देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 831–840

देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 831–840

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८२२ श्रुत्वा नृपप्रार्थितमादिदेव-स्तमाह राजानममोघवाक्यम् ययातिसूनो व्रज तत्र तीर्थे कलिन्दकन्यातमसाप्रसङ्गे मयाद्य पुत्रस्तु यथेप्सितस् तत्रैव मुक्तोऽस्त्यमितप्रभावः लक्ष्म्याः प्रसूतो मम वीर्यजश्च कृतस्तवार्थेऽथ गृहाण राजन् श्रुत्वा हरेर्वाक्यमतीव मृष्टं सन्तुष्टचित्तः प्रबभूव राजा हरिस्तु दत्त्वेति वरं जगाम वैकुण्ठलोकं रमया युतश्च गते हरौ सोऽथ ययातिसूनु-यावनुद्धातरथेन राजा प्रेमान्वितस्तत्र तो यत्र वचो निशम्येति जनार्दनस्य स तत्र गत्वातिमनोहरं तं ददर्श बालं भुवि खेलमानम् मुखे निवेश्यैककरेण कृत्वा श्लक्ष्णं पदाङ्गुष्ठमनन्यसत्त्वः तं वीक्ष्य पुत्रं मदनस्वरूपं नारायणांश कमलाप्रसूतम् हरिप्रभावं हरिवर्मनामा हर्षप्रफुल्लाननपङ्कजोऽभूत् गृह्णन् सुवेगात् करपङ्कजाभ्यां बभूव प्रेमार्णवमग्नदेहः मूर्धन्युपाघ्राय मुदान्वितो sat ननन्द राजा सुतमालिलिङ्ग मुखं समीक्ष्यातिमनोहरं त-मुवाच नेत्राम्बुनिरुद्धकण्ठः दत्तोऽसि देवेन जनार्दनेन मात्रा पुत्रावमदुःखभीतेः तप्तं मया पुत्र तपस्तवार्थे श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २० राजाकी प्रार्थना सुनकर आदिदेव भगवान् । विष्णुने राजासे सार्थक वचन कहा - हे ययातिनन्दन! तुम इसी समय यमुना तथा तमसा नदीके उस ॥३४ । पावन संगम तीर्थपर चले जाओ । हे राजन्! आप जैसा पुत्र चाहते हैं, वैसा ही पुत्र मैंने वहाँ रख दिया । है । मेरे तेजसे प्रादुर्भूत वह पुत्र अमित प्रभाववाला है तथा लक्ष्मीजीने उसे उत्पन्न किया है । तुम्हारे लिये ॥ ३५ ही उसकी उत्पत्ति की गयी है, अतः तुम उसे ग्रहण करो ॥ ३४-३५ ॥ । भगवान् विष्णुकी अत्यन्त मधुर वाणी सुनकर राजाके मनमें प्रसन्नता हुई । राजाको यह वरदान देकर भगवान् विष्णु लक्ष्मीजीके साथ ॥ ३६ वैकुण्ठ चले गये ॥ ३६ ॥

भगवान् विष्णुके चले जानेपर उन जनार्दनकी । बात सुनकर आनन्दविभोर ययातिनन्दन राजा हरिवर्मा एक अप्रतिहत गति वाले रथपर आरूढ़ होकर उस ॥ ३७ स्थानपर गये, जहाँ बालक स्थित था ॥ ३७ ॥

वहाँ पहुँचनेपर परम तेजस्वी राजाने उस अति । मनोहर बालकको एक हाथसे पैरका कोमल अँगूठा मुखमें डालकर भूमिपर खेलता हुआ देखा ॥ ३८ ॥

॥ ३८ लक्ष्मीजीसे उत्पन्न भगवान् विष्णुके अंशस्वरूप तथा उन्हींके समान प्रभावशाली एवं कामदेवके सदृश । रूपवान् उस पुत्रको देखकर राजा हरिवर्माका मुखारविन्द हर्षसे खिल उठा । उस बालकको अपने करकमलोंसे ॥३ ९ बड़ी तेजीसे उठाते हुए राजा हरिवर्मा प्रेमसागरमें मग्न हो गये । प्रसन्नतापूर्वक उसका मस्तक सूँघकर उन । राजाने पुत्रका आलिंगन किया और अत्यन्त आनन्द

प्राप्त किया । ३ ९ -४० ॥

॥ ४० उस बालकका अत्यन्त मनोहर मुख देखकर प्रेमके अश्रुसे रुँधे कण्ठवाले राजाने उससे कहा – हे । पुत्र! भगवान् विष्णु तथा माता लक्ष्मीके द्वारा तुम मेरे लिये प्रदान किये गये हो । हे पुत्र! नरकभोगके ॥ ४१ । दुःखसे भयभीत होकर मैंने तुम्हारे लिये पूरे सौ वर्षोंतक अत्यन्त कठोर तपस्या की है । उसी तपसे सुदुष्करं वर्षशतं च पूर्णम् । प्रसन्न होकर रमाकान्त विष्णुने सांसारिक सुख तेनैव तुष्टेन माप्रियेण भोगनेके लिये तुम्हें पुत्ररूपमें मुझे प्रदान किया

दत्तोऽसि संसारसुखोदयाय ॥ ४२ । है ॥ ४१-४२ ॥

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अ ० २० ] षष्ठ स्कन्ध ८२३ माता रमा त्वां तनुजं मदर्थे लक्ष्मीजी तुम्हारी जननी हैं; तुझ पुत्रको मेरे लिये त्यक्त्वा गता सा हरिणा समेता । छोड़कर वे भगवान् विष्णुके साथ वैकुण्ठ चली गयी धन्या तु सा या प्रहसन्तमङ्के हैं । अब वह माता धन्य होगी, जो तुझ जैसे हँसते कृत्वा सुतं त्वां मुदितानना स्यात् ॥ ४३ हुए पुत्रको अपनी गोदमें लेकर आनन्द प्राप्त करेगी । raha संसारसमुद्रनौका-रूपः कृतः पुत्र लक्ष्मीधरेण इत्येवमुक्त्वा नृपतिः सुतं तं मुदा समादाय यौ गृहाय पुरीसमीपे नृपमागतं त-माकर्ण्य सर्वे सचिवास्तु राज्ञः । ययुः समीपं नृपतेश्च लोकाः सोपायनास्ते सपुरोहिताश्च ॥ बन्दीजना गायनकाश्च सूताः समाययुः सम्मुखमाशु राज्ञः । नृपः पुरं प्राप्य पुरः समागतं जनं समाश्वास्य वाक्यैश्च दृष्ट्या ॥ सम्पूजितः पौरजनेन राजा

