देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 811–820

देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 811–820

पृष्ठ 811

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८०२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १६

न ददुः प्रार्थितं विप्राः पादवृद्धयापि याचिताः ।

नास्तीतिवादिनः स्तब्धाः दुःखितान्वीक्ष्य याज्यकान् ॥

धनं प्राप्तं कार्तवीर्याद्रक्षितं केन हेतुना न कृताः क्रतवः किं तैर्दानं चार्थिषु भूरिशः ॥ न सञ्चितव्यं विप्रैस्तु धनं क्वापि कदाचन यष्टव्यं विधिवद्देयं भोक्तव्यं च यथासुखम् द्रव्ये चौरभयं प्रोक्तं तथा राजभयं द्विजाः वह्नेर्भयं महाघोरं तथा धूर्तभयं महत् येन केनाप्युपायेन धनं त्यजति रक्षकम् अथवासौ मृतो याति द्रव्यं त्यक्त्वा ह्यसद्गतिम् पादवृद्ध्या तथास्माभिः प्रार्थितं विनयान्वितैः तथापि लोभसन्दिग्धैर्न दत्तं नः पुरोहितैः दानं भोगस्तथा नाशो धनस्य गतिरीदृशी दानभोगौ कृतीनां च नाशः पापात्मनां किल न दाता न च यो भोक्ता कृपणो गुप्तितत्परः राज्ञासौ सर्वथा दण्ड्यो वञ्चको दुःखभाङ्नरः तस्माद्वयं गुरूनेतान्वञ्चकान्ब्राह्मणाधमान् हन्तुं समुद्यताः सर्वे न क्रोधव्यं महात्मभिः व्यास उवाच इत्युक्त्वा हेतुमद्वाक्यं तानाश्वास्य मुनीनथ विचेरुश्च विचिन्वाना भृगुदाराननेकशः भयार्ता भृगुपन्यस्तु हिमवन्तं धराधरम् प्रपेदिरे रुदन्त्यश्च वेपमानाः कृशा भृशम् ॥ एवं ते हैहयैर्विप्राः पीडिता धनकामुकैः निहताश्च यथाकामं संरब्धैः पापकर्मभिः यहाँतक कि चतुर्थांशवृद्धिपर भी धन माँगनेपर हम ३४ याचकोंको अत्यन्त दुःखित देखकर इन निष्ठुर ब्राह्मणोंने ' हमारे पास नहीं है ' - ऐसा कहा ॥ ३३-३४ ॥ । महाराज कार्तवीर्यसे धन प्राप्त करके इन्होंने ३५ किस प्रयोजनसे धनकी रक्षा की? इन्होंने न तो यज्ञ किये और न तो याचकोंको ही प्रचुर दान दिया ॥ ३५ ॥

। ब्राह्मणों को कभी भी धनका संग्रह नहीं करना चाहिये । यज्ञ करने, दान देने तथा सुखोपभोगमें ॥ ३६ यथेच्छ धनका उपयोग करना चाहिये ॥ ३६ ॥

। हे विप्रो! पासमें धन रहनेपर चोर, राजा, अग्नि तथा धूर्तोंसे महान् भय कहा गया है ॥ ३७ ॥

॥ ३७ जिस किसी भी उपायसे अपनी ही रक्षा करनेवालेको । धन छोड़ देता है अथवा वह व्यक्ति धन छोड़कर स्वयं मर जाता है और दुर्गतिको प्राप्त होता है ॥ ३८ ॥

॥ ३८ हम सबने बड़ी विनम्रताके साथ इन लोगोंसे । चतुर्थांशवृद्धिपर धन माँगा था, फिर भी लोभके कारण संशयमें पड़े हुए पुरोहितोंने हमें धन नहीं दिया ॥ ३ ९ ॥ ॥ ३ ९ दान, भोग तथा नाश - धनकी इस प्रकारकी गति । होती है । पुण्यशाली प्राणियोंके धनकी गति दान तथा भोग है और दुष्ट आत्मावाले प्राणियोंके धनकी गति ॥ ४० नाश है । जो कृपण व्यक्ति न दान करता है और न धनका उपभोग करता है, अपितु केवल धनके संग्रहमें । लगा रहता है, वह वंचक प्राणी राजाके द्वारा सर्वथा ॥ ४१ दण्डनीय है और दुःखका भागी होता है ॥ ४०-४१ ॥ इसीलिये इन वंचक गुरुओं तथा अधम । ब्राह्मणोंको मारनेके लिये हम सभी उद्यत हुए हैं । आप ॥ ४२ महात्माजन इसके लिये हमपर कोप न करें ॥४२ ॥

व्यासजी बोले- इस प्रकार सहेतुक वचन कहकर उन मुनियोंको पूर्ण आश्वस्त करनेके बाद | वे पुनः भृगुकुलकी स्त्रियोंको खोजते हुए भ्रमण ॥ ४३ करने लगे ॥ ४३ ॥

भयार्त तथा अत्यन्त कृश शरीरवाली भृगुवंशीय । पत्नियाँ हिमवान् पर्वतपर रोती तथा काँपती हुई ४४ पहुचीं ॥ ४४ ॥

इस प्रकार धनलोलुप तथा पापकर्मोंसे अभिभूत । हैहयोंने उन ब्राह्मणोंको बहुत पीड़ित किया तथा ॥ ४५ । उनका संहार किया ॥ ४५ ॥

1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] -26 B

पृष्ठ 812

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अ ० १७ ]

लोभ एव मनुष्याणां देहसंस्थो महारिपुः ।

सर्वदुःखाकरः प्रोक्तो दुःखदः प्राणनाशकः ॥

सर्वपापस्य मूलं हि सर्वदा तृष्णयान्वितः ।

विरोधकृत्त्रिवर्णानां सर्वार्तेः कारणं तथा ॥

लोभात्त्यजन्ति धर्मं वै कुलधर्मं तथैव हि ।

मातरं भ्रातरं हन्ति पितरं बान्धवं तथा ॥

गुरुं मित्रं तथा भार्यां पुत्रं च भगिनीं तथा ।

लोभाविष्टो न किं कुर्यादकृत्यं पापमोहितः ॥

क्रोधात्कामादहङ्काराल्लोभ एव महारिपुः ।

प्राणांस्त्यजति लोभेन किं पुनः स्यादनावृतम् ॥

पूर्वजास्ते महाराज धर्मज्ञाः सत्पथे स्थिताः ।

पाण्डवाः कौरवाश्चैव लोभेन निधनं गताः ॥

यत्र भीष्मश्च द्रोणश्च कृपः कर्णश्च बाह्लिकः ।

भीमसेनो धर्मपुत्रस्तथैवार्जुनकेशवौ ॥

तथापि युद्धमत्युग्रं कृतं तैश्च परस्परम् ।

कुटुम्बकदनं भूरि कृतं लोभातुरैरिह ॥

हतो द्रोणो हतो भीष्मस्तथैव पाण्डवात्मजाः ।

भ्रातरः पितरः पुत्राः सर्वे वै निहता रणे ॥

तस्माल्लोभाभिभूतस्तु किं न कुर्यान्नरः किल ।

हैहयैर्निहताः सर्वे भृगवः पापबुद्धिभिः ॥

षष्ठ स्कन्ध ८०३ लोभ मनुष्योंके देहमें रहनेवाला सबसे बड़ा शत्रु ४६ है । यह समस्त दु: खोंका आगार, दुःखदायी तथा प्राणोंका नाश करनेवाला कहा गया है ॥ ४६ ॥

