देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 721–730

देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 721–730

पृष्ठ 721

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७१२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३३ श्रुत्वा तद् ब्रह्मणो वाक्यं दृष्ट्वा च केतकीदलम् ॥

हरिस्तं प्रत्युवाचेदं साक्षी कः कथयाधुना ।

यथार्थवादी मेधावी सदाचारः शुचिः समः ॥

साक्षी भवति सर्वत्र विवादे समुपस्थिते । ब्रह्मोवाच दूरदेशात्समायाति साक्षी कः समयेऽधुना ॥

यत्सत्यं तद्वचः सेयं केतकी कथयिष्यति ।

इत्युक्त्वा प्रेरिता तत्र ब्रह्मणा केतकी स्फुटम् ॥

वचनं प्राह तरसा शार्ङ्गिणं प्रत्यबोधयत् ।

शिवमूर्धिन स्थितां ब्रह्मा गृहीत्वा मां समागतः ॥

सन्देहोऽत्र न कर्तव्यस्त्वया विष्णो कदाचन ।

मम वाक्यं प्रमाणं हि ब्रह्मा पारङ्गतोऽस्य ह ॥

गृहीत्वा मां समायातः शिवभक्तैः समर्पिताम् ।

केतक्या वचनं श्रुत्वा हरिराह स्मयन्निव ॥

महादेवः प्रमाणं मे यद्यसौ वचनं वदेत् । ऋषिरुवाच तदाकर्ण्य हरेर्वाक्यं महादेवः सनातनः ॥

कुपितः केतकीं प्राह मिथ्यावादिनि मा वद ।

गच्छतो मध्यतः प्राप्ता पतिता मस्तकान्मम ॥

मिथ्याभिभाषिणी त्यक्ता मया त्वं सर्वदैव हि ।

ब्रह्मा लज्जापरो भूत्वा ननाम मधुसूदनम् ॥

शिवेन केतकी त्यक्ता तद्दिनात्कुसुमेषु वै ।

एवं मायाबलं विद्धि ज्ञानिनामपि मोहदम् ॥

अन्येषां प्राणिनां राजन् का वार्ता विभ्रमं प्रति ।

देवानां कार्यसिद्ध्यर्थं सर्वदैव रमापतिः ॥

३७ ब्रह्माजीके उस वचनको सुनकर और केतकी पुष्पको देखकर विष्णुने उनसे कहा - इसका साक्षी कौन है, बताइये । किसी विवादके उपस्थित होनेपर ३८ किसी सत्यवादी, बुद्धिमान्, सदाचारी, पवित्र और निष्पक्ष व्यक्तिको साक्षी बनाया जाता है । ३७-३८३ ब्रह्माजी बोले- इस समय इतने दूर देशसे कौन साक्षी आयेगा? जो सत्य बात है, उसे यह केतकी स्वयं कह देगी ॥ ३ ९ ३ ॥ ३ ९ ऐसा कहकर ब्रह्माजीने केतकीको [ साक्ष्यके लिये ] प्रेरित किया । तब उसने शीघ्रतापूर्वक विष्णुको ४० सम्बोधित करते हुए कहा कि शिव ( लिंग ) –के मस्तकपर स्थित मुझे ब्रह्माजी वहाँसे लेकर आये हैं । विष्णो! इसमें आपको किसी प्रकारका सन्देह नहीं ४१ करना चाहिये । ब्रह्माजी इस लिंगके पार गये हैं और शिवभक्तोंके द्वारा समर्पित की गयी मुझको लेकर आये हैं - यह मेरा कथन ही प्रमाण है ॥ ४० - ४२३ ॥ ४२ केतकीकी बात सुनकर भगवान् विष्णु मुसकराते हुए बोले कि मेरे लिये तो महादेव ही प्रमाण हैं । यदि वे ऐसी बात बोल दें तो मैं मान लूँगा ॥ ४३ ॥

४३ ऋषि बोले- तब विष्णुकी बात सुनकर सनातन भगवान् महादेवने क्रुद्ध होकर केतकीसे कहा— असत्यभाषिणि! ऐसा मत बोलो । मेरे मस्तकसे गिरी हुई तुझे ब्रह्मा बीचमें ही पा गये थे । तुमने झूठ बोल ४४ है, इसलिये अब मैंने सदैवके लिये तुम्हारा त्याग कर दिया । तब ब्रह्माजीने लज्जित होकर भगवान् विष्णुको नमस्कार किया । उसी दिनसे शिवद्वारा पुष्पोंमेंस ४५ केतकीका त्याग कर दिया गया ॥ ४४–४६३ ॥ हे राजन्! आप यह जान लीजिये कि मायाक बल ज्ञानियोंको भी मोहमें डाल देता है, तब दूसरे ४६ प्राणियोंके मोहित हो जानेकी क्या बात? स्वयं देवाधिदेव लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु देवताओंके कार्यक्र सिद्धिके लिये पापका भय छोड़कर दैत्योंके साथ छन्-४७ करते रहते हैं । वे ऐश्वर्यसम्पन्न भगवान् माधव अ सुख और आनन्दको त्यागकर विविध योनियोंमें अवतार लेकर दैत्योंके साथ युद्ध करते हैं । देवताओं ४८ कार्यहेतु अंशावतार ग्रहण करनेवाले सर्वज्ञ ---

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अ ० ३३ ]

दैत्यान्वञ्चयते चाशु त्यक्त्वा पापभयं हरिः ।

अवतारकरो देवो नानायोनिषु माधवः ॥

त्यक्त्वानन्दसुखं दैत्यैर्युद्धं चैवाकरोद्विभुः ।

नूनं मायाबलं चैतन्माधवेऽपि जगद्गुरौ ॥

सर्वज्ञे देवकार्यांशे का वार्तान्यस्य भूपते ।

ज्ञानिनामपि चेतांसि परमा प्रकृतिः किल ॥

बलादाकृष्य मोहाय प्रयच्छति महीपते ।

यया व्याप्तमिदं सर्वं भगवत्या चराचरम् ॥

मोहदा ज्ञानदा सैव बन्धमोक्षप्रदा सदा । राजोवाच भगवन्ब्रूहि मे तस्याः स्वरूपं बलमुत्तमम् ॥ उत्पत्तिकारणं वापि स्थानं परमकं च यत् । ऋषिरुवाच न चोत्पत्तिरनादित्वान्नृप तस्याः कदाचन ॥

