देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 781–790

देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 781–790

पृष्ठ 781

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७७२ प्रारब्धं कर्म विज्ञेयं भोगात्तस्य क्षयः स्मृतः प्राणिभिः खलु भोक्तव्यं प्रारब्धं नात्र संशयः पुरा कृतानि राजेन्द्र शुभानि शुभानि च अवश्यमेव कर्माणि भोक्तव्यानीति निश्चयः देवैर्मनुष्यैरसुरैर्यक्षगन्धर्वकिन्नरैः कर्मैव हि महाराज देहारम्भस्य कारणम् कर्मक्षये जन्मनाशः प्राणिनां नात्र संशयः ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्र इन्द्राद्याश्च सुरास्तथा दानवा यक्षगन्धर्वाः सर्वे कर्मवशाः किल अन्यथा देहसम्बन्धः कथं भवति भूपते कारणं यस्तु भोगस्य देहिनः सुखदुःखयोः तस्मादनेकजन्मोत्थसञ्चितानां च कर्मणाम् मध्ये वेगः समायाति कस्यचित्कालपाकतः तत्प्रारब्धवशात्पुण्यं करोति च यथा तथा पापं करोति मनुजस्तथा देवादयोऽपि च तथा नारायणो राजन्नरश्च धर्मजावुभौ जातौ कृष्णार्जुनौ काममंशौ नारायणस्य तौ पुराणपीठिकेयं वै मुनिभिः परिकीर्तिता देवांशः स तु विज्ञेयो यो भवेद्विभवाधिकः नानृषिः कुरुते काव्यं नारुद्रो रुद्रमर्चते नादेवांशो ददात्यन्नं नाविष्णुः पृथिवीपतिः इन्द्रादग्नेर्यमाद्विष्णोर्धनदादिति भूपते प्रभुत्वं च प्रभावं च कोपं चैव पराक्रमम् आदाय क्रियते नूनं शरीरमिति निश्चयः यः कश्चिद्बलवाँल्लोके भाग्यवानथ भोगवान् विद्यावान्दानवान्वापि स देवांशः प्रपठ्यते तथैवैते मयाख्याताः पाण्डवाः पृथिवीपते देवांशो वासुदेवोऽपि नारायणसमद्युतिः श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १० । प्रारब्ध कर्म उसे जानना चाहिये, जिसका ॥ १४ भोगसे क्षय हो जाता है । प्राणियोंको यहाँ प्रारब्ध कर्म अवश्य भोगना पड़ता है; इसमें सन्देह नहीं है I । हे । राजेन्द्र! देवता, मनुष्य, असुर, यक्ष, गन्धर्व और ॥ १५ | किन्नर - इन सभीको पूर्वकालमें किये गये शुभ-अशुभ कर्मोंका फल भोगना पड़ता है - यह निश्चित I है । हे महाराज! सबके देह - धारणका कारण ॥ १६ उनका कर्म ही होता है । कर्मके समाप्त हो जानेपर । प्राणियोंका जन्म लेना भी समाप्त हो जाता है-इसमें सन्देह नहीं है ॥ १४–१६३ ॥ ॥ १७ हे राजन्! ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र आदि देवता, । दानव, यक्ष और गन्धर्व - ये सभी कर्मके वशीभूत हैं, ॥ १८ अन्यथा जीवके सुख - दुःखमें भोगका जो कारणरूप देहसम्बन्ध है वह कैसे होता? इसीलिये किसी । कालविपाकके योगसे यथासमय अनेक जन्मोंमें ॥ १ ९ किये हुए संचित कर्मोंका प्रभाव प्रकट हो जाता है । उसी प्रारब्धकर्मके वशमें होकर ही मनुष्य पुण्य । या पाप करता है, उसी प्रकार देवता आदि भी करते ॥ २० | हैं ॥ १७–२०३ । हे राजन्! भगवान् विष्णुके अंशसे धर्मपुत्र नर और नारायण ही कृष्ण और अर्जुनके रूपमें प्रकट ॥ २१ हुए । मुनियोंके द्वारा इस पौराणिक आख्यानका । विवेचन किया गया है ॥ २१-२२ ॥ ॥ २२ जो अधिक वैभवशाली होता है उसे देवांश जानना चाहिये । जो ऋषि नहीं है वह काव्यकी रचना । नहीं कर सकता; जो रुद्र नहीं है वह रुद्रकी अर्चना ॥ २३ नहीं कर सकता । जिसमें देवांश नहीं है वह अन्नदान नहीं कर सकता और जिसमें विष्णुका अंश नहीं है । वह राजा नहीं हो सकता । हे राजन्! विष्णु, इन्द्र, ॥ २४ अग्नि, यम और कुबेरसे प्रभुत्व, प्रभाव, कोप और । पराक्रम प्राप्त करके ही निश्चितरूपसे यह शरीर बनता है | २३ - २५ ॥ ॥ २५ इस संसारमें जो कोई बलवान्, भाग्यवान्, । भोगवान्, विद्यावान् या दानशील है, उसे देवांश ॥ २६ कहा जाता है ॥ २६ ॥

हे राजन्! उसी प्रकार मैंने पाण्डवोंको भी । देवांश बताया था । वासुदेव श्रीकृष्ण तो नारायणके ॥ २७ अंश और उन्हींके समान कान्तियुक्त थे ॥२७ ॥

1897 श्रीमद्देवी..... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] - 25 D

पृष्ठ 782

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अ ० १० ]

