देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 691–700
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 691–700
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६८२ ब्रह्माणी वरटारूढा साक्षसूत्रकमण्डलुः आगता ब्रह्मणः शक्तिर्ब्रह्माणीति प्रतिश्रुता वैष्णवी गरुडारूढा शङ्खचक्रगदाधरा पद्महस्ता समायाता पीताम्बरविभूषिता शाङ्करी तु वृषारूढा त्रिशूलवरधारिणी अर्धचन्द्रधरा देवी तथाहिवलया शिवा कौमारी शिखिसंरूढा शक्तिहस्ता वरानना युद्धकामा समायाता कार्तिकेयस्वरूपिणी इन्द्राणी सुष्ठुवदना सुश्वेतगजवाहना वज्रहस्तातिरोषाढ्या संग्रामाभिमुखी ययौ वाराही शूकराकारा प्रौढप्रेतासना मता नारसिंही नृसिंहस्य बिभ्रती सदृशं वपुः याम्या च महिषारूढा दण्डहस्ता भयप्रदा समायाताथ संग्रामे यमरूपा शुचिस्मिता तथैव वारुणी शक्तिः कौबेरी च मदोत्कटा एवंविधास्तथाकारा ययुः स्वस्वबलैर्वृताः आगतास्ताः समालोक्य देवी मुदमवाप च
स्वस्था मुमुदिरे देवा दैत्याश्च भयमाययुः ।
ताभिः परिवृतस्तत्र शङ्करो लोकशङ्करः ॥
समागम्य च संग्रामे चण्डिकामित्युवाच ह ।
हन्यन्तामसुराः शीघ्रं देवानां कार्यसिद्धये ॥
निशुम्भं चैव शुम्भं च ये चान्ये दानवाः स्थिताः ।
हत्वा दैत्यबलं सर्वं कृत्वा च निर्भयं जगत् ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २८ ॥ १ ९ ब्रह्माजीकी शक्ति, जो ब्रह्माणी नामसे प्रख्यात हैं, हाथमें अक्षसूत्र तथा कमण्डलु धारण करके । हंसपर आरूढ़ हो वहाँ आयीं । भगवान् विष्णुकी ॥ २० शक्ति वैष्णवी गरुडपर सवार होकर रणभूमिमें आयीं । वे पीताम्बरसे विभूषित थीं तथा उन्होंने । हाथोंमें शंख - चक्र - गदा - पद्म धारण कर रखा था । शंकरकी शक्ति भगवती शिवा बैलपर सवार ॥ २१ होकर हाथमें उत्तम त्रिशूल लिये मस्तकपर अर्धचन्द्र धारण किये तथा सर्पोंके कंगन पहने वहाँ उपस्थित
।
हुईं ॥ १ ९ – २१३ ॥
॥ २२ भगवान् कार्तिकेयके समान ही रूप धारण करके सुन्दर मुखवाली भगवती कौमारी युद्धकी । इच्छासे हाथमें शक्ति धारण करके मयूरपर आरूढ़ ॥ २३ होकर आयीं । सुन्दर मुखवाली इन्द्राणी अतिशय उज्ज्वल हाथीपर सवार होकर हाथमें वज्र लिये उग्र । क्रोधसे आविष्ट हो समरभूमिमें पहुँचीं । इसी प्रकार ॥ २४ सूकरका रूप धारण करके एक विशाल प्रेतपर सवार होकर भगवती वाराही, नृसिंहके समान रूप धारण करके भगवती नारसिंही और यमराजके ही समान । रूपवाली भयदायिनी शक्ति भगवती याम्या हाथमें ॥ २५ दण्ड धारण किये तथा महिषपर आरूढ़ होकर मधुर - मधुर मुसकराती हुई संग्राममें आयीं । उसी । प्रकार वरुणकी शक्ति वारुणी तथा कुबेरकी मदोन्मत्त ॥ २६ शक्ति कौबेरी भी समरभूमिमें पहुँच गयीं । इसी तरह अन्य देवताओंकी शक्तियाँ भी उन्हीं देवोंका रूप । धारणकर अपनी - अपनी सेनाओंके साथ रणभूमिमें ॥ २७ उपस्थित हुईं । उन शक्तियोंको वहाँ उपस्थित देखकर भगवती अम्बिका बहुत हर्षित हुईं । इससे देवता निश्चिन्त तथा प्रसन्न हो गये और दैत्य भयभीत हो उठे ॥ २२–२७३ ॥ २८ लोककल्याणकारी शिवजी भी उन शक्तियों के साथ वहाँ संग्राममें भगवती चण्डिकाके पास आकर उनसे कहने लगे - देवताओंकी कार्यसिद्धिके लिये २ ९ आप शुम्भ - निशुम्भ तथा अन्य जो भी दानव उपस्थित हैं, उन सबका वध कर दीजिये । साथ ही सारी असुर- सेनाका संहार करके और इस प्रकार संसारको ३० भयमुक्त करके ये समस्त शक्तियाँ अपने - अपने
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अ ० २८ ]
स्वानि स्वानि च धिष्ण्यानि समागच्छन्तु शक्तयः ।
देवा यज्ञभुजः सन्तु ब्राह्मणा यजने रताः ॥
प्राणिनः सन्तु सन्तुष्टाः सर्वे स्थावरजङ्गमाः ।
शमं यान्तु तथोत्पाता ईतयश्च तथा पुनः ॥
घनाः काले प्रवर्षन्तु कृषिर्बहुफला तथा । व्यास उवाच एवं ब्रुवति देवेशे शङ्करे लोकशङ्करे ॥
चण्डिकायाः शरीरात्तु निर्गता शक्तिरद्भुता ।
भीषणातिप्रचण्डा च शिवाशतनिनादिनी ॥
घोररूपाथ पञ्चास्यमित्युवाच स्मितानना ।
देवदेव व्रजाशु त्वं दैत्यानामधिपं प्रति ॥
