देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 751–760

देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 751–760

पृष्ठ 751

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 751 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

७४२ गृहीतं देवसदनं तेन देव बलीयसा किं कर्तव्यमतः शम्भो ब्रूहि सत्यं शिवाद्य नः किं कुर्मः क्व च गच्छामः स्थानभ्रष्टा महेश्वर दुःखस्य नाधिगच्छामो विनाशोपायमीश्वर साहाय्यं कुरु भूतेश व्यथिताः स्म कृपानिधे वृत्रं जहि मदोत्सिक्तं वरदानबलाद्विभो शिव उवाच

ब्रह्माणं पुरतः कृत्वा वयं सर्वे हरेः क्षयम् ।

गत्वा समेत्य तं विष्णुं चिन्तयामो वधोद्यमम् ॥

स शक्तश्च छलज्ञश्च बलवान्बुद्धिमत्तरः । शरण्यश्च दयाब्धिश्च वासुदेवो जनार्दनः

विना तं देवदेवेशं नार्थसिद्धिर्भविष्यति ।

तस्मात्तत्र च गन्तव्यं सर्वकार्यार्थसिद्धये ॥

व्यास उवाच

इति सञ्चिन्त्य ते सर्वे ब्रह्मा शक्रः सशङ्करः ।

जग्मुर्विष्णोः क्षयं देवाः शरण्यं भक्तवत्सलम् ॥

गत्वा विष्णुपदं देवास्तुष्टुवुः परमेश्वरम् । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४ । हे देव! उस महाबलीने देवलोकपर अधिकार ॥ ५२ कर लिया है । हे शम्भो! हे शिव! अब हमें क्या करना चाहिये, आप हमें सही - सही बताइये ॥ ५२ ॥

। हे महेश्वर! हम राज्यभ्रष्ट क्या करें और कहाँ ॥ ५३ जायँ? हे ईश्वर! हम इस दुःखके विनाशके लिये कोई भी उपाय नहीं जान पा रहे हैं ॥ ५३ ॥

। हे भूतेश! हमारी सहायता कीजिये । हे कृपानिधान! ॥५४ हम सब बहुत दुःखी हैं । हे विभो! वरदानके प्रभावसे मदोन्मत्त वृत्रासुरका वध कीजिये ॥ ५४ ॥

शिवजी बोले- ब्रह्माजीको आगे करके हमलोग विष्णुलोक चल करके वहाँ उन श्रीहरिके पास जाकर ५५ उस वृत्रासुरके वधके उपायपर विचार करेंगे ॥ ५५ ॥

वे जनार्दन भगवान् विष्णु शक्तिशाली, छलकार्यमें निपुण, बलवान्, सबसे बुद्धिमान्, शरणदाता और ॥ ५६ दयाके सागर हैं ॥ ५६ ॥

उन देवदेवेशके बिना हमारा प्रयोजन सिद्ध नहीं ५७ होगा, इसलिये सभी कार्योंकी सिद्धिके लिये हमें वहीं चलना चाहिये ॥ ५७ ॥

व्यासजी बोले- ऐसा विचारकर ब्रह्मा, शिव तथा इन्द्र आदि सभी देवता शरणदाता और भक्तवत्सल ५८ भगवान् विष्णुके लोक गये ॥ ५८ ॥

वैकुण्ठधाममें पहुँचकर वे देवता वेदोक्त पुरुषसूक्तसे उन परमेश्वर जगद्गुरु श्रीहरिकी स्तुति हरिं पुरुषसूक्तेन वेदोक्तेन जगद्गुरुम् ॥५ ९ करने लगे ॥५ ९ ॥

प्रत्यक्षोऽभूज्जगन्नाथस्तेषां स कमलापतिः ।

सम्मान्य च सुरान्सर्वानित्युवाच पुरः स्थितः ॥

किमागताः स्म लोकेशा हरब्रह्मसमन्विताः ।

कारणं कथयध्वं वः सर्वेषां सुरसत्तमाः ॥

व्यास उवाच

इति श्रुत्वा हरेर्वाक्यं नोचुर्देवा रमापतिम् ।

चिन्ताविष्टाः स्थिताः प्रायः सर्वे प्राञ्जलयस्तथा ॥

तब भगवान् जगन्नाथ कमलापति विष्णु उनके सम्मुख उपस्थित हो गये और सभी देवताओंका ६० सम्मान करके उनसे बोले- ॥ ६० ॥

हे लोकपालगण! आपलोग ब्रह्मा और शिवजीके साथ यहाँ क्यों आये हैं? हे श्रेष्ठ देवताओ! आप ६१ सभी अपने आगमनका कारण बतायें ॥ ६१ ॥

व्यासजी बोले – भगवान् विष्णुका यह वचन सुनकर भी देवगण उन रमापतिसे कुछ बोल न सके और वे चिन्तातुर होकर हाथ जोड़े खड़े ६२ | ही रहे ॥ ६२ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे ब्रह्मनेतृत्वे सेन्द्रैः सुरैर्विष्णोः शरणगमनवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

पृष्ठ 752

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 752 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ५ ] षष्ठ स्कन्ध ७४३ अथ पञ्चमोऽध्यायः भगवान् विष्णुकी प्रेरणासे देवताओंका भगवतीकी स्तुति करना और प्रसन्न होकर व्यास उवाच

तथा चिन्तातुरान्वीक्ष्य सर्वान्सर्वार्थतत्त्ववित् ।

प्राह प्रेमभरोद्भ्रान्तान्माधवो मेदिनीपते ॥

विष्णुरुवाच

किं मौनमाश्रिता यूयं ब्रुवन्तु कारणं सुराः ।

सदसद्वापि यच्छ्रुत्वा यतिष्ये तन्निवारणे ॥

देवा ऊचुः

किमज्ञातं तव विभो त्रिषु लोकेषु वर्तते ।

सर्वं वेद भवान्कार्यं किं पृच्छसि पुनः पुनः ॥

त्वया पूर्वं बलिर्बद्धः शक्रो देवाधिपः कृतः ।

वामनं वपुरास्थाय क्रान्तं त्रिभुवनं पदैः ॥

अमृतं त्वाहृतं विष्णो दैत्याश्च विनिपातिताः ।

त्वं प्रभुः सर्वदेवानां सर्वापद्विनिवारणे ॥

विष्णुरुवाच

न भेतव्यं सुरवरा वेद्ययुपायं सुसम्मतम् ।

तद्बधाय प्रवक्ष्यामि येन सौख्यं भविष्यति ॥

अवश्यं करणीयं मे भवतां हितमात्मना ।

बुद्ध्या बलेन चार्थेन येन केनच्छलेन वा ॥

उपायाः खलु चत्वारः कथितास्तत्त्वदर्शिभिः ।

सामादयः सुहृत्स्वेव दुर्हृदेषु विशेषतः ॥

ब्रह्मणास्य वरो दत्तस्तपसाराधितेन च ।

दुर्जयत्वं च सम्प्राप्तं वरदानप्रभावतः ॥

भगवतीका वरदान देना व्यासजी बोले – हे राजन्! तब सभी तत्त्वोंके ज्ञाता माधव भगवान् विष्णु समस्त देवताओंको चिन्तासे व्याकुल तथा अत्यन्त प्रेमविह्वल देखकर कहने लगे ॥१ ॥