शरीरं प्राणिनां नूनं भाजनं सुखदुःखयोः ।

शरीरी प्राप्नुयात्कामं सुखं दुःखमनन्तरम् ॥

देही नास्ति वशः कोऽपि दैवाधीनः सदैव हि ।

जननं मरणं दुःखं सुखं प्राप्नोति चावशः ॥

पाण्डवास्ते वने जाताः प्राप्तास्तु स्वगृहं पुनः ।

स्वबाहुबलतः पश्चाद्राजसूयं क्रतूत्तमम् ॥

वनवासं पुनः प्राप्ता बहुदुःखकरं परम् ।

अर्जुनेन तपस्तप्तं दुष्करं ह्यजितेन्द्रियैः ॥

सन्तुष्टैस्तु सुरैर्दत्तं वरदानं पुनः शुभम् ।

नरदेहकृतं पुण्यं क्व गतं वनवासजम् ॥

नरदेहे तपस्तप्तं चोग्रं बदरिकाश्रमे ।

नार्जुनस्य शरीरे तत्फलदं सम्बभूव ह ॥

प्राणिनां देहसम्बन्धे गहना कर्मणो गतिः ।

दुर्ज्ञेया सर्वथा देवैर्मानवानां तु का कथा ॥

वासुदेवोऽपि सञ्जातः कारागारेऽतिसङ्कटे ।

नीतोऽसौ वसुदेवेन नन्दगोपस्य गोकुलम् ॥

एकादशैव वर्षाणि संस्थितस्तत्र भारत ।

पुनः स मथुरां गत्वा जघानोग्रसुतं बलात् ॥

मोचयामास पितरौ बन्धनाद् भृशदुःखितौ ।

उग्रसेनं च राजानञ्चकार मथुरापुरे ॥

जगाम द्वारवत्यां स म्लेच्छराजभयात्पुनः ।

सर्वं भाविवशात्कृष्णः कृतवान्पौरुषं महत् ॥

कृत्वा कार्याण्यनेकानि द्वारवत्यां जनार्दनः ।

देहं त्यक्त्वा प्रभासे तु सकुटुम्बो दिवं गतः ॥

पुत्राः पौत्राश्च सुहृदो भ्रातरो जामयस्तथा ।

प्रभासे यादवाः सर्वे विप्रशापात्क्षयं गताः ॥

एवं ते कथिता राजन् कर्मणो गहना गतिः ।

वासुदेवोऽपि व्याधस्य बाणेन निधनं गतः ॥

षष्ठ स्कन्ध ७७३ प्राणियोंका शरीर सुख - दुःखका भाजन होता २८ है; शरीरधारी सुख - दुःख प्राप्त करता रहता है ॥ २८ ॥

कोई भी प्राणी स्वतन्त्र नहीं है, बल्कि सदैव दैवके अधीन रहता है । वह विवश होकर जन्म, २ ९ मरण, सुख तथा दुःख प्राप्त करता है ॥ २ ९ ॥ दैववश ही पाण्डव वन गये और पुनः उन्होंने ३० । अपना राज्य प्राप्त किया । तत्पश्चात् उन्होंने अपने बाहुबलसे राजसूय नामक उत्तम यज्ञ किया और बादमें अत्यन्त ३१ दुःखदायक वनवास उन्हें पुनः प्राप्त हुआ । वहाँ अर्जुनने अजितेन्द्रिय पुरुषोंके लिये दुष्कर तपस्या की । तब [ उस तपस्यासे ] सन्तुष्ट होकर देवताओंने उन्हें कल्याणकारी ३२ वरदान दिया । उस वनवास और नरावतारमें किया गया पुण्य कहाँ गया? नरावतारमें उन्होंने बदरिकाश्रममें उग्र ३३ तपस्या की थी, परंतु अर्जुनके रूपमें उन्हें उस तपस्याका फल नहीं मिला! ॥३०– -३३ ॥ प्राणियोंके देह - सम्बन्धी कर्मोंकी गति अत्यन्त ३४ गहन है; यह देवताओंके लिये भी दुर्ज्ञेय है तो मनुष्योंकी क्या बात! ॥ ३४ ॥

३५ वासुदेव श्रीकृष्ण भी अत्यन्त संकटमय कारागारमें उत्पन्न हुए और वसुदेवके द्वारा गोकुलमें नन्दगोपके घर ले जाये गये । हे भारत! वे वहाँ ग्यारह वर्षतक रहे ३६ और पुनः मथुरा जाकर उन्होंने बलपूर्वक उग्रसेनके पुत्र कंसका वध किया । तदनन्तर अत्यन्त दुःखित माता-३७ | पिताको बन्धनसे मुक्त किया तथा उग्रसेनको मथुरापुरीका राजा नियुक्त किया । पुनः वे म्लेच्छराज कालयवनके ३८ भयसे द्वारका चले गये । श्रीकृष्णने यह सब महान् पराक्रम

दैवके अधीन होकर ही किया । ३५ - ३८ ॥

वे जनार्दन श्रीकृष्ण द्वारकामें अनेक कार्य करके ३ ९ और प्रभासक्षेत्रमें देहका परित्यागकर अपने कुटुम्बसहित स्वर्ग चले गये । विप्रशापके कारण समस्त यादवगण ४० पुत्रों, पौत्रों, मित्रों, भाइयों और बहनोंसहित प्रभासक्षेत्रमें नष्ट हो गये और वासुदेव श्रीकृष्ण भी व्याधके बाणसे निधनको प्राप्त हुए । । हे राजन्! इस प्रकार मैंने आपसे ४१ कर्मकी गहन गतिका वर्णन कर दिया ॥ ३ ९ –४१ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे कर्मणां गहनगतिवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥

पृष्ठ 783

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७७४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ११ अथैकादशोऽध्यायः युगधर्म एवं तत्सम्बन्धी व्यवस्थाका वर्णन जनमेजय उवाच भारावतारणार्थाय कथितं जन्म कृष्णयोः । संशयोऽयं द्विजश्रेष्ठ हृदये मम तिष्ठति पृथिवी गोस्वरूपेण ब्रह्माणं शरणं गता । द्वापरान्तेऽतिदीनार्ता गुरुभारप्रपीडिता

वेधसा प्रार्थितो विष्णुः कमलापतिरीश्वरः ।

भूभारोत्तारणार्थाय साधूनां रक्षणाय च ॥

भगवन् भारते खण्डे देवैः सह जनार्दन । अवतारं गृहाणाशु वसुदेवगृहे विभो

एवं सम्प्रार्थितो धात्रा भगवान्देवकीसुतः ।

बभूव सह रामेण भूभारोत्तारणाय वै ॥

कियानुत्तारितो भारो हत्वा दुष्टाननेकशः ।

ज्ञात्वा सर्वान्दुराचारान्पापबुद्धिनृपानिह ॥

हतो भीष्मो हतो द्रोणो विराटो द्रुपदस्तथा ।

बाह्लीक: सोमदत्तश्च कर्णो वैकर्तनस्तथा ॥

यैर्लुण्ठितं धनं सर्वं हृताश्च हरियोषितः । कथं न नाशिता दुष्टा ये स्थिताः पृथिवीतले

आभीराश्च शका म्लेच्छा निषादाः कोटिशस्तथा ।

भारावतरणं किं तत्कृतं कृष्णेन धीमता ॥

सन्देहोऽयं महाभाग न निवर्तति चित्ततः । कलावस्मिन्प्रजाः सर्वाः पश्यतः पापनिश्चयाः व्यास उवाच

राजन् यस्मिन्युगे यादृक्प्रजा भवति कालतः ।

नान्यथा तद्भवेन्नूनं युगधर्मोऽत्र कारणम् ॥

ये धर्मरसिका जीवास्ते वै सत्ययुगेऽभवन् ।

धर्मार्थरसिका ये तु ते वै त्रेतायुगेऽभवन् ॥

धर्मार्थकामरसिका द्वापरे चाभवन्युगे ।

अर्थकामपराः सर्वे कलावस्मिन्भवन्ति हि ॥

जनमेजय बोले- हे द्विजश्रेष्ठ! पृथ्वीका भार उतारनेके लिये बलराम और श्रीकृष्णके अवतारकी ॥ १ बात आपने कही, किंतु मेरे मनमें एक संशय है ॥ १ ॥