यह लोभ सम्पूर्ण पापोंकी जड़ तथा सभी ४७ दुःखोंका कारण है । लोभसे युक्त प्राणी सदा तीनों वर्णोंके लोगोंसे विरोध रखनेवाला होता है ॥ ४७ ॥

४८ लोभके वशीभूत प्राणी अपने सदाचार तथा कुल-धर्मका भी परित्याग कर देते हैं । वे अपने माता, पिता, भाई, बान्धव, गुरु, मित्र, पत्नी, पुत्र तथा बहनतकका वध कर ४ ९ देते हैं । इस प्रकार लोभके वशीभूत मनुष्य पापसे विमोहित होकर कौन - सा दुष्कर्म नहीं कर डालता ॥ ४८-४९ ॥ ५० क्रोध, काम तथा अहंकारसे भी बढ़कर लोभ महान् शत्रु है । लोभमें पड़कर मनुष्य अपने प्राणतक गँवा देता है; फिर इसके विषयमें और क्या कहा जाय! ॥ ५० ॥

५१ हे महाराज! आपके पूर्वज धर्मज्ञ तथा सत्पथपर चलनेवाले थे, किंतु वे पाण्डव तथा कौरव लोभके कारण ५२ ही मारे गये । जहाँ भीष्मपितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण, बाह्लीक, भीमसेन, धर्मपुत्र युधिष्ठिर, अर्जुन तथा श्रीकृष्ण थे, फिर भी लोभके वशीभूत उन्होंने आपसमें ५३ भीषण युद्ध किया और अपने कुटुम्बका महाविनाश कर डाला । उस युद्धमें द्रोण, भीष्म, पाण्डवोंके पुत्र, ५४ भाई, पिता, पुत्र सभी मारे गये ॥ ५१–५४ ॥ अतएव लोभपरायण मनुष्य क्या नहीं कर डालता? [ लोभके कारण ही ] पापबुद्धि हैहयवंशी क्षत्रियोंने ५५ । भृगुकुलके समस्त ब्राह्मणोंको मार डाला था ॥ ५५ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्रयां संहितायां षष्ठस्कन्थे हैहयैर्धनाहरणेन सहभृगूणां वधवर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥

अथ सप्तदशोऽध्यायः भगवतीकी कृपासे भार्गव - ब्राह्मणीकी जंघासे तेजस्वी बालककी उत्पत्ति, हैहयवंशी जनमेजय उवाच

कथं ताश्च स्त्रियः सर्वा भृगूणां दुःखसागरात् ।

मुक्ता वंशः पुनस्तेषां ब्राह्मणानां स्थिरोऽभवत् ॥

हैहयैः किं कृतं कार्यं हत्वा तान्ब्राह्मणानपि ।

क्षत्रियैर्लोभसंयुक्तैः पापाचारैर्वदस्व तत् ॥

1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] - 26 C क्षत्रियोंकी उत्पत्तिकी कथा जनमेजय बोले – भृगुवंशकी स्त्रियोंका पुनः दुःखरूप समुद्रसे कैसे उद्धार हुआ और उन ब्राह्मणोंकी १ वंशपरम्परा किस प्रकार स्थिर रही? ॥१ ॥

लोभके वशीभूत तथा पापाचारी हैहय क्षत्रियोंने उन ब्राह्मणोंको मारनेके पश्चात् कौन - सा कार्य २ । किया? उसे आप बताइये ॥ २ ॥

पृष्ठ 813

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८०४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १७

न तृप्तिरस्ति मे ब्रह्मन् पिबतस्ते कथामृतम् ।

पावनं सुखदं नॄणां परलोके फलप्रदम् ॥

व्यास उवाच

शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि कथां पापप्रणाशिनीम् ।

यथा स्त्रियस्तु ता मुक्ता दुःखात्तस्माद्दुरत्ययात् ॥

भृगुपत्न्यो यदा राजन् हिमवन्तं गिरिं गताः ।

भयत्रस्ता विभग्नाशा हैहयैः पीडिता भृशम् ॥

गौरीं तत्र तु संस्थाप्य मृण्मयीं सरितस्तटे ।

उपोषणपराश्चक्रुर्निश्चयं मरणं प्रति ॥

स्वप्ने गत्वा तदा देवी प्राह ताः प्रमदोत्तमाः ।

युष्मासु मध्ये कस्याश्चिद्भविता चोरुजः पुमान् ॥

मदंशशक्तिसम्भिन्नः स वः कार्यं विधास्यति ।

इत्यादिश्य पराम्बा सा पश्चादन्तर्हिताभवत् ॥

जागृतास्तु ततः सर्वा मुदमापुर्वराङ्गनाः ।

काचित्तासां भयोद्विग्ना कामिनी चतुरा भृशम् ॥

दधार चोरुणैकेन गर्भं सा कुलवृद्धये ।

पलायनपरा दृष्टा क्षत्रियैर्ब्राह्मणी यदा ॥

विह्वला तेजसा युक्ता तदा ते दुद्रुवुर्भृशम् ।

गृह्यतां वध्यतां नारी सगर्भा याति सत्वरा ॥

इति ब्रुवन्तः सम्प्राप्ताः कामिनीं खड्गपाणयः ।

सा भयार्ता तु तान्दृष्ट्वा रुरोद समुपागतान् ॥

गर्भस्य रक्षणार्थं सा चुक्रोशातिभयातुरा ।

रुदतीं मातरं श्रुत्वा दीनां प्राणविवर्जिताम् ॥

निराधारां क्रन्दमानां क्षत्रियैर्भृशतापिताम् ।

गृहीतामिव सिंहेन सगर्भां हरिणीं यथा ॥

साश्रुनेत्रां वेपमानां सङ्क्रुध्य बालकस्तदा ।

भित्त्वोरुं निर्जगामाशु गर्भः सूर्य इवापरः ॥

मुष्णन्दृष्टीः क्षत्रियाणां तेजसा बालकः शुभः । हे ब्रह्मन्! आपके द्वारा कथित इस पवित्र, लोगों के लिये सुखदायक तथा परलोकमें फल देनेवाले कथामृतका ३ पान करते हुए मुझे तृप्ति नहीं हो रही है ॥ ३ ॥