दूतत्वं कुरु कामारे ब्रूहि शुम्भं स्मराकुलम् ।
निशुम्भञ्च मदोत्सिक्तं वचनान्मम शङ्कर ॥
मुक्त्वा त्रिविष्टपं यात यूयं पातालमाशु वै ।
देवा: स्वर्गे सुखं यान्तु तुराषाट् स्वासनं शुभम् ॥
प्राप्नोतु त्रिदिवं स्थानं यज्ञभागांश्च देवताः ।
जीवितेच्छा च युष्माकं यदि स्यात्तु महत्तरा ॥
तर्हि गच्छत पातालं तरसा यत्र दानवाः ।
अथवा बलमास्थाय युद्धेच्छा मरणाय चेत् ॥
तदागच्छन्तु तृप्यन्तु मच्छिवाः पिशितेन वः । व्यास उवाच तच्छ्रुत्वा वचनं तस्याः शूलपाणिस्त्वरान्वितः ॥ गत्वाह दैत्यराजानं शुम्भं सदसि संस्थितम् । शिव उवाच राजन् दूतोऽहमम्बायास्त्रिपुरान्तकरो हरः ॥
त्वत्सकाशमिहायातो हितं कर्तुं तवाखिलम् ।
त्यक्त्वा स्वर्गं तथा भूमिं यूयं गच्छत सत्वरम् ॥
पञ्चम स्कन्ध ६८३ स्थानोंको चली जायँ । [ आप यह कार्य सम्पन्न करें ३१ जिससे ] देवता यज्ञभाग पाने लगें, ब्राह्मण [ निर्भय होकर ] यज्ञ आदि करनेमें तत्पर हो जायँ, सभी स्थावर - जंगम प्राणी सन्तुष्ट हो जायँ, सब प्रकार ३२ उपद्रव और अकाल आदि आपदाएँ समाप्त हो जायँ, मेघ समयपर वृष्टि करें और कृषि लोगोंके लिये अधिक फलदायिनी हो ॥ २८ – ३२३ ॥ व्यासजी बोले- लोकका कल्याण करनेवाले ३३ देवेश्वर शिवके ऐसा कहनेपर भगवती चण्डिकाके शरीरसे एक अद्भुत शक्ति प्रकट हुई । वह शक्ति अत्यन्त भयंकर तथा प्रचण्ड थी, वह सैकड़ों सियारिनोंके ३४ समवेत स्वरके समान ध्वनि कर रही थी और उसका रूप बहुत भयानक था । मन्द ---- मन्द मुसकानयुक्त मुखमण्डलवाली उस शक्तिने पंचमुख शिवजीसे ३५ कहा- हे देवदेव! आप दैत्यराज शुम्भके पास शीघ्र जाइये । हे कामरिपु! इस समय आप मेरे दूतका काम कीजिये । हे शंकर! कामपीड़ित शुम्भ तथा ३६ मदोन्मत्त निशुम्भसे मेरे शब्दोंमें कह दीजिये –'तुम सब तत्काल स्वर्ग त्यागकर पाताललोक चले जाओ, जिससे देवगण सुखपूर्वक स्वर्गमें प्रविष्ट हो सकें और ३७ इन्द्रको स्वर्गलोक तथा अपना उत्तम इन्द्रासन पुनः प्राप्त हो जाय; साथ ही सभी देवताओंको उनके ३८ यज्ञभाग पुनः मिलने लगें । यदि जीवित रहनेकी तुमलोगोंकी बलवती इच्छा हो तो तुमलोग बहुत शीघ्र पाताललोक चले जाओ, जहाँ दानवलोग रहते ३ ९ हैं । अथवा अपने बलका आश्रय लेकर यदि तुम सब युद्धकी इच्छा रखते हो, तो मरनेके लिये आ जाओ, जिससे मेरी सियारिनें तुमलोगोंके कच्चे मांससे तृप्त हो जायँ ॥ ३३- - -३ ९ १ ॥ ४० व्यासजी बोले – चण्डिकाका यह वचन सुनकर शिव अपनी सभामें बैठे हुए दैत्यराज शुम्भके पास शीघ्र जाकर उससे कहने लगे ॥ ४०३ ॥
शिवजी बोले – हे राजन्! मैं त्रिपुरासुरका ४१ संहार करनेवाला महादेव हूँ । अम्बिकाका दूत बनकर मैं इस समय तुम्हारा सम्पूर्ण हित करनेके लिये यहाँ तुम्हारे पास आया हूँ । [ देवीने कहलाया है कि ] ४२ तुमलोग स्वर्ग तथा भूलोक त्यागकर शीघ्र पाताललोक
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पातालं यत्र प्रह्लादो बलिश्च बलिनां वरः ।
अथवा मरणेच्छा चेत्तर्ह्यगच्छत सत्वरम् ॥
संग्रामे वो हनिष्यामि सर्वानेवाहमाशु वै ।
इत्युवाच महाराज्ञी युष्मत्कल्याणहेतवे ॥
व्यास उवाच
इति दैत्यवरान्देवीवाक्यं पीयूषसन्निभम् ।
हितकृच्छ्रावयित्वा स प्रत्यायातश्च शूलभृत् ॥
ययासौ प्रेरितः शम्भुर्दूतत्वे दानवान्प्रति ।
शिवदूतीति विख्याता जाता त्रिभुवनेऽखिले ॥
तेऽपि श्रुत्वा वचो देव्याः शङ्करोक्तं तु दुष्करम् ।
युद्धाय निर्ययुः शीघ्रं दंशिताः शस्त्रपाणयः ॥
तरसा रणमागत्य चण्डिकां प्रति दानवाः ।
निर्जघ्नुश्च शरैस्तीक्ष्णैः कर्णाकृष्टैः शिलाशितैः ॥
कालिका शूलपातैस्तान् गदाशक्तिविदारितान् ।
कुर्वन्ती व्यचरत्तत्र भक्षयन्ती च दानवान् ॥
कमण्डलुजलाक्षेपगतप्राणान् महाबलान् ।
ब्रह्माणी चाकरोत्तत्र दानवान्समराङ्गणे ॥
माहेश्वरी वृषारूढा त्रिशूलेनातिरंहसा ।
जघान दानवान्संख्ये पातयामास भूतले ॥
वैष्णवी चक्रपातेन गदापातेन दानवान् ।
गतप्राणांश्चकाराशु चोत्तमाङ्गविवर्जितान् ॥