द्वापरयुग अन्तमें अत्यन्त दीन तथा आतुर होकर भारी बोझसे दबी हुई पृथ्वी गौका रूप धारण ॥ करके ब्रह्माजीकी शरणमें गयी ॥ २ ॥

तब ब्रह्माजीने लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुसे ३ प्रार्थना की- ' हे भगवन्! हे विभो! हे जनार्दन! पृथ्वीका भार उतारनेके लिये और साधुजनोंकी रक्षाके लिये आप देवताओंके साथ भारतवर्षमें वसुदेवके ॥ ४ घरमें शीघ्र ही अवतार लीजिये ' ॥ ३४ ॥

ब्रह्माजीके द्वारा इस प्रकार प्रार्थना किये ५ | जानेपर भगवान् पृथ्वीका भार उतारनेके लिये बलरामके साथ देवकीके पुत्र हुए; तब उन्होंने अनेक दुष्टों तथा सभी दुराचारी और पापबुद्धि राजाओंको ज्ञात करके ६ उन्हें मारकर पृथ्वीका कितना भार उतारा? ॥५-६ ॥ भीष्म मारे गये, द्रोणाचार्य मारे गये; इसी ७ प्रकार विराट, द्रुपद, बाह्लीक, सोमदत्त और सूर्यपुत्र कर्ण मारे गये । परंतु जिन्होंने कृष्णकी पत्नियोंका हरण किया और उनका सारा धन लूट लिया, उन दुष्टों को ॥ ८ तथा जो करोड़ों आभीर, शक, म्लेच्छ और निषाद पृथ्वीतलपर स्थित थे— उन सबको उन्होंने नष्ट क्यों ९ नहीं कर दिया? तब उन बुद्धिमान् श्रीकृष्णने पृथ्वीका कौन - सा भार उतार दिया! हे महाभाग! मेरे चित्तसे यह सन्देह नहीं हटता है; इस कलियुगमें तो समस्त ॥ १० प्रजा पापपरायण ही दिखायी देती है ॥ ७–१० ॥ व्यासजी बोले- हे राजन्! जैसा युग होता है, कालप्रभावसे प्रजा भी वैसी ही होती है, इसके ११ विपरीत नहीं होता; इसमें युगधर्म ही कारण है ॥ ११ ॥

जो धर्मानुरागी जीव हैं, वे सत्ययुगमें हुए; जो धर्म और अर्थसे प्रेम रखनेवाले प्राणी हैं, वे त्रेतायुगमें १२ हुए; धर्म, अर्थ और कामके रसिक प्राणी द्वापरयुगमें हुए और अर्थ तथा काममें आसक्ति रखनेवाले सभी १३ प्राणी इस कलियुगमें होते हैं ॥ १२-१३ ॥

पृष्ठ 784

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अ ० ११ ]

युगधर्मस्तु राजेन्द्र न याति व्यत्ययं पुनः ।

काल: कर्तास्ति धर्मस्य ह्यधर्मस्य च वै पुनः ॥

राजोवाच

ये तु सत्ययुगे जीवा भवन्ति धर्मतत्पराः ।

कुत्र तेऽद्य महाभाग तिष्ठन्ति पुण्यभागिनः ॥।

त्रेतायुगे द्वापरे वा ये दानव्रतकारकाः ।

वर्तन्ते मुनयः श्रेष्ठाः कुत्र ब्रूहि पितामह ॥

कलाव दुराचारा येऽत्र सन्ति गतत्रपाः ।

आद्ये युगे क्व यास्यन्ति पापिष्ठा देवनिन्दकाः ॥

एतत्सर्वं समाचक्ष्व विस्तरेण महामते ।

सर्वथा श्रोतुकामोऽस्मि यदेतद्धर्मनिर्णयम् ॥

व्यास उवाच

ये वै कृतयुगे राजन् सम्भवन्तीह मानवाः ।

कृत्वा ते पुण्यकर्माणि देवलोकान्व्रजन्ति वै ॥

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च नृपसत्तम ।

स्वधर्मनिरता यान्ति लोकान्कर्मजितान्किल ॥

सत्यं दया तथा दानं स्वदारगमनं तथा ।

अद्रोहः सर्वभूतेषु समता सर्वजन्तुषु ॥

एतत्साधारणं धर्मं कृत्वा सत्ययुगे पुनः ।

स्वर्गं यान्तीतरे वर्णा धर्मतो रजकादयः ॥

तथा त्रेतायुगे राजन् द्वापरेऽथ युगे तथा ।

कलावस्मिन्युगे पापा नरकं यान्ति मानवाः ॥

तावत्तिष्ठन्ति ते तत्र यावत्स्याद्युगपर्ययः ।

पुनश्च मानुषे लोके भवन्ति भुवि मानवाः ॥

यदा सत्ययुगस्यादिः कलेरन्तश्च पार्थिव ।

तदा स्वर्गात्पुण्यकृतो जायन्ते किल मानवाः ॥

यदा कलियुगस्यादिद्वपरस्य क्षयस्तथा ।

नरकात्पापिनः सर्वे भवन्ति भुवि मानवाः ॥

एवं कालसमाचारो नान्यथाभूत्कदाचन ।

तस्मात्कलिरसत्कर्ता तस्मिंस्तु तादृशी प्रजा ॥

षष्ठ स्कन्ध ७७५ हे राजेन्द्र! युगधर्मका प्रभाव विपरीत नहीं होता १४ है; काल ही धर्म और अधर्मका कर्ता है ॥१४ ॥

राजा बोले- हे महाभाग! सत्ययुगमें जो धर्मपरायण प्राणी हुए हैं, वे पुण्यशाली लोग इस समय कहाँ स्थित हैं? हे पितामह! त्रेतायुग या १५ द्वापरमें जो दान तथा व्रत करनेवाले श्रेष्ठ मुनि हुए हैं, वे अब कहाँ विद्यमान हैं; मुझे बतायें । १६ इस कलियुगमें जो दुराचारी, निर्लज्ज, देवनिन्दक और पापी लोग विद्यमान हैं, वे सत्ययुगमें कहाँ जायँगे? हे महामते! यह सब विस्तारपूर्वक कहिये; १७ मैं इस धर्मनिर्णयके विषयमें सब कुछ सुनना चाहता हूँ ॥ १५–१८ ॥ १८ व्यासजी बोले – हे राजन्! जो मनुष्य सत्ययुगमें उत्पन्न होते हैं, वे अपने पुण्यकार्योंके कारण देवलोकको चले जाते हैं ॥ १ ९ ॥ हे नृपश्रेष्ठ! अपने - अपने वर्णाश्रमधर्मोंमें संलग्न १ ९ रहनेवाले ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र अपने कर्मोंसे अर्जित लोकोंमें चले जाते हैं ॥ २० ॥

