देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 801–810

देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 801–810

पृष्ठ 801

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 801 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

७ ९ २ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १४

शापं च दत्तवांस्तस्मै राज्ञे मन्युवशं गतः ।

यस्मात्त्वं मां गुरुं त्यक्त्वा कृत्वान्यं गुरुमात्मनः ॥

दीक्षितोऽसि बलान्मन्द मामवज्ञाय पार्थिव ।

वारितोऽपि मया तस्माद्विदेहस्त्वं भविष्यसि ॥

पतत्विदं शरीरं ते विदेहो भव भूपते । व्यास उवाच इति तद्व्याहृतं श्रुत्वा राज्ञस्तु परिचारकाः ॥

सद्यः प्रबोधयामासुर्मुनिमाहुः प्रकोपितम् ।

कुपितं तं समागत्य राजा विगतकल्मषः ॥

उवाच वचनं श्लक्ष्णं हेतुगर्भं च युक्तिमत् ।

मम दोषो न धर्मज्ञ गतस्त्वं तृष्णयाकुलः ॥

हित्वा मां यजमानं वै प्रार्थितोऽपि मया भृशम् ।

न लज्जसे द्विजश्रेष्ठ कृत्वा कर्म जुगुप्सितम् ॥

सन्तोषे ब्राह्मणश्रेष्ठ जानन्धर्मस्य निश्चयम् ।

पुत्रोऽसि ब्रह्मणः साक्षाद्वेदवेदाङ्गवित्तमः ॥

न वेत्सि विप्रधर्मस्य गतिं सूक्ष्मां दुरत्ययाम् ।

आत्मदोषं मयि ज्ञात्वा मृषा मां शप्तुमिच्छसि ॥

त्याज्यस्तु सुजनैः क्रोधश्चण्डालादधिको यतः ।

वृथा क्रोधपरीतेन मयि शापः प्रपातितः ॥

तवापि च पतत्वद्य देहोऽयं क्रोधसंयुतः ।

एवं शप्तो मुनी राज्ञा राजा च मुनिना तथा ॥

परस्परं प्राप्य शापं दुःखितौ तौ बभूवतुः ।

वसिष्ठस्त्वतिचिन्तार्तो ब्रह्माणं शरणं गतः ॥

निवेदयामास तथा शापं भूपकृतं महत् । वसिष्ठ उवाच राज्ञा शप्तोऽस्मि देहोऽयं पतत्त्वद्य तवेति वै ॥

किं करोमि पितः प्राप्तं कष्टं कायप्रपातजम् ।

अन्यदेहसमुत्पत्तौ जनकं वद साम्प्रतम् ॥

उन मुनिने राजाको शाप दे दिया— ' हे मूर्ख पार्थिव! मेरे ४१ द्वारा मना किये जानेपर भी तुम मुझ गुरुका त्याग करके दूसरेको अपना गुरु बनाकर शक्तिके अभिमानमें मेरी अवहेलना करके यज्ञमें दीक्षित हो गये हो, उससे तुम ४२ विदेह हो जाओगे । हे राजन्! तुम्हारा यह शरीर नष्ट हो जाय और तुम विदेह हो जाओ ' ॥ ३ ९ -४२३ ॥ व्यासजी बोले- उनका यह शापवचन सुनकर राजाके सेवकोंने शीघ्रतासे जाकर राजाको जगाया ४३ और उन्हें बताया कि मुनि वसिष्ठ बहुत क्रोधित हो गये हैं, तब उन कुपित मुनिके पास आकर निष्पाप राजाने मधुर शब्दोंमें युक्तिपूर्ण तथा सारगर्भित वचन ४४ कहा— ॥ ४३-४४३ ॥ • हे धर्मज्ञ! इसमें मेरा दोष नहीं है, आप ही लोभके ४५ वशीभूत होकर मेरे बार - बार अनुरोध करनेपर भी मुझ यजमानको छोड़कर चले गये । हे विप्रवर! हे ब्राह्मण-श्रेष्ठ! ब्राह्मणको सदा सन्तोष रखना चाहिये – धर्मके ४६ | इस सिद्धान्तको जानते हुए भी ऐसा निन्दित कर्म करके आपको लज्जा नहीं आ रही है । आप तो साक्षात् ब्रह्माजीके पुत्र और वेद - वेदांगों के सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता हैं तो भी आप ४७ ब्राह्मणधर्मकी अत्यन्त कठिन और सूक्ष्म गतिको नहीं जाते । अपना दोष मुझमें आरोपित करके आप मुझे ४८ व्यर्थ ही शाप देना चाहते हैं । सज्जनोंको चाहिये कि क्रोधका त्याग कर दें; क्योंकि यह चण्डालसे भी अधिक दूषित है; क्रोध वशीभूत होकर आपने मुझे व्यर्थ ही ४ ९ शाप दे दिया है । अत: आपकी भी यह क्रोधयुक्त देह आज ही नष्ट हो जाय ॥ ४५–४९ ३ ॥ इस प्रकार राजाके द्वारा मुनि और मुनिके द्वारा राजा ५० शापित हो गये और दोनों एक - दूसरेसे शाप पाकर बहुत दुःखी हुए । तब वसिष्ठजी अत्यधिक चिन्तातुर होकर ब्रह्माजीकी शरण में गये और उन्होंने राजाके द्वारा प्रदत्त ५१ कठिन शापके विषयमें उनसे निवेदन किया ॥ ५०-५१३ ॥ वसिष्ठजी बोले- हे पिताजी! राजा निमिने मुझे शाप दे दिया है कि तुम्हारा यह शरीर आज ही ५२ नष्ट हो जाय । अतः शरीर नष्ट होनेसे प्राप्त कष्टके लिये मैं क्या करूँ? इस समय आप मुझे यह बतायें कि दूसरे शरीरकी प्राप्तिमें मेरे पिता कौन होंगे? हे ५३ पिताजी! दूसरे देहसे सम्बन्ध होनेपर भी मेरी स्थिति

पृष्ठ 802

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 802 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० १४ ]

