देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 81–90
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 81–90
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७२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २ या विद्येत्यभिधीयते श्रुतिपथे शक्तिः सदाद्या परा सर्वज्ञा भवबन्धछित्तिनिपुणा सर्वाशये संस्थिता । दुर्ज्ञेया सुदुरात्मभिश्च मुनिभिर्ध्यानास्पदं प्रापिता प्रत्यक्षा भवतीह सा भगवती सिद्धिप्रदा स्यात्सदा ॥ सृष्ट्वाखिलं जगदिदं सदसत्स्वरूपं शक्त्या स्वया त्रिगुणया परिपाति विश्वम् । संहृत्य कल्पसमये रमते तथैका तां सर्वविश्वजननीं मनसा स्मरामि ॥ ब्रह्मा सृजत्यखिलमेतदिति प्रसिद्धं पौराणिकैश्च कथितं खलु वेदविद्भिः । विष्णोस्तु नाभिकमले किल तस्य जन्म तैरुक्तमेव सृजते न हि स स्वतन्त्रः ॥ विष्णुस्तु शेषशयने स्वपितीति काले तन्नाभिपद्ममुकुले खलु तस्य जन्म । आधारतां किल गतोऽत्र सहस्त्रमौलिः सम्बोध्यतां स भगवान् हि कथं मुरारिः ॥ एकार्णवस्य सलिलं रसरूपमेव पात्रं विना न हि रसस्थितिरस्ति कच्चित् । या सर्वभूतविषये किल शक्तिरूपा तां सर्वभूतजननीं शरणं गतोऽस्मि ॥
योगनिद्रामीलिताक्षं विष्णुं दृष्ट्वाम्बुजे स्थितः ।
अजस्तुष्टाव यां देवीं तामहं शरणं गतः ॥
तां ध्यात्वा सगुणां मायां मुक्तिदां निर्गुणां तथा ।
वक्ष्ये पुराणमखिलं शृण्वन्तु मुनयस्त्विह ॥
वैदिक मार्गानुसार जिसे ' विद्या ' कहते हैं, जो सर्वदा ' आदिशक्ति ' कही जाती हैं, जिन्हें योगीलोग ' पराशक्ति ' भी कहते हैं; जो सर्वज्ञ, भवबन्धन काटनेमें निपुण हैं तथा जो सबके हृदयदेशमें विराजती ४ रहती हैं और दुरात्मा प्राणी जिन्हें नहीं जान सकते, मुनियोंके ध्यान करनेपर जो शीघ्र प्रत्यक्ष दर्शन देती हैं, वे भगवती सर्वदा सिद्धिदायिनी बनी रहें ॥ ४ ॥
जो सत् - असत्रूप उस जगत्की सृष्टि करके अपनी त्रिगुणात्मिका ( सत्त्व, रज, तम ) शक्तिद्वारा उसका पालन करती तथा प्रलयान्तमें उसका संहार करके अकेली स्वयं लीलारमण करती हैं, उन समस्त विश्वकी जननी भगवतीका मैं मन - ही - मन स्मरण करता हूँ ॥५ ॥
यह संसारमें प्रसिद्ध है कि ब्रह्मा ही इस सम्पूर्ण जगत्के स्रष्टा हैं, साथ ही सभी वेदज्ञ तथा पुराणवेत्ता भी यही कहते हैं । उनका यह भी कथन है कि भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे ही उन ब्रह्माकी उत्पत्ति ६ हुई है, जो स्वतन्त्र नहीं हैं, अपितु विष्णुकी प्रेरणा से ही वे संसारकी सृष्टि करते हैं ॥ ६ ॥
जब कल्पान्तमें सर्वत्र जलमय हो जाता है, तब केवल शेषशय्यापर भगवान् विष्णु शयन करते हैं और उन्हींके नाभिकमलसे ब्रह्माका आविर्भाव होता है । इस प्रकार जब सहस्र फणवाले शेष ही विष्णुके ७ आधार हैं, तो फिर उन मुरारिको भी सर्वाधार भगवान् कैसे कहा जाय? ॥ ७ ॥
प्रलयकालीन समुद्रका जल भी तो रसरूप ही है और बिना पात्र रस कहीं ठहर नहीं सकता । अतएव जो सब प्राणियोंमें शक्तिरूपसे विराजती रहती हैं, मैं उन सम्पूर्ण संसारकी जननी आदिशक्ति भगवतीकी ८ शरण ग्रहण करता हूँ ॥ ८ ॥
योगनिद्रामें लीन भगवान् विष्णुको देखकर उनके नाभिकमलपर विराजमान ब्रह्माने जिन देवीकी स्तुति की थी, मैं उन्हीं पराशक्ति भगवतीके शरणागत हूँ ॥ ९ ॥
९ हे मुनिजनो! उन्हीं निर्गुण तथा सगुण रूपवाली तथा मुक्तिदायिनी योगमायाका ध्यान करके मैं यहाँ सम्पूर्ण देवीभागवतपुराण कह रहा १० हूँ; आपलोग सुनिये ॥१० ॥
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अ ० २ ] प्रथम
पुराणमुत्तमं पुण्यं श्रीमद्भागवताभिधम् ।
अष्टादश सहस्राणि श्लोकास्तत्र तु संस्कृताः ॥ ११
स्कन्धा द्वादश चैवात्र कृष्णेन विहिताः शुभाः ।
त्रिशतं पूर्णमध्याया अष्टादशयुताः स्मृताः ॥ १२
विंशतिः प्रथमे तत्र द्वितीये द्वादशैव तु ।
त्रिंशच्चैव तृतीये तु चतुर्थे पञ्चविंशतिः ॥ १३
पञ्चत्रिंशत्तथाध्यायाः पञ्चमे परिकीर्तिताः ।
एकत्रिंशत्तथा षष्ठे चत्वारिंशच्च सप्तमे ॥ १४
अष्टमे तत्त्वसङ्ख्याश्च पञ्चाशन्नवमे तथा ।
त्रयोदश तु सम्प्रोक्ता दशमे मुनिना किल ॥ १५
तथा चैकादशस्कन्धे चतुर्विंशतिरीरिताः ।
चतुर्दशैव चाध्याया द्वादशे मुनिसत्तमाः ॥ १६
एवं सङ्ख्या समाख्याता पुराणेऽस्मिन्महात्मना ।