सत्य, दया, दान, एकपत्नीव्रत, सभी प्राणियोंमें २० अद्रोहभाव तथा सभी जीवोंमें समभाव रखना— यह सत्ययुगका साधारण धर्म है । सत्ययुगमें इसका २१ धर्मपूर्वक पालन करके रजक आदि इतर वर्णके लोग भी स्वर्ग चले जाते हैं । हे राजन्! त्रेता और द्वापरयुगमें यही स्थिति रहती है, किंतु इस २२ कलियुगमें पापी मनुष्य नरक जाते हैं और वे वहाँ तबतक रहते हैं जबतक युगका परिवर्तन २३ नहीं होता, उसके बाद मनुष्यके रूपमें पुनः पृथ्वीपर जन्म लेते हैं॥२१–२४ ॥ २४ हे राजन्! जब कलियुगका अन्त और सत्ययुगका आरम्भ होता है, तब पुण्यशाली लोग स्वर्गसे पुनः मनुष्यके रूपमें जन्म लेते हैं ॥ २५ ॥

२५ जब द्वापरका अन्त और कलियुगका प्रारम्भ होता है, तब नरकके सभी पापी पृथ्वीपर मनुष्य रूपमें उत्पन्न होते हैं ॥ २६ ॥

२६ इस प्रकार युगके अनुरूप ही आचार होता है, उसके विपरीत कभी नहीं । कलियुग असत् - प्रधान २७ होता है, इसलिये उसमें प्रजा भी वैसी ही होती है ।

पृष्ठ 785

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७७६ कदाचिद्दैवयोगात्तु प्राणिनां व्यत्ययो भवेत् कलौ ये साधवः केचिद् द्वापरे सम्भवन्ति ते तथा त्रेतायुगे केचित्केचित्सत्ययुगे तथा दुष्टाः सत्ययुगे ये तु ते भवन्ति कलावपि कृतकर्मप्रभावेण प्राप्नुवन्त्यसुखानि च पुनश्च तादृशं कर्म कुर्वन्ति युगभावतः जनमेजय उवाच युगधर्मान्महाभाग ब्रूहि सर्वानशेषतः यस्मिन्वै यादृशो धर्मो ज्ञातुमिच्छामि तं तथा व्यास उवाच निबोध नृपशार्दूल दृष्टान्तं ते ब्रवीम्यहम् साधूनामपि चेतांसि युगभावाद् भ्रमन्ति हि पितुर्यथा ते राजेन्द्र बुद्धिर्विप्रावहेलने कृता वै कलिना राजन् धर्मज्ञस्य महात्मनः अन्यथा क्षत्रियो राजा ययातिकुलसम्भवः तापसस्य गले सर्पं मृतं कस्मादयोजयत् सर्वं युगबलं राजन्वेदितव्यं विजानता प्रयत्नेन हि कर्तव्यं धर्मकर्म विशेषतः नूनं सत्ययुगे राजन् ब्राह्मणा वेदपारगाः पराशक्त्यर्चनरता देवीदर्शनलालसाः गायत्रीप्रणवासक्ता गायत्रीध्यानकारिणः गायत्री जपसंसक्ता मायाबीजैकजापिनः ग्रामे ग्रामे पराम्बायाः प्रासादकरणोत्सुकाः स्वकर्मनिरताः सर्वे सत्यशौचदयान्विताः त्रय्युक्तकर्मनिरतास्तत्त्वज्ञानविशारदाः अभवन्क्षत्रियास्तत्र प्रजाभरणतत्पराः वैश्यास्तु कृषिवाणिज्यगोसेवानिरतास्तथा शूद्राः सेवापरास्तत्र पुण्ये सत्ययुगे नृप पराम्बापूजनासक्ताः सर्वे वर्णाः परे युगे तथा त्रेतायुगे किञ्चिन्न्यूना धर्मस्य संस्थितिः श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ११ । दैवयोगसे कभी - कभी इन प्राणियोंके जन्म लेनेमें ॥ २८ व्यतिक्रम भी हो जाता है । कलियुगमें कुछ जो साधुजन हैं, वे द्वापरके मनुष्य हैं । उसी प्रकार द्वापरके । मनुष्य कभी - कभी त्रेतामें और त्रेताके मनुष्य सत्ययुग में ॥ २ ९ जन्म लेते हैं । जो सत्ययुगमें दुराचारी मनुष्य होते हैं, । कलियुग हैं । वे अपने किये हुए कर्मके प्रभावसे ॥ ३० दु: ख पाते हैं और पुनः युगप्रभावसे वे वैसा ही कर्म करते ॥ २७–३० ॥ जनमेजय बोले- हे महाभाग! आप समस्त । युगधर्मोका पूर्णरूपसे वर्णन करें; जिस युगमें जैसा ॥ ३१ धर्म होता है, उसे मैं जानना चाहता हूँ ॥ ३१ ॥

व्यासजी बोले — हे नृपशार्दूल! ध्यानपूर्वक सुनिये, इस सम्बन्धमें मैं एक दृष्टान्त कहता हूँ । साधुजनोंके

मन भी युगधर्मसे प्रभावित होते हैं ॥ ३२ ॥

॥ ३२ हे राजेन्द्र! आपके महात्मा और धर्मज्ञ पिताकी । भी बुद्धि कलियुग विप्रका अपमान करनेकी ओर । ३३ प्रेरित कर दी थी; अन्यथा ययातिके कुलमें पैदा । हुए क्षत्रिय राजा परीक्षित् एक तपस्वीके गलेमें मरा हुआ सर्प क्यों डालते? ॥ ३३-३४ ॥ ॥ ३४ हे राजन्! विद्वान्‌को इसे युगका ही प्रभाव । समझना चाहिये । इसलिये विशेषरूपसे धर्माचरण ॥ ३५ ही प्रयत्नपूर्वक करना चाहिये ॥ ३५ ॥

। हे राजन्! सत्ययुगमें सभी ब्राह्मण वेदके ज्ञाता, पराशक्तिकी पूजामें तत्पर रहनेवाले, देवीदर्शनकी ॥ ३६ लालसासे युक्त, गायत्री और प्रणवमन्त्रमें अनुरक्त, । गायत्रीका ध्यान करनेवाले, गायत्रीजपपरायण, एकमात्र ॥ ३७ । मायाबीजमन्त्रका जप करनेवाले, प्रत्येक गाँवमें भगवती । पराम्बाका मन्दिर बनानेके लिये उत्सुक रहनेवाले, अपने - अपने कर्मोंमें निरत रहनेवाले, सत्य - पवित्रता-॥ ३८ दयासे समन्वित, वेदत्रयी कर्ममें संलग्न रहनेवाले और I तत्त्वज्ञानमें पूर्ण निष्णात होते थे । क्षत्रिय प्रजाओंके ॥ ३ ९ भरण - पोषणमें संलग्न रहते थे । हे राजन्! उस पुण्यमय । सत्ययुगमें वैश्यलोग कृषि, व्यापार और गो - पालन करते थे तथा शूद्र सेवापरायण रहते थे ॥ ३६–४० ॥ ॥ ४० उस सत्ययुगमें सभी वर्णोंके लोग भगवती । पराम्बाके पूजनमें आसक्त रहते थे । उसके बाद ॥ ४१ । त्रेतायुगमें धर्मकी स्थिति कुछ कम हो गयी । सत्ययुगमें