तथा मे देहसंयोगः पूर्ववत्समपद्यताम् ।

यादृशं ज्ञानमेतस्मिन्देहे तत्रास्तु तत्पितः ॥

समर्थोऽसि महाराज प्रसादं कर्तुमर्हसि ।

वसिष्ठस्य वचः श्रुत्वा ब्रह्मा प्रोवाच तं सुतम् ॥

मित्रावरुणयोस्तेजस्त्वं प्रविश्य स्थिरो भव ।

तस्मादयोनिजः काले भविता त्वं न संशयः ॥

पुनर्देहं समासाद्य धर्मयुक्तो भविष्यसि ।

भूतात्मा वेदवित्कामं सर्वज्ञः सर्वपूजितः ॥

एवमुक्तस्तदा पित्रा प्रययौ वरुणालयम् ।

कृत्वा प्रदक्षिणं प्रीत्या प्रणम्य च पितामहम् ॥

विवेश स तयोर्देहे मित्रावरुणयोः किल ।

जीवांशेन वसिष्ठोऽथ त्यक्त्वा देहमनुत्तमम् ॥

कदाचित्तूर्वशी राजन्नागता वरुणालयम् ।

यदृच्छया वरारोहा सखीगणसमावृता ॥

दृष्ट्वा तामप्सरां दिव्यां रूपयौवनसंयुताम् ।

जातौ कामातुरौ देवौ तदा तामूचतुर्नृप ॥

विवशौ चारुसर्वाङ्गीं देवकन्यां मनोरमाम् ।

आवां त्वमनवद्याङ्गि वरयस्व समाकुलौ ॥

विहरस्व यथाकामं स्थानेऽस्मिन्वरवर्णिनि ।

तथोक्ता सा ततो देवी ताभ्यां तत्र स्थितावशा ॥

कृत्वा भावं स्थिरं देवी मित्रावरुणयोर्गृहे ।

सा गृहीत्वा तयोर्भावं संस्थिता चारुदर्शना ॥

तयोस्तु पतितं वीर्यं कुम्भे दैवादनावृते ।

तस्माज्जातौ मुनी राजन्द्वावेवातिमनोहरौ ॥

अगस्तिः प्रथमस्तत्र वसिष्ठश्चापरस्तथा ।

मित्रावरुणयोर्वीर्यात्तापसावृषिसत्तमौ ॥

प्रथमस्तु वनं प्राप्तो बाल एव महातपाः ।

इक्ष्वाकुस्तु वसिष्ठं तं बालं वव्रे पुरोहितम् ॥

षष्ठ स्कन्ध ७ ९ ३ पूर्ववत् ही रहे । इस शरीरमें जैसा ज्ञान है, वैसा ही ५४ उस शरीरमें भी रहे । हे महाराज! आप समर्थ हैं; मुझपर कृपा करने योग्य हैं ॥ ५२ - ५४३ ॥ वसिष्ठकी बात सुनकर ब्रह्माजी अपने उस ५५ पुत्रसे बोले- तुम मित्रावरुणके तेज हो, अतः इन्हींमें प्रवेश करके स्थिर हो जाओ । कुछ समय बाद तुम उन्हीं से अयोनिज पुत्रके रूपमें प्रकट होओगे; इसमें ५६ सन्देह नहीं है । इस प्रकार पुनः शरीर प्राप्त करके तुम धर्मनिष्ठ, प्राणियोंके सुहृद्, वेदवेत्ता, सर्वज्ञ और ५७ सबके द्वारा पूजित होओगे ॥ ५५–५७ ॥ पिताके ऐसा कहनेपर वसिष्ठजी प्रसन्नतापूर्वक पितामह ब्रह्माजीकी परिक्रमा करके और उन्हें प्रणाम ५८ करके वरुणके वासस्थानको चले गये । वसिष्ठजीने अपने उत्तम देहका त्याग करके मित्र और वरुणके शरीरमें जीवांशरूपसे प्रवेश किया ॥ ५८-५९ ॥ ५ ९ हे राजन्! किसी समय परम सुन्दरी अप्सरा उर्वशी अपनी सखियोंके साथ स्वेच्छापूर्वक मित्रावरुणके ६० स्थानपर आयी ॥ ६० ॥

हे राजन्! उस रूपयौवनसे सम्पन्न दिव्य अप्सराको देखकर वे दोनों देवता कामातुर हो गये और समस्त ६१ सुन्दर अंगोंवाली उस मनोरम देवकन्यासे कहने लगे— हे प्रशस्त अंगोंवाली! विवश तथा व्याकुल हम दोनोंका तुम वरण कर लो और हे वरवर्णिनि! तुम अपनी ६२ इच्छाके अनुसार इस स्थानपर विहार करो । उनके इस प्रकार कहनेपर वह देवी उर्वशी मन स्थिर करके मित्रावरुणके ६३ घरमें उन दोनोंके साथ विवश होकर रहने लगी । प्रिय दर्शनवाली वह अप्सरा उन दोनोंके भावोंको समझकर वहीं रहने लगी ॥ ६१–६४ ॥ ६४ दैववशात् वहाँ रखे हुए एक आवरणरहित कुम्भमें दोनोंका वीर्य स्खलित हो गया; और हे राजन्! उसमेंसे दो अत्यन्त सुन्दर मुनिकुमारोंने जन्म ६५ लिया । उनमें पहले अगस्ति थे और दूसरे वसिष्ठ थे । इस प्रकार मित्र और वरुणके तेजसे वे दोनों ऋषिश्रेष्ठ ६६ तपस्वी प्रकट हुए ॥ ६५-६६ ॥ महातपस्वी अगस्ति बाल्यावस्थामें ही वन चले गये और महाराज इक्ष्वाकुने अपने पुरोहितके रूपमें ६७ । दूसरे बालक वसिष्ठका वरण कर लिया ॥ ६७ ॥

पृष्ठ 803

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 803 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

७ ९ ४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १५ वंशस्यास्य सुखार्थं ते पालयामास पार्थिव । हे राजन्! आपका यह वंश सुखी रहे, इसलिये राजा विशेषेण मुनिं ज्ञात्वा प्रीत्या युक्तो बभूव ह ॥ ६८ इक्ष्वाकुने वसिष्ठका पालन - पोषण किया और विशेष-रूपसे इन्हें मुनि जानकर वे अत्यन्त प्रसन्न हुए ॥ ६८ ॥

इस प्रकार शापके कारण मित्रावरुणके कुलमें एतत्ते सर्वमाख्यातं वसिष्ठस्य च कारणम् । वसिष्ठजीके अन्य शरीरकी प्राप्तिका समस्त आख्यान

शापाद्देहान्तरप्राप्तिर्मित्रावरुणयोः कुले ॥६ ९ । मैंने आपको बता दिया ॥ ६ ९ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे वसिष्ठस्य मैत्रावरुणिरितिनामवर्णनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥

अथ पञ्चदशोऽध्यायः भगवतीकी कृपासे निमिको मनुष्योंके नेत्र - पलकोंमें वासस्थान मिलना तथा संसारी प्राणियोंकी जनमेजय उवाच

देहप्राप्तिर्वसिष्ठस्य कथिता भवता किल ।

निमिः कथं पुनर्देहं प्राप्तवानिति मे वद ॥ १

व्यास उवाच

वसिष्ठेन च सम्प्राप्तः पुनर्देहो नराधिप ।

निमिना न तथा प्राप्तो देहः शापादनन्तरम् ॥ २

यदा शप्तो वसिष्ठेन तदा ते ब्राह्मणाः क्रतौ ।

ऋत्विजो ये वृता राज्ञा ते सर्वे समचिन्तयन् ॥ ३

किं कर्तव्यमहोऽस्माभिः शापदग्धो महीपतिः ।

अस्मिन्यज्ञे त्वसम्पूर्णे दीक्षायुक्तश्च धार्मिकः ॥ ४

किं कर्तव्यं कार्यमेतद्विपरीतमभूत्किल ।

अवश्यम्भाविभावत्वादशक्ताः स्म निवारणे ॥ ५

मन्त्रैर्बहुविधैर्देहं तदा तस्य महात्मनः ।

रक्षितं धारयामासुः किञ्चिच्छ्वसनसंयुतम् ॥ ६

गन्धैर्माल्यैश्च विविधैः पूज्यमानं मुहुर्मुहुः ।

मन्त्रशक्त्या प्रतिष्टभ्य निर्विकारं सुपूजितम् ॥ ७

समाप्ते च क्रतौ तत्र देवाः सर्वे समागताः ।

ऋत्विग्भिस्तु स्तुताः सर्वे सुप्रीताश्चाभवन्नृप ॥ ८

त्रिगुणात्मकताका वर्णन जनमेजय बोले- आपने वसिष्ठकी शरीर-प्राप्तिका वर्णन किया; निमिने पुनः किस प्रकार देह प्राप्त की; यह मुझसे कहिये ॥१ ॥