नित्यैव सा परा देवी कारणानां च कारणम् ।

वर्तते सर्वभूतेषु शक्तिः सर्वात्मना नृप ॥

शववच्छक्तिहीनस्तु प्राणी भवति सर्वथा ।

चिच्छक्तिः सर्वभूतेषु रूपं तस्यास्तदेव हि ॥

आविर्भावतिरोभावौ देवानां कार्यसिद्धये ।

यदा स्तुवन्ति तां देवा मनुजाश्च विशाम्पते ॥

प्रादुर्भवति भूतानां दुःखनाशाय चाम्बिका ।

नानारूपधरा देवी नानाशक्तिसमन्विता ॥

आविर्भवति कार्यार्थं स्वेच्छया परमेश्वरी ।

दैवाधीना न सा देवी यथा सर्वे सुरा नृप ॥

न कालवशगा नित्यं पुरुषार्थप्रवर्तिनी ।

अकर्ता पुरुषो द्रष्टा दृश्यं सर्वमिदं जगत् ॥

दृश्यस्य जननी सैव देवी सदसदात्मिका ।

पुरुषं रञ्जयत्येका कृत्वा ब्रह्माण्डनाटकम् ॥

रञ्जिते पुरुषे सर्वं संहरत्यतिरंहसा ।

तया निमित्तभूतास्ते ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ॥

पञ्चम स्कन्ध ७१३ जगद्गुरु भगवान् विष्णुमें भी यह मायाशक्ति अपना ४ ९ प्रभाव डालती है, तब हे राजन्! अन्यकी क्या बात! हे राजन्! वे परम प्रकृतिस्वरूपा महामाया ज्ञानियोंके मनको भी बलपूर्वक आकृष्ट करके ५० मोहित कर देती हैं, जिन भगवतीके द्वारा स्थावर-जंगमात्मक यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है; वे ही ५१ ज्ञानदायिनी, मोहदायिनी तथा बन्धन एवं मोक्ष प्रदान करनेवाली हैं ॥ ४७–५२३ ॥ राजा बोले- हे भगवन्! मुझे उनके स्वरूप, ५२ उत्तम बल, उनकी उत्पत्तिका कारण और उनके परम धामके विषयमें बताइये ॥ ५३३ ॥

ऋषि बोले- हे राजन्! अनादि होनेके कारण ५३ उनकी कभी उत्पत्ति नहीं होती । नित्य और सर्वोपरि वे देवी समस्त कारणोंकी भी कारण हैं । हे नृप! वे शक्तिस्वरूपा भगवती सभी प्राणियोंमें सर्वात्मारूपसे विद्यमान रहती हैं । यदि प्राणी शक्तिसे रहित हो जाय ५४ तो वह प्राणी शवतुल्य हो जाता है; क्योंकि सभी प्राणियोंमें जो चैतन्य शक्ति है, वह इन्हींका रूप है । ५५ देवताओंकी कार्यसिद्धिके लिये ही उनका प्राकट्य और तिरोधान होता है ॥ ५४–५६३ ॥ हे राजन्! जब देवता या मनुष्य उनकी ५६ स्तुति करते हैं, तब प्राणियोंके दुःखका नाश करनेके लिये ये भगवती जगदम्बा प्रकट होती हैं, वे देवी ५७ परमेश्वरी अनेक रूप धारण करके अनेक प्रकारकी शक्तियोंसे सम्पन्न होकर कार्य सिद्ध करनेके लिये स्वेच्छापूर्वक आविर्भूत होती हैं । हे राजन्! अन्य ५८ देवताओंकी भाँति वे भगवती दैवके अधीन नहीं हैं । सदा पुरुषार्थका प्रवर्तन करनेवाली वे देवी कालके वशमें नहीं हैं॥५७–५९ ३ ॥ ५ ९ यह सम्पूर्ण जगत् दृश्य है, परमपुरुष इसका द्रष्टा है, वह कर्ता नहीं है । वे सत् - असत्स्वरूपा देवी ६० ही इस दृश्यमान जगत्की जननी हैं, वे स्वयं अकेले इस ब्रह्माण्डकी रचना करके परमपुरुषको आनन्दित करती हैं और उन परमपुरुषका मनोरंजन हो जाने के ६१ बाद वे भगवती शीघ्र ही सम्पूर्ण सृष्टि - प्रपंचका संहार भी कर देती हैं । वे ब्रह्मा, विष्णु और महेश ६२ तो निमित्तमात्र हैं । वे भगवती ही अपनी लीलासे

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७१४ कल्पिताः स्वस्वकार्येषु प्रेरिता लीलया त्वमी स्वांशं तेषु समारोप्य कृतास्ते बलवत्तराः दत्ताश्च शक्तयस्तेभ्यो गीर्लक्ष्मीर्गिरिजा तथा ते तां ध्यायन्ति देवेशाः पूजयन्ति परां मुदा ज्ञात्वा सर्वेश्वरीं शक्तिं सृष्टिस्थितिविनाशिनीम् । एतत्ते सर्वमाख्यातं देवीमाहात्म्यमुत्तमम् । मम बुद्ध्यनुसारेण नान्तं जानामि भूपते श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३४ । उनकी रचना करती हैं और उन्हें अपने - अपने ॥ ६३ कार्यों ( जगत्का सृजन, पालन और संहार ) - में प्रवृत्त करती हैं । वे ( देवी ) उनमें अपने अंश ( शक्ति ) - का आरोपणकर उन्हें बलवान् बनाती हैं । उन्होंने सरस्वती, । लक्ष्मी और पार्वतीके रूपमें उन्हें अपनी शक्तियाँ दी ॥ ६४ हैं । अतः वे त्रिदेव उन्हीं पराम्बाको सृजन, पालन और संहार करनेवाली जानकर प्रसन्नतापूर्वक उनका ध्यान और पूजन करते हैं ॥ ६०-६ -६४ ÷ II हे राजन्! इस प्रकार मैंने अपनी बुद्धिके अनुसार देवीका यह उत्तम माहात्म्य आपसे कह दिया, मैं ॥ ६५ । इसका अन्त नहीं जानता हूँ ॥ ६५ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे देवीमाहात्म्यवर्णनं नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥

अथ चतुस्त्रिंशोऽध्यायः मुनि सुमेधाद्वारा राजोवाच भगवन्ब्रूहि मे सम्यक्तस्या आराधने विधिम् पूजाविधिञ्च मन्त्रांश्च तथा होमविधिं वद ऋषिरुवाच शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि तस्याः पूजाविधिं शुभम् कामदं मोक्षदं नॄणां ज्ञानदं दुःखनाशनम् ॥ आदौ स्नानविधिं कृत्वा शुचिः शुक्लाम्बरो नरः आचम्य प्रयतः कृत्वा शुभमायतनं निजम् ततोऽवलिप्तभूम्यां तु संस्थाप्यासनमुत्तमम् तत्रोपविश्य विधिवत् त्रिराचम्य मुदान्वितः पूजाद्रव्यं सुसंस्थाप्य यथाशक्त्यनुसारतः प्राणायामं ततः कृत्वा भूतशुद्धिं विधाय च कुर्यात्प्राणप्रतिष्ठां तु सम्भारं प्रोक्ष्य मन्त्रतः । कालज्ञानं ततः कृत्वा न्यासं कुर्याद्यथाविधि देवीकी पूजा - विधिका वर्णन राजा बोले- हे भगवन्! अब मुझे उन देवीकी । आराधना - विधि भलीभाँति बताइये; साथ ही पूजा-॥ १ विधि, हवनकी विधि और मन्त्र भी बताइये ॥ १ ॥

ऋषि बोले- हे राजन्! सुनिये, मैं उनके पूजनकी शुभ विधि बताता हूँ, जो मनुष्योंको काम, । मोक्ष और ज्ञानको देनेवाली तथा उनके दुःखों का २ नाश करनेवाली है ॥ २ ॥

मनुष्यको सर्वप्रथम विधिपूर्वक स्नान करके । पवित्र हो श्वेत वस्त्र धारण कर लेना चाहिये । ॥ ३ तत्पश्चात् वह सावधानीपूर्वक आचमन करके पूजा-स्थानको शुद्ध करनेके बाद लिपी हुई भूमिपर । उत्तम आसन बिछाकर उसपर बैठ जाय और प्रसन्न ॥ ४ होकर विधिपूर्वक तीन बार आचमन करे । अपनी शक्तिके अनुसार पूजाद्रव्यको सुव्यवस्थित ढंगसे । रखकर प्राणायाम कर ले, उसके बाद भूतशुद्धि ॥ ५ करके और पुनः मन्त्र पढ़कर समस्त पूजन-सामग्रीका प्रोक्षण करके देवीमूर्तिकी प्राणप्रतिष्ठा करनी चाहिये । तत्पश्चात् देशकालका उच्चारणकर ॥ ६ । विधिपूर्वक न्यास करना चाहिये ॥३-६ ॥

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अ ० ३४ ] पञ्चम

शुभे ताम्रमये पात्रे चन्दनेन सितेन च ।

षट्कोणं विलिखेद्यन्त्रं चाष्टकोणं ततो बहिः ॥ ७

नवाक्षरस्य मन्त्रस्य बीजानि विलिखेत्ततः ।

कृत्वा यन्त्रप्रतिष्ठाञ्च वेदोक्तां संविधाय च ॥ ८

अर्चा वा धातवीं कुर्यात्पूजामन्त्रैः शिवोदितैः ।

पूजनं पृथिवीपाल भगवत्याः प्रयत्नतः ॥ ९

कृत्वा वा विधिवत्पूजामागमोक्तां समाहितः ।

जपेन्नवाक्षरं मन्त्रं सततं ध्यानपूर्वकम् ॥ १०

होमं दशांशतः कुर्याद्दशांशेन च तर्पणम् ।

भोजनं ब्राह्मणानाञ्च तद्दशांशेन कारयेत् ॥ ११

चरित्रत्रयपाठञ्च नित्यं कुर्याद्विसर्जयेत् ।

नवरात्रव्रतं चैव विधेयं विधिपूर्वकम् ॥ १२

आश्विने च तथा चैत्रे शुक्ले पक्षे नराधिप ।

नवरात्रोपवासो वै कर्तव्यः शुभमिच्छता ॥ १३

होमः सुविपुलः कार्यों जप्यमन्त्रैः सुपायसैः ।

शर्कराघृतमिश्रैश्च मधुयुक्तैः सुसंस्कृतैः ॥ १४

छागमांसेन वा कार्यों बिल्वपत्रैस्तथा शुभैः ।

हयारिकुसुमै रक्तैस्तिलैर्वा शर्करायुतैः ॥ १५

अष्टम्याञ्च चतुर्दश्यां नवम्याञ्च विशेषतः ।

कर्तव्यं पूजनं देव्या ब्राह्मणानाञ्च भोजनम् ॥ १६

निर्धनो धनमाप्नोति रोगी रोगात्प्रमुच्यते ।

अपुत्रो लभते पुत्राञ्छुभांश्च वशवर्तिनः ॥ १७

राज्यभ्रष्टो नृपो राज्यं प्राप्नोति सार्वभौमिकम् ।

शत्रुभिः पीडितो हन्ति रिपुं मायाप्रसादतः ॥ १८

विद्यार्थी पूजनं यस्तु करोति नियतेन्द्रियः ।

अनवद्यां शुभां विद्यां विन्दते नात्र संशयः ॥ १ ९

स्कन्ध ७१५ इसके बाद सुन्दर ताम्रपात्रपर श्वेत चन्दनसे षट्कोण यन्त्र तथा उसके बाहर अष्टकोण यन्त्र लिखना चाहिये । तदनन्तर नवाक्षर मन्त्रके आठ बीज अक्षर आठों कोणोंमें लिखना चाहिये और नौवाँ अक्षर यन्त्रकी कर्णिका ( बीच ) - में लिखना चाहिये । तदनन्तर वेदमें बतायी गयी विधिसे यन्त्रकी प्रतिष्ठा करके अथवा हे राजन्! भगवतीकी धातुमयी प्रतिमा बनाकर शिवतन्त्रोक्त पूजामन्त्रोंसे प्रयत्नपूर्वक पूजन करना चाहिये । अथवा सावधान होकर आगमशास्त्रमें बतायी गयी विधिसे विधानपूर्वक पूजन करके ध्यानपूर्वक नवाक्षरमन्त्रका सतत जप करना चाहिये । जपका दशांश होम करना चाहिये, होमका दशांश तर्पण करना चाहिये और तर्पणका दशांश ब्राह्मणभोजन कराना चाहिये । प्रतिदिन तीनों चरित्रों ( प्रथम चरित्र, मध्यम चरित्र तथा उत्तर चरित्र ) - का पाठ करना चाहिये । इसके बाद विसर्जन करना चाहिये ॥ ७- - ११ ÷ || हे राजन्! कल्याण चाहनेवालेको आश्विन और चैत्र माह के शुक्लपक्षमें विधिपूर्वक नवरात्रव्रत करना चाहिये । इन नवरात्रोंमें उपवास भी करना चाहिये ॥ १२-१३ ॥ अनुष्ठानमें जपे गये मन्त्रोंके द्वारा शर्करा, घी और मधुमिश्रित पवित्र खीरसे विस्तारपूर्वक हवन करना चाहिये अथवा उत्तम बिल्वपत्रों, लाल कनैलके पुष्पों अथवा शर्करामिश्रित तिलोंसे हवन करना चाहिये । अष्टमी, नवमी एवं चतुर्दशीको विशेषरूपसे देवीपूजन करना चाहिये और इस अवसरपर ब्राह्मणभोजन भी कराना चाहिये । ऐसा करनेसे निर्धनको धनकी प्राप्ति होती है, रोगी रोगमुक्त हो जाता है, पुत्रहीन व्यक्ति सुन्दर और आज्ञाकारी पुत्रोंको प्राप्त करता है और राज्यच्युत राजाको सार्वभौम राज्य प्राप्त हो जाता है । देवी महामायाकी कृपासे शत्रुओंसे पीड़ित मनुष्य अपने शत्रुओंका नाश कर देता है । जो विद्यार्थी इन्द्रियोंको वशमें करके इस पूजनको करता है, वह शीघ्र ही पुण्यमयी उत्तम विद्या प्राप्त कर लेता है; । इसमें सन्देह नहीं है॥१४–१९ ॥