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अ ० ११ ] षष्ठ स्कन्ध ७७७

द्वापरे च विशेषेण न्यूना सत्ययुगस्थितिः ।

पूर्वं ये राक्षसा राजन् ते कलौ ब्राह्मणाः स्मृताः ॥ ४२

पाखण्डनिरताः प्रायो भवन्ति जनवञ्चकाः ।

असत्यवादिनः सर्वे वेदधर्मविवर्जिताः ॥ ४३

दाम्भिका लोकचतुरा मानिनो वेदवर्जिताः ।

शूद्रसेवापराः केचिन्नानाधर्मप्रवर्तकाः ॥ ४४

वेदनिन्दाकराः क्रूरा धर्मभ्रष्टातिवादुकाः ।

यथा यथा कलिर्वृद्धिं याति राजंस्तथा तथा ॥ ४५

धर्मस्य सत्यमूलस्य क्षयः सर्वात्मना भवेत् ।

तथैव क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च धर्मवर्जिताः ॥ ४६

• असत्यवादिनः पापास्तथा वर्णेतराः कलौ ।

शूद्रधर्मरता विप्राः प्रतिग्रहपरायणाः ॥ ४७

भविष्यन्ति कलौ राजन् युगे वृद्धिं गताः किल ।

कामचाराः स्त्रियः कामलोभमोहसमन्विताः ॥ ४८

पापा मिथ्याभिवादिन्यः सदा क्लेशरता नृप ।

स्वभर्तृवञ्चका नित्यं धर्मभाषणपण्डिताः ॥ ४ ९

भवन्त्येवंविधा नार्यः पापिष्ठाश्च कलौ युगे ।

आहारशुद्ध्या नृपते चित्तशुद्धिस्तु जायते ॥ ५०

शुद्धे चित्ते प्रकाशः स्याद्धर्मस्य नृपसत्तम ।

वृत्तसङ्करदोषेण जायते धर्मसङ्करः ॥ ५१

धर्मस्य सङ्करे जाते नूनं स्याद्वर्णसङ्करः ।

एवं कलियुगे भूप सर्वधर्मविवर्जिते ॥ ५२

स्ववर्णधर्मवार्तेषा न कुत्राप्युपलभ्यते ।

महान्तोऽपि च धर्मज्ञा अधर्मं कुर्वते नृप ॥ ५३

कलिस्वभाव एवैष परिहार्यो न केनचित् ।

तस्मादत्र मनुष्याणां स्वभावात्पापकारिणाम् ॥५४

निष्कृतिर्न हि राजेन्द्र सामान्योपायतो भवेत् । जो धर्मकी स्थिति थी, वह द्वापरमें विशेषरूपसे कम हो गयी । हे राजन्! पूर्वयुगोंमें जो राक्षस समझे जाते थे, वे ही कलियुगमें ब्राह्मण माने जाते हैं ॥ ४१-४२ ॥ वे प्रायः पाखण्डी, लोगोंको ठगनेवाले, झूठ बोलनेवाले तथा वेद और धर्मसे दूर रहनेवाले होते हैं । उनमेंसे कुछ तो दम्भी, लोकव्यवहारमें चालाक, अभिमानी, वेदप्रतिपादित मार्गसे हटकर चलनेवाले, शूद्रोंकी सेवा करनेवाले, विभिन्न धर्मोंका प्रवर्तन करनेवाले, वेदनिन्दक, क्रूर, धर्मभ्रष्ट और व्यर्थ वाद - विवादमें लगे रहनेवाले होते हैं । हे राजन्! जैसे - जैसे कलियुगकी वृद्धि होती है, वैसे - वैसे सत्यमूलक धर्मका सर्वथा क्षय होता जाता है और वैसे ही क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और इतर वर्णोंके लोग भी धर्महीन, मिथ्यावादी तथा पापी होते हैं । ब्राह्मण शूद्रधर्ममें संलग्न और प्रतिग्रहपरायण हो जाते हैं ॥ ४३–४७ ॥ हे राजन्! कलियुगका प्रभाव और बढ़नेपर स्त्रियाँ स्वेच्छाचारिणी तथा काम, लोभ और मोहसे युक्त हो जायँगी । हे राजन्! वे पापाचारिणी, झूठ बोलनेवाली, सदा कलह करनेवाली, अपने पतिको ठगनेवाली और नित्य धर्मका भाषण करनेमें निपुण होंगी । कलियुगमें इस प्रकारकी पापपरायण स्त्रियाँ

होती हैं । ४८-४९ ३ ॥

हे राजन्! आहारकी शुद्धिसे ही अन्तःकरणकी शुद्धि होती है और हे नृपश्रेष्ठ! चित्त शुद्ध होनेपर ही धर्मका प्रकाश होता है । आचारसंकरता ( दूसरे वर्णोंके अनुसार आचरण ) - दोषसे धर्ममें व्यतिक्रम ( विकार ) उत्पन्न होता है और धर्ममें विकृति होनेपर वर्णसंकरता उत्पन्न होती है । हे राजन्! इस प्रकार सभी धर्मोंसे हीन कलियुगमें अपने - अपने वर्णाश्रम-धर्मकी चर्चा भी कहीं नहीं सुनायी देती । हे राजन्! धर्मज्ञ और श्रेष्ठजन भी अधर्म करने लग जाते हैं । यह कलियुगका स्वभाव ही है; किसीके भी द्वारा इसका प्रतीकार नहीं किया जा सकता । अतः हे राजेन्द्र! इस कालमें स्वभावसे ही पाप करनेवाले मनुष्योंकी निष्कृति सामान्य उपायसे नहीं हो सकती ॥ ५०–५४३ ॥

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७७८ जनमेजय उवाच भगवन्सर्वधर्मज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ॥ कलावधर्मबहुले नराणां का गतिर्भवेत् । यद्यस्ति तदुपायश्चेद्दयया तं वदस्व मे व्यास उवाच