व्यासजी बोले — हे राजन्! वसिष्ठने जिस प्रकार पुनः शरीर प्राप्त किया, उस प्रकार निमिको शापके बाद पुनः देह नहीं मिली ॥ २ ॥

जब वसिष्ठजीने शाप दिया तो राजाके द्वारा यज्ञमें वरण किये गये ब्राह्मण और ऋत्विज् विचार करने लगे -॥३ ॥

अहो, यज्ञमें दीक्षित ये धर्मनिष्ठ राजा शापसे दग्ध हो गये हैं और यज्ञ भी अपूर्ण ही रह गया है— ऐसेमें हम सबको क्या करना चाहिये? अब हम क्या करें? यह तो विपरीत कार्य हो गया । भवितव्यताके अवश्य होनेके कारण इसका निवारण करनेमें हम असमर्थ हैं । ४-५ । तब उन महात्मा राजाकी देहको ऋत्विजोंने अनेक प्रकारके मन्त्रोंसे सुरक्षित रखा; उनकी श्वास मन्द गतिसे चल रही थी । मन्त्रशक्तिसे उनकी निर्विकार आत्माको देहमें प्रतिष्ठित करके ऋत्विजोंने उसे अनेक प्रकारके गन्ध, माल्य आदिसे सुपूजित कर रखा था ॥ ६-७ ॥ यज्ञके सम्पूर्ण होनेपर वहाँ सभी देवगण आये I हे राजन्! ऋत्विजोंने उन सबकी स्तुति की, जिससे वे बहुत प्रसन्न हुए । मुनियोंके द्वारा राजाके विषयमें समस्त बातोंको जान लेनेपर स्तोत्रोंसे सन्तुष्ट देवताओंने

पृष्ठ 804

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 804 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० १५ ]

विज्ञप्ता मुनिभिः स्तोत्रैर्निर्विण्णात्मानमब्रुवन् ।

प्रसन्नाः स्म महीपाल वरं वरय सुव्रत ॥

यज्ञेनानेन राजर्षे वरं जन्म विधीयते ।

देवदेहं नृदेहं वा यत्ते मनसि वाञ्छितम् ॥

दृप्तः कामं पुरोधास्ते मृत्युलोके यथासुखम् ।

एवमुक्तो निमेरात्मा सन्तुष्टस्तानुवाच ह ॥

न देहे मम वाञ्छास्ति सर्वदैव विनश्वरे ।

वासो मे सर्वसत्त्वानां दृष्टावस्तु सुरोत्तमाः ॥

नेत्रेषु सर्वभूतानां वायुभूतश्चराम्यहम् ।

एवमुक्ताः सुरास्तत्र निमेरात्मानमब्रुवन् ॥

प्रार्थय त्वं महाराज देवीं सर्वेश्वरीं शिवाम् ।

मखेनानेन सन्तुष्टा सा तेऽभीष्टं विधास्यति ॥

स देवैरेवमुक्तस्तु प्रार्थयामास देवताम् ।

स्तोत्रैर्नानाविधैर्दिव्यैर्भक्त्या गद्गदया गिरा ॥

प्रसन्ना सा तदा देवी प्रत्यक्षं दर्शनं ददौ । कोटिसूर्यप्रतीकाशं रूपं लावण्यदीपितम् ।

दृष्ट्वा प्रमुदिताः सर्वे कृतकृत्याश्च चेतसि ।

प्रसन्नायां देवतायां राजा वव्रे वरं नृप ॥

ज्ञानं तद्विमलं देहि येन मोक्षो भवेदपि ।

नेत्रेषु सर्वभूतानां निवासो मे भवेदिति ॥

ततः प्रसन्ना देवेशी प्रोवाच जगदम्बिका ।

ज्ञानं ते विमलं भूयात्प्रारब्धस्यावशेषतः ॥

नेत्रेषु सर्वभूतानां निवासोऽपि भविष्यति ।

निमिषं यान्ति चक्षूंषि त्वत्कृतेनैव देहिनाम् ॥

तव वासात्सनिमिषा मानवाः पशवस्तथा ।

पतङ्गाश्च भविष्यन्ति पुनश्चानिमिषाः सुराः ॥

इति दत्त्वा वरं तस्मै तदा श्रीवरदेवता ।

आमन्त्र्य च मुनीन्सर्वांस्तत्रैवान्तर्हिताभवत् ॥

षष्ठ स्कन्ध ७ ९ ५ दुःखी मनवाले राजासे कहा- हे राजन्! हे सुव्रत! हम ९ प्रसन्न हैं; वर माँगिये । हे राजर्षे! इस यज्ञके कारण आपको श्रेष्ठ जन्म प्राप्त हो सकता है । देवशरीर, मनुष्यशरीर अथवा आपके मनमें जो इच्छा हो, उसे आप प्राप्त कर १० सकते हैं; जैसे कि आपके पुरोहित वसिष्ठ गर्वयुक्त होकर मर्त्यलोकमें सुखपूर्वक रह रहे हैं ॥ ८-१०३ ॥ उनके ऐसा कहनेपर निमिकी आत्माने परम ११ सन्तुष्ट होकर उनसे कहा- हे श्रेष्ठ देवगण! सर्वदा विनष्ट होनेवाली इस देहमें रहनेकी मेरी इच्छा १२ नहीं है, सम्पूर्ण प्राणियोंकी दृष्टिमें मेरा निवास हो, जिससे मैं वायुरूप होकर समस्त प्राणियोंके नेत्रोंमें विचरण करूँ॥११-१२३ ॥ १३ उनसे ऐसा कहे जानेपर देवताओंने निमिकी आत्मासे कहा - हे महाराज! आप कल्याणकारिणी तथा सबकी ईश्वरी भगवतीकी आराधना करें । आपके १४ इस यज्ञसे प्रसन्न होकर वे आपका अभीष्ट अवश्य पूर्ण करेंगी ॥ १३-१४ ॥ १५ देवताओंके ऐसा कहनेपर उन्होंने अनेक प्रकारके दिव्य स्तोत्रोंद्वारा भक्तिपूर्वक गद्गद वाणीमें देवीकी प्रार्थना की ॥ १५ ॥

