देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 771–780
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 771–780
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७६२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ८
किञ्चित्कालं प्रतीक्षस्व यावत्कुर्वे विनिर्णयम् ।
इन्द्रोऽस्तीति न वास्तीति सन्देहो मे हृदि स्थितः ॥ २ ९
ततस्त्वां समुपस्थास्ये कृत्वा निश्चयमात्मनि ।
तावत्क्षमस्व राजेन्द्र सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ३०
न हि विज्ञायते शक्रो नष्टः किं वा क्व वा गतः ।
एवमुक्तः स चेन्द्राण्या नहुषः प्रीतिमानभूत् ॥ ३१
व्यसर्जयत्स तां देवीं तथेत्युक्त्वा मुदान्वितः ।
सा विसृष्टा नृपेणाशु गत्वा प्राह सुरान्सती ॥ ३२
इन्द्रस्यागमने यत्नं कुरुताद्य कृतोद्यमाः ।
श्रुत्वा तद्वचनं देवा इन्द्राण्या रसवच्छुचि ॥ ३३
मन्त्रयामासुरेकाग्राः शक्रार्थं नृपसत्तम ।
ते गत्वा वैष्णवं धाम तुष्टुवुः परमेश्वरम् ॥ ३४
आदिदेवं जगन्नाथं शरणागतवत्सलम् ।
ऊचुश्चैनं समुद्विग्ना वाक्यं वाक्यविशारदाः ॥ ३५
देवदेव सुरपतिर्ब्रह्महत्याप्रपीडितः ।
अदृश्यः सर्वभूतानां क्वापि तिष्ठति वासवः ॥ ३६
त्वया निहते विप्रे ब्रह्महत्या कुतः प्रभो ।
त्वं गतिस्तस्य भगवन्नस्माकं च तथैव हि ॥ ३७
त्राहि नः परमापन्नान्मोक्षं तस्य विनिर्दिश ।
देवानां वचनं श्रुत्वा कातरं विष्णुरब्रवीत् ॥ ३८
यजतामश्वमेधेन शक्रपापनिवृत्तये ।
पुण्येन हयमेधेन पावितः पाकशासनः ॥ ३ ९
पुनरेष्यति देवानामिन्द्रत्वमकुतोभयः ।
हयमेधेन सन्तुष्टा देवी श्रीजगदम्बिका ॥ ४०
ब्रह्महत्यादिपापानि नाशयिष्यत्यसंशयम् ।
यस्याः स्मरणमात्रेण पापजालं विनश्यति ॥ ४१
किं पुनर्वाजिमेधेन तत्प्रीत्यर्थं कृतेन च ।
इन्द्राणी कुरुतान्नित्यं भगवत्याः प्रपूजनम् ॥ ४२ ।
प्रतीक्षा करें, जबतक मैं यह निर्णय कर लूँ कि मेरे पति इन्द्र जीवित हैं या नहीं; क्योंकि इस बातका मेरे मनमें सन्देह है । मनमें इसका निश्चय करनेके अनन्तर मैं आपकी सेवामें उपस्थित होऊँगी । हे राजेन्द्र! तबतकके लिये क्षमा कीजिये; यह मैं सत्य कह रहीं हूँ । अभी यह ज्ञात नहीं है कि इन्द्र नष्ट हो गये हैं
या कहीं चले गये हैं । २८- -३०३ ॥
इन्द्राणीके ऐसा कहनेपर नहुष प्रसन्न हो गया और ' ऐसा ही हो ' – यह कहकर उसने उन देवी शचीको प्रसन्नतापूर्वक विदा किया । राजासे मुक्ति पाकर वह पतिव्रता शची शीघ्रतापूर्वक देवताओंके पास जाकर बोली- आपलोग उद्यमशील होकर इन्द्रको ले आनेका प्रयास करें॥३१-३२३ ॥ हे नृपश्रेष्ठ! इन्द्राणीका पवित्र और मधुर वचन सुनकर सभी देवताओंने एकाग्र होकर इन्द्रके विषयमें विचार - विमर्श किया । तदनन्तर वे वैकुण्ठलोक जाकर शरणागतवत्सल आदिदेव भगवान् जगन्नाथकी स्तुति करने लगे । उन वाक्पटुविशारद देवताओंने उद्विग्न होकर इस प्रकार कहा- ॥ ३३ – ३५ ॥ हे देवाधिदेव! ब्रह्महत्यासे पीड़ित देवराज इन्द्र सभी प्राणियोंसे अदृश्य होकर कहीं रह रहे हैं । हे प्रभो! आपके परामर्शसे ही उन्होंने ब्राह्मण वृत्रासुरका वध किया था । तब ब्रह्महत्या कहाँ हुई? हे भगवन्! आप ही उनकी और हम सबकी एकमात्र गति हैं । इस महान् कष्टमें पड़े हुए हम सबकी रक्षा कीजिये और उन इन्द्रके ब्रह्महत्यासे
छूटने का उपाय बताइये ॥। ३६-३७३ ॥
देवताओंका करुण वचन सुनकर भगवान् विष्णु बोले- इन्द्रके पापकी निवृत्तिके लिये अश्वमेधयज्ञ कीजिये; अश्वमेध करनेसे प्राप्त पुण्यसे इन्द्र पवित्र हो जायँगे । इससे वे पुनः देवताओंके इन्द्रत्वको पा जायँगे, फिर कोई भय नहीं रहेगा । अश्वमेधयज्ञसे भगवती श्रीजगदम्बिका प्रसन्न होकर ब्रह्महत्या आदि पाप निश्चितरूपसे नष्ट कर देंगी । जिनके स्मरणमात्रसे पापोंका समूह नष्ट हो जाता है, उन जगदम्बाकी प्रसन्नताके लिये किये गये अश्वमेधयज्ञका क्या कहना! इन्द्राणी भी नित्य भगवती जगदम्बाकी पूजा
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अ ०८ ]
आराधनं शिवायास्तु सुखकारि भविष्यति ।
नहुषोऽपि जगन्मातुर्मायया मोहितः किल ॥
विनाशं स्वकृतेनाशु गमिष्यत्येनसा सुराः ।
पावितश्चाश्वमेधेन तुराषाडपि वैभवम् ॥
प्राप्स्यत्यचिरकालेन स्वमासनमनुत्तमम् । ते तु श्रुत्वा शुभां वाणीं विष्णोरमिततेजसः ।
जग्मुस्तं देशमनिशं यत्रास्ते पाकशासनः ।
