देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 711–720
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 711–720
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७०२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३१ गदामुद्यम्य शुम्भोऽथ जघान कालिकां रणे ॥ ५२
कालिका दैत्यराजानं गदया न्यहनद् भृशम् ।
बभंजास्य रथं चण्डी गदया कनकोज्ज्वलम् ॥ ५३
खरान्हत्वा जघानाशु दारुकं दारुणस्वना ।
स पदातिर्गदां गुर्वीं समादाय क्रुधान्वितः ॥ ५४
कालिकाभुजयोर्मध्ये प्रहसन्नहनत्तदा ।
वञ्चयित्वा गदाघातं खड्गमादाय सत्वरा ॥ ५५
चिच्छेदास्य भुजं सव्यं सायुधं चन्दनार्चितम् ।
स छिन्नबाहुर्विरथो गदापाणि: परिप्लुतः ॥ ५६
अचिरेण समागम्य कालिकामहनत्तदा ।
काली च करवालेन भुजं तस्याथ दक्षिणम् ॥ ५७
चिच्छेद प्रहसन्ती सा सगदं किल साङ्गदम् ।
कर्तुं पादप्रहारं स कुपितः प्रययौ जवात् ॥ ५८
काली चिच्छेद चरणौ खड्गेनास्य त्वरान्विता ।
सच्छिन्नकरपादोऽपि तिष्ठ तिष्ठेति च ब्रुवन् ॥५ ९
धावमानो ययावाशु कालिकां भीषयन्निव ।
तमागच्छन्तमालोक्य कालिका कमलोपमम् ॥ ६०
चकर्त मस्तकं कण्ठाद्रुधिरौघवहं भृशम् ।
छिन्नेऽसौ मस्तके भूमौ पपात गिरिसन्निभः ॥ ६१
प्राणा विनिर्ययुस्तस्य देहादुत्क्रम्य सत्वरम् ।
गतासुं पतितं दैत्यं दृष्ट्वा देवाः सवासवाः ॥ ६२
तुष्टुवुस्तां तदा देवीं चामुण्डां कालिकां तथा । शुम्भ अपनी गदा लेकर उससे कालिकापर प्रहार किया । भगवती कालिका भी अपनी गदासे दैत्यराज शुम्भपर तेज प्रहार करने लगीं । भयानक स्वरवाली चण्डीने गदासे उस दैत्यके सुवर्णमय चमकीले रथको चूर - चूर कर डाला और [ शुम्भका रथ खींचनेवाले ] गदहोंको मारकर उसके सारथिको भी मार डाला ॥ ५२-५३ई ॥ अब क्रोधमें भरे हुए शुम्भने अपनी विशाल गदा लेकर अट्टहास करते हुए पैदल ही पहुँचकर कालिकाकी दोनों भुजाओंके मध्यभाग ( वक्षःस्थल ) -पर प्रहार किया ॥५४३ ॥
तब कालिकाने उसके गदा - प्रहारको निष्फल करके शीघ्रतापूर्वक तलवार उठाकर शुम्भके चन्दनचर्चित तथा आयुधयुक्त बायें हाथको काट दिया ॥ ५५३ ॥
हाथ कट जाने तथा रथविहीन होनेके बावजूद भी रक्तसे लथपथ वह शुम्भ हाथमें गदा लिये हुए शीघ्रतापूर्वक कालिकाके पास पहुँचकर उनके ऊपर प्रहार करने लगा ॥ ५६ ॥
तब कालीने अपने करवाल ( तलवार ) - से उसके गदायुक्त तथा बाजूबन्दसे सुशोभित दाहिने हाथको हँसते - हँसते काट डाला ॥ ५७३ ॥
इसके बाद वह शुम्भ कुपित होकर कालिकापर पैरसे प्रहार करनेके लिये शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़ा । तभी कालिकाने अपनी तलवारसे तुरंत उसके दोनों पैर भी काट डाले ॥ ५८३ ॥
हाथ- थ - पैर कट जानेपर भी ' ठहरो - ठहरो ' ऐसा कहता हुआ वह शुम्भ कालिकाको भयभीत करते हुए वेगपूर्वक दौड़ता हुआ उनकी ओर बढ़ा ॥ ५ ९ ३ ॥ उसे आते देखकर कालिकाने उसके कमलसदृश मस्तकको काट दिया, जिससे उसके कण्ठसे रक्तकी अजस्र धारा बहने लगी । मस्तक कट जानेपर पर्वततुल्य वह शुम्भ जमीनपर गिर पड़ा और उसके प्राण शरीरसे निकलकर तत्काल प्रयाण कर गये ॥ ६०-६१३ ॥ दैत्य शुम्भको इस प्रकार प्राणविहीन होकर गिरा हुआ देखकर इन्द्रसहित सभी देवता भगवती चामुण्डा तथा कालिकाकी स्तुति करने लगे ॥ ६२३ ॥
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अ ० ३२ ] ववुर्वाता: शिवास्तत्र दिशश्च विमला भृशम् ॥
बभूवुश्चाग्नयो होमे प्रदक्षिणशिखाः शुभाः ।
हतशेषाश्च ये दैत्याः प्रणम्य जगदम्बिकाम् ॥
त्यक्त्वायुधानि ते सर्वे पातालं प्रययुर्नृप ।
एतत्ते सर्वमाख्यातं देव्याश्चरितमुत्तमम् ॥
शुम्भादीनां वधं चैव सुराणां रक्षणं तथा ।
एतदाख्यानकं सर्वं पठन्ति भुवि मानवाः ॥
शृण्वन्ति च सदा भक्त्या ते कृतार्था भवन्ति हि ।
अपुत्रो लभते पुत्रान्निर्धनश्च धनं बहु ॥
रोगी च मुच्यते रोगात्सर्वान्कामानवाप्नुयात् ।
शत्रुतो न भयं तस्य य इदं चरितं शुभम् ।
शृणोति पठते नित्यं मुक्तिमाञ्जायते नरः ॥
पञ्चम स्कन्ध ७०३ ६३ सुखदायक पवन बहने लगा तथा सभी दिशाएँ अत्यन्त निर्मल हो गयीं । हवन करते समय [ शुभ सूचनाके रूपमें ] अग्निकी पवित्र ज्वालाएँ दाहिनी ६४ ओरसे उठने लगीं ॥ ६३ ॥
हे राजन्! जो दानव मरनेसे बच गये थे, वे सभी जगदम्बिकाको प्रणाम करके अपने - अपने आयुध त्यागकर पाताल चले गये ॥ ६४३ ॥