अष्टादशसहस्त्रीया सङ्ख्या च परिकीर्तिता ॥ १७
सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च ।
वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम् ॥ १८
निर्गुणा या सदा नित्या व्यापिका विकृता शिवा ।
योगगम्याखिलाधारा तुरीया या च संस्थिता ॥ १ ९
तस्यास्तु सात्त्विकी शक्ती राजसी तामसी तथा ।
महालक्ष्मीः सरस्वती महाकालीति ताः स्त्रियः ॥ २०
तासां तिसृणां शक्तीनां देहाङ्गीकारलक्षणः ।
सृष्ट्यर्थं च समाख्यातः सर्गः शास्त्रविशारदैः ॥ २१
हरिद्रुहिणरुद्राणां समुत्पत्तिस्ततः स्मृता ।
पालनोत्पत्तिनाशार्थं प्रतिसर्गः स्मृतो हि सः ॥ २२
सोमसूर्योद्भवानां च राज्ञां वंशप्रकीर्तनम् ।
हिरण्यकशिप्वादीनां वंशास्ते परिकीर्तिताः ॥ २३
स्वायम्भुवमुखानां च मनूनां परिवर्णनम् ।
कालसङ्ख्या तथा तेषां तत्तन्मन्वन्तराणि च ॥ २४
तेषां वंशानुकथनं वंशानुचरितं स्मृतम् ।
पञ्चलक्षणयुक्तानि भवन्ति मुनिसत्तमाः ॥ २५
स्कन्ध ७३ यह श्रीमद्देवीभागवत नामक पुराण अत्यन्त पवित्र एवं उत्तम है । इसमें अठारह हजार सुन्दर श्लोक हैं । कृष्णद्वैपायनद्वारा विरचित इस श्रीमद्देवीभागवतपुराणमें कल्याणकारी बारह स्कन्ध तथा कुल तीन सौ अठारह अध्याय बताये गये हैं । उनमें प्रथम स्कन्धमें बीस अध्याय, द्वितीयमें बारह, तृतीयमें तीस और चतुर्थमें पच्चीस अध्याय हैं । पंचम स्कन्धमें पैंतीस अध्याय, षष्ठमें एकतीस, सप्तममें चालीस, अष्टममें तत्त्व - संख्या * के बराबर अर्थात् चौबीस, नवममें पचास और दशम स्कन्धमें तेरह अध्याय मुनि व्यासजीने कहे हैं । इसी प्रकार हे मुनिगण! एकादश स्कन्धमें चौबीस और द्वादश स्कन्धमें चौदह अध्याय बताये गये हैं ॥ ११–१६ ॥ इस प्रकार महात्मा व्यासजीने इस महापुराणमें अध्यायोंकी संख्या बतायी है । इसमें श्लोकोंकी संख्या अठारह हजार कही गयी है ॥ १७ ॥
सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश - वर्णन, मन्वन्तर तथा वंशा-नुचरित - इस प्रकार पुराणोंके ये पाँच लक्षण हैं ॥ १८ ॥
जो कल्याणमयी भगवती नित्या, निर्गुणा, व्यापकरूपसे सृष्टिमें स्थित रहनेवाली, विकाररहित, योगगम्या, सबकी आधाररूपा तथा तुरीयावस्थामें प्रतिष्ठित हैं; उन्हींकी सात्त्विकी राजसी और तामसी शक्तियाँ महासरस्वती, महालक्ष्मी तथा महाकाली नामक देवियोंके रूपमें प्रकट होती हैं ॥ १ ९ -२० ॥ उन्हीं तीनों शक्तियोंका सृष्टिके लिये शरीर धारण करना ही शास्त्रके विद्वानोंके द्वारा ' सर्ग ' कहा | गया है ॥ २१ ॥
तदनन्तर जगत्के सृजन, पालन तथा संहारके लिये ब्रह्मा, विष्णु और महेशकी उत्पत्ति कही गयी है; और उसे ही प्रतिसर्ग बताया गया है ॥२२ ॥
चन्द्रवंशी, सूर्यवंशी राजाओंके वंशवर्णन तथा हिरण्यकशिपु आदि दैत्योंके वंशकथनको ' वंश ' कहा गया है; इसी प्रकार स्वायम्भुव आदि चौदह मनुओंका वर्णन एवं उनके समय - विभाग मन्वन्तर कहलाते हैं । उन मनुओंके वंशका क्रमशः वर्णन करना ही ' वंशानुचरित ' कहा गया है । हे मुनिवरो! इस प्रकार सभी पुराण । उपर्युक्त पाँचों लक्षणोंसे युक्त होते हैं ॥ २३–२५ ॥ * सांख्यशास्त्रमें प्रकृति, महत्, अहंकार आदि चौबीस तत्त्व माने जाते हैं ।
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सपादलक्षं च तथा भारतं मुनिना कृतम् ।
इतिहास इति प्रोक्तं पञ्चमं वेदसम्मतम् ॥
शौनक उवाच
कानि तानि पुराणानि ब्रूहि सूत सविस्तरम् ।
कतिसङ्ख्यानि सर्वज्ञ श्रोतुकामा वयं त्विह ॥
कलिकालविभीताः स्मो नैमिषारण्यवासिनः ।
ब्रह्मणात्र समादिष्टाश्चक्रं दत्त्वा मनोमयम् ॥
कथितं तेन नः सर्वान्गच्छन्त्वेतस्य पृष्ठतः ।
नेमिः संशीर्यते यत्र स देशः पावनः स्मृतः ॥
कलेस्तत्र प्रवेशो न कदाचित् सम्भविष्यति ।
तावत्तिष्ठन्तु तत्रैव यावत्सत्ययुगं पुनः ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य गृहीत्वा तत्कथानकम् ।
चालयन्निर्गतस्तूर्णं सर्वदेशदिदृक्षया ॥
प्रेत्यात्र चालयंश्चक्रं नेमिः शीर्णोऽत्र पश्यतः ।
तेनेदं नैमिषं प्रोक्तं क्षेत्रं परमपावनम् ॥
कलिप्रवेशो नैवात्र तस्मात्स्थानं कृतं मया ।
मुनिभिः सिद्धसङ्घैश्च कलिभीतैर्महात्मभिः ॥
पशुहीनाः कृता यज्ञाः पुरोडाशादिभिः किल ।
