुण्डा, कालिका और अम्बिका हँसने लगीं ॥ ६३ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे रक्तबीजद्वारा देवीसमीपे शुम्भनिशुम्भसंवादवर्णनं नाम सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥
अथाष्टाविंशोऽध्यायः देवीके साथ रक्तबीजका युद्ध, विभिन्न शक्तियोंके साथ भगवान् शिवका रणस्थलमें आना तथा भगवतीका उन्हें दूत बनाकर शुम्भके पास भेजना, भगवान् शिवके सन्देशसे दानवोंका क्रुद्ध होकर युद्धके लिये आना व्यास उवाच
कृत्वा हास्यं ततो देवी तमुवाच विशांपते ।
मेघगम्भीरया वाचा युक्तियुक्तमिदं वचः ॥
पूर्वमेव मया प्रोक्तं मन्दात्मन् किं विकत्थसे ।
दूतस्याग्रे यथायोग्यं वचनं हितसंयुतम् ॥
सदृशो मम रूपेण बलेन विभवेन च ।
त्रिलोक्यां यदि कोऽपि स्यात्तं पतिं प्रवृणोम्यहम् ॥
ब्रूहि शुम्भ निशुम्भञ्च प्रतिज्ञा मे पुरा कृता । व्यासजी बोले – हे राजन्! तत्पश्चात् वे देवी हँसकर मेघके समान गम्भीर वाणीमें उस रक्तबीजसे १ यह युक्तिसंगत वचन बोलीं- हे मन्दबुद्धि! तुम क्यों व्यर्थ प्रलाप कर रहे हो? मैं तो पहले ही दूतके सामने उचित और हितकर बात कह चुकी हूँ कि यदि तीनों २ लोकोंमें कोई भी पुरुष रूप, बल और वैभवमें मेरे समान हो तो मैं पतिरूपमें उसका वरण कर लूँगी । अब तुम शुम्भ - निशुम्भसे कह दो कि मैं पूर्वकालमें ३ ऐसी प्रतिज्ञा कर चुकी हूँ, अतः मेरे साथ युद्ध करो और रणमें मुझे जीतकर [ मेरे साथ ] विधिवत् विवाह कर लो ॥१-४ ॥ तस्माद्युध्यस्व जित्वा मां विवाहं विधिवत्कुरु ॥४
त्वं वै तदाज्ञया प्राप्तस्तस्य कार्यार्थसिद्धये ।
संग्रामं कुरु पातालं गच्छ वा पतिना सह ॥
व्यास उवाच
तच्छ्रुत्वा वचनं देव्याः स दैत्योऽमर्षपूरितः ।
मुमोच तरसा बाणान्सिंहस्योपरि दारुणान् ॥
अम्बिका ताञ्छरान्वीक्ष्य गगने पन्नगोपमान् ।
चिच्छेद सायकैस्तीक्ष्णैर्लघुहस्ततया क्षणात् ॥
तुम भी शुम्भकी आज्ञासे उसका कार्य सिद्ध करनेके लिये यहाँ आये हो । अतएव यदि चाहो तो ५ मेरे साथ युद्ध करो अथवा अपने स्वामीके साथ पाताललोक चले जाओ ॥ ५ ॥
व्यासजी बोले –देवीकी बात सुनकर वह दैत्य क्रोधमें भर उठा और बड़े वेगसे देवीके सिंहपर ६ भीषण बाण छोड़ने लगा ॥ ६ ॥
सर्पसदृश उन बाणोंको देखकर अम्बिकाने दक्षतापूर्वक बड़ी फुर्तीके साथ अपने तीखे बाणोंसे ७ उन्हें आकाशमें ही क्षणभरमें काट डाला ॥७ ॥
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अ ० २८ ] पञ्चम
अन्यैर्जघान विशिखै रक्तबीजं महासुरम् ।
अम्बिका चापनिर्मुक्तैः कर्णाकृष्टैः शिलाशितैः ॥ ८
देवीबाणहतः पापो मूर्च्छामाप रथोपरि ।
पतिते रक्तबीजे तु हाहाकारो महानभूत् ॥ ९
सैनिकाश्चुक्रुशुः सर्वे हताः स्म इति चाब्रुवन् ।