विष्णु बोले - हे देवगण! आप सबने मौन धारण क्यों कर रखा है? आप सब अपने दुःखका सत् - असत् जो भी कारण हो बतायें, जिसे सुनकर मैं २ उसे दूर करनेका उपाय करूँगा ॥२ ॥

देवता बोले- हे विभो! तीनों लोकोंमें कौन-सी वस्तु आपसे अज्ञात है, आप हमारा सारा कार्य [ भली प्रकारसे ] जानते हैं; तो क्यों बार - बार पूछ ३ रहे हैं? ॥ ३ ॥

पूर्वकालमें आपने बलिको बाँध लिया था और इन्द्रको देवताओंका राजा बनाया था; आपने वामन-४ शरीर धारणकर तीनों लोकोंको अपने चरणोंसे नाप लिया था ॥ ४ ॥

हे विष्णो! आपने ही अमृत छीनकर दैत्योंका ५ नाश किया था; आप सभी देवताओंकी समस्त विपत्तियोंको दूर करनेमें समर्थ हैं ॥ ५ ॥

विष्णु बोले - हे श्रेष्ठ देवताओ! आपलोग भयभीत न हों । मैं उस वृत्रासुरके वधका सुसंगत उपाय जानता हूँ, उसे मैं बताऊँगा, जिससे ६ आपलोगोंको सुख होगा ॥६ ॥

अपनी बुद्धिसे, बलसे, धनसे या जिस किसी भी उपायसे मुझे आपलोगोंका हित अवश्य करना ७ है ॥७ ॥

मित्रों और विशेषरूपसे शत्रुओंके प्रति [ प्रयोगहेतु ] तत्त्वदर्शियोंने साम, दान, दण्ड, भेद - ये चार उपाय ८ बताये हैं ॥ ८ ॥

वृत्रासुरकी तपस्यासे प्रसन्न होकर ब्रह्माजीने इसे वरदान दिया है और उस वरदानके प्रभावसे ९ । यह दुर्जय हो गया है ॥ ९ ॥

पृष्ठ 753

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 753 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

७४४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ०५

अजेयः सर्वभूतानां त्वष्ट्रा समुपपादितः ।

ततो बलेन वृद्धिं स प्राप्तः परपुरञ्जयः ॥

दुःसाध्योऽसौ सुराः शत्रुर्विना सामप्रतारणम् ।

प्रलोभ्य वशमानेयो हन्तव्यस्तु ततः परम् ॥

गच्छध्वं सर्वगन्धर्वा यत्रास्ति बलवत्तरः ।

साम तस्य प्रयुञ्जध्वं तत एनं विजेष्यथ ॥

सङ्गम्य शपथान्कृत्वा विश्वास्य समयेन हि ।

मित्रत्वं च समाधाय हन्तव्यः प्रबलो रिपुः ॥

अदृश्यः सम्प्रवेक्ष्यामि वज्रमस्य वरायुधम् ।

साहाय्यं च करिष्यामि शक्रस्याहं सुरोत्तमाः ॥

समयं च प्रतीक्षध्वं सर्वथैवायुषः क्षये ।

मरणं विबुधास्तस्य नान्यथा सम्भविष्यति ॥

गच्छध्वमृषिभिः सार्धं गन्धर्वाः कपटावृताः ।

इन्द्रेण सह मित्रत्वं कुरुध्वं वाक्यदानतः ॥

यथा स याति विश्वासं तथा कार्यं प्रतारणम् ।

गुप्तोऽहं सम्प्रवक्ष्यामि पविं सञ्छादितं दृढम् ॥

विश्वस्तं मघवा शत्रुं हनिष्यति न चान्यथा ।

विश्वासस्य कृते पापं कृत्वा शक्रस्तु पृष्ठतः ॥

मत्सहायोऽथ वज्रेण शातयिष्यति पापिनम् ।

न दोषोऽत्र शठे शत्रौ शाठ्यमेव प्रकुर्वतः ॥

नान्यथा बलवान्वध्यः शूरधर्मेण जायते ।

वामनं रूपमाधाय मयायं वञ्चितो बलिः ॥

कृत्वा च मोहिनीवेषं दैत्याः सर्वेऽपि वञ्चिताः ।

भवन्तः सहिताः सर्वे देवीं भगवतीं शिवाम् ॥

त्वष्टाके द्वारा उत्पन्न किया गया यह वृत्रासुर समस्त प्राणियोंके लिये अजेय हो गया है । शत्रुओंके १० राज्यको जीत लेनेवाला वह अपनी शक्तिसे अधिक प्रबल हो गया है ॥ १० ॥

हे देवताओ! बिना सामनीतिके प्रयोगके वह ११ वृत्रासुर देवताओंके लिये दुःसाध्य है, अतः पहले इसे प्रलोभन देकर वशमें करना चाहिये, तत्पश्चात् मार डालना चाहिये ॥ ११ ॥

१२ हे गन्धर्वगण! जहाँ वह बलवान् वृत्रासुर रहता है, वहाँ तुमलोग जाओ और उसपर सामनीतिका प्रयोग करो; तभी उसपर विजय प्राप्त कर सकोगे ॥ १२ ॥

१३ वहाँ जाकर अनेक शपथें खाकर सन्धिके द्वारा उसे विश्वासमें ले करके और पुनः मित्रताकर बादमें उस प्रबल शत्रुको मार डालना चाहिये ॥ १३ ॥