तमाश्वास्य सुराः शक्रं बृहस्पतिपुरोगमाः ॥
कारयामासुरखिलं हयमेधं महाक्रतुम् ।
विभज्य ब्रह्महत्यां तु वृक्षेषु च नदीषु च ॥
पर्वतेषु पृथिव्यां च स्त्रीषु चैवाक्षिपद्विभुः ।
तां विसृज्य च भूतेषु विपापः पाकशासनः ॥
विज्वरः समभूद् भूयः कालाकाङ्क्षी स्थितो जले ।
अदृश्यः सर्वभूतानां पद्मनाले व्यतिष्ठत ॥
देवास्तु निर्गताः स्थाने कृत्वा कार्यं तदद्भुतम् ।
पौलोमी तु गुरुं प्राह दुःखिता विरहाकुला ॥
कृतयज्ञोऽपि मे भर्ता किमदृश्यः पुरन्दरः ।
कथं द्रक्ष्ये प्रियं स्वामिंस्तमुपायं वदस्व मे ॥
बृहस्पतिरुवाच
त्वमाराधय पौलोम देवीं भगवतीं शिवाम् ।
दर्शयिष्यति ते नाथं देवी विगतकल्मषम् ॥
आराधिता जगद्धात्री नहुषं वारयिष्यति ।
मोहयित्वा नृपं स्थानात्पातयिष्यति चाम्बिका ॥
इत्युक्ता सा तदा तेन पुलोमतनया नृप ।
जग्राह मन्त्रं विधिवद् गुरोर्देव्याः ससाधनम् ॥
विद्यां प्राप्य गुरोर्देवी देवीं श्रीभुवनेश्वरीम् ।
सम्यगाराधयामास बलिपुष्पार्चनैः शुभैः ॥
षष्ठ स्कन्ध ७६३ करें; भगवती शिवाकी आराधना सुखकारी होगी । हे ४३ देवताओ! नहुष भी जगदम्बिकाकी मायासे मोहित होकर शीघ्र ही अपने किये हुए पापसे अवश्य विनष्ट हो जायगा । अश्वमेधयज्ञसे पवित्र होकर इन्द्र भी ४४ शीघ्र ही अपने उत्तम इन्द्रपद और वैभवको प्राप्त करेंगे ॥ ३८–४४३ ॥ अमित तेजवाले भगवान् विष्णुकी इस शुभ ४५ वाणीको सुनकर वे देवगण उस स्थानको चल दिये जहाँ इन्द्र रह रहे थे । बृहस्पतिके नेतृत्वमें देवताओंने ४६ इन्द्रको आश्वासन देकर सम्पूर्ण अश्वमेध महायज्ञ सम्पन्न कराया ॥ ४५-४६३ ॥ तत्पश्चात् भगवान् विष्णुने ब्रह्महत्याको ४७ विभाजितकर वृक्षों, नदियों, पर्वतों, पृथ्वी और स्त्रियोंपर फेंक दिया । इस प्रकार उसको प्राणि - पदार्थोंमें विसर्जित करके इन्द्र पापरहित हो गये । सन्तापरहित होनेपर भी ४८ इन्द्र अच्छे समयकी प्रतीक्षा करते हुए जलमें ही ठहरे रहे । वहाँ सभी प्राणियोंसे अदृश्य रहते हुए जलमें वे ४ ९ एक कमलनालमें स्थित रहे ॥ ४७–४९ ॥ देवगण उस अद्भुत कार्यको करके अपने स्थानको चले गये । तब शचीने दुःख और वियोगसे व्याकुल ५० होकर देवगुरु बृहस्पतिसे कहा – यज्ञ करनेपर भी मेरे स्वामी इन्द्र क्यों अदृश्य हैं? हे स्वामिन्! मैं अपने प्रियको कैसे देख सकूँगी; आप मुझे उस उपायको ५१ बतायें ॥ ५०-५१ ॥ बृहस्पति बोले – हे पौलोमि! तुम देवी भगवती शिवाकी आराधना करो । वे देवी तुम्हारे पापरहित पतिका तुम्हें दर्शन करायेंगी । आराधना करनेपर ५२ जगत्का पालन करनेवाली वे भगवती नहुषको शक्तिहीन कर देंगी । वे अम्बिका राजाको मोहित ५३ करके उसे उसके स्थानसे गिरा देंगी ॥ ५२-५३ ॥ हे राजन्! बृहस्पतिजीके ऐसा कहनेपर पुलोमापुत्री शचीने देवगुरुसे पूजाविधिसहित देवीका ५४ मन्त्र विधिवत् प्राप्त कर लिया ॥ ५४ ॥
गुरु मन्त्रविद्या प्राप्त करके देवी शचीने बलि, पुष्प आदि शुभ अर्चनोंसे भगवती श्रीभुवनेश्वरीकी ५५ सम्यक् आराधना की ॥ ५५ ॥
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७६४ त्यक्तान्यभोगसम्भारा तापसीवेषधारिणी चकार पूजनं देव्याः प्रियदर्शनलालसा ॥ कालेन कियता तुष्टा प्रत्यक्षं दर्शनं ददौ सौम्यरूपधरा देवी वरदा हंसवाहिनी ॥ सूर्यकोटिप्रतीकाशा चन्द्रकोटिसुशीतला विद्युत्कोटिसमानाभा चतुर्वेदसमन्विता ॥ पाशांकुशाभयवरान्दधती निजबाहुभिः । आपादलम्बिनीं स्वच्छां मुक्तामालां च बिभ्रती
प्रसन्नस्मेरवदना लोचनत्रयभूषिता ।
आब्रह्मकीटजननी करुणामृतसागरा ॥
अनन्तकोटिब्रह्माण्डनायिका परमेश्वरी । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ८ । अपने प्रिय पतिके दर्शनकी लालसासे युक्त शची ५६ समस्त भोगोंका त्यागकर तपस्विनीका वेश धारणकर देवीका पूजन करने लगीं ॥ ५६ ॥