विवेश पुत्रेण युतो नगर्याम् ।

मार्गेषु लाजैः कुसुमैः समन्ता-द्विकीर्यमाणो नृपतिर्जगाम ॥

गृहं समृद्धं सचिवैः समेतः सुतं समादाय मुदा कराभ्याम् । राज्यै ददौ चाथ सुतं मनोज्ञं सद्यःप्रसूतं च मनोभवाभम् ॥ राज्ञी गृहीत्वाभिनवं तनूजं पप्रच्छ राजानमनिन्दिता सा । राजन् कुतश्चैष सुतः सुजन्मा प्राप्तस्त्वया मन्मथतुल्यरूपः ॥ केनैष दत्तः कथयाशु कान्त चेतो मदीयं प्रहृतं सुतेन । नृपस्तदोवाच मुदान्वितोऽसौ प्रिये रमेशेन सुतो हि मह्यम् हे पुत्र! मेरे लिये संसारसागरको पार करनेके लिये तुम । नौकास्वरूप हो, जिसे साक्षात् लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुने उत्पन्न किया है । ऐसा कहकर राजा हरिवर्मा ॥ ४४ । प्रसन्नतापूर्वक उस पुत्रको लेकर अपने घरकी ओर चले गये ॥ ४३-४४ ॥ राजा नगरके समीप आ गये हैं- ऐसा सुनकर राजाके सभी सचिव तथा उनके प्रजावर्ग ४५ | पुरोहितोंके साथ समस्त उपहार - सामग्री लेकर उनके पास पहुँच गये ॥ ४५ ॥

सूत, बंदीजन तथा गायकगण भी राजाके सामने उनका यशोगान करते हुए शीघ्र ही आ गये । नगरमें ४६ आकर राजा हरिवर्मा अपने सम्मुख उपस्थित लोगोंको [ स्नेहभरी ] दृष्टि तथा [ मधुर ] वचनोंसे आश्वस्त करके नगरवासियोंद्वारा भलीभाँति पूजित होकर पुत्रके साथ नगरीमें प्रविष्ट हुए । नगरमें जाते समय रास्तेभर ४७ राजाके ऊपर लाजा तथा फूलोंकी वर्षा की जा रही थी ॥ ४६-४७ ॥ सचिवोंके साथ अपने समृद्धिशाली महलमें पहुँचनेपर राजाने हर्षपूर्वक कामदेवके तुल्य कान्तिमान् ४८ तथा मनोहर नवजात पुत्रको दोनों हाथोंमें लेकर रानीको दे दिया ॥ ४८ ॥

उस बालकको गोदमें लेकर पुण्यात्मा रानीने राजासे पूछा – हे राजन्! कामदेवके समान सुन्दर तथा उत्तम कुलमें उत्पन्न इस पुत्रको आपने कहाँसे प्राप्त ४ ९ किया? हे कान्त! आप शीघ्र बताइये कि किसने आपको यह बालक दिया है? इस पुत्रने अपने सौन्दर्यसे मेरे मनको वशीभूत कर लिया है । तब राजाने बड़ी प्रसन्नताके साथ कहा- हे प्रिये! हे लोलाक्षि दत्तः ॥५० चंचल नेत्रोंवाली! लक्ष्मीजीसे उत्पन्न तथा भगवान् जनार्दनांशोऽयमहीनसत्त्वः कमलासमुत्थो जनार्दनका अंशस्वरूप यह महान् शक्तिशाली पुत्र सा तं गृहीत्वा मुदमाप राज्ञी मुझे स्वयं लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुने ही दिया है । उस पुत्रको लेकर रानी परम आनन्दित हुईं और

राजा चकारोत्सवमद्भुतं च ॥५१ । राजाने अद्भुत उत्सव मनाया ॥ ४ ९ –५१ ॥

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८२४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २१ ददौ च दानं किल याचकेभ्यो गीतानि वाद्यानि बहूनि नेदुः । कृत्वोत्सवं भूपतिरात्मजस्य नामैकवीरेति चकार विश्रुतम् ॥ सुखं च सम्प्राप्य मुदान्वितोऽसौ ननन्द देवाधिपतुल्यवीर्यः । पुत्रं हरे रूपगुणानुरूपं सम्प्राप्य वंशस्य ऋणाच्च मुक्तः ॥ इति सकलसुराणामीश्वरेणार्पितं तं सकलगुणगणाढ्यं पुत्रमासाद्य राजा । विविधसुखविनोदैर्भार्यया सेव्यमानो व्यहरत निजगेहे शक्रतुल्यप्रतापः ॥ राजाने याचकोंको दान दिया । इस अवसरपर गीत गाये गये तथा अनेक वाद्य बजाये गये । सम्यक् उत्सव करके राजाने अपने पुत्रका ' एकवीर'– -यह ५२ प्रसिद्ध नाम रखा । वे सुख पाकर बहुत प्रसन्न हुए तथा आनन्दित हुए । इन्द्रके समान पराक्रमशाली राजा हरिवर्मा भगवान् विष्णुके सदृश रूपवान् तथा गुणी पुत्र पाकर वंशऋण ( पितृऋण ) - से मुक्त हो गये ॥५२-५३ ॥ ५३ इस प्रकार समस्त देवताओंके अधिपति भगवान् विष्णु द्वारा अर्पित किये गये उस सर्वगुणसम्पन्न पुत्रको प्राप्त करके इन्द्रके समान प्रतापी राजा हरिवर्मा अपनी भार्याके साथ नानाविध सुख भोगते हुए तथा ५४ । विनोद करते हुए अपने महलमें रहने लगे ॥५४ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे एकवीराख्यानवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥

O अथैकविंशोऽध्यायः आखेटके लिये वनमें यशोवतीकी भेंट, व्यास उवाच

जातकर्मादिसंस्कारांश्चकार नृपतिस्तदा ।

दिने दिने जगामाशु वृद्धिं बालः सुलालितः ॥

नृपः संसारजं प्राप्य सुखं पुत्रसमुद्भवम् ।

ऋणत्रयविमोक्षं च मेने तेन महात्मना ॥

षष्ठेऽन्नप्राशनं तस्य कृत्वा मासि यथाविधि ।

तृतीयेऽथ तथा वर्षे चूडाकरणमुत्तमम् ॥

चकार ब्राह्मणान् द्रव्यैः सम्पूज्य विविधैर्धनैः ।

गोभिश्च विविधैर्दानैर्याचकानितरानपि ॥

वर्षे चैकादशे तस्य मौञ्जीबन्धनकर्म वै ।

कारयित्वा धनुर्वेदमध्यापयत पार्थिवः ॥

अधीतवेदं पुत्रं तं राजधर्मविशारदम् ।

दृष्ट्वा तस्याभिषेकाय मतिं चक्रे जनाधिपः ॥

गये राजासे एकावलीकी सखी एकावलीके जन्मकी कथा व्यासजी बोले – हे राजन्! तत्पश्चात् राजा हरिवर्माने बालकके जातकर्म आदि संस्कार किये । भलीभाँति पालित - पोषित होनेके कारण वह बालक १ दिनोदिन शीघ्रतासे बढ़ने लगा ॥१ ॥

इस प्रकार पुत्रजनित सांसारिक सुख प्राप्त करके उन महात्मा नरेशने अपनेको अब तीनों ऋणोंसे मुक्त मान लिया ॥ २ ॥

राजा हरिवर्माने छठें महीनेमें बालकका अन्नप्राशन-संस्कार करके तीसरे वर्षमें शुभ मुण्डन - संस्कार विधि - विधानके साथ सम्पन्न किया । इनमें ब्राह्मणोंकी सम्यक् पूजा करके उन्हें विविध धन- द्रव्यों तथा ४ गौओंका दान किया गया और अन्य याचकोंको भी नानाविध दान दिये ॥ ३-४ ॥ ग्यारहवें वर्षमें उस बालकका यज्ञोपवीत - संस्कार कराकर राजाने उसको धनुर्वेद पढ़वाया ॥ ५ ॥

राजा हरिवर्माने उस पुत्रको धनुर्वेद तथा राजधर्ममें पूर्ण निष्णात हुआ देखकर उसका राज्याभिषेक करनेका ६ निश्चय किया ॥६ ॥

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अ ० २१ ]

पुष्यार्कयोगसंयुक्ते दिवसे नृपसत्तमः ।

कारयामास सम्भारानभिषेकार्थमादरात् ॥

द्विजानाहूय वेदज्ञान् सर्वशास्त्रविचक्षणान् । अभिषेकं चकारासौ विधिवत् स्वात्मजस्य ह

जलमानीय तीर्थेभ्य: सागरेभ्यश्च पार्थिवः ।

स्वयं चकार विधिवदभिषेकं शुभे दिने ॥

धनं दत्त्वाथ विप्रेभ्यो राज्यं पुत्रे निवेश्य सः ।

जगाम वनमेवाशु स्वर्गकामः स भूपतिः ॥

एकवीरं नृपं कृत्वा सम्मान्य सचिवानथ ।

भार्यया सह भूपालः प्रविवेश वनं वशी ॥

मैनाकशिखरे राजा कृत्वा तार्तीयमाश्रमम् ।

नित्यं पत्रफलाहारश्चिन्तयामास पार्वतीम् ॥

एवं स नृपतिः कृत्वा दिष्टान्ते सह भार्यया ।

मृतोऽसौ वासवं लोकं गतः पुण्येन कर्मणा ॥

इन्द्रलोकं पिता प्राप्त इति श्रुत्वाथ हैहयः ।

चकार वेदनिर्दिष्टं कर्म चैवौर्ध्वदैहिकम् ॥

कृत्वोत्तराः क्रियाः सर्वाः पितुः पार्थिवनन्दनः ।

राज्यं चकार मेधावी पित्रा दत्तं सुसम्मतम् ॥

एकवीरोऽथ धर्मज्ञः प्राप्य राज्यमनुत्तमम् ।

बुभुजे विविधान् भोगान् सचिवैश्च सुमानितः ॥

एकस्मिन् दिवसे राजा मन्त्रिपुत्रैः समन्वितः ।

जगाम जाह्नवीतीरे हयारूढः प्रतापवान् ॥

सम्पश्यन् पादपान् रम्यान् कोकिलालापसंयुतान् ।

पुष्पितान् फलसंयुक्तान् षट्पदालिविराजितान् ॥

षष्ठ स्कन्ध ८२५ तत्पश्चात् श्रेष्ठ राजाने पुष्यार्क - योगसे युक्त ७ शुभ दिनमें बड़े आदरके साथ अभिषेकहेतु सभी सामग्रियाँ एकत्र करवायीं ॥ ७ ॥

सभी शास्त्रोंमें पूर्ण पारंगत तथा वेदवेत्ता ॥ ८ ब्राह्मणोंको बुलाकर उन्होंने विधिवत् अपने पुत्रका अभिषेक सम्पन्न किया । सभी तीर्थों तथा समुद्रोंसे जल मँगाकर राजाने शुभ दिनमें पुत्रका स्वयं अभिषेक किया ॥ ८ - ९ ॥ ९ तत्पश्चात् ब्राह्मणोंको धन देकर तथा पुत्रको राज्य सौंपकर उन राजा हरिवर्माने स्वर्गप्राप्तिकी कामनासे वनके लिये शीघ्र ही प्रस्थान किया ॥ १० ॥

१० इस प्रकार एकवीरको राजा बनाकर तथा योग्य मन्त्रियोंको नियुक्तकर इन्द्रियजित् राजा हरिवर्माने अपनी भार्याके साथ वनमें प्रवेश किया ॥ ११ ॥

११ मैनाकपर्वतके शिखरपर तृतीय आश्रम ( वानप्रस्थ ) - का आश्रय लेकर वे राजा प्रतिदिन वनके पत्तों तथा फलोंका आहार करते हुए भगवती १२ पार्वतीकी आराधना करने लगे ॥१२ ॥

इस प्रकार अपनी भार्याके साथ वानप्रस्थ-आश्रमका पालन करके वे राजा प्रारब्ध कर्मके समाप्त १३ | हो जानेपर मृत्युको प्राप्त हुए और अपने पुण्यकर्मके प्रभावसे इन्द्रलोक चले गये ॥१३ ॥

पिता इन्द्रलोक चले गये – ऐसा सुनकर हैहय १४ एकवीरने वैदिक विधानके अनुसार उनका और्ध्वदैहिक संस्कार सम्पन्न किया ॥ १४ ॥

पिताकी सभी श्राद्ध आदि क्रियाएँ सम्पन्न १५ करके सबकी सहमतिसे पिताद्वारा दिये गये राज्यपर वह मेधावी राजकुमार एकवीर शासन करने लगा ॥ १५ ॥