१४ हे श्रेष्ठ देवगण! मैं अदृश्य रूपमें इन्द्रके श्रेष्ठ आयुध वज्रमें प्रवेश कर जाऊँगा और उनकी सहायता करूँगा ॥१४ ॥

१५ हे देवताओ! अब आपलोग समयकी प्रतीक्षा करें, वृत्रासुरकी आयुके क्षीण होनेपर ही उसकी मृत्यु होगी, अन्य किसी भी प्रकारसे नहीं ॥ १५ ॥

१६ गन्धर्वगण! तुमलोग वेष बदलकर ऋषियोंके साथ उसके पास जाओ और वचनबद्धतापूर्वक इन्द्रके साथ उसकी मित्रता करा दो ॥ १६ ॥

जिस प्रकारसे उसका विश्वास दृढ़ हो जाय, १७ वैसा ही आप सबको करना चाहिये । मैं सुदृढ़ तथा आवरणयुक्त वज्रमें गुप्तरूपसे प्रवेश कर जाऊँगा ॥ १७ ॥

जब वृत्रासुरको पूर्ण विश्वास हो जाय तभी इन्द्र १८ उस शत्रुका वध करेंगे । उसके वधका अन्य कोई उपाय नहीं है । वे इन्द्र विश्वासघात करके मेरी सहायतासे वज्रद्वारा पीछेसे उस पापीको मार डालेंगे । १ ९ इस दुष्ट शत्रुके साथ शठता करनेमें दोष नहीं है । अन्यथा वह बलवान् वीरधर्मसे नहीं मारा जा सकेगा । पूर्वकालमें मैंने भी वामनरूप धारणकर बलिको २० वंचित किया था और मोहिनीरूप धारणकर सभी दैत्यों को छला था ॥ १८ – २०३ ॥ हे देवताओ! अब आप सब लोग एक साथ २१ देवी भगवती शिवाकी शरणमें जायँ और भावपूर्वक

पृष्ठ 754

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 754 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ५ ]

गच्छध्वं शरणं भावैः स्तोत्रमन्त्रैः सुरोत्तमाः ।

साहाय्यं सा योगमाया भवतां संविधास्यति ॥

वन्दामहे सदा देवीं सात्त्विकीं प्रकृतिं पराम् ।

सिद्धिदां कामदां कामां दुरापामकृतात्मभिः ॥

इन्द्रोऽपि तां समाराध्य हनिष्यति रिपुं रणे ।

मोहिनी सा महामाया मोहयिष्यति दानवम् ॥

मोहितो मायया वृत्रः सुखसाध्यो भविष्यति ।

प्रसन्नायां पराम्बायां सर्वं साध्यं भविष्यति ॥

नोचेन्मनोरथावाप्तिर्न कस्यापि भविष्यति ।

अन्तर्यामिस्वरूपा सा सर्वकारणकारणा ॥

तस्मात्तां विश्वजननीं प्रकृतिं परमादृताः ।

भजध्वं सात्त्विकैर्भावैः शत्रुनाशाय सत्तमाः ॥

पुरा मयापि संग्रामं कृत्वा परमदारुणम् ।

पञ्चवर्षसहस्राणि निहतौ मधुकैटभौ ॥

स्तुता मया तदात्यर्थं प्रसन्ना प्रकृतिः परा ।

मोहितौ तौ तदा दैत्यौ छलेन च मया हतौ ॥

विप्रलब्धौ महाबाहू दानवौ मदगर्वितौ ।

तथा कुरुध्वं प्रकृतेर्भजनं भावसंयुताः ॥

सर्वथा कार्यसिद्धिं सा करिष्यति सुरोत्तमाः ।

एवं ते दत्तमतयो विष्णुना प्रभविष्णुना ॥

जग्मुस्ते मेरुशिखरं मन्दारद्रुममण्डितम् । एकान्ते संस्थिता देवाः कृत्वा ध्यानं जपं तपः ।

तुष्टुवुर्जगतां धात्रीं सृष्टिसंहारकारिणीम् ।

भक्तकामदुघामम्बां संसारक्लेशनाशिनीम् ॥

देवा ऊचुः देवि प्रसीद परिपाहि सुरान्प्रतप्तान् वृत्रासुरेण समरे परिपीडितांश्च । दीनार्तिनाशनपरे परमार्थतत्त्वे प्राप्तांस्त्वदङ्घ्रिकमलं शरणं सदैव ॥ षष्ठ स्कन्ध ७४५ स्तोत्रों और मन्त्रोंसे उनकी स्तुति करें । वे भगवती २२ योगमाया आपलोगोंकी सहायता करेंगी ॥ २१-२२ ॥ हम सभी उन सात्त्विकी, परा प्रकृति, सिद्धिदात्री, कामनास्वरूपिणी, भक्तोंकी कामना पूर्ण करनेवाली २३ | और दुराचारियोंके लिये दुर्लभ देवीकी सदा वन्दना करते हैं ॥२३ ॥

इन्द्र भी उनकी आराधना करके युद्धमें २४ शत्रुको मार डालेंगे । वे मोहिनी महामाया उस दानव वृत्रासुरको मोहित कर देंगी । तब मायासे मोहित २५ वृत्रासुर सुगमतापूर्वक मारा जा सकेगा । उन पराम्बाके प्रसन्न होनेपर सब कुछ साध्य हो जायगा । अन्यथा किसीकी भी कामनाकी पूर्ति नहीं होगी । वे भगवती २६ सबकी अन्तर्यामिस्वरूपिणी और सभी कारणोंकी भी कारण हैं । इसलिये हे श्रेष्ठ देवगण! शत्रुके विनाशके लिये सात्त्विक भावोंसे युक्त होकर उन २७ प्रकृतिस्वरूपा जगज्जननीका परम आदरपूर्वक भजन कीजिये ॥ २४ – २७ ॥ २८ पूर्वकालमें मैंने भी पाँच हजार वर्षोंतक अत्यन्त भीषण युद्ध करके मधु - कैटभका वध किया था । उस समय मैंने उन पराप्रकृतिकी स्तुति की थी, तब वे अत्यन्त २ ९ प्रसन्न हो गयी थीं । तत्पश्चात् उनके द्वारा मोहित दोनों दैत्योंको मैंने छलपूर्वक मार डाला था । मोहित किये गये विशाल भुजाओंवाले वे दोनों दानव अत्यन्त मदोन्मत्त ३० थे । इसीलिये आपलोग भी उसी प्रकार भावपूर्वक उन पराप्रकृतिका भजन कीजिये । हे देवगण! वे सब प्रकारसे कार्यकी सिद्धि करेंगी ॥ २८-३०३ ॥ ३१ इस प्रकार भगवान् विष्णुसे परामर्श प्राप्त करके वे मन्दार वृक्षोंसे सुशोभित सुमेरुपर्वतके शिखरपर ३२ चले गये । वे देवता वहाँ एकान्तमें बैठकर ध्यान, जप और तप करके जगत्का सृजन - पालन - संहार करनेवाली, भक्तोंके लिये कामधेनुस्वरूपा एवं संसारके ३३ क्लेशोंका नाश करनेवाली पराम्बा भगवतीकी इस प्रकार स्तुति करने लगे ॥ ३१–३३ ॥ देवता बोले - हे देवि! हे दीनोंके कष्ट दूर करनेवाली! हे परमार्थतत्त्वस्वरूपिणि! हमपर प्रसन्न हों, वृत्रासुरके द्वारा सताये गये, युद्धमें अत्यन्त पीड़ित किये गये तथा आपके चरणकमलकी शरण में सदासे ३४ । पड़े हुए हम देवताओंकी रक्षा कीजिये ॥ ३४ ॥

