देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 761–770
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 761–770
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७५२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ६ व्यास उवाच ऋषयस्तं तदा प्राहुर्बाढमित्येव चादृताः ॥
समयं श्रावयामासुस्तत्रानीय सुरेश्वरम् ।
इन्द्रोऽपि शपथांस्तत्र चकार विगतज्वरः ॥
साक्षिणं पावकं कृत्वा मुनीनां सन्निधौ किल ।
वृत्रस्तु वचनैस्तस्य विश्वासमगमत्तदा ॥
बभूव मित्रवच्छक्रे सहचर्यापरायणः ।
कदाचिन्नन्दने चोभौ कदाचिद् गन्धमादने ॥
कदाचिदुदधेस्तीरे मोदमानौ विचेरतुः ।
एवं कृते च सन्धाने वृत्रः प्रमुदितोऽभवत् ॥
शक्रोऽपि वधकामस्तु तदुपायानचिन्तयत् ।
रन्ध्रान्वेषी समुद्विग्नस्तदासीन्मघवा भृशम् ॥
एवं चिन्तयतस्तस्य कालः समभिवर्तत ।
विश्वासं परमं प्राप वृत्रः शक्रेऽतिदारुणे ॥।
एवं कतिचिदब्दानि गतानि समये कृते ।
वृत्रस्य मरणोपायान्मनसीन्द्रोऽप्यचिन्तयत् ॥
त्वष्कदा सुतं प्राह विश्वस्तं पाकशासने ।
पुत्र वृत्र महाभाग शृणु मे वचनं हितम् ॥
न विश्वासस्तु कर्तव्यः कृतवैरे कथञ्चन ।
मघवा कृतवैरस्ते सदासूयापरः परैः ॥
लोभान्मत्तो द्वेषरतः परदुःखोत्सवान्वितः ।
परदारलम्पटः स पापबुद्धिः प्रतारकः ॥
रन्ध्रान्वेषी द्रोहपरो मायावी मदगर्वितः ।
यः प्रविश्योदरे मातुर्गर्भच्छेदं चकार ह ॥
सप्तकृत्वः सप्तकृत्वः क्रन्दमानमनातुरः ।
तस्मात्पुत्र न कर्तव्यो विश्वासस्तु कथञ्चन ॥
कृतपापस्य का लज्जा पुनः पुत्र प्रकुर्वतः । * वे ही उनचास मरुद्गण बने । व्यासजी बोले — ऋषियोंने उससे आदरपूर्वक ३५ कहा - ' ठीक है ' और तत्पश्चात् देवराज इन्द्रको वहाँ बुलाकर उन्हें वह शर्त सुना दी । इन्द्रने भी मुनियोंकी उपस्थितिमें अग्निको साक्षी करके शपथें ३६ लीं और वे सन्तापसे मुक्त हो गये । वृत्रासुर भी उनकी बातोंसे विश्वासमें आ गया और इन्द्रके साथ मित्रकी ३७ भाँति व्यवहारपरायण हो गया ॥ ३५-३७३ ॥ वे दोनों कभी नन्दनवनमें, कभी गन्धमादनपर्वतपर और कभी समुद्रके तटपर आनन्दपूर्वक विचरण करते ३८ थे । इस प्रकार सन्धि हो जानेपर वृत्रासुर बहुत प्रसन्न रहता था । लेकिन वधकी इच्छावाले इन्द्र उसके ३ ९ वधके उपाय सोचा करते थे । इन्द्र उसकी कमजोरी ढूँढ़नेके लिये सदा उद्विग्न रहते थे । ३८ - ४० ॥ इन्द्रके इस प्रकार विचार करते हुए कुछ समय ४० बीत गया । वृत्रासुरको अत्यन्त क्रूर इन्द्रपर अत्यधिक विश्वास हो गया । इस प्रकार सन्धिके कुछ वर्ष बीत ४१ जानेपर इन्द्रने मन - ही - मन वृत्रासुरके मरणका उपाय सोच लिया ॥ ४१-४२ ॥ एक बार त्वष्टाने इन्द्रपर बहुत अधिक विश्वास ४२ | करनेवाले पुत्रसे कहा- हे पुत्र वृत्रासुर! हे महाभाग! मेरी हितकर बात सुनो, जिसके साथ शत्रुता हो ४३ चुकी हो, उसका विश्वास कभी नहीं करना चाहिये । इन्द्र तुम्हारा शत्रु है, वह दूसरोंके द्वारा तुम्हारे गुणोंमें सदा दोष ढूँढ़ा करता है॥४३-४४ ॥ ४४ वह सदा लोभसे उन्मत्त रहनेवाला, सबसे द्वेष रखनेवाला, दूसरोंका दुःख देखकर सुखी रहनेवाला, परस्त्रीगामी, पापबुद्धि, कपटी, छिद्रान्वेषी, दूसरोंसे ४५ द्रोह करनेवाला, मायावी और अहंकारी है, जिसने कि एक बार माताके उदरमें प्रवेश करके उसके गर्भको ४६ सात भागों में काट डाला । तब उन्हें रोते देखकर उस निर्दयीने उनके भी पृथक् - पृथक् सात भाग कर दिये । * इसलिये हे पुत्र! उसपर किसी प्रकार भी ४७ विश्वास नहीं करना चाहिये । हे पुत्र! पाप करनेवालेको । दुबारा पाप करनेमें क्या लज्जा! ॥ ४५ - ४७३ ॥
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अ ० ६ ] व्यास उवाच एवं प्रबोधितः पित्रा वचनैर्हेतुसंयुतैः ॥
न बुबोध तदा वृत्र आसन्नमरणः किल ।
स कदाचित्समुद्रान्ते तमपश्यन्महासुरम् ॥
सन्ध्याकाल उपावृत्ते मुहूर्तेऽतीव दारुणे ।
ततः सञ्चिन्त्य मघवा वरदानं महात्मनाम् ॥
सन्ध्येयं वर्तते रौद्रा न रात्रिर्दिवसो न च ।
हन्तव्यो ऽयं मया चाद्य बलेनैव न संशयः ॥
एकाकी विजने चात्र सम्प्राप्तः समयोचितः ।
एवं विचार्य मनसा सस्मार हरिमव्ययम् ॥
तत्राजगाम भगवानदृश्यः पुरुषोत्तमः ।
वज्रमध्ये प्रविश्यासौ संस्थितो भगवान्हरिः ॥
इन्द्रो बुद्धिं चकाराशु तदा वृत्रवधं प्रति ।
इति सञ्चिन्त्य मनसा कथं हन्यां रिपुं रणे ॥