६५ देवीका उत्तम चरित्र, शुम्भ आदि दैत्योंका वध तथा देवताओंकी रक्षा - इन सबका वर्णन आपसे कर दिया । पृथ्वीपर रहनेवाले जो मनुष्य ६६ इस समस्त आख्यानका भक्तिभावसे निरन्तर पठन तथा श्रवण करते हैं, वे निश्चितरूपसे कृतार्थ हो जाते हैं । पुत्रहीनको पुत्र प्राप्त होते हैं, निर्धनको ६७ विपुल सम्पदा सुलभ हो जाती है तथा रोगी रोगसे मुक्त हो जाता है । वह सभी वांछित फल प्राप्त कर लेता है और उसे शत्रुओंसे किसी प्रकारका भय नहीं रह जाता है । जो मनुष्य इस पवित्र आख्यानका नित्य पठन तथा श्रवण करता है, वह अन्तमें मोक्षका भागी ६८ | हो जाता है ॥ ६५ – ६८ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे शुम्भवधो नामैकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥
अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः देवीमाहात्म्यके प्रसंगमें राजा जनमेजय उवाच
महिमा वर्णितः सम्यक्चण्डिकायास्त्वया मुने ।
केन चाराधिता पूर्वं चरित्रत्रययोगतः ॥
प्रसन्ना कस्य वरदा केन प्राप्तं फलं महत् ।
आराध्य कामदां देवीं कथयस्व कृपानिधे ॥
उपासनाविधिं ब्रह्मंस्तथा पूजाविधिं वद ।
विस्तरेण महाभाग होमस्य च विधिं पुनः ॥
सुरथ और समाधि वैश्यकी कथा जनमेजय बोले- हे मुने! आपने भगवती चण्डिकाकी महिमाका भलीभाँति वर्णन किया । अब आप यह बतानेकी कृपा करें कि तीन १ चरित्रोंका प्रयोग करके पहले किसने भगवतीकी आराधना की थी? ॥ १ ॥
वे वरदायिनी भगवती किसके ऊपर प्रसन्न हुईं? सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाली देवीकी २ उपासना करके किसने महान् फल प्राप्त किया? हे कृपानिधान! यह सब बताइये ॥ २ ॥
हे ब्रह्मन्! हे महाभाग! जगदम्बाकी उपासनाविधि, पूजाविधि तथा हवनविधिका भी ३ विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये ॥३ ॥
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७०४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३२ सूत उवाच
इति भूपवचः श्रुत्वा प्रीतः सत्यवतीसुतः ।
प्रत्युवाच नृपं कृष्णो महामायाप्रपूजनम् ॥
व्यास उवाच
स्वारोचिषेऽन्तरे पूर्वं सुरथो नाम पार्थिवः ।
बभूव परमोदारः प्रजापालनतत्परः ॥
सत्यवादी कर्मपरो ब्राह्मणानाञ्च पूजकः ।
गुरुभक्तिरतो नित्यं स्वदारगमने रतः ॥
दानशीलोऽविरोधी च धनुर्वेदैकपारगः ।
एवं पालयतो राज्यं म्लेच्छाः पर्वतवासिनः ॥
बलाच्छत्रुत्वमापन्नाः सैन्यं कृत्वा चतुर्विधम् ।
हस्त्यश्वरथपादातिसहितास्ते मदोत्कटाः ॥
कोलाविध्वंसिनः प्राप्ताः पृथ्वीग्रहणतत्पराः ।
सुरथः सैन्यमादाय सम्मुखः समपद्यत ॥
युद्धं समभवद् घोरं तस्य तैरतिदारुणैः ।
म्लेच्छानां तु बलं स्वल्पं राज्ञस्तद्बलमद्भुतम् ॥
तथापि तैर्जितो युद्धे दैवाद्राजा पराजितः ।
भग्नश्च स्वपुरं प्राप्तः सुरक्षं दुर्गमण्डितम् ॥
चिन्तयामास मेधावी राजा नीतिविचक्षणः ।
प्रधानान्विमना दृष्ट्वा शत्रुपक्षसमाश्रितान् ॥
स्थानं गृहीत्वा विपुलं परिखादुर्गमण्डितम् ।
कालप्रतीक्षा कर्तव्या किं वा युद्धं वरं मतम् ॥
मन्त्रिणः शत्रुवशगा मन्त्रयोग्या न ते किल ।
किं करोमीति मनसा भूपतिः समचिन्तयत् ॥
कदाचित्ते गृहीत्वा मां पापाचाराः पराश्रिताः ।
शत्रुभ्योऽथ प्रदास्यन्ति तदा किं वा भविष्यति ॥
पापबुद्धिषु विश्वासो न कर्तव्यः कदाचन ।
किन्न ते वै प्रकुर्वन्ति ये लोभवशगा नराः ॥
भ्रातरं पितरं मित्रं सुहृदं बान्धवं तथा । सूतजी बोले - राजाकी यह बात सुनकर सत्यवतीनन्दन कृष्णद्वैपायन प्रसन्न होकर उन्हें महामाया ४ भगवतीका पूजन - विधान बताने लगे ॥४ ॥
व्यासजी बोले- पूर्वकालमें स्वारोचिष - मन्वन्तरमें सुरथ नामक एक राजा हुए; जो परम उदार, प्रजापालनमें तत्पर, सत्यवादी, कर्मनिष्ठ, ब्राह्मणोंके ५ उपासक, गुरुजनोंके प्रति भक्ति रखनेवाले, सदा अपनी ही भार्यामें अनुरक्त, दानशील, किसीके ६ साथ विरोधभाव न रखनेवाले तथा धनुर्विद्यामें पूर्ण पारंगत थे॥५-६३ ॥ इस प्रकार प्रजापालनमें तत्पर रहनेवाले राजा ७ सुरथसे कुछ पर्वतवासी म्लेच्छोंने अनायास ही शत्रुता ठान ली । हाथी, घोड़े, रथ तथा पैदल सैनिकोंसे सुसज्जित चतुरंगिणी सेना लेकर अभिमानमें चूर वे ८ कोलाविध्वंसी सुरथके राज्यपर अधिकार करनेकी लालसासे वहाँ आ पहुँचे । सुरथ भी अपनी सेना लेकर ९ सामने डट गये । उन महाभयंकर म्लेच्छोंके साथ राजा सुरथका भीषण युद्ध होने लगा ॥ ७ – ९ ३ ॥ यद्यपि म्लेच्छोंकी सेना बहुत थोड़ी थी तथा १० राजाकी सेना अत्यन्त विशाल थी, फिर भी दैवयोगसे उन्होंने राजा सुरथको युद्धमें जीत लिया । इस प्रकार उनसे पराजित हुए राजा सुरथ हताश होकर अपने ११ दुर्गवेष्टित सुरक्षित नगरमें आ गये ॥ १०-११ ॥ तत्पश्चात् प्रतिभासम्पन्न तथा नीतिविशारद राजा १२ सुरथ अपने मन्त्रियोंको शत्रुपक्षके अधीन देखकर अत्यन्त खिन्नमनस्क होकर विचार करने लगे कि मैं खाईं तथा किलेसे सुरक्षित किसी बड़े स्थानपर रहकर १३ समयकी प्रतीक्षा करूँ अथवा मेरे लिये युद्ध करना उचित होगा । मेरे मन्त्री शत्रुके वशीभूत हो गये हैं, इसलिये वे अब परामर्श करनेयोग्य नहीं रह गये हैं, १४ तो अब मैं क्या करूँ? वे राजा सुरथ पुनः मन - ही-मन विचार करने लगे । कदाचित् वे पापी तथा शत्रुके १५ साथ मिले हुए मन्त्री मुझे पकड़कर शत्रुओंको सौंप देंगे, तब क्या होगा? पापबुद्धि पुरुषोंपर कभी भी विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि जो मनुष्य १६ लोभके वशीभूत होते हैं वे क्या - क्या नहीं कर बैठते? लोभपरायण मनुष्य अपने भाई, पिता, मित्र, सुहृद्,
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अ ० ३२ ] गुरुं पूज्यं द्विजं द्वेष्टि लोभाविष्टः सदा नरः ॥
तस्मान्मया न कर्तव्यो विश्वासः सर्वथाधुना ।
मन्त्रिवर्गेऽतिपापिष्ठे शत्रुपक्षसमाश्रिते ॥
इति सञ्चिन्त्य मनसा राजा परमदुर्मनाः ।
एकाकी हयमारुह्य निर्जगाम पुरात्ततः ॥
असहायोऽथ निर्गत्य गहनं वनमाश्रितः ।
चिन्तयामास मेधावी क्व गन्तव्यं मया पुनः ॥
योजनत्रयमात्रे तु मुनेराश्रममुत्तमम् ।
ज्ञात्वा जगाम भूपालस्तापसस्य सुमेधसः ॥
बहुवृक्षसमायुक्तं नदीपुलिनसंश्रितम् ।
निर्वैरश्वापदाकीर्णं कोकिलारावमण्डितम् ॥
शिष्याध्ययनशब्दाढ्यं मृगयूथशतावृतम् ।
नीवारान्नसुपक्वाढ्यं सुपुष्पफलपादपम् ॥
होमधूमसुगन्धेन प्रीतिदं प्राणिनां सदा ।
वेदध्वनिसमाक्रान्तं स्वर्गादपि मनोहरम् ॥
दृष्ट्वा तमाश्रमं राजा बभूवासौ मुदान्वितः ।
भयं त्यक्त्वा मतिं चक्रे विश्रामाय द्विजाश्रमे ॥
आसज्य पादपेऽश्वं तु जगाम विनयान्वितः ।
दृष्ट्वा तं मुनिमासीनं सालच्छायासु संश्रितम् ॥
मृगाजिनासनं शान्तं तपसातिकृशं ऋजुम् ।
अध्यापयन्तं शिष्यांश्च वेदशास्त्रार्थदर्शिनम् ॥
रहितं क्रोधलोभाद्यैर्द्वन्द्वातीतं विमत्सरम् ।
आत्मज्ञानरतं सत्यवादिनं शमसंयुतम् ॥
तं वीक्ष्य भूपतिर्भूमौ पपात दण्डवत्तदा ।
तदग्रेऽश्रुजलापूर्णनयनः प्रेमसंयुतः ॥
1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] —23 A पञ्चम स्कन्ध ७०५ १७ बन्धु - बान्धव, पूजनीय गुरु तथा ब्राह्मणसे भी सदा द्वेष करता है । अतएव इस समय शत्रुपक्षके आश्रयको प्राप्त अत्यन्त पापपरायण अपने मन्त्रिसमुदायपर मुझे १८ बिलकुल विश्वास नहीं करना चाहिये ॥ १२–१८ ॥ इस प्रकार अपने मनमें भलीभाँति विचार करके अत्यन्त दुःखीचित्त राजा सुरथ घोड़ेपर आरूढ होकर १ ९ अकेले ही उस नगरसे निकल पड़े ॥ १ ९ ॥ वे बिना किसी सहायकको साथ लिये ही नगरसे बाहर निकलकर एक घने जंगलमें चले गये । २० प्रतिभासम्पन्न राजा सुरथ सोचने लगे कि अब मुझे कहाँ चलना चाहिये? ॥ २० ॥
तपस्वी सुमेधाका पवित्र आश्रम यहाँसे मात्र २१ तीन योजनकी दूरीपर है - यह जानकर राजा सुरथ वहाँ चले गये ॥२१ ॥
बहुत प्रकारके वृक्षोंसे युक्त, नदीके तटपर २२ विराजमान, वैरभावसे रहित होकर विचरण करनेवाले पशुओंसे समन्वित, कोयलोंकी मधुर ध्वनिसे मण्डित, अध्ययनरत शिष्योंके स्वरसे निनादित, सैकड़ों मृगसमूहों से २३ घिरे हुए, भलीभाँति पके हुए नीवारान्नसे परिपूर्ण, सुन्दर फल - फूलसे लदे हुए पादपोंसे सुशोभित, होमके सुगन्धित धूमसे प्राणियोंको सदा आनन्दित २४ करनेवाले, निरन्तर वेदध्वनिसे परिव्याप्त तथा स्वर्गसे भी मनोहर उस आश्रमको देखकर वे राजा अत्यन्त आनन्दित हुए और उन्होंने भय त्यागकर मुनिके आश्रम में २५ विश्राम करनेका निश्चय कर लिया ॥ २२-२५ ॥ तत्पश्चात् अपने घोड़ेको एक वृक्षमें बाँधकर उन्होंने विनम्रतापूर्वक आश्रममें प्रवेश किया । वहाँ २६ उन्होंने देखा कि मुनि एक सालवृक्षकी छायामें मृगचर्मके आसनपर बैठे हुए हैं, उनकी आकृति शान्त है, तपस्या करनेके कारण उनका शरीर क्षीण हो गया २७ है, उनका स्वभाव अति कोमल है, वे शिष्योंको पढ़ा रहे हैं, वे वेद - शास्त्रोंके तत्त्वदर्शी विद्वान् हैं, क्रोध-लोभ आदि विकारोंसे मुक्त हैं, सुख - दुःख आदि २८ द्वन्द्वोंसे परे हैं, ईर्ष्यारहित हैं, आत्मज्ञानके चिन्तनमें संलग्न हैं, सत्यवादी तथा जितेन्द्रिय हैं । उन्हें देखकर अश्रुपूरित नयनोंवाले राजा सुरथ प्रेमपूर्वक उनके आगे २ ९ । दण्डकी भाँति भूतलपर गिर पड़े ॥ २६–२९ ॥