उत्कृष्ट राज्य प्राप्त करके धर्मपरायण एकवीर १६ सभी मन्त्रियोंसे सम्मानित रहते हुए अनेकविध सुखोंका उपभोग करने लगे ॥ १६ ॥

एक दिन प्रतापी राजा एकवीर मन्त्रियोंके पुत्रोंके साथ घोड़ेपर आरूढ़ होकर गंगाके तटपर गये । वहाँ १७ उन्होंने कोकिलोंकी कूजसे गुंजित, भ्रमरोंकी पंक्तियोंसे सुशोभित तथा फलों - फूलोंसे लदे मनोहर वृक्षों; वेदपाठकी ध्वनिसे निनादित, हवनके धुएँसे आच्छादित १८ | आकाश - मण्डलवाले, मृगोंके छोटे शिशुओंसे आवृत

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८२६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २१

मुनीनामाश्रमान् दिव्यान् वेदध्वनिनिनादितान् ।

होमधूमावृताकाशान् मृगशावसमावृतान् ॥१ ९

केदाराञ्छालिसम्पक्वान् गोपिकाभिः सुरक्षितान् ।

प्रफुल्लपङ्कजारामान्निकुञ्जांश्च मनोरमान् ॥ २०

प्रेक्षमाणः प्रियालांस्तु चम्पकान् पनसद्रुमान् ।

बकुलांस्तिलकान्नीपान् मन्दारांश्च प्रफुल्लितान् ॥ २१

शालांस्तालांस्तमालांश्च जम्बूचूतकदम्बकान् ।

स गच्छञ्जाह्नवीतोये प्रफुल्लं शतपत्रकम् ॥ २२

पङ्कजं चातिगन्धाढ्यमपश्यदवनीपतिः ।

दक्षिणे जलजस्याथ पार्श्वे कमललोचनाम् ॥ २३

कनकाभां सुकेशीं च कम्बुग्रीवां कृशोदरीम् ।

बिम्बोष्ठीं सुन्दरीं किञ्चित्समुद्यत्सुपयोधराम् ॥ २४

सुनासां चारुसर्वाङ्गीमपश्यत् कन्यकां नृपः ।

रुदतीं तां सखीं त्यक्त्वा विह्वलां दुःखपीडिताम् ॥ २५

साश्रुनेत्रां क्रन्दमानां विजने कुररीमिव ।

संवीक्ष्य राजा पप्रच्छ कन्यकां शोककारणम् ॥ २६

सुनसे ब्रूहि कासि त्वं कस्य पुत्री शुभानने ।

गन्धर्वी देवकन्याथ कथं रोदिषि सुन्दरि ॥ २७

कथमेकाकिनी बाले त्यक्ता केन पिकस्वरे ।

पतिस्ते क्व गतः कान्ते पिता वा ब्रूहि साम्प्रतम् ॥ २८

किं ते दुःखमरालभ्रु कथयाद्य ममान्तिके ।

करोमि दुःखनाशं ते सर्वथैव कृशोदरि ॥ २ ९

न राज्ये मम तन्वङ्गि पीडां कोऽपि करोत्यलम् ।

न भयं चौरजं कान्ते न राक्षसभयं तथा ॥ ३०

मयि शासति भूपाले नोत्पाता दारुणा भुवि ।

भयं न व्याघ्रसिंहेभ्यो न भयं कस्यचिद्भवेत् ॥ ३१

वद वामोरु कस्मात्त्वं विलापं जाह्नवीतटे ।

करोषि त्राणहीनात्र किं ते दुःखं वदस्व मे ॥ ३२

दिव्य मुनि - आश्रमों; गोपिकाओंके द्वारा सुरक्षित तथा पके हुए शालिधान्यसे युक्त खेतों; विकसित कमलोंसे सुशोभित अनेक सरोवरों तथा मनको आकर्षित करनेवाले निकुंजोंको देखा । उन राजा एकवीरने प्रियाल, चम्पक, कटहल, बकुल, तिलक, नीप, पुष्पित मन्दार, शाल, ताल, तमाल, जामुन, आम और कदम्बके आदि वृक्षोंको देखते हुए कुछ दूर आगे जानेपर गंगाके जलमें उत्कृष्ट गन्धयुक्त एक खिला हुआ शतदल कमल देखा । राजाने उस कमलके दक्षिण भागमें कमलसदृश नेत्रोंवाली, स्वर्णके समान कान्तिवाली, सुन्दर केश-पाशवाली, शंखतुल्य गर्दनवाली, कृश कटिप्रदेशवाली, बिम्बाफलके समान ओष्ठवाली, किंचित् स्फुट पयोधरवाली, मनोहर नासिकावाली तथा समस्त सुन्दर अंगोंवाली एक सुन्दरी कन्याको देखा । अपनी सखीसे बिछुड़ जानेसे व्याकुल होकर दुःखपूर्वक विलाप करती हुई, निर्जन वनमें आँखोंमें आँसू भरकर कुररी पक्षीकी भाँति क्रन्दन करती हुई उस कन्याको देखकर राजा एकवीरने उससे शोकका कारण पूछा ॥ १७–२६ ॥ हे सुन्दर नासिकावाली! तुम कौन हो? हे सुमुखि! तुम किसकी पुत्री हो? तुम गन्धर्वकन्या हो अथवा देवकन्या? हे सुन्दरि! तुम क्यों रो रही हो? यह मुझे बताओ ॥ २७ ॥

हे बाले! तुम यहाँ अकेली क्यों हो? हे पिकस्वरे! तुम्हें यहाँ किसने छोड़ दिया है? हे प्रिये! तुम्हारे पति अथवा पिता इस समय कहाँ चले गये हैं? मुझे बताओ ॥ २८ ॥

हे वक्र भौंहोंवाली! तुम्हें क्या दुःख है? उसे मेरे सामने अभी व्यक्त करो । हे कृशोदरि! मैं सब प्रकारसे तुम्हारा दुःख दूर करूँगा ॥ २ ९ ॥ हे तन्वंगि! मेरे राज्यमें कोई भी प्राणी किसीको पीड़ा नहीं पहुँचा सकता और हे कान्ते! कहीं न तो चोरोंका भय है और न राक्षसोंका ही भय है ॥ ३० ॥