पृष्ठ 755

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 755 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

७४६ त्वं सर्वविश्वजननी परिपालयास्मान् पुत्रानिवातिपतितान् रिपुसङ्कटेऽस्मिन् मातर्न तेऽस्त्यविदितं भुवनत्रयेऽपि कस्मादुपेक्ष सुरानसुरप्रतप्तान् त्रैलोक्यमेतदखिलं विहितं त्वयैव ब्रह्मा हरिः पशुपतिस्तव वासनोत्थाः कुर्वन्ति कार्यमखिलं स्ववशा न ते ते श्रीमद्देवीभागवत [ अ ०५ हे माता! आप समस्त विश्वकी जननी हैं, । शत्रुद्वारा उपस्थित किये गये इस संकटमें पड़े हुए हम सबका आप पुत्रोंके समान परिपालन कीजिये । आपसे तीनों लोकोंमें कुछ भी अज्ञात नहीं है, तो आप ॥ ३५ असुरोंके द्वारा पीड़ित देवताओंकी उपेक्षा क्यों कर रही हैं? ॥ ३५ ॥

आपने ही इस सम्पूर्ण त्रिलोकीकी रचना की है ॥ ब्रह्मा, विष्णु और शिव आपके ही संकल्पसे उत्पन्न हुए हैं । आपके भृकुटि - विलासमात्र से वे [ सृजन, पालन तथा संहार ] समस्त कार्य करते हैं और यथेच्छ भ्रूभङ्गचालनवशाद्विहरन्ति कामम् ॥ ३६ विहार करते हैं; वे भी स्वतन्त्र नहीं हैं ॥ ३६ ॥

माता सुतान्परिभवात्परिपाति दीनान्

रीतिस्त्वयैव रचिता प्रकटापराधान् ।

कस्मान्न पालयसि देवि विनापराधा-नस्मांस्त्वदङ्घ्रिशरणान्करुणारसाब्धे ॥

नूनं मदङ्घ्रिभजनाप्तपदाः किलैते भक्तिं विहाय विभवे सुखभोगलुब्धाः । नेमे कटाक्षविषया इति चेन्न चैषा रीतिः सुते जननकर्तरि चापि दृष्टा ॥ दोषो न नोऽत्र जननि प्रतिभाति चित्ते

यत्ते विहाय भजनं विभवे निमग्नाः ।

मोहस्त्वया विरचितः प्रभवत्यसौ न-स्तस्मात्स्वभावकरुणे दयसे कथं न ॥

पूर्वं त्वया जननि दैत्यपतिर्बलिष्ठो व्यापादितो महिषरूपधरः किलाजौ । अस्मत्कृते सकललोक भयावहो ऽसौ वृत्रं कथं न भयदं विधुनोषि मातः ॥ हे देवि! माता प्रत्यक्ष अपराधवाले अपने दुःखी पुत्रोंकी भी कष्टसे सब प्रकारसे रक्षा करती है - यह रीति आपके ही द्वारा निर्मित है; तब हे करुणरसकी समुद्रस्वरूपिणि! आप अपने चरणोंकी शरणमें पड़े हुए हम निरपराध देवताओंका पालन क्यों ३७ नहीं कर रही हैं? ॥ ३७ ॥

हे जननि! यदि आप सोचती हों कि मेरे चरणकमलोंकी आराधनासे राज्य प्राप्त करके देवता मेरी भक्ति छोड़कर वैभव - सुखोंके भोगमें आसक्त हो जायँगे और इन्हें मेरे कृपाकटाक्षकी आवश्यकता नहीं रह जायगी तो ऐसा सामान्यतः होता ही है, फिर भी जन्म देनेवाली माता अपने ३८ पुत्रके प्रति ऐसी भावना रखे - यह रीति कहीं देखी नहीं गयी ॥ ३८ ॥

हे जननि! आपका भजन त्यागकर हमलोग जो भोगमें निमग्न हैं - इसमें हमारे चित्तमें अपना दोष नहीं प्रतीत होता; क्योंकि मोहकी रचना आपने ही की है और वह हमलोगोंको मोहित कर देता है । ऐसी ३ ९ परिस्थितिमें हे करुणामय स्वभाववाली! आप हमपर दया क्यों नहीं करतीं? ॥ ३ ९ ॥ हे जननि! पूर्वकालमें आपने हमलोगोंके कल्याणार्थ सभीके लिये भयकारी महिषरूप धारण करनेवाले बलवान् दैत्यराजका वध किया था । हे माता! भय प्रदान करनेवाले वृत्रासुरका भी वध आप ४० । क्यों नहीं करतीं? ॥ ४० ॥