व्यासजी बोले — हे राजन्! सुनिये, वे स्त्रियाँ उस भयावह दु: खसे जिस प्रकार मुक्त हुईं, अब मैं उस ४ पापनाशिनी कथाका वर्णन करूँगा ॥४ ॥

हे राजन्! जब क्षत्रिय हैहय भृगुकुलकी नारियोंको बहुत पीड़ित करने लगे तब वे भयभीत तथा निराश ५ होकर हिमालयपर्वतपर चली गयीं ॥५ ॥

उन्होंने वहाँ नदीके तटपर गौरीकी मृण्मयी प्रतिमा स्थापित करके निराहार रहते हुए [ उपासनामें लीन होकर ] ६ । अपने मरणके प्रति पूरा निश्चय कर लिया ॥ ६ ॥

एक समय स्वप्नमें भगवती जगदम्बाने उन उत्तम स्त्रियोंके पास पहुँचकर कहा- तुमलोगोंमेंसे किसीकी ७ जंघासे एक पुरुष उत्पन्न होगा । मेरा अंशभूत वही शक्तिमान् पुरुष तुमलोगोंका कार्य सिद्ध करेगा । ऐसा कहकर पराम्बा भगवती अन्तर्धान हो गयीं ॥ ७-८ ॥ ८ जागनेपर वे सभी स्त्रियाँ बहुत प्रसन्न हुईं । उनमेंसे किसी चतुर, कामिनी स्त्रीने जो भयसे त्रस्त थी; वंशवृद्धिहेतु ९ अपनी एक जंघामें गर्भ धारण किया ॥ ९ ३ ॥ जब उन हैहय क्षत्रियोंने व्याकुल तथा तेजयुक्त उस स्त्रीको भागती हुई देखा तब वे उसके पीछे दौड़ १० पड़े ॥ १०३ ॥

' यह गर्भ धारण करके वेगपूर्वक भागी जा रही है, इसे पकड़ लो और मार डालो ' - इस प्रकार कहते हुए ११ हाथमें तलवार लेकर वे उस स्त्रीके पास पहुँच गये ॥ ११३ ॥

भयसे घबरायी हुई वह स्त्री अपने समीप आये १२ हुए उन क्षत्रियोंको देखकर रोने लगी और पुन: गर्भरक्षाके लिये भयसे विह्वल होकर जोर - जोरसे विलाप करने लगी ॥ १२३ ॥

१३ तब दयनीय दशावाली, प्राणहीन - सी प्रतीत हो रही, आश्रयहीन, क्षत्रियोंसे पीडित होनेके कारण क्रन्दन करती हुई, सिंहके द्वारा पकड़ी गयी गर्भवती हिरनीके समान १४ | प्रतीत होनेवाली, आँसूभरे नेत्रोंवाली तथा थर - थर काँपती हुई माताका रुदन सुनकर वह सुन्दर गर्भस्थ बालक कुपित होकर अपने तेजसे क्षत्रियोंकी नेत्र - ज्योतिका १५ हरण करता हुआ जंघाका भेदन करके दूसरे सूर्यकी भाँति शीघ्र ही बाहर निकल आया ॥ १३-१५३ ॥ 1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] - 26 D

पृष्ठ 814

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अ ० १७ ] षष्ठ दर्शनाद् बालकस्याशु सर्वे जाता विलोचनाः ॥ १६