कालातिवाहनं कार्यं यावत्सत्ययुगागमः ॥
भाग्ययोगेन सम्प्राप्तः सूत त्वं चात्र सर्वथा ।
कथा पुराणं हि पावनं ब्रह्मसम्मतम् ॥
सूत शुश्रूषवः सर्वे वक्ता त्वं मतिमानथ ।
निर्व्यापारा वयं नूनमेकचित्तास्तथैव च ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २ सवा लाख श्लोकोंका महाभारत नामक ग्रन्थ २६ भी व्यासजीने ही रचा है; यह ‘ इतिहास ' कहलाता है— जो वेदसम्मत होनेके कारण पाँचवाँ वेद कहा गया है ॥२६ ॥
शौनकजी बोले - – हे सूतजी! वे पुराण कौन-कौनसे हैं और कितने हैं? हमलोगोंको सुनने की २७ उत्कट इच्छा है और आप सर्वज्ञ हैं, अतः विस्तारसे | बताइये ॥ २७ ॥
कलिकालसे भयभीत हम ब्राह्मण नैमिषारण्यमें २८ ही रहते हैं । ब्रह्माजीने मनोमय चक्र हमें देकर यह आदेश दिया था कि इसी चक्रके पीछे - पीछे आपलोग जायँ । जहाँ इस चक्रकी नेमि शीर्ण हो जाय, वह देश परम पवित्र कहा गया है । वहाँ कभी कलियुगका २ ९ । प्रवेश नहीं होगा । आपलोग वहाँ तबतक रहें, जबतक पुनः ' सत्ययुग ' न आ जाय ॥ २८-३० ॥ उनका वह वचन सुनकर तथा उनकी बातोंको ३० हृदयमें रखकर हमलोग सब देशोंके दर्शनार्थ उस मनोमय चक्रके पीछे - पीछे तत्काल चल दिये ॥ ३१ ॥
चलते - चलते इसी स्थानपर पहुँचकर उस चक्रकी ३१ नेमि हमलोगोंके देखते - देखते शीर्ण हो गयी । तभी से यह स्थान परम पवित्र ' नैमिषक्षेत्र ' के नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ ३२ ॥
यहाँ कभी कलिका प्रवेश नहीं होता । इसीलिये ३२ मैंने अनेक ऋषि - मुनियों, सिद्धगणों एवं कलिसे भयभीत महात्माओंके साथ यहाँ अपना निवास बना लिया है ॥ ३३ ॥
३३ हमलोगोंने यहाँपर चरु - पुरोडाश आदिद्वारा अनेक पशुवध - विहीन यज्ञ किये हैं । जबतक सत्ययुग न आ जाय तबतक हमलोगोंका यहीं रहनेका दृढ़ ३४ निश्चय है ॥ ३४ ॥
हे सूतजी! आप निश्चितरूपसे हमलोगोंके सौभाग्यसे ही यहाँ आ पहुँचे हैं । इसलिये आप इस ब्रह्मसम्मित पावन पुराणकी कथा कहिये ॥ ३५ ॥
३५ हे सूतजी! हमलोगों को सुननेकी उत्कट इच्छा है और आप जैसे बुद्धिमान् वक्ता भी प्राप्त हैं । हमलोग भी अपना सभी कार्य त्यागकर चित्त एकाग्र ३६ । करके यहाँ स्थित हैं ॥ ३६ ॥
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अ ० ३ ]
त्वं सूत भव दीर्घायुस्तापत्रयविवर्जितः ।
कथा पुराणं हि पुण्यं भागवतं शिवम् ॥
यत्र धर्मार्थकामानां वर्णनं विधिपूर्वकम् ।
विद्यां प्राप्य तया मोक्षः कथितो मुनिना किल ॥
द्वैपायनेन मुनिना कथितं यच्च पावनम् ।
न तृप्यामो वयं सूत कथां श्रुत्वा मनोरमाम् ॥
सकलगुणगणानामेकपात्रं पवित्र-मखिलभुवनमातुर्नाट्यवद्यद्विचित्रम् 1 निखिलमलगणानां नाशकृत्कामकन्दं प्रकटय भगवत्या नामयुक्तं पुराणम् ॥ प्रथम स्कन्ध ७५ अतः हे सूतजी! आप चिरंजीवी हों तथा तीनों ३७ प्रकारके तापों ( दैहिक, दैविक, भौतिक ) - से मुक्त रहकर अब हमलोगोंको परम पवित्र तथा कल्याणकारी श्रीमद्देवी - भागवतपुराण सुनाइये; जिसमें धर्म, अर्थ और कामका विधिवत् वर्णन किया गया है । महर्षि ३८ व्यासने भी बताया है कि इसके द्वारा ज्ञान प्राप्त करके पुनः उससे मुक्ति मिलती है ॥ ३७-३८ ॥ हे सूतजी! महर्षि वेदव्यासने जिस पवित्र पुराणको कहा है, उसके मनोहर कथा - चरित्रोंको ३ ९ सुननेसे हमारी कभी तृप्ति नहीं होती है ॥ ३ ९ ॥ सभी गुणोंका एकमात्र स्थान, परम पवित्र, समस्त संसारकी जननी भगवतीके लीलानाट्यके समान विचित्र, सभी पापसमूहोंका नाश करनेवाले तथा सब प्रकारकी अभिलाषाओंको पूर्ण करनेवाले
तथा भगवतीके नामसे समन्वित श्रीमद्देवीभागवत-४० । महापुराणको प्रकट कीजिये ॥ ४० ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे ग्रन्थसंख्याविषयवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
अथ तृतीयोऽध्यायः सूतजीद्वारा पुराणोंके नाम तथा उनकी श्लोकसंख्याका कथन, उपपुराणों तथा प्रत्येक द्वापरयुगके व्यासोंका नाम सूत उवाच सूतजी बोले- हे मुनीश्वरवृन्द! सत्यवती -शृण्वन्तु सम्प्रवक्ष्यामि यथाश्रुतानि तत्त्वेन मद्वयं भद्वयं चैव अनापलिंगकूस्कानि
पुराणानि मुनीश्वराः ।
व्यासात्सत्यवतीसुतात् ॥
ब्रत्रयं वचतुष्टयम् ।
पुराणानि पृथक्पृथक् ॥
सुत वेद - व्यासजीसे मैंने जिस प्रकार तत्त्वपूर्वक १ पुराणोंको सुना है, उसे मैं आपलोगोंसे कहता हूँ, सुनिये ॥१ ॥