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७०६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३२
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते तमुवाच तदा मुनिः ।
शिष्यो ददौ बृसीं तस्मै गुरुणा नोदितस्तदा ॥
उत्थाय नृपतिस्तस्यां समासीनस्तदाज्ञया ।
अर्घ्यपाद्यार्हणं चक्रे सुमेधा विधिपूर्वकम् ॥
पप्रच्छात्र कुतः प्राप्तः कस्त्वं चिन्तापरः कथम् ।
कथयस्व यथाकामं संवृतं कारणं त्विह ॥
किमागमनकृत्यं ते ब्रूहि कार्यं मनोगतम् ।
करिष्ये वाञ्छितं काममसाध्यमपि यत्तव ॥
राजोवाच
सुरथो नाम राजाहं शत्रुभिश्च पराजितः ।
त्यक्त्वा राज्यं गृहं भार्यामहं ते शरणं गतः ॥
यदाज्ञापयसे ब्रह्मंस्तदहं भक्तितत्परः ।
करिष्यामि न मे त्राता त्वदन्यः पृथिवीतले ॥
शत्रुभ्यो मे भयं घोरं प्राप्तोऽस्म्यद्य तवान्तिकम् ।
त्रायस्व मुनिशार्दूल शरणागतवत्सल ॥
ऋषिरुवाच
निर्भयं वस राजेन्द्र नात्र ते शत्रवः किल ।
आगमिष्यन्ति बलिनो निश्चयं तपसो बलात् ॥
नात्र हिंसा प्रकर्तव्या वनवृत्त्या नृपोत्तम ।
कर्तव्यं जीवनं शस्तैर्नीवारफलमूलकैः ॥
व्यास उवाच
इति तस्य वचः श्रुत्वा निर्भयः स नृपस्तदा ।
उवासाश्रम एवासौ फलमूलाशनः शुचिः ॥
कदाचित्स नृपस्तत्र वृक्षच्छायां समाश्रितः ।
चिन्तयामास चिन्तार्तो गृह एव गताशयः ॥
राज्यं मे शत्रुभिः प्राप्तं म्लेच्छैः पापरतैः सदा ।
सम्पीडिताः स्युर्लोकास्तैर्दुराचारैर्गतत्रपैः ॥
1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] - 23 B तब मुनिने उनसे कहा — उठिये - उठिये, आपका ३० कल्याण हो । तत्पश्चात् गुरुसे आदेश पाकर एक शिष्यने उन्हें आसन प्रदान किया ॥ ३० ॥
तब वे उठकर मुनिसे आज्ञा लेकर उस आसनपर ३१ बैठ गये । इसके बाद सुमेधाऋषिने अर्घ्य -पाद्य - आदि उनका विधिपूर्वक सत्कार किया । मुनिने उनसे पूछा कि आप यहाँ कहाँसे आये हैं? आप कौन हैं तथा ३२ | चिन्तित क्यों हैं? यहाँ आनेका जो भी कारण हो, उसे आप यथारुचि बतायें । आपके आगमनका प्रयोजन क्या है? आप अपने मनके विचारोंको अवश्य ३३ बताइये | आपका कोई असाध्य मनोरथ होगा तो उसे भी मैं पूर्ण करूँगा ॥ ३१–३३ ॥ राजा बोले - मैं सुरथ नामवाला राजा हूँ । शत्रुओंसे पराजित होकर मैं राज्य, महल तथा स्त्री - सब कुछ ३४ छोड़कर आपकी शरण में आया हूँ ॥ ३४ ॥
हे ब्रह्मन्! अब आप मुझे जो भी आज्ञा देंगे, मैं श्रद्धापूर्वक वही करूँगा । इस पृथ्वीतलपर आपके ३५ अतिरिक्त अब कोई दूसरा मेरा रक्षक नहीं है ॥ ३५ ॥
हे मुनिराज! हे शरणागतवत्सल! शत्रुओंसे मुझे महान् भय उपस्थित है, अतएव मैं आपके पास आया ३६हूँ;; अब आप मेरी रक्षा कीजिये ॥ ३६ ॥
ऋषि बोले- हे राजेन्द्र! आप निर्भीक होकर यहाँ रहिये | यह निश्चित है कि मेरी तपस्याके प्रभावसे आपके पराक्रमी शत्रु यहाँ नहीं आ सकेंगे ॥ ३७ ॥
३७ हे नृपश्रेष्ठ! यहाँपर आपको हिंसा नहीं करनी चाहिये और वनवासियोंकी भाँति पवित्र नीवार ३८ तथा फल - मूल आदिके द्वारा जीवन - निर्वाह करना चाहिये ॥ ३८ ॥
व्यासजी बोले- तब मुनिकी यह बात सुनकर राजा सुरथ निर्भय हो गये । अब वे फल- मूलका आहार करते ३ ९ हुए पवित्रताके साथ उस आश्रममें ही रहने लगे ॥ ३ ९ ॥ किसी समय उस आश्रममें एक वृक्षकी छायामें बैठे हुए चिन्ताकुल राजा सुरथका चित्त घरकी ओर ४० चला गया और वे सोचने लगे - ॥ ४० ॥
निरन्तर पापकर्ममें लगे रहनेवाले म्लेच्छ शत्रुओंने मेरा राज्य छीन लिया है । उन दुराचारी तथा निर्लज्ज ४१ । म्लेच्छोंके द्वारा मेरी प्रजा बहुत सतायी जाती होगी ॥ ४१ ॥
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अ ० ३२ ] पञ्चम स्कन्ध ७०७
गजाश्च तुरगाः सर्वे दुर्बला भक्ष्यवर्जिताः ।
जाताः स्युर्नात्र सन्देहः शत्रुणा परिपीडिताः ॥ ४२
सेवका मम सर्वे ते शत्रूणां वशवर्तिनः ।
