देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 101–110
देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 101–110
पृष्ठ 101
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
९ २ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १६ देशमध्ये च यः कश्चित्पापकर्म समाचरेत् ॥ ४८
षष्ठांशस्तस्य पापस्य राजा भुङ्क्ते न संशयः ।
निषेधनीयो राज्ञासौ पापं कर्तुं समुद्यतः ॥ ४ ९
न निषिद्धस्त्वया कस्मात्पुत्रं विक्रेतुमुद्यतः ।
सूर्यवंशे समुत्पन्नस्त्रिशङ्कुतनयः शुभः ॥ ५०
आर्यस्त्वनार्यवत्कर्म कर्तुमिच्छसि पार्थिव ।
मोचनान्मुनिपुत्रस्य करणाद्वचनस्य मे ॥ ५१
तव देहे सुखं राजन् भविष्यत्यविचारणात् ।
पिता ते शापयोगेन चाण्डालत्वमुपागतः ॥ ५२
मयासौ तेन देहेन स्वर्लोकं प्रापितः किल ।
तेनैव प्रीतियोगेन कुरु मे वचनं नृप ॥ ५३
मुञ्चैनं बालकं दीनं रुदन्तं भृशमातुरम् ।
याचितोऽसि मया नूनं यज्ञेऽस्मिन् राजसूयके ॥ ५४
प्रार्थनाभङ्गजं दोषं कथं त्वं नावबुध्यसे ।
प्रार्थितं सर्वदा देयं मखेऽस्मिन्नृपसत्तम ॥ ५५
अन्यथा पापमेव स्यात्तव राजन्न संशयः । व्यास उवाच इति तस्य वचः श्रुत्वा कौशिकस्य नृपोत्तमः ॥ ५६
प्रत्युवाच महाराज कौशिकं मुनिसत्तमम् ।
जलोदरेण गाधेय दुःखितोऽहं भृशं मुने ॥ ५७
तस्मान्न मोचयाम्येनमन्यत्प्रार्थय कौशिक ।
न त्वया विग्रहः कार्यः कार्येऽस्मिन्मम सर्वथा ॥ ५८
तच्छ्रुत्वा वचनं राज्ञो विश्वामित्रोऽतिकोपनः ।
बभूव दुःखसन्तप्तो वीक्ष्य दीनं द्विजात्मजम् ॥ ५ ९
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां [ हे राजन्! ] राज्यमें जो कोई भी व्यक्ति पापकर्म करता है तो उसके पापका छठाँ अंश राजाको भोगना पड़ता है; इसमें कोई सन्देह नहीं है । अतः राजाको चाहिये कि पापकर्म करनेके लिये मना करे, तो फिर आपने पुत्रको उस अजीगर्तको क्यों नहीं रोका? हे राजन्! आप सूर्यवंशमें महाराज त्रिशंकुके कल्याणकारी होकर भी अनार्यों - जैसा कर्म करना हे राजन्! मेरी बात मानकर बन्धनमुक्त कर देनेसे आपका देह हो जायगा ॥ ५१३ ॥
उद्यत उस व्यक्तिको बेचनेके लिये तत्पर ॥ ४८-४ -४ ९ ३ ॥ उत्पन्न हुए हैं और पुत्र हैं । आप आर्य चाहते हैं? ॥ ५०३ ॥