पृष्ठ 756

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 756 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ५ ] षष्ठ स्कन्ध ७४७ शुम्भस्तथातिबलवाननुजो निशुम्भ-स्तौ भ्रातरौ तदनुगा निहता हतौ च । वृत्रं तथा जहि खलं प्रबलं दयार्द्रे मत्तं विमोहय तथा न भवेद्यथासौ ॥ त्वं पालयाद्य विबुधानसुरेण मातः सन्तापितानतितरां भयविह्वलांश्च । नान्योऽस्ति कोऽपि भुवनेषु सुरार्तिहन्ता यः क्लेशजालमखिलं निदहेत्स्वशक्त्या ॥ वृत्रे दया तव यदि प्रथिता तथापि जह्येनमाशु जनदुःखकरं खलं च । पापात्समुद्धर भवानि शरैः पुनाना नोचेत्प्रयास्यति तमो ननु दुष्टबुद्धिः ॥ ते प्रापिताः सुरवनं विबुधायो ये हत्वा रणेऽपि विशिखैः किल पावितास्ते । त्राता न किं निरयपातभयाद्दयार्द्रे यच्छत्रवोऽपि न हि किं विनिहंसि वृत्रम् ॥ जानीमहे रिपुरसौ तव सेवको न प्रायेण पीडयति नः किल पापबुद्धिः । यस्तावकस्त्विह भवेदमरानसौ किं त्वत्पादपङ्कजरतान्ननु पीडयेद्वा ॥ कुर्मः कथं जननि पूजनमद्य तेऽम्ब पुष्पादिकं तव विनिर्मितमेव यस्मात् । मन्त्रा वयं च सकलं परशक्तिरूपं तस्माद्भवानि चरणे प्रणताः स्म नूनम् ॥ धन्यास्त एव मनुजा हि भजन्ति भक्त्या पादाम्बुजं तव भवाब्धिजलेषु पोतम् । यं योगिनोऽपि मनसा सततं स्मरन्ति मोक्षार्थिनो विगतरागविकारमोहाः ॥ शुम्भ और उसके बलवान् भाई निशुम्भ - उन दोनों भाइयोंको आपने मार डाला था और उनके अनुचरोंका भी वध कर दिया था । उसी प्रकार हे दयासे आर्द्रहृदयवाली! अत्यन्त बलशाली, उन्मत्त ४१ तथा दुष्ट वृत्रासुरको भी मार डालिये । आप इसे विमोहित कर दें, जिससे यह भी उनकी तरह न हो सके । हे माता! असुरोंके द्वारा अत्यधिक पीड़ित किये गये तथा भयसे व्याकुल हम देवताओंका अब आप ही पालन कीजिये; क्योंकि तीनों लोकोंमें ऐसा कोई ४२ नहीं है जो देवताओंका दुःख दूर कर सके और अपनी शक्तिसे सम्पूर्ण कष्टके समूहको नष्ट कर सके ॥ ४१-४२ ॥ यदि वृत्रासुरपर आपकी अत्यधिक दया हो तो भी आप हमलोगोंके लिये संतापकारक इस दुष्टको शीघ्र ही मार डालिये । हे भवानि! अपने बाणोंसे इसको पवित्र ४३ करती हुई आप पापसे इसका उद्धार कर दीजिये, अन्यथा यह दुष्टबुद्धि वृत्रासुर नरक प्राप्त करेगा ॥ ४३ ॥

जिन दानवोंको युद्धमें आपने बाणोंद्वारा मारकर पवित्र बना दिया, वे नन्दनवनको प्राप्त हो गये । हे दयार्द्र स्वभाववाली! क्या आपने नरकमें गिरनेके ४४ भयसे उन शत्रुओंकी रक्षा नहीं की? तो फिर आप वृत्रासुरको क्यों नहीं मारती हैं ॥ ४४ ॥

हम यह जानते हैं कि वह आपका सेवक नहीं, शत्रु ही है; क्योंकि वह दुष्ट पापबुद्धि हम सबको सदैव सताया करता है । आपके चरणकमलोंकी ४५ भक्तिमें रत हम देवताओंको पीड़ित करनेवाला वह ( वृत्रासुर ) आपका भक्त कैसे हो सकता है? ॥ ४५ ॥

हे जननि! हे अम्ब! हम आज आपकी पूजा कैसे करें; क्योंकि पुष्पादि [ पूजोपचार ] तो आपके द्वारा ही बनाये गये हैं । मन्त्र, हमलोग तथा अन्य सब कुछ आपकी पराशक्तिके ही रूप हैं, अतः हे भवानि! ४६ हम केवल आपके चरणोंकी शरण ले सकते हैं ॥ ४६ ॥

वे ही मनुष्य धन्य हैं, जो भवसागरसे पार उतारनेवाले पोतसदृश आपके चरणकमलका निरन्तर भक्तिभावसे भजन करते हैं और राग, मोह आदि विकारोंसे रहित मोक्षकामी योगी भी मनसे जिसका ४७ । निरन्तर स्मरण करते हैं ॥ ४७ ॥

पृष्ठ 757

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 757 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

७४८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ०५ ये याज्ञिकाः सकलवेदविदोऽपि नूनं त्वां संस्मरन्ति सततं किल होमकाले । स्वाहां तु तृप्तिजननीममरेश्वराणां भूयः स्वधां पितृगणस्य च तृप्तिहेतुम् ॥ ४८ मेधासि कान्तिरसि शान्तिरपि प्रसिद्धा

बुद्धिस्त्वमेव विशदार्थकरी नराणाम् ।

सर्वं त्वमेव विभवं भुवनत्रयेऽस्मि -न्कृत्वा ददासि भजतां कृपया सदैव ॥ ४ ९

व्यास उवाच

एवं स्तुता सुरैर्देवी प्रत्यक्षा साभवत्तदा ।

चारुरूपधरा तन्वी सर्वाभरणभूषिता ॥ ५०

पाशांकुशवराभीतिलसद्बाहुचतुष्टया 1 रणत्किङ्किणिकाजालरसनाबद्धसत्कटिः ॥५१

कलकण्ठीरवा कान्ता क्वणत्कङ्कणनूपुरा ।

चन्द्रखण्डसमाबद्धरत्नमौलिविराजिता ॥ ५२

मन्दस्मितारविन्दास्या नेत्रत्रयविभूषिता ।

पारिजातप्रसूनाच्छनालवर्णसमप्रभा ॥ ५३

रक्ताम्बरपरीधाना रक्तचन्दनचर्चिता ।

प्रसादसुमुखी देवी करुणारससागरा ॥५४

सर्वशृङ्गारवेषाढ्या सर्वद्वैतारणिः परा ।

सर्वज्ञा सर्वकर्त्री च सर्वाधिष्ठानरूपिणी ॥ ५५

सर्ववेदान्तसंसिद्धा सच्चिदानन्दरूपिणी ।

प्रणेमुस्तां समालोक्य सुरा देवीं पुरः स्थिताम् ॥ ५६

तानाह प्रणतानम्बा किं वः कार्यं ब्रुवन्तु माम् । समस्त वेदोंमें पारंगत वे यज्ञकर्ता भी निश्चय ही धन्य हैं, जो हवनके समय देवताओंको तृप्ति देनेवाली स्वाहा और पितरोंको तृप्ति देनेवाली स्वधाके रूपमें आपका निरन्तर स्मरण करते हैं ॥ ४८ ॥