। [ आराधना करनेपर ] कुछ समय बाद प्रसन्न ५७ होकर भगवतीने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया । वे वरदायिनी । देवी सौम्य रूप धारण किये हुए हंसपर सवार थीं । वे करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान, करोड़ों चन्द्रमाओंके ५८ समान शीतल, करोड़ों विद्युत् के समान प्रभासे युक्त और चारों वेदोंसे समन्वित थीं । उन्होंने अपनी भुजाओंमें ॥ ५ ९ पाश, अंकुश, अभय तथा वर - मुद्राएँ धारण कर रखी थीं, वे चरणोंतक लटकती हुई स्वच्छ मोतियोंकी माला पहने हुए थीं । उनके मुखपर मधुर मुसकान थी ६० और वे तीन नेत्रोंसे सुशोभित थीं । ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त सभी प्राणियोंकी जननी, करुणारूपी अमृतकी सौम्यानन्तरसैर्युक्तस्तनद्वयविराजिता ॥६१ सागरस्वरूपा तथा अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंकी अधीश्वरी सर्वेश्वरी च सर्वज्ञा कूटस्थाक्षररूपिणी तामुवाच प्रसन्ना सा शक्रपत्नीं कृतोद्यमाम् ॥ मेघगम्भीरशब्देन मुदमाददती भृशम् । देव्युवाच वरं वरय सुश्रोणि वाञ्छितं शक्रवल्लभे ददाम्यद्य प्रसन्नास्मि पूजिता सुभृशं त्वया वरदाहं समायाता दर्शनं सहजं न मे ॥ अनेककोटिजन्मोत्थपुण्यपुजैर्हि लभ्यते । इत्युक्ता सा तदा देवी तामाह प्रणता पुरः
शक्रपत्नी भगवतीं प्रसन्नां परमेश्वरीम् ।
वाञ्छामि दर्शनं मातः पत्युः परमदुर्लभम् ॥
नहुषाद्भयनाशं च स्वपदप्रापणं तथा देव्युवाच गच्छ त्वमनया दूत्या सार्धं श्रीमानसं सरः
यत्र मे मूर्तिरचला विश्वकामाभिधा मता ।
तत्र पश्यसि शक्रं त्वं दुःखितं भयविह्वलम् ॥
मोहयिष्यामि राजानं कालेन कियता पुनः । वे परमेश्वरी सौम्य थीं तथा अनन्त रसोंसे आपूरित । स्तनयुगलसे सुशोभित हो रही थीं । सबकी अधीश्वरी, ६२ सब कुछ जाननेवाली, कूटस्थ और बीजाक्षरस्वरूपिणी वे भगवती उद्यमशील इन्द्रपत्नी शचीसे प्रसन्न होकर मेघके समान अत्यन्त गम्भीर वाणीके द्वारा उन्हें परम हर्षित करती हुई कहने लगीं ॥५७-६२३ ॥ ॥ ६३ देवी बोलीं- हे सुन्दर कटिप्रदेशवाली इन्द्रप्रिये! । अपना अभिलषित वर माँगो, तुम्हारे द्वारा सम्यक् ६४ प्रकारसे पूजित मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ, मैं तुम्हें आज वरदान दूँगी । मैं वर प्रदान करनेके लिये आयी हूँ; मेरा दर्शन सहज सुलभ नहीं है । करोड़ों जन्मोंकी संचित ॥ ६५ पुण्यराशिसे ही यह प्राप्त होता है । ६३ - ६४३ ॥ उनके ऐसा कहनेपर इन्द्रपत्नी देवी शचीने सम्मुख स्थित होकर उन प्रसन्न भगवती परमेश्वरीसे विनतभावसे ६६ कहा- हे माता! मैं अपने पतिका अत्यन्त दुर्लभ । दर्शन, नहुषसे उत्पन्न भयका नाश और अपने पदकी पुनः प्राप्ति चाहती हूँ ॥ ६५-६६३ ॥ ॥ ६७ देवी बोलीं- तुम [ मेरी ] इस दूतीके साथ मानसरोवर चली जाओ, जहाँ मेरी विश्वकामा नामक अचल मूर्ति प्रतिष्ठित है, वहीं तुम्हें भयभीत और ६८ दुःखी इन्द्रके दर्शन हो जायँगे । कुछ समय बाद मैं पुनः राजाको मोहित करूँगी । हे विशालाक्षि! तुम
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अ ० ९ ] स्वस्था भव विशालाक्षि करोमि तव चेप्सितम् ॥ भ्रंशयिष्यामि भूपालं मोहितं त्रिदशासनात् । व्यास उवाच देवीदूती तां गृहीत्वा शक्रपत्नीं त्वरान्विता ॥ प्रापयामास सान्निध्यं स्वपत्युः परमेश्वरीम् ।
सा दृष्ट्वा तं पतिं बाला सुरेशं गुप्तसंस्थितम् ।
मुदिताभूद्वरं वीक्ष्य बहुकालाभिवाञ्छितम् ॥
षष्ठ स्कन्ध ७६५ ६ ९ शान्तचित्त हो जाओ, मैं तुम्हारा अभिलषित कार्य करूँगी । मैं मोहग्रस्त राजा [ नहुष ] - को इन्द्रपदसे गिरा दूँगी ॥ ६७–६९ ३ ॥ व्यासजी बोले- तदनन्तर परमेश्वरी इन्द्रपत्नीको ७० ले जाकर देवीकी दूतीने शीघ्रतापूर्वक उनके पति इन्द्रके पास पहुँचा दिया । गुप्तरूपसे रहते हुए अपने पति उन देवराज इन्द्रको देखकर और इस प्रकार चिरकालसे वांछित अपने वरकी प्राप्ति करके वे शची ७१ अत्यन्त प्रसन्न हुईं ॥ ७०-७१ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे इन्द्राण्या शक्रदर्शनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
II III II III अथ नवमोऽध्यायः शचीका इन्द्रसे अपना दुःख कहना, इन्द्रका शचीको सलाह देना कि वह नहुषसे ऋषियोंद्वारा वहन की जा रही पालकीमें आनेको कहे, नहुषका ऋषियोंद्वारा वहन की जा रही पालकीमें सवार होना और शापित होकर सर्प होना तथा इन्द्रका पुनः स्वर्गाधिपति बनना व्यास उवाच
तां वीक्ष्य विपुलापाङ्गीं रहः शोकसमन्विताम् ।
आखण्डलः प्रियां भार्यां विस्मितश्चाब्रवीत्तदा ॥
कथमत्रागता कान्ते कथं ज्ञातस्त्वया ह्यहम् ।
दुर्ज्ञेयः सर्वभूतानां संस्थितोऽस्मि शुभानने ॥
शच्युवाच
देव देव्याः प्रसादेन ज्ञातोऽस्यद्य भवानिह ।
पुनस्तस्याः प्रसादेन प्राप्तास्मि त्वां दिवस्पते ॥
नहुषो नाम राजर्षिः स्थापितो भवदासने ।
त्रिदशैर्मुनिभिश्चैव स मां बाधति नित्यशः ॥
पतिं मां कुरु चार्वङ्गि तुरासाहं सुराधिपम् ।
एवं वदति मां पाप्मा किं करोमि बलार्दन ॥