दुःखिता एव जाताः स्युः पालिता ये मया पुरा ॥ ४३
धनं मे सुदुराचारैरसद्व्ययपरैः परैः ।
द्यूतासवभुजिष्यादिस्थाने स्यात्प्रापितं किल ॥ ४४
कोशक्षयं करिष्यन्ति व्यसनैः पापबुद्धयः ।
न पात्रदाननिपुणा म्लेच्छास्ते मन्त्रिणोऽपि मे ॥ ४५
इति चिन्तापरो राजा वृक्षमूलस्थितो यदा ।
तदाजगाम वैश्यस्तु कश्चिदार्तिपरस्तथा ॥ ४६
नृपेण पुरतो दृष्टः पार्श्वे तत्रोपवेशितः ।
पप्रच्छ तं नृपः कोऽसि कुत एवागतो वनम् ॥ ४७
कोऽसि कस्माच्च दीनोऽसि हरिणः शोकपीडितः ।
ब्रूहि सत्यं महाभाग मैत्री साप्तपदी मता ॥ ४८
व्यास उवाच
तच्छ्रुत्वा वचनं राज्ञस्तमुवाच विशोत्तमः ।
उपविश्य स्थिरो भूत्वा मत्वा साधुसमागमम् ॥ ४ ९
वैश्य उवाच
मित्राहं वैश्यजातीयः समाधिर्नाम विश्रुतः ।
धनवान्धर्मनिपुणः सत्यवागनसूयकः ॥५०
पुत्रदारैर्निरस्तोऽहं धनलुब्धैरसाधुभिः । ( कृपणेति मिषं कृत्वा त्यक्त्वा मायां सुदुस्त्यजाम् । ) स्वजनेन च संत्यक्तः प्राप्तोऽस्मि वनमाशु वै ॥ ५१ कोऽसि त्वं भाग्यवान्भासि कथयस्व प्रियाधुना । मेरे सभी हाथी तथा घोड़े आहार न पाने तथा शत्रुसे प्रताड़ित किये जानेके कारण अत्यन्त दुर्बल हो गये होंगे; इसमें तो कोई सन्देह नहीं है ॥ ४२ ॥
अपने जिन सेवकों का मैंने पहले पालन - पोषण किया था, वे सब शत्रुओंके अधीन हो जानेके कारण कष्टका अनुभव करते होंगे ॥ ४३ ॥
उन अति दुराचारी तथा अपव्यय करनेके स्वभाववाले शत्रुओंने मेरा धन द्यूत, मदिरालय एवं वेश्यालयोंमें निश्चित रूपसे खर्च कर दिया होगा ॥ ४४ ॥
वे पापबुद्धि मेरा समस्त राजकोष व्यसनोंमें नष्ट कर डालेंगे, सत्पात्रोंको दान देनेकी योग्यता भी उन म्लेच्छोंमें नहीं है और मेरे मन्त्री भी अधीनतामें रहनेके कारण उन्हींके जैसे हो गये होंगे ॥ ४५ ॥
महाराज सुरथ वृक्षके नीचे बैठकर इसी चिन्तामें पड़े हुए थे कि उसी समय एक विषादग्रस्त वैश्य वहाँ आ पहुँचा ॥४६ ॥
राजाने उस वैश्यको सामने देख लिया । उन्होंने उसे अपने समीपमें बैठा लिया और पुनः उससे पूछा- आप कौन हैं तथा इस वनमें कहाँसे आये हैं? आप कौन हैं, आप उदास क्यों हैं? चिन्ताग्रस्त रहनेके कारण आप तो पीले वर्णके हो गये हैं? हे महाभाग! सात पग एक साथ चलनेपर ही मैत्री समझ ली जाती है, अतः आप मुझे सब कुछ सच-सच बता दीजिये ॥ ४७-४८ ॥ व्यासजी बोले – राजाका वचन सुनकर वह वैश्यश्रेष्ठ उनके पास बैठ गया और इसे सज्जनसमागम समझकर शान्तचित्त होकर उनसे कहने लगा ॥ ४ ९ ॥ वैश्य बोला - हे मित्र! मैं वैश्यजातिमें उत्पन्न हूँ और समाधि नामसे प्रसिद्ध हूँ । मैं धनवान्, धर्मकार्योंमें निपुण, सत्यवादी और ईर्ष्यासे रहित हूँ, फिर भी धनके लोभी और कुटिल स्त्री- पुत्रोंने मुझे घरसे निकाल दिया ( उन्होंने मुझे कृपण कहकर कठिनाईसे टूटनेवाला माया - बन्धन भी तोड़ दिया ), अतः अपने कुटुम्बियोंसे परित्यक्त होकर मैं अभी - अभी इस वनमें आया हूँ । हे प्रिय! आप कौन हैं? मुझे बतायें; आप भाग्यवान् प्रतीत होते हैं ॥ ५०-५१ ३ ॥ 1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] -23 C
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७०८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३२ राजोवाच सुरथो नाम राजाहं दस्युभिः पीडितोऽभवम् ॥ ५२
प्राप्तोऽस्मि गतराज्योऽत्र मन्त्रिभिः परिवञ्चितः ।
दिष्ट्या त्वमत्र मित्रं मे मिलितोऽसि विशोत्तम ॥ ५३
सुखेन विहरिष्यावो वनेऽत्र शुभपादपे ।
शोकं त्यज महाबुद्धे स्वस्थो भव विशोत्तम ॥५४
( अत्रैव च यथाकामं सुखं तिष्ठ मया सह । ) वैश्य उवाच
कुटुम्बं मे निरालम्बं मया हीनं सुदुःखितम् ।
भविष्यति च चिन्तार्तं व्याधिशोकोपतापितम् ॥ ५५
भार्यादेहे सुखं नो वा पुत्रदेहे न वा सुखम् ।
इति चिन्तातुरं चेतो न मे शाम्यति भूमिप ॥ ५६
कदा द्रक्ष्ये सुतं भार्यां गृहं स्वजनमेव च ।
स्वस्थं न मन्मनो राजन् गृहचिन्ताकुलं भृशम् ॥ ५७
राजोवाच
यैर्निरस्तोऽसि पुत्राद्यैरसद्वृत्तैः सुबालिशैः ।
तान्दृष्ट्वा किं सुखं तेऽद्य भविष्यति महामते ॥ ५८
हितकारी वरः शत्रुर्दुःखदाः सुहृदः कुतः ।
तस्मात्स्थिरं मनः कृत्वा विहरस्व मया सह ॥ ५ ९
वैश्य उवाच
मनो मे न स्थिरं राजन् भवत्यद्य सुदुःखितम् ।
चिन्तयात्र कुटुम्बस्य दुस्त्यजस्य दुरात्मभिः ॥ ६०
राजोवाच
ममापि राज्यजं दुःखं दुनोति किल मानसम् ।