उनमें दो ‘ म ’ वाले ( मत्स्यपुराण, मार्कण्डेयपुराण ), दो ‘ भ ' वाले ( भविष्यपुराण तथा भागवत ), तीन ' ब्र ' वाले ( ब्रह्म, ब्रह्माण्ड वाले ( वामन, विष्णु, वाला ( अग्निपुराण ), वाला ( पद्मपुराण ), ' वाला ( गरुडपुराण ), वाला ( स्कन्दपुराण ) २ | पुराण हैं ॥ २ ॥
और ब्रह्मवैवर्तपुराण ), चार ' व ' वायु और वाराहपुराण ), ' अ ' ‘ ना ' वाला ( नारदपुराण ), ‘ प ’ लिं ' वाला ( लिंगपुराण ), ‘ ग ’ ‘ कू ' वाला ( कूर्मपुराण ), " स्क ' - ये पृथक् - पृथक् ( अठारह )
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७६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३
चतुर्दशसहस्त्रं च मत्स्यमाद्यं प्रकीर्तितम् ।
तथा ग्रहसहस्त्रं तु मार्कण्डेयं महाद्भुतम् ॥
चतुर्दशसहस्राणि तथा पञ्चशतानि च ।
भविष्यं परिसंख्यातं मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ॥
अष्टादशसहस्त्रं वै पुण्यं भागवतं किल ।
तथा चायुतसंख्याकं पुराणं ब्रह्मसंज्ञकम् ॥
द्वादशैव सहस्त्राणि ब्रह्माण्डं च शताधिकम् ।
तथाष्टादशसाहस्त्रं ब्रह्मवैवर्तमेव च ॥
अयुतं वामनाख्यं च वायव्यं षट्शतानि च । चतुर्विंशतिसंख्यातः सहस्त्राणि तु शौनक ।
त्रयोविंशतिसाहस्त्रं वैष्णवं परमाद्भुतम् ।
चतुर्विंशतिसाहस्त्रं वाराहं परमाद्भुतम् ॥
षोडशैव सहस्त्राणि पुराणं चाग्निसंज्ञितम् ।
पञ्चविंशतिसाहस्त्रं नारदं परमं मतम् ॥
पञ्चपञ्चाशत्साहस्त्रं पद्माख्यं विपुलं मतम् ।
एकादशसहस्राणि लिङ्गाख्यं चातिविस्तृतम् ॥
एकोनविंशत्साहस्रं गारुडं हरिभाषितम् ।
सप्तदशसहस्त्रं च पुराणं कूर्मभाषितम् ॥
एकाशीतिसहस्राणि स्कन्दाख्यं परमाद्भुतम् ।
पुराणाख्या च संख्या च विस्तरेण मयानघाः ॥
तथैवोपपुराणानि शृण्वन्तु ऋषिसत्तमाः ।
सनत्कुमारं प्रथमं नारसिंहं ततः परम् ॥
नारदीयं शिवं चैव दौर्वाससमनुत्तमम् ।
कापिलं मानवं चैव तथा चौशनसं स्मृतम् ॥
वारुणं कालिकाख्यं च साम्बं नन्दिकृतं शुभम् ।
सौरं पाराशरप्रोक्तमादित्यं चातिविस्तरम् ॥
माहेश्वरं भागवतं वासिष्ठं च सविस्तरम् ।
एतान्युपपुराणानि कथितानि महात्मभिः ॥
अष्टादश पुराणानि कृत्वा सत्यवतीसुतः ।
भारताख्यानमतुलं चक्रे तदुपबृंहितम् ॥
मन्वन्तरेषु सर्वेषु द्वापरे द्वापरे युगे ।
प्रादुःकरोति धर्मार्थी पुराणानि यथाविधि ॥
द्वापरे द्वापरे विष्णुर्व्यासरूपेण सर्वदा ।
वेदमेकं स बहुधा कुरुते हितकाम्यया ॥
उनमें आदिके मत्स्यपुराणमें चौदह हजार, अत्यन्त ३ अद्भुत मार्कण्डेयपुराणमें नौ हजार तथा भविष्यपुराणमें चौदह हजार पाँच सौ श्लोक - संख्या तत्त्वदर्शी मुनियोंने ४ बतायी है॥३-४ ॥ पवित्र भागवतपुराणमें अठारह हजार और ब्रह्म-पुराणमें दस हजार श्लोक हैं । ब्रह्माण्डपुराणमें बारह हजार एक सौ तथा ब्रह्मवैवर्तपुराणमें अठारह हजार
श्लोक हैं ॥ ५-६ ॥
हे शौनक! वामनपुराणमें दस हजार तथा वायुपुराणमें चौबीस हजार छः सौ श्लोक हैं । उस ७ परम विचित्र विष्णुपुराणमें तेईस हजार, वाराहपुराणमें चौबीस हजार, अग्निपुराणमें सोलह हजार तथा नारद-८ पुराणमें पचीस हजार श्लोक कहे गये हैं ॥ ७ – ९ ॥ विशाल पद्मपुराणमें पचपन हजार और लिंगपुराणमें ग्यारह हजार श्लोक हैं । इसी प्रकार साक्षात् भगवान्के द्वारा कहे हुए गरुडपुराणमें उन्नीस हजार तथा १० कूर्मपुराणमें सत्रह हजार श्लोक हैं॥१०-११ ॥ परम विचित्र स्कन्दपुराणमें इक्यासी हजार ११ श्लोक कहे गये हैं । हे पापरहित मुनियो! इस प्रकार मैंने पुराणों तथा उनके श्लोकोंकी संख्या विस्तारपूर्वक १२ | बता दी ॥ १२ ॥
हे मुनिवरो! अब उपपुराणोंकी भी संख्या १३ सुनिये । उनमें सर्वप्रथम उपपुराण सनत्कुमार है, तत्पश्चात् नरसिंह, नारदीय, शिव, दुर्वासा, कपिल, १४ मनु, उशना, वरुण, कालिका, साम्ब, नन्दी, सौर, पराशर, आदित्य, माहेश्वर, भागवत तथा अठारहवाँ १५ वासिष्ठ - ये सब उपपुराण महात्माओं द्वारा बताये गये हैं ॥ १३–१६ ॥ सत्यवतीतनय वेदव्यासजीने अठारह पुराणोंकी १६ रचना करनेके बाद उन्हीं विषयोंसे विस्तारपूर्वक उस अतुलनीय ' महाभारत ' का प्रणयन किया ॥ १७ ॥