इन्द्र उवाच
कालाकाङ्क्षी वरारोहे संस्थितोऽस्मि यदृच्छया ।
तथा त्वमपि कल्याणि सुस्थिरं स्वमनः कुरु ॥
व्यासजी बोले - विशाल नेत्रोंवाली अपनी शोकाकुल प्रिय पत्नीको वहाँ एकान्तमें देखकर इन्द्र १ आश्चर्यचकित हो गये और बोले - ॥ १ ॥
हे प्रिये! तुम यहाँ कैसे आयी? तुम्हें कैसे ज्ञात हुआ कि मैं यहाँ हूँ? हे शुभानने! मैं सभी प्राणियोंसे २ अज्ञात रहते हुए यहाँ निवास कर रहा हूँ ॥ २ ॥
शची बोली - हे देव! देवी भगवतीकी कृपासे आप आज मुझे यहाँ ज्ञात हुए हैं । हे देवेन्द्र! उन्हींकी ३ कृपासे मैं आपको पुनः प्राप्त कर सकी हूँ ॥३ ॥
देवताओं और मुनियोंने नहुष नामक राजर्षिको आपके आसनपर बैठा दिया है; वह मुझे नित्य कष्ट ४ देता है । वह पापी मुझसे इस प्रकार कहता है - हे सुन्दरि! मुझ देवराज इन्द्रको अपना पति बना लो । हे ५ बलार्दन! अब मैं क्या करूँ? ॥४-५ ॥ इन्द्र बोले - हे वरारोहे! हे कल्याणि! जिस प्रकार मैं [ अनुकूल ] समयकी प्रतीक्षा करते हुए प्रारब्धवश यहाँ रह रहा हूँ, वैसे ही तुम भी अपने ६ । मनको पूर्णरूपसे स्थिर करो ॥ ६ ॥
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७६६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ९ व्यास उवाच इत्युक्ता तेन सा देवी पतिनातिप्रशंसिना निःश्वसन्त्याह तं शक्रं वेपमानातिदुःखिता कथं तिष्ठे महाभाग पापात्मा मां वशानुगाम् करिष्यति मदोन्मत्तो वरदानेन गर्वितः देवाश्च मुनयः सर्वे मामूचुस्तद्भयाकुलाः तं भजस्व वरारोहे देवराजं स्मरातुरम् बृहस्पतिस्तु शत्रुघ्न वाडवो बलवर्जितः कथं मां रक्षितुं शक्तो भवेद्देवानुगः सदा तस्माच्चिन्तास्ति महती नार्यहं वशवर्तिनी अनाथा किं करिष्यामि विपरीते विधौ विभो नार्यस्म्यहं न कुलटा त्वच्चित्तातिपतिव्रता नास्ति मे शरणं तत्र यो मां रक्षति दुःखिताम् इन्द्र उवाच उपायं प्रब्रवीम्यद्य तं कुरुष्व वरानने शीलं ते दुःखिते काले परित्रातं भविष्यति परेण रक्षिता नारी न भवेच्च पतिव्रता उपायैः कोटिभिः कामभिन्नचित्तातिचञ्चला शीलमेव हि नारीणां सदा रक्षति पापतः तस्मात्त्वं शीलमास्थाय स्थिरा भव शुचिस्मिते यदा त्वां नहुषो राजा बलादाकर्षयेत्खलः तदा त्वं समयं कृत्वा गुप्तं वञ्चय भूपतिम् ॥ एकान्ते तत्समीपे त्वं गत्वा वद मदालसे ऋषियानेन दिव्येन मामुपैहि जगत्पते एवं तव वशे प्रीता भविष्यामीति मे व्रतम् इति तं वद सुश्रोणि तदा तु परिमोहितः कामान्धः स मुनीन् याने योजयिष्यति पार्थिवः अवश्यं तापसो भूपं शापदग्धं करिष्यति व्यासजी बोले- अपने परम आदरणीय पति । ऐसा कहनेपर लम्बी साँसें खींचती तथा काँपती ॥ ७ हुई वे शची अत्यन्त दुःखित होकर इन्द्रसे कहने लगीं— ॥७ ॥
। हे महाभाग! मैं कैसे रहूँ? वरदानके द्वारा ॥ ८ मदोन्मत्त और अहंकारी बना हुआ वह पापात्मा मुझे अपने वशमें कर लेगा । उससे भयभीत सभी देवताओं । और मुनियोंने मुझसे कहा - हे वरारोहे! तुम उस ॥ ९ कामातुर देवराजको अंगीकार कर लो ॥ ८- ९ ॥ । शत्रुसूदन! बृहस्पति भी निर्बल ब्राह्मण हैं; वे ॥ १० मेरी रक्षा करनेमें कैसे समर्थ हो सकते हैं; क्योंकि वे भी तो सदा देवताओंके ही अनुगामी हैं ॥ १० ॥
। अतः हे विभो! मैं वशवर्तिनी नारी हूँ, मुझे यह ॥ ११ महान् चिन्ता है कि भाग्यकी इस विपरीत अवस्थामें मैं अनाथ क्या करूँगी? ॥ ११ ॥
। मैं कुलटा नहीं हूँ अपितु आपका ही ध्यान ॥ १२ करनेवाली पतिव्रता स्त्री हूँ । वहाँ मेरे लिये ऐसा कोई शरण नहीं है, जो मुझ दुःखितकी रक्षा करे ॥ १२ ॥
इन्द्र बोले – हे वरानने! मैं एक उपाय बताता । हूँ, तुम उसे इस समय करो । इससे दुःखके समयमें ॥ १३ तुम्हारे शीलकी रक्षा हो जायगी ॥ १३ ॥
। करोड़ों उपाय करनेपर भी दूसरेके द्वारा रक्षित ॥ १४ स्त्री पतिव्रता नहीं रह सकती; क्योंकि वह कामसे विचलित मनवाली तथा अत्यन्त चंचल होती है ॥ १४ ॥
। स्त्रियोंका शील ही पापसे इनकी रक्षा करता है ॥ १५ इसलिये हे पवित्र मुसकानवाली! तुम शीलका आश्रय लेकर धैर्य धारण करो ॥ १५ ॥
। जब दुष्ट राजा नहुष तुम्हें बलपूर्वक प्राप्त करनेकी १६ चेष्टा करे तब तुम गुप्त प्रतिज्ञा करके राजाको धोखेमें । डाल देना । हे मदालसे! तुम एकान्तमें उसके समीप जाकर कहो — हे जगत्पते! आप ऋषियोंके द्वारा वहन ॥ १७ किये जानेवाले दिव्य वाहनसे मेरे पास आयें, ऐसा । होनेपर मैं प्रेमपूर्वक आपके वशमें हो जाऊँगी – यह ॥ १८ मेरी प्रतिज्ञा है । हे सुश्रोणि! तुम उससे ऐसा बोलना, तब मोहित और कामान्ध वह राजा मुनियोंको अपने । वाहनमें लगायेगा; इससे तपस्वी अवश्य ही नहुषको ॥ १ ९ । शापसे दग्ध कर देंगे॥१६–१९ ॥