पृच्छावोऽद्य मुनिं शान्तं शोकनाशनमौषधम् ॥ ६१
व्यास उवाच
इति कृत्वा मतिं तौ तु राजा वैश्यश्च जग्मतुः ।
मुनिं तौ विनयोपेतौ प्रष्टुं शोकस्य कारणम् ॥ ६२
राजा बोले - मैं सुरथ नामका राजा हूँ, मैं दस्युओंसे पीड़ित हूँ । मन्त्रियोंके द्वारा ठगे जानेके कारण राज्यविहीन होकर मैं यहाँ आया हूँ । हे वैश्यश्रेष्ठ! भाग्यवश आप मुझे यहाँ मित्रके रूपमें मिल गये हैं । अब हम दोनों सुन्दर वृक्षोंसे युक्त इस वनमें विहार करेंगे । हे महाबुद्धिमान् वैश्यश्रेष्ठ! चिन्ता छोड़िये और प्रसन्नचित्त होइये ( अब आप मेरे साथ यहीं पर इच्छानुसार सुखपूर्वक रहिये ) ॥ ५२ - ५४ ॥ वैश्य बोला- मेरा परिवार आश्रयरहित है, मेरे बिना परिवारके लोग अत्यन्त दुःखी होंगे । मेरे बारेमें चिन्ता करते हुए वे रोग तथा शोकसे व्याकुल हो जायँगे ॥ ५५ ॥
हे राजन्! मेरी पत्नी तथा पुत्र शारीरिक सुख पा रहे होंगे अथवा नहीं, इसी चिन्तासे व्याकुल रहने के कारण मेरा मन शान्त नहीं रह पाता ॥ ५६ ॥
हे राजन्! मैं पुत्र, पत्नी, घर और स्वजनोंको कब देख सकूँगा? गृहकी चिन्तासे अत्यन्त व्याकुल मेरा मन स्वस्थ नहीं हो पाता है ॥ ५७ ॥
राजा बोले- हे महामते! जिन दुराचारी तथा महामूर्ख पुत्र आदि द्वारा आप घरसे निकाल दिये गये, उन्हें देखकर अब आपको कौन - सा सुख मिलेगा? दुःख देनेवाले सुहृदोंकी अपेक्षा सुख देनेवाला शत्रु श्रेष्ठ है; अतः अपने मनको स्थिर करके आप मेरे साथ आनन्द कीजिये ॥ ५८-५९ ॥ वैश्य बोला - हे राजन्! दुर्जनोंके द्वारा भी अत्यन्त कठिनतासे त्यागे जानेवाले कुटुम्बकी चिन्तासे अत्यन्त दुःखित मेरा मन इस समय स्थिर नहीं हो पा रहा है ॥६० ॥
राजा बोले- राज्यसम्बन्धी चिन्ता मेरे मनको भी दुःखी करती रहती है । अत: अब हम दोनों शान्त प्रकृतिवाले मुनिसे शोकके नाशकी औषधि पूछें ॥ ६१ ॥
व्यासजी बोले – ऐसा विचार करके राजा और वैश्य - दोनों ही अत्यन्त विनम्र होकर शोकका कारण । पूछनेके लिये मुनिके पास गये ॥६२ ॥
1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] -23 D
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अ ० ३३ ] पञ्चम स्कन्ध ७० ९ गत्वा तं प्रणिपत्याह राजा ऋषिमनुत्तमम् । वहाँ जाकर राजा सुरथ आसन लगाकर शान्त बैठे हुए मुनिश्रेष्ठको प्रणाम करके स्वयं भी सम्यक् रूपसे आसनपर बैठकर शान्तिपूर्वक
आसीनं सम्यगासीनः शान्तं शान्तिमुपागतः ॥ ६३ । उनसे कहने लगे ॥६३ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे सुरथराजसमाधि-वैश्ययोर्मुनिसमीपे गमनं नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥
अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः मुनि सुमेधाका सुरथ और राजोवाच
मुने वैश्योऽयमधुना वने मे मित्रतां गतः ।
पुत्रदारैर्निरस्तोऽयं प्राप्तोऽत्र मम सङ्गमम् ॥
( कुटुम्बविरहेणासौ दुःखितोऽतीव दुर्मनाः । न शान्तिमुपयात्येष तथापि मम साम्प्रतम् । गतराज्यस्य दुःखेन शोकार्तोऽस्मि महामते । )
निष्कारणञ्च मे चिन्ता हृदयान्न निवर्तते ।
हया मे दुर्बलाः स्युः किं गजाः शत्रुवशं गताः ॥
भृत्यवर्गस्तथा दुःखी जातः स्यात्तु मया विना ।
कोशक्षयं करिष्यन्ति रिपवोऽतिबलात्क्षणात् ॥
इत्येवं चिन्तयानस्य न मे निद्रा तनौ सुखम् ।
जानामीदं जगन्मिथ्या स्वप्नवत्सर्वमेव हि ॥
जानतोऽपि मनो भ्रान्तं न स्थिरं भवति प्रभो ।
कोऽहं केऽश्वा गजाः केऽमी न ते मे च सहोदराः ॥
न पुत्रा न च मित्राणि येषां दुःखं दुनोति माम् ।
भ्रमोऽयमिति जानामि तथापि मम मानसः ॥
मोहो नैवापसरति किं तत्कारणमद्भुतम् ।
स्वामिंस्त्वमसि सर्वज्ञः सर्वसंशयनाशकृत् ॥
कारणं ब्रूहि मोहस्य ममास्य च दयानिधे । व्यास उवाच इति पृष्टस्तदा राज्ञा सुमेधा मुनिसत्तमः ॥ तमुवाच परं ज्ञानं शोकमोहविनाशनम् । समाधिको देवीकी महिमा बताना राजा बोले- हे मुने! ये वैश्य हैं, आज ही वनमें इनसे मेरी मित्रता हुई है । पत्नी और पुत्रोंने इन्हें १ निकाल दिया है और अब यहाँ इन्हें मेरा साथ प्राप्त हुआ है ॥ १ ॥