अजेयं सर्वथा सर्वदेवैश्च दानवैस्तथा ।
यदि वृत्रं न हन्म्यद्य वञ्चयित्वा महाबलम् ॥
न श्रेयो मम नूनं स्यात्सर्वथा रिपुरक्षणात् ।
अपां फेनं तदापश्यत्समुद्रे पर्वतोपमम् ॥
नायं शुष्को न चार्द्रोऽयं न च शस्त्रमिदं तथा ।
अपां फेनं तदा शक्रो जग्राह किल लीलया ॥
परां शक्तिं च सस्मार भक्त्या परमया युतः ।
स्मृतमात्रा तदा देवी स्वांशं फेने न्यधापयत् ॥
वज्रं तदावृतं तत्र चकार हरिसंयुतम् ।
फेनावृतं पविं तत्र शक्रश्चिक्षेप तं प्रति ॥
सहसा निपपाताशु वज्राहत इवाचलः ।
वासवस्तु प्रहृष्टात्मा बभूव निहते तदा ॥
ऋषयश्च महेन्द्रं तमस्तुवन्विविधैः स्तवैः ।
हतशत्रुः प्रहृष्टात्मा वासवः सह दैवतैः ॥
षष्ठ स्कन्ध ७५३ व्यासजी बोले- इस प्रकार पिताद्वारा कल्याणकारी ४८ वचनोंसे समझाये जानेपर भी आसन्न - मृत्यु वृत्रासुरको कुछ भी चेत नहीं हुआ ॥ ४८३ ॥
एक दिन उन्होंने ( इन्द्रने ) उस महान् दैत्यको ४ ९ समुद्रके तटपर देखा । उस समय संध्याकालका अत्यन्त भयंकर मुहूर्त उपस्थित था । तब इन्द्रने महात्मा ५० मुनियोंद्वारा निर्धारित शर्त - वरदानपर यह विचार करके कि यह भयंकर संध्याकाल है, इस समय न दिन है, न रात है, अतः मुझे आज ही इसे अपनी शक्तिसे मार ५१ डालना चाहिये; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ४ ९ –५१ ॥ यहाँ एकान्त है और यह अकेला है तथा समय भी अनुकूल है - ऐसा विचारकर उन्होंने अपने मनमें ५२ अविनाशी भगवान् श्रीहरिका स्मरण किया । [ स्मरण करते ही ] पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु वहाँ अदृश्यरूपसे ५३ आ गये और वे प्रभु श्रीहरि इन्द्रके वज्रमें प्रविष्ट होकर विराजमान हो गये ॥ ५२-५३ ॥ तब इन्द्र वृत्रासुरको मारनेकी युक्ति सोचने लगे ५४ कि सभी देवताओं तथा दानवोंसे सर्वथा अजेय इस शत्रुको युद्धमें कैसे मारूँ? यदि छल करके इस महाबलीको आज नहीं मारता तो इस शत्रुके जीवित ५५ । रहते किसी भी प्रकार कल्याण नहीं है । इन्द्र ऐसा विचार कर ही रहे थे तभी उन्होंने समुद्रमें पर्वतके समान जलफेनको देखा ॥ ५४-५६ ॥ ५६ यह न सूखा है, न गीला है और यह न तो कोई शस्त्र है, [ ऐसा विचारकर ] इन्द्रने उस समुद्रफेनको ५७ लीलापूर्वक उठा लिया ॥ ५७ ॥
तदनन्तर उन्होंने परम भक्तिपूर्वक, पराशक्ति जगदम्बाका स्मरण किया, तब स्मरण करते ही देवीने ५८ अपना अंश उस फेनमें स्थापित कर दिया ॥ ५८ ॥
इन्द्रने भगवान् श्रीहरिसे युक्त वज्रको उस फेनसे आवृत कर दिया और उस फेनसे आवृत वज्रको ५ ९ वृत्रासुरके ऊपर फेंका ॥५ ९ ॥ उस वज्रके अचानक प्रहारसे वह पर्वतकी भाँति ६० गिर पड़ा । तब उसके मर जानेपर इन्द्र अत्यन्त प्रसन्नचित्त हो उठे और ऋषिगण विविध स्तोत्रोंसे देवराज इन्द्रकी स्तुति करने लगे । उस शत्रुके मारे जानेसे ६१ | प्रसन्नचित्त इन्द्रने देवताओंके साथ उन भगवतीकी
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७५४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ७
देवीं सम्पूजयामास यत्प्रसादाद्धतो रिपुः ।
प्रसादयामास तदा स्तोत्रैर्नानाविधैरपि ॥
देवोद्याने पराशक्तेः प्रासादमकरोद्धरिः ।
पद्मरागमयीं मूर्ति स्थापयामास वासवः ॥
त्रिकालं महतीं पूजां चक्रुः सर्वेऽपि निर्जराः ।
तदाप्रभृति देवानां श्रीदेवी कुलदैवतम् ॥
विष्णुं त्रिभुवनश्रेष्ठं पूजयामास वासवः ।
ततो हते महावीर्ये वृत्रे देवभयङ्करे ॥
प्रववौ च शिवो वायुर्जहृषुर्देवतास्तथा ।
हते तस्मिन्सगन्धर्वा यक्षराक्षसकिन्नराः ॥
इत्थं वृत्र: पराशक्तिप्रवेशयुतफेनतः ।
तया कृतविमोहाच्च शक्रेण सहसा हतः ॥
ततो वृत्रनिहन्त्रीति देवी लोकेषु गीयते ।
शक्रेण निहतत्वाच्च शक्रेण हत उच्यते ॥
पूजा की तथा विविध स्तोत्रोंसे उन्हें प्रसन्न किया, ६२ जिनकी कृपासे शत्रु मारा गया ॥ ६०–६२ ॥ तत्पश्चात् इन्द्रने देवोद्यान नन्दनवनमें पराशक्ति भगवतीका मन्दिर बनवाया और उसमें पद्मराग मणियोंसे ६३ निर्मित मूर्तिकी स्थापना की और सभी देवता भी तीनों समय उनकी महती पूजा करने लगे; तभीसे श्रीदेवी ही उन देवताओंकी कुलदेवी हो गयीं ॥ ६३-६४ ॥ ६४ तब महापराक्रमी और देवताओंके लिये भयंकर वृत्रके मारे जानेपर इन्द्रने तीनों लोकोंमें श्रेष्ठ भगवान् विष्णुकी पूजा की । उस वृत्रासुरके मर जानेपर कल्याण-६५ कारी वायु बहने लगी तथा देवता, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और किन्नरगण हर्षित हो उठे । ६५-६६ ॥ ६६ इस प्रकार भगवती पराशक्तिके समुद्रफेनसे संयुक्त होने और उनके द्वारा ही विमोहित किये जानेके कारण वृत्रासुर सहसा इन्द्रके द्वारा मारा गया । ६७ इसलिये वे भगवती देवी संसारमें ' वृत्रनिहन्त्री ' इस नामसे विख्यात हुईं और वह वृत्रासुर चूँकि प्रकटरूपसे इन्द्रके द्वारा मारा गया था, इसलिये उसे इन्द्रके द्वारा ६८ । मारा गया, ऐसा कहा जाता है ॥६७-६८ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे छद्मनेन्द्रेण फेनद्वारा पराशक्तिस्मरणपूर्वकं वृत्रहननवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
O अथ सप्तमोऽध्यायः त्वष्टाका वृत्रासुरकी पारलौकिक क्रिया करके इन्द्रको शाप देना, इन्द्रको ब्रह्महत्या लगना, नहुषका स्वर्गाधिपति बनना और इन्द्राणीपर आसक्त होना व्यास उवाच
अथ तं पतितं दृष्ट्वा विष्णुर्विष्णुपुरीं ययौ ।
मनसा शङ्कमानस्तु तस्य हत्याकृतं भयम् ॥
इन्द्रोऽपि भयसंत्रस्तो ययाविन्द्रपुरीं ततः ।
मुनयो भयसंविग्ना ह्यभवन्निहते रिपौ ॥
किमस्माभिः कृतं पापं यदसौ वञ्चितः किल ।
मुनिशब्दो वृथा जातः सुरेशस्य च सङ्गमात् ॥
अस्माकं वचनाद् वृत्रो विश्वासमगमत्किल ।
विश्वासघातिनः सङ्गाद्वयं विश्वासघातकाः ॥
व्यासजी बोले- इस प्रकार उसे गिरा हुआ देखकर मन- -ही- - मन हत्याके भयसे सशंकित भगवान् १ विष्णु वैकुण्ठलोकको चले गये ॥१ ॥
तत्पश्चात् इन्द्र भी भयभीत होकर इन्द्रपुरीको चल दिये । उस शत्रु ( वृत्रासुर ) - के मारे जानेपर २ मुनिगण भी भयग्रस्त हो गये कि हमने छलपूर्ण यह कैसा पापकृत्य कर डाला । इन्द्रका साथ देनेसे हमारा ३ ' मुनि ' नाम व्यर्थ हो गया ॥ २-३ ॥ हमारी ही बातोंसे वृत्रासुरको विश्वास आया; विश्वासघातीके संगसे हम सब भी विश्वासघाती ४ | हो गये ॥ ४ ॥
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अ ० ७ ]
धिगियं ममता पापमूलमेवमनर्थकृत् ।
यदस्माभिश्छलं कृत्वा शपथैर्वञ्चितोऽसुरः ॥
मन्त्रकृद् बुद्धिदाता च प्रेरकः पापकारिणाम् ।
पापभाक्स भवेन्नूनं पक्षकर्ता तथैव च ॥
विष्णुनापि कृतं पापं यत्साहाय्यमवाप्तवान् ।
वज्रं प्रविश्य येनासौ पातितः सत्त्वमूर्तिना ॥
नूनं स्वार्थपरः प्राणी न पापात् त्रासमश्नुते ।
हरिणा हरिसङ्गेन सर्वथा दुष्कृतं कृतम् ॥
द्वावेव स्तः पदार्थानां द्वावेव निधनं गतौ ।
प्रथमश्च तुरीयश्च यौ त्रिलोक्यां तु दुर्लभौ ॥
अर्थकामौ प्रशस्तौ द्वौ सर्वेषां सम्मतौ प्रियौ ।
धर्माधर्मेति वाग्वादो दम्भोऽयं महतामपि ॥
मुनयोऽपि मनस्तापमेवं कृत्वा पुनः पुनः ।
जग्मुः स्वानाश्रमानेव विमनस्का हतोद्यमाः ॥।
त्वष्टा तु निहतं श्रुत्वा पुत्रमिन्द्रेण भारत ।
रुरोद दुःखसन्तप्तो निर्वेदमगमत्पुनः ॥
यत्रासौ पतितस्तत्र गत्वा वीक्ष्य तथागतम् ।
संस्कारं कारयामास विधिवत्पारलौकिकम् ॥
स्नात्वास्य सलिलं दत्त्वा कृत्वा चैवौर्ध्वदैहिकम् ।
शशापेन्द्रं स शोकार्तः पापिष्ठं मित्रघातकम् ॥
यथा मे निहतः पुत्रः प्रलोभ्य शपथैर्भृशम् ।
तथेन्द्रोऽपि महद्दुःखं प्राप्नोतु विधिनिर्मितम् ॥
षष्ठ स्कन्ध ७५५ पापकी जड़ और अनर्थकारी इस ममताको धिक्कार है, जिसके कारण हमलोगोंने छलपूर्वक ५ शपथ ली और उस असुर ( वृत्रासुर ) - को धोखा दिया ॥ ५ ॥
पाप करनेका परामर्श देनेवाला, पाप करनेके ६ लिये बुद्धि देनेवाला, पापकी प्रेरणा देनेवाला तथा पाप करनेवालोंका पक्ष लेनेवाला भी निश्चय ही पापकर्ताके समान पापभाजन होता है ॥ ६ ॥
७ वज्रमें प्रविष्ट होकर वृत्रकी हत्या करनेमें सत्त्वगुणके मूर्तरूप भगवान् विष्णुने इन्द्रकी सहायता की और उसे मारा, अतः उन्होंने भी पाप किया ॥ ७ ॥
स्वार्थपरायण प्राणी पापसे भयभीत नहीं ८ होता । विष्णुने इन्द्रका साथ देकर सर्वथा दुष्कृत कर्म किया ॥ ८ ॥
चार पदार्थों ( धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ) - मेंसे ९ दो ही रह गये हैं और दो समाप्त हो गये हैं । उनमें भी प्रथम पदार्थ धर्म और चतुर्थ पदार्थ मोक्ष दोनों त्रिलोकमें दुर्लभ ही हो गये हैं ॥ ९ ॥
अर्थ और काम ही सबके प्रिय और प्रशस्त माने १० गये हैं । धर्म और अधर्मकी विवेचना - यह बड़े लोगोंका वाचिक दम्भमात्र ही रह गया है ॥१० ॥
इस प्रकार मुनिगण भी बार- बार मनमें सन्ताप ११ करके उदासमनसे हतोत्साह होकर अपने - अपने आश्रमोंको चले गये ॥ ११ ॥