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अ ० ९ ] साहाय्यं जगदम्बा ते करिष्यति न संशयः जगदम्बापदस्मर्तुः सङ्कटं न कदाचन
यदि जायेत तच्चापि ज्ञेयं तत्स्वस्तये किल ।
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन मणिद्वीपाधिवासिनीम् ॥
भज त्वं भुवनेशानीं गुरुवाक्यानुसारतः । व्यास उवाच इत्याख्याता शची तेन जगाम नहुषं प्रति ॥
तथेत्युक्त्वातिविश्वस्ता भाविकार्ये कृतोद्यमा ।
नहुषस्तां समालोक्य मुदितो वाक्यमब्रवीत् ॥
स्वागतं सत्यवचनैस्त्वदधीनोऽस्मि कामिनि ।
दासोऽहं तव सत्येन पालितं वचनं त्वया ॥
यदागता समीपे मे तुष्टोऽस्मि मितभाषिणि ।
न च व्रीडा त्वया कार्या भक्तं मां भज सुस्मिते ॥
कार्यं वद विशालाक्षि करिष्यामि तव प्रियम् । शच्युवाच सर्वं कृतं त्वया कार्यं मम कृत्रिमवासव ॥
मनोरथोऽस्ति मे देव शृणु चित्तेऽधुना विभो ।
वाञ्छितं कुरु कल्याण त्वद्वशाहमतः परम् ॥
ब्रवीमि मानसोत्साहं त्वं तं कर्तुमिहार्हसि । नहुष उवाच कार्यं त्वं ब्रूहि चन्द्रास्ये करोमि तव वाञ्छितम् ॥ अलभ्यमपि दास्यामि तुभ्यं सुभ्रु वदस्व माम् । शच्युवाच कथं ब्रवीमि राजेन्द्र प्रत्ययो नास्ति मे तव ॥
शपथं कुरु राजेन्द्र यत्करोमि प्रियं तव ।
राजानः सत्यवचसो दुर्लभा एव भूतले ॥
षष्ठ स्कन्ध ७६७ । भगवती जगदम्बा तुम्हारी सहायता करेंगी; ॥ २० इसमें सन्देह नहीं है । भगवती जगदम्बाके चरणोंका स्मरण करनेवालेको कभी संकट नहीं होता । यदि संकट उत्पन्न भी हो जाय तो उसे भी अपने कल्याणके २१ लिये ही समझना चाहिये । अत: तुम गुरु बृहस्पतिके कथनानुसार पूर्ण प्रयत्नसे मणिद्वीपवासिनी भगवती भुवनेश्वरीका भजन करो ॥ २०-२१३ ॥ व्यासजी बोले- उनके ऐसा कहनेपर ' वैसा ही २२ होगा'- ' – यह कहकर अत्यन्त विश्वस्त तथा भावी कार्यके प्रति प्रयत्नशील शची नहुषके पास गयीं । नहुष उन्हें देखकर प्रसन्न होता हुआ यह वचन २३ बोला - हे कामिनि! तुम्हारा स्वागत है, मैं तुम्हारे सत्य वचनोंके कारण तुम्हारे अधीन हूँ । तुमने अपने वचनका सत्यतापूर्वक पालन किया, इसलिये मैं २४ तुम्हारा दास हो गया हूँ । हे मितभाषिणि! तुम जब मेरे समीप आ गयी हो तो मैं सन्तुष्ट हो गया हूँ । तुम्हें अब लज्जा नहीं करनी चाहिये । हे सुन्दर २५ मुसकानवाली! मुझ अनुरक्तको अंगीकार करो । हे विशाल नेत्रोंवाली! अपना कार्य बताओ; मैं तुम्हारा प्रिय करूँगा ॥ २२–२५३ ॥ शची बोलीं- हे कृत्रिम वासव! आपने मेरा २६ सम्पूर्ण कार्य कर दिया है । हे देव! हे विभो! इस समय मेरे मनमें एक अभिलाषा है, उसे आप सुनें । हे कल्याण! मेरा मनोरथ पूर्ण कर दीजिये; इसके २७ बाद मैं आपकी वशवर्तिनी हो जाऊँगी, मैं बड़े उत्साहसे अपना मनोरथ कह रही हूँ, आप उसे पूरा करनेमें समर्थ हैं ॥ २६-२७३ ॥ नहुष बोला- हे चन्द्रमुखि! तुम अपना कार्य २८ बताओ, मैं तुम्हारा अभिलषित कार्य करता हूँ । हे सुभ्रु! यदि अलभ्य वस्तु होगी तो भी मैं तुम्हें दूँगा; मुझे बताओ ॥ २८३ ॥
शची बोलीं- हे राजेन्द्र! मैं कैसे बताऊँ, मुझे २ ९ आपका विश्वास नहीं है । हे राजेन्द्र! आप शपथ लें कि मैं तुम्हारा प्रिय करूँगा; क्योंकि पृथ्वीतलपर सत्यवादी राजा दुर्लभ हैं । हे राजन्! आपको सत्यसे ३० बँधा जाननेके बाद ही मैं अपना अभिलषित बताऊँगी ।
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७६८ पश्चाद् ब्रवीम्यहं राजन् ज्ञात्वा सत्येन यन्त्रितम् कृते चेद्वाञ्छिते भूप सदा ते वशवर्तिनी ॥ भविष्यामि तुराषाड् वै सत्यमेतद्वचो मम नहुष उवाच अवश्यमेव कर्तव्यं वचनं तव सुन्दरि शपामि सुकृतेनाहं यज्ञदानकृतेन वै । शच्युवाच इन्द्रस्य हरयो वाहा गजश्चैव रथस्तथा गरुडो वासुदेवस्य यमस्य महिषस्तथा वृषभ: शङ्करस्यापि ब्रह्मणो वरटापतिः मयूरः कार्तिकेयस्य गजास्यस्य तु मूषकः इच्छाम्यहमपूर्वं वै वाहनं ते सुराधिप यन्न विष्णोर्न रुद्रस्य नासुराणां न रक्षसाम् । वहन्तु त्वां महाराज मुनयः संशितव्रताः सर्वे शिबिकया राजन्नेतद्धि मम वाञ्छितम् सर्वदेवाधिकं त्वां वै जानामि वसुधाधिप तेन ते तेजसो वृद्धिं वाञ्छाम्यहमतन्द्रिता व्यास उवाच तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा प्रहस्य ज्ञानदुर्बलः मोहितस्तु महादेव्या कृतमोहेन तत्क्षणम् । उवाच वचनं भूपः संस्तुवन्वासवप्रियाम् नहुष उवाच सत्यमुक्तं त्वया तन्वि वाहनं रुचिरं मम । करिष्यामि सुकेशान्ते वचनं तव सर्वथा