एक एव महाराज तत्रोपायोऽस्ति नापरः ।

सर्वदोषनिरासार्थं ध्यायेद्देवीपदाम्बुजम् ॥

न सन्त्यघानि तावन्ति यावती शक्तिरस्ति हि ।

नाम्नि देव्याः पापदाहे तस्माद्भीतिः कुतो नृप ॥

अवशेनापि यन्नाम लीलयोच्चारितं यदि ।

किं किं ददाति तज्ज्ञातुं समर्था न हरादयः ॥

प्रायश्चित्तं तु पापानां श्रीदेवीनामसंस्मृतिः ।

तस्मात्कलिभयाद्राजन् पुण्यक्षेत्रे वसेन्नरः ॥

निरन्तरं पराम्बाया नामसंस्मरणं चरेत् ।

छित्त्वा भित्त्वा च भूतानि हत्वा सर्वमिदं जगत् ॥

देवीं नमति भक्त्या यो न स पापैर्विलिप्यते ।

रहस्यं सर्वशास्त्राणां मया राजन्नुदीरितम् ॥

विमृश्यैतदशेषेण भज देवीपदाम्बुजम् ।

अजपां नाम गायत्रीं जपन्ति निखिला जनाः ॥

महिमानं न जानन्ति मायाया वैभवं महत् ।

गायत्रीं ब्राह्मणाः सर्वे जपन्ति हृदयान्तरे ॥

महिमानं न जानन्ति मायाया वैभवं महत् ।

एतत्सर्वं समाख्यातं यत्पृष्टं तत्त्वया नृप ।

युगधर्मव्यवस्थायां किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ११ जनमेजय बोले- हे भगवन्! हे समस्त धर्मों ५५ ज्ञाता! हे समस्त शास्त्रोंमें निपुण! अधर्मके बाहुल्यवाले कलियुगमें मनुष्योंकी क्या गति होती है? यदि उससे निस्तारका कोई उपाय हो तो उसे दयापूर्वक मुझे ॥ ५६ बतलाइये ॥ ५५-५६ ॥ व्यासजी बोले – हे महाराज! इसका एक ही उपाय है दूसरा नहीं है; समस्त पापोंके शमनके लिये देवीके चरणकमलका ध्यान करना चाहिये । ५७ हे राजन्! देवीके पापदाहक नाममें जितनी शक्ति है, उतने पाप तो हैं ही नहीं । इसलिये भयकी क्या आवश्यकता? यदि विवशतापूर्वक भी भगवतीके ५८ नामका उच्चारण हो जाय, तो वे क्या - क्या दे देती हैं, उसे जाननेमें भगवान् शंकर आदि भी समर्थ नहीं हैं! ॥ ५७ – ५ ९ ॥ ५ ९ भगवती देवीके नामका स्मरण ही समस्त पापोंका प्रायश्चित्त है, इसलिये हे राजन्! मनुष्यको ६० कलिके भयसे पुण्यक्षेत्रमें निवास करना चाहिये और पराम्बा नामका निरन्तर स्मरण करना चाहिये । जो देवीको भक्तिभावसे नमस्कार करता है, वह प्राणियोंका ६१ छेदन - भेदन और सारे संसारको पीड़ित करके भी उन पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ६०-६१३ ॥ हे राजन्! यह मैंने आपसे सम्पूर्ण शास्त्रोंके ६२ रहस्यको कह दिया, इसपर भलीभाँति विचारकर आप देवीके चरणकमलकी आराधना करें । [ वैसे तो ] सभी लोग ' अजपा ' नामक गायत्रीका जप करते हैं, ६३ लेकिन वे [ मायासे मोहित होनेके कारण ] उन महामायाकी महिमा और महान् वैभवको नहीं जानते । सभी ब्राह्मण अपने हृदयमें गायत्रीका जप ६४ करते हैं, परंतु वे भी उन महामायाकी महिमा और उनके महान् वैभवको नहीं जानते । हे राजन्! युगधर्मकी व्यवस्थाके विषयमें आपने जो कुछ पूछा था, यह सब मैंने कह दिया, अब आप और ६५ । क्या सुनना चाहते हैं? ॥ ६२–६५ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे युगधर्मव्यवस्थावर्णनं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥

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अ ० १२ ] षष्ठ स्कन्ध ७७ ९ अथ द्वादशोऽध्यायः पवित्र तीर्थोंका वर्णन, चित्तशुद्धिकी प्रधानता तथा इस सम्बन्धमें विश्वामित्र और वसिष्ठके परस्पर वैरकी कथा, राजा हरिश्चन्द्रका वरुणदेवके राजोवाच तीर्थानि भुवि पुण्यानि ब्रूहि मे मुनिसत्तम गम्यानि मानवैर्देवैः क्षेत्राणि सरितस्तथा फलं च यादृशं यत्र तीर्थेषु स्नानदानतः विधिं तु तीर्थयात्रायां नियमांश्च विशेषतः व्यास उवाच शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि तीर्थानि विविधानि च येषु तीर्थेषु देवीनां प्रशस्तान्यायनानि च नदीनां जाह्नवी श्रेष्ठा यमुना च सरस्वती नर्मदा गण्डकी सिन्धुर्गोमती तमसा तथा कावेरी चन्द्रभागा च पुण्या वेत्रवती शुभा चर्मण्वती च सरयूस्तापी साभ्रमती तथा एताश्च कथिता राजन्नन्याश्च शतशः पुनः तासां समुद्रगाः पुण्याः स्वल्पपुण्या ह्यनब्धिगाः समुद्रगानां ताः पुण्याः सर्वदौघवहास्तु याः मासद्वयं श्रावणादौ ताश्च सर्वा रजस्वलाः भवन्ति वृष्टियोगेन ग्राम्यवारिवहास्तथा पुष्करं च कुरुक्षेत्रं धर्मारण्यं सुपावनम् प्रभासं च प्रयागं च नैमिषारण्यमेव च विश्रुतं चार्बुदारण्यं शैलाश्च पावनास्तथा श्रीशैलश्च सुमेरुश्च पर्वतो गन्धमादनः शापसे जलोदरग्रस्त होना राजा बोले – - हे मुनिश्रेष्ठ! अब आप मुझे । मनुष्यों और देवताओंके द्वारा सेवनीय इस पृथ्वीपर ॥ १ स्थित पुण्य तीर्थों, क्षेत्रों तथा नदियोंके विषयमें बताइये । उन तीर्थोंमें स्नान तथा दानका जैसा फल । मिलता है, उसे और विशेषरूपसे तीर्थयात्राकी विधि ॥ २ तथा नियमोंको भी बताइये ॥ १-२ ॥ व्यासजी बोले – हे राजन्! सुनिये, मैं उन विविध । तीर्थोंका वर्णन करूँगा, जिन तीर्थोंमें देवियोंके प्रशस्त ॥ ३ मन्दिर विद्यमान हैं ॥३ ॥