हे भारत! उधर अपने पुत्रको इन्द्रद्वारा मारा गया सुनकर त्वष्टा दुःखसे सन्तप्त होकर अत्यन्त दुःखित १२ हौ रोने लगे; उन्हें इससे बहुत वेदना हुई ॥१२ ॥
तदनन्तर जहाँ वह ( वृत्र ) गिरा पड़ा था, वहाँ जाकर उसे उस स्थितिमें देखकर त्वष्टाने विधिपूर्वक १३ उसका पारलौकिक संस्कार कराया ॥ १३ ॥
तत्पश्चात् स्नान करके, जलाञ्जलि देकर उसका और्ध्वदैहिक कर्म सम्पन्न करनेके पश्चात् उन शोकसन्तप्त त्वष्टाने पापी और मित्रघाती इन्द्रको इस १४ प्रकार शाप दे दिया कि जिस प्रकार शपथोंसे प्रलोभितकर इन्द्रने मेरे पुत्रको मार डाला है, उसी प्रकार वह भी विधाताद्वारा दिये हुए महान् दुःख १५ | प्राप्त करे ॥ १४-१५ ॥
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७५६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ७
इति शप्त्वा सुरेशानं त्वष्टा तापसमन्वितः ।
मेरोः शिखरमास्थाय तपस्तेपे सुदुष्करम् ॥
जनमेजय उवाच
हत्वा त्वाष्ट्रं सुरेशोऽथ कामवस्थामवाप्तवान् ।
सुखं वा दुःखमेवाग्रे तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
व्यास उवाच
किं पृच्छसि महाभाग सन्देहः कीदृशस्तव ।
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् ॥
बलिष्ठैर्दुर्बलैर्वापि स्वल्पं वा बहु वा कृतम् ।
सर्वथैव हि भोक्तव्यं सदेवासुरमानुषैः ॥
शक्रायेत्थं मतिर्दत्ता हरिणा वृत्रघातिने ।
प्रविष्टोऽथ पविं विष्णुः सहायः प्रत्यपद्यत ॥
न चापदि सहायोऽभूद्वासुदेवः कथञ्चन ।
समये स्वजनः सर्वः संसारेऽस्मिन्नराधिप ॥
दैवे विमुखतां प्राप्ते न कोऽप्यस्ति सहायवान् ।
पिता माता तथा भार्या भ्राता वाथ सहोदरः ॥
सेवको वापि मित्रं वा पुत्रश्चैव तथौरसः ।
प्रतिकूले गते दैवे न कोऽप्येति सहायताम् ॥
भोक्ता पापस्य पुण्यस्य कर्ता भवति सर्वथा ।
वृत्रं हत्वा गताः सर्वे निस्तेजस्कः शचीपतिः ॥
शेपुस्तं त्रिदशाः सर्वे ब्रह्महेत्यब्रुवञ्छनैः ।
को नाम शपथान्कृत्वा सत्यं दत्त्वा वचः पुनः ॥
जिघांसति सुविश्वस्तं मुनिं मित्रत्वमागतम् ।
देवगोष्ठ्यां सुरोद्याने गन्धर्वाणां समागमे ॥
सर्वत्रैव कथा तस्य विस्तारमगमत्किल ।
किं कृतं दुष्कृतं कर्म शक्रेणाद्य जिघांसता ॥
वृत्रं छलेन विश्वस्तं मुनिभिश्च प्रतारितम् ।
वेदप्रमाणमुत्सृज्य स्वीकृतं सौगतं मतम् ॥
इस प्रकार देवराज इन्द्रको शाप देकर सन्तप्त १६ त्वष्टा सुमेरुपर्वतके शिखरका आश्रय लेकर अत्यन्त कठोर तपस्या करने लगे ॥ १६ ॥
जनमेजय बोले- हे पितामह! वृत्रासुरको मारनेके बाद इन्द्रकी क्या दशा हुई? उन्हें बादमें सुख मिला १७ या दु: ख, इसे मुझे बताइये ॥१७ ॥
व्यासजी बोले – हे महाभाग! तुम क्या पूछ रहे हो, [ इस विषय में ] तुम्हें क्या सन्देह है? किये गये शुभ - अशुभ कर्मका फल तो अवश्य ही भोगना पड़ता १८ है । देवता, राक्षस और मनुष्यसहित बलवान् या दुर्बल कोई भी हो - सभीको अपने द्वारा किये गये अत्यन्त १ ९ अल्प या अधिक कर्मका फल सर्वथा भोगना ही पड़ता है ॥ १८-१९ ॥ भगवान् विष्णुने वृत्रघाती इन्द्रको इस प्रकारकी २० मति प्रदान की थी । वे विष्णु उनके वज्रमें प्रविष्ट हुए थे तथा उनके सहायक बने थे; परंतु विपत्तिमें उन्होंने किसी भी तरह सहायता नहीं की । हे राजन्! इस २१ संसारमें अच्छे समयमें सभी लोग अपने बन जाते हैं, किंतु दैवके प्रतिकूल होनेपर कोई भी सहायक नहीं २२ होता । पिता, माता, पत्नी, सहोदर भाई, सेवक, मित्र एवं औरस पुत्र – कोई भी दैवके प्रतिकूल हो जानेपर सहायता नहीं करता । पाप या पुण्य करनेवाला ही २३ उसका भागी होता है॥२०–२३३ ॥ वृके मारे जानेपर अन्य सभी लोग चले गये; २४ इन्द्र तेजहीन हो गये । सभी देवता उसकी निन्दा करने लगे और ' यह ब्रह्महत्यारा है ' – ऐसा मन्द स्वरमें कहने लगे । कौन ऐसा होगा जो शपथ खाकर और २५ वचन देकर अत्यन्त विश्वासमें आये हुए तथा मित्रताको प्राप्त मुनिको मारनेकी इच्छा करेगा! उसकी यह बात देवताओंकी सभामें, देवोद्यानमें तथा २६ गन्धर्वोंके समाजमें सर्वत्र फैल गयी । हत्या करनेकी इच्छावाले इन्द्रने आज यह कैसा दुष्कृत कर्म कर २७ डाला! मुनियोंके द्वारा विश्वास दिलाये गये वृत्रासुरको छलपूर्वक मार करके ( मानो ) इन्द्रने वेदोंकी प्रामाणिकताका त्यागकर सौगतोंका मत स्वीकार कर २८ लिया । इन्द्रने छल करके अत्यन्त साहससे शत्रुको