न ह्यल्पवीर्यो भवति यो वाहान्कुरुते मुनीन् ।
अहमारुह्य यानेन त्वामेष्यामि शुचिस्मिते ॥
सप्तर्षयो मां वक्ष्यन्ति सर्वे देवर्षयस्तथा समर्थं त्रिषु लोकेषु ज्ञात्वा मां तपसाधिकम् व्यास उवाच इत्युक्त्वा तां सुसन्तुष्टो विससर्ज हरिप्रियाम् । मुनीनाहूय सर्वांस्तानित्युवाच स्मरान्वितः श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ९ । हे राजन्! मेरी उस अभिलाषाको पूर्ण कर देनेपर मैं ३१ सदाके लिये आपकी वशवर्तिनी हो जाऊँगी । हे इन्द्र! यह मेरा सत्यवचन है ॥ २ ९ –३१३ ॥ । नहुष बोला - हे सुन्दरि! मैं यज्ञ, दान आदि कृत्योंसे संचित पुण्यकी शपथ लेकर कहता हूँ कि मैं ॥ ३२ तुम्हारे वचनका अवश्य पालन करूँगा ॥ ३२३ ॥
शची बोलीं- इन्द्रके वाहन अश्व, गज और रथ हैं । भगवान् विष्णुका वाहन गरुड़, यमराजका ॥ ३३ वाहन महिष, शिवका वाहन वृषभ, ब्रह्माका वाहन हंस, कार्तिकेयका वाहन मयूर और गजाननका वाहन । मूषक है । हे सुराधिप! मैं चाहती हूँ कि आपका ॥ ३४ वाहन ऐसा विलक्षण हो जो विष्णु, रुद्र, असुरों तथा राक्षसोंके भी पास न हो ॥ ३३ - ३५३ ॥ । हे महाराज! अपने व्रतमें अटल रहनेवाले ॥ ३५ समस्त मुनिगण शिबिका ( पालकी ) - में आपको ढोयें - हे राजन्! यही मेरी इच्छा है । हे पृथ्वीपते! मैं ॥ ३६ आपको सभी देवताओंसे महान् समझती हूँ; इसीलिये । मैं सावधान रहती हुई आपके तेजकी वृद्धि चाहती हूँ ॥ ३६-३७३ ॥ ॥ ३७ व्यासजी बोले – उनकी यह बात सुनकर । महादेवीद्वारा प्रकट किये गये मोहसे मोहित हुआ बुद्धिहीन राजा नहुष हँसकर इन्द्रप्रिया शचीको सन्तुष्ट ॥ ३८ करते हुए यह वचन कहने लगा - ॥३८-३९ ॥ नहुष बोला — हे तन्वंगि! तुमने सत्य ही कहा है, यह वाहन मुझे भी रुचिकर है । हे सुन्दर ॥ ३ ९ केशपाशवाली! मैं तुम्हारे वचनोंका सम्यक् रूपसे पालन करूँगा ॥ ४० ॥
हे पवित्र मुसकानवाली! जो अल्प पराक्रमवाला ॥ ४० होता है, वही ऋषियोंको पालकी ढोनेमें नहीं लगा सकता; मैं [ तुम्हारी इच्छाके अनुसार ] वाहनपर आरूढ़ होकर तुम्हारे पास आऊँगा ॥ ४१ ॥
४१ मुझे तीनों लोकोंमें सबसे बड़ा तपस्वी और । समर्थ जानकर सप्तर्षि तथा सभी देवर्षि मेरा वहन ॥ ४२ करेंगे ॥ ४२ ॥
व्यासजी बोले - – ऐसा कहकर परम सन्तुष्ट उस नहुषने उन इन्द्रप्रिया शचीको विदा किया, इसके बाद सभी मुनियोंको बुलाकर वह कामातुर ॥ ४३ । उनसे इस प्रकार कहने लगा —॥४३ ॥
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अ ० ९ ] षष्ठ नहुष उवाच
अहमिन्द्रो भो विप्राः सर्वशक्तिसमन्वितः ।
कार्यमत्र प्रकुर्वन्तु भवन्तो विगतस्मयाः ॥ ४४
इन्द्रासनं मया प्राप्तं नेन्द्राणी मामुपैति च ।
आकारिता च मां ब्रूते प्रेमपूर्वमिदं वचः ॥ ४५
मुनियानेन देवेन्द्र मामुपैहि सुराधिप ।
देवदेव महाराज मत्प्रियं कुरु मानद ॥ ४६
एतत्कार्यं मुनिश्रेष्ठा ममात्यन्तं दुरासदम् ।
भवद्भिस्तु प्रकर्तव्यं सर्वथैव दयालुभिः ॥ ४७
मनो दहति मे कामः शक्रपल्यां प्रवर्तितम् ।
भवन्तः शरणं मेऽद्य कुरुध्वं कार्यमद्भुतम् ॥ ४८
अगस्तिप्रमुखास्तस्य श्रुत्वा वाक्यमसत्करम् ।
अङ्गीचक्रुश्च भावित्वात्कृपया परमर्षयः ॥ ४ ९
अङ्गीकृतेऽथ तद्वाक्ये मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ।
मुदं प्राप नृपः कामं पौलोमीकृतमानसः ॥ ५०
आरुह्य शिबिकां रम्यां संस्थितस्त्वरयान्वितः ।
वाहान्कृत्वा मुनीन्दिव्यान्सर्प सर्पेति चाब्रवीत् ॥ ५१
कामार्तः सोऽस्पृशन्मूढः पादेन मुनिमस्तकम् ।
अगस्तिं तापसश्रेष्ठं लोपामुद्रापतिं तदा ॥ ५२
वातापिभक्षकर्तारं समुद्रस्यापि शोषकम् ।
कशया ताडयामास पञ्चबाणशराहतः ॥ ५३
इन्द्राणीहृतचित्तोऽसौ सर्पेति प्रब्रुवन्मुनिम् ।
तं शशाप मुनिः क्रुद्धः कशाघातमनुस्मरन् ॥५४
सर्पो भव दुराचार वने घोरवपुर्महान् ।
बहुवर्षसहस्राणि यत्र क्लेशी महान्भवेत् ॥ ५५ ।
1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] – 25 A स्कन्ध ७६ ९ नहुष बोला- हे विप्रगण! मैं आज सर्वशक्ति-सम्पन्न इन्द्र हूँ । आपलोग गर्वरहित होकर मेरा | कार्य करें ॥ ४४ ॥