मुझ नरेशके शासन करते हुए इस पृथ्वीपर भीषण उत्पात नहीं हो सकते; बाघ अथवा सिंहसे किसीको भय नहीं हो सकता और किसीको कोई भी भय नहीं रहता ॥ ३१ ॥

हे वामोरु! असहाय होकर तुम गंगातटपर क्यों विलाप कर रही हो, तुम्हें क्या दुःख है? | मुझे बताओ ॥ ३२ ॥

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अ ० २१ ] षष्ठ स्कन्ध ८२७

हन्म्यहं दुःखमत्युग्रं प्राणिनां पृथिवीतले ।

दैवं च मानुषं कान्ते व्रतमेतन्ममाद्भुतम् ॥

विशाललोचने ब्रूहि करोमि तव चिन्तितम् ।

इत्युक्ते वचने राज्ञा श्रुत्वोवाच मृदुस्वना ॥

शृणु राजेन्द्र वक्ष्यामि मम शोकस्य कारणम् ।

विपत्तिरहितः प्राणी कथं रुदति भूपते ॥

प्रब्रवीमि महाबाहो यदर्थं रुदती त्वहम् ।

तव राज्यादन्यदेशे राजा परमधार्मिकः ॥

रैभ्यो नाम महाराजः सन्तानरहितो भृशम् ।

तस्य भार्या सुविख्याता रुक्मरेखेति नामतः ॥

सुरूपा चतुरा साध्वी सर्वलक्षणसंयुता ।

अपुत्रा दुःखिता कान्तमित्युवाच पुनः पुनः ॥

किं जीवितेन मे नाथ धिग्वृथा जीवितं मम ।

वन्ध्यायाः सुखहीनाया ह्यपुत्राया धरातले ॥

इत्येवं भार्यया भूपः प्रेरितो मखमुत्तमम् ।

चकार ब्राह्मणांस्तज्ज्ञानाहूय विधिवत्तदा ॥

पुत्रकामो धनं भूरि ददावथ यथोदितम् ।

हूयमाने घृतेऽत्यर्थं पावकादतिसुप्रभात् ॥

आविर्बभूव चार्वङ्गी कन्यका शुभलक्षणा ।

बिम्बोष्ठी सुदती सुभ्रूः पूर्णचन्द्रनिभानना ॥

कनकाभा सुकेशान्ता रक्तपाणितला मृदुः ।

सुरक्तनयना तन्वी रक्तपादतला भृशम् ॥

हुताशनात्समुद्भूता होत्रा सा स्वीकृता तदा ।

होता प्रोवाच राजानं गृहीत्वा तां सुमध्यमाम् ॥

राजन् पुत्रीं गृहाणेमां सर्वलक्षणसंयुताम् ।

एकावलीव सम्भूता हूयमानाद्भुताशनात् ॥

हे कान्ते! मैं जगत्के प्राणियोंके अत्यन्त भीषण ३३ दैविक तथा मानुषिक कष्टको भी दूर करता हूँ; यह मेरा अद्भुत व्रत है । हे विशालनयने! बताओ, मैं तुम्हारा वांछित कार्य करूँगा ॥३३३ ॥

३४ राजाके ऐसा कहनेपर उसे सुनकर मधुरभाषिणी कन्याने कहा - हे राजेन्द्र! सुनिये, मैं आपको अपने शोकका कारण बता रही हूँ । हे राजन्! ३५ विपदारहित प्राणी भला क्यों रोयेगा? हे महाबाहो! मैं जिसलिये रो रही हूँ, वह आपको बता रही हूँ । आपके राज्यसे भिन्न दूसरे देशमें रैभ्य नामक एक ३६ महान् धार्मिक राजा हैं, वे महाराज सन्तानहीन हैं, उनकी पत्नी रुक्मरेखा - इस नामसे प्रसिद्ध हैं । वे ३७ परम रूपवती, बुद्धिमती, पतिव्रता तथा समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न हैं । पुत्रहीन होनेसे दुःखित रहनेके कारण वे अपने पतिसे बार - बार कहा करती थीं-३८ हे नाथ! मेरे इस जीवनसे क्या लाभ? इस जगत् में मुझ वन्ध्या, पुत्रहीन तथा सुखरहित नारीके इस व्यर्थ जीवनको धिक्कार है ॥ ३४–३९ ॥ ३ ९ इस प्रकार अपनी भार्यासे प्रेरणा पाकर राजा रैभ्यने यज्ञके ज्ञाता ब्राह्मणोंको बुलाकर विधिवत् उत्तम यज्ञ सम्पन्न किया ॥ ४० ॥

४० पुत्राभिलाषी राजा रैभ्यने शास्त्रोक्त रीतिसे प्रचुर धन दान दिया । घृतकी आहुति अधिक पड़ते रहनेसे तीव्र प्रभायुक्त अग्निसे सुन्दर अंगोंवाली, शुभ लक्षणोंसे ४१ सम्पन्न, बिम्बाफलके समान ओष्ठवाली, सुन्दर दाँतों तथा भौंहोंवाली, पूर्ण चन्द्रमाके समान मुखवाली, स्वर्णके समान आभावाली, सुन्दर केशोंवाली, रक्त ४२ हथेलियोंवाली, कोमल, सुन्दर लाल नेत्रोंवाली, कृश शरीरवाली तथा रक्त पादतल [ तलवे ] - वाली एक ४३ कन्या प्रकट हुई ॥ ४१–४३ ॥ तब होताने अग्निसे उत्पन्न हुई उस कन्याको स्वीकार कर लिया । इसके बाद उस सुन्दर कन्याको ४४ लेकर होताने राजा रैभ्यसे कहा — हे राजन्! समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न इस पुत्रीको ग्रहण कीजिये । हवन करते समय अग्निसे उत्पन्न यह कन्या मोतियोंकी ४५ मालाके समान प्रतीत होती है । अतः हे राजन्! यह

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८२८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २१