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७१६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३४

ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रो वा भक्तिसंयुतः ।

पूजयेज्जगतां धात्रीं स सर्वसुखभाग्भवेत् ॥

नवरात्रव्रतं कुर्यान्नरनारीगणश्च यः ।

वाञ्छितं फलमाप्नोति सर्वदा भक्तितत्परः ॥

आश्विने शुक्लपक्षे तु नवरात्रव्रतं शुभम् ।

करोति भावसंयुक्तः सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥

विधिवन्मण्डलं कृत्वा पूजास्थानं प्रकल्पयेत् ।

कलशं स्थापयेत्तत्र वेदमन्त्रविधानतः ॥

यन्त्रं सुरुचिरं कृत्वा स्थापयेत्कलशोपरि ।

वापयित्वा यवांश्चारून्पार्श्वतः परिवर्तितान् ॥

कृत्वोपरि वितानञ्च पुष्पमालासमावृतम् ।

धूपदीपसुसंयुक्तं कर्तव्यं चण्डिकागृहम् ॥

त्रिकालं तत्र कर्तव्या पूजा शक्त्यनुसारतः ।

वित्तशाठ्यं न कर्तव्यं चण्डिकायाश्च पूजने ॥

धूपैर्दीपैः सुनैवेद्यैः फलपुष्पैरनेकशः ।

गीतवाद्यैः स्तोत्रपाठैर्वेदपारायणैस्तथा ॥

उत्सवस्तत्र कर्तव्यो नानावादित्रसंयुतैः ।

कन्यकानां पूजनञ्च विधेयं विधिपूर्वकम् ॥

चन्दनैर्भूषणैर्वस्त्रैर्भक्ष्यैश्च विविधैस्तथा ।

सुगन्धतैलमाल्यैश्च मनसो रुचिकारकैः ॥

एवं सम्पूजनं कृत्वा होमं मन्त्रविधानतः ।

अष्टम्यां वा नवम्यां वा कारयेद्विधिपूर्वकम् ॥

ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चात्पारणं दशमीदिने ।

कर्तव्यं शक्तितो दानं देयं भक्तिपरैर्नृपैः ॥

एवं यः कुरुते भक्त्या नवरात्रव्रतं नरः ।

नारी वा सधवा भक्त्या विधवा वा पतिव्रता ॥

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र - जो भी २० भक्तिपरायण होकर जगज्जननी जगदम्बाकी पूजा करता है, वह सब प्रकारके सुखका भागी हो जाता है । जो स्त्री अथवा पुरुष भक्तितत्पर होकर नवरात्रव्रत २१ करता है, वह सदा मनोवांछित फल प्राप्त करता है ॥ २०-२१ ॥ जो मनुष्य आश्विन शुक्लपक्षमें इस उत्तम २२ नवरात्रव्रतको श्रद्धाभावसे करता है, उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं ॥ २२ ॥

विधिपूर्वक मण्डलका निर्माण करके पूजा-२३ स्थानका निर्माण करना चाहिये और वहाँपर विधि-विधानसे वैदिक मन्त्रोंद्वारा कलशकी स्थापना करनी चाहिये ॥ २३ ॥

२४ अत्यन्त सुन्दर यन्त्रका निर्माण करके उसे कलशके ऊपर स्थापित कर देना चाहिये । तत्पश्चात् कलशके चारों ओर परिष्कृत तथा उत्तम जौका वपन २५ करके पूजा - स्थानके ऊपर पुष्पमालासे अलंकृत चाँदनी लगाकर देवीका मण्डप बनाना चाहिये तथा उसे सदा धूप - दीप से सम्पन्न रखना चाहिये ॥ २४ - २५ ॥ २६ अपनी शक्तिके अनुसार वहाँ [ प्रातः, मध्याह्न तथा सायंकाल ] तीनों समय पूजा करनी चाहिये । देवीकी पूजामें धनकी कृपणता नहीं करनी चाहिये । २७ धूप, दीप, उत्तम नैवेद्य, अनेक प्रकारके फल - पुष्प, गीत, वाद्य, स्तोत्रपाठ तथा वेदपारायण - इनके द्वारा २८ भगवतीकी पूजा होनी चाहिये । नानाविध वाद्य बजाकर उत्सव मनाना चाहिये । इस अवसरपर चन्दन, आभूषण, वस्त्र, विविध प्रकारके व्यंजन, सुगन्धित तेल, हार— २ ९ मनको प्रसन्न करनेवाले इन पदार्थोंसे विधिपूर्वक कन्याओंका पूजन करना चाहिये । इस प्रकार पूजन सम्पन्न करके अष्टमी या नवमीको मन्त्रोच्चारपूर्वक ३० विधिवत् हवन करना चाहिये । तत्पश्चात् ब्राह्मण-भोजन कराना चाहिये । इसके बाद दशमीको पारण करना चाहिये । भक्तिनिष्ठ राजाओंको यथाशक्ति दान ३१ भी करना चाहिये ॥ २६–३१ ॥ इस प्रकार पुरुष अथवा पतिव्रता सधवा या विधवा स्त्री जो कोई भी भक्तिपूर्वक नवरात्रव्रत ३२ | करता है, वह इस लोकमें सुख तथा मनोभिलषित