१६ तब प्रसन्न होकर देवीने उन्हें साक्षात् दर्शन दिया । उनके करोड़ों सूर्योकी प्रभाके समान तथा लावण्यसे दीप्तिमान रूपको देखकर सभी कृतकृत्य हो गये और १७ उनके मनमें परम प्रसन्नता हुई । हे राजन्! देवीके प्रसन्न हो जानेपर राजाने वर माँगा - मुझे वह विमल ज्ञान १८ दीजिये, जिससे मोक्ष प्राप्त हो जाय तथा समस्त प्राणियोंके नेत्रों में मेरा निवास हो जाय ॥ १६-१८ ॥ तब प्रसन्न हुई देवेश्वरी जगदम्बाने कहा- तुम्हें १ ९ | विमल ज्ञान प्राप्त होगा, परंतु अभी तुम्हारा प्रारब्ध शेष है । समस्त प्राणियोंके नेत्रोंमें तुम्हारा निवास भी होगा । तुम्हारे कारण ही प्राणियोंके नेत्रोंमें पलक गिरानेकी २० शक्ति होगी । तुम्हारे निवासके कारण ही मनुष्य, पशु तथा पक्षी ' निमिष ' ( पलक गिरानेवाले ) तथा देवता २१ ' अनिमिष ' ( पलक न गिरानेवाले ) होंगे ॥ १ ९ –२१ ॥ इस प्रकार उन राजाको वर देकर और सब मुनियोंको बुलाकर वे श्रीवरदायिनी भगवती वहीं २२ । अन्तर्धान हो गयीं ॥ २२ ॥

पृष्ठ 805

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 805 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

७ ९ ६ अन्तर्हितायां देव्यां तु मुनयस्तत्र संस्थिताः विचिन्त्य विधिवत्सर्वे निमेर्देहं समाहरन् अरणिं तत्र संस्थाप्य ममन्थुर्मन्त्रवत्तदा मन्त्रहोमैर्महात्मानः पुत्रहेतोर्निमेरथ अरण्यां मथ्यमानायां पुत्रः प्रादुरभूत्तदा सर्वलक्षणसम्पन्नः साक्षान्निमिरिवापरः अरण्या मथनाज्जातस्तस्मान्मिथिरिति स्मृतः येनायं जनकाज्जातस्तेनासौ जनकोऽभवत् विदेहस्तु निमिर्जातो यस्मात्तस्मात्तदन्वये समुद्भूतास्तु राजानो विदेहा इति कीर्तिताः एवं निमिसुतो राजा प्रथितो जनकोऽभवत् नगरी निर्मिता तेन गङ्गातीरे मनोहरा मिथिलेति सुविख्याता गोपुराट्टालसंयुता धनधान्यसमायुक्ता हट्टशालाविराजिता वंशेऽस्मिन्येऽपि राजानस्ते सर्वे जनकास्तथा विख्याता ज्ञानिनः सर्वे विदेहाः परिकीर्तिताः एतत्ते कथितं राजन्निमेराख्यानमुत्तमम् शापाद्यस्य विदेहत्वं विस्तरादुदितं मया राजोवाच भगवन्भवता प्रोक्तं निमिशापस्य कारणम् श्रुत्वा सन्देहमापन्नं मनो मेऽतीव चञ्चलम् ॥ वसिष्ठो ब्राह्मणः श्रेष्ठो राज्ञश्चैव पुरोहितः पुत्रः पङ्कजयोनेस्तु राज्ञा शप्तः कथं मुनिः गुरुं च ब्राह्मणं ज्ञात्वा निमिना न कृता क्षमा यज्ञकर्म शुभं कृत्वा कथं क्रोधमुपागतः ज्ञात्वा धर्मस्य विज्ञानं कथमिक्ष्वाकुसम्भवः क्रोधस्य वशमापन्नः शप्तवान्ब्राह्मणं गुरुम् ॥ व्यास उवाच क्षमातिदुर्लभा राजन्प्राणिभिरजितात्मभिः क्षमावान्दुर्लभो लोके सुसमर्थो विशेषतः श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १५ । देवीके अन्तर्धान हो जानेपर वहाँ उपस्थित ॥ २३ मुनिगण विधिवत् विचार करके निमिके शरीरको ले आये और पुत्रप्राप्ति के लिये उसपर अरणिकाष्ठ । रखकर वे महात्मा मन्त्र पढ़कर मन्त्रहोमके द्वारा ॥ २४ निमिके देहका मन्थन करने लगे॥२३-२४ ॥ । तब अरणिके मन्थनसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो ॥ २५ समस्त लक्षणोंसे सम्पन्न और साक्षात् दूसरे निमिकी भाँति था । अरणिके मन्थनसे इसका जन्म हुआ था, । अतः यह ' मिथि ' – ऐसा कहा गया और जनकसे जन्म ॥ २६ होनेके कारण ' जनक ' यह नामवाला हुआ । राजा । निमि विदेह हुए, अत: उनके कुलमें उत्पन्न सभी राजा ॥ २७ ' विदेह ' ऐसा कहे गये ॥ २५–२७ ॥ इस प्रकार निमिके पुत्र राजा जनक प्रसिद्ध । हुए । उन्होंने गंगाके तटपर एक सुन्दर नगरीका ॥ २८ निर्माण कराया, जो मिथिला नामसे विख्यात है । यह । गोपुरों, अट्टालिकाओं तथा धन - धान्यसे सम्पन्न और ॥ २ ९ बाजारोंसे सुशोभित है ॥ २८-२९ ॥ । इस वंशमें जो अन्य राजा हुए, वे सभी जनक कहे गये; वे सभी विख्यात ज्ञानी और विदेह कहे ॥ ३० जाते थे ॥ ३० ॥

। हे राजन्! इस प्रकार निमिकी उत्तम कथाका ॥ ३१ मैंने आपसे वर्णन किया, शापके कारण उनके विदेह होने को भी मैंने विस्तारसे कह दिया ॥ ३१ ॥

राजा बोले- हे भगवन्! आपने निमिके शापका । कारण बताया, इसे सुनकर मेरा मन संशयग्रस्त और ३२ अत्यन्त चंचल हो गया है ॥ ३२ ॥

। वसिष्ठजी श्रेष्ठ ब्राह्मण थे, राजाके पुरोहित थे ॥ ३३ और वे कमलयोनि ब्रह्माजीके पुत्र थे, तब राजा निमिने उन मुनिको कैसे शाप दिया? निमिने उन्हें गुरु । और ब्राह्मण जानकर क्षमा क्यों नहीं किया । यज्ञ-॥ ३४ जैसा शुभ कार्य करनेपर भी उन्हें क्रोध कैसे आ । गया? धर्मका रहस्य जान करके भी इक्ष्वाकुवंशमें ३५ उत्पन्न राजाने क्रोधके वशीभूत होकर अपने ब्राह्मण गुरुको शाप क्यों दिया? ॥ ३३-३५ ॥ व्यासजी बोले- हे राजन्! अजितेन्द्रिय प्राणियोंके । लिये क्षमा अत्यन्त दुर्लभ है, विशेषरूपसे सामर्थ्यशाली ॥ ३६ । व्यक्तिका क्षमाशील होना इस संसारमें दुर्लभ है ॥ ३६ ॥

पृष्ठ 806

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 806 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० १५ ]