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अ ० ७ ]
यदयं निहतः शत्रुर्वञ्चयित्वातिसाहसात् ।
को नाम वचनं दत्त्वा विपरीतमथाचरेत् ॥
विना शक्रं हरिं वापि यथायं विनिपातितः ।
एवंविधाः कथाश्चान्याः समाजेष्वभवन्भृशम् ॥
शुश्रावेन्द्रोऽपि विविधाः स्वकीर्तेर्हानिकारकाः ।
यस्य कीर्तिर्हता लोके धिक्तस्यैव कुजीवितम् ॥
यं दृष्ट्वा पथि गच्छन्तं शत्रुः स्मेरमुखो भवेत् ।
इन्द्रद्युम्नोऽपि राजर्षिः पतितः कीर्तिसंक्षयात् ॥
स्वर्गादकृतपापोऽसौ पापकृत्किं न पात्यते ।
स्वल्पेऽपराधेऽपि नृपो ययातिः पतितः किल ॥
नृपः कर्कटतां प्राप्तो युगानष्टादशैव तु ।
भृगुपत्नीशिरश्छेदाद्भगवान्हरिरच्युतः ॥
ब्रह्मशापात्पशोर्योनौ सञ्जातो मकरादिषु ।
विष्णुश्च वामनो भूत्वा याचनार्थं बलेर्गृहे ॥
गतः किमपरं दुःखं प्राप्नोति दुष्कृती नरः ।
रामोऽपि वनवासेषु सीताविरहजं बहु ॥
दुःखं च प्राप्तवान्घोरं भृगुशापेन भारत ।
तथेन्द्रोऽपि ब्रह्महत्याकृतं प्राप्य महद्भयम् ॥
न स्वास्थ्यं प्राप गेहेऽसौ सर्वसिद्धिसमन्विते ।
पौलोमी तं सभाहीनं दृष्ट्वा प्रोवाच वासवम् ॥
निःश्वसन्तं भयत्रस्तं नष्टसंज्ञं विचेतसम् ।
किं प्रभोऽद्य भयार्तोऽसि मृतस्ते दारुणो रिपुः ॥
का चिन्ता वर्तते कान्त तव शत्रुनिषूदन ।
कस्माच्छोचसि लोकेश निःश्वसन्प्राकृतो यथा ॥
नान्योऽस्ति बलवाञ्छत्रुर्येन चिन्तापरो भवान् । इन्द्र उवाच नारातिर्बलवान्मेऽस्ति न शान्तिर्न सुखं तथा ॥
ब्रह्महत्याभयाद्राज्ञि बिभेमि सततं गृहे ।
न नन्दनं सुखकरं नामृतं न गृहं वनम् ॥
षष्ठ स्कन्ध ७५७ मार डाला । वचन देकर भी जिस प्रकार [ छलपूर्वक ] २ ९ यह वृत्रासुर मारा गया, वैसा विपरीत आचरण इन्द्र और विष्णुके अतिरिक्त कौन होगा, जो कर सकता है! इस प्रकारकी कथाएँ तथा और भी बातें लोगों में ३० व्यापक रूपसे होने लगीं ॥ २४–३० ॥ इन्द्र भी अपनी कीर्ति नष्ट करनेवाली तरह-३१ तरहकी बातें सुनते रहे । संसारमें जिसकी कीर्ति नष्ट हो गयी, उसके कलुषित जीवनको धिक्कार है । रास्तेमें जाते हुए ऐसे व्यक्तिको देखकर शत्रु हँस ३२ पड़ता है । राजर्षि इन्द्रद्युम्नने कोई पाप नहीं किया था फिर भी कीर्ति नेष्ट हो जानेसे वे स्वर्गसे गिर गये थे; तब पाप करनेवाला कैसे नहीं गिरेगा? राजा ययातिका ३३ बहुत थोड़ेसे अपराधपर पतन हो गया था । इसी प्रकार एक राजाको अठारह युगोंतक केकड़ेकी योनिमें रहना ३४ पड़ा था । भृगुकी पत्नीका मस्तक काटनेके कारण अच्युत भगवान् श्रीहरिको ब्रह्मशापसे मकर आदि रूपोंमें पशुयोनिमें जन्म लेना पड़ा । विष्णुको भी ३५ वामन होकर याचनाके लिये बलिके घर जाना पड़ा तब यदि कुकर्मी मनुष्य दुःख पाये तो क्या आश्चर्य ३६ है! हे भारत! श्रीरामचन्द्रजीको भी भृगुके शापसे वनवासकालमें सीतासे वियोगका महान् कष्ट उठाना पड़ा । उसी प्रकार इन्द्रको भी ब्रह्महत्याजनित महान् ३७ | भय प्राप्त करके समस्त सिद्धियोंसे युक्त भवनमें भी सुख नहीं प्राप्त होता था । उन्हें दीर्घ श्वास लेते, ३८ भयग्रस्त, चेतनारहित, खिन्नमनस्क और सभामें न जाते देखकर शचीने पूछा- हे प्रभो! आजकल आप भयभीत क्यों रहते हैं, आपका भयंकर शत्रु तो मर ३ ९ गया है । हे कान्त! हे शत्रुहन्ता! आपको क्या चिन्ता है? हे लोकेश! साधारण मनुष्यकी भाँति लम्बी-लम्बी साँसें लेते हुए आप शोक क्यों करते हैं? ४० आपका कोई बलवान् शत्रु भी तो नहीं है, जिससे आप चिन्ताकुल हों ॥ ३१- - ४० ॥ इन्द्र बोले - हे राज्ञि! यद्यपि अब मेरा कोई ४१ बलवान् शत्रु नहीं है तथापि ब्रह्महत्याके भयसे मैं निरन्तर डरता रहता हूँ । घरमें रहते हुए भी मुझे न सुख है और न शान्ति । नन्दनवन, अमृत, घर तथा ४२ । वन - कुछ भी मुझे सुखकर नहीं लगता । गन्धर्वोंका
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७५८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ७
गन्धर्वाणां तथा गेयं नृत्यमप्सरसां पुनः ।
न त्वं सुखकरा नारी नाना च सुरयोषितः ॥ ४३
न तथा कामधेनुश्च देववृक्षः सुखप्रदः ।
किं करोमि क्व गच्छामि क्व शर्म मम जायते ॥ ४४
इति चिन्तापरः कान्ते न लभे सुखमात्मनि । व्यास उवाच इत्युक्त्वा वचनं शक्रः प्रियां परमकातराम् ॥ ४५
निर्जगाम गृहान्मन्दो मानसं सर उत्तमम् ।
पद्मनाले प्रविष्टोऽसौ भयार्तः शोककर्षितः ॥ ४६
न प्राज्ञायत देवेन्द्रस्त्वभिभूतश्च कल्मषैः ।