आप ही मेधा हैं, आप ही कान्ति हैं, आप ही शान्ति हैं और मनुष्योंका महान् मनोरथ पूर्ण करनेवाली प्रख्यात बुद्धि भी आप ही हैं । समस्त ऐश्वर्यकी रचना करके आप इस त्रिलोकीमें कृपा करके अपनी आराधना करनेवालेको वैभव प्रदान करती रहती हैं ॥ ४ ९ ॥ व्यासजी बोले- इस प्रकार देवताओंके स्तुति करनेपर वे भगवती प्रकट हो गयीं । उन्होंने सुन्दर रूप धारण कर रखा था, वे कोमल विग्रहवाली थीं और समस्त आभूषणोंसे सुसज्जित थीं ॥ ५० ॥

वे पाश, अंकुश, वर और अभयमुद्रासे सुशोभित चार भुजाओंसे युक्त थीं, उनकी कमरमें बँधी हुई करधनीके घुँघरू बज रहे थे ॥५१ ॥

उन कान्तिमयी भगवतीकी ध्वनि कोयल समान थी, उनके हाथोंके कंकण और चरणोंके नूपुर बज रहे थे । उनके मस्तकपर अर्धचन्द्रसे मण्डित रत्नमुकुट सुशोभित हो रहा था ॥ ५२ ॥

वे मन्द मन्द मुसकरा रही थीं, उनका मुख कमलके समान सुशोभित हो रहा था, वे तीन नेत्रोंसे विभूषित थीं तथा पारिजातके पुष्प - नालकी भाँति उनके शरीरकी कान्ति रक्तवर्ण थी ॥ ५३ ॥

वे लाल रंगके वस्त्र धारण किये हुए थीं और उनके शरीरपर रक्त चन्दन अनुलिप्त था । करुणारसकी सागर वे भगवती प्रसन्न मुख - मण्डलसे शोभा पा रही थीं । वे समस्त शृंगार - वेषसे विभूषित थीं I । वे देवी द्वैतभाव के लिये अरणीस्वरूपा, परा, सब कुछ जाननेवाली, सबकी रचना करनेवाली, सबकी अधिष्ठानस्वरूपा, सभी वेदान्तोंद्वारा प्रतिपादित और सच्चिदानन्दरूपिणी हैं । उन देवीको अपने सम्मुख स्थित देखकर देवताओंने उन्हें प्रणाम किया । तब उन प्रणत देवताओंसे भगवती अम्बिकाने कहा- आपलोग मुझे अपना कार्य बतायें ॥ ५४–५६३ ॥

पृष्ठ 758

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 758 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ६ ] षष्ठ स्कन्ध ७४ ९ देवा ऊचुः मोहयैनं रिपुं वृत्रं देवानामतिदुःखदम् ॥

यथा विश्वसते देवांस्तथा कुरु विमोहितम् ।

आयुधे च बलं देहि हतः स्याद्येन वा रिपुः ॥

व्यास उवाच

तथेत्युक्त्वा भगवती तत्रैवान्तरधीयत ।

स्वानि स्वानि निकेतानि जग्मुर्देवा मुदान्विताः ॥

देवता बोले- आप देवताओंके लिये अत्यन्त ५७ दुःखदायी इस शत्रु वृत्रासुरको विमोहित कर दीजिये । उसे आप ऐसा विमोहित कर दें, जिससे वह देवताओं पर विश्वास करने लगे और हमारे ५८ आयुधमें इतनी शक्ति भर दीजिये, जिससे यह शत्रु मारा जा सके ॥ ५७-५८ ॥ व्यासजी बोले- तब ' तथास्तु ' - – ऐसा कहकर भगवती वहीं अन्तर्धान हो गयीं और देवता भी प्रसन्न ५ ९ । होकर अपने - अपने भवनोंको चले गये ॥ ५ ९ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे देवीसमाराधनाय देवकृतस्तुतिवर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

अथ षष्ठोऽध्यायः भगवान् विष्णुका इन्द्रको वृत्रासुरसे सन्धिका परामर्श देना, ऋषियोंकी मध्यस्थतासे इन्द्र और वृत्रासुरमें सन्धि, इन्द्रद्वारा छलपूर्वक वृत्रासुरका वध व्यास उवाच एवं प्राप्तवरा देवा ऋषयश्च तपोधनाः । ( जग्मुः सर्वे च सम्मन्त्र्य वृत्रस्याश्रममुत्तमम् । ) ददृशुस्तत्र तं वृत्रं ज्वलन्तमिव तेजसा ॥

धक्ष्यन्तमिव लोकांस्त्रीन्ग्रसन्तमिव चामरान् ।

ऋषयोऽथ ततोऽभ्येत्य वृत्रमूचुः प्रियं वचः ॥

देवकार्यार्थसिद्ध्यर्थं सामयुक्तं रसात्मकम् । ऋषय ऊचुः वृत्र वृत्र महाभाग सर्वलोकभयङ्कर ॥