( परिवारके वियोगसे ये अत्यन्त दुःखी और विक्षुब्ध हैं; इन्हें शान्ति नहीं मिल पा रही है और इस समय मेरी भी ऐसी ही स्थिति है । हे महामते! राज्य चले जानेके दुःखसे मैं शोकसन्तप्त हूँ । ) व्यर्थकी यह २ चिन्ता मेरे हृदयसे निकल नहीं रही है — मेरे घोड़े दुर्बल हो गये होंगे और हाथी शत्रुओंके अधीन हो गये होंगे । उसी प्रकार सेवकगण भी मेरे बिना दुःखी ३ रहते होंगे । शत्रुगण राजकोशको क्षणभरमें बलपूर्वक रिक्त कर देंगे ॥ २-३ ॥ इस प्रकार चिन्ता करते हुए मुझे न निद्रा आती ४ है और न मेरे शरीरको सुख मिलता है । मैं जानता हूँ कि यह सम्पूर्ण जगत् स्वप्नकी भाँति मिथ्या है, किंतु हे प्रभो! यह जानते हुए भी मेरा भ्रमित मन ५ स्थिर नहीं होता । मैं कौन हूँ? ये हाथी - घोड़े कौन हैं? ये मेरे कोई सगे - सम्बन्धी भी नहीं हैं । न ये मेरे ६ पुत्र हैं, और न मेरे मित्र हैं, जिनका दुःख मुझे पीड़ित कर रहा है । मैं जानता हूँ कि यह भ्रम है, फिर भी मेरे मनसे सम्बन्ध रखनेवाला मोह दूर नहीं होता, यह ७ बड़ा ही अद्भुत कारण है! हे स्वामिन्! आप सर्वज्ञ और सभी संशयोंका नाश करनेवाले हैं, अतः हे दयानिधे! मेरे इस मोहका कारण बतायें ॥ ४–७ – ७३ ॥ व्यासजी बोले- तब राजाके ऐसा पूछने पर ८ मुनिश्रेष्ठ सुमेधा उनसे शोक और मोहका नाश करनेवाले परम ज्ञानका वर्णन करने लगे ॥ ८३ ॥
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७१० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३३ ऋषिरुवाच शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि कारणं बन्धमोक्षयोः ॥
महामायेति विख्याता सर्वेषां प्राणिनामिह ।
ब्रह्मा विष्णुस्तथेशानस्तुराषाड् वरुणोऽनिलः ॥
सर्वे देवा मनुष्याश्च गन्धर्वोरगराक्षसाः ।
वृक्षाश्च विविधा वल्ल्यः पशवो मृगपक्षिणः ॥
मायाधीनाश्च ते सर्वे भाजनं बन्धमोक्षयोः ।
तया सृष्टमिदं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥
तद्वशे वर्तते नूनं मोहजालेन यन्त्रितम् ।
त्वं कियान्मानुषेष्वेकः क्षत्रियो रजसाविलः ॥
ज्ञानिनामपि चेतांसि मोहयत्यनिशं हि सा ।
ब्रह्मेशवासुदेवाद्या ज्ञाने सत्यपि शेषतः ॥
तेऽपि रागवशाल्लोके भ्रमन्ति परिमोहिताः ।
पुरा सत्ययुगे राजन् विष्णुर्नारायणः स्वयम् ॥
श्वेतद्वीपं समासाद्य चकार विपुलं तपः ।
वर्षाणामयुतं यावद् ब्रह्मविद्याप्रसक्तये ॥
अनश्वरसुखायासौ चिन्तयानस्ततः परम् ।
एकस्मिन्निर्जने देशे ब्रह्मापि परमाद्भुते ॥
स्थितस्तपसि राजेन्द्र मोहस्य विनिवृत्तये ।
कदाचिद्वासुदेवोऽसौ स्थलान्तरमतिर्हरिः ॥
तस्माद्देशात्समुत्थाय जगामान्यद्दिदृक्षया ।
चतुर्मुखोऽपि राजेन्द्र तथैव निःसृतः स्थलात् ॥
मिलितौ मार्गमध्ये तु चतुर्मुखचतुर्भुजौ ।
अन्योन्यं पृष्टवन्तौ तौ कस्त्वं कस्त्वमिति स्म ह ॥
ब्रह्मा प्रोवाच तं देवं कर्ताहं जगतः किल ।
विष्णुस्तमाह भो मूर्ख जगत्कर्ताहमच्युतः ॥
त्वं कियान्बलहीनोऽसि रजोगुणसमाश्रितः ।
सत्त्वाश्रितं हि मां विद्धि वासुदेवं सनातनम् ॥
ऋषि बोले – हे राजन्! सुनिये, मैं बताता हूँ । ९ महामायाके नामसे विख्यात वे भगवती ही सभी प्राणियोंके बन्धन और मोक्षकी कारण हैं । ब्रह्मा, विष्णु, महेश, इन्द्र, वरुण, पवन आदि सभी देवता, १० मनुष्य, गन्धर्व, सर्प, राक्षस, वृक्ष, विविध लताएँ, पशु, मृग और पक्षी - ये सब मायाके आधीन हैं और बन्धन तथा मोक्षके भाजन हैं । उन महामायाने ११ ही इस जड़ - चेतनमय सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि की है । जब यह जगत् सदा उन्हींके अधीन रहता है १२ और मोहजालमें जकड़ा हुआ है, तब आप किस गणनामें हैं? आप तो मनुष्योंमें रजोगुणसे युक्त एक क्षत्रियमात्र हैं ॥ ९ -१३ ॥ १३ वे महामाया ज्ञानियोंकी बुद्धिको भी सदा मोहित किये रहती हैं । ब्रह्मा, विष्णु और महेश आदि १४ परम ज्ञानी होते हुए भी रागके वशीभूत होकर व्यामोहमें पड़ जाते हैं और संसारमें चक्कर काटा करते हैं ॥१४३ ॥
१५ हे राजन्! प्राचीन कालमें स्वयं उन भगवान् नारायणने ब्रह्मविद्याकी प्राप्ति तथा अविनाशी सुखके लिये श्वेतद्वीपमें जाकर ध्यान करते हुए दस १६ हजार वर्षोंतक घोर तपस्या की थी । हे राजेन्द्र! इसके साथ ही मोहकी निवृत्तिके लिये एक निर्जन १७ प्रदेशमें ब्रह्माजी भी परम अद्भुत तपस्यामें संलग्न हो गये ॥ १५- - १७३ ॥ हे राजेन्द्र! किसी समय वासुदेव भगवान् श्रीहरिने १८ दूसरे स्थानपर जानेका विचार किया और वे उस स्थानसे उठकर अन्य स्थलको देखनेकी इच्छासे चल दिये । ब्रह्माजी भी उसी प्रकार अपने स्थानसे निकल १ ९ पड़े । चतुर्मुख ब्रह्माजी और चतुर्भुज भगवान् विष्णु मार्गमें मिल गये । तब वे दोनों एक - दूसरेसे पूछने लगे - तुम कौन हो, तुम कौन हो? ॥ १८-२० ॥ २० ब्रह्माजी भगवान् विष्णुसे बोले- मैं जगत्का स्रष्टा हूँ । तब विष्णुने उनसे कहा - हे मूर्ख! अपनी २१ महिमासे कभी च्युत न होनेवाला मैं विष्णु ही जगत्का कर्ता हूँ । तुम कितने शक्तिशाली हो? तुम तो रजोगुणयुक्त और बलहीन हो! मुझे सत्त्वगुणसम्पन्न २२ | सनातन नारायण जानो ॥ २१-२२ ॥