सर्वसङ्गपरित्यागी मुनिर्भवतु तापसः ।

निद्राक्षुधोर्विजेता च योगाभ्यासे सुनिष्ठितः ॥

कामः क्रोधस्तथा लोभो ह्यहङ्कारश्चतुर्थकः ।

दुर्ज्ञेया देहमध्यस्था रिपवस्तेन सर्वथा ॥

न भूतपूर्वः संसारे न चैव वर्ततेऽधुना ।

भविता न पुमान्कश्चिद्यो जयेत रिपूनिमान् ॥

न स्वर्गे न च भूलोके ब्रह्मलोके हरेः पदे ।

कैलासे नेदृशः कश्चिद्यो जयेत रिपूनिमान् ॥

मुनयो ब्रह्मपुत्राश्च तथान्ये तापसोत्तमाः ।

तेऽपि गुणत्रयाविद्धाः किं पुनर्मानवा भुवि ॥

कपिल: सांख्यवेत्ता च योगाभ्यासरतः शुचिः ।

तेनापि दैवयोगाद्धि प्रदग्धाः सगरात्मजाः ॥

तस्माद्राजन्नहङ्कारात्सञ्जातं भुवनत्रयम् ।

कार्यकारणभावात्तु तद्वियुक्तं कथं भवेत् ॥

ब्रह्मा गुणत्रयाविष्टो विष्णुश्चैवाथ शङ्करः ।

प्रभवन्ति शरीरेषु तेषां भावाः पृथक्पृथक् ॥

मानवानां च का वार्ता सत्त्वैकान्तव्यवस्थितौ ।

गुणानां सङ्करो राजन्सर्वत्र समवस्थितः ॥

कदाचित्सत्त्ववृद्धिः स्यात्कदाचिद्रजसः किल ।

कदाचित्तमसो वृद्धिः समभावः कदाचन ॥

निर्गुणः परमात्मासौ निर्लेपः परमोऽव्ययः ।

अलक्ष्यः सर्वसत्त्वानामप्रमेयः सनातनः ॥

तथैव परमा शक्तिर्निर्गुणा ब्रह्मसंस्थिता ।

दुर्ज्ञेया चाल्पमतिभिः सर्वभूतव्यवस्थितिः ॥

परात्मनस्तथा शक्तेस्तयोरैक्यं सदैव हि ।

अभिन्नं तद्वपुर्ज्ञात्वा मुच्यते सर्वदोषतः ॥

तज्ज्ञानादेव मोक्षः स्यादिति वेदान्तडिण्डिमः ।

यो वेद स विमुक्तोऽस्मिन्संसारे त्रिगुणात्मके ॥

षष्ठ स्कन्ध ७ ९ ७ मुनिको चाहिये कि वह सभी आसक्तियों का ३७ परित्याग करनेवाला, तपस्वी, निद्रा तथा भूखपर विजय प्राप्त करनेवाला और योगाभ्यासमें सम्यक् रूपसे निष्ठा रखनेवाला हो ॥ ३७ ॥

३८ काम, क्रोध, लोभ और चौथा अहंकार – ये शत्रु शरीरमें सदा विद्यमान रहते हैं जो सर्वथा दुर्ज्ञेय होते हैं । संसारमें न पहले कोई व्यक्ति हुआ है, न इस समय है और न तो ३ ९ आगे होगा जो इन शत्रुओंको जीत सके ॥ ३८-३९ ॥ न स्वर्गमें, न पृथ्वीलोकमें, न ब्रह्मलोकमें, न विष्णुलोक में और न तो कैलासमें भी ऐसा कोई ४० व्यक्ति है, जो इन शत्रुओंको जीत सके ॥४० ॥

जो मुनिगण, ब्रह्माजीके सभी पुत्र तथा अन्य ४१ श्रेष्ठ तपस्वीलोग हैं, वे भी तीनों गुणोंसे बँधे रहते हैं, तो मर्त्यलोकके मनुष्योंकी बात ही क्या? ॥ ४१ ॥

कपिलमुनि सांख्यशास्त्रके ज्ञाता, योगाभ्यास -४२ परायण और शुद्ध चित्तवाले थे, किंतु उन्होंने भी दैववश सगर - पुत्रोंको भस्म कर दिया ॥ ४२ ॥

अतः हे राजन्! कार्य - कारणस्वरूप अहंकारसे ४३ ही यह त्रिलोक उत्पन्न हुआ है, तो फिर मनुष्य उससे वियुक्त कैसे रह सकता है? ॥ ४३ ॥

ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी त्रिगुणसे बँधे हुए ४४ हैं; उनके भी शरीरोंमें गुणोंके पृथक् - पृथक् भाव उत्पन्न होते हैं । जब एकमात्र सत्त्वप्रधान देवताओंकी ४५ भी यह स्थिति है तो फिर मनुष्योंकी क्या बात? हे राजन्! गुणोंका संकर ( मेल ) सर्वत्र विद्यमान है । कभी सत्त्वगुणकी वृद्धि होती है, कभी रजोगुणकी ४६ वृद्धि होती है, कभी तमोगुणकी वृद्धि हो जाती है और कभी तीनों गुण बराबर हो जाते हैं ॥ ४४-४६ ॥ वे परमात्मा निर्गुण, निर्लेप, परम अविनाशी, ४७ सभी प्राणियोंसे अलक्ष्य, अप्रमेय और सनातन हैं । उसी प्रकार वे परमा शक्ति भी निर्गुण, ब्रह्ममें स्थित, अल्पबुद्धि प्राणियोंके द्वारा दुर्ज्ञेय, समस्त प्राणियोंकी ४८ आश्रय हैं । परमात्मा और पराशक्ति - उन दोनोंमें सदासे ऐक्य है । उनका स्वरूप अभिन्न है - यह ४ ९ जानकर प्राणी समस्त दोषोंसे मुक्त हो जाता है । इस ज्ञानसे मुक्ति हो जाती है - यह वेदान्तका डिंडिमघोष है । जो यह जान लेता है, वह इस त्रिगुणात्मक ५० संसारसे मुक्त हो जाता है॥४७–५० ॥

पृष्ठ 807

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 807 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

७ ९ ८ ज्ञानं तु द्विविधं प्रोक्तं शाब्दिकं प्रथमं स्मृतम् । वेदशास्त्रार्थविज्ञानात्तद्भवेद् बुद्धियोगतः विकल्पास्तत्र बहवो भवन्ति मतिकल्पिताः ( कुतर्ककल्पिताः केचित्सुतर्ककल्पिताः परे । वितर्कैर्विभ्रमोत्पत्तिर्विभ्रमाद् बुद्धिभ्रंशता । बुद्धिभ्रंशाज्ज्ञाननाशः प्राणिनां परिकीर्तितः । ) अनुभवाख्यं द्वितीयं तु ज्ञानं तद्दुर्लभं नृप ॥

तत्तदा प्राप्यते तस्य वेत्तुः सङ्गो यदा भवेत् ।

शब्दज्ञानान्न कार्यस्य सिद्धिर्भवति भारत ॥

तस्मान्नानुभवज्ञानं सम्भवत्यतिमानुषम् । अन्तर्गतं तमश्छेत्तुं शाब्दबोधो हि न क्षमः