व्याप्तं त्वयैतत्सकलं ब्रह्माण्डमखिलं किल ।

शक्रेण तव वैरं यत्तत्तु सौख्यविघातकम् ॥

युवयोर्दुःखदं कामं चिन्तावृद्धिकरं परम् ।

न त्वं स्वपिषि सन्तुष्टो न चापि मघवा तथा ॥

सुखं स्वपिति चिन्तार्तो द्वयोर्यद्वैरिजं भयम् ।

युवयोर्युध्यतोः कालो व्यतीतस्तु महानिह ॥

पीड्यन्ते च प्रजाः सर्वाः सदेवासुरमानवाः । व्यासजी बोले- इस प्रकार वरप्राप्त उन देवता और तपस्वी ऋषिगणोंने ( परस्पर मन्त्रणा करके वृत्रासुरके उत्तम आश्रम के लिये प्रस्थान किया ) १ वहाँ तेजसे प्रकाशमान वृत्रासुरको देखा, जो तीनों लोकोंको भस्मसात् करने और देवताओंको निगल जानेके लिये उद्यत प्रतीत होता था । ऋषियोंने २ वृत्रासुरके समीप जाकर देवताओंकी कार्य - सिद्धिके लिये उससे सामनीतिपूर्ण तथा रसमय प्रिय वचन कहा॥१-२३ ॥ ३ ऋषि बोले- - सब लोकोंके लिये भयंकर हे महाभाग वृत्रासुर! आपने इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको व्याप्त कर लिया है, परंतु इन्द्रके साथ आपका ४ वैर आपके सुखको नष्ट करनेवाला है । यह आप दोनोंके लिये दुःखद और चिन्ता बढ़ानेका परम कारण है । न आप सुखसे सो पाते हैं, न ही इन्द्र ५ सन्तुष्ट होकर सोते हैं; क्योंकि आप दोनोंको शत्रु I - - उ जन्य भय बना रहता है । आप दोनोंको युद्ध ६ करते हुए भी बहुत समय व्यतीत हो गया है; इससे देवताओं, राक्षसों तथा मनुष्यों सहित समस्त प्रजाको कष्ट हो रहा है ॥ ३–६३ ॥

पृष्ठ 759

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 759 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

७५० संसारेऽत्र सुखं ग्राह्यं दुःखं हेयमिति स्थितिः न सुखं कृतवैरस्य भवतीति विनिर्णयः संग्रामरसिकाः शूराः प्रशंसन्ति न पण्डिताः युद्धं शृङ्गारचतुरा इन्द्रियार्थविघातकम् पुष्पैरपि न योद्धव्यं किं पुनर्निशितैः श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ६ ॥ ७ इस संसारमें सुख ही ग्राह्य है और दुःख सर्वथा । त्याज्य है - यही परम्परा है । वैर करनेवालेको सुख नहीं प्राप्त होता, यह निश्चित सिद्धान्त है । इसलिये ॥ ८ युद्धप्रेमी वीर इन्द्रिय सुखको नष्ट करनेवाले युद्धकी । प्रशंसा करते हैं, किंतु शृंगाररसके प्रेमी विद्वान् उसकी प्रशंसा नहीं करते । पुष्पोंसे भी युद्ध नहीं करना चाहिये, शरैः ॥ ९ फिर तीक्ष्ण बाणोंकी तो बात ही क्या? ॥७ – ९ ॥ युद्धे विजयसन्देहो निश्चयं बाणताडनम् दैवाधीनमिदं विश्वं तथा जयपराजयौ दैवाधीनाविति ज्ञात्वा न योद्धव्यं कदाचन कालेऽथ भोजनं स्नानं शय्यायां शयनं तथा

परिचर्यापरा भार्या संसारे सुखसाधनम् ।

किं सुखं युध्यतः संख्ये बाणवृष्टिभयङ्करे ॥

खड्गपातातिरौद्रे च तथारातिसुखप्रदे । संग्रामे मरणात्स्वर्गसुखप्राप्तिरिति । युद्धमें विजय ही हो – यह सन्देहास्पद है, ॥ १० परंतु उसमें बाणोंसे शरीरको पीड़ा प्राप्त होना निश्चित है । यह समस्त विश्व दैवके अधीन है, उसी प्रकार । जय - पराजय भी उसीके अधीन हैं । अतः इन्हें ॥ ११ दैवाधीन जानकर युद्ध कभी नहीं करना चाहिये । समयपर स्नान, भोजन, शय्यापर शयन और सेवा-परायण पत्नी- ये ही संसारमें सुखके साधन हैं १२ बाणवर्षासे भयंकर, खड्ग - प्रहारसे अत्यन्त रौद्र तथा शत्रुको सुख प्रदान करनेवाले संग्राममें युद्ध करनेसे

क्या सुख प्राप्त हो सकता है? । १० – १२३ ॥

स्फुटम् ॥१३

प्रलोभनपरं वाक्यं नोदनार्थं निरर्थकम् ।

छित्त्वा देहं व्यथां प्राप्य शृगालकरटादिभिः ॥

पश्चात्स्वर्गसुखावाप्तिं को वा वाञ्छति मन्दधीः ।

सख्यं भवतु वृत्र शक्रेण सह नित्यदा ॥

अवाप्स्यसि सुखं त्वं च शक्रश्चापि निरन्तरम् ।

वयं च तापसाः सर्वे गन्धर्वाश्च निजाश्रमे ॥

सुखवासं गमिष्यामः शान्ते वैरेऽधुनैव वाम् ।

संग्रामे युवयोर्धीर वर्तमाने दिवानिशम् ॥

पीड्यन्ते मुनयः सर्वे गन्धर्वाः किन्नरा नराः ।

सर्वेषां शान्तिकामानां सख्यमिच्छामहे वयम् ॥

मुनयस्त्वं च शक्रश्च प्राप्नुवन्तु सुखं किल ।

मध्यस्थाश्च वयं वृत्र युवयोः सख्यकारणे ॥

शपथं कारयित्वात्र योजयामो मिथः प्रियम् ।

शक्रस्तु शपथान्कृत्वा यथोक्तांश्च तवाग्रतः ॥

ऐसा स्पष्ट कथन है कि युद्धमें मरनेसे स्वर्ग-सुखकी प्राप्ति होती है - यह तो प्रलोभन और प्रेरणा १४ देनेवाला तथा निरर्थक वचन है । ऐसा कौन मन्दबुद्धि है जो शरीरको अस्त्र - शस्त्रोंसे घायल कराकर सियार और कौओंसे नोचवाकर स्वर्गसुखकी प्राप्तिकी १५ कामना करेगा! ॥ १३-१४१ ॥ हे वृत्र! इन्द्रके साथ तुम्हारी स्थायी मैत्री हो जाय, जिससे तुम्हें और इन्द्र - दोनोंको निरन्तर १६ सुखकी प्राप्ति हो । आप दोनोंका वैर शान्त हो जानेसे हम सब तपस्वी और गन्धर्वगण भी अपने - अपने आश्रमोंमें सुखपूर्वक रह सकेंगे । हे धीर! आप दोनोंके १७ दिन - रातके युद्धमें हम सभी मुनियों, गन्धर्वों, किन्नरों और मनुष्योंको कष्ट प्राप्त होता है I । सभी लोगोंको १८ शान्ति प्राप्त हो सके - इस कामनासे हम सब आप दोनोंमें मैत्री कराना चाहते हैं ॥ १५ - १८ ॥ हे वृत्र! मुनिगण, तुम्हें और इन्द्रको सुख प्राप्त १ ९ हो । हमलोग तुम दोनोंकी मित्रता कराने में मध्यस्थ बनेंगे । हम शपथ कराकर आप दोनोंको एक - दूसरेका प्रिय मित्र बना देंगे । आप जैसा कहेंगे, वैसे ही इन्द्र २० | भी आपके सम्मुख शपथ लेकर आपके मनको प्रेमसे