नाम्ना चैकावली लोके ख्याता पुत्री भविष्यति ।

सुखितो भव भूपाल पुत्र्या पुत्रसमानया ॥

सन्तोषं कुरु राजेन्द्र दत्ता देवेन विष्णुना ।

होतुर्वाक्यं नृपः श्रुत्वा दृष्ट्वा तां कन्यकां शुभाम् ॥

जग्राह परमप्रीतो होत्रा दत्तां सुसम्मताम् ।

गृहीत्वा नृपतिस्तां तु ददौ पत्न्यै वराननाम् ॥

आभाष्य रुक्मरेखायै गृहाण सुभगे सुताम् ।

सा तां कमलपत्राक्षीं प्राप्य कन्यां मनोरमाम् ॥

जहर्ष मुदिता राज्ञी पुत्रं प्राप्य यथासुखम् ।

चकार मङ्गलं कर्म जातकर्मादिकं शुभम् ॥

पुत्रजन्मसमुत्थं यत्तत्सर्वं विधिवत्ततः ।

समाप्य च मखं राजा द्विजेभ्यो दक्षिणां शुभाम् ॥

दत्त्वा विसृज्य विप्रेन्द्रान् मुदं प्राप महीपतिः ।

दिने दिने सितापाङ्गी पुत्रवृद्धया भृशं बभौ ॥

मुदं च परमां प्राप नृपभार्या सुतान्विता ।

उत्सवस्तद्दिने तस्य प्रवृत्तः सुतजन्मजः ॥

पुत्री पुत्रसमात्यर्थं बभूव वल्लभा किल ।

राज्ञो मन्त्रिसुता चाहं सुबुद्धे मन्मथाकृते ॥

यशोवती च मे नाम समानं वय आवयोः ।

वयस्याहं कृता राज्ञा क्रीडनाय तया सह ॥

सदा सहचरी जाता प्रेमयुक्ता दिवानिशम् ।

एकावली गन्धवन्ति यत्र पद्मानि पश्यति ॥

तत्र सा रमते बाला नान्यत्र सुखमाप्नुयात् ।

सुदूरे जाह्नवीतीरे भवन्ति कमलान्यपि ॥

पुत्री जगत्में ' एकावली ' नामसे प्रसिद्ध होगी । पुत्रतुल्य ४६ इस कन्याको प्राप्तकर आप सुखी हो जायँ । हे राजेन्द्र! सन्तोष कीजिये; भगवान् विष्णुने आपको यह कन्या दी है ॥ ४४–४६३ ॥ होताकी बात सुनकर राजाने उस सुन्दर कन्याकी ४७ ओर देखकर होताके द्वारा प्रदत्त उस कन्याको अति प्रसन्न होकर ले लिया । राजाने सुन्दर मुखवाली उस कन्याको ले करके अपनी पत्नी रुक्मरेखाको ४८ यह कहकर दे दिया कि हे सुभगे! इस कन्याको स्वीकार करो । कमलपत्रके समान नेत्रोंवाली उस मनोहर कन्याको पाकर रानी बहुत हर्षित हुईं; वे ४ ९ ऐसी सुखी हो गयीं मानो उन्हें पुत्र प्राप्त हो गया हो ॥ ४७–४९ ३ ॥ तत्पश्चात् राजाने उसके जातकर्म आदि सभी ५० शुभ मंगल कार्य सम्पन्न किये तथा पुत्रजन्मके अवसरपर होनेवाले जो कुछ भी कार्य थे, वे सब उन्होंने विधिपूर्वक सम्पन्न कराये । यज्ञ सम्पन्न ५१ करके राजा रैभ्य ब्राह्मणोंको विपुल दक्षिणा देकर तथा सभी विप्रेन्द्रोंको विदाकर अत्यन्त आनन्दित हुए ॥ ५०-५१३ ॥ ५२ श्याम नेत्रोंवाली वह कन्या पुत्रवृद्धिके समान दिनोंदिन बढ़ने लगी । उसे देखकर उस समय रानी अपनेको पुत्रवती समझकर परम आनन्दित हुईं । उस दिन महलमें ऐसा उत्सव मनाया गया, जैसा पुत्रजन्मके ५३ अवसरपर मनाया जाता है । वह पुत्री उन दोनोंके लिये पुत्रके ही सदृश प्रिय हो गयी ॥ ५२-५३३ ॥ ५४ हे सुबुद्धे! हे कामदेवसदृश रूपवाले! मैं उन्हीं राजा रैभ्यके मन्त्रीकी पुत्री हूँ । मेरा नाम यशोवती है । मेरी तथा एकावलीकी अवस्था समान है । उसके साथ खेलनेके लिये राजाने मुझे उसकी सखी बना दिया । ५५ इस प्रकार मैं उसकी सहचरी बनकर प्रेमपूर्वक दिन-रात उसके साथ रहने लगी ॥ ५४-५५ ३ ॥ एकावली जहाँ भी सुगन्धित कमल देखती थी, ५६ वह बाला वहीं खेलने लग जाती थी; अन्यत्र कहीं भी उसे सुख नहीं मिलता था । [ एक बार ] गंगाके तटपर बहुत दूर कमल खिले हुए थे । राजकुमारी ५७ | एकावली सखियोंसहित मेरे साथ घूमती हुई वहाँ

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अ ० २२ ]

रममाणा तत्र याता मत्समेता सखीयुता ।

मया निवेदितं राजन् पुत्री ते कमलाकरान् ॥

प्रेक्षमाणातिदूरे सा प्रयाति निर्जने वने ।

निषेधिताथ पित्रासौ गृहे कृत्वा जलाशयान् ॥

कमलान् वापयित्वाथ पुष्पितान् भ्रमरावृतान् ।

तथापि निर्ययौ बाला कमलासक्तचेतना ॥

तदा राज्ञा रक्षपालाः प्रेरिताः शस्त्रपाणयः ।

एवं रक्षायुता तन्वी मत्समेता सखीयुता ।

क्रीडार्थं जाह्नवीतोये नित्यमायाति याति च ॥

षष्ठ स्कन्ध ८२ ९ चली गयी । [ इससे चिन्तित होकर ] मैंने महाराज ५८ रैभ्यसे कहा - हे राजन्! आपकी पुत्री एकावली कमलोंको देखती हुई बहुत दूर निर्जन वनमें चली जाती है । तब उसके पिताने घरपर ही अनेक ५ ९ जलाशयोंका निर्माण कराकर उनमें पुष्पित तथा भौंरोंसे आवृत कमल लगवाकर उसे दूर जानेसे मना कर दिया । इसपर भी मनमें कमलोंके प्रति आसक्ति रखनेवाली ६० वह कन्या बाहर निकल जाती थी । तब राजाने उसके साथ हाथोंमें शस्त्र धारण किये हुए रक्षक नियुक्त कर दिये । इस प्रकार रक्षित होकर वह सुन्दरी मेरे तथा

सखियोंसहित क्रीडाके लिये गंगातटपर प्रतिदिन आया-६१ । जाया करती थी ॥ ५६–६१ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे राजपुत्र्या एकावल्या वर्णनं नामैकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥

अथ द्वाविंशोऽध्यायः यशोवतीका एकवीरसे कालकेतुद्वारा एकावलीके अपहृत होनेकी बात बताना यशोवत्युवाच प्रातरुत्थाय तन्वङ्गी चलिता च सखीयुता चामरैर्वीज्यमाना सा रक्षिता बहुरक्षिभिः सायुधैश्चातिसन्नद्धैः सहिता वरवर्णिनी क्रीडार्थमत्र राजेन्द्र सम्प्राप्ता नलिनीं शुभाम् अहमप्यनया सार्धं गङ्गातीरे समागता अप्सरोभिः समेता च कमलैः क्रीडमानया एकावली तथा चाहं जाते क्रीडापरे यदा सहसैव तदायातो दानवो बलसंयुतः कालकेतुरिति ख्यातो राक्षसैर्बहुभिर्युतः परिघासिगदाचापबाणतोमरपाणिभिः दृष्टा चैकावली तेन रूपयौवनशालिनी द्वितीया कामपत्नीव क्रीडमाना सुपङ्कजैः मयोक्तैकावली राजन् कोऽयं दैत्यः समागतः गच्छावो रक्षपालानां मध्ये पङ्कजलोचने यशोवती बोली- एक बार वह सुन्दरी एकावली । प्रात: काल उठकर अपनी सखियोंके साथ बाहर ॥ १ निकल पड़ी । वह बहुत - से रक्षकोंसे रक्षित थी तथा उसके ऊपर चँवर डुलाये जा रहे थे । हे राजेन्द्र! वह । सुन्दरी यहाँ सुन्दर कमलोंके पास क्रीड़ा करनेके लिये ॥ २ आयी थी ॥ १-२ ॥ । साथ ॥ थी ॥ । गयीं, ॥ ४ बाण । साथ कमलोंसे खेलनेकी रुचिवाली इस कन्या के मैं भी अप्सराओंसहित गंगाके तटपर आयी ३ ॥ जब मैं तथा एकावली दोनों खेलनेमें व्यस्त हो उसी समय हाथोंमें परिघ, तलवार, गदा, धनुष, तथा तोमर धारण किये हुए बहुत - से राक्षसोंके कालकेतु नामक बलवान् दानव वहाँ अकस्मात् 11 आ पहुँचा ॥४-५ ॥ उसने कमलोंके साथ क्रीडा करती हुई उस । रूप - यौवनसम्पन्न तथा दूसरी कामपत्नी रतिकी भाँति ॥ ६ प्रतीत हो रही एकावलीको देख लिया ॥६ ॥

हे राजन्! मैंने एकावलीसे कहा- हे कमलनयने! । यह कौन - सा दैत्य आ गया है! अब हम दोनों ॥ ७ । रक्षकोंके पास भाग चलें ॥ ७ ॥

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८३० विमृश्यैवं सखी चाहं त्वरयैव गते भयात् मध्ये वै सैनिकानां तु सायुधानां नृपात्मज कालकेतुस्तु तां दृष्ट्वा मोहिनीं मदनातुरः गदां गुर्वीं गृहीत्वा तु धावमानः समागतः रक्षकान्दूरतः कृत्वा जग्राहाम्बुजलोचनाम् त्रस्तां वेपथुसंयुक्तां क्रन्दमानां कृशोदरीम् त्यजैनां मां गृहाणेति मया चोक्तोऽपि दानवः न मां जग्राह कामार्तस्तां गृहीत्वा विनिःसृतः तिष्ठ तिष्ठेति भाषन्तो रक्षकास्तं महाबलम् श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २२ । हे राजकुमार! इस प्रकार विचारविमर्श करके ॥ ८ सखी एकावली तथा मैं भयभीत होनेके कारण शस्त्रधारी सैनिकोंके बीच तुरंत चली गयी ॥ ८ ॥

। वह कामातुर कालकेतु उस मोहिनी एकावलीको देखकर अपनी विशाल गदा लेकर दौड़ता हुआ ॥ ९ पासमें आ गया और उसने रक्षकोंको हटाकर डरके । मारे काँपती तथा रोती हुई कृश कटिप्रदेशवाली तथा कमलके समान नेत्रोंवाली एकावलीको पकड़ ॥ १० लिया॥९ -१० ॥ ' इस राजकुमारीको छोड़ दो और मुझे ग्रहण । कर लो ' – ऐसा मेरे कहनेपर भी उसने मुझे स्वीकार ॥ ११ नहीं किया और कामके वशीभूत वह दानव एकावलीको लेकर वहाँसे निकल गया ॥११ ॥

। रक्षकोंने ' ठहरो - ठहरो ' - ऐसा कहते हुए उस प्रतिषिध्य तु संग्रामं चक्रुर्विस्मयकारकम् ॥ १२ महाबलीको रोककर उसके साथ विस्मयकारक तस्यापि राक्षसाः क्रूराः सर्वतः शस्त्रपाणयः युयुधू रक्षकैः सार्धं स्वामिकार्ये कृतोद्यमाः संग्रामस्तु तदा जात: कालकेतोस्तथा रणे निहत्य रक्षकान्सर्वान्गृहीत्वैनां महाबलः युक्तो राक्षससैन्येन निर्जगाम पुरं प्रति वीक्ष्य तां रुदतीं बालां गृहीतां दानवेन तु पृष्ठतोऽहं गता तत्र यत्र नीता सखी मम विक्रोशन्ती यथा सा मां पश्येदिति पदानुगा सापि मामागतां वीक्ष्य किञ्चित्स्वस्थाभवत्तदा गताहं तत्समीपे तु तामाभाष्य पुनः पुनः सा मां प्राप्यातिदुःखार्ता स्तम्भस्वेदसमाकुला कण्ठे गृहीत्वा मां भूप रुरोद भृशदुःखिता स मामाह कालकेतुः प्रीतिपूर्वमिदं वचः समाश्वासय भीतां त्वं सखीं चञ्चललोचनाम् युद्ध किया ॥ १२ ॥