बभ्रमुर्गिरिदुर्गेषु जन्मान्धा इव क्षत्रियाः ।

चिन्तितं मनसा सर्वैः किमेतदिति साम्प्रतम् ॥ १७

सर्वे चक्षुर्विहीना यज्जाताः स्म बालदर्शनात् ।

ब्राह्मण्यास्तु प्रभावोऽयं सतीव्रतबलं महत् ॥ १८

क्षणाद्वामोघसङ्कल्पाः किं करिष्यन्ति दुःखिताः ।

इति सञ्चिन्त्य मनसा नेत्रहीना निराश्रयाः ॥ १ ९

ब्राह्मणीं शरणं जग्मुर्हैहया गतचेतसः ।

प्रणेमुस्तां भयत्रस्तां कृताञ्जलिपुटाश्च ते ॥ २०

ऊचुश्चैनां भयोद्विग्नां दृष्ट्यर्थं क्षत्रियर्षभाः ।

प्रसीद सुभगे मातः सेवकास्ते वयं किल ॥ २१

कृतापराधा रम्भोरु क्षत्रियाः पापबुद्धयः ।

दर्शनात्तव तन्वङ्गि जाताः सर्वे विलोचनाः ॥ २२

मुखं ते नैव पश्यामो जन्मान्धा इव भामिनि ।

अद्भुतं ते तपो वीर्यं किं कुर्मः पापकारिणः ॥ २३

शरणं ते प्रपन्नाः स्मो देहि चक्षूंषि मानदे ।

अन्धत्वं मरणादुग्रं कृपां कर्तुं त्वमर्हसि ॥ २४

पुनर्दृष्टिप्रदानेन सेवकान्क्षत्रियान्कुरु ।

उपरम्य च गच्छेम सहिताः पापकर्मणः ॥ २५

अतः परं न कर्तव्यमीदृशं कर्म कर्हिचित् ।

भार्गवाणां तु सर्वेषां सेवकाः स्मो वयं किल ॥ २६

अज्ञानाद्यत्कृतं पापं क्षन्तव्यं तत्त्वयाधुना ।

वैरं नातः परं क्वापि भृगुभिः क्षत्रियैः सह ॥ २७

कर्तव्यं शपथैः सम्यग्वर्तितव्यं तु हैहयैः ।

सपुत्रा भव सुश्रोणि प्रणताः स्मो वयं च ते ॥ २८

प्रसादं कुरु कल्याणि न द्विष्यामः कदाचन । व्यास उवाच इति तेषां वचः श्रुत्वा ब्राह्मणी विस्मयान्विता ॥ २ ९ । स्कन्ध ८०५ उस बालककी ओर देखते ही वे सभी दृष्टिहीन हो गये । तत्पश्चात् वे क्षत्रिय जन्मान्धकी भाँति पर्वतकी गुफाओं में इधर - उधर भटकने लगे । सभी क्षत्रिय मनमें विचार करने लगे कि इस समय यह क्या हो गया है कि हम सभी लोग बालकको देखनेमात्र से चक्षुहीन हो गये । ऐसा प्रतीत होता है कि इसी ब्राह्मणीका यह प्रभाव है; क्योंकि सतीव्रत एक महान् बल है । अमोघ संकल्पवाली दुःखित स्त्रियाँ क्षणभरमें न जाने क्या कर डालेंगी! ॥ १६ – १८३ ॥ ऐसा मनमें सोचकर नेत्रहीन, निराश्रय तथा चेतना-रहित हैहयवंशी क्षत्रिय उस ब्राह्मणीकी शरण में गये और उन्होंने भयसे त्रस्त उस स्त्रीको दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम किया । वे श्रेष्ठ क्षत्रिय अपनी नेत्रज्योतिके लिये इस भयाकुल ब्राह्मणीसे कहने लगे - ॥ १ ९ -२०३ ॥ हे सुभगे! हे माता! हम सब आपके सेवक हैं । अब आप हमारे ऊपर प्रसन्न हो जाइये । हे रम्भोरु! पाप बुद्धिवाले हम क्षत्रियोंने अपराध किया है । हे तन्वंगि! इसीलिये आपको देखते ही हम सब चक्षुविहीन हो गये । हे भामिनि! जन्मसे अन्धे व्यक्तिकी भाँति हम आपका मुखदर्शन कर पाने में समर्थ नहीं हैं । आपका तप तथा पराक्रम अद्भुत है; हम पापपरायण कर ही क्या सकते हैं? हे मानदे! हम आपकी शरणमें हैं । हमें नेत्र दीजिये; क्योंकि नेत्रज्योतिसे विहीन हो जाना मृत्युसे भी कष्टकारक होता है । आप हमारे ऊपर कृपा कीजिये । फिरसे नेत्रज्योति देकर इन समस्त क्षत्रियोंको अपना सेवक बना लीजिये । इसके बाद पापकर्मसे रहित होकर हमलोग साथ - साथ चले जायँगे । अब हमलोग इस प्रकारका कर्म कभी नहीं करेंगे । अब हम सभी भार्गव ब्राह्मणोंके सेवक हो गये । हमलोगोंने अज्ञानवश जो भी पाप किया है उसे आप क्षमा करें । हम हैहय क्षत्रिय शपथपूर्वक कहते हैं कि आजसे कभी भी भृगुवंशी ब्राह्मणोंके साथ हमें वैरभाव नहीं रखना चाहिये और यथोचित व्यवहार करना चाहिये । हे सुश्रोणि! आप पुत्रवती होवें । हम आपकी शरणमें हैं । हे कल्याणि! आप कृपा करें; हमलोग अब कभी भी द्वेषभाव नहीं रखेंगे ॥ २१ - २८३ ॥ व्यासजी बोले - – [ हे राजन्! ] उन क्षत्रियोंकी यह बात सुनकर ब्राह्मणी विस्मयमें पड़ गयी और उसने शरणागत तथा दुर्गतिको प्राप्त उन नेत्रहीन

पृष्ठ 815

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८०६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १७

तानाह प्रणतान्दुःस्थानाश्वास्य गतलोचनान् ।

गृहीता न मया दृष्टिर्युष्माकं क्षत्रियाः किल ॥

नाहं रुषान्विता सत्यं कारणं शृणुताद्य यत् ।

अयं च भार्गवो नूनमूरुजः कुपितोऽद्य वः ॥

चक्षूंषि तेन युष्माकं स्तम्भितानि रुषावता ।

स्वबन्धून्निहताञ्ज्ञात्वा गर्भस्थानपि क्षत्रियैः ॥

अनागसो धर्मपरांस्तापसान्धनकाम्यया ।

गर्भानपि यदा यूयं भृगूनघ्नंस्तु पुत्रकाः ॥

तदायमूरुणा गर्भो मया वर्षशतं धृतः ।

षडङ्गश्चाखिलो वेदो गृहीतोऽनेन चाञ्जसा ॥

गर्भस्थेनापि बालेन भृगुवंशविवृद्धये ।

सोऽपि पितृवधान्नूनं क्रोधेो हन्तुमिच्छति ॥

भगवत्याः प्रसादेन जातोऽयं मम बालकः ।

तेजसा यस्य दिव्येन चक्षूंषि मुषितानि वः ॥

तस्मादौ सुतं मेऽद्य याचध्वं विनयान्विताः ।

प्रणिपातेन तुष्टोऽसौ दृष्टिं वः प्रतिमोक्ष्यति ॥

व्यास उवाच

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या हैहयास्तुष्टुवुश्च तम् ।

प्रणेमुर्विनयोपेता ऊरुजं मुनिसत्तमम् ॥

स सन्तुष्टो बभूवाथ तानुवाच विचक्षुषः ।

गच्छध्वं स्वगृहान्भूपा ममाख्यानकृतं वचः ॥

अवश्यम्भाविभावास्ते भवन्ति देवनिर्मिताः ।

नात्र शोकस्तु कर्तव्यः पुरुषेण विजानता ॥

पूर्ववदृषयः सर्वे प्राप्नुवन्तु यथासुखम् ।

व्रजन्तु विगतक्रोधा भवनानि यथासुखम् ॥

क्षत्रियों को आश्वासन देकर कहा - हे क्षत्रियो! आपलोग ३० निश्चितरूपसे जान लें कि मैंने आप सबकी दृष्टिका

हरण नहीं किया है । २ ९ -३० ॥

मैं आपलोगोंपर कुपित नहीं हूँ । अब मैं वास्तविक कारण बता रही हूँ, आपलोग सुनिये । मेरी जंघासे उत्पन्न ३१ यह भृगुवंशी बालक आज आपलोगोंपर कुपित है । क्षत्रियोंके द्वारा अपने बान्धवों और यहाँतक कि गर्भस्थित बालकोंका वध किये जानेकी बात जानकर कोपाविष्ट इसी बालकने ३२ आपलोगोंके नेत्र स्तम्भित कर दिये हैं ॥ ३१-३२ ॥ हे वत्सगण! जब आपलोग निरपराध, धर्मनिष्ठ तथा तपस्वी भार्गव ब्राह्मणों और गर्भस्थ बालकोंको ३३ भी धन- - लोलुपतामें पड़कर मार रहे थे तभी मैंने इसे अपनी जंघामें गर्भरूपसे एक सौ वर्षतक धारण किये रखा । भृगुवंशकी वृद्धिके लिये इस गर्भस्थ बालकने ३४ छहों अंगोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका बड़े सहजभावसे अध्ययन कर लिया है और अब यह अपने पितृजनोंके वधसे अत्यन्त कुपित होकर आपलोगोंका संहार करना चाहता ३५ है ॥३३–३५ ॥ मेरा यह पुत्र भगवतीकी कृपासे उत्पन्न हुआ है, जिसके अलौकिक तेजने आपलोगोंके नेत्र हर ३६ लिये हैं ॥ ३६ ॥

अतएव आपलोग इसी समय मेरी जंघासे उत्पन्न इस बालकसे विनम्रतापूर्वक याचना कीजिये । ३७ चरणोंमें गिरनेसे प्रसन्न होकर यह बालक आपलोगोंकी नेत्रज्योति मुक्त कर देगा ॥ ३७ ॥

व्यासजी बोले – उस ब्राह्मणीका वचन सुनकर हैहयोंने जंघासे उत्पन्न बालकरूप मुनिश्रेष्ठको प्रणाम किया और वे विनयसे युक्त होकर उसकी स्तुति करने ३८ लगे ॥ ३८ ॥

तत्पश्चात् प्रसन्न होकर उस बालकने उन नेत्रहीन क्षत्रियोंसे कहा — हे राजाओ! अब तुमलोग मेरी कही ३ ९ हुई बातपर विश्वास करके अपने घर लौट जाओ ॥ ३ ९ ॥ दैवने जो विधान सुनिश्चित कर दिये हैं, वे अवश्य होकर रहते हैं; ज्ञानी व्यक्तिको इस विषय में ४० चिन्ता नहीं करनी चाहिये ॥ ४० ॥

सभी ऋषिगण पूर्वकी भाँति सुख प्राप्त करें तथा सभी क्षत्रिय भी अब क्रोधरहित होकर सुखपूर्वक ४१ । अपने - अपने घरोंके लिये प्रस्थान करें ॥ ४१ ॥

पृष्ठ 816

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अ ० १७ ] षष्ठ स्कन्ध ८०७

इति तेन समादिष्टा हैहयाः प्राप्तलोचनाः ।

और्वमामन्त्र्य जग्मुस्ते सदनानि यथारुचि ॥

ब्राह्मणी तं सुतं दिव्यं गृहीत्वा स्वाश्रमं गता ।

पालयामास भूपाल तेजस्विनमतन्द्रिता ॥

एवं ते कथितं राजन् भृगूणां तु विनाशनम् ।

लोभाविष्टैः क्षत्रियैश्च यत्कृतं पातकं किल ॥

जनमेजय उवाच

श्रुतं मया महत्कर्म क्षत्रियाणाञ्च दारुणम् ।

कारणं लोभ एवात्र दुःखदश्चोभयोस्तु सः ॥

किञ्चित्प्रष्टुमिहेच्छामि संशयं वासवीसुत ।

हैहयास्ते कथं नाम्ना ख्याता भुवि नृपात्मजाः ॥

यदोस्तु यादवाः कामं भरताद्भारतास्तथा ।

हैहयः कोऽपि राजाभूत्तेषां वंशे प्रतिष्ठितः ॥

तदहं श्रोतुमिच्छामि कारणं करुणानिधे ।

हैहयास्ते कथं जाताः क्षत्रियाः केन कर्मणा ॥

व्यास उवाच

हैहयानां समुत्पत्तिं शृणु भूप सविस्तराम् ।

पुरातनीं सुपुण्यां च कथां पापप्रणाशिनीम् ॥

कस्मिंश्चित्समये भूप सूर्यपुत्रः सुशोभनः ।

रेवन्तेति च विख्यातो रूपवानमितप्रभः ॥

उच्चैःश्रवसमारुह्य हयरत्नं मनोहरम् ।

जगाम विष्णुसदनं वैकुण्ठं भास्करात्मजः ॥

भगवद्दर्शनाकांक्षी हयारूढो यदागतः ।

हयस्थस्तु तदा दृष्टो लक्ष्म्यासौ रविनन्दनः ॥

रमा वीक्ष्य हयं दिव्यं भ्रातरं सागरोद्भवम् । रूपेण विस्मिता तस्य तस्थौ स्तम्भितलोचना । इस प्रकार उसके कहनेपर उन हैहयवंशी ४२ क्षत्रियोंको दृष्टि प्राप्त हो गयी और वे उत्पन्न ) उस बालकसे आज्ञा लेकर अपने - अपने घर चले गये ॥ ४२ ॥

४३ हे राजन्! वह ब्राह्मणी भी उस अलौकिक बालकको लेकर अपने गयी और बड़ी सावधानीपूर्वक उसका ४४ | करने लगी ॥४३ ॥

हे राजन्! इस प्रकार भृगुवंशके और्व ( ऊरुसे आनन्दपूर्वक तेजस्वी तथा आश्रम चली पालन - पोषण विनाश तथा लोभके वशीभूत हैहय क्षत्रियोंने जो पापकर्म किया था; उसके विषयमें मैंने आपसे कहा ॥ ४४ ॥

जनमेजय बोले- हे मुने! मैंने क्षत्रियोंके अत्यन्त ४५ दारुण कर्मके विषयमें सुन लिया । इहलोक तथा परलोकमें दुःख देनेवाला वह लोभ ही इसमें मूल कारण है ॥ ४५ ॥

हे सत्यवतीनन्दन! मैं संशयग्रस्त हूँ; [ इस विषय में ] ४६ आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ । ये क्षत्रिय राजकुमार इस जगत्में हैहय नामसे क्यों प्रसिद्ध हुए? ॥ ४६ ॥

यदुसे यादव हुए तथा भरतसे भारत हुए । उसी ४७ प्रकार क्या उन क्षत्रियोंके वंशमें ' हैहय ' नामधारी कोई प्रतिष्ठित राजा हुआ था? ॥ ४७ ॥

हे करुणानिधान! उन हैहय क्षत्रियोंकी उत्पत्ति ४८ कैसे हुई तथा किस कर्मसे उनका यह नाम पड़ा? वह कारण मैं सुनना चाहता हूँ ॥ ४८ ॥

व्यासजी बोले- हे राजन्! अब मैं हैहयोंकी उत्पत्तिसे सम्बन्धित अति प्राचीन, पुण्यदायिनी तथा ४ ९ पापनाशिनी कथाका विस्तारपूर्वक वर्णन कर रहा हूँ, आप इसे सुनिये ॥ ४ ९ ॥ हे महाराज! किसी समय अत्यन्त सुन्दर, ५० रूपवान् तथा अपरिमित तेजवाले सूर्यपुत्र जो ' रेवन्त ' नामसे विख्यात थे, अपने मनोहर अश्वरत्न उच्चैःश्रवापर आरूढ़ होकर भगवान् विष्णुके निवासस्थान वैकुण्ठलोक ५१ | गये ॥ ५०-५१ ॥ विष्णुके दर्शनके आकांक्षी वे भास्करनन्दन घोड़ेपर सवार होकर जब वहाँ पहुँचे तब लक्ष्मीजीकी ५२ दृष्टि अश्वपर विराजमान रेवन्तपर पड़ गयी ॥ ५२ ॥

समुद्रसे प्रादुर्भूत अपने भाई अलौकिक उच्चैःश्रवा घोड़े को देखकर वे महान् विस्मयमें पड़ गयीं और ५३ । उसके रूपको स्थिर नेत्रोंसे देखती रह गयीं ॥ ५३ ॥

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८०८ भगवानपि तं दृष्ट्वा हयारूढं मनोहरम् आगच्छन्तं रमां विष्णुः पप्रच्छ प्रणयात्प्रभुः कोऽयमायाति चार्वङ्गि हयारूढ इवापरः स्मरतेजस्तनुः कान्ते मोहयन्भुवनत्रयम् ॥ प्रेक्षमाणा तदा लक्ष्मीस्तच्चित्ता दैवयोगतः नोवाच वचनं किञ्चित्पृष्टापि च पुनः पुनः व्यास उवाच अश्वासक्तमतिं वीक्ष्य कामिनीमतिमोहिताम् पश्यन्तीं परमप्रेम्णा चञ्चलाक्षीं च चञ्चलाम् तामाह भगवान्क्रुद्धः किं पश्यसि सुलोचने मोहिता च हरिं दृष्ट्वा पृष्टा नैवाभिभाषसे सर्वत्र रमसे यस्माद्रमा तस्माद् भविष्यसि चञ्चलत्वाच्चलेत्येवं सर्वथैव न संशयः प्राकृता च यथा नारी नूनं भवति चञ्चला तथा त्वमपि कल्याणि स्थिरा नैव कदाचन त्वं हयं मत्समीपस्था समीक्ष्य यदि मोहिता वडवा भव वामोरु मर्त्यलोकेऽतिदारुणे इति शप्ता रमा देवी हरिणा दैवयोगतः रुरोद वेपमाना सा भयभीतातिदुःखिता तमुवाच रमानाथं शङ्किता चारुहासिनी प्रणम्य शिरसा देवं स्वपतिं विनयान्विता देवदेव जगन्नाथ करुणाकर केशव स्वल्पेऽपराधे गोविन्द कस्माच्छापं ददासि मे न कदाचिन्मया दृष्टः क्रोधस्ते हीदृशः प्रभो क्व गतस्ते मयि स्नेहः सहजो न तु नश्वरः श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १७ । भगवान् विष्णुने उस मनोहर रेवन्तको घोड़ेपर ॥ ५४ बैठकर आता हुआ देखकर लक्ष्मीजीसे प्रेमपूर्वक पूछा — हे सुन्दर अंगोंवाली! हे प्रिये! दूसरे कामदेवके । समान तेजोमय शरीरवाला यह कौन है जो घोड़ेपर ५५ सवार होकर तीनों लोकोंको मोहित करता हुआ इधर चला आ रहा है ॥ ५४-५५ ॥ । उस समय घोड़ेको एकटक देखते रहनेसे दैववशात् ॥ ५६ उसीमें चित्तयोग हो जानेके कारण भगवान् विष्णुके बार - बार पूछनेपर भी लक्ष्मीजीने कुछ नहीं कहा ॥ ५६ ॥

व्यासजी बोले- भगवान् विष्णु कामिनी, चपल नेत्रोंवाली तथा चंचला लक्ष्मीको अत्यन्त मोहित । होकर अत्यधिक प्रेमके साथ निहारती हुई तथा उस ॥ ५७ अश्वमें अनुरक्त बुद्धिवाली देखकर क्रोधित हो उठे । और उनसे बोले - हे सुलोचने! तुम क्या देख रही हो? इस घोड़ेको देखकर मोहित हुई तुम मेरे पूछनेपर ॥। ५८ भी उत्तर नहीं दे रही हो ॥ ५७-५८ ॥ क्योंकि तुम्हारा चित्त सभी ओर रमण करता है । अतएव ' रमा ' और तुम्हारी चंचलताके कारण तुम ॥ ५ ९ ' चला ' कही जाओगी; इसमें सन्देह नहीं है ॥५ ९ ॥ जिस प्रकार सामान्य नारी चंचल होती है, उसी । प्रकार हे कल्याणि! तुम भी कभी स्थिर स्वभाववाली ॥ ६० नहीं रहोगी ॥ ६० ॥

मेरे पास रहनेपर भी तुम यदि एक अश्वको देखकर । मोहित हो गयी हो तो हे वामोरु! तुम अत्यन्त दारुण ॥ ६१ मर्त्यलोकमें घोड़ीके रूपमें जन्म ग्रहण करो ॥ ६१ ॥

दैवयोगसे भगवान् विष्णुने जब देवी लक्ष्मीको । ऐसा शाप दे दिया तब वे अत्यन्त भयभीत तथा दुःखी ॥ ६२ होकर काँपती हुई रोने लगीं ॥६२ ॥

सुन्दर मुसकानवाली लक्ष्मीजी दुविधामें पड़ गयीं । और अपने पति भगवान् विष्णुको विनयसे युक्त होकर मस्तक ॥ ६३ । झुकाकर प्रणाम करके उनसे कहने लगीं- ॥ ६३ ॥

हे देवदेव! हे जगदीश्वर! हे करुणानिधान! हे । केशव! हे गोविन्द! एक छोटेसे अपराधके लिये ॥ ६४ आपने मुझे ऐसा शाप क्यों दे दिया? ॥ ६४ ॥

हे प्रभो! मैंने आपका ऐसा क्रोध पहले कभी । नहीं देखा । मेरे प्रति आपका वह सहज तथा शाश्वत ॥ ६५ । प्रेम कहाँ चला गया? ॥ ६५ ॥

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अ ० १८ ] षष्ठ स्कन्ध ८० ९

वज्रपातस्तु शत्रौ वै कर्तव्यो न सुहृज्जने ।

सदाहं वरयोग्या ते शापयोग्या कथं कृता ॥ ६६

प्राणांस्त्यक्ष्यामि गोविन्द पश्यतोऽद्य तवाग्रतः ।

कथं जीवे त्वया हीना विरहानलतापिता ॥ ६७

प्रसादं कुरु देवेश शापादस्मात्सुदारुणात् ।

कदा मुक्ता समीपं ते प्राप्नोमि सुखदं विभो ॥ ६८

हरिरुवाच

यदा ते भविता पुत्रः पृथिव्यां मत्समः प्रिये ।

तदा मां प्राप्य तन्वङ्गि सुखिता त्वं भविष्यसि ॥ ६ ९

आपको वज्रपात शत्रुपर करना चाहिये न कि अपने स्नेहीजनपर । आपसे सदा वर पानेयोग्य मैं आज शापके योग्य कैसे हो गयी? ॥६६ ॥

हे गोविन्द! मैं इसी समय आपके देखते - देखते आपके सामने प्राण त्याग दूँगी; क्योंकि आपसे वियुक्त होकर विरहाग्निमें जलती हुई मैं कैसे जीवित रह सकूँगी? ॥ ६७ ॥

हे देवेश! मेरे ऊपर कृपा कीजिये । हे विभो! अब मैं इस दारुण शापसे मुक्त होकर आपका सुखदायी सांनिध्य कब प्राप्त करूँगी? ॥६८ ॥

हरि बोले — हे प्रिये! हे तन्वंगि! जब पृथ्वीलोकमें तुम्हें मेरे समान एक पुत्रकी प्राप्ति हो जायगी तब । पुनः मुझे प्राप्त करके तुम सुखी हो जाओगी ॥ ६ ९ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे हैहयानामुत्पत्ति-प्रसङ्गे रमाविष्णुसंवादवर्णनं नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥१७ ॥

अथाष्टादशोऽध्यायः भगवती लक्ष्मीद्वारा घोड़ीका जनमेजय उवाच

इति शप्ता भगवता सिन्धुजा कोपयोगतः ।

कथं सा वडवा जाता रेवन्तेन च किं कृतम् ॥ १

कस्मिन्देशेऽब्धिजा देवी वडवारूपधारिणी ।

संस्थितैकाकिनी बाला परोषित्पतिका यथा ॥ २

कालं कियन्तमायुष्मन् वियुक्ता पतिना रमा ।

संस्थिता विजनेऽरण्ये किं कृतं च तया पुनः ॥ ३

समागमं कदा प्राप्ता वासुदेवस्य सिन्धुजा ।

पुत्रः कथं तया प्राप्तो नारायणवियुक्तया ॥ ४

एतद्वृत्तान्तमार्येश कथयस्व सविस्तरम् ।

श्रोतुकामोऽस्मि विप्रेन्द्र कथाख्यानमनुत्तमम् ॥ ५

सूत उवाच

इति पृष्टस्तदा व्यासः परीक्षित्तनयेन वै ।

कथयामास भो विप्राः कथामेतां सुविस्तराम् ॥ ६

रूप धारणकर तपस्या करना जनमेजय बोले – [ हे मुने! ] इस प्रकार कोप करके भगवान्‌के द्वारा शापित लक्ष्मीजीने घोड़ीके रूपमें किस प्रकार जन्म लिया और इसके बाद रेवन्तने क्या किया? ॥ १ ॥

अपने पतिके प्रवासमें रहनेके कारण उसके वियोगमें एकाकिनी समय व्यतीत करनेवाली नारीकी भाँति लक्ष्मीजीने घोड़ीका रूप धारण करके किस देशमें समय व्यतीत किया? ॥ २ ॥

हे आयुष्मन्! पतिसे वियुक्त रहते हुए लक्ष्मीजीने कितना समय बिताया और पुनः उस निर्जन वनमें रहती हुई उन्होंने क्या किया? ॥ ३ ॥

समुद्रतनया लक्ष्मीको पुनः भगवान् विष्णुका समागम कब प्राप्त हुआ तथा विष्णुसे अलग रहते हुए उन्होंने किस प्रकार पुत्र प्राप्त किया? ॥ ४ ॥

हे आर्येश! इस वृत्तान्तका वर्णन विस्तारके साथ कीजिये । हे विप्रवर! मैं इस अत्युत्तम पौराणिक आख्यानको सुनना चाहता हूँ ॥५ ॥

सूतजी बोले- हे विप्रो! परीक्षित्पुत्र जनमेजयके ऐसा पूछनेपर व्यासजी इस अति विस्तृत कथाका वर्णन करने लगे ॥६ ॥

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८१० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १८ व्यास उवाच

शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि कथां पौराणिकीं शुभाम् ।

पावनीं सुखदां कर्णे विशदाक्षरसंयुताम् ॥

रेवन्तस्तु रमां दृष्ट्वा शप्तां देवेन कामिनीम् ।

भयार्तः प्रययौ दूरात्प्रणम्य जगतां पतिम् ॥

पितुः सकाशं त्वरितो वीक्ष्य कोपं जगत्पतेः ।

निवेदयामास कथां भास्कराय स शापजाम् ॥

दुःखिता सा रमा देवी प्रणम्य जगदीश्वरम् ।

आज्ञप्ता मानुषं लोकं प्राप्ता कमललोचना ॥

सूर्यपल्या तपस्तप्तं यत्र पूर्वं सुदारुणम् ।

तत्रैव सा ययावाशु वडवारूपधारिणी ॥

कालिन्दीतमसासङ्गे सुपर्णाक्षस्य चोत्तरे ।

सर्वकामप्रदे स्थाने सुरम्यवनमण्डिते ॥

तत्र स्थिता महादेवं शङ्करं वाञ्छितप्रदम् ।

दध्यौ चैकेन मनसा शूलिनं चन्द्रशेखरम् ॥

पञ्चाननं दशभुजं गौरीदेहार्धधारिणम् ।

कर्पूरगौरदेहाभं नीलकण्ठं त्रिलोचनम् ॥

व्याघ्राजिनधरं देवं गजचर्मोत्तरीयकम् ।

कपालमालाकलितं नागयज्ञोपवीतिनम् ॥

सागरस्य सुता कृत्वा हयीरूपं मनोहरम् ।

तस्मिंस्तीर्थे रमादेवी चकार दुश्चरं तपः ॥

ध्यायमाना परं देवं वैराग्यं समुपाश्रिता ।

दिव्यं वर्षसहस्त्रं तु गतं तत्र महीपते ॥

ततस्तुष्टो महादेवो वृषारूढस्त्रिलोचनः ।

प्रत्यक्षोऽभून्महेशानः पार्वतीसहितः प्रभुः ॥

तत्रैत्य सगणः शम्भुस्तामाह हरिवल्लभाम् ।

तपस्यन्तीं महाभागामश्विनीरूपधारिणीम् ॥

किं तपस्यसि कल्याणि जगन्मातर्वदस्व मे ।

सर्वार्थदः पतिस्तेऽस्ति सर्वलोकविधायकः ॥

व्यासजी बोले – हे राजन्! सुनिये मैं अब वह शुभ, पवित्र, स्पष्ट अक्षरोंसे युक्त तथा कानोंको प्रिय ७ लगनेवाली पौराणिक कथा कहूँगा ॥७ ॥

कामिनी रमाको विष्णुद्वारा शापित की गयी देखकर रेवन्त भयके कारण जगत्पति वासुदेवको ८ दूरसे ही प्रणाम करके चले गये ॥८ ॥

जगन्नाथ विष्णुका यह क्रोध देखकर वे तत्काल अपने पिताके पास गये और उन सूर्यसे शापसे ९ सम्बन्धित कथा बतायी॥९ ॥

इसके बाद कमलके समान नेत्रोंवाली वे दुःखित लक्ष्मीजी जगदीश्वर विष्णुजीसे आज्ञा लेकर उन्हें प्रणाम १० करके मृत्युलोकमें आ गयीं । सूर्यकी पत्नीने पूर्वकालमें सुपर्णाक्षकी उत्तरदिशामें यमुना - तमसा नदीके संगमपर ११ सभी मनोरथ पूर्ण करनेवाले तथा सुन्दर वनोंसे सुशोभित जिस स्थान पर कठोर तपस्या की थी, वहीं वडवारूपधारिणी वे लक्ष्मीजी शीघ्र पहुँच गयीं ॥ १०–१२ ॥ १२ वहाँ रहकर वे लक्ष्मीजी समस्त कामनाएँ पूर्ण करनेवाले, त्रिशूलधारी, चन्द्रशेखर, पाँच मुखोंवाले, दस भुजाओंवाले, गौरीके शरीरका अर्ध भाग धारण करनेवाले, १३ कर्पूरके समान गौर शरीरवाले, नीले कण्ठसे सुशोभित, तीन नेत्रोंवाले, व्याघ्रचर्म धारण करनेवाले, हाथीके चर्मका उत्तरीय धारण करनेवाले, गलेमें नरमुण्डकी मालासे १४ मण्डित तथा सर्पका यज्ञोपवीत धारण करनेवाले महादेव शंकरका एकाग्रमनसे ध्यान करने लगीं ॥ १३–१५ ॥ सागरपुत्री लक्ष्मीजीने सुन्दर घोड़ीका रूप धारण १५ करके उस तीर्थमें अत्यन्त कठोर तपस्या की ॥ १६ ॥

हे राजन्! महादेव शंकरका ध्यान करते - करते लक्ष्मीजीके मनमें वैराग्यका प्रादुर्भाव हो गया । इस १६ प्रकार [ उनको तप करते हुए ] एक हजार दिव्य वर्ष बीत गये ॥ १७ ॥

१७ तदनन्तर प्रसन्न होकर त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकरने वृषभपर सवार होकर पार्वतीजीके साथ उन्हें साक्षात् दर्शन दिया ॥ १८ ॥

१८ भगवान् शंकरने अपने गणोंसहित वहाँ आकर तप करती हुई वडवारूपधारिणी महाभागा विष्णुप्रिया लक्ष्मीजीसे कहा -॥१ ९ ॥ १ ९ हे कल्याणि! हे जगज्जननि! आप तपस्या क्यों कर रही हैं? मुझे इसका कारण बतायें । आपके पति विष्णु तो स्वयं सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण करनेवाले तथा २० । सभी लोकोंका विधान करनेवाले हैं ॥ २० ॥

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अ ० १८ ] षष्ठ स्कन्ध

हरिं त्यक्त्वाद्य मां कस्मात्स्तौषि देवि जगत्पतिम् ।

वासुदेवं जगन्नाथं भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् ॥ २१

वेदोक्तं वचनं कार्यं नारीणां देवता पतिः ।

नान्यस्मिन्सर्वथा भावः कर्तव्यः कर्हिचित्क्वचित् ॥ २२

पतिशुश्रूषणं स्त्रीणां धर्म एव सनातनः ।

यादृशस्तादृशः सेव्यः सर्वथा शुभकाम्यया ॥ २३

नारायणस्तु सर्वेषां सेव्यो योग्यः सदैव हि ।

तं त्यक्त्वा देवदेवेशं किं मां ध्यायसि सिन्धुजे ॥ २४

लक्ष्मीरुवाच

आशुतोष महेशान शप्ताहं पतिना शिव ।

मां समुद्धर देवेश शापादस्माद्दयानिधे ॥ २५

तदोक्तं हरिणा शम्भो शापानुग्रहकारणम् ।

विज्ञप्तेन मया कामं दयायुक्तेन विष्णुना ॥ २६

यदा ते भविता पुत्रस्तदा शापस्य मोक्षणम् ।

भविष्यति च वैकुण्ठवासस्ते कमलालये ॥ २७

इत्युक्ताहं तपस्तप्तुमागतास्मि तपोवने ।

आराधितो मया देव त्वं सर्वार्थप्रदायकः ॥ २८

पतिसङ्गं विना पुत्रं देवदेव लभे कथम् ।

स तु तिष्ठति वैकुण्ठे त्यक्त्वा वामामनागसम् ॥ २ ९

वरं मे देहि देवेश यदि तुष्टोऽसि शङ्कर ।

तव तस्य द्विधा भावो नास्ति नूनं कदाचन ॥ ३०

मयैतद् गिरिजाकान्त ज्ञातं पत्युः पुरो हर ।

यस्त्वं योऽसौ पुनर्योऽसौ स त्वं नास्त्यत्र संशयः ॥ ३१

एकत्वं च मया ज्ञात्वा मया ते स्मरणं कृतम् ।

अन्यथा मम दोषस्त्वामाश्रयन्त्या भवेच्छिव ॥ ३२ ।

८११ हे देवि! भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले जगत्पति वासुदेव जगन्नाथ विष्णुको छोड़कर इस समय आप मेरी आराधना किसलिये कर रही हैं? ॥ २१ ॥

स्त्रियोंके लिये पति ही उनका देवता होता है-| इस वेदोक्त वचनका उन्हें पालन करना चाहिये । किसी दूसरेमें कभी कहीं भी भावना नहीं करनी चाहिये ॥ २२ ॥

पतिकी सेवा - - शुश्रूषा ही स्त्रियोंका सनातन धर्म है । पति चाहे जैसा भी हो, कल्याणकी इच्छा रखनेवाली स्त्रीको निरन्तर उसकी सेवा करनी चाहिये ॥ २३ ॥

भगवान् विष्णु तो सर्वदा सभी प्राणियोंकी आराधनाके योग्य हैं । अतएव हे सिन्धुजे! उन देवाधिदेवको छोड़कर आप मेरा ध्यान क्यों कर रही हैं? ॥ २४ ॥

लक्ष्मी बोलीं- हे आशुतोष! हे महेशान! हे शिव! हे देवेश! हे दयानिधान! मेरे पतिने मुझे शाप दे दिया है; अतएव इस शापसे आप मेरा उद्धार कीजिये ॥ २५ ॥

हे शम्भो! उस समय मेरे बहुत पूछनेपर दयालु भगवान् विष्णुने शापसे मुक्तिका यह उपाय भी बतला | दिया था - ' हे कमलालये! जब तुम्हें एक पुत्र उत्पन्न हो जायगा तब तुम शापसे मुक्त हो जाओगी और वैकुण्ठधाममें पुन: तुम्हारा वास होगा ' ॥ २६-२७ ॥ हे देव! श्रीविष्णुके इस प्रकार कहनेपर मैं तपस्या करनेके लिये इस तपोवनमें आ गयी और सम्पूर्ण कामनाओं की पूर्ति करनेवाले आप परमेश्वरकी आराधना करने लगी ॥ २८ ॥

हे देवदेव! मुझ निरपराध पत्नीको छोड़कर वे विष्णु तो वैकुण्ठमें विराजमान हैं; अतएव पतिके सांनिध्यके बिना मैं पुत्र कैसे प्राप्त कर सकती हूँ? ॥ २ ९ ॥ हे देवेश! हे शंकर! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे वर दीजिये । आप तथा श्रीहरिमें निश्चितरूपसे कोई भेद नहीं है ॥ ३० ॥

हे गिरिजाकान्त! हे हर! जब मैं पतिदेवके पास थी तभी से मुझे यह ज्ञात है कि जो आप हैं, वही वे हैं तथा जो वे हैं, वही आप हैं; इसमें संशय नहीं है ॥ ३१ ॥

[ आप तथा श्रीविष्णुमें ] एकत्व जानकर ही मैंने आपका स्मरण किया है, अन्यथा हे शिव! आपका आश्रय लेनेसे मुझे दोष ही लगता ॥ ३२ ॥