पृष्ठ 760

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 760 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ६ ]

चित्तं ते प्रीतिसंयुक्तं करिष्यति तु साम्प्रतम् ।

सत्याधारा धरा नूनं सत्येन च दिवाकरः ॥

तपत्ययं यथाकालं वायुः सत्येन वात्यथ ।

उदन्वानपि मर्यादां सत्येनैव न मुञ्चति ॥

तस्मात्सत्येन सख्यं वा भवत्वद्य यथासुखम् ।

एकत्र शयनं क्रीडा जलकेलिः सुखासनम् ॥

युवाभ्यां सर्वथा कार्यं कर्तव्यं सख्यमेत्य च । व्यास उवाच महर्षिवचनं श्रुत्वा तानुवाच महामतिः ॥

अवश्यं भगवन्तो मे माननीयास्तपस्विनः ।

भवन्तो मुनयः क्वापि न मिथ्यावादिनो भृशम् ॥

सदाचाराः सुशान्ताश्च न विदुश्छलकारणम् ।

कृतवैरे शठे स्तब्धे कामुके च गतत्विषि ॥

निर्लज्जे नैव कर्तव्यं सख्यं मतिमता सदा ।

निर्लज्जोऽयं दुराचारो ब्रह्महा लम्पट: शठः ॥

न विश्वासस्तु कर्तव्यः सर्वथैवेदृशे जने ।

भवन्तो निपुणाः सर्वे न द्रोहमतयः सदा ॥

अनभिज्ञास्तु शान्तत्वाच्चित्तानामतिवादिनाम् । मुनय ऊचुः जन्तुः कृतस्य भोक्ता वै शुभस्य त्वशुभस्य च ॥

द्रोहं कृत्वा कुतः शान्तिमाप्नुयान्नष्टचेतनः ।

विश्वासघातकर्तारो नरकं यान्ति निश्चयम् ॥

दुःखं च समवाप्नोति नूनं विश्वासघातकः ।

निष्कृतिर्ब्रह्महन्तॄणां सुरापानां च निष्कृतिः ॥

विश्वासघातिनां नैव मित्रद्रोहकृतामपि ।

समयं ब्रूहि सर्वज्ञ यथा ते चेतसि ध्रुवम् ॥

तेनैव समयेनाद्य सन्धिः स्यादुभयोः किल । वृत्र उवाच न शुष्केण न चार्द्रेण नाश्मना न च दारुणा ॥

न वज्रेण महाभाग न दिवा निशि नैव च ।

वध्यो भवेयं विप्रेन्द्राः शक्रस्य सह दैवतैः ॥

एवं मे रोचते सन्धिः शक्रेण सह नान्यथा । षष्ठ स्कन्ध ७५१ परिपूर्ण कर देंगे । सत्यके आधारपर ही यह पृथ्वी २१ स्थित है, सत्यसे ही भगवान् सूर्य नित्य तपते हैं, सत्यसे ही समयके अनुसार वायु बहती है और सत्यके कारण ही समुद्र भी अपनी मर्यादाका परित्याग २२ नहीं करता । इसलिये सत्यके आधारपर ही आज आप दोनोंमें मित्रता हो जाय, जिससे आपलोग सुखपूर्वक २३ साथ - साथ शयन, क्रीडा, जलकेलि कर सकें और बैठ सकें । इसलिये आप दोनोंको एकत्रित होकर

अवश्य ही मित्रता कर लेनी चाहिये । १ ९ - २३३ ॥

२४ व्यासजी बोले — उन महर्षियोंका वचन सुनकर अत्यन्त बुद्धिमान् वृत्रासुरने कहा - हे भगवन्! आप सभी तपस्वीगण मेरे मान्य हैं । आप मुनिगण कभी २५ असत्य भाषण नहीं करते । आपलोग सदाचारी तथा अति शान्त स्वभाववाले हैं और छल करना नहीं जानते । २६ किंतु वैरी, मूर्ख, जड़, कामी, कलंकित और निर्लज्जसे बुद्धिमान्को मित्रता नहीं करनी चाहिये । यह ( इन्द्र ) २७ निर्लज्ज, दुराचारी, ब्राह्मणघाती, लम्पट और मूर्ख है-इस प्रकारके व्यक्तिका विश्वास नहीं करना चाहिये । आप सभी लोग कुशल हैं, किंतु द्रोह - बुद्धिवाले २८ कभी नहीं हैं । आप सब शान्तचित्त होनेके कारण अतिवादियोंके मनकी बात नहीं जानते ॥ २४–२८३ ॥ मुनि बोले- प्रत्येक प्राणी अपने किये हुए २ ९ शुभाशुभ कर्मोंका फल भोगता है । जिसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी हो, वह द्रोह करके भी क्या शान्ति प्राप्त कर ३० सकता है? विश्वासघात करनेवाले निश्चय ही नरकमें जाते हैं । विश्वासघाती निश्चितरूपसे दु: ख प्राप्त करता है । ब्राह्मणकी हत्या करनेवालों और मद्यपान ३१ करनेवालोंके लिये तो प्रायश्चित्त है, परंतु विश्वासघातियों और मित्रद्रोहियोंके लिये कोई प्रायश्चित्त नहीं है । ३२ अतः हे सर्वज्ञ! आपने मनमें जो शर्त निश्चय कर रखी हो, उसे बताइये; जिससे उस शर्त के अनुसार आज ही आप दोनोंमें सन्धि हो जाय ॥ २ ९ –३२३ ॥ वृत्रासुर बोला - हे महाभाग! सभी देवताओं सहित ३३ इन्द्र न शुष्क या गीली वस्तुसे, न पत्थरसे, न काष्ठसे, न वज्रसे, न दिनमें और न रातमें मेरा वध कर सकें । ३४ हे विप्रेन्द्रो! इसी शर्तपर मैं इन्द्रसे सन्धि करना चाहता हूँ, अन्यथा नहीं ॥ ३३-३४३ ॥