नदियोंमें गंगा श्रेष्ठ हैं, इसी प्रकार यमुना, सरस्वती, । नर्मदा, गण्डकी, सिन्धु, गोमती, तमसा, कावेरी, चन्द्रभागा, ॥ ४ पुण्या, शुभ वेत्रवती, चर्मण्वती, सरयू, तापी तथा । साभ्रमती भी हैं - इन्हें मैंने बतला दिया । हे राजन्! ॥ ५ इनके अतिरिक्त सैकड़ों अन्य नदियाँ भी हैं । उनमेंसे । समुद्रमें गिरनेवाली नदियाँ पुण्यमयी हैं तथा समुद्रमें न ॥ ६ गिरनेवाली नदियाँ अल्प पुण्यवाली हैं । समुद्रगामिनी नदियोंमें वे बहुत पवित्र हैं जो सदा जलपूरित होकर । बहती हैं । श्रावण और भाद्रपद – इन दो महीनोंमें ॥ ७ सभी नदियाँ रजस्वला होती हैं; क्योंकि उनमें वर्षाकालमें । ग्रामीणजल प्रवाहित होता है ॥ ४ – ७३ ॥ ॥ ८ पुष्कर, कुरुक्षेत्र, धर्मारण्य, प्रभास, प्रयाग, । नैमिषारण्य और विख्यात अर्बुदारण्य - ये अत्यन्त ॥ ९ पवित्र तीर्थ हैं । इसी प्रकार श्रीशैल, सुमेरु और गन्धमादन पवित्र पर्वत हैं । सरोवरोंमें सर्वविख्यात । मानसरोवर, श्रेष्ठ बिन्दुसर और पवित्र अच्छोदसरोवर सरांसि चैव पुण्यानि मानसं सर्वविश्रुतम् ॥ १० पुण्य सरोवर हैं ॥ ८ - १०३ ॥ तथा बिन्दुसरः श्रेष्ठमच्छोदं नाम पावनम् आश्रमास्तु तथा पुण्या मुनीनां भावितात्मनाम् विश्रुतस्तु सदा पुण्यः ख्यातो बदरिकाश्रमः नरनारायणौ यत्र तेपाते तौ मुनी तपः वामनाश्रम आख्यातः शतयूपाश्रमस्तथा येन यत्र तपस्तप्तं तस्य नाम्नातिविश्रुतः । इसी प्रकार शुद्ध मनवाले मुनियोंके आश्रम भी ॥ ११ पुण्यस्थल हैं । विख्यात बदरिकाश्रम सदैव पुण्यशाली । आश्रमके रूपमें कहा गया है जहाँ नर - नारायण नामके दो मुनियोंने तपस्या की थी । ऐसे ही वामनाश्रम ॥ १२ और शतयूपाश्रम भी विख्यात हैं । जिस ऋषिने जहाँ । तपस्या की वह आश्रम उसीके नामसे प्रसिद्ध हो ॥ १३ | गया ॥ ११–१३ ॥

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७८० एवं पुण्यानि स्थानानि ह्यसंख्यातानि भूतले मुनिभिः परिगीतानि पावनानि महीपते । एषु स्थानेषु सर्वत्र देवीस्थानानि भूपते दर्शनात्पापहारीणि वसन्ति नियमेन च कथयिष्यामि तान्यग्रे प्रसङ्गेन च कानिचित् तीर्थानि नृप दानानि व्रतानि च मखास्तथा तपांसि पुण्यकर्माणि सापेक्षाणि महीपते द्रव्यशुद्धिं क्रियाशुद्धिं मनः शुद्धिमपेक्ष्य च ॥ पावनानि हि तीर्थानि तपांसि च व्रतानि च । कदाचिद् द्रव्यशुद्धिः स्यात्क्रियाशुद्धिः कदाचन

दुर्लभा मनसः शुद्धिः सर्वेषां सर्वदा नृप ।

मनस्तु चञ्चलं राजन्ननेकविषयाश्रितम् ॥

कथं शुद्धं भवेद्राजन्नानाभावसमाश्रितम् । कामक्रोधौ तथा लोभो ह्यहङ्कारो मदस्तथा

सर्वविघ्नकरा ह्येते तपस्तीर्थव्रतेषु च ।

अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ॥

स्वधर्मपालनं राजन् सर्वतीर्थफलप्रदम् ।

नित्यकर्मपरित्यागान्मार्गे संसर्गदोषतः ॥

व्यर्थं तीर्थाधिगमनं पापमेवावशिष्यते ।

क्षालयन्ति हि तीर्थानि सर्वथा देहजं मलम् ॥

मानसं क्षालितुं तानि न समर्थानि वै नृप ।

शक्तानि यदि चेत्तानि गङ्गातीरनिवासिनः ॥

मुनयो द्रोहसंयुक्ताः कथं स्युर्भावितेश्वराः ।

वसिष्ठसदृशाः प्रह्वा विश्वामित्रादयः किल ॥

रागद्वेषरताः सर्वे कामक्रोधाकुलाः सदा ।

चित्तशुद्धिमयं तीर्थं गङ्गादिभ्योऽतिपावनम् ॥

यदि स्याद्दैवयोगेन क्षालयत्यान्तरं मलम् ।

विशेषेण तु सत्सङ्गो ज्ञाननिष्ठस्य भूपते ॥

न वेदा न च शास्त्राणि न व्रतानि तपांसि न ।

न मखा न च दानानि चित्तशुद्धेस्तु कारणम् ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १२ । हे राजन्! इस प्रकार इस भूतलपर असंख्य १४ पवित्र पुण्यस्थल हैं, जो मुनियोंद्वारा पवित्र कहे गये हैं । हे राजन्! इन सभी स्थानोंमें देवीके मन्दिर हैं, जो । दर्शन कर लेने मात्रसे पापका हरण करते हैं, वहाँ ॥ १५ बहुत - से भक्त नियमपूर्वक वास करते हैं । उन कतिपय । स्थानोंका वर्णन आगे करूँगा ॥ १४-१५३ ॥ ॥ १६ हे राजन्! तीर्थ, दान, व्रत, यज्ञ, तपस्या और । सभी पुण्यकर्म शुद्धिसापेक्ष हैं । द्रव्यशुद्धि, क्रियाशुद्धि और मानसिक शुद्धिके आधारपर ही तीर्थ, तप और १७ व्रत पवित्र होते हैं । कभी द्रव्यशुद्धि और कभी क्रियाशुद्धि हो पाती है, लेकिन हे राजन्! मानसिक ॥ १८ शुद्धि सबके लिये सदा ही दुर्लभ होती है; क्योंकि हे नृप! मन बड़ा चंचल है और अनेक १ ९ विषयोंमें भटकता रहता है । तब हे राजन्! विविध विषयोंके आश्रित रहनेवाला मन कैसे शुद्ध रह सकता है? ॥१६–१९ ३ ॥ ॥ २० काम, क्रोध, लोभ, अहंकार तथा मद- ये सभी तपस्या, तीर्थसेवन और व्रतोंमें विघ्नकारी होते हैं । हे २१ राजन्! अहिंसा, सत्य, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह और अपने धर्मका पालन - समस्त तीर्थोंका फल प्रदान करते हैं । नित्यकर्मके परित्याग और मार्गमें २२ संसर्गदोषसे तीर्थमें जाना व्यर्थ हो जाता है, केवल पाप ही लगता है ॥ २०–२२३ ॥ २३ हे राजन्! तीर्थ तो केवल शरीरजन्य मलको ही धोते हैं, वे अन्तःकरणको धोनेमें समर्थ नहीं होते । यदि वे तीर्थ [ मनको शुद्ध करनेमें ] समर्थ होते तो २४ गंगाके तटपर रहनेवाले विश्वामित्र और वसिष्ठसदृश ईश्वर - चिन्तनपरायण भक्त मुनि द्रोहभावसे युक्त क्यों २५ होते? इस प्रकार तीर्थोंमें रहनेवाले लोग भी सदैव राग - द्वेषपरायण तथा काम - क्रोधसे व्याकुल रहते हैं । २६ अतः चित्तशुद्धिरूपी तीर्थ गंगा आदि तीर्थोंसे भी