१७ प्रत्येक द्वापरयुगमें भगवान् वेदव्यासजी ही धर्मरक्षार्थ पुराणोंकी यथाविधि रचना करते रहते हैं । जब - जब १८ द्वापरयुग आता है, तब - तब साक्षात् भगवान् विष्णु ही व्यासजीके रूपमें अवतीर्ण होकर सर्वलोकहितार्थ १ ९ । वेदके अनेक भेदोपभेद करते हैं ॥१८-१९ ॥
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अ ० ३ ]
अल्पायुषोऽल्पबुद्धींश्च विप्रान् ज्ञात्वा कलावथ ।
पुराणसंहितां पुण्यां कुरुतेऽसौ युगे युगे ॥
स्त्रीशूद्रद्विजबन्धूनां न वेदश्रवणं मतम् ।
तेषामेव हितार्थाय पुराणानि कृतानि च ॥
मन्वन्तरे सप्तमेऽत्र शुभे वैवस्वताभिधे ।
अष्टाविंशतिमे प्राप्ते द्वापरे मुनिसत्तमाः ॥
व्यासः सत्यवतीसूनुर्गुरुर्मे धर्मवित्तमः ।
एकोनत्रिंशत्संप्राप्ते द्रौणिर्व्यासो भविष्यति ॥
अतीतास्तु तथा व्यासाः सप्तविंशतिरेव च ।
पुराणसंहितास्तैस्तु कथितास्तु युगे युगे ॥
ऋषय ऊचुः
ब्रूहि सूत महाभाग व्यासाः पूर्वयुगोद्भवाः ।
वक्तारस्तु पुराणानां द्वापरे द्वापरे युगे ॥
सूत उवाच
द्वापरे प्रथमे व्यस्ताः स्वयं वेदाः स्वयम्भुवा ।
प्रजापतिर्द्वितीये तु द्वापरे व्यासकार्यकृत् ॥
तृतीये चोशना व्यासश्चतुर्थे तु बृहस्पतिः ।
पञ्चमे सविता व्यासः षष्ठे मृत्युस्तथापरे ॥
मघवा सप्तमे प्राप्ते वसिष्ठस्त्वष्टमे स्मृतः ।
सारस्वतस्तु नवमे त्रिधामा दशमे तथा ॥
एकादशेऽथ त्रिवृषो भरद्वाजस्ततः परम् ।
त्रयोदशे चान्तरिक्षो धर्मश्चापि चतुर्दशे ॥
त्रय्यारुणिः पञ्चदशे षोडशे तु धनञ्जयः मेधातिथिः सप्तदशे व्रती ह्यष्टादशे तथा अत्रिरेकोनविंशेऽथ गौतमस्तु ततः परम् । उत्तमश्चैकविंशेऽथ हर्यात्मा परिकीर्तितः वेनो वाजश्रवाश्चैव सोमो ऽमुष्यायणस्तथा तृणबिन्दुस्तथा व्यासो भार्गवस्तु ततः परम् प्रथम स्कन्ध ७७ विशेषकर कलियुगमें ब्राह्मणोंको अल्पायु एवं २० अल्पबुद्धि जानकर वे युग - युगमें पवित्र पुराण-संहिताओंका निर्माण करते हैं ॥ २० ॥
स्त्रियों, शूद्रों तथा भ्रष्ट द्विजातियोंको वेद-२१ श्रवणका अधिकार नहीं है, इसलिये उनके कल्याणके लिये व्यासजीने पुराणोंकी रचना की है ॥ २१ ॥
हे श्रेष्ठ मुनिगण! इस वैवस्वत नामक शुभ २२ सातवें मन्वन्तरके अट्ठाइसवें द्वापरयुगमें परम धर्मनिष्ठ सत्यवतीपुत्र मेरे गुरु श्रीव्यासजी हुए और उनतीसवें २३ द्वापरमें द्रौणि नामके व्यास होंगे । इनके पूर्व भी सत्ताईस व्यास हो चुके हैं, जिन्होंने प्रत्येक युगमें अनेक पुराण - संहिताएँ रची हैं ॥ २२–२४ ॥ २४ ऋषियोंने कहा — हे महाभाग सूतजी! अब आप पूर्वकालमें प्रत्येक द्वापरयुगमें अवतीर्ण हुए पुराणवक्ता व्यासोंकी कथा कहिये ॥ २५ ॥
सूतजी बोले- सृष्टिके बाद सर्वप्रथम द्वापरयुगमें २५ स्वयं ब्रह्माजीने ही ' व्यास ' के रूपमें प्रकट होकर वेदोंका विभाजन किया । दूसरे द्वापरमें ' प्रजापति ' व्यास बने, तीसरे द्वापरमें ' शुक्राचार्य ', चौथे द्वापरमें २६ ‘ बृहस्पति ', पाँचवेंमें ' सूर्य ' तथा छठेमें ‘ यमराज ' ही साक्षात् व्यास बने थे ॥ २६–२७ ॥ सातवें द्वापरमें ' इन्द्र ', आठवेंमें ' वसिष्ठमुनि ', २७ नवेंमें ' सारस्वत ' और दसवें द्वापरमें ' त्रिधामाजी ' व्यास हुए ॥ २८ ॥
ग्यारहवेंमें ‘ त्रिवृष ’, बारहवेंमें ‘ भरद्वाजमुनि ', २८ तेरहवेंमें ' अन्तरिक्ष ' और चौदहवें द्वापरमें ‘ धर्मराज ’ स्वयं व्यास बने ॥ २ ९ ॥ २ ९ पन्द्रहवें द्वापरमें ' त्रय्यारुणि ', सोलहवें में ' धनंजय ', सत्रहवेंमें ' मेधातिथि ' तथा अठारहवें । द्वापरमें ' व्रतीमुनि ' व्यास हुए ॥ ३० ॥
॥ ३० उन्नीसवें में ' अत्रि ', बीसवें में ' गौतम ' और इक्कीसवें द्वापरमें हर्यात्मा ' उत्तम ' नामक व्यास ॥ ३१ कहे गये हैं ॥३१ ॥
बाईसवेंमें ‘ वाजश्रवा वेन ', तेईसवेंमें ' आमुष्यायण । सोम ', चौबीसवें में ' तृणविन्दु ' तथा पचीसवें द्वापरमें ॥ ३२ ' भार्गव ' व्यास हुए ॥ ३२ ॥
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७८ ततः शक्तिर्जातुकर्ण्यः कृष्णद्वैपायनस्ततः अष्टाविंशतिसंख्येयं कथिता या मया श्रुता कृष्णद्वैपायनात्प्रोक्तं पुराणं च मया श्रुतम् श्रीमद्भागवतं पुण्यं सर्वदुःखौघनाशनम् ॥
कामदं मोक्षदं चैव वेदार्थपरिबृंहितम् ।
सर्वागमरसारामं मुमुक्षूणां सदा प्रियम् ॥