प्रतिच्छन्नो वसत्यप्सु चेष्टमान इवोरगः ॥ ४७
असहायस्तुराषाडैच्चिन्तात विकलेन्द्रियः ।
ततः प्रनष्टे देवेन्द्रे ब्रह्महत्याभयार्दिते ॥ ४८
सुराश्चिन्तातुराश्चासन्नुत्पाताश्चाभवन्नथ ।
ऋषयः सिद्धगन्धर्वा भयार्ताश्चाभवन्भृशम् ॥ ४ ९
अराजकं जगत्सर्वमभिभूतमुपद्रवैः ।
अवर्षणं तदा जातं पृथिवी क्षीणवैभवा ॥ ५०
विच्छिन्नस्त्रोतसो नद्यः सरांस्यनुदकानि वै ।
एवं त्वराजके जाते देवता मुनयस्तथा ॥ ५१
विचार्य नहुषं चक्रुः शक्रं सर्वे दिवौकसः ।
सम्प्राप्य नहुषो राजा धर्मिष्ठोऽपि रजोबलात् ॥ ५२
बभूव विषयासक्तः पञ्चबाणशराहतः ।
अप्सरोभिर्वृतः क्रीडन्देवोद्यानेषु भारत ॥५३
शक्रपत्नीगुणाञ्छ्रुत्वा चकमे तां स पार्थिवः ।
ऋषीनाह किमिन्द्राणी नोपगच्छति मां किल ॥ ५४ ।
भवद्भिश्चामरैः सर्वैः कृतोऽहं वासवस्त्विह ।
प्रेषयध्वं सुराः कामं सेवार्थं मम वै शचीम् ॥ ५५
प्रियं चेन्मम कर्तव्यं सर्वथा मुनयोऽमराः ।
अहमिन्द्रोऽद्य देवानां लोकानां च तथेश्वरः ॥ ५६
आगच्छतु शची मह्यं क्षिप्रमद्य निवेशनम् । गान और अप्सराओंका नृत्य तथा यहाँतक कि तुम और अन्य देवांगनाएँ भी मुझे सुखकर नहीं लगतीं । न कामधेनु और न ही कल्पवृक्ष मुझे सुख प्रदान करते हैं । मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, मुझे शान्ति कहाँ मिलेगी? हे प्रिये! इसी चिन्तामें पड़ा हुआ मैं अपने मनमें शान्ति नहीं प्राप्त कर पा रहा हूँ ॥ ४१ - ४४३ ॥ व्यासजी बोले – अत्यन्त घबरायी हुई अपनी प्रिय पत्नीसे ऐसा कहकर मूढ इन्द्र घरसे निकल पड़े और उत्तम मानसरोवरको चले गये । भयसे पीडित और शोकसन्तप्त होकर वे एक कमलनालमें प्रविष्ट हो गये । पापकर्मोंसे पराभूत हुए देवराज इन्द्रको कोई जान नहीं सका । वे सर्प समान चेष्टा करते हुए जलमें छिपकर रह रहे थे । उस समय वे इन्द्र असहाय, चिन्तित और व्याकुल इन्द्रियोंवाले हो गये ॥ ४५ - ४७३ ॥ ब्रह्महत्याके भयसे दुःखी होकर देवराज इन्द्रके अदृश्य हो जानेपर देवगण चिन्तातुर हो उठे तथा अनेक प्रकारके उत्पात होने लगे । ऋषि, सिद्ध और गन्धर्वगण भी अत्यन्त भयभीत हो गये । उपद्रवोंके होनेसे सम्पूर्ण जगत् अराजकतासे ग्रस्त हो गया । उस समय अनावृष्टि उपस्थित हो गयी और पृथ्वी वैभवशून्य हो गयी, नदियोंके स्रोत सूख गये और तालाब बिना जलके हो गये - इस प्रकारकी अराजकताको देखकर स्वर्गके देवताओं और मुनियोंने विचार करके नहुषको इन्द्र बना दिया ॥ ४८–५१३ ॥ राज्य प्राप्त करनेपर राजा नहुष धर्मात्मा होते हुए भी राजसी वृत्तिके कारण कामबाणसे आहत हो विषयासक्त हो गये । हे भारत! देवोद्यानोंमें क्रीडारत रहते हुए वे सदा अप्सराओंसे घिरे रहते थे । ५२-५३ ॥ उस राजा नहुषके मनमें इन्द्राणी शचीके गुणोंको सुनकर उन्हें प्राप्त करनेकी इच्छा हुई । उसने ऋषियोंसे कहा- मेरे पास इन्द्राणी क्यों नहीं आती? आपलोग और देवताओंने मुझे इन्द्र बनाया, इसलिये हे देवताओ! शचीको मेरी सेवाके लिये भेजिये । हे मुनियो तथा देवताओ! आपलोगोंको मेरा प्रिय कार्य अवश्य करना चाहिये । इस समय मैं देवताओंका इन्द्र और समस्त लोकोंका स्वामी हूँ; शची शीघ्र ही आज मेरे भवनमें आ जायँ ॥ ५४-५६३ ॥
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अ ० ८ ] षष्ठ इति तस्य वचः श्रुत्वा देवा देवर्षयस्तथा ॥ ५७
गत्वा चिन्तातुराः प्रोचुः पौलोमीं प्रणतास्ततः ।
इन्द्रपनि दुराचारो नहुषस्त्वामिहेच्छति ॥ ५८
कुपितोऽस्मानुवाचेदं प्रेषयध्वं शचीमिह ।
किं कुर्मस्तदधीनाः स्मो येनेन्द्रोऽयं कृतः किल ॥ ५ ९
तच्छ्रुत्वा दुर्मना देवी बृहस्पतिमुवाच ह ।
रक्ष मां नहुषाद् ब्रह्मंस्तवास्मि शरणं गता ॥ ६०
बृहस्पतिरुवाच
न भेतव्यं त्वया देवि नहुषात्पापमोहितात् ।
न त्वां दास्याम्यहं वत्से त्यक्त्वा धर्मं सनातनम् ॥ ६१
शरणागतमार्तं च यो ददाति नराधमः ।
स एव नरकं याति यावदाभूतसंप्लवम् ।
स्वस्था भव पृथुश्रोणि न त्यक्ष्ये त्वां कदाचन ॥ ६२
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां स्कन्ध ७५ ९ उसकी यह बात सुनकर चिन्तासे व्याकुल देवता तथा ऋषिगण शचीके पास जाकर उन्हें प्रणाम करके कहने लगे - हे इन्द्रपनि! दुराचारी नहुष इस समय आपकी कामना करता है । उसने क्रुद्ध होकर हमसे यह बात कही है ' शचीको यहाँ भेज दीजिये । ' हम उसके अधीन हैं, अतः कर ही क्या सकते हैं; क्योंकि उसे इन्द्र बना दिया गया है ॥ ५७ – ५ ९ ॥ यह सुनकर दुःखितमन शचीने बृहस्पतिसे कहा— ' हे ब्रह्मन्! नहुषसे मेरी रक्षा कीजिये; मैं आपकी शरणमें हूँ'॥६० ॥