ऐन्द्री वज्रप्रहारेण पातयामास भूतले । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २८ चले जाओ, जहाँ प्रह्लाद तथा बलवानोंमें श्रेष्ठ राजा ४३ बलि रहते हैं । अथवा यदि मरनेकी ही इच्छा हो तो तुरंत सामने आ जाओ; मैं तुम सबको संग्राममें शीघ्र ही मार डालूंगी । तुमलोगोंके कल्याणके लिये ४४ । महारानी अम्बिकाने ऐसा कहा है ॥ ४१–४४ ॥ व्यासजी बोले- भगवतीका यह अमृत तुल्य कल्याणकारी सन्देश उन प्रधान दैत्योंको सुनाकर शूलधारी भगवान् शंकर लौट आये ॥ ४५ ॥
४५ भगवती अम्बिकाने शिवजीको दूत बनाकर दानवोंके पास भेजा था, अतः वे सम्पूर्ण त्रिलोकीमें ' शिवदूती ' इस नामसे विख्यात हुईं ॥ ४६ ॥
४६ शंकरजीके मुखसे कहे गये भगवतीके इस दुष्कर सन्देशको सुनते ही वे दैत्य भी कवच धारण करके तथा हाथोंमें शस्त्र लेकर शीघ्र ही युद्धके ४७ लिये निकल पड़े ॥४७ ॥
वे दानव बड़े वेगसे रणभूमिमें चण्डिकाके समक्ष आकर कानोंतक खींचे गये तथा पत्थरपर सान ४८ चढ़े तीखे बाणोंसे प्रहार करने लगे ॥४८ ॥
भगवती कालिका त्रिशूल, गदा और शक्तिसे दानवोंको विदीर्ण करती हुई और उनका भक्षण करती ४ ९ हुई युद्धमें विचरने लगीं ॥ ४ ९ ॥ भगवती ब्रह्माणी युद्धभूमिमें अपने कमण्डलुके जलके प्रक्षेपमात्रसे उन महाबली दानवोंको प्राणशून्य ५० कर देती थीं ॥ ५० ॥
वृषभपर विराजमान भगवती माहेश्वरी अपने त्रिशूलसे रणमें दानवोंपर बड़े वेगसे प्रहार करती थीं ५१ और उन्हें मारकर धराशायी कर देती थीं ॥५१ ॥
भगवती वैष्णवी गदा तथा चक्रके प्रहारसे दानवोंको ५२ निष्प्राण तथा सिरविहीन कर डालती थीं ॥ ५२ ॥
इन्द्रकी शक्ति देवी ऐन्द्री ऐरावत हाथीकी सूँड़की चोटसे पीड़ित बड़े - बड़े दैत्योंको अपने वज्रके ऐरावतकराघातपीडितान्दैत्यपुङ्गवान् ॥५३ प्रहारसे भूतलपर गिरा देती थीं ॥५३ ॥
देवी वाराही कुपित होकर अपने तुण्ड तथा वाराही तुण्डघातेन दंष्ट्राग्रपातनेन च । भयंकर दाढ़ोंके प्रहारसे सैकड़ों दैत्यों और दानवोंको जघान क्रोधसंयुक्ता शतशो दैत्यदानवान् ॥ ५४ मार डालती थीं ॥ ५४ ॥
देवी नारसिंही अपने तीक्ष्ण नखोंसे बड़े - बड़े नारसिंही नखैस्तीत्रैर्दारितान्दैत्यपुङ्गवान् । दैत्योंको फाड़ - फाड़कर खाती हुई रणभूमिमें विचर भक्षयन्ती चचाराजौ ननाद च मुहुर्मुहुः ॥ ५५ | रही थीं तथा बार - बार गर्जना कर रही थीं ॥ ५५ ॥
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अ ० २ ९ ] पञ्चम
शिवदूती अट्टहासैः पातयामास भूतले ।
तांश्चखादाथ चामुण्डा कालिका च त्वरान्विता ॥ ५६
शिखिसंस्था च कौमारी कर्णाकृष्टैः शिलाशितैः ।
निजघान रणे शत्रून्देवानां च हिताय वै ॥५७
वारुणी पाशसम्बद्धान्दैत्यान्समरमस्तके ।
पातयामास तत्पृष्ठे मूर्च्छितान्गतचेतनान् ॥ ५८
एवं मातृगणेनाजावतिवीर्यपराक्रमम् ।
मर्दितं दानवं सैन्यं पलायनपरं ह्यभूत् ॥ ५ ९
बुम्बारवस्तु सुमहानभूत्तत्र बलार्णवे ।
पुष्पवृष्टिं तदा देवाश्चक्रुर्देव्या गणोपरि ॥ ६०
तच्छ्रुत्वा निनदं घोरं जयशब्दं च दानवाः ।
रक्तबीजश्चुकोपाशु दृष्ट्वा दैत्यान्पलायितान् ॥ ६१
गर्जमानांस्तथा देवान्वीक्ष्य दैत्यो महाबलः ।
रक्तबीजस्तु तेजस्वी रणमभ्याययौ तदा ॥ ६२
सायुधो रथसंविष्टः कुर्वञ्ज्याशब्दमद्भुतम् ।
आजगाम तदा देवीं क्रोधरक्तेक्षणोद्यतः ॥ ६३
स्कन्ध ६८५ शिवदूती अपने अट्टहाससे ही दैत्योंको धराशायी कर देती थीं और चामुण्डा तथा कालिका बड़ी शीघ्रतासे उन्हें खाने लगती थीं ॥ ५६ ॥
मयूरपर विराजमान भगवती कौमारी देवताओंके कल्याणके लिये कानोंतक खींचे गये तथा पत्थरपर सान चढ़े तीक्ष्ण बाणोंसे शत्रुओंका संहार करने लगीं ॥५७ ॥
भगवती वारुणी समरांगणमें दैत्योंको अपने पाशमें बाँधकर उन्हें अचेत करके एकके ऊपर एकके क्रमसे गिरा देती थीं और वे निष्प्राण हो जाते थे ॥५८ ॥
इस प्रकार उन मातृशक्तियोंके प्रयाससे दानवोंकी वह ओजस्विनी तथा पराक्रमी सेना युद्धभूमिमें तहस-नहस होकर भाग खड़ी हुई ॥ ५ ९ ॥ उस सेनारूपी समुद्रमें बड़े जोरसे रोने - चिल्लाने की ध्वनि होने लगी । देवीके गणोंके ऊपर देवता पुष्पोंकी वर्षा करने लगे ॥६० ॥
दानवोंकी भयंकर चीत्कार तथा देवताओंकी जयध्वनि सुनकर रक्तबीज बहुत कुपित हुआ । उस समय दैत्योंको पलायित देखकर तथा देवताओंको गरजते हुए देखकर वह महाबली तथा तेजस्वी दैत्य रक्तबीज युद्धभूमिमें स्वयं आ डटा । वह आयुधोंसे सुसज्जित होकर रथपर सवार था और प्रत्यंचाकी अद्भुत टंकार करता हुआ क्रोधके मारे आँखें लाल किये युद्धके लिये देवीके सम्मुख आ | गया ॥ ६१-६३ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे रक्तबीजेन देव्या युद्धवर्णनं नामाष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥
O ल अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः रक्तबीजका वध और निशुम्भका युद्धक्षेत्रके लिये प्रस्थान व्यास उवाच व्यासजी बोले- हे राजन्! किसी समय शंकरजीने वरदानमिदं तस्य दानवस्य शिवार्पितम् । उस दानव रक्तबीजको यह बड़ा ही अद्भुत वर दे तत्प्रब्रवीम्यहम् डाला था, मैं उसे बता रहा हूँ; आप सुनिये ॥१ ॥
अत्यद्भुततरं राजञ्छृणु ॥ १ उस दानवके शरीरसे जब रक्तकी बूँद पृथ्वीपर तस्य देहाद्रक्तबिन्दुर्यदा पतति भूतले । गिरती थी, तब उसीके रूप तथा पराक्रमवाले समुत्पतन्ति दैतेयास्तद्रूपास्तत्पराक्रमाः ॥ २ दानव तुरंत उत्पन्न हो जाते थे । भगवान् शंकरने
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६८६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २ ९
असंख्याता महावीर्या दानवा रक्तसम्भवाः ।
प्रभवन्त्विति रुद्रेण दत्तोऽस्त्यत्यद्भुतो वरः ॥
स तेन वरदानेन दर्पितः क्रोधसंयुतः ।
अभ्यगात्तरसा संख्ये हन्तुं देवीं सकालिकाम् ॥ ४
स दृष्ट्वा वैष्णवीं शक्तिं गरुडोपरिसंस्थिताम् ।
शक्त्या जघान दैत्येन्द्रस्तां वै कमललोचनाम् ॥ ५
गदया वारयामास शक्तिः सा शक्तिसंयुता ।
अताडयच्च चक्रेण रक्तबीजं महासुरम् ॥ ६
रथाङ्गहतदेहात्तु बहु सुस्राव शोणितम् ।
वज्राहतगिरेः शृङ्गान्निर्झरा इव गैरिकाः ॥ ७
यत्र यत्र यदा भूमौ पतन्ति रक्तबिन्दवः ।
समुत्तस्थुस्तदाकाराः पुरुषाश्च सहस्रशः ॥ ८
ऐन्द्री तमसुरं घोरं वज्रेणाभिजघान च ।
रक्तबीजं क्रुधाविष्टा निःससार च शोणितम् ॥ ९
ततस्तत्क्षतजाज्जाता रक्तबीजा ह्यनेकशः ।
तद्वीर्याश्च तदाकाराः सायुधा युद्धदुर्मदाः ॥ १०
ब्रह्माणी ब्रह्मदण्डेन कुपिता ह्यहनद् भृशम् ।
माहेश्वरी त्रिशूलेन दारयामास दानवम् ॥ ११
नारसिंही नखाघातैस्तं विव्याध महासुरम् ।
अहनत्तुण्डघातेन क्रुद्धा तं राक्षसाधमम् ॥१२
कौमारी च तथा शक्त्या वक्षस्येनमताडयत् ।
सोऽपि क्रुद्धः शरासारैर्बिभेद निशितैश्च ताः ॥ १३ ।
उसे यह बड़ा ही अद्भुत वर दे दिया था कि तुम्हारे रक्तसे असंख्य महान् पराक्रमी दानव उत्पन्न हो जायँगे ॥ २-३ ॥ उस वरदानके कारण अभिमानमें भरा हुआ वह दैत्य अत्यन्त कुपित होकर कालिकासमेत अम्बिकाको मारनेके लिये बड़े वेगसे रणभूमिमें पहुँचा ॥४ ॥
गरुडपर विराजमान वैष्णवी शक्तिको देखकर उस दैत्येन्द्रने उन कमलनयनी देवीपर शक्ति ( बर्धी ) -से प्रहार कर दिया ॥५ ॥
तब उस शक्तिशालिनी वैष्णवी शक्तिने अपनी गदासे उस प्रहारको विफल कर दिया और अपने चक्रसे महान् असुर रक्तबीजपर आघात किया ॥६ ॥
उस चक्रके लगनेपर रक्तबीजके घायल शरीरसे रक्तकी विशाल धारा बह चली मानो वज्रप्रहारसे घायल पर्वतके शिखरसे गेरूकी धारा बह चली हो ॥७ ॥
पृथ्वीतलपर जहाँ - जहाँ रक्तकी बूँदें गिरती थीं, वहाँ - वहाँ उसीके समान आकारवाले हजारों पुरुष उत्पन्न हो जाते थे ॥८ ॥
तदनन्तर इन्द्रकी शक्ति ऐन्द्रीने क्रोधमें भरकर उस महान् असुर रक्तबीजपर वज्रसे आघात किया, जिससे उसके शरीरसे और रक्त निकलने लगा ॥ ९ ॥
तब उसके रक्तसे अनेक रक्तबीज उत्पन्न हो
गये, जो उसीके समान पराक्रमी तथा आकारवाले थे ।
वे सब - के - सब शस्त्रसम्पन्न तथा युद्धोन्मत्त थे ॥ १० ॥
ब्रह्माणीने कुपित होकर उसे ब्रह्मदण्डसे बहुत मारा और देवी माहेश्वरीने अपने त्रिशूलसे उस दानवको विदीर्ण कर दिया । देवी नारसिंहीने अपने नखोंके प्रहारोंसे उस महान् असुरको बींध डाला, देवी वाराहीने क्रुद्ध होकर उस अधम राक्षसको अपने तुण्डप्रहारसे चोट पहुँचायी और भगवती कौमारीने अपनी शक्तिसे उसके वक्षपर प्रहार किया ॥ ११ - १२३ ॥ तब वह दानव रक्तबीज भी क्रुद्ध होकर अलग-अलग उन सभी देवियोंको तीखे बाणोंकी घोर वर्षा तथा गदा और शक्तिके प्रहारोंसे चोट पहुँचाने लगा ।
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अ ० २ ९ ] पञ्चम स्कन्ध ६८७
गदाशक्तिप्रहारैस्तु मातृः सर्वाः पृथक्पृथक् ।
शक्तयस्तं शराघातैर्विव्यधुस्तत्प्रकोपिताः ॥
तस्य शस्त्राणि चिच्छेद चण्डिका स्वशरैः शितैः ।
जघानान्यैश्च विशिखैस्तं देवी कुपिता भृशम् ॥
तस्य देहाच्च सुस्राव रुधिरं बहुधा तु यत् ।
तस्मात्तत्सदृशाः शूराः प्रादुरासन्सहस्रशः ॥
रक्तबीजैर्जगद्व्याप्तं रुधिरौघसमुद्भवैः ।
सन्नद्धैः सायुधैः कामं कुर्वद्भिर्युद्धमद्भुतम् ॥
प्रहरन्तश्च तान्दृष्ट्वा रक्तबीजाननेकशः ।
भयभीताः सुरास्त्रेसुर्विषण्णाः शोककर्षिताः ॥
कथमद्य क्षयं दैत्या गमिष्यन्ति सहस्रशः ।
महाकाया महावीर्या दानवा रक्तसम्भवाः ॥
एकैव चण्डिकात्रास्ति तथा काली च मातरः ।
एताभिर्दानवाः सर्वे जेतव्याः कष्टमेव तत् ॥
निशुम्भो वाथ शुम्भो वा सहसा बलसंवृतः ।
आगमिष्यति संग्रामे ततोऽनर्थो महान्भवेत् ॥
व्यास उवाच
एवं देवा भयोद्विग्नाश्चिन्तामापुर्महत्तराम् ।
यदा तदाम्बिका प्राह कालीं कमललोचनाम् ॥
चामुण्डे कुरु विस्तीर्णं वदनं त्वरिता भृशम् ।
मच्छस्त्रपातसम्भूतं रुधिरं पिब सत्वरा ॥
भक्षयन्ती चर रणे दानवानद्य कामतः ।
हनिष्यामि शरैस्तीक्ष्णैर्गदासिमुसलैस्तथा ॥
तथा कुरु विशालाक्षि पानं तद्रुधिरस्य च ।
बिन्दुमात्रं यथा भूम्यां न पतेदपि साम्प्रतम् ॥
भक्ष्यमाणास्तदा दैत्या न चोत्पत्स्यन्ति चापरे ।
एवमेषां क्षयो नूनं भविष्यति न चान्यथा ॥
उसके आघातसे कुपित होकर सभी देवियोंने बाणोंके १४ प्रहारसे उसको बींध डाला । भगवती चण्डिकाने अपने तीक्ष्ण बाणोंसे उसके शस्त्रोंको काट डाला और अत्यन्त कुपित होकर वे अन्य बाणोंसे उस दानवको १५ | मारने लगीं ॥१३-१५ ॥ अब उसके शरीरसे अत्यधिक रक्त निकलने लगा । उस रक्तसे उसी रक्तबीजके समान हजारों वीर १६ उत्पन्न हो गये । इस प्रकार उस रुधिर - राशिसे उत्पन्न रक्तबीजोंसे सारा जगत् भर गया; वे सब कवच पहने हुए थे, आयुधों से सुसज्जित थे और अद्भुत युद्ध कर १७ | रहे थे ॥ १६-१७ ॥ उन असंख्य रक्तबीजोंको प्रहार करते देखकर देवता भयभीत, आतंकित, विषादग्रस्त और शोकसंतप्त १८ हो गये । [ वे सोचने लगे ] इस समय रक्तबीजके रक्तसे उत्पन्न ये हजारों विशालकाय और महापराक्रमी दानव किस प्रकार विनष्ट होंगे? यहाँ रणभूमिमें १ ९ केवल भगवती चण्डिका हैं और उनके साथमें देवी काली तथा कुछ मातृकाएँ हैं; केवल इन्हीं देवियोंको मिलकर सभी दानवोंको जीतना है - यह तो महान् २० कष्ट है । इसी समय यदि अचानक शुम्भ अथवा निशुम्भ भी सेनाके साथ संग्राममें आ जायगा, तब तो २१ बहुत बड़ा अनर्थ हो जायगा ॥ १८–२१ ॥ व्यासजी बोले - [ हे राजन्! ] इस प्रकार जब सभी देवता भयसे व्याकुल होकर अत्यधिक चिन्तित हो उठे, तब भगवती अम्बिकाने कमलसदृश नेत्रोंवाली २२ कालीसे कहा — हे चामुण्डे! तुम शीघ्रतापूर्वक अपना मुख पूर्णरूपसे फैला लो और मेरे शस्त्राघातके द्वारा [ रक्तबीजके शरीरसे ] निकले रक्तको जल्दी-२३ जल्दी पीती जाओ । तुम दानवोंका भक्षण करती हुई इच्छानुसार युद्धभूमिमें विचरण करो । मैं तीक्ष्ण बाणों, गदा, तलवार तथा मुसलोंसे इन दैत्योंको मार २४ डालूंगी ॥ २२ - २४ ॥ हे विशाल नयनोंवाली! तुम इस प्रकारसे इस दैत्यके रुधिरका पान करो, जिससे कि अब एक भी २५ बूँद रक्त भूमिपर न गिरने पाये; तब इस ढंगसे भक्षण किये जानेपर दूसरे दानव उत्पन्न नहीं हो सकेंगे । इस प्रकार इन दैत्योंका नाश अवश्य हो जायगा, इसके २६ । अतिरिक्त दूसरा कोई उपाय नहीं है॥२५-२६ ॥
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६८८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २ ९
घातयिष्याम्यहं दैत्यं त्वं भक्षय च सत्वरा ।
पिबन्ती क्षतजं सर्वं यतमानारिसंक्षये ॥
इत्थं दैत्यक्षयं कृत्वा दत्त्वा राज्यं सुरालयम् ।
इन्द्राय सुस्थिरं सर्वं गमिष्यामो यथासुखम् ॥
व्यास उवाच
इत्युक्ताम्बिकया देवी चामुण्डा चण्डविक्रमा ।
पपौ च क्षतजं सर्वं रक्तबीजशरीरजम् ॥
अम्बिका तं जघानाशु खड्गेन मुसलेन च ।
चखाद देहशकलांश्चामुण्डा तान्कृशोदरी ॥
सोऽपि क्रुद्धो गदाघातैश्चामुण्डां समघातयत् ।
तथापि सा पपावाशु क्षतजं तमभक्षयत् ॥
येऽन्ये रुधिरजाः क्रूरा रक्तबीजा महाबलाः ।
तेऽपि निष्पातिताः सर्वे भक्षिता गतशोणिताः ॥
कृत्रिमा भक्षिताः सर्वे यस्तु स्वाभाविकोऽसुरः ।
सोऽपि प्रपातितो हत्वा खड्गेनातिविखण्डितः ॥
रक्तबीजे हते रौद्रे ये चान्ये दानवा रणे ।
पलायनं ततः कृत्वा गतास्ते भयकम्पिताः ॥
हाहेति विब्रुवन्तस्ते शुम्भं प्रोचुः सविह्वलाः ।
रुधिरारक्तदेहाश्च विगतास्त्रा विचेतसः ॥
राजन्नम्बिकया रक्तबीजोऽसौ विनिपातितः ।
चामुण्डा तस्य देहात्तु पपौ सर्वं च शोणितम् ॥
ये चान्ये दानवाः शूरा वाहनेनातिरंहसा ।
सिंहेन निहताः सर्वे काल्या च भक्षिताः परे ॥
वयं त्वां कथितुं राजन्नागता युद्धचेष्टितम् ।
चरितञ्च तथा देव्याः संग्रामे परमाद्भुतम् ॥
जब मैं इस दैत्यको मारूँ, तब तुम शत्रुसंहाररूपी २७ इस कार्यमें प्रयत्नशील होकर सारा रक्त पीती हुई शीघ्रतापूर्वक इसका भक्षण कर जाना । इस प्रकार दैत्यवध करके स्वर्गका सारा राज्य इन्द्रको देकर हम २८ सब आनन्दपूर्वक यहाँसे चली जायँगी ॥ २७-२८ ॥ व्यासजी बोले- भगवती अम्बिकाके ऐसा कहनेपर प्रचण्ड पराक्रमवाली देवी चामुण्डा रक्तबीजके शरीरसे निकले हुए समस्त रुधिरको पीने लगीं । जगदम्बा खड्ग तथा मुसलसे उस दैत्यको मारने लगीं और २ ९ कृशोदरी चामुण्डा उसके शरीरके कटे हुए अंगोंका
भक्षण करने लगीं ॥। २ ९ -३० ॥
अब वह रक्तबीज भी कुपित होकर गदाके ३० प्रहारोंसे चामुण्डाको घायल करने लगा, फिर भी वे शीघ्रतापूर्वक उसका रुधिर पीती रहीं और उसका भक्षण करती रहीं ॥ ३१ ॥
३१ उस दैत्यके रुधिरसे उत्पन्न हुए अन्य जो भी महाबली और क्रूर रक्तबीज थे, उन्हें भी चामुण्डाने मार डाला । वे देवी उनका भी रक्त पी गयीं और उन ३२ सबको खा गयीं ॥ ३२ ॥
इस प्रकार भगवतीने जब सभी कृत्रिम रक्तबीजोंका भक्षण कर लिया, तब जो वास्तविक रक्तबीज था, ३३ उसे भी मारकर उन्होंने खड्गसे उसके अनेक टुकड़े करके भूमिपर गिरा दिया ॥३३ ॥
तत्पश्चात् भयंकर रक्तबीजका वध हो जानेपर ३४ जो अन्य दानव रणभूमिमें थे, वे भयसे काँपते हुए भाग करके शुम्भके पास पहुँचे । उनका चित्त बहुत व्याकुल था, उनका शरीर रुधिरसे लथपथ था, वे शस्त्रविहीन हो गये थे और अचेत - से हो गये थे । ३५ वे हाय, हाय - ऐसा पुकारते हुए शुम्भसे कहने लगे - हे राजन्! अम्बिकाने उस रक्तबीजको मार डाला और चामुण्डा उसकी देहसे निकला सारा रुधिर ३६ पी गयी । जो अन्य दानववीर थे, उन सबको देवीके वाहन सिंहने बड़ी तेजीसे मार डाला और शेष दानवोंको भगवती काली खा गयीं ॥ ३४–३७ ॥ ३७ हे राजन्! हमलोग आपको युद्धका वृत्तान्त तथा संग्राममें देवीके द्वारा प्रदर्शित किये गये उनके अत्यन्त अद्भुत चरित्रको बतानेके लिये आपके पास ३८ | आये हुए हैं ॥ ३८ ॥
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अ ० २ ९ ] पञ्चम स्कन्ध ६८ ९
अजेयेयं महाराज सर्वथा दैत्यदानवैः ।
गन्धर्वासुरयक्षैश्च पन्नगोरगराक्षसैः ॥
अन्यास्तत्रागता देव्य इन्द्राणीप्रमुखा भृशम् ।
युध्यमाना महाराज वाहनैरायुधैर्युताः ॥
ताभिः सर्वं हतं सैन्यं दानवानां वरायुधैः ।
रक्तबीजोऽपि राजेन्द्र तरसा विनिपातितः ॥
एकापि दुःसहा देवी किं पुनस्ताभिरन्विता ।
सिंहोऽपि हन्ति संग्रामे राक्षसानमितप्रभः ॥
अतो विचार्य सचिवैर्यद्युक्तं तद्विधीयताम् ।
न वैरमनया युक्तं सन्धिरेव सुखप्रदः ॥
आश्चर्यमेतदखिलं यन्नारी हन्ति राक्षसान् ।
रक्तबीजोऽपि निहतः पीतं तस्यापि शोणितम् ॥
अन्ये निपातिता दैत्याः संग्रामेऽम्बिकया नृप ।
चामुण्डया च मांसं वै भक्षितं सकलं रणे ॥
वरं पातालगमनं तस्याः सेवाथवा वरा ।
न तु युद्धं महाराज कार्यमम्बिकया सह ॥
न नारी प्राकृता ह्येषा देवकार्यार्थसाधिनी ।
मायेयं प्रबला देवी क्षपयन्तीयमुत्थिता ॥
व्यास उवाच
इति तेषां वचस्तथ्यं श्रुत्वा कालविमोहितः ।
मुमूर्षुः प्रत्युवाचेदं शुम्भः प्रस्फुरिताधरः ॥
शुम्भ उवाच
यूयं गच्छत पातालं शरणं वा भयातुराः ।
हनिष्याम्यहमद्यैव ताञ्च ताश्च समुद्यतः ॥
हे महाराज! यह देवी दैत्य, दानव, गन्धर्व, ३ ९ असुर, यक्ष, पन्नग, उरग और राक्षस- इन सभीसे सर्वथा अजेय है ॥ ३ ९ ॥ हे महाराज! इन्द्राणी आदि अन्य प्रमुख देवियाँ भी वहाँ आयी हुई हैं । वे अपने - अपने वाहनोंपर सवार ४० होकर नानाविध आयुध धारण करके घोर युद्ध कर रही हैं । हे राजेन्द्र! उन देवियोंने अपने उत्तम अस्त्रोंसे दानवोंकी सारी सेनाका विध्वंस कर डाला और रक्तबीजको भी ४१ बड़ी शीघ्रता से मार गिराया ॥ ४०-४१ ॥ एकमात्र देवी अम्बिका ही हमलोगोंके लिये असह्य थी, और फिर जब वह उन देवियोंके साथ ४२ हो गयी है तब कहना ही क्या? असीम तेजवाला उसका वाहन सिंह भी संग्राममें राक्षसोंका वध कर रहा है ॥ ४२ ॥
४३ अतएव मन्त्रियोंके साथ विचार - विमर्श करके जो उचित हो, वह कीजिये । इसके साथ शत्रुता उचित नहीं है, अपितु सन्धि कर लेना ही सुखदायक ४४ होगा ॥ ४३ ॥
यह आश्चर्य है कि एक स्त्री राक्षसोंका संहार कर रही है! रक्तबीज भी मार डाला गया! देवी चामुण्डा उसका सारा रक्त भी पी गयी! हे नृप! अम्बिकाने ४५ संग्राममें अन्य दैत्योंको मार डाला और देवी चामुण्डा उनका सम्पूर्ण मांस खा गयी ॥ ४४-४५ ॥ हे महाराज! अब हमलोगोंके लिये या तो ४६ पाताल चला जाना श्रेयस्कर है अथवा उसकी दासता स्वीकार कर लेना; किंतु उस अम्बिकाके साथ युद्ध नहीं करना चाहिये । यह साधारण स्त्री नहीं है, यह ४७ देवताओंका कार्य सिद्ध करनेवाली है और यह मायारूपिणी शक्तिसम्पन्न देवीके रूपमें दैत्योंका नाश करनेके लिये प्रकट हुई है ॥ ४६-४७ ॥ व्यासजी बोले- उन सैनिकोंकी यह यथार्थ बात ४८ सुनकर कालसे मोहित तथा मरनेके लिये उद्यत वह काँपते हुए ओठोंवाला शुम्भ उनसे कहने लगा ॥ ४८ ॥
शुम्भ बोला- तुमलोग भयभीत होकर पाताल चले जाओ अथवा उसकी शरणमें चले जाओ, किंतु मैं तो युद्धमें पूर्णरूपसे तत्पर रहते हुए उस अम्बिका ४ ९ तथा उन देवियोंको आज ही मार डालूँगा ॥। ४ ९ ॥
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६ ९ ० श्रीमद्देवीभागवत अ ० २ ९
जित्वा सर्वान्सुरानाजौ कृत्वा राज्यं सुपुष्कलम् ।
कथं नारीभयोद्विग्नः पातालं प्रविशाम्यहम् ॥
निहत्य पार्षदान्सर्वान् रक्तबीजमुखान् रणे ।
प्राणत्राणाय गच्छामि हित्वा किं विपुलं यशः ॥
मरणं त्वनिवार्यं वै प्राणिनां कालकल्पितम् ।
तद्भयं जन्मनोपात्तं त्यजेत्को दुर्लभं यशः ॥
निशुम्भाहं गमिष्यामि रथारूढो रणाजिरे ।
हत्वा तामागमिष्यामि नागमिष्यामि चान्यथा ॥
त्वं तु सेनायुतो वीर पाणिग्राहो भवस्व मे तरसा तां शरैस्तीक्ष्णैर्नारीं नय यमालये ॥ निशुम्भ उवाच
अहमद्य हनिष्यामि गत्वा दुष्टाञ्च कालिकाम् ।
आगमिष्याम्यहं शीघ्रं गृहीत्वा तामथाम्बिकाम् ॥
मा चिन्तां कुरु राजेन्द्र वराकायास्तु कारणे ।
क्वैषा बाला क्व मे बाहुवीर्यं विश्ववशङ्करम् ॥
त्यक्त्वार्तिं विपुलां भ्रातर्भुक्ष्व भोगाननुत्तमान् ।
आनयिष्याम्यहं कामं मानिनीं मानसंयुताम् ॥
मयि तिष्ठति ते राजन्न युक्तं गमनं रणे ।
गत्वाहमानयिष्यामि तवार्थे वै जयश्रियम् ॥
व्यास उवाच
इत्युक्त्वा भ्रातरं ज्येष्ठं कनीयान्बलगर्वितः ।
रथमास्थाय विपुलं सन्नद्धः स्वबलावृतः ॥
रणभूमिमें सभी देवताओंको जीतकर तथा विशाल ५० राज्यका भोग करके भला एक स्त्रीके भयसे व्याकुल होकर मैं पाताल क्यों चला जाऊँ? रक्तबीज आदि प्रमुख पार्षदोंको रणमें मरवाकर और अपनी विशद कीर्तिका नाश करके प्राणरक्षाके लिये मैं पाताल क्यों ५१ चला जाऊँ? ॥ ५०-५१ ॥ कालके द्वारा निर्धारित प्राणियोंकी मृत्यु तो अनिवार्य है । जन्मके साथ ही मृत्युका भय प्राणी ५२ साथ लग जाता है । तब भला कौन ( बुद्धिमान् ) व्यक्ति दुर्लभ यशका त्याग कर सकता है? ॥ ५२ ॥
हे निशुम्भ! मैं रथपर सवार होकर युद्धभूमिमें जाऊँगा और उसे मारकर ही वापस आऊँगा और ५३ यदि मैं उसे मार न सका तो फिर वापस नहीं लौदूँगा ॥ ५३ ॥
हे वीर! तुम भी सेना साथमें लेकर चलो ५४ और युद्धमें मेरे सहायक बनो । वहाँ अपने तीक्ष्ण बाणोंसे मारकर तुम उस स्त्रीको शीघ्र ही यमलोक पहुँचा दो ॥५४ ॥
निशुम्भ बोला- मैं अभी युद्धक्षेत्रमें जाकर दुष्ट कालिकाको मार डालूँगा और उस अम्बिकाको लेकर ५५ शीघ्र ही आपके पास आ जाऊँगा ॥ ५५ ॥
हे राजेन्द्र! आप उस बेचारीके विषयमें चिन्ता मत कीजिये । कहाँ यह एक साधारण स्त्री ५६ और कहाँ पूरे विश्वको अपने वशमें कर लेनेवाला मेरा बाहुबल! हे भाई! आप इस भारी चिन्ताको छोड़कर सर्वोत्तम सुखोंका उपभोग कीजिये । मैं आदरकी पात्र उस मानिनीको अवश्य ही ले ५७ आऊँगा ॥ ५६-५७ ॥ हे राजन्! मेरे रहते युद्धक्षेत्रमें आपका जाना उचित नहीं है । आपका कार्य सिद्ध करनेके ५८ लिये मैं वहाँ जाकर विजयश्री अवश्य ही प्राप्त करूँगा ॥ ५८ ॥
व्यासजी बोले- बड़े भाई शुम्भसे ऐसा कहकर अपने बलपर - अभिमान रखनेवाले छोटे भाई निशुम्भने कवच धारण कर लिया और अपनी सेना साथमें ५ ९ लेकर एक विशाल रथपर आरूढ़ हो स्वयं अनेकविध
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अ ० ३० ] पञ्चम स्कन्ध ६ ९ १ जगाम तरसा तूर्णं सङ्गरे कृतमङ्गलः । आयुध लेकर वह पूरी तैयारीके साथ तुरंत बड़ी तेजीसे युद्धभूमिकी ओर चल पड़ा । उस समय मंगलाचार किया जा रहा था और बन्दीजन तथा चारण उसका
संस्तुतो बन्दिसूतैश्च सायुधः सपरिष्करः ॥ ६० । यशोगान कर रहे थे ॥५ ९ -६० ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे देव्या सह युद्धकरणाय निशुम्भप्रयाणं नामैकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २ ९ ॥ अथ त्रिंशोऽध्यायः देवीद्वारा निशुम्भका वध व्यास उवाच
निशुम्भो निश्चयं कृत्वा मरणाय जयाय वा ।
सोद्यमः सबलः शूरो रणे देवीमुपाययौ ॥
तमाजगाम शुम्भोऽपि स्वबलेन समावृतः ।
प्रेक्षकोऽभूद्रणे राजा संग्रामरसपण्डितः ॥
गगने संस्थिता देवास्तदाभ्रपटलावृताः ।
दिदृक्षवस्तु संग्रामे सेन्द्रा यक्षगणास्तथा ॥
निशुम्भोऽथ रणे गत्वा धनुरादाय शार्ङ्गकम् ।
चकार शरवृष्टिं स भीषयञ्जगदम्बिकाम् ॥
मुञ्चन्तं शरजालानि निशुम्भं चण्डिका रणे ।
वीक्ष्यादाय धनुः श्रेष्ठं जहास सुस्वरं मुहुः ॥
उवाच कालिकां देवी पश्य मूर्खत्वमेतयोः ।
मरणायागतौ कालि मत्समीपमिहाधुना ॥
दृष्ट्वा दैत्यवधं घोरं रक्तबीजात्ययं तथा ।
जयाशां कुरुतस्त्वेतौ मोहितौ मम मायया ॥
आशा बलवती ह्येषा न जहाति नरं क्वचित् ।
भग्नं हृतबलं नष्टं गतपक्षं विचेतनम् ॥
व्यासजी बोले - [ हे राजन्! ] वह पराक्रमी निशुम्भ अब मृत्यु अथवा विजयका निश्चय करके पूरी तैयारीके साथ सेनासहित समरभूमिमें १ उपस्थित हो गया ॥ १ ॥
अपनी सेना साथमें लेकर शुम्भ भी उस निशुम्भके पास आ गया और युद्धकलाका पूर्ण ज्ञान २ रखनेवाला वह दैत्यराज शुम्भ रणमें दर्शक बनकर युद्धका अवलोकन करने लगा ॥ २ ॥
इन्द्रसहित समस्त देवता तथा यक्षगण संग्राम ३ देखनेकी इच्छासे आकाशमण्डलमें मेघपटलोंमें छिपकर विराजमान हो गये ॥ ३ ॥
निशुम्भ रणभूमिमें पहुँचकर सींगका बना हुआ धनुष लेकर भगवती जगदम्बाको भयभीत करता हुआ ४ उनके ऊपर बाणोंकी बौछार करने लगा ॥४ ॥
युद्धभूमिमें निशुम्भको बाण - समूह छोड़ते हुए देखकर भगवती चण्डिका अपना उत्कृष्ट धनुष ५ धारण करके उच्च स्वरमें बार - बार हँसने लगीं । देवी चण्डिकाने कालीसे कहा- हे काली! इन दोनोंकी मूर्खता तो देखो, ये दोनों इस समय यहाँ मेरे पास मरनेके लिये ही आये हुए हैं ॥ ५-६ ॥ दैत्योंका भीषण संहार तथा रक्तबीजकी मृत्यु देखकर भी मेरी मायासे विमोहित हुए ये दोनों दैत्य विजयकी आशा कर रहे हैं ॥ ७ ॥
७ यह आशा बड़ी बलवती होती है; यह प्राणियोंको कभी नहीं छोड़ती है । यहाँतक कि अंगहीन, बलहीन, नष्टप्राय, असहाय तथा अचेत प्राणी भी आशाके ८ प्रभावसे छूट नहीं पाता है ॥ ८ ॥