व्यासेन कृत्वातिशुभं पुराणं शुकाय पुत्राय महात्मने यत् । वैराग्ययुक्ताय च पाठितं वै विज्ञाय चैवारणिसम्भवाय ॥ श्रुतं मया तत्र तथा गृहीतं यथार्थवद्व्यासमुखान्मुनीन्द्राः पुराणगुह्यं सकलं समेतं गुरोः प्रसादात्करुणानिधेश्च ॥ सूतेन पृष्टः सकलं जगाद द्वैपायनस्तत्र पुराणगुह्यम् । अयोनिजेनाद्भुतबुद्धिना वै श्रुतं मया तत्र महाप्रभावम् ॥ श्रीमद्भागवतामरांघ्रिपफलास्वादादरः सत्तमाः संसारार्णवदुर्विगाह्यसलिलं सन्तर्तुकामः शुकः । नानाख्यानरसालयं श्रुतिपुटैः प्रेम्णाशृणोदद्भुतं तच्छ्रुत्वा न विमुच्यते कलिभयादेवंविधः कः क्षितौ ॥ पापीयानपि वेदधर्मरहितः स्वाचारहीनाशयो व्याजेनापि शृणोति यः परमिदं श्रीमत्पुराणोत्तमम् । भुक्त्वा भोगकलापमत्र विपुलं देहावसानेऽचलं योगिप्राप्यमवाप्नुयाद्भगवतीनामाङ्कितं सुन्दरम् ॥ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३ । छब्बीसवेंमें ' शक्ति ', सत्ताईसवेंमें ' जातुकर्ण्य ' ॥ ३३ और अट्ठाईसवें द्वापरमें ' कृष्णद्वैपायनजी ' व्यास हुए । इस प्रकार अट्ठाईस व्यासोंके नाम जैसा मैंने सुना था, । वैसा बता दिया ॥ ३३ ॥
इन्हीं कृष्णद्वैपायन व्यासजीके द्वारा कहे ३४ गये श्रीमद्देवीभागवतपुराणको मैंने सुना था; जो पुण्यप्रद, सब प्रकारके दुःखोंका नाश करनेवाला, सब प्रकारके मनोरथ पूर्ण करनेवाला, मोक्षदाता, ३५ वैदिक भावोंसे ओत - प्रोत तथा सभी आगमोंके रसोंसे परिपूर्ण, अत्यन्त मनोहर एवं मुमुक्षुजनोंको सदा प्रिय लगनेवाला है ॥ ३४-३५ ॥ जिस अत्यन्त पवित्र पुराणको रचकर व्यासजीने अरणीके गर्भसे उत्पन्न, विद्वान्, महात्मा एवं विरक्त अपने पुत्र शुकदेवजीको पढ़ाया था; हे मुनिवृन्द! उसी ३६ रहस्यमय महापुराण ( श्रीमद्देवीभागवत ) - को मैंने भी करुणासागर अपने गुरु व्यासजीके मुखसे सम्पूर्णरूपसे यथार्थतः सुना तथा उनकी कृपासे उसे हृदयंगम कर लिया है ॥ ३६-३७ ॥ जिस समय अयोनिज एवं अपूर्व बुद्धिमान् अपने ३७ पुत्र शुकदेवजीके प्रश्न करनेपर व्यासजीने रहस्ययुक्त इस पुराणको सुनाया, उस समय मैंने भी एक साधारण श्रोताके रूपमें इस महान् प्रभाववाले श्रीमद्देवी-भागवतमहापुराणको सुन लिया ॥३८ ॥
हे सर्वश्रेष्ठ मुनिजन! श्रीमद्भागवतरूपी इस कल्पवृक्षके फलके स्वादके प्रति आदरबुद्धि रखनेवाले ३८ तथा अपार संसार - सागरसे पार पानेके लिये श्रीशुकदेवजीने अनेक प्रकारकी सुन्दर एवं रसमयी कथाओंसे युक्त जिस अद्भुत महापुराणको विधिवत् अपने कर्णपुटसे प्रेमपूर्वक सुना है, उसे श्रवण करके भी जो कलिकालके भयसे मुक्त न हुआ, भला ऐसा प्राणी इस भूतलपर कौन होगा? ॥ ३ ९ ॥ ३ ९ वैदिक धर्मसे रहित तथा निकृष्ट विचार रखनेवाला बड़े - से - बड़ा पापी मनुष्य भी यदि किसी बहाने इस उत्तम श्रीमद्देवीभागवतपुराणका श्रवण कर लेता है तो वह भी निश्चय ही समस्त सांसारिक सुखोंको भोगकर अन्तमें योगिजनोंके द्वारा प्राप्त करनेयोग्य, भगवतीके नामसे चिह्नित, मनोरम तथा अचल पदको ४० प्राप्त कर लेता है ॥ ४० ॥
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अ ० ४ ] प्रथम स्कन्ध ७ ९ या निर्गुणा हरिहरादिभिरप्यलभ्या विद्या सतां प्रियतमाथ समाधिगम्या । सा तस्य चित्तकुहरे प्रकरोति भावं यः संशृणोति सततं तु सतीपुराणम् ॥ ४१ सम्प्राप्य मानुषभवं सकलाङ्गयुक्तं पोतं भवार्णवजलोत्तरणाय कामम् । सम्प्राप्य वाचकमहो न शृणोति मूढः स वञ्चितोऽत्र विधिना सुखदं पुराणम् ॥ ४२ यः प्राप्य कर्णयुगलं पटुमानुषत्वे रागी शृणोति सततं च परापवादान् । सर्वार्थदं रसनिधिं विमलं पुराणं नष्टः कुतो न शृणुते भुवि मन्दबुद्धिः ॥ ४३ । जो प्राणी इस श्रीमद्देवीभागवतपुराणको प्रतिदिन प्रेमसे सुनता है, उसके हृदयरूपी गुहामें विष्णु, शिव आदि देवताओंके लिये भी दुर्लभ, सर्वश्रेष्ठ विद्यारूपिणी, सज्जनोंकी एकमात्र प्रिया, गुणातीता एवं समाधिद्वारा जाननेयोग्य वे भगवती निवास करने लगती हैं ॥ ४१ ॥
अतः सर्वांगसुन्दर इस मानव - तनको पाकर संसार - सागरके अगाध सलिलसे पार होनेके लिये जलयानके समान परम सुखदायी श्रीमद्देवीभागवतपुराण एवं उसके वक्ताको प्राप्त करके भी जो मूर्ख इसका श्रवण नहीं करता, वह विधाताके द्वारा वंचित ही कहा जायगा ॥ ४२ ॥