इन्द्रपद मुझे प्राप्त हो गया है, परंतु इन्द्राणी अभी मुझे नहीं प्राप्त हो सकी हैं । उन्होंने मेरे पास आकर प्रेमपूर्वक यह बात कही है - ' हे सुरेन्द्र! हे सुराधिप! मुनियोंद्वारा ढोयी जानेवाली पालकीसे आप मेरे पास आयें । हे देवाधिदेव! हे महाराज! हे मानद! आप मेरा यह प्रिय कार्य करें ' ॥ ४५-४६ ॥ हे श्रेष्ठ मुनिगण! मेरा यह कार्य अत्यन्त दुष्कर है, परंतु आप सब दयालुओंको मेरा यह कार्य अवश्य करना चाहिये । इन्द्रपत्नी शचीमें अत्यन्त आसक्त मेरे मनको काम जला रहा है, मैं आप सबकी शरणमें हूँ । अतः मेरे इस महान् कार्यको सम्पन्न करें ॥ ४७-४८ ॥ अगस्त्य आदि प्रमुख ऋषियोंने उसकी यह अनादरपूर्ण बात सुनकर भावीवश उसे कृपापूर्वक स्वीकार कर लिया ॥ ४ ९ ॥ उन तत्त्वदर्शी मुनियोंके द्वारा उस वचनके स्वीकार कर लिये जानेपर शचीके प्रति आसक्त-चित्तवाला राजा नहुष प्रसन्न हो गया ॥ ५० ॥
वह तुरंत एक सुन्दर पालकीपर चढ़कर उसमें बैठ गया और दिव्य मुनियोंको उसे ढोनेके लिये नियुक्तकर उन्हें ' सर्प - सर्प ' ( शीघ्र चलो - शीघ्र चलो ) ऐसा कहने लगा ॥५१ ॥
उस कामातुर मूर्खने मुनि अगस्तिके मस्तकका पैरसे स्पर्श कर दिया । कामबाणसे आहत तथा इन्द्राणीके द्वारा आकृष्टचित्तवाले उस राजा नहुषने शीघ्र चलो - ऐसा कहते हुए वातापि नामक राक्षसका भक्षण करनेवाले तथा समुद्रको भी पी जानेवाले उन तपस्विश्रेष्ठ लोपामुद्रापति मुनि अगस्तिपर कोड़ेसे प्रहार भी किया ॥ ५२-५३३ ॥ तब उस कोड़ेके आघातका स्मरण करते हुए मुनिने उसे यह शाप दे दिया । हे दुराचारी! तुम वनमें भयंकर शरीरवाले विशाल सर्प हो जाओ, जहाँ तुम्हें हजारों वर्षोंतक बहुत कष्ट भोगते हुए विचरण करना पड़ेगा और अपने प्रभावसे तुम पुनः स्वर्ग प्राप्त
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७७० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ९
विचरिष्यसि वीर्येण पुनः स्वर्गमवाप्स्यसि ।
दृष्ट्वा युधिष्ठिरं नाम तव मोक्षो भविष्यति ॥
प्रश्नानामुत्तरं श्रुत्वा धर्मपुत्रमुखात्ततः । व्यास उवाच एवं शप्तः स राजर्षिः स्तुत्वा तं मुनिसत्तमम् ॥
स्वर्गात्पपात सहसा सर्परूपधरोऽभवत् ।
बृहस्पतिस्ततो गत्वा तरसा मानसं प्रति ॥
इन्द्राय सर्ववृत्तान्तं कथयामास विस्तरात् ।
तच्छ्रुत्वा मघवा राज्ञः स्वर्गात्प्रच्यवनादिकम् ॥
मुदितोऽभून्महाराज स्थितस्तत्रैव वासवः ।
देवाश्च मुनयो दृष्ट्वा नहुषं पतितं भुवि ॥
जग्मुः सर्वेऽपि तत्रैव यत्रेन्द्रः सरसि स्थितः ।
तमाश्वास्य सुराः सर्वे मुनिभिः सहितास्तदा ॥
स्वर्गे समानयामासुर्मानपूर्वं शचीपतिम् ॥
समागतं ततः शक्रं सर्वे ते मुनयः सुराः ॥
स्थापयित्वासने पश्चादभिषेकं दधुः शिवम् ।
इन्द्रोऽपि स्वासनं प्राप्य शच्या सह सुरालये ॥
चिक्रीड नन्दने रम्ये कानने प्रेमयुक्तया । व्यास उवाच एवमिन्द्रेण सम्प्राप्तं दुःखं परमदारुणम् ॥
हत्वासुरं कामरूपं विश्वरूपं महामुनिम् ।
पुनर्देव्याः प्रसादेन स्वस्थानं प्राप्तवान्नृप ॥
एतत्ते सर्वमाख्यातं वृत्रासुरवधाश्रयम् ।
यत्पृष्टोऽहं त्वया राजन् कथानकमनुत्तमम् ॥
यादृशं कुरुते कर्म तादृशं फलमाप्नुयात् ।
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् ॥
करोगे । युधिष्ठिर नामवाले धर्मपुत्रका दर्शनकर और ५६ उनके मुखसे अपने प्रश्नोंके उत्तर सुनकर तुम्हारी मुक्ति हो जायगी ॥ ५४–५६३ ॥ व्यासजी बोले- इस प्रकार शाप प्राप्तकर राजर्षि नहुष उन मुनिश्रेष्ठकी स्तुति करके अचानक ५७ स्वर्गसे गिर पड़ा और सर्परूपधारी हो गया ॥५७३ ॥
तब बृहस्पतिने शीघ्रतापूर्वक मानसरोवर जाकर ५८ इन्द्रसे सारा वृत्तान्त विस्तारपूर्वक कहा । हे महाराज ( जनमेजय )! राजा नहुषके स्वर्गसे पतन आदिकी बात सुनकर इन्द्र बहुत प्रसन्न हुए । वे इन्द्र अब भी ५ ९ वहींपर स्थित रहे । सभी देवता और मुनि नहुषको पृथ्वीपर गिरा देखकर उसी सरोवरके पास गये, जहाँ ६० इन्द्र रहते थे ॥ ५८–६०३ ॥ तत्पश्चात् उन शचीपति इन्द्रको आश्वासन देकर मुनियोंसहित सभी देवता उन्हें सम्मानपूर्वक ६१ स्वर्ग ले आये । तदनन्तर वापस आये हुए उन इन्द्रको सभी मुनियों और देवताओंने आसनपर ६२ स्थापित करके उनका पवित्र अभिषेक किया । इन्द्र भी अपने पदको प्राप्तकर प्रेमयुक्त शचीके साथ देवप्रासाद और मनोहर नन्दनवनमें क्रीड़ा करने ६३ लगे ॥६१–६३३ ॥ व्यासजी बोले – हे राजन्! इस प्रकार इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले महामुनि विश्वरूप ६४ और वृत्रासुरको मारनेके कारण इन्द्रको अत्यन्त भीषण दुःख प्राप्त हुआ और देवीकी कृपासे उन्होंने पुनः अपना स्थान प्राप्त कर लिया ॥ ६४-६५ ॥ ६५ हे राजन्! इस प्रकार आपने मुझसे जो पूछा था, वृत्रासुरवधपर आधारित वह सम्पूर्ण उत्तम आख्यान मैंने आपको कह दिया ॥ ६६ ॥