मुनिपुत्र शुनःशेपको अवश्य ही रोगमुक्त महर्षि वसिष्ठके शापके कारण आपके पिता चाण्डाल हो गये थे, तब मैंने उसी देहसे उन्हें स्वर्गलोक पहुँचा दिया था । हे राजन्! उसी उपकारको समझकर आप मेरी बात मान लीजिये और अत्यधिक विलाप करते हुए इस दीन तथा भयाकुल बालकको मुक्त कर दीजिये ॥ ५२-५३३ ॥ हे राजन्! आपके इस राजसूययज्ञमें मैं आपसे मात्र इसकी प्राण - रक्षाकी याचना कर रहा हूँ । क्या आप प्रार्थनाभंगसे होनेवाले दोषके विषयमें नहीं जानते? हे नृपश्रेष्ठ! इस राजसूययज्ञमें प्रार्थीको उसकी कामनाके अनुकूल वस्तु दी जानी चाहिये । यदि आप ऐसा नहीं करेंगे तो आपको पाप ही लगेगा; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ५४-५५३ ॥ व्यासजी बोले - [ हे राजा जनमेजय! ] विश्वामित्रकी यह बात सुनकर राजाओंमें श्रेष्ठ हरिश्चन्द्रने मुनिवर विश्वामित्रसे कहा- गाधिपुत्र! मुने! मैं जलोदर रोगसे बहुत पीड़ित हूँ, इसलिये इस बालकको नहीं छोड़ सकता । हे कौशिक! इसके अतिरिक्त आप दूसरी वस्तु माँग लीजिये और मेरे इस कार्यमें किसी तरह की बाधा मत उत्पन्न कीजिये ॥ ५६–५८ ॥ राजा हरिश्चन्द्रकी यह बात सुनकर तथा दुःखित ब्राह्मण - पुत्र शुनःशेपको देखकर मुनि विश्वामित्र । अत्यधिक कुपित हो उठे ॥५ ९ ॥ संहितायां सप्तमस्कन्धे यज्ञपशुभूतस्य ब्राह्मणपुत्रस्य वधकरणाय विश्वामित्रनिषेधवर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
पृष्ठ 102
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० १७ ] सप्तम स्कन्ध ९ ३ अथ सप्तदशोऽध्यायः विश्वामित्रका शुनःशेपको वरुणमन्त्र देना और उसके जपसे वरुणका प्रकट होकर उसे बन्धनमुक्त तथा राजाको रोगमुक्त करना, राजा हरिश्चन्द्रकी प्रशंसासे विश्वामित्रका व्यास उवाच
रुदन्तं बालकं वीक्ष्य विश्वामित्रो दयातुरः ।
शुनःशेपमुवाचेदं गत्वा पार्श्वेऽतिदुःखितम् ॥ १
मन्त्रं प्रचेतसः पुत्र मयोक्तं मनसा स्मरन् ।
जपतस्तव कल्याणं भविष्यति ममाज्ञया ॥ २
विश्वामित्रवचः श्रुत्वा शुनःशेपः शुचाकुलः ।
मन्त्रं जजाप मनसा कौशिकोक्तं स्फुटाक्षरम् ॥ ३
जपतस्तत्र तस्याशु प्रचेतास्तु कृपाकरः ।
प्रादुर्बभूव सहसा प्रसन्नो नृप बालके ॥ ४
दृष्ट्वा तमागतं सर्वे विस्मयं परमं गताः ।
तुष्टुवुर्वरुणं देवं मुदिता दर्शनेन ते ॥ ५
राजातिविस्मितः पादौ प्रणनाम रुजातुरः ।
बद्धाञ्जलिपुटो देवं तुष्टाव पुरतः स्थितम् ॥ ६
हरिश्चन्द्र उवाच
देवदेव कृपासिन्धो पापात्माहं सुमन्दधीः ।
कृतापराधः कृपणः पावितः परमेष्ठिना ॥ ७
मया ते पुत्रकामेन दुःखसंस्थेन हेलनम् ।
कृतं क्षमाप्यं प्रभुणा कोऽपराधः सुदुर्मतेः ॥ ८
वसिष्ठपर क्रोधित होना व्यासजी बोले – राजन्! अत्यन्त दुःखित तथा करुण - क्रन्दन करते हुए बालक शुनःशेपको देखकर महर्षि विश्वामित्रको बड़ी दया आयी और वे उसके पास जाकर यह बोले - ' हे पुत्र! मैं तुम्हें वरुणदेवका मन्त्र बतला रहा हूँ । तुम मनमें उनका स्मरण करते हुए इस मन्त्रका जप करो । मेरी आज्ञासे इसका जप करनेसे तुम्हारा कल्याण अवश्य होगा ॥ १-२ ॥ दुःखसे अत्यन्त व्यग्र शुनःशेप मुनि विश्वा-मित्रकी बात सुनकर उनके द्वारा बताये गये स्पष्ट अक्षरोंवाले उस मन्त्रका मन - ही - मन जप करने लगा ॥ ३ ॥