बृहस्पति बोले - – हे देवि! पापसे मोहित नहुषसे तुम्हें भय नहीं करना चाहिये । हे पुत्र! मैं सनातनधर्मका त्यागकर तुम्हें उसको नहीं दूँगा ॥ ६१ ॥
जो अधम मनुष्य शरणमें आये हुए तथा दुःखी प्राणीको दूसरोंको सौंप देता है वह प्रलयपर्यन्त नरकमें वास करता है । अतः हे पृथुश्रोणि! तुम निश्चिन्त रहो, मैं तुम्हारा त्याग कभी नहीं करूँगा ॥ ६२ ॥
संहितायां षष्ठस्कन्धे इन्द्रस्य पद्मनालप्रवेशानन्तरं नहुषस्य देवेन्द्रपदे ऽभिषेकवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
अथाष्टमोऽध्यायः इन्द्राणीको बृहस्पतिकी शरणमें जानकर नहुषका क्रुद्ध होना, देवताओंका नहुषको समझाना, बृहस्पतिके परामर्शसे इन्द्राणीका नहुषसे समय माँगना, देवताओंका भगवान् विष्णुके पास जाना और विष्णुका उन्हें देवीको प्रसन्न करनेके लिये अश्वमेधयज्ञ करनेको कहना, बृहस्पतिका शचीको भगवतीकी आराधना करनेको कहना, शचीकी आराधनासे प्रसन्न होकर देवीका प्रकट होना व्यास उवाच नहुषस्त्वथ तां श्रुत्वा गुरोस्तु शरणं गताम् चुक्रोध स्मरबाणार्तस्तमाङ्गिरसमाशु वै ॥ देवानाहाङ्गिरासूनुर्हन्तव्योऽयं मया किल इतीन्द्राणीं गृहे मूढो रक्षतीति मया श्रुतम् इति तं कुपितं दृष्ट्वा देवाः सर्षिपुरोगमाः अब्रुवन्नहुषं घोरं सामपूर्वं वचस्तदा और शचीको इन्द्रका दर्शन होना व्यासजी बोले- वे शची देवगुरुकी शरण में चली । गयी हैं — ऐसा सुनकर कामबाणसे आहत नहुष अंगिरापुत्र १ बृहस्पतिपर बहुत कुपित हुआ और उसने देवताओंसे कहा- यह अंगिरापुत्र बृहस्पति आज मेरेद्वारा निश्चय । ही मारा जायगा; क्योंकि मैंने ऐसा सुना है कि उस ॥ २ मूर्खने इन्द्राणीको अपने घरमें रखा है ॥१-२ ॥ इस प्रकार नहुषको क्रुद्ध देखकर प्रधान । ऋषियोंसहित देवतागण उस दुष्टसे सामनीतियुक्त ॥ ३ | वचन बोले —॥३ ॥
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७६० क्रोधं संहर राजेन्द्र त्यज पापमतिं प्रभो निन्दन्ति धर्मशास्त्रेषु परदाराभिमर्शनम् शक्रपत्नी सदा साध्वी जीवमाने पतौ पुनः कथमन्यं पतिं कुर्यात्सुभगातिपतिव्रता त्रिलोकीशस्त्वमधुना शास्ता धर्मस्य वै विभो त्वादृशोऽधर्ममातिष्ठेत्तदा नश्येत्प्रजा ध्रुवम् ॥ सर्वथा प्रभु कार्यं शिष्टाचारस्य रक्षणम् वारमुख्याश्च शतशो वर्तन्तेऽत्र शचीसमाः रतिस्तु कारणं प्रोक्तं शृङ्गारस्य महात्मभिः रसहानिर्बलात्कारे कृते सति तु जायते उभयोः सदृशं प्रेम यदि पार्थिवसत्तम तदा वै सुखसम्पत्तिरुभयोरुपजायते तस्माद्भावमिमं मुञ्च परदाराभिमर्शने श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ८ । हे राजेन्द्र! क्रोध दूर करो और पापकारिणी ॥ ४ बुद्धिका त्याग करो । हे प्रभो! [ मनीषियोंने ] धर्मशास्त्रोंमें परस्त्रीगमनकी निन्दा की है ॥ ४ ॥
। इन्द्रकी पत्नी शची सदासे अत्यन्त साध्वी, ॥ ५ सौभाग्यवती और पतिव्रता हैं; फिर अपने पतिके जीवित रहते वे कैसे दूसरेको पति बना सकती हैं? ॥ ५ ॥
। विभो! आज इस समय आप तीनों लोकोंके स्वामी तथा धर्मके रक्षक हैं । आप - जैसा राजा ६ अधर्ममें स्थित हो जाय तब तो निश्चितरूपसे प्रजाका । नाश हो जायगा ॥ ६ ॥
॥ ७ राजाको सब प्रकारसे सदाचारकी रक्षा करनी चाहिये । यहाँ स्वर्गमें तो शचीके सदृश सैकड़ों प्रमुख । अप्सराएँ हैं ॥७ ॥
॥ ८ महात्माओंने रतिको ही शृंगारका कारण बताया है, बलप्रयोग किये जानेपर तो रसकी हानि ही । होती है ॥ ८ ॥
॥ हे नृपश्रेष्ठ! जब [ स्त्री - पुरुष ] दोनोंमें एक समान प्रेम रहता है, तभी उन दोनोंको अधिक सुख । प्राप्त होता है ॥ ॥ अतः हे देवेन्द्र! परस्त्रीगमनकी यह भावना सद्भावं कुरु देवेन्द्र पदं प्राप्तोऽस्यनुत्तमम् ॥ १० छोड़ दीजिये और श्रेष्ठ आचरण कीजिये; क्योंकि ऋद्धिक्षयस्तु पापेन पुण्येनातिविवर्धनम् । तस्मात्पापं परित्यज्य सन्मतिं कुरु पार्थिव नहुष उवाच गौतमस्य यदा भुक्ता दाराः शक्रेण देवताः वाचस्पतेस्तु सोमेन क्व यूयं संस्थितास्तदा
परोपदेशे कुशला प्रभवन्ति नराः किल ।
कर्ता चैवोपदेष्टा च दुर्लभः पुरुषो भवेत् ॥
मामागच्छतु सा देवी हितं स्यादद्भुतं हि वः ।
एतस्याः परमं देवाः सुखमेवं भविष्यति ॥
अन्यथा न हि तुष्येऽहं सत्यमेतद् ब्रवीमि वः ।