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अ ० ३४ ] पञ्चम स्कन्ध ७१७

इह लोके सुखं भोगान्प्राप्नोति मनसेप्सितान् ।

देहान्ते परमं स्थानं प्राप्नोति व्रततत्परः ॥ ३३

जन्मान्तरेऽम्बिकाभक्तिर्भवत्यव्यभिचारिणी ।

जन्मोत्तमकुले प्राप्य सदाचारो भवेद्धि सः ॥ ३४

नवरात्रव्रतं प्रोक्तं व्रतानामुत्तमं व्रतम् ।

आराधनं शिवायास्तु सर्वसौख्यकरं परम् ॥ ३५

अनेन विधिना राजन् समाराधय चण्डिकाम् ।

जित्वा रिपूनस्खलितं राज्यं प्राप्स्यस्यनुत्तमम् ॥ ३६

सुखञ्च परमं भूप देहेऽस्मिन्स्वगृहे पुनः ।

पुत्रदारान्समासाद्य लप्स्यसे नात्र संशयः ॥ ३७

वैश्योत्तम त्वमेवाद्य समाराधय कामदाम् ।

देवीं विश्वेश्वरीं मायां सृष्टिसंहारकारिणीम् ॥ ३८

स्वजनानां च मान्यस्त्वं भविष्यसि गृहे गतः ।

सुखं सांसारिकं प्राप्य यथाभिलषितं पुनः ॥ ३ ९

देवीलोके शुभे वासो भविता ते न संशयः ।

नाराधिता भगवती यैस्ते नरकभागिनः ॥ ४०

इह लोकेऽतिदुःखार्ता नानारोगैः प्रपीडिताः ।

भवन्ति मानवा राजञ्छत्रुभिश्च पराजिताः ॥ ४१

निष्कलत्रा ह्यपुत्राश्च तृष्णार्ताः स्तब्धबुद्धयः ।

बिल्वीदलैः करवीरैः शतपत्रैश्च चम्पकैः ॥ ४२

अर्चिता जगतां धात्री यैस्तेऽतीव विलासिनः ।

भवन्ति कृतपुण्यास्ते शक्तिभक्तिपरायणाः ॥ ४३

धनविभवसुखाढ्या मानवा मानवन्तः सकलगुणगणानां भाजनं भारतीशाः । निगमपठितमन्त्रैः पूजिता यैर्भवानी नृपतितिलकमुख्यास्ते भवन्तीह लोके ॥ ४४ भोगोंको प्राप्त करता है और वह व्रतपरायण व्यक्ति देह - त्याग होनेपर परम दिव्य देवीलोकको प्राप्त

करता है । ३२-३३ ॥

उसे जन्मान्तरमें देवी जगदम्बाकी अविचल भक्ति प्राप्त होती है और उत्तम कुलमें जन्म पाकर वह स्वभावतः सदाचारी होता है ॥ ३४ ॥

नवरात्रव्रतको व्रतोंमें उत्तम व्रत कहा गया है; भगवती शिवाका आराधन सब प्रकारके उत्तम सुखको देनेवाला है ॥ ३५ ॥

हे राजन्! इस विधि से भगवती चण्डिकाकी आराधना कीजिये, इससे शत्रुओंको जीतकर आप अपना उत्तम राज्य पुनः प्राप्त कर लेंगे और हे भूप! अपनी स्त्री- पुत्र आदि स्वजनोंको प्राप्तकर आप अपने भवनमें परम उत्तम सुखका इसी शरीरसे उपभोग करेंगे; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३६-३७ ॥ वैश्यश्रेष्ठ! आप भी आजसे समस्त कामनाओंको देनेवाली, सृष्टि और संहारकी कारणभूता विश्वेश्वरी देवी महामायाकी आराधना कीजिये । इससे आप अपने घर जानेपर अपने लोगोंमें मान्य हो जायँगे और मनोभिलषित सांसारिक सुख प्राप्त करके अन्तमें शुभ देवीलोकमें वास करेंगे — इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३८-३९ ३ ॥ हे राजन्! जो मनुष्य भगवतीकी आराधना नहीं करते, वे नरकके भागी होते हैं । वे इस लोकमें अत्यन्त दुःखी, विविध व्याधियोंसे पीड़ित, शत्रुओं द्वारा पराजित, स्त्री- पुत्रसे हीन, तृष्णाग्रस्त और बुद्धिभ्रष्ट होते हैं ॥ ४०-४१३ ॥ बिल्वपत्रोंसे तथा कनैल, कमल और चम्पाके फूलोंसे जो जगज्जननीकी आराधना करते हैं, शक्तिस्वरूपा भगवतीकी भक्तिमें रत वे पुण्यशाली लोग विविध प्रकारके सुख प्राप्त करते हैं ॥ ४२-४३ ॥ [ हे नृपश्रेष्ठ! ] जो लोग वेदोक्त मन्त्रोंसे भवानीका पूजन करते हैं, वे मानव इस संसारमें सब प्रकारके धन, वैभव तथा सुखसे परिपूर्ण, समस्त गुणोंके आगार, माननीय, विद्वान् और राजाओंके शिरोमणि होते हैं ॥ ४४ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे भगवत्याः पूजाराधनविधिवर्णनं नाम चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥

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७१८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३५ अथ पञ्चत्रिंशोऽध्यायः सुरथ और समाधिकी तपस्यासे प्रसन्न भगवतीका प्रकट होना और उन्हें इच्छित वरदान देना व्यास उवाच