यथा न नश्यति तमः कृतया दीपवार्तया ।

तत्कर्म यन्न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तये ॥

आयासायापरं कर्म विद्यान्या शिल्पनैपुणम् ।

शीलं परहितत्वं च कोपाभावः क्षमा धृतिः ॥

सन्तोषश्चेति विद्यायाः परिपाकोज्ज्वलं फलम् ।

विद्यया तपसा वापि योगाभ्यासेन भूपते ॥

विना कामादिशत्रूणां नैव नाशः कदाचन । ( मनस्तु चञ्चलं राजन्स्वभावादतिदुर्ग्रहम् । तद्वशः सर्वथा प्राणी त्रिविधो भुवनत्रये । ) कामक्रोधादयो भावाश्चित्तजाः परिकीर्तिताः ॥

ते तदा न भवन्त्येव यदा वै निर्जितं मनः ।

तस्मात्तु निमिना राजन्न क्षमा विहिता मुनौ ॥

यथा ययातिना पूर्वं कृता शुक्रे कृतागसि ।

भृगुपुत्रेण शप्तोऽपि ययातिर्नृपसत्तमः ॥

न शशाप मुनिं क्रोधाज्जरां राजा गृहीतवान् ।

कश्चित्सौम्यो भवेत्कश्चित्क्रूरो भवति पार्थिवः ॥

स्वभावभेदान्नृपते कस्य दोषोऽत्र कल्प्यते ।

हैहया भार्गवान्पूर्वं धनलोभात्पुरोहितान् ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १५ ज्ञान भी दो प्रकारका कहा गया है । प्रथम ॥ ५१ शाब्दिक ज्ञान बताया गया है । वह ज्ञान बुद्धिकी सहायतासे वेद और शास्त्रके अर्थविज्ञानद्वारा प्राप्त हो । जाता है । बुद्धिवैभिन्न्यके अनुसार इस ज्ञानके भी बहुत - से भेद हो जाते हैं । ( इनमेंसे कुछ ज्ञान कुतर्कसे और कुछ सुतर्कसे कल्पित होते हैं । कुतर्कोंसे भ्रान्तिकी उत्पत्ति होती है और विभ्रमसे बुद्धिनाश हो जाता है । बुद्धिनाशसे प्राणियों का ज्ञान नष्ट हो जाना कहा गया ५२ हैं । ) हे राजन्! अनुभव नामक वह दूसरा ज्ञान तो दुर्लभ होता है । वह ज्ञान तब प्राप्त होता है, जब ५३ उसके जाननेवालेका संग हो जाय । हे भारत! शब्दज्ञानसे कार्यकी सिद्धि नहीं होती, इसलिये अनुभवज्ञान अत्यन्त अलौकिक होता है । शब्दज्ञान अन्तःकरणके ॥ ५४ अन्धकारको दूर करनेमें उसी प्रकार समर्थ नहीं है जैसे दीपकसम्बन्धी वार्ता करनेसे अन्धकार नष्ट नहीं होता ॥ ५१ – ५४३ ॥ ५५ कर्म वही है, जो बन्धन न करे और विद्या वही है जो मुक्ति लिये हो । अन्य कर्म तो मात्र परिश्रमके लिये होता है तथा दूसरी विद्या तो मात्र शिल्पसम्बन्धी ५६ कौशल है । शील, परोपकार, क्रोधका अभाव, क्षमा, धैर्य और सन्तोष - यह सब विद्याका अत्यन्त उत्तम ५७ फल है । हे भूपते! विद्या, तपस्या अथवा योगाभ्यासके बिना काम आदि शत्रुओंका नाश कभी नहीं हो सकता । ( हे राजन्! मन चंचल और स्वभावतः अति दुर्ग्रह होता है, तीनों लोकोंमें तीनों प्रकारके प्राणी उसी मनके वशमें रहते हैं ) काम - क्रोध आदि भाव ५८ चित्तजन्य कहे गये हैं । ये सब उस समय नहीं उत्पन्न होते, जब मनपर विजय पा ली जाती है । हे राजन्! इसीलिये निमिने मुनिको उस प्रकार क्षमा नहीं किया, ५ ९ जिस प्रकार ययातिने अपराध करनेपर भी शुक्राचार्यको क्षमा कर दिया था । पूर्वकालमें भृगुपुत्र शुक्राचार्यने नृपश्रेष्ठ ययातिको शाप दे दिया था, लेकिन राजाने ६० क्रोधित होकर मुनिको शाप नहीं दिया और स्वयं

वृद्धावस्थाको स्वीकार कर लिया था । ५५ - – ६०३ ॥

६१ हे राजन्! कोई राजा शान्तस्वभाव और कोई क्रूर होता है । स्वभावमें भेद होनेके कारण इसमें किसका दोष कहा जाय? पूर्वकालमें हैहयवंशी ६२ | क्षत्रियोंने ब्रह्महत्याजनित पापकी उपेक्षा करके धनके

पृष्ठ 808

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 808 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० १६ ] षष्ठ स्कन्ध ७ ९९ ब्राह्मणान्मूलतः सर्वांश्चिच्छिदुः क्रोधमूर्च्छिताः । लोभसे भृगुवंशी ब्राह्मण पुरोहितोंका कोपाविष्ट होकर

पातकं पृष्ठतः कृत्वा ब्रह्महत्यासमुद्भवम् ॥ ६३ । समूलोच्छेद कर दिया था॥६१–६३ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे देवीमहिम्नि नानाभाववर्णनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥

Oce अथ षोडशोऽध्यायः हैहयवंशी क्षत्रियों द्वारा भृगुवंशी ब्राह्मणोंका संहार जनमेजय उवाच कुले कस्य समुत्पन्नाः क्षत्रिया हैहयाश्च ते ब्रह्महत्यामनादृत्य निजघ्नुर्भार्गवांश्च ये वैरस्य कारणं तेषां किं मे ब्रूहि पितामह निमित्तेन विना क्रोधं कथं कुर्वन्ति सत्तमाः वैरं पुरोहितैः सार्धं कस्मात्तेषामजायत नाल्पहेतोर्हि तद्वैरं क्षत्रियाणां भविष्यति अन्यथा ब्राह्मणान्पूज्यान्कथं जघ्नुरनागसः बाहुजा बलवन्तोऽपि पापभीताः कथं न ते स्वल्पेऽपराधे को हन्याद्वाडवान्क्षत्रियर्षभः सन्देहो मे मुनिश्रेष्ठ कारणं वक्तुमर्हसि सूत उवाच इति पृष्टस्तदा तेन राज्ञा सत्यवतीसुतः उवाच परमप्रीतः कथां संस्मृत्य चेतसा व्यास उवाच शृणु पारिक्षिते वार्तां क्षत्रियाणां पुरातनीम् आश्चर्यकारिणीं सम्यग्विदितां च पुरा मया कार्तवीर्येति नाम्नाभूद्धैहयः पृथिवीपतिः सहस्रबाहुर्बलवानर्जुनो धर्मतत्परः