विनयाद्वा बलाद्वापि तामाशु प्रापयन्त्विह ॥
आपको इन्द्र - जैसा अतिश्रेष्ठ पद प्राप्त है ॥ १० ॥
हे राजन्! पापसे सम्पत्तिका क्षय होता है औ ॥ ११ पुण्यसे महान् वृद्धि होती है, इसलिये पापकर्म छोड़कर सात्त्विक बुद्धिका आश्रय लीजिये ॥ ११ ॥
नहुषने कहा- हे देवताओ! जब देवराज इन्द्रने । गौतमकी पत्नीके साथ और चन्द्रमाने बृहस्पतिकी पत्नीके ॥ १२ साथ अनाचार किया था, तब तुमलोग कहाँ थे? ॥ १२ ॥
लोग दूसरोंको उपदेश देनेमें बहुत कुशल होते हैं, परंतु उपदेश देनेवाला तथा उसका पालन १३ करनेवाला पुरुष दुर्लभ होता है ॥१३ ॥
हे देवताओ! वह शची मेरे पास आ जाय, इसीमें आप सबका परम कल्याण है; इससे उसको १४ भी अत्यन्त सुख मिलेगा ॥१४ ॥
अन्य किसी भी प्रकारसे मैं सन्तुष्ट नहीं होऊँगा, यह मैं तुमलोगोंसे कह रहा हूँ । इसलिये विनयसे या १५ । बलपूर्वक तुमलोग उसे शीघ्र ही मुझे प्राप्त कराओ ॥ १५ ॥
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अ ० ८ ]
इति तस्य वचः श्रुत्वा देवाश्च मुनयस्तथा ।
तमूचुश्चातिसन्त्रस्ता नहुषं मदनातुरम् ॥
इन्द्राणीमानयिष्यामः सामपूर्वं तवान्तिकम् ।
इत्युक्त्वा ते तदा जग्मुर्बृहस्पतिनिकेतनम् ॥
व्यास उवाच
ते गत्वाङ्गिरसः पुत्रं प्रोचुः प्राञ्जलयः सुराः ।
जानीमः शरणं प्राप्तामिन्द्राणीं तव वेश्मनि ॥
सा देया नहुषायाद्य वासवोऽसौ कृतो यतः ।
वृणोत्वियं वरारोहा पतित्वे वरवर्णिनी ॥
बृहस्पतिः सुरानाह तच्छ्रुत्वा दारुणं वचः ।
नाहं त्यक्ष्ये तु पौलोमीं सतीं च शरणागताम् ॥
देवा ऊचुः
उपायोऽन्यः प्रकर्तव्यो येन सोऽद्य प्रसीदति ।
अन्यथा कोपसंयुक्तो दुराराध्यो भविष्यति ॥
गुरुरुवाच
तत्र गत्वा शची भूपं प्रलोभ्य वचसा भृशम् ।
करोतु समयं बाला पतिं ज्ञात्वा मृतं भजे ॥
इन्द्रे जीवति मे कान्ते कथमन्यं करोम्यहम् ।
अन्वेषणार्थं गन्तव्यं मया तस्य महात्मनः ॥
इति सा समयं कृत्वा वञ्चयित्वा च भूपतिम् ।
भर्तुरानयने यत्नं करोतु मम वाक्यतः ॥
इति सञ्चिन्त्य मे सर्वे बृहस्पतिपुरोगमाः ।
नहुषं सहिता जग्मुरिन्द्रपल्या दिवौकसः ॥
तानागतान्समीक्ष्याह तदा कृत्रिमवासवः ।
जहर्ष च मुदायुक्तस्तां वीक्ष्य मुदितोऽब्रवीत् ॥
अद्यास्मि वासवः कान्ते भज मां चारुलोचने ।
पतित्वे सर्वलोकस्य पूज्योऽहं विहितः सुरैः ॥
इत्युक्ता सा नृपं प्राह वेपमाना त्रपायुता ।
वरमिच्छाम्यहं राजंस्त्वत्तः प्राप्तं सुरेश्वर ॥
षष्ठ स्कन्ध ७६१ उसकी यह बात सुनकर भयभीत देवताओं और १६ मुनियोंने उस कामातुर नहुषसे कहा- हमलोग सामनीतिसे इन्द्राणीको आपके पास लायेंगे - ऐसा कहकर वे लोग बृहस्पतिके निवासपर चले गये ॥ १६ - १७ ॥ १७ व्यासजी बोले- तदनन्तर वे देवगण अंगिरा पुत्र बृहस्पतिके पास जाकर हाथ जोड़कर उनसे बोले- हमें ज्ञात हुआ है कि इन्द्राणीको आपके घरमें शरण प्राप्त है, उन्हें आज ही नहुषको देना है; १८ । क्योंकि वह इन्द्र बना दिया गया है । यह सुलक्षणा सुन्दरी उन्हें पतिके रूपमें वरण कर ले ॥ १८-१९ ॥ १ ९ यह दारुण वचन सुनकर बृहस्पतिने देवताओंसे कहा- मैं शरणमें आयी हुई इस पतिव्रता शचीका त्याग नहीं करूँगा ॥२० ॥
२० देवगण बोले- तब दूसरा कोई उपाय करना चाहिये, जिससे वह आज प्रसन्न हो जाय, अन्यथा क्रुद्ध होनेपर वह दुराराध्य हो जायगा ॥ २१ ॥
देवगुरु बोले- सुन्दरी शची वहाँ जाकर २१ राजाको अपनी बातसे अत्यन्त मोहित करके यह शपथ ले कि ‘ अपने पतिको मृत जाननेके बाद ही मैं आपको अंगीकार करूँगी । अपने पति इन्द्र २२ जीवित रहते मैं किसी दूसरेको पति कैसे बना लूँ? इसलिये उन महाभागकी खोजके लिये मुझे जाना पड़ेगा । ' इस प्रकार वह मेरे कथनके अनुसार २३ शपथ लेकर और राजाको छलकर अपने पतिको लानेका प्रयत्न करे ॥ २२–२४ ॥ ऐसा विचार करके सभी देवता बृहस्पतिको २४ आगे करके इन्द्रपत्नी शचीके साथ नहुषके पास गये ॥ २५ ॥
२५ उन सभीको आया हुआ देखकर वह कृत्रिम इन्द्र नहुष हर्षित हुआ । उस शचीको देखकर वह आनन्दित हो गया और प्रसन्नतापूर्वक बोला –हे २६ प्रिये! आज मैं इन्द्र हूँ, हे सुन्दर नेत्रोंवाली! मुझे पतिरूपमें अंगीकार करो । मैं देवताओंके द्वारा सम्पूर्ण २७ लोकका पूज्य बना दिया गया हूँ ॥ २६-२७ ॥ नहुषके ऐसा कहनेपर शचीने लज्जित होकर काँपते हुए कहा - हे राजन्! हे सुरेश्वर! मैं आपसे २८ । एक वरप्राप्तिकी इच्छा करती हूँ । आप कुछ समयतक