इति तस्य वचः श्रुत्वा दुःखितौ वैश्यपार्थिवौ ।

प्रणिपत्य मुनिं प्रीत्या प्रश्रयावनतौ भृशम् ॥

हर्षेणोत्फुल्लनयनावूचतुर्वाक्यकोविदौ I कृताञ्जलिपुटौ शान्तौ भक्तिप्रवणचेतसौ ॥

भगवन्पावितावद्य शान्तौ दीनौ शुचान्वितौ ।

तव सूक्तसरस्वत्या गङ्गयेव भगीरथः ॥

साधवः सम्भवन्तीह परोपकृतितत्पराः ।

अकृत्रिमगुणारामाः सुखदाः सर्वदेहिनाम् ॥

पूर्वपुण्यप्रसङ्गेन प्राप्तोऽयमाश्रमः शुभः ।

तवावाभ्यां महाभाग महादुःखविनाशकः ॥

भवन्ति मानवा भूमौ बहवः स्वार्थतत्पराः ।

परार्थसाधने दक्षाः केचित्क्वापि भवादृशाः ॥

दुःखितोऽहं मुनिश्रेष्ठ वैश्योऽयं चातिदुःखितः ।

उभौ संसारसन्तप्तौ तवाश्रमपदे मुदा ॥

दर्शनादेव हे विद्वन् गतं दुःखमिहावयोः ।

देहजं मानसं वाक्यश्रवणादेव साम्प्रतम् ॥

धन्यावावां कृतकृत्यौ जातौ सूक्तिसुधारसात् ।

पावितौ भवता ब्रह्मन् कृपया करुणार्णव ॥

गृहाणास्मत्करौ साधो नय पारं भवार्णवे ।

मग्नौ श्रान्ताविति ज्ञात्वा मन्त्रदानेन साम्प्रतम् ॥

व्यासजी बोले – उनका यह वचन सुनकर दुःखित हृदयवाले वैश्य और राजाने प्रसन्नतापूर्वक १ विनम्रभावसे मुनिके चरणोंमें प्रणाम किया । भक्तिपरायण चित्तवाले, शान्त स्वभाववाले तथा हर्षके कारण खिले हुए नेत्रोंवाले वे दोनों वाक्य-विशारद राजा और वैश्य हाथ जोड़कर कहने २ लगे ॥ १-२ ॥ हे भगवन्! हम दोनों दुःखी जनोंको आपकी सूक्तिरूपिणी वाणीने उसी प्रकार शान्त तथा पवित्र ३ कर दिया, जैसे गंगाने राजा भगीरथको कर दिया था ॥ ३ ॥

सज्जन लोग परोपकारपरायण, स्वाभाविक ४ रूपसे गुणोंके भण्डार और सभी प्राणियोंको सुख देनेवाले होते हैं । पूर्वजन्मोंके पुण्यके कारण ही महान् दुःखका नाश करनेवाले आपके इस शुभ ५ आश्रममें हम दोनोंका आना हुआ । पृथ्वीपर बहुत-से स्वार्थी मनुष्य होते हैं, परंतु दूसरोंके हित-साधनमें कुशल आप जैसे कुछ ही लोग कहीं-६ कहीं मिलते हैं । हे मुनिश्रेष्ठ! मैं दुःखी हूँ और ये वैश्य अत्यन्त दुःखी हैं । हम दोनों इस संसारसे पीड़ित हैं । हे विद्वन्! आपके इस आश्रम में ७ आकर प्रसन्नतापूर्वक आपके दर्शन और उपदेश-श्रवणसे हमारा शारीरिक तथा मानसिक क्लेश दूर हो गया॥४-८ ॥ हे ब्रह्मन्! आपकी अमृतमयी वाणीके रससे ८ हम दोनों धन्य और कृतकृत्य हो गये । हे करुणासागर! आपने अपनी कृपासे हम दोनोंको पवित्र कर दिया ॥ ९ ॥

९ हे साधो! हम दोनों थककर इस संसाररूपी महासागरमें डूब रहे हैं - यह जानकर अब आप हम दोनोंका हाथ पकड़िये और मन्त्रदान देकर भवसागरसे १० । पार कर दीजिये ॥ १० ॥

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अ ० ३५ ] पञ्चम स्कन्ध ७१ ९

तपः कृत्वातिविपुलं समाराध्य सुखप्रदाम् ।

सम्प्राप्य दर्शनं भूयो यास्यावो निजमन्दिरम् ॥

वदनात्तव सम्प्राप्य देवीमन्त्रं नवाक्षरम् ।

स्मरणञ्च करिष्यावो निराहारौ धृतव्रतौ ॥

व्यास उवाच

इति संचोदितस्ताभ्यां सुमेधा मुनिसत्तमः ।

ददौ मन्त्रं शुभं ताभ्यां ध्यानबीजपुरःसरम् ॥

तौ च प्राप्य मुनेर्मन्त्रं सम्मन्त्र्य गुरुदैवतौ ।

जग्मतुर्वैश्यराजानौ नदीतीरमनुत्तमम् ॥

एकान्ते विजने स्थाने कृत्वासनपरिग्रहम् ।

उपविष्टौ स्थिरप्रज्ञौ तावतीव कृशोदरौ ॥

मन्त्रजाप्यरत शान्तौ चरित्रत्रयपाठकौ ।

निन्यतुर्मासमेकं तु तत्र ध्यानपरायणौ ॥

तयोर्मासव्रतेनैव जाता प्रीतिरनुत्तमा ।

पादाम्बुजे भवान्यास्तु स्थिरा बुद्धिस्तथाप्यलम् ॥

कदाचित्पादयोर्गत्वा मुनेस्तस्य महात्मनः ।

कृतप्रणामावागत्य तस्थतुश्च कुशासने ॥

नान्यकार्यपरौ क्वापि बभूवतुः कदाचन ।

देवीध्यानपरौ नित्यं जपमन्त्ररतौ सदा ॥

एवं जाते तदा पूर्णे तत्र संवत्सरे नृप ।

बभूवतुः फलाहारं त्यक्त्वा पर्णाशनौ नृप ॥

वर्षमेकं तपस्तत्र चक्रतुर्वैश्यपार्थिव ।

शुष्कपर्णाशनौ दान्तौ जपध्यानपरायणौ ॥

पूर्णे वर्षद्वये जाते कदाचिद्दर्शनञ्च तौ ।

प्रापतुः स्वप्नमध्ये तु भगवत्या मनोहरम् ॥

रक्ताम्बरधरां देवीं चारुभूषणभूषिताम् ।

कदाचिन्नृपतिः स्वप्नेऽप्यपश्यज्जगदम्बिकाम् ॥

अब अत्यन्त कठोर तपस्या करके हम दोनों ११ सुख प्रदान करनेवाली जगदम्बाका आराधन करके उनका दर्शन प्राप्तकर अपने - अपने घरोंको वापस जायँगे ॥ ११ ॥

१२ आपके मुखसे देवीका नवाक्षरमन्त्र ग्रहण करके हम दोनों निराहार रहकर व्रत करेंगे और उस मन्त्रका जप करेंगे ॥१२ ॥

व्यासजी बोले- इस प्रकार उन दोनोंके आग्रह १३ करनेपर मुनिश्रेष्ठ सुमेधाने उन्हें ध्यान- बीजसहित देवीका मंगलकारी नवाक्षरमन्त्र प्रदान किया ॥ १३ ॥

वे दोनों वैश्य और राजा मुनिसे मन्त्र और उसके १४ ऋषि, छंद, देवताका ज्ञान प्राप्त करके तथा उनसे आज्ञा लेकर नदी अत्युत्तम तटपर चले गये ॥ १४ ॥