दत्तात्रेयस्य शिष्योऽभूदवतारो हरेरिव ।

सिद्धः सर्वार्थदः शाक्तो भृगूणां याज्य एव सः ॥

जनमेजय बोले- जिन हैहय क्षत्रियोंने ब्रह्म-। हत्याकी लेशमात्र भी चिन्ता न करके भृगुवंशी ॥ १ ब्राह्मणोंका वध कर दिया, वे किसके कुलमें उत्पन्न हुए थे? ॥१ ॥

। हे पितामह! उनके वैरका क्या कारण था, आप ॥ २ मुझे बतलाइये । श्रेष्ठजन किसी कारणविशेषके बिना क्रोध कैसे कर सकते हैं? ॥ २ ॥

। अपने ही पुरोहितोंके साथ उनकी शत्रुता ॥ ३ किसलिये हो गयी थी? सम्भवतः उन क्षत्रियों की उस शत्रुताके पीछे कोई महान् कारण रहा । होगा । अन्यथा पापसे भयभीत रहनेवाले वे पराक्रमी ॥ ४ क्षत्रिय निरपराध एवं पूजनीय ब्राह्मणोंकी हत्या क्यों करते? ॥३-४ ॥ । हे मुनिश्रेष्ठ! ऐसा कौन श्रेष्ठ क्षत्रिय होगा, जो अल्प अपराधके कारण ब्राह्मणोंका वध करेगा? मुझे ॥ ५ तो इस विषयमें महान् शंका हो रही है, इसका कारण बतानेकी कृपा करें ॥ ५ ॥

। सूतजी बोले- तब राजा जनमेजयके इस प्रकार पूछनेपर सत्यवतीनन्दन व्यासजी परम प्रसन्न हुए और ॥ ६ मनमें उस वृत्तान्तका स्मरण करके कहने लगे ॥६ ॥

व्यासजी बोले – हे जनमेजय! मेरे द्वारा पूर्वकालमें सम्यक् प्रकारसे ज्ञात क्षत्रियोंसे सम्बन्ध । रखनेवाली इस आश्चर्यजनक प्राचीन कथाको आप ॥ ७ सुनिये? ॥ ७ ॥

कार्तवीर्य नामक एक हैहयवंशीय राजा हो चुके । हैं । सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले उन बलवान् राजाकी ॥ ८ हजार भुजाएँ थीं, वे सहस्रार्जुन भी कहे जाते थे ॥ ८ ॥

वे भगवान् विष्णुके अवतारस्वरूप, दत्तात्रेयके शिष्य, भगवतीके उपासक, परम सिद्ध, सब कुछ ९ देनेमें समर्थ तथा भृगुवंशी ब्राह्मणोंके यजमान थे॥९॥

पृष्ठ 809

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 809 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

८०० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १६

यज्वा परमधर्मिष्ठः सदा दानपरायणः ।

ददौ वित्तं भृगुभ्योऽसौ कृत्वा यज्ञाननेकशः ॥

धनिनस्ते द्विजा जाता भृगवो नृपदानतः ।

हयरत्नसमृद्ध्याढ्याः सञ्जाताः प्रथिता भुवि ॥

स्वर्याते नृपशार्दूले कार्तवीर्यार्जुने पुनः ।

हैहया निर्धना जाताः कालेन महता नृप ॥

धनकार्यं समुत्पन्नं हैहयानां कदाचन ।

याचिष्णवोऽभिजग्मुस्तान्भृगूंस्ते हैहया नृप ॥

विनयं क्षत्रियाः कृत्वाप्ययाचन्त धनं बहु ।

न ददुस्तेऽतिलोभार्ता नास्ति नास्तीतिवादिनः ॥

भूमौ च निदधुः केचिद् भृगवो धनमुत्तमम् ।

ददुः केचिद् द्विजातिभ्यो ज्ञात्वा क्षत्रियतो भयम् ॥

कृत्वा स्थानान्तरे द्रव्यं ब्राह्मणा भयविह्वलाः ।

त्यक्त्वाश्रमान्ययुः सर्वे भृगवस्तृष्णयान्विताः ॥

याज्यांश्च दुःखितान्दृष्ट्वा न ददुर्लोभमोहिताः ।

पलायित्वा गताः सर्वे गिरिदुर्गानुपाश्रिताः ॥

ततस्ते हैहयास्तात दुःखिताः कार्यगौरवात् ।

भृगूणामाश्रमाञ्जग्मुर्द्रव्यार्थं क्षत्रियर्षभाः ॥

भृगूंस्तु निर्गतान्वीक्ष्य शून्यांस्त्यक्त्वा गृहानथ ।

चखनुर्भूतलं तत्र द्रव्यार्थं हैहया भृशम् ॥

खनताधिगतं वित्तं केनचिद् भृगुवेश्मनि ।

ददृशुः क्षत्रियाः सर्वे तद्वित्तं श्रमकर्शिताः ॥

यत्र यत्र समुत्पन्नं भूरि द्रव्यं महीतलात् ।

तदा ते पार्श्वभागस्थब्राह्मणानां गृहाण्यपि ॥

वे यज्ञ करनेवाले, धर्मनिष्ठ तथा सदैव दान देनेमें १० रुचि रखनेवाले थे । उन्होंने अनेक यज्ञ करके अपनी विपुल सम्पदा भृगुवंशी ब्राह्मणोंको दान कर दी थी । राजाके द्वारा दिये गये दानसे वे भृगुवंशी ब्राह्मण बड़े धनी हो ११ गये । घोड़े तथा रत्न आदि सम्पदासे युक्त हो जाने के कारण जगत्में वे अतीव प्रसिद्ध हो गये ॥ १०-११ ॥ हे राजन्! नृपश्रेष्ठ कार्तवीर्यार्जुनके दीर्घकालतक राज्य करनेके पश्चात् उनके स्वर्ग चले जानेपर १२ हैहयवंशी क्षत्रिय धनहीन हो गये ॥१२ ॥

हे राजन्! किसी समय हैहय क्षत्रियोंको कार्य-विशेषके लिये धनकी आवश्यकता पड़ गयी । तब वे धन १३ माँगनेकी इच्छासे भृगुवंशी ब्राह्मणोंके पास गये ॥ १३ ॥।

उन क्षत्रियोंने अत्यधिक विनम्रतापूर्वक उन ब्राह्मणोंसे धनकी याचना की, किंतु लोभके वशीभूत १४ उन ब्राह्मणोंने कुछ नहीं दिया और बार - बार कहते रहे - ' मेरे पास नहीं है, मेरे पास नहीं है'॥१४ ॥

हैहयवंशी क्षत्रियोंसे भयभीत होकर कुछ भृगुवंशी १५ ब्राह्मणोंने अपनी प्रचुर सम्पत्ति जमीनमें गाड़ दी और कुछने अन्य ब्राह्मणोंको दे दी ॥१५ ॥

भयाक्रान्त तथा लोभके वशीभूत वे सभी भृगुवंशी १६ ब्राह्मण अपना - अपना धन स्थानान्तरित करके अपने आश्रम छोड़कर अन्यत्र चले गये ॥ १६ ॥

अपने यजमानोंको दुःखित देखकर भी लोभसे १७ विमोहित ब्राह्मणोंने उन्हें कुछ भी नहीं दिया । उन सभीने भागकर पर्वतकी गुफाओंका आश्रय ग्रहण किया ॥ १७ ॥