इस दुर्लभ मनुष्य देहमें दोनों कानोंको प्राप्त करके भी जो सांसारिक मनुष्य केवल दूसरोंके दुर्गुणोंको ही सुना करता है, वह अधम मन्दबुद्धि चारों उत्तम पदार्थोंको देनेवाले तथा सब रसोंसे परिपूर्ण इस निर्मल पुराणको भूतलपर क्यों नहीं सुनता? ॥ ४३ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे पुराणवर्णन-पूर्वकतत्तद्युगीयव्यासवर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
अथ चतुर्थोऽध्यायः नारदजीद्वारा व्यासजीको ऋषय ऊचुः
सौम्य व्यासस्य भार्यायां कस्यां जातः सुतः शुकः ।
कथं वा कीदृशो येन पठितेयं सुसंहिता ॥ १
अयोनिजस्त्वया प्रोक्तस्तथा चारणिजः शुकः । सन्देहोऽस्ति महांस्तत्र कथयाद्य महामते ।
गर्भयोगी श्रुतः पूर्वं शुको नाम महातपाः ।
कथं च पठितं तेन पुराणं बहुविस्तरम् ॥ ३
सूत उवाच
पुरा सरस्वतीतीरे व्यासः सत्यवतीसुतः ।
आश्रमे कलविंकौ तु दृष्ट्वा विस्मयमागतः ॥ ४ ।
देवीकी महिमा बताना ऋषिगण बोले – हे सौम्य! महर्षि व्यासकी किस पत्नीसे शुकदेवजी उत्पन्न हुए? उनका जन्म किस प्रकार हुआ और किस प्रकारसे उन्होंने इस संहिताका सम्यक् अध्ययन कर लिया? ॥१ ॥
आपके द्वारा ही वे अयोनिज कहे गये हैं तो फिर अरणीसे उनकी उत्पत्ति कैसे हुई? हे महामते! इसमें हमें महान् संशय हो रहा है, आप उसका समाधान करें ॥ २ ॥
हमलोगोंने पहले ही सुना है कि महातपस्वी शुकदेवजी गर्भयोगी थे । ऐसी स्थितिमें उन्होंने इतने विस्तृत पुराण ( श्रीमद्देवीभागवत ) - का अध्ययन कैसे कर लिया? ॥ ३ ॥
सूतजी बोले – प्राचीन कालमें एक समय सत्यवतीके पुत्र व्यासजी सरस्वतीनदीके किनारे अपने आश्रममें गौरैया पक्षीका जोड़ा देखकर आश्चर्यचकित हो गये ॥४ ॥
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८० जातमात्रं शिशुं नीडे मुक्तमण्डान्मनोहरम् ताम्रास्यं शुभसर्वाङ्गं पिच्छांकुरविवर्जितम् तौ तु भक्ष्यार्थमत्यन्तं रतौ श्रमपरायणौ शिशोश्चंचुपुटे भक्ष्यं क्षिपन्तौ च पुनः पुनः अङ्गेनाङ्गानि बालस्य घर्षयन्तौ मुदान्वितौ चुम्बन्तौ च मुखं प्रेम्णा कलविंकौ शिशोः शुभम् वीक्ष्य प्रेमाद्भुतं तत्र बाले चटकयोस्तदा व्यासश्चिन्तातुरः कामं मनसा समचिन्तयत् तिरश्चामपि यत्प्रेम पुत्रे समभिलक्ष्यते किं चित्रं यन्मनुष्याणां सेवाफलमभीप्सताम् ॥ किमेतौ चटकौ चास्य विवाहं सुखसाधनम् विरच्य सुखिनौ स्यातां दृष्ट्वा वध्वा मुखं शुभम् अथवा वार्धके प्राप्ते परिचर्यां करिष्यति पुत्रः परमधर्मिष्ठः पुण्यार्थं कलविकयोः अर्जयित्वाथवा द्रव्यं पितरौ तर्पयिष्यति अथवा प्रेतकार्याणि करिष्यति यथाविधि अथवा किं गया श्राद्धं गत्वा संवितरिष्यति नीलोत्सर्गं च विधिवत्प्रकरिष्यति बालकः संसारेऽत्र समाख्यातं सुखानामुत्तमं सुखम् पुत्रगात्रपरिष्वंगो लालनञ्च विशेषतः अपुत्रस्य गतिर्नास्ति स्वर्गो नैव च नैव च पुत्रादन्यतरन्नास्ति परलोकस्य साधनम् मन्वादिभिश्च मुनिभिर्धर्मशास्त्रेषु भाषितम् पुत्रवान्स्वर्गमाप्नोति नापुत्रस्तु कथञ्चन ॥ दृश्यतेऽत्र समक्षं तन्नानुमानेन साध्यते पुत्रवान्मुच्यते पापादाप्तवाक्यं च शाश्वतम् ॥ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४ । अण्डेसे तत्काल पैदा हुए लाल मुखवाले, ॥ ५ सुन्दर अंगोंवाले एवं पंखरहित शिशुको घोंसलेमें ही छोड़कर वे दोनों उड़ गये और अत्यन्त परिश्रमसे । चारा लाकर उस शिशुके चोंचमें डालते हुए दोनों ॥ ६ पक्षी अत्यन्त आह्लादयुक्त होकर उस शिशुके अंगोंको अपने अंगोंसे रगड़ते हुए प्रेमपूर्वक उसके सुन्दर । मुखको चूम रहे थे ॥ ५–७ ॥ ॥ ७ व्यासजी उस शिशुमें उन दोनों पक्षियोंका ऐसा अद्भुत प्रेम देखकर चिन्तामें पड़ गये और मन - ही-। मन सोचने लगे । यदि अपने पुत्रके प्रति पक्षियोंमें ऐसा ॥ ८ प्रेम दिखायी दे रहा है तो अपनी सेवाका फल चाहनेवाले मनुष्योंमें ऐसा प्रेम - व्यवहार होनेमें आश्चर्य । ही क्या! क्या ये दोनों पक्षी इसका सुख - साधनस्वरूप ९ विवाह करके स्वयं सुखी रहते हुए इसकी वधूका सुन्दर मुख देख पायेंगे? क्या इनकी वृद्धावस्थामें यह । धर्मनिष्ठ पुत्र पुण्य - प्राप्तिके लिये इन दोनोंकी सेवा ॥ १० करेगा? धन आदि अर्जित करके क्या यह अपने । माता - पिताको सन्तुष्ट रखेगा और इनकी मृत्युके उपरान्त क्या इनका विधि- पूर्वक प्रेतकर्म करेगा? ॥ ११ अथवा क्या गयातीर्थ जाकर यह बालक उनके श्राद्ध । आदि कर्म करके उनका उद्धार करेगा तथा उनके परलोकसाधनहेतु क्या यह विधिपूर्वक नीलोत्सर्ग ॥ १२ ( नील वृषभ छोड़नेका कर्म ) करेगा? ॥ ८–१३ ॥ । पुत्रके शरीरका आलिंगन और विशेषरूपसे ॥ १३ उसका लालन - पालन इस संसारमें सभी सुखोंमें उत्तम सुख कहा गया है ॥ १४ ॥