अत्यन्त कृशकाय वे दोनों एकान्तमें निर्जन १५ स्थानपर आसन लगाकर स्थिरचित्त होकर बैठ गये ॥ १५ ॥

१६ उन दोनोंने शान्तचित्त तथा ध्यानपरायण होकर मन्त्रजप और भगवतीके तीनों चरित्रोंका पाठ करते हुए एक मासका समय व्यतीत कर दिया ॥ १६ ॥

१७ उनके एक मासके व्रतसे ही उनमें भगवती भवानीके चरणकमलमें उत्तम प्रीति उत्पन्न हो गयी और उनकी बुद्धि स्थिर हो गयी ॥ १७ ॥

१८ वे दोनों नित्य जाकर एक बार महात्मा [ सुमेधा ] मुनिके चरणों में प्रणाम करते थे और वहाँसे लौटकर फिर अपने कुशासनपर बैठ जाते थे । दोनों अन्य १ ९ कोई भी कार्य नहीं करते थे और सदैव देवीके ध्यान तथा मन्त्रजपमें संलग्न रहते थे ॥ १८-१९ ॥ हे राजन्! इस प्रकार एक वर्ष पूर्ण होनेपर वे २० फलाहारका त्याग करके पत्तेके आहारपर रहने लगे । हे नृप! उन दोनों --- - वैश्य और राजाने एक वर्षतक २१ सूखे पत्ते खाकर इन्द्रियोंको वशमें करके जप और ध्यानमें रत रहते हुए तप किया ॥ २० - २१ ॥ इस प्रकार दो वर्ष व्यतीत होनेपर उन दोनों को २२ किसी समय स्वप्नमें भगवतीका मनोहारी दर्शन प्राप्त हुआ । राजाने स्वप्न में देवी जगदम्बिकाको लाल वस्त्र धारण किये हुए तथा सुन्दर आभूषणोंसे अलंकृत २३ | देखा ॥ २२-२३ ॥

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७२० वीक्ष्य स्वप्ने च तौ देवीं प्रीतियुक्तौ बभूवतुः जलाहारैस्तृतीये तु स्थितौ संवत्सरे तु तौ ॥ एवं वर्षत्रयं कृत्वा ततस्तौ वैश्यपार्थिवौ । चक्रतुस्तौ तदा चिन्तां चित्ते दर्शनलालसौ

प्रत्यक्षं दर्शनं देव्या न प्राप्तं शान्तिदं नृणाम् ।

देहत्यागं करिष्यावो दुःखितौ भृशमातुरौ ॥

इति सञ्चिन्त्य मनसा राजा कुण्डं चकार ह । त्रिकोणं सुस्थिरं सौम्यं हस्तमात्रप्रमाणतः संस्थाप्य पावकं राजा तथा वैश्योऽतिभक्तिमान् । जुहावासौ निजं मांसं छित्त्वा छित्त्वा पुनः पुनः तथा वैश्योऽपि दीप्तेऽग्नौ स्वमांसं प्राक्षिपत्तदा । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३५ । स्वप्न में देवीका दर्शन प्राप्तकर दोनों प्रेमभावसे २४ परिपूर्ण हो गये । अब वे दोनों तीसरे वर्षमें मात्र जलके आहारपर रहने लगे ॥ २४ ॥

इस प्रकार तीन वर्षतक तपस्या करनेके पश्चात् ॥ २५ वे दोनों - राजा और वैश्य मनमें देवीके साक्षात् दर्शनकी लालसासे चिन्तित हो उठे ॥ २५ ॥

अत्यन्त दुःखी तथा व्याकुल होकर उन दोनोंने २६ निश्चय किया कि मनुष्योंको शान्ति प्रदान करनेवाली देवीका प्रत्यक्ष दर्शन नहीं प्राप्त हुआ, अतः अब हम शरीरका त्याग कर देंगे ॥ २६ ॥

॥ २७ ऐसा मनमें विचारकर राजाने एक हाथ प्रमाणका त्रिभुजाकार, सुन्दर तथा सुस्थिर अग्निकुण्ड ॥ २८ बनाया । उसमें अग्निकी स्थापना करके राजा अपना मांस काट - काटकर बार - बार हवन करने लगे । साथ ही अत्यन्त भक्तिमान् वह वैश्य भी प्रदीप्त अग्निमें रुधिरेण बलिं चास्यै ददतुस्तौ कृतोद्यमौ ॥ २ ९ अपना मांस डालने लगा । तत्पश्चात् वे दोनों जब तदा भगवती दत्त्वा प्रत्यक्षं दर्शनं तयोः । प्राह प्रीतिभरोद्भ्रान्तौ दृष्ट्वा तौ दुःखितौ भृशम् देव्युवाच

वरं वरय भो राजन् यत्ते मनसि वाञ्छितम् ।

तुष्टाहं तपसा तेऽद्य भक्तोऽसि त्वं मतो मम ॥

वैश्यं प्राह तदा देवी प्रसन्नाहं महामते ।

किं तेऽभीष्टं ददाम्यद्य प्रार्थयाशु मनोगतम् ॥

व्यास उवाच

तच्छ्रुत्वा वचनं राजा तामुवाच मुदान्वितः ।

देहि मेऽद्य निजं राज्यं हतशत्रुबलं बलात् ॥

तमुवाच तदा देवी गच्छ राजन् निजं गृहम् ।

शत्रवः क्षीणसत्त्वास्ते गमिष्यन्ति पराजिताः ॥

मन्त्रिणस्ते समागम्य ते पतिष्यन्ति पादयोः ।

कुरु राज्यं महाभाग नगरे स्वं यथासुखम् ॥

अपने रुधिरसे इन देवीको बलि देनेके लिये उद्यत हुए तब भगवती उन दोनोंको प्रेम - भक्तिमें तन्मय और ॥ ३० अत्यन्त दुःखी देखकर उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन देकर उनसे कहने लगीं - ॥ २७–३० ॥ देवी बोलीं- हे राजन्! अपना मनोभिलषित वर माँगो, मैं आज तुम्हारी तपस्यासे सन्तुष्ट हूँ । अब ३१ मैंने समझ लिया कि तुम मेरे भक्त हो । उसके बाद देवीने वैश्यसे कहा – हे महामते! मैं प्रसन्न हूँ । ३२ तुम्हारा अभीष्ट क्या है? तुम्हारे मनमें जो भी हो माँग लो, मैं उसे दूँगी ॥ ३१-३२ ॥ व्यासजी बोले — उनके इस वचनको सुनकर प्रसन्न मनवाले राजाने उनसे कहा कि बलपूर्वक मैं ३३ शत्रुओंका नाशकर अपना राज्य प्राप्त करूँ – मुझे आज यह वरदान दीजिये ॥ ३३ ॥