हे तात! तत्पश्चात् कष्ट झेल रहे अनेक हैहय क्षत्रियप्रमुख विशेष कार्यवश द्रव्यप्राप्तिके १८ लिये भृगुवंशी ब्राह्मणोंके आश्रमोंपर पहुँचे ॥ १८ ॥

अपने - अपने आश्रमको सुनसान छोड़कर भृगुवंशी ब्राह्मणोंको बाहर गया हुआ देखकर वे हैहय क्षत्रिय १ ९ धनके लिये वहाँकी जमीन खोदने लगे ॥१ ९ ॥ तत्पश्चात् किसी ब्राह्मणके घरमें जमीन खोद रहे किसी क्षत्रियने कुछ पाया । अब परिश्रमके कारण २० क्षीणकाय सभी क्षत्रियोंने उस धनको देख लिया । उस समयसे जहाँ - जहाँ भी पता चलता, वे जमीन खोदकर समस्त धन ले लेते थे । धनके लोभसे आस-२१ | पास रहनेवाले ब्राह्मणोंके भी घरोंको खोदनेपर उन

पृष्ठ 810

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 810 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० १६ ]

निर्भिद्य हैहया द्रव्यं ददृशुर्धनलिप्सया ।

ब्राह्मणाश्चुक्रुशुः सर्वे भीताश्च शरणं गताः ॥

अतिचिन्वत्सु विप्राणां भवनान्निःसृतं बहु ।

निजघ्नुस्ताञ्छरैः कोपाद्वाडवाञ्छरणागतान् ॥

ययुस्ते गिरिदुर्गांश्च यत्र वै भृगवः स्थिताः ।

आगर्भादनुकृन्तन्तश्चेरुश्चैव महीमिमाम् ॥

प्राप्तान्प्राप्तान्भृगून्सर्वान्निजघ्नुर्निशितैः शरैः ।

आबालवृद्धानपरानवमन्य च पातकम् ॥

एवमुत्पाट्यमानेषु भार्गवेषु यतस्ततः ।

हन्युर्गर्भांश्च नारीणां गृहीत्वा हैहया भृशम् ॥

रुरुदुस्ता: स्त्रियः कामं कुरर्य इव दुःखिताः ।

गर्भाश्च कृन्तिता यासां क्षत्रियैः पापनिश्चयैः ॥

अन्येऽप्याहुश्च तान्दृप्तान्मुनयस्तीर्थवासिनः ।

मुञ्चन्तु क्षत्रियाः क्रोधं ब्राह्मणेषु भयावहम् ॥

अयुक्तमेतदारब्धं भवद्भिः कर्म गर्हितम् ।

यद् गर्भान्भृगुपत्नीनां निहन्युः क्षत्रियर्षभाः ॥

अत्युग्रपुण्यपापानामिहैव फलमाप्नुयात् ।

तस्माज्जुगुप्सितं कर्म त्यक्तव्यं भूतिमिच्छता ॥

तानाहुहैहयाः क्रुद्धा मुनीनथ दयापरान् ।

भवन्तः साधवः सर्वे नार्थज्ञाः पापकर्मणाम् ॥

एभिर्हतं धनं सर्वं पूर्वजानां महात्मनाम् ।

वञ्चयित्वा छलाभिज्ञैर्मार्गे पाटच्चरैरिव ॥

एते प्रतारका दम्भास्तादृशा बकवृत्तयः ।

उत्पन्ने च महाकार्ये प्रार्थिता विनयेन ते ॥

1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] - 26 A षष्ठ स्कन्ध ८०१ क्षत्रियोंको पर्याप्त धन दिखलायी पड़ा । इसपर सभी २२ ब्राह्मण रोने - चिल्लाने लगे और भयभीत होकर क्षत्रियोंके शरणागत हो गये ॥ २० - २२ ॥ बार - बार खोजते रहनेपर उन ब्राह्मणोंके घरसे प्रायः सभी धन निकल चुका था । फिर भी वे क्षत्रिय उन शरणागत २३ ब्राह्मणोंपर कोप करके बाणोंसे प्रहार करते रहे ॥ २३ ॥

इसके पश्चात् वे उन पर्वतकी गुफाओंमें पहुँच गये, जहाँ भृगुवंशी ब्राह्मण स्थित थे । इस प्रकार २४ गर्भस्थ शिशुओंसहित ब्राह्मणोंको नष्ट करते हुए क्षत्रिय इस पृथ्वीमण्डलपर घूमने लगे ॥ २४ ॥

उन्हें जहाँ कहीं भृगुवंशी बालक, वृद्ध तथा २५ अन्य भी मिल जाते थे, वे पापकी परवा किये बिना उन सभीको तीक्ष्ण बाणोंसे मार डालते थे ॥ २५ ॥

इस प्रकार इधर - उधर सभी भृगुवंशी ब्राह्मणोंके २६ मार दिये जानेपर उन हैहय क्षत्रियोंने स्त्रियोंको पकड़ - पकड़कर उनका गर्भ नष्ट कर डाला । पापकृत्यपर तुले हुए क्षत्रियोंके द्वारा जिन स्त्रियोंके गर्भ नष्ट कर दिये जाते थे, वे बेचारी अत्यन्त दुःखित होकर कुररी २७ पक्षीकी भाँति विलाप करने लगती थीं॥२६-२७ ॥ तब अन्य तीर्थवासी मुनियोंने भी अभिमानमें चूर उन हैहयवंशी क्षत्रियोंसे कहा - हे क्षत्रियो! तुमलोग २८ ब्राह्मणोंपर ऐसा भयंकर क्रोध करना छोड़ दो । हे श्रेष्ठ क्षत्रियो! तुमलोगोंने तो अत्यन्त निन्दनीय तथा अनुचित कार्य आरम्भ कर दिया है जो कि तुमलोग भृगुवंशी २ ९ ब्राह्मणोंकी पत्नियोंका गर्भोच्छेद कर रहे हो । अत्यन्त उग्र पाप अथवा पुण्यका फल इसी लोकमें प्राप्त हो जाता है । इसलिये कल्याणकी इच्छा रखनेवाले प्राणीको ३० गर्हित कर्मका परित्याग कर देना चाहिये ॥ २८–३० ॥ तत्पश्चात् क्रोधमें भरे हुए उन हैहय क्षत्रियोंने उन परम दयालु मुनियोंसे कहा- आप सभी लोग साधु हैं, अतः पापकर्मोंका रहस्य नहीं जानते ॥ ३१ ॥

३१ छल - छद्मको जाननेवाले इन ब्राह्मणोंने कपट करके हमारे महात्मा पूर्वजोंका सारा धन उसी प्रकार छीन लिया था जैसे कोई लुटेरा किसी पथिकका धन ३२ छीन लेता है ॥ ३२ ॥

ये सभी ठग, दम्भी तथा बकवृत्तिवाले ( पाखण्डी ) हैं । आवश्यक कार्य पड़नेपर हमने विनम्रतापूर्वक ३३ । इनसे धनकी याचना की थी, किंतु इन्होंने नहीं दिया ।