। पुत्ररहित मनुष्यकी न तो सद्गति होती है और ॥ १४ न तो उसे स्वर्गकी ही प्राप्ति होती है । अतः परलोकसाधनके लिये पुत्रसे बढ़कर अन्य कोई उपाय । नहीं है ॥ १५ ॥
॥ १५ मनु आदि ऋषियोंने भी धर्मशास्त्रोंमें कहा है कि पुत्रवान् मनुष्य स्वर्ग प्राप्त करता है और पुत्रहीन । व्यक्तिको स्वर्ग - प्राप्ति कभी भी नहीं होती है ॥ १६ ॥
१६ इस बातमें अनुमानकी कोई आवश्यकता ही नहीं है अपितु यह प्रत्यक्षरूपमें भी देखा जाता है; । साथ ही यह वेद, स्मृति आदिका भी सनातन वचन १७ है कि पुत्रवान् मनुष्य पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १७ ॥
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अ ० ४ ]
आतुरे मृत्युकालेऽपि भूमिशय्यागतो नरः ।
करोति मनसा चिन्तां दुःखितः पुत्रवर्जितः ॥
धनं मे विपुलं गेहे पात्राणि विविधानि च ।
मन्दिरं सुन्दरं चैतत्को ऽस्य स्वामी भविष्यति ॥
मृत्युकाले मनस्तस्य दुःखेन भ्रमते यतः ।
अतोऽस्य दुर्गतिर्नूनं भ्रान्तचित्तस्य सर्वथा ॥
एवं बहुविधां चिन्तां कृत्वा सत्यवतीसुतः ।
निःश्वस्य बहुधा चोष्णं विमनाः सम्बभूव ह ॥
विचार्य मनसात्यर्थं कृत्वा मनसि निश्चयम् ।
जगाम च तपस्तप्तुं मेरुपर्वतसन्निधौ ॥
मनसा चिन्तयामास कं देवं समुपास्महे ।
वरप्रदाननिपुणं वाञ्छितार्थप्रदं तथा ॥
विष्णुं रुद्रं सुरेन्द्रं वा ब्रह्माणं वा दिवाकरम् ।
गणेश कार्तिकेयं च पावकं वरुणं तथा ॥
एवं चिन्तयतस्तस्य नारदो मुनिसत्तमः ।
यदृच्छया समायातो वीणापाणिः समाहितः ॥
तं दृष्ट्वा परमप्रीतो व्यासः सत्यवतीसुतः ।
कृत्वार्घ्यमासनं दत्त्वा पप्रच्छ कुशलं मुनिम् ॥
श्रुत्वाथ कुशलप्रश्नं पप्रच्छ मुनिसत्तमः ।
चिन्तातुरोऽसि कस्मात्त्वं द्वैपायन वदस्व मे ॥
व्यास उवाच
अपुत्रस्य गतिर्नास्ति न सुखं मानसे यतः ।
तदर्थं दुःखितश्चाहं चिन्तयामि पुनः पुनः ॥
तपसा तोषयाम्यद्य कं देवं वाञ्छितार्थदम् ।
इति चिन्तातुरोऽस्म्यद्य त्वामहं शरणं गतः ॥
प्रथम स्कन्ध ८१ रोगावस्थामें तथा मरणकालमें भूमि - शय्यापर १८ पड़ा हुआ सन्तानहीन प्राणी दुःखित होकर अपने मनमें विचार करता है कि मेरे घरमें पर्याप्त धन है, अनेक प्रकारके पात्र हैं तथा मेरा यह भवन भी १ ९ अत्यन्त सुन्दर है; किंतु अब इन सबका स्वामी कौन होगा? ॥ १८-१९ ॥ चूँकि मृत्युकालमें उस प्राणीका मन अति दुःखी २० होकर भ्रमित होता रहता है, इसलिये उस भ्रान्त मनवाले प्राणीकी दुर्गति अवश्य ही होती है ॥ २० ॥
इस प्रकार अनेकानेक चिन्तन करके और बार-२१ बार लम्बी तथा गर्म साँसें लेकर सत्यवतीपुत्र व्यासजीका मन अत्यन्त खिन्न हो गया ॥ २१ ॥
इसके बाद मनमें बहुत सोच - विचार करके २२ अन्ततः दृढ निश्चय करके वे तपश्चर्याके लिये मेरुपर्वतपर चले गये ॥ २२ ॥
उन्होंने मनमें विचार किया कि मैं विष्णु, रुद्र, २३ | इन्द्र, ब्रह्मा, सूर्य, गणेश, कार्तिकेय, अग्नि एवं वरुण – इन देवताओंमें किस देवताकी आराधना करूँ, जो वरप्रदान करनेमें उदार तथा अभीष्ट फलोंको २४ देनेवाला हो ॥ २३-२४ ॥ इस प्रकार व्यासजी विचार कर ही रहे थे कि उसी समय संयोगवश मुनिश्रेष्ठ नारदजी हाथोंमें वीणा २५ धारण किये हुए वहाँ आ गये ॥ २५ ॥
उन्हें देखकर सत्यवतीपुत्र व्यासजी अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने अर्घ्य तथा आसन प्रदान २६ करके उन मुनिसे कुशल - क्षेम पूछा ॥ २६ ॥
कुशल- प्रश्न सुन लेनेके पश्चात् मुनिवर नारदजीने पूछा - हे द्वैपायन! आप किस कारणसे चिन्ताग्रस्त हैं? मुझे बतायें ॥ २७ ॥
२७ व्यासजी बोले – सन्तानहीन व्यक्तिकी सद्गति नहीं होती और कभी भी उसके मनमें सुखानुभूति नहीं होती है । इसी बातको लेकर मैं अत्यन्त दुःखित हूँ और बार - बार यही सोचता रहता हूँ ॥२८ ॥
२८ मैं अभिलषित फल देनेवाले किस देवताको अपनी तप: साधनासे प्रसन्न करूँ, इसी चिन्तामें पड़ा हुआ मैं [ अब इसके समाधानहेतु ] आपकी २ ९ | शरणमें हूँ ॥ २ ९ ॥