ततो बुम्बारवं श्रुत्वा शुम्भः परमदारुणम् ॥ १०
उद्योगं सर्वसैन्यानां दैत्यानामादिदेश ह । शुम्भ उवाच निर्यान्तु दानवाः सर्वे काम्बोजाः स्वबलैर्वृताः ॥ ११ अन्येऽप्यतिबलाः शूराः कालकेया विशेषतः । व्यास उवाच इत्याज्ञप्तं बलं सर्वं शुम्भेन च चतुर्विधम् ॥ १२
निर्जगाम मदाविष्टं देवीसमरमण्डले ।
तमागतं समालोक्य चण्डिका दानवं बलम् ॥ १३
घण्टानादं चकाराशु भीषणं भयदं मुहुः ।
ज्यास्वनं शङ्खनादञ्च चकार जगदम्बिका ॥ १४
तेन नादेन सा जाता काली विस्तारितानना ।
श्रुत्वा तन्निनदं घोरं सिंहो देव्याश्च वाहनम् ॥ १५
जगर्ज सोऽपि बलवाञ्जनयन्भयमद्भुतम् ।
तन्निनादमुपश्रुत्य दानवाः क्रोधमूर्च्छिताः ॥ १६
सर्वे चिक्षिपुरस्त्राणि देवीं प्रति महाबलाः । तस्मिन्नेवायते युद्धे दारुणे लोमहर्षणे । १७
ब्रह्मादीनाञ्च देवानां शक्तयश्चण्डिकां ययुः ।
यस्य देवस्य यद्रूपं यथा भूषणवाहनम् ॥ १८
तादृग्रूपास्तदा देव्यः प्रययुः समराङ्गणे । स्कन्ध ६८१ इसके बाद अम्बिकाने कानतक खींचकर धनुषसे छोड़े गये तथा पत्थरपर घिसकर तीक्ष्ण बनाये गये अन्य बाणोंसे महान् असुर रक्तबीजपर प्रहार किया ॥ ८ ॥
भगवतीके बाणोंसे आहत होकर पापी रक्तबीज रथपर ही मूर्च्छित हो गया । रक्तबीजके गिर जानेपर बड़ा हाहाकार मच गया । उसके सभी सैनिक चीखने - चिल्लाने लगे और ‘ हाय! हम मारे गये’— ऐसा कहने लगे ॥ ९ ३ ॥ तब अपने सैनिकोंका अत्यन्त भीषण क्रन्दन सुनकर शुम्भने सभी दैत्ययोद्धाओंको शस्त्रास्त्रसे सुसज्जित होनेका आदेश दिया ॥ १०३ ॥
शुम्भ बोला- कम्बोजदेशके सभी दानव तथा उनके अतिरिक्त अन्य महाबली वीर विशेष करके कालकेयसंज्ञक पराक्रमी योद्धा भी अपनी - अपनी सेनाके साथ निकल पड़ें ॥ ११३ ॥
व्यासजी बोले — इस प्रकार शुम्भके आदेश देनेपर उसकी सारी चतुरंगिणी सेना मदमत्त होकर देवीके संग्रामस्थलके लिये निकल पड़ी । समरभूमिमें आयी हुई उस दानवी सेनाको देखकर भगवती चण्डिका बार- बार भीषण तथा भयदायक घंटानाद करने लगीं । जगदम्बाने धनुषका टंकार तथा शंखनाद किया । उस नादके होते ही भगवती काली भी अपना मुख फैलाकर घोर ध्वनि करने लगीं ॥ १२–१४३ ॥ उस भयंकर शब्दको सुनकर भगवतीका वाहन बलशाली सिंह भी अद्भुत भय उत्पन्न करता हुआ बड़े जोरका गर्जन करने लगा । वह निनाद सुनकर सभी दैत्य क्रोधके मारे बौखला उठे और वे महाबली दैत्य देवीपर अस्त्र छोड़ने लगे ॥ १५-१६३ ॥ उस भयानक तथा रोमांचकारी महासंग्राममें ब्रह्मा आदि देवताओंकी विभिन्न शक्तियाँ भी चण्डिकाके पास पहुँच गयीं । जिस देवताका जैसा रूप, भूषण तथा वाहन था; ठीक उसी प्रकारके रूप, भूषण तथा वाहनसे युक्त होकर सभी देवियाँ रणक्षेत्रमें पहुँची
थीं ॥। १७-१८३ ॥