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अ ० ३३ ]
मया त्वं रक्षितोऽद्यैव कृत्वा युद्धं सुदारुणम् ।
शरणं मे समायातो दानवाभ्यां प्रपीडितः ॥
मया तौ निहतौ कामं दानवौ मधुकैटभौ ।
कथं गर्वायसे मन्द मोहोऽयं त्यज साम्प्रतम् ॥
न मत्तोऽप्यधिकः कश्चित्संसारेऽस्मिन्प्रसारिते । ऋषिरुवाच एवं प्रवदमानौ तौ ब्रह्मविष्णू परस्परम् ॥
स्फुरदोष्ठौ वेपमानौ लोहिताक्षौ बभूवतुः ।
प्रादुर्बभूव सहसा तयोर्विवदमानयोः ॥
मध्ये लिङ्गं सुधाश्वेतं विपुलं दीर्घमद्भुतम् ।
आकाशे तरसा तत्र वागुवाचाशरीरिणी ॥
तौ सम्बोध्य महाभागौ विवदन्तौ परस्परम् ।
ब्रह्मन् विष्णो विवादं मा कुरुतां वां परस्परम् ॥
लिङ्गस्यास्य परं पारमधस्तादुपरि ध्रुवम् ।
यो याति युवयोर्मध्ये स श्रेष्ठो वां सदैव हि ॥
एकः प्रयातु पातालमाकाशमपरोऽधुना ।
प्रमाणं मे वचः कार्यं त्यक्त्वा वादं निरर्थकम् ॥
मध्यस्थः सर्वदा कार्यो विवादेऽस्मिन्द्वयोरिह । ऋषिरुवाच तच्छ्रुत्वा वचनं दिव्यं सज्जीभूतौ कृतोद्यमौ ॥।
जग्मतुर्मातुमग्रस्थं लिङ्गमद्भुतदर्शनम् ।
पातालमगमद्विष्णुर्ब्रह्माप्याकाशमेव च ॥
परिमातुं महालिङ्गं स्वमहत्त्वविवृद्धये ।
विष्णुर्गत्वा कियद्देशं श्रान्तः सर्वात्मना यतः ॥
न प्रापान्तं स लिङ्गस्य परिवृत्य ययौ स्थलम् ।
ब्रह्मागच्छत्ततश्चोर्ध्वं पतितं केतकीदलम् ॥
शिवस्य मस्तकात्प्राप्य परावृत्तो मुदावृतः ।
आगत्य तरसा ब्रह्मा विष्णवे केतकीदलम् ॥
दर्शयित्वा च वितथमुवाच मदमोहितः ।
लिङ्गस्य मस्तकादेतद् गृहीतं केतकीदलम् ॥
अभिज्ञानाय चानीतं तव चित्तप्रशान्तये । पञ्चम स्कन्ध ७११ दोनों दानवों ( मधु - कैटभ ) - के द्वारा पीड़ित २३ | किये जानेपर तुम मेरी ही शरणमें आये थे, उस समय अत्यन्त भीषण युद्ध करके मैंने तुम्हारी रक्षा की । मैंने ही उन मधु - कैटभ दानवोंका वध किया है, अत: हे २४ मन्दबुद्धि! तुम क्यों गर्व करते हो? यह तुम्हारा अज्ञान है, इसका शीघ्र त्याग कर दो; क्योंकि इस सम्पूर्ण संसारमें मुझसे बढ़कर कोई नहीं है । २३ - - २४३ 11 ऋषि बोले- इस प्रकार परस्पर विवाद करते हुए २५ उन दोनों — ब्रह्मा - विष्णुके ओठ फड़कने लगे, वे क्रोधमें काँपने लगे और उनकी आँखें रक्तवर्ण हो गयीं । तभी २६ विवादरत उन दोनोंके मध्य अचानक एक श्वेतवर्ण, अत्यन्त विशाल तथा अद्भुत लिंग प्रकट हो गया । तदनन्तर विवाद करते हुए उन दोनों महानुभावोंको सम्बोधित २७ करके आकाशवाणी हुई- हे ब्रह्मन्! हे विष्णो! तुम
दोनों परस्पर विवाद मत करो । २५ - २८ ॥
२८ इस लिंगके ऊपरी या निचले छोरका आप दोनोंमेंसे जो पता लगा लेगा, आप दोनोंमें वह सदैव २ ९ लिये श्रेष्ठ हो जायगा । इसलिये मेरी वाणीको प्रमाण मानकर तथा इस निरर्थक विवादका त्यागकर आपलोगोंमेंसे एक आकाश और दूसरा पातालकी ३० ओर अभी जाय । इस विवादमें आप दोनोंको एक मध्यस्थ भी अवश्य कर लेना चाहिये ॥ २ ९ -३०३ ॥ ऋषि बोले- उस दिव्य वाणीको सुनकर वे दोनों चेष्टापूर्वक उद्यम करनेके लिये तैयार हो गये ३१ और अपने समक्ष स्थित उस देखनेमें अद्भुत लिंगको मापनेके लिये चल पड़े । अपने - अपने महत्त्वकी ३२ वृद्धिके लिये उस महालिंगको नापनेहेतु विष्णु पातालकी ओर और ब्रह्मा आकाशकी ओर गये ॥ ३१-३२३ ॥ कुछ दूर तक जानेपर विष्णु पूर्णरूपसे थक गये । ३३ वे लिंगका अन्त नहीं प्राप्त कर सके और तब उसी स्थलपर वापस लौट आये । ब्रह्माजी ऊपरकी ओर गये ३४ और शिवके मस्तकसे गिरे हुए केतकी पुष्पको लेकर वे भी प्रसन्न हो लौट आये ॥ ३३-३४३ ॥ तब अहंकारसे मोहित ब्रह्मा शीघ्रतापूर्वक आकर ३५ विष्णुको केतकीपुष्प दिखाकर यह झूठ बोलने लगे कि मैंने यह केतकीपुष्प इस लिंगके मस्तकसे प्राप्त ३६ किया है | आपके चित्तकी शान्तिके लिये पहचानचिह्नके रूपमें मैं इसे लेता आया हूँ ॥ ३५-३६३ ॥