तब देवीने उनसे कहा- हे राजन्! अपने घरको ३४ जाओ, तुम्हारे शत्रु शीघ्र ही क्षीण बलवाले होकर पराजित हो जायँगे । हे महाभाग! तुम्हारे मन्त्रिगण आकर तुम्हारे पैरोंपर गिरेंगे । अब आप अपने नगरमें ३५ सुखपूर्वक राज्य करें । हे राजन्! अपने विस्तृत

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अ ० ३५ ] पञ्चम स्कन्ध ७२१

कृत्वा राज्यं सुविपुलं वर्षाणामयुतं नृप ।

देहान्ते जन्म सम्प्राप्य सूर्याच्च भविता मनुः ॥

व्यास उवाच

वैश्यस्तामप्युवाचेदं कृताञ्जलिपुट: शुचिः ।

न मे गृहेण कार्यं वै न पुत्रेण धनेन वा ॥

सर्वं बन्धकरं मातः स्वप्नवन्नश्वरं स्फुटम् ।

ज्ञानं मे देहि विशदं मोक्षदं बन्धनाशनम् ॥

असारेऽस्मिंश्च संसारे मूढा मज्जन्ति पामराः ।

पण्डिताः सन्तरन्तीह तस्मान्नेच्छन्ति संसृतिम् ॥

व्यास उवाच

तदाकर्ण्य महामाया वैश्यं प्राह पुरः स्थितम् ।

वैश्यवर्य तव ज्ञानं भविष्यति न संशयः ॥

इति दत्त्वा वरं ताभ्यां तत्रैवान्तरधीयत ।

अदर्शनं गतायां तु राजा तं मुनिसत्तमम् ॥

प्रणम्य हयमारुह्य गमनाय मनो दधे ।

तदैव तस्य सचिवास्तत्रागत्य नृपं प्रजाः ॥

प्रणेमुर्विनयोपेतास्तमूचुः प्राञ्जलिस्थिताः ।

राजंस्ते शत्रवः सर्वे पापाच्च निहता रणे ॥

राज्यं निष्कण्टकं भूप कुरुष्व पुरमास्थितः ।

तच्छ्रुत्वा वचनं राजा नत्वा तं मुनिसत्तमम् ॥

आपृच्छ्य निर्ययौ तत्र मन्त्रिभिः परिवारितः ।

सम्प्राप्य च निजं राज्यं दारान्स्वजनबान्धवान् ॥

बुभुजे पृथिवीं सर्वां ततः सागरमेखलाम् ।

वैश्योऽपि ज्ञानमासाद्य मुक्तसङ्गः समन्ततः ॥

कालातिवाहनं तत्र मुक्तबन्धश्चकार ह ।

तीर्थेषु विचरन्गायन्भगवत्या गुणानथ ॥

एतत्ते कथितं देव्याश्चरितं परमाद्भुतम् ।

आराधनफलप्राप्तिर्यथावद्भूपवैश्ययोः ॥

दैत्यानां हननं प्रोक्तं प्रादुर्भावस्तथा शुभः ।

एवंप्रभावा सा देवी भक्तानामभयप्रदा ॥

साम्राज्यका दस हजार वर्षोंतक शासन करके देहत्यागके ३६ बाद सूर्यसे जन्म प्राप्त करके तुम [ सावर्णि ] मनु होओगे ॥ ३४-३६ ॥ व्यासजी बोले – शुद्धहृदय वैश्यने हाथ जोड़कर कहा- अब मुझे न घरकी आवश्यकता है, न धनकी ३७ और न पुत्रकी ही । हे माता! ये सभी बन्धनमें डालनेवाले और स्वप्नकी भाँति नश्वर हैं, अतः आप मुझे बन्धनका नाश करनेवाला और मोक्ष देनेवाला ३८ दिव्य ज्ञान प्रदान करें । इस असार संसारमें अज्ञानी डूब जाते हैं और ज्ञानी पार उतर जाते हैं, इसलिये ३ ९ वे संसारकी इच्छा नहीं करते । ३७ - ३ ९ ॥ व्यासजी बोले- तब अपने समक्ष खड़े वैश्यकी बात सुनकर देवी महामायाने कहा- हे वैश्य श्रेष्ठ! तुम्हें ज्ञान प्राप्त होगा, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ४० ॥

४० इस प्रकार उन दोनोंको वरदान देकर देवी वहीं अन्तर्धान हो गयीं । तब भगवतीके अन्तर्धान हो जानेपर राजा सुरथने उन मुनिश्रेष्ठको प्रणाम करके घोड़ेपर ४१ चढ़कर चलनेका निश्चय किया, तभी उनके प्रजाजनों और मन्त्रिगणोंने वहाँ आकर प्रणाम किया; वे हाथ ४२ जोड़कर खड़े हो गये तथा विनम्र होकर राजासे कहने लगे - हे राजन्! आपके शत्रुगण अपने पापके कारण युद्धमें मारे गये । हे भूप! अब आप अपने नगरमें निवास ४३ करके निष्कण्टक राज्य कीजिये ॥ ४१-४३३ ॥ उनकी बात सुनकर राजा मुनिश्रेष्ठको प्रणाम ४४ करके उनसे आज्ञा लेकर मन्त्रियोंके साथ चल दिये । वे अपने राज्य, स्त्री और बन्धु - बान्धवोंको पाकर समुद्रपर्यन्त सम्पूर्ण पृथ्वीका राज्य भोगने ४५ लगे ॥ ४४-४५३ ॥ वैश्य भी ज्ञान प्राप्त करके सर्वथा आसक्तिरहित ४६ और बन्धनसे मुक्त होकर तीर्थोंमें भ्रमण करता हुआ तथा भगवतीके गुणोंका गान करता हुआ समय व्यतीत करने लगा ॥ ४६-४७ ॥ ४७ इस प्रकार देवीकी परम अद्भुत लीला तथा राजा और वैश्यद्वारा की गयी उनकी आराधना एवं फलप्राप्तिको मैंने यथार्थ रूपसे आपसे कहा । देवीके शुभ आविर्भाव ४८ और उनके द्वारा दैत्योंके विनाशकी कथा भी मैंने आपसे कही । भक्तोंको अभय प्रदान करनेवाली वे ४ ९ भगवती ऐसे प्रभाववाली हैं! ॥ ४८-४९ ॥