६६ जो जैसा कर्म करता है, उसे वैसा फल प्राप्त होता है | किये गये शुभ - अशुभ कर्मका फल अवश्य ६७ । ही भोगना पड़ता है ॥६७ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे नहुषस्वर्गच्युतिवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] –25 B
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अ ० १० ] षष्ठ स्कन्ध ७७१ अथ दशमोऽध्यायः कर्मकी गहन गतिका वर्णन तथा इस सम्बन्धमें भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनका उदाहरण जनमेजय उवाच कथितं चरितं ब्रह्मञ्छक्रस्याद्भुतकर्मणः स्थानभ्रंशस्तथा दुःखप्राप्तिरुक्ता विशेषतः यत्र देवाधिदेव्याश्च महिमातीव वर्णितः सन्देहोऽत्र ममाप्यस्ति यच्छक्रोऽपि महातपाः देवाधिपत्यमासाद्य दुःसहं दुःखमन्वभूत् मखानां तु शतं कृत्वा प्राप्तं स्थानमनुत्तमम् देवेशत्वं च सम्प्राप्य भ्रष्टः स्थानादसौ कथम् एतत्सर्वं समाचक्ष्व कारणं करुणानिधे सर्वज्ञोऽसि मुनिश्रेष्ठ पुराणानां प्रवर्तकः नावाच्यं महतां किञ्चिच्छिष्ये च श्रद्धयान्विते तस्मात्कुरु महाभाग मत्सन्देहापनोदनम् । सूत उवाच इति पृष्टः स राज्ञा वै तदा सत्यवतीसुतः तमाहातिप्रसन्नात्मा यथानुक्रममुत्तरम् । व्यास उवाच जनमेजय बोले — हे ब्रह्मन्! आपने अद्भुत कर्म । करनेवाले इन्द्रका आख्यान कहा, जिसमें उनके ॥ पदच्युत होने और दुःख प्राप्त करनेका विशेषरूपसे । वर्णन किया गया है तथा जिसमें देवताओं की भी अधीश्वरी देवी भगवतीकी महिमा विस्तारसे ॥ २ वर्णित हुई है ॥ १३ ॥
। मुझे महान् सन्देह है कि महान् तपस्वी ॥ ३ इन्द्रको देवाधिपतिका पद प्राप्त होनेपर भी दारुण । दुःख प्राप्त हुआ । सौ यज्ञ करके उन्होंने अतिश्रेष्ठ ॥ ४ स्थान प्राप्त किया; और देवताओंके स्वामीका पद प्राप्त करके भी वे अपने स्थानसे कैसे च्युत हो । गये? ॥ २-३३ ॥ ॥ ५ हे दयानिधे! इस सबका कारण सम्यक् रूपसे बताइये | हे मुनिश्रेष्ठ! आप सब कुछ जाननेवाले और पुराणोंके प्रवर्तक हैं, महापुरुषोंके लिये अपने श्रद्धालु ॥ ६ शिष्यसे कुछ भी अकथ्य नहीं होता, इसलिये हे महाभाग! मेरे सन्देहका निवारण कीजिये ॥ ४-५३ ॥ सूतजी बोले- तब राजाके ऐसा पूछनेपर सत्यवतीपुत्र वेदव्यासजी प्रसन्नतापूर्वक उनके प्रश्नोंका निबोध नृपतिश्रेष्ठ कारणं परमाद्भुतम् ॥ ७ क्रमसे उत्तर देने लगे ॥ ६३ ॥
कर्मणस्तु त्रिधा प्रोक्ता गतिस्तत्त्वविदां वरैः ।
सञ्चितं वर्तमानं च प्रारब्धमिति भेदतः ॥
अनेकजन्मसञ्जातं प्राक्तनं सञ्चितं स्मृतम् ।
सात्त्विकं राजसं कर्म तामसं त्रिविधं पुनः ॥
शुभं वाप्यशुभं भूप सञ्चितं बहुकालिकम् ।
अवश्यमेव भोक्तव्यं सुकृतं दुष्कृतं तथा ॥
जन्मजन्मनि जीवानां सञ्चितानां च कर्मणाम् ।
निःशेषस्तु क्षयो नाभूत्कल्पकोटिशतैरपि ॥
क्रियमाणं च यत्कर्म वर्तमानं तदुच्यते ।
देहं प्राप्य शुभं वापि ह्यशुभं वा समाचरेत् ॥
सञ्चितानां पुनर्मध्यात्समाहृत्य कियान्किल ।
देहारम्भे च समये कालः प्रेरयतीव तत् ॥
1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] -25 C व्यासजी बोले- हे नृपश्रेष्ठ! इसका अत्यन्त अद्भुत कारण सुनो । श्रेष्ठ तत्त्वज्ञानियोंने संचित, ८ वर्तमान और प्रारब्धके भेदसे कर्मकी तीन गतियाँ बतलायी हैं । अनेक जन्मोंका संचित प्राक्तन कर्म ९ संचित - कर्म कहा गया है; फिर वे कर्म भी सात्त्विक, राजस और तामस - तीन प्रकारके होते हैं ॥ ७ - ९ ॥ हे राजन्! बहुत समयके संचित शुभ या अशुभ १० कर्म पुण्य या पापके रूपमें अवश्य ही भोगने पड़ते हैं । जीवोंके प्रत्येक जन्मके संचित कर्म बिना भोग ११ किये करोड़ों कल्पोंमें भी नहीं नष्ट होते ॥ १०-११ ॥ जो कर्म किया जा रहा है, उसे वर्तमान कहा जाता है, जीव देह प्राप्तकर शुभ या अशुभ कार्यमें १२ प्रवृत्त होता है । संचित कर्मोंके कारण देह प्राप्त होनेपर काल जीवको पुन: कर्मके लिये प्रेरित करता १३ | है ॥ १२-१३ ॥