हे राजन्! शुनःशेपके जप करते ही कृपानिधान वरुणदेव उस बालकपर प्रसन्न होकर शीघ्र ही प्रकट हो गये ॥४ ॥
इस प्रकार वहाँ प्रकट हुए वरुणदेवको देखकर सभी लोग अत्यन्त आश्चर्यमें पड़ गये । उनके दर्शनसे आनन्दित होकर वे सब उनकी स्तुति करने लगे ॥५ ॥
जलोदर रोगसे पीड़ित राजा हरिश्चन्द्र अतीव विस्मित होकर उनके चरणोंमें प्रणाम करने लगे और दोनों हाथ जोड़कर वे अपने सम्मुख स्थित वरुणदेवकी स्तुति करने लगे ॥६ ॥
हरिश्चन्द्र बोले - – हे देवदेव! हे कृपासागर! आप परमेश्वरने यहाँ आकर मुझ पापात्मा, अत्यन्त मन्दबुद्धि, अपराधी तथा भाग्यहीनको आज पवित्र कर दिया है ॥ ७ ॥
मैं पुत्रके अभावमें दुःखित था और आपकी कृपासे पुत्र होनेपर आपकी अवहेलना की । अतः आप प्रभु मेरे द्वारा किये गये अपराधको क्षमा कर दें; क्योंकि भ्रष्ट बुद्धिवालेका दोष ही क्या? ॥ ८ ॥
पृष्ठ 103
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
९ ४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १७
अर्थी दोषं न जानाति तस्मात्पुत्रार्थिना मया ।
वञ्चितस्त्वं देवदेव भीतेन नरकाद्विभो ॥
अपुत्रस्य गतिर्नास्ति स्वर्गो नैव च नैव च ।
भीतोऽहं तेन वाक्येन तस्मात्ते हेलनं कृतम् ॥
नाज्ञस्य दूषणं चिन्त्यं नूनं ज्ञानवता विभो ।
दुःखितोऽहं रुजाक्रान्तो वञ्चितः स्वसुतेन ह ॥
न जानेऽहं महाराज पुत्रो मे क्व गतः प्रभो ।
वञ्चयित्वा वने भीतो मरणान्मां कृपानिधे ॥
प्रययौ द्रविणं दत्त्वा गृहीतो द्विजबालकः ।
यज्ञोऽयं क्रीतपुत्रेण प्रारब्धस्तव तुष्टये ॥
दर्शनं तव सम्प्राप्य गतं दुःखं ममाद्भुतम् ।
जलोदरकृतं सर्वं प्रसन्ने त्वयि साम्प्रतम् ॥
व्यास उवाच
इति तस्य वचः श्रुत्वा राज्ञो रोगातुरस्य च ।
दयावान्देवदेवेशः प्रत्युवाच नृपोत्तमम् ॥
वरुण उवाच
मुञ्च राजञ्छुनःशेपं स्तुवन्तं मां भृशातुरम् ।
यज्ञोऽयं परिपूर्णस्ते रोगमुक्तो भवात्मना ॥
इत्युक्त्वा वरुणस्तूर्णं राजानं विरुजं तथा ।
चकार पश्यतां तत्र सदस्यानां सुसंस्थितम् ॥
विमुक्तोऽसौ द्विजः पाशाद्वरुणेन महात्मना ।
जयशब्दस्ततस्तत्र सञ्जातो मखमण्डपे ॥
राजा प्रमुदितः सद्यो रोगान्मुक्तः सुदारुणात् ।
यूपान्मुक्तः शुनःशेपो बभूवातीव संस्थितः ॥
हे देवदेव! स्वार्थपरायण व्यक्तिको अपने दोषका ९ ज्ञान नहीं रहता । इसीलिये पुत्र पानेका स्वार्थी मैं अपना दोष नहीं देख सका और हे विभो! