देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 701–710
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 701–710
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६ ९ २ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३०
आशापाशनिबद्धौ द्वौ युद्धाय समुपागतौ ।
निहन्तव्यौ मया कालि रणे शुम्भनिशुम्भकौ ॥
आसन्नमरणावेतौ सम्प्राप्तौ दैवमोहितौ ।
पश्यतां सर्वदेवानां हनिष्याम्यहमद्य तौ ॥
व्यास उवाच
इत्युक्त्वा कालिकां चण्डी कर्णाकृष्टशरोत्करैः ।
छादयामास तरसा निशुम्भं पुरतः स्थितम् ॥
दानवोऽपि शरांस्तस्याश्चिच्छेद निशितैः शरैः ।
तयोः परस्परं युद्धं बभूवातिभयानकम् ॥
केसरी केशजालानि धुन्वानः सैन्यसागरम् ।
गाहयामास बलवान्सरसीं वारणो यथा ॥
नखैर्दन्तप्रहारैस्तु दानवान्पुरतः स्थितान् ।
चखाद च विशीर्णाङ्गान् गजानिव मदोत्कटान् ॥
एवं विमथ्यमाने तु सैन्ये केसरिणा तदा ।
अभ्यधावन्निशुम्भोऽथ विकृष्टवरकार्मुकः ॥
अन्येऽपि क्रुद्धा दैत्येन्द्रा देवीं हन्तुमुपाययुः ।
सन्दष्टदन्तरसना रक्तनेत्रा ह्यनेकशः ॥
तत्राजगाम तरसा शुम्भः सैन्यसमावृतः ।
निहत्य कालिकां कोपाद् ग्रहीतुं जगदम्बिकाम् ॥
तत्रागत्य ददर्शाजावम्बिकाञ्च पुरःस्थिताम् ।
रौद्ररसयुतां कान्तां शृङ्गाररससंयुताम् ॥
हे कालि! इस प्रकार आशा - पाशमें बँधे हुए ये दोनों शुम्भ - निशुम्भ युद्धके लिये समरभूमिमें ९ आये हुए हैं, अब मुझे इन दोनोंका वध कर देना चाहिये ॥ ९ ॥
आसन्न मृत्युवाले ये दोनों दैत्य प्रारब्धकी १० प्रेरणासे यहाँ आये हुए हैं । सभी देवताओंके समक्ष आज ही मैं इन्हें मार डालूँगी ॥१० ॥
व्यासजी बोले – भगवती चण्डिकाने कालिकासे ऐसा कहकर कानोंतक खींचकर छोड़े गये बाण-समूहोंसे अपने समक्ष खड़े निशुम्भको शीघ्र ही ११ ९ आच्छादित कर दिया ॥ ११ ॥
दैत्य निशुम्भने भी उन चण्डिकाके बाणोंको अपने तीक्ष्ण बाणोंसे काट डाला । इस प्रकार उन दोनोंमें परस्पर अत्यन्त भयंकर युद्ध होने लगा ॥ १२ ॥
१२ देवीका सिंह भी अपने गर्दनके बालोंको झाड़ता हुआ दैत्योंके सेनारूपी समुद्रको उसी प्रकार मथने लगा, जैसे कोई बलवान् हाथी तालाबको मथ १३ रहा हो ॥ १३ ॥
जिस प्रकार कोई सिंह मतवाले हाथियोंके अंग - प्रत्यंग चीरकर खा डालता है, उसी प्रकार भगवतीका वह सिंह अपने समक्ष स्थित दानवोंको १४ अपने नखों तथा दाँतोंके प्रहारसे फाड़कर खाने लगा ॥ १४ ॥
भगवतीके उस सिंहद्वारा दानवी सेनाका इस १५ प्रकार संहार होते देखकर निशुम्भ अपना श्रेष्ठ धनुष चढ़ाकर सिंहके पीछे दौड़ा ॥ १५ ॥
उसी समय कोपके कारण लाल नेत्रोंवाले अन्य बहुत- - से प्रधान दानव भी दाँतोंसे अपनी जीभ चबाते १६ हुए भगवतीको मारनेके लिये उनपर टूट पड़े ॥ १६ ॥
उसी अवसरपर कुपित होकर शुम्भ भी कालिकापर प्रहार करके भगवती अम्बिकाको १७ पकड़नेके लिये अपनी सेनाके साथ बड़े वेगसे वहाँ आ पहुँचा ॥१७ ॥
वहाँ आकर उसने जगदम्बिकाको युद्धभूमिमें अपने सामने खड़ी देखा; जो परम सुन्दरी, श्रृंगाररससे १८ । परिपूर्ण तथा रौद्ररस से भरी हुई थीं ॥ १८ ॥
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अ ० ३० ]
तां वीक्ष्य विपुलापाङ्गीं त्रैलोक्यवरसुन्दरीम् ।
सुरक्तनयनां रम्यां क्रोधरक्तेक्षणां तथा ॥
विवाहेच्छां परित्यज्य जयाशां दूरतस्तथा । मरणे निश्चयं कृत्वा तस्थावाहितकार्मुकः
तं तथा दानवं देवी स्मितपूर्वमिदं वचः ।
बभाषे शृण्वतां तेषां दैत्यानां रणमस्तके ॥
गच्छध्वं पामरा यूयं पातालं वा जलार्णवम् ।
जीविताशां स्थिरां कृत्वा त्यक्त्वात्रैवायुधानि च ॥
अथवा मच्छराघातहतप्राणा रणाजिरे ।
प्राप्य स्वर्गसुखं सर्वे क्रीडन्तु विगतज्वराः ॥
कातरत्वं च शूरत्वं न भवत्येव सर्वथा ।
ददाम्यभयदानं वै यान्तु सर्वे यथासुखम् ॥
व्यास उवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तस्या निशुम्भो मदगर्वितः ।
निशितं खड्गमादाय चर्म चैवाष्टचन्द्रकम् ॥
धावमानस्तु तरसासिना सिंहं मदोत्कटम् ।
जघानातिबलान्मूनि भ्रामयञ्जगदम्बिकाम् ॥
ततो देवी स्वगदया वञ्चयित्वासिपातनम् ।
ताडयामास तं बाहोर्मूले परशुना तदा ॥
खड्गेन निहतः सोऽपि बाहुमूले महामदः ।
संस्तभ्य वेदनां भूयो जघान चण्डिकां तदा ॥
सापि घण्टास्वनं घोरं चकार भयदं नृणाम् ।
पपौ पुनः पुनः पानं निशुम्भं हन्तुमिच्छती ॥
एवं परस्परं युद्धं बभूवातिभयप्रदम् ।
देवानां दानवानाञ्च परस्परजयैषिणाम् ॥
पञ्चम स्कन्ध ६ ९ ३ [ स्वभावतः ] लाल नेत्रोंवाली, किंतु उस समय १ ९ कोपके कारण अतिरक्त नयनोंवाली, तीनों लोकोंमें परम सुन्दरी तथा विशाल नेत्रप्रान्तोंवाली उन मनोहर भगवतीको देखकर विजयकी आशा तथा विवाहकी ॥ २० अभिलाषाका दूरसे ही परित्याग करके वह दानव अब अपने मरणका निश्चय - कर हाथमें धनुष लिये हुए खड़ा ही रह गया ॥ १ ९ -२० ॥ २१ तब भगवतीने युद्धस्थलमें उपस्थित उन सभी दानवोंको सुनाते हुए मुसकराकर उस दैत्यसे यह वचन कहा - हे नीच दानवो! यदि तुम सब जीवित २२ रहनेकी इच्छा रखते हो तो अपने आयुध यहीं छोड़कर पाताललोक या समुद्रमें चले जाओ अथवा तुमलोग समरांगणमें मेरे बाणोंके प्रहारसे निष्प्राण २३ | होकर स्वर्गमें सुख प्राप्तकर वहाँ निर्भय होकर विहार करो । कायरता तथा पराक्रम दोनोंका एक साथ रह पाना सम्भव नहीं है । मैं तुम सबको अभयदान देती २४ हूँ; तुम सब सुखपूर्वक चले जाओ ॥ २१ - २४ ॥ व्यासजी बोले – उन भगवतीका वचन सुनकर मदोन्मत्त निशुम्भ तीक्ष्ण खड्ग तथा अष्टचन्द्र नामक ढाल लेकर बड़े वेगसे दौड़ा और उसने बलपूर्वक २५ अपने खड्गसे मतवाले सिंहके मस्तकपर प्रहार किया । तत्पश्चात् उसने तलवार घुमाकर जगदम्बापर भी प्रहार किया ॥ २५-२६ ॥ २६ तब भगवतीने अपनी गदासे उसके तलवारके प्रहारको रोककर अपने परशुसे उसके बाहुमूल ( कन्धे ) - पर आघात किया ॥ २७ ॥
२७ अपने कन्धेपर खड्गसे प्रहार होनेपर भी उस महाभिमानी अहंकारी निशुम्भने उस आघातकी वेदना सहकर भगवती चण्डिकापर पुनः प्रहार किया ॥ २८ ॥
२८ तत्पश्चात् भगवती चण्डिकाने भी प्राणियोंको भयभीत कर देनेवाली भीषण घंटाध्वनि की और निशुम्भको मारने की इच्छा प्रकट करती हुई उन्होंने २ ९ । बार - बार मधुपान किया ॥ २ ९ ॥ इस प्रकार एक- दूसरेको जीतनेकी प्रबल इच्छावाले देवताओं तथा दानवोंमें परस्पर अत्यन्त ३० । भयंकर युद्ध आरम्भ हो गया ॥३० ॥
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६ ९ ४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३०
पलादाः पक्षिणः क्रूराः सारमेयाश्च जम्बुकाः ।
ननृतुश्चातिसन्तुष्टा गृध्राः कङ्काश्च वायसाः ॥
रणभूर्भात भूयिष्ठपतितासुरवर्ष्मकैः ।
रुधिरस्त्रावसंयुक्तैर्गजाश्वदेहसंकुला ॥
पतितान्दानवान्दृष्ट्वा निशुम्भोऽतिरुषान्वितः ।
प्रययौ चण्डिकां तूर्णं गदामादाय दारुणाम् ॥
सिंहं जघान गदया मस्तके मदगर्वितः ।
प्रहृत्य च स्मितं कृत्वा पुनर्देवीमताडयत् ॥
सापि तं कुपितातीव निशुम्भं पुरतः स्थितम् ।
प्रहरन्तं समीक्ष्याथ देवी वचनमब्रवीत् ॥
देव्युवाच
तिष्ठ मन्दमते तावद्यावत्खड्गमिदं तव ।
ग्रीवायां प्रेरयाम्यस्माद् गन्तासि यमसादनम् ॥
व्यास उवाच
इत्युक्त्वा तरसा देवी कृपाणेन समाहिता ।
चिच्छेद मस्तकं तस्य निशुम्भस्याथ चण्डिका ॥
सच्छिन्नमस्तको देव्या कबन्धोऽतीव दारुणः ।
बभ्राम च गदापाणिस्त्रासयन्देवतागणान् ॥
देवी तस्य शितैर्बाणैश्चिच्छेद चरणौ करौ ।
पपातोर्व्यां ततः पापी गतासुः पर्वतोपमः ॥
तस्मिन्निपतिते दैत्ये निशुम्भे भीमविक्रमे ।
हाहाकारो महानासीत्तत्सैन्ये भयकम्पिते ॥
त्यक्त्वायुधानि सर्वाणि सैनिकाः क्षतजाप्लुताः ।
जग्मुर्बुम्बारवं सर्वे कुर्वाणा राजमन्दिरम् ॥
तानागतान्सुसम्प्रेक्ष्य शुम्भः शत्रुनिषूदनः ।
पप्रच्छ क्व निशुम्भोऽसौ कथं भग्नाः पलायिताः ॥
मांसाहारी क्रूर पक्षी, कुत्ते, सियार, गीध, कंक तथा कौए अति प्रसन्न होकर नृत्य करने लगे ॥ ३१ ॥
३१ उस समय बहुत से गिरे हुए दैत्योंके रक्त बहते हुए शरीरोंसे तथा हाथियों और घोड़ोंके देहसे ३२ पटी हुई वह रणभूमि अत्यधिक [ भयानक ] प्रतीत हो रही थी ॥ ३२ ॥
[ भूमिपर ] गिरे हुए दानवोंको देखकर निशुम्भ अत्यन्त कुपित हो उठा और एक भयंकर गदा लेकर ३३ शीघ्रतापूर्वक भगवतीके समक्ष पहुँच गया ॥ ३३ ॥
अभिमानमें चूर उस निशुम्भने सिंहके मस्तकपर गदासे प्रहार किया । तत्पश्चात् उसने मुसकराकर पुनः ३४ देवीपर प्रहार करके उन्हें चोट पहुँचायी ॥ ३४ ॥
इससे वे भगवती भी अत्यन्त कुपित हो गयीं और समक्ष स्थित होकर प्रहार कर रहे उस निशुम्भको ३५ देखकर कहने लगीं —॥३५ ॥
देवी बोलीं – हे मन्दबुद्धि! मैं तलवार चला रही हूँ । तुम तबतकके लिये ठहर जाओ, जबतक मेरी यह तलवार तुम्हारी गर्दनतक नहीं पहुँच जाती । इसके ३६ बाद तुम यमपुरी निश्चय ही पहुँच जाओगे ॥ ३६ ॥
व्यासजी बोले- ऐसा कहकर भगवती चण्डिकाने एकाग्रचित्त होकर बड़ी शीघ्रतासे अपने कृपाणसे उस निशुम्भका मस्तक काट दिया ॥ ३७ ॥
३७ इस प्रकार भगवतीके द्वारा सिर कटा हुआ अत्यन्त विकराल वह धड़ हाथमें गदा धारण किये देवगणोंको भयभीत करता हुआ इधर - उधर घूमने लगा ॥ ३८ ॥
३८ तत्पश्चात् भगवतीने तीक्ष्ण बाणोंसे उसके दोनों हाथ तथा पैर भी काट दिये । इसके बाद पर्वतके समान शरीरवाला वह पापी दैत्य प्राणहीन होकर ३ ९ धरतीपर गिर पड़ा ॥ ३ ९ ॥ प्रचण्ड पराक्रमवाले उस निशुम्भ दैत्यके गिर जानेपर भयसे कम्पित दानवसेनामें महान् हाहाकार ४० मच गया । रक्तसे लथपथ समस्त दानवसैनिक अपने-अपने सभी आयुध फेंककर चीख - पुकार करते हुए राजभवनकी ओर भाग गये ॥ ४०-४१ ॥ ४१ शत्रुओंके संहारकी शक्ति रखनेवाले शुम्भने वहाँ आये हुए उन सैनिकोंको देखकर उनसे पूछा-निशुम्भ कहाँ है और घायल होकर तुम सब ४२ । युद्धभूमिसे भाग क्यों आये? ॥ ४२ ॥
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अ ० ३० ]
तच्छ्रुत्वा वचनं राज्ञस्ते प्रोचुः प्रणता भृशम् ।
राजंस्ते निहतो भ्राता शेते समरमूर्धनि ॥
तया निपातिताः शूरा ये च तेऽप्यनुजानुगाः ।
वयं त्वां कथितुं सर्वं वृत्तान्तं समुपागताः ॥
निशुम्भो निहतस्तत्र तया चण्डिकयाधुना ।
न हि युद्धस्य कालोऽद्य तव राजन् रणाङ्गणे ॥
देवकार्यं समुद्दिश्य कापीयं परमाङ्गना ।
हन्तुं दैत्यकुलं नूनं प्राप्तेति परिचिन्तय ॥
नैषा प्राकृतयोषैव देवी शक्तिरनुत्तमा ।
अचिन्त्यचरिता क्वापि दुर्ज्ञेया दैवतैरपि ॥
नानारूपधरातीव मायामूलविशारदा ।
विचित्रभूषणा देवी सर्वायुधधरा शुभा ॥
गहना गूढचरिता कालरात्रिरिवापरा ।
अपारपारगा पूर्णा सर्वलक्षणसंयुता ॥
अन्तरिक्षस्थिता देवास्तां स्तुवन्त्यकुतोभयाः ।
देवकार्यञ्च कुर्वाणां श्रीदेवीं परमाद्भुताम् ॥
पलायनं परो धर्मः सर्वथा देहरक्षणम् ।
रक्षिते किल देहेस्मिन्कालेऽस्मत्सुखताङ्गते ॥
संग्रामे विजयो राजन् भविता ते न संशयः ।
कालः करोति बलिनं समये निर्बलं क्वचित् ॥
पञ्चम स्कन्ध ६ ९ ५ दानवराज शुम्भका वह वचन सुनकर उन सैनिकोंने अति विनम्रतापूर्वक कहा - हे राजन्! ४३ आपके भाई निशुम्भ मृत होकर रणभूमिमें सोये पड़े हैं ॥ ४३ ॥
उस स्त्रीने आपके अनुज ( निशुम्भ ) - के जो ४४ भी अनुचर दानववीर थे, उन्हें मार डाला । यही सब समाचार आपको बतानेके लिये हम यहाँ आये हुए हैं ॥४४ ॥
उस चण्डिकाने इसी समय युद्धभूमिमें ४५ निशुम्भका संहार किया है । अतएव हे राजन्! उसके साथ समरभूमिमें आपके लिये आज युद्ध करनेका [ उचित ] अवसर नहीं है ॥ ४५ ॥
आप यह निश्चितरूपसे जान लीजिये कि ४६ देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके उद्देश्यसे दानवकुलका संहार करनेके लिये यह कोई अद्भुत देवी प्रकट हुई है ॥ ४६ ॥
यह सामान्य नारी नहीं है, अपितु देवीरूपिणी ४७ कोई अत्युत्तम शक्ति है । अद्भुत चरित्रोंवाली ये देवी देवताओंके भी ज्ञानसे परे हैं ॥ ४७ ॥
ये कल्याणी भगवती अनेक रूप धारण करनेमें समर्थ हैं, मायाके मूल तत्त्वका पूर्ण ज्ञान रखनेवाली ४८ हैं और अद्भुत भूषण तथा समस्त प्रकारके आयुध धारण करनेवाली हैं ॥ ४८ ॥
गूढ़ चरित्रोंवाली इन देवीको जान पाना अत्यन्त ४ ९ कठिन है 1 । ये दूसरी कालरात्रिके समान प्रतीत होती हैं । असीमके भी पार जा सकनेमें समर्थ ये पूर्णतामयी देवी सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न हैं ॥ ४ ९ ॥ समस्त देवतागण अन्तरिक्षमें स्थित होकर देवकार्य ५० सिद्ध करनेवाली परम अद्भुतस्वरूपिणी उन देवीका निर्भीकतापूर्वक स्तवन कर रहे हैं ॥ ५० ॥
यदि आप शरीरकी रक्षा करना चाहते हैं तो इस समय पलायन ही परम धर्म है । इस शरीर की ५१ रक्षा हो जानेके बाद पुनः आनन्ददायक अनुकूल समय आनेपर संग्राममें आपकी विजय होगी, इसमें कोई सन्देह नहीं है । हे राजन्! कभी - कभी काल बलवान्को भी बलहीन बना देता है और पुनः समय ५२ | आनेपर उसे बलशाली बनाकर विजयकी प्राप्ति
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६ ९ ६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३०
तं पुनः सबलं कृत्वा जयायोपदधाति हि ।
दातारं याचकं कालः करोति समये क्वचित् ॥
भिक्षुकं धनदातारं करोति समयान्तरे ।
विष्णुः कालवशे नूनं ब्रह्मा वा पार्वतीपतिः ॥
इन्द्राद्या निर्जराः सर्वे काल एव प्रभुः स्वयम् ।
तस्मात्कालं प्रतीक्षस्व विपरीतं तवाधुना ॥
सम्मुखो देवतानाञ्च दैत्यानां नाशहेतुकः ।
एकैव च गतिर्नास्ति कालस्य किल भूपते ॥
नानारूपधराप्यस्ति ज्ञातव्यं तस्य चेष्टितम् ।
कदाचित्सम्भवो नॄणां कदाचित्प्रलयस्तथा ॥
उत्पत्तिहेतुः कालोऽन्यः क्षयहेतुस्तथापरः ।
प्रत्यक्षं ते महाराज देवाः सर्वे सवासवाः ॥
करदास्ते कृताः पूर्वं कालेन सम्मुखेन च ।
तेनैव विमुखेनाद्य बलिनो ऽबलयासुराः ॥
निहता नितरां कालः करोति च शुभाशुभम् ।
नैवात्र कारणं काली नैव देवाः सनातनाः ॥
यथा ते रोचते राजंस्तथा कुरु विमृश्य च ।
कालोऽयं नात्र हेतुस्ते दानवानां तथा पुनः ॥
त्वदग्रतो गतः शक्रो भग्नः संख्ये निरायुधः ।
तथा विष्णुस्तथा रुद्रो वरुणो धनदो यमः ॥
तथा त्वमपि राजेन्द्र वीक्ष्य कालवशं जगत् ।
पातालं गच्छ तरसा जीवन्भद्रमवाप्स्यसि ॥
करा देता है । कभी - कभी काल विषम परिस्थितिमें दाताको भिखारी बना देता है और पुनः कुछ समय ५३ बीतनेपर उसी भिखारीको धन देनेवाला बना देता है ॥५१–५३३ ॥ विष्णु, ब्रह्मा, शिव तथा इन्द्र आदि सभी देवता ५४ निश्चितरूपसे सदा कालके वशवर्ती हैं । यह काल स्वयं ही सबका स्वामी है । हे राजन्! अभी काल आपके लिये विपरीत है, अतएव आप समयकी प्रतीक्षा कीजिये ॥ ५४-५५ ॥ ५५ हे पृथ्वीपते! इस समय काल देवताओंके लिये अनुकूल तथा दैत्योंके लिये विनाशकारी है । कालकी गति सर्वथा एक ही तरहकी नहीं बनी रहती ५६ है । यह काल - गति नानाविध रूप भी धारण करती है । अतः कालकी चेष्टापर विचार करते रहना चाहिये । कभी प्राणियोंका जन्म होता है और कभी ५७ उनका मरण उपस्थित हो जाता है । एक काल उत्पत्तिका हेतु होता है तो दूसरा काल विनाशका हेतु बन जाता है॥५६-५७३ ॥ हे महाराज! आपके समक्ष इसका प्रमाण ५८ विद्यमान है कि पहले इन्द्र आदि सभी देवता आपके लिये अनुकूल समय रहनेपर आपके करदाता बन गये थे, किंतु आज उसी कालके विपरीत हो जानेके ५ ९ कारण एक अबलाने बलशाली असुरोंका संहार कर डाला । यही काल हित भी करता है तथा अहित भी करता है । इस पराजयमें न तो काली कारण हैं और न तो सनातन देवता ही कारण हैं ॥ ५८–६० ॥ ६० हे राजन्! आपको जैसा उचित जान पड़े भलीभाँति सोच - समझकर आप वैसा ही कीजिये । हमारी समझमें तो यह काल अभी आपके तथा अन्य ६१ दानवोंके लिये भी अनुकूल नहीं है ॥ ६१ ॥
किसी समय संग्राममें घायल होकर तथा अपने आयुध छोड़कर इन्द्र आपके सामनेसे भाग गये थे । ऐसे ही विष्णु, रुद्र, वरुण, कुबेर, यम आदि देवता ६२ भी आपके समक्ष टिक नहीं पाये थे । अतः हे राजेन्द्र! इस समस्त जगत्को कालके अधीन मानकर आप भी तत्काल पाताललोक चले जाइये; जीवन बचा रहा तो ६३ आप कल्याण अवश्य प्राप्त करेंगे ॥ ६२-६३ ॥
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अ ० ३१ ] पञ्चम स्कन्ध ६ ९ ७ मृते त्वयि महाराज शत्रवस्ते मुदान्विताः । हे महाराज! यदि कहीं आपका निधन हो गया तो आपके शत्रु प्रसन्नतापूर्वक मंगलगान करते हुए मङ्गलानि प्रगायन्तो विचरिष्यन्ति सर्वतः ॥ ६४ | निर्भय होकर सर्वत्र विचरण करेंगे ॥६४ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे युद्धात्प्रत्यागतानां रक्षसां शुम्भाय वार्ताविर्णनं नाम त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥
अथैकत्रिंशोऽध्यायः शुम्भका रणभूमिमें आना और देवीसे वार्तालाप करना, भगवती कालिकाद्वारा उसका वध, देवीके इस उत्तम चरित्रके पठन और श्रवणका फल व्यास उवाच
इति तेषां वचः श्रुत्वा शुम्भो दैत्यपतिस्तथा ।
उवाच सैनिकानाशु कोपाकुलितलोचनः ॥ १
शुम्भ उवाच
जाल्मा: किं ब्रूत दुर्वाच्यं कृत्वा जीवितुमुत्सहे ।
निहत्य सचिवान्भ्रातॄन्निर्लज्जो विचरामि किम् ॥
कालः कर्ता शुभानां वाशुभानां बलवत्तरः ।
का चिन्ता मम दुर्वारे तस्मिन्नीशेऽप्यरूपके ॥ ३
यद्भवति तद्भवतु यत्करोति करोतु तत् ।
न मे चिन्तास्ति कुत्रापि मरणाज्जीवनात्तथा ॥ ४
स कालोऽप्यन्यथाकर्तुं भावितो नेशते क्वचित् ।
न वर्षति च पर्जन्यः श्रावणे मासि सर्वथा ॥ ५
कदाचिन्मार्गशीर्षे वा पौषे माघेऽथ फाल्गुने ।
अकाले वर्षतीवाशु तस्मान्मुख्यो न चास्त्ययम् ॥ ६
कालो निमित्तमात्रं तु दैवं हि बलवत्तरम् ।
दैवेन निर्मितं सर्वं नान्यथा भवतीत्यदः ॥ ७
दैवमेव परं मन्ये धिक्पौरुषमनर्थकम् ।
जेता यः सर्वदेवानां निशुम्भोऽप्यनया हतः ॥ ८
व्यासजी बोले – उन सैनिकोंका यह वचन सुनकर क्रोधसे आकुलित नेत्रोंवाले दानवराज शुम्भने उनसे तुरन्त कहा ॥१ ॥
शुम्भ बोला – हे मूर्खो! तुम सब खोटी बात क्यों बोल रहे हो? तुम्हारे वचनोंको मानकर मैं भला अपने जीवनकी रक्षा क्यों करूँ? क्या अपने सचिवों तथा भाई - बन्धुओंका वध कराकर मैं निर्लज्ज बनकर विचरण करूँ? ॥२ ॥
प्राणियोंके शुभ अथवा अशुभका कर्ता जब एकमात्र वही अति बलवान् काल है तो मुझे चिन्ता क्या? क्योंकि परोक्षरूपसे सबपर शासन करनेवाला वह काल टाला नहीं जा सकता ॥३ ॥
जो हो रहा है, वह होता रहे तथा काल जो कुछ भी कर रहा है, उसे करता रहे; अब तो मुझे जीवन तथा मृत्युके विषयमें किसी भी प्रकारकी चिन्ता नहीं है ॥ ४ ॥
वह काल भी भवितव्यताको मिटा सकनेमें समर्थ नहीं है । ऐसा भी होता है कि सावनके महीनेमें मेघ सदा नहीं बरसते; अपितु कभी - कभी अगहन, पौष, माघ तथा फाल्गुनमें असमय ही तेज वृष्टि होने लगती है । अतएव [ समस्त कार्योंमें ] काल ही प्रधान नहीं है ॥ ५-६ ॥ काल तो निमित्तमात्र है, अपितु [ इसकी तुलनामें ] दैव अधिक बलवान् है । सब कुछ दैवनिर्मित है; इसके विपरीत कुछ नहीं होता ॥ ७ ॥
मैं तो दैवको ही प्रधान मानता हूँ । अनर्थकारी पुरुषार्थको धिक्कार है; क्योंकि जिस निशुम्भने सभी देवताओं पर विजय प्राप्त कर ली थी, उसे इस । स्त्रीने मार डाला ॥ ८ ॥
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६ ९ ८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३१
रक्तबीजो महाशूरः सोऽपि नाशं गतो यदा ।
तदाहं कीर्तिमुत्सृज्य जीविताशां करोमि किम् ॥
प्राप्ते काले स्वयं ब्रह्मा परार्धद्वयसम्मिते ।
निधनं याति तरसा जगत्कर्ता स्वयं प्रभुः ॥
चतुर्युगसहस्त्रं तु ब्रह्मणो दिवसे किल ।
पतन्ति भवनात्पञ्च नव चेन्द्रास्तथा पुनः ॥
तथैव द्विगुणे विष्णुर्मरणायोपकल्पते ।
तथैव द्विगुणे काले शङ्करः शान्तिमेति च ॥
का चिन्ता मरणे मूढा निश्चले दैवनिर्मिते ।
मही महीधराणाञ्च नाशः सूर्यशशाङ्कयोः ॥
जातस्य हि ध्रुवं मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।
अधुवेऽस्मिञ्छरीरे तु रक्षणीयं यशः स्थिरम् ॥
रथो मे कल्प्यतां शीघ्रं गमिष्यामि रणाजिरे ।
जयो वा मरणं वापि भवत्वद्यैव दैवतः ॥
इत्युक्त्वा सैनिकाञ्छुम्भो रथमास्थाय सत्वरः ।
प्रययावम्बिका यत्र संस्थिता तु हिमाचले ॥
सैन्यं प्रचलितं तस्य सङ्गे तत्र चतुर्विधम् ।
हस्त्यश्वरथपादातिसंयुतं सायुधं बहु ॥
तत्र गत्वाचले शुम्भः संस्थितां जगदम्बिकाम् ।
त्रैलोक्यमोहिनीं कान्तामपश्यत्सिंहवाहिनीम् ॥
सर्वाभरणभूषाढ्यां सर्वलक्षणसंवृताम् ।
स्तूयमानां सुरैः खस्थैर्गन्धर्वयक्षकिन्नरैः ॥
पुष्पैश्च पूज्यमानाञ्च मन्दारपादपोद्भवैः ।
कुर्वाणां शङ्खनिनदं घण्टानादं मनोहरम् ॥
जब महान् शूरवीर रक्तबीज भी विनाशको ९ प्राप्त हो गया, तब अपनी कीर्तिको कलंकित करके मैं ही जीवनकी आशा क्यों करूँ? ॥ ९ ॥
जगत्के रचयिता सर्वसमर्थ स्वयं ब्रह्मा भी दो परार्धका समय बीत जानेपर तत्क्षण ही निधनको १० प्राप्त हो जाते हैं ॥ १० ॥
ब्रह्माजीके एक दिनमें एक हजार चतुर्युग समाप्त हो जाते हैं और इतनी ही अवधिमें चौदह ११ इन्द्रोंका स्वर्गसे पतन हो चुकता है ॥११ ॥
इसी प्रकार [ ब्रह्माजीके जीवनकालका ] दुगुना समय बीतने पर विष्णुका अन्त हो जाता है तथा १२ इससे भी दूने समयके पश्चात् शंकर भी समाप्त हो जाते हैं ॥१२ ॥
इसी प्रकार पृथ्वी, पर्वत, सूर्य तथा चन्द्रमा १३ | आदिका भी विनाश हो जाता है, तब हे मूर्खो! दैवकी बनायी हुई इस अटल मृत्युके विषयमें क्या चिन्ता है? ॥ १३ ॥
१४ जन्म लेनेवालेकी मृत्यु निश्चित है तथा मरनेवालेका जन्म निश्चित है | अतः इस अनित्य शरीरके द्वारा अपनी स्थिर कीर्तिकी रक्षा करनी चाहिये ॥ १४ ॥
१५ शीघ्रतापूर्वक मेरा रथ तैयार करो । मैं समरांगणमें जाऊँगा । विजय अथवा मरण प्रारब्धानुसार जो भी होनेवाला हो, वह आज ही हो जाय ॥ १५ ॥
१६ सैनिकोंसे ऐसा कहकर वह शुम्भ तुरंत रथपर सवार होकर हिमालयकी ओर चल दिया, जहाँ भगवती विराजमान थीं ॥ १६ ॥
उस समय हाथी, घोड़े, रथ तथा पैदल चलने-१७ वालोंसे सुसज्जित एवं नानाविध आयुधोंसे युक्त विशाल चतुरंगिणी सेना भी उसके साथ चल पड़ी ॥ १७ ॥
उस पर्वतपर पहुँचकर शुम्भने त्रिभुवनको १८ मोहित करनेवाली परम सुन्दरी सिंहवाहिनी भगवती जगदम्बिकाको वहाँ विराजमान देखा । वे सभी प्रकारके आभूषणोंसे अलंकृत थीं तथा सभी शुभ १ ९ लक्षणोंसे सम्पन्न थीं; देवता, यक्ष तथा किन्नर आकाशमें स्थित होकर उनकी स्तुति कर रहे थे तथा मन्दारवृक्षके पुष्पोंसे पूजा कर रहे थे और वे मनोहर २० । शंखध्वनि तथा घंटानाद कर रही थीं ॥ १८ - २० ॥
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अ ० ३१ ] पञ्चम स्कन्ध ६ ९९
दृष्ट्वा तां मोहमगमच्छुम्भः कामविमोहितः ।
पञ्चबाणाहतः कामं मनसा समचिन्तयत् ॥
अहो रूपमिदं सम्यगहो चातुर्यमद्भुतम् ।
सौकुमार्यञ्च धैर्यञ्च परस्परविरोधि यत् ॥
सुकुमारातितन्वङ्गी सद्यः प्रकटयौवना ।
चित्रमेतदसौ बाला कामभावविवर्जिता ॥
कामकान्तासमा रूपे सर्वलक्षणलक्षिता ।
अम्बिकेयं किमेतत्तु हन्ति सर्वान्महाबलान् ॥
उपायः कोऽत्र कर्तव्यो येन मे वशगा भवेत् ।
न मन्त्रा वा मरालाक्षीसाधने सन्निधौ मम ॥
सर्वमन्त्रमयी ह्येषा मोहिनी मदगर्विता ।
सुन्दरीयं कथं मे स्याद्वशगा वरवर्णिनी ॥
पातालगमनं मेऽद्य न युक्तं समराङ्गणात् ।
सामदानविभेदैश्च नेयं साध्या महाबला ॥
किं कर्तव्यं क्व गन्तव्यं विषमे समुपस्थिते ।
मरणं नोत्तमं चात्र स्त्रीकृतं तु यशोऽपहृत् ॥
मरणमृषिभिः प्रोक्तं सङ्गरे मङ्गलास्पदम् ।
यत्तत्समानबलयोर्योधयोर्युध्यतोः किल ॥
प्राप्तेयं दैवरचिता नारी नरशतोत्तमा ।
नाशायास्मत्कुलस्येह सर्वथातिबलाबला ॥
वृथा किं सामवाक्यानि मया योज्यानि साम्प्रतम् ।
हननायागता ह्येषा किं नु साम्ना प्रसीदति ॥
उन्हें देखकर शुम्भ मोहित हो गया । कामबाणसे २१ आहत वह शुम्भ कामासक्त होकर मन - ही - मन सोचने लगा- ॥ २१ ॥
अहो, इसका ऐसा आकर्षक रूप तथा ऐसा अद्भुत चातुर्य है । सुकुमारता तथा धीरता – ये दोनों २२ परस्पर विरोधीभाव इसमें एक साथ विद्यमान हैं!॥ २२ ॥
अत्यन्त कृश शरीरवाली इस सुकुमारीमें अभी-अभी यौवन प्रस्फुटित हुआ है, किंतु आश्चर्य है कि २३ यह रमणी कामभावनासे रहित है ॥ २३ ॥
रूपमें कामदेवकी पत्नी रतिके समान सुन्दर तथा सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न यह स्त्री कहीं अम्बिका ही तो नहीं, जो सभी महाबली दानवोंका २४ संहार कर रही है ॥ २४ ॥
इस अवसरपर मैं कौन - सा उपाय करूँ, जिससे यह मेरी वशवर्तिनी हो जाय? इस हंस - सदृश २५ नेत्रोंवालीको वशमें करनेहेतु मेरे पास कोई मन्त्र भी नहीं है ॥ २५ ॥
सर्वमन्त्रमयी, सबको मोहित करनेवाली, अभिमानमें मत्त रहनेवाली तथा उत्तम लक्षणोंवाली यह सुन्दरी २६ किस प्रकार मेरे वशमें होगी? ॥ २६ ॥
अब युद्धभूमि छोड़कर पाताललोक जाना भी मेरे लिये उचित नहीं है । साम, दान तथा भेद आदि २७ उपायोंसे भी यह महाबलशालिनी वशमें नहीं की जा सकती ॥ २७ ॥
इस विषम परिस्थितिके आ जानेपर अब मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ? स्त्रीके हाथों मर जाना भी उचित २८ नहीं है; क्योंकि ऐसी मृत्यु यशको नष्ट करनेवाली होती है ॥२८ ॥
ऋषियोंने उस मृत्युको श्रेयस्कर कहा है, जो २ ९ समरभूमिमें समान बलवाले योद्धाओंके साथ लड़ते-लड़ते प्राप्त हो ॥ २ ९ ॥ सैकड़ों वीरोंसे श्रेष्ठ, महाबलशालिनी तथा ३० दैव - विरचित यह नारी मेरे कुलके पूर्ण विनाशके लिये यहाँ उपस्थित हुई है ॥ ३० ॥
मैं इस समय सामनीतिसे युक्त वचनोंका प्रयोग व्यर्थमें क्यों करूँ? क्योंकि यह तो संहारके ३१ लिये आयी हुई है, तो फिर सामवचनोंसे यह कैसे
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७०० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३१
न दानैश्चालितुं योग्या नानाशस्त्रविभूषिता ।
भेदस्तु विफलः कामं सर्वदेववशानुगा ॥
तस्मात्तु मरणं श्रेयो न संग्रामे पलायनम् ।
जयो वा मरणं वाद्य भवत्वेव यथाविधि ॥
व्यास उवाच
इति सञ्चिन्त्य मनसा शुम्भः सत्त्वाश्रितोऽभवत् ।
युद्धाय सुस्थिरो भूत्वा तामुवाच पुरः स्थिताम् ॥
देवि युध्यस्व कान्तेऽद्य वृथायं ते परिश्रमः ।
मूर्खासि किल नारीणां नायं धर्मः कदाचन ॥
नारीणां लोचने बाणा भ्रुवावेव शरासनम् ।
हावभावास्तु शस्त्राणि पुमाँल्लक्ष्यं विचक्षणः ॥
सन्नाहश्चाङ्गरागोऽत्र रथश्चापि मनोरथः ।
मन्दप्रजल्पितं भेरीशब्दो नान्यः कदाचन ॥
अन्यास्त्रधारणं स्त्रीणां विडम्बनमसंशयम् ।
लज्जैव भूषणं कान्ते न च धाष्टर्यं कदाचन ॥
युध्यमाना वरा नारी कर्कशेवाभिदृश्यते ।
स्तनौ सङ्गोपनीयौ वा धनुषः कर्षणे कथम् ॥
क्व मन्दगमनं कुत्र गदामादाय धावनम् ।
बुद्धिदा कालिका तेऽत्र चामुण्डा परनायिका ॥
चण्डिका मन्त्रमध्यस्था लालनेऽसुस्वरा शिवा ।
वाहनं मृगराडास्ते सर्वसत्त्वभयङ्करः ॥
प्रसन्न हो सकती है? अनेक प्रकारके शस्त्रोंसे विभूषित होनेके कारण दान आदिके प्रलोभनोंसे ३२ भी यह विचलित नहीं की जा सकती । भेदनीति भी निष्फल सिद्ध होगी; क्योंकि सभी देवता इसके वशमें हैं ॥ ३१-३२ ॥ ३३ अतएव संग्राममें मर जाना श्रेयस्कर है, किंतु पलायन करना ठीक नहीं है । अब तो प्रारब्धके अनुसार विजय अथवा मृत्यु जो भी होना हो, वह हो ॥ ३३ ॥
व्यासजी बोले- इस प्रकार अपने मनमें ३४ विचार करके शुम्भने धैर्यका सहारा लिया । अब युद्धके लिये दृढ़ निश्चय करके उसने अपने सामने खड़ी भगवती से कहा ॥ ३४ ॥
हे देवि! युद्ध करो, किंतु हे प्रिये! इस समय ३५ तुम्हारा यह परिश्रम व्यर्थ है । तुम मूर्ख हो; क्योंकि युद्ध करना स्त्रियोंका स्त्रियोंके नेत्र ही हैं, उनके हाव - भाव ३६ उनका लक्ष्य है ॥ ३६ अंगराग ( शीतल है, मनोकामना रथ है ३७ बोलना भेरी - ध्वनि है धर्म कदापि नहीं है ॥ ३५ ॥
बाण हैं, उनकी भौंहें ही धनुष ही शस्त्र हैं और रसज्ञ पुरुष ॥ चन्दन आदि ) ही उनका कवच तथा धीरे - धीरे मधुर वाणीमें । अतएव स्त्रियोंके लिये अन्य शस्त्रों की कोई आवश्यकता नहीं रहती ॥ ३७ ॥
यदि स्त्रियाँ इनके अतिरिक्त अन्य अस्त्र धारण करें तो यह निश्चितरूपसे उनके लिये विडम्बना ही ३८ है । हे प्रिये! लज्जा ही नारियोंका आभूषण है, धृष्टता उन्हें कभी भी शोभा नहीं देती ॥ ३८ ॥
युद्ध करती हुई उत्तम नारी भी कर्कशाके सदृश दिखायी देती है । धनुष खींचते समय कोई ३ ९ स्त्री अपने दोनों स्तनोंको छिपानेमें कैसे सफल हो सकती है? ॥ ३ ९ ॥ कहाँ नारियोंकी मन्थरगति और कहाँ युद्धमें गदा ४० लेकर दौड़ना । इस समय यह कालिका तथा दूसरी स्त्री चामुण्डा ही तुम्हें बुद्धि देनेवाली हैं । मध्यस्थ होकर चण्डिका मन्त्रणा देती है, कर्कश स्वरवाली शिवा तुम्हारी शुश्रूषामें रहती है और सभी प्राणियोंमें ४१ । भयंकर सिंह तुम्हारा वाहन है॥४०-४१ ॥
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अ ० ३१ ] वीणानादं परित्यज्य घण्टानादं करोषि यत् । रूपयौवनयोः सर्वं विरोधि वरवर्णिनि ।
यदि ते सङ्गरेच्छास्ति कुरूपा भव भामिनि ।
लम्बोष्ठी कुनखी क्रूरा ध्वांक्षवर्णा विलोचना ॥
लम्बपादा कुदन्ती च मार्जारनयनाकृतिः ।
ईदृशं रूपमास्थाय तिष्ठ युद्धे स्थिरा भव ॥
कर्कशं वचनं ब्रूहि ततो युद्धं करोम्यहम् ।
ईदृशीं सुदतीं दृष्ट्वा न मे पाणिः प्रसीदति ॥
हन्तुं त्वां मृगशावाक्षि कामकान्तोपमे मृधे । व्यास उवाच इति ब्रुवाणं कामार्तं वीक्ष्य तं जगदम्बिका ॥ स्मितपूर्वमिदं वाक्यमुवाच भरतोत्तम । देव्युवाच किं विषीदसि मन्दात्मन् कामबाणविमोहितः ॥
प्रेक्षिकाहं स्थिता मूढ कुरु कालिकया मृधम् ।
चामुण्डया वा कुर्वेते तव योग्ये रणाङ्गणे ॥
प्रहरस्व यथाकामं नाहं त्वां योद्धुमुत्सहे ।
इत्युक्त्वा कालिकां प्राह देवी मधुरया गिरा ॥
जह्येनं कालिके क्रूरे कुरूपप्रियमाहवे । व्यास उवाच इत्युक्ता कालिका कालप्रेरिता कालरूपिणी ॥
गदां प्रगृह्य तरसा तस्थावाजौ कृतोद्यमा ।
तयोः परस्परं युद्धं बभूवातिभयानकम् ॥
पश्यतां सर्वदेवानां मुनीनाञ्च महात्मनाम् । पञ्चम स्कन्ध ७०१ हे सुन्दरि! वीणा वादन छोड़कर तुम यह जो ४२ घंटा - नाद कर रही हो, वह सब तुम्हारे रूप तथा यौवनके सर्वथा विपरीत है ॥ ४२ ॥
हे भामिनि! यदि युद्ध करना ही तुम्हें अभीष्ट है तो तुम सर्वप्रथम लम्बे ओठोंवाली, विचित्र ४३ नखोंवाली, क्रूर स्वभाववाली, कौए - जैसे वर्णवाली, विकृत आँखोंवाली, लम्बे पैरोंवाली, भयंकर दाँतोंवाली और बिल्लीसदृश नेत्रोंवाली कुरूप स्त्री बन ४४ जाओ । ऐसा ही विकराल रूप धारण करके तुम युद्धभूमिमें स्थिरतापूर्वक खड़ी हो जाओ और कर्कश वचन बोलो, तभी मैं तुम्हारे साथ युद्ध ४५ करूँगा; क्योंकि हे मृगशावक - सदृश नेत्रोंवाली! हे रतितुल्य सुन्दरि! सुन्दर दाँतोंवाली ऐसी रमणीको देखकर तुम्हें युद्धमें मारनेके लिये मेरा हाथ नहीं उठ पा रहा है ॥ ४३ – ४५३ ॥ व्यासजी बोले – हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ ४६ जनमेजय! उस कामातुर शुम्भको ऐसा बोलते हुए देखकर भगवती जगदम्बा मुसकराकर यह वचन कहने लगीं— ॥ ४६३ ॥
देवी बोलीं- हे मन्दबुद्धि! कामबाणसे ४७ विमोहित होकर तुम इस प्रकार विषाद क्यों कर रहे हो? हे मूढ! तुम पहले कालिका अथवा चामुण्डाके साथ ही युद्ध कर लो । ये दोनों देवियाँ ४८ ही समरांगणमें तुम्हारे साथ युद्ध करनेमें पूर्ण समर्थ हैं । मैं तो केवल दर्शक बनकर खड़ी हूँ । तुम इन दोनोंपर यथेच्छ प्रहार करो । मैं तुमसे लड़ने की इच्छा नहीं करती ॥ ४७-४८३ ॥ ४ ९ शुम्भसे ऐसा कहकर भगवतीने मधुर वाणीमें कालिकासे कहा - हे क्रूर कालिके! कुरूपाके साथ लड़ने की इच्छावाले इस दानवको तुम युद्धमें मार डालो ॥ ४ ९ ३ ॥ ५० व्यासजी बोले- भगवतीके इस प्रकार कहने पर कालरूपिणी कालिका कालसे प्रेरित होकर बड़ी तेजीसे तत्काल गदा उठाकर सावधानीपूर्वक रणमें खड़ी हो गयीं । इसके बाद सभी देवताओं, मुनियों ५१ और महात्माओंके देखते - देखते उन दोनोंमें अतीव
भीषण युद्ध प्रारम्भ हो गया । ५० -५१३ ॥