अधिक पवित्र है । २३–२६ ॥

हे राजन्! यदि दैवयोगसे ज्ञाननिष्ठ पुरुषका २७ सत्संग प्राप्त हो जाय तो वह आन्तरिक मैलको धो देता है । हे राजन्! वेद, शास्त्र, व्रत, तप, यज्ञ तथा २८ । दान - ये चित्तकी शुद्धिके कारण नहीं हैं ॥ २७-२८ ॥

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अ ० १२ ] षष्ठ स्कन्ध ७८१

वसिष्ठो ब्रह्मणः पुत्रो वेदविद्याविशारदः ।

रागद्वेषान्वितः कामं गङ्गातीरसमाश्रितः ॥

आडीबकं महायुद्धं विश्वामित्रवसिष्ठयोः ।

जातं निरर्थकं द्वेषाद्देवानां विस्मयप्रदम् ॥

विश्वामित्रो बकस्तत्र जातः परमतापसः ।

शप्तः स तु वसिष्ठेन हरिश्चन्द्रस्य कारणात् ॥

कौशिकेन वसिष्ठोऽपि शप्त्वाडीदेहभाक्कृतः ।

शापादाडीबकौ जातौ तौ मुनी विशदप्रभौ ॥

निवासं प्रापतुस्तीरे सरसो मानसस्य च ।

चक्रतुर्दारुणं युद्धं नखचञ्चुप्रताडनैः ॥

वर्षाणामयुतं यावत्तावृषी रोषसंयुतौ ।

युयुधाते मदोन्मत्तौ सिंहाविव परस्परम् ॥

राजोवाच

कथं तौ मुनिशार्दूलौ तापसौ धर्मतत्परौ ।

परस्परं वैरपरौ सञ्जातौ केन हेतुना ॥

शापं परस्परं केन कारणेन महामती ।

दत्तवन्तौ मिथः क्लेशकारकौ दुःखदौ नृणाम् ॥

व्यास उवाच

हरिश्चन्द्रो नृपश्रेष्ठस्त्रिशंकुतनयः पुरा ।

बभूव रविवंशीयो रामचन्द्रस्य पूर्वजः ॥

अनपत्यः स राजर्षिर्वरुणाय महाक्रतुम् ।

प्रतिजज्ञे पुत्रकामो नरमेधं दुरासदम् ॥

वरुणस्तस्य सन्तुष्टो यज्ञस्य नियमे कृते ।

दधार गर्भं राज्ञस्तु भार्या परमसुन्दरी ॥

राजा बभूव सन्तुष्टो दृष्ट्वा भार्यां सदोहदाम् ।

चकार विधिवत्कर्म गर्भसंस्कारकारकम् ॥

सुषुवे तनयं नारी सर्वलक्षणसंयुतम् ।

मुदं प्राप नृपस्तत्र पुत्रे जाते विशाम्पते ॥

कृतवाञ्जातकर्मादिसंस्कारविधिमुत्तमम् ।

ददौ हिरण्यं गा दोग्ध्रीर्ब्राह्मणेभ्यो विशेषतः ॥

ब्रह्माजीके पुत्र वसिष्ठ वेदविद्यामें पारंगत थे २ ९ और गंगाजीके तटपर रहते थे, फिर भी वे राग - द्वेषसे युक्त हो गये । विश्वामित्र और वसिष्ठके मध्य देवताओंको भी विस्मयमें डाल देनेवाला आडीबक ३० नामक महायुद्ध हुआ, जो द्वेषके कारण व्यर्थ ही हुआ था । उस युद्धमें परम तपस्वी विश्वामित्र बक हुए थे, ३१ उन्हें वसिष्ठने हरिश्चन्द्र के कारण शाप दे दिया था । विश्वामित्र ने भी वसिष्ठको शाप देकर आडी पक्षी देहवाला बना दिया । इस प्रकार निर्मल कान्तिवाले वे ३२ दोनों मुनि शापके कारण आडी और बक पक्षीके रूपमें हो गये । वे मानसरोवर के तटपर रहने लगे और ३३ वहाँ नखों और चोंचके प्रहारसे भयंकर युद्ध करते रहे । वे दोनों ऋषि मदोन्मत्त सिंहोंके समान रोषयुक्त ३४ होकर दस हजार वर्षोंतक आपसमें युद्ध करते रहे ॥ २ ९ –३४ ॥ राजा बोले- श्रेष्ठ तपस्वी और धर्मपरायण वे दोनों मुनिश्रेष्ठ किस कारण परस्पर वैरपरायण हुए? ३५ उन दोनों बुद्धिमान् ऋषियोंने किस कारणसे एक-दूसरेको शाप दिया? जो मनुष्योंके लिये कष्टकारक ३६ और दुःखदायक सिद्ध हुए ॥ ३५-३६ ॥ व्यासजी बोले- पूर्वकालमें सूर्यवंशमें त्रिशंकुके पुत्र हरिश्चन्द्र नामक एक श्रेष्ठ राजा हुए, जो रामचन्द्रजीके पूर्वज थे ॥३७ ॥

३७ वे राजर्षि सन्तानहीन थे, अतः पुत्रकी कामनासे वरुणदेवकी प्रसन्नताके लिये उन्होंने ' नरमेध ' नामक ३८ दुष्कर महायज्ञ करनेकी प्रतिज्ञा की । उस यज्ञका व्रत लेनेसे वरुणदेव उनपर प्रसन्न हो गये और राजाकी परम रूपवती भार्याने गर्भ धारण किया ॥ ३८-३९ ॥ ३ ९ रानीको गर्भवती देखकर राजा प्रसन्न हुए और उन्होंने विधिपूर्वक गर्भको संस्कारित करनेवाला ४० कर्म सम्पन्न कराया ॥ ४० ॥

हे राजन्! रानीने समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न पुत्रको जन्म दिया । पुत्रके उत्पन्न होनेपर राजा बहुत ४१ प्रसन्न हुए । उन्होंने जातकर्म आदि संस्कारकी उत्तम विधि सम्पन्न की । ब्राह्मणोंको विशेषरूपसे स्वर्ण ४२ । और पयस्विनी गौएँ प्रदान कीं ॥ ४१-४२ ॥