। अपने स्वामीके कार्यमें पूर्ण तत्पर तथा हाथोंमें ॥ १३ शस्त्र धारण किये उसके सभी क्रूर राक्षसोंने भी रक्षकोंके साथ भीषण युद्ध किया । तब उन रक्षकोंके । साथ कालकेतुका संग्राम होने लगा । वह महाबली ॥ १४ युद्धमें सभी रक्षकोंको मारकर तथा एकावलीको लेकर राक्षसी सेनाके साथ अपने नगरके लिये चल । दिया । दानव कालकेतुके द्वारा अधिकारमें की गयी ॥ १५ उस राजकुमारीको रोती हुई देखकर मैं उसके पीछे-पीछे वहीं पहुँच जाती थी, जहाँ कालकेतु मेरी । सखीको लेकर जाता था जिससे कि रोती हुई वह मुझे अपने पीछे आते हुए देख ले ॥१३–१६ ॥ ॥ १६ मुझे आयी हुई देखकर वह भी कुछ स्वस्थचित्त । हुई तब मैं उसके पास जाकर उससे बार - बार बातें करने लगी ॥ १७ ॥

॥ १७ हे राजन्! दुःखसे व्याकुल तथा पसीनेसे संसिक्त उस एकावलीने मुझे पकड़कर गलेसे लगा लिया और

वह अत्यन्त दुःखित होकर रोने लगी ॥ १८ ॥

॥ १८ तत्पश्चात् उस कालकेतुने प्रेम प्रदर्शित करते हुए मुझसे यह बात कही कि चंचल नेत्रोंवाली अपनी इस । भयग्रस्त सखीको धीरज बँधाओ और अपनी इस सखीसे ॥ १ ९ । [ मेरी बात ] कहो — ' हे प्रिये! देवलोकके समान अत्यन्त

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अ ० २२ ] षष्ठ स्कन्ध ८३१

प्राप्तं ममाद्य नगरं देवलोकसमं प्रिये ।

दासोऽस्मि तव रत्या हि कस्मात्क्रन्दसि कातरा ॥

कथयैनां सखीं तेऽद्य स्वस्था भव सुलोचने ।

इत्युक्त्वा मां सखीपार्श्वे समारोप्य रथोत्तमे ॥

जगाम तरसा दुष्टः पुरे स्वस्य मनोहरे ।

सैन्येन महता युक्तः प्रफुल्लवदनाम्बुजः ॥

एकावलीं तथा मां च संस्थाप्य धवले गृहे ।

राक्षसान् गृहरक्षार्थं कल्पयामास कोटिशः ॥

द्वितीये दिवसे सोऽथ मामुवाच रहो नृप ।

प्रबोधय सखीं बालां शोचन्तीं विरहातुराम् ॥

पत्नी मे भव सुश्रोणि सुखं भुङ्क्ष्व यथेप्सितम् ।

राज्यं त्वदीयं चन्द्रास्ये सेवकोऽहं सदा तव ॥

पुनरुक्तं मया वाक्यं श्रुत्वा तद्भाषितं खरम् ।

नाहं क्षमाप्रियं वक्तुं त्वमेनां कथय प्रभो ॥

इत्युक्ते वचने दुष्टो मदनक्षतमानसः ।

उवाच विनयादेनां सखीं क्षामोदरीं प्रियाम् ॥

कृशोदरि त्वया मन्त्रो निक्षिप्तोऽस्ति ममोपरि ।

तेन मे हृदयं कान्ते हृतं ते वशतां गतम् ॥

तेनाहं तव दासोऽद्य कृतोऽस्मीति विनिश्चयः ।

भज मां कामबाणेन पीडितं विवशं भृशम् ॥

यौवनं याति रम्भोरु चञ्चलं दुर्लभं तदा ।

सफलं कुरु कल्याणि पतिं मां परिरभ्य च ॥

एकावल्युवाच

पित्राहं कल्पिता पूर्वं दातुं राजसुताय वै ।

हैहयस्तु महाभाग स मया मनसा वृतः ॥

सुन्दर मेरा नगर अब आ ही गया है । तुम्हारे प्रेमके २० कारण मैं तुम्हारा दास हो चुका हूँ । तुम भयभीत होकर क्यों विलाप कर रही हो? हे सुलोचने! अब शान्त हो जाओ ' - ऐसा कहकर उसी उत्तम रथमें सखीके पास २१ मुझे भी बैठाकर प्रसन्नताके कारण खिले हुए कमलके समान मुखवाला दुष्ट कालकेतु अपनी भारी सेनाके साथ अपने सुन्दर नगरके लिये शीघ्र ही चल २२ | दिया ॥ १ ९ -२२ ॥ वहाँ उस दानवने मुझे तथा एकावलीको एक दिव्य महलमें ठहराकर उस महलकी रक्षाके लिये २३ करोड़ों राक्षस नियुक्त कर दिये ॥ २३ ॥

हे राजन्! दूसरे दिन उस कालकेतुने एकान्तमें मुझसे कहा — विरहसे दुःखित तथा शोक करती हुई २४ अपनी सुन्दर सखीको [ मेरे शब्दोंमें ] समझाओ – ‘ हे सुश्रोणि! तुम मेरी पत्नी हो जाओ और फिर यथेच्छ सुखोपभोग करो । हे चन्द्रमुखि! अब यह राज्य २५ तुम्हारा है और मैं सदाके लिये तुम्हारा सेवक बन गया हूँ ' ॥ २४-२५ ॥ उसका ऐसा दुर्वचन सुनकर मैंने उससे यह बात २६ कही कि हे प्रभो! मैं ऐसा अप्रिय वाक्य नहीं कह सकती, अतः आप ही इससे कहिये ॥ २६ ॥

मेरे ऐसा कहने पर कामसे आहत चित्तवाले उस २७ दुष्ट दानवने कृश उदरवाली मेरी उस प्रिय सखी विनयपूर्वक कहा- ॥ २७ ॥

हे कृशोदरि! तुमने मेरे ऊपर कोई मन्त्र - प्रयोग २८ कर दिया है । हे कान्ते! उसीसे मोहित होकर मेरा मन तुम्हारे वशमें हो चुका है । उसी मन्त्रने मुझे अब तुम्हारा दास बना दिया है, इसमें कोई सन्देह नहीं है । २ ९ इसलिये कामबाणसे आहत मुझ अत्यन्त विवशको अब तुम स्वीकार कर लो । हे रम्भोरु! तुम्हारा दुर्लभ तथा चंचल यौवन व्यर्थ जा रहा है । इसलिये हे ३० कल्याणि! पतिभावसे मेरा आलिंगन करके इसे सफल कर लो ॥ २८- –३० ॥ एकावली बोली- मेरे पिता राजकुमार हैहयको मुझे देनेका पहले ही निश्चय कर चुके हैं । मैंने भी ३१ उन महाभागका मनसे वरण कर लिया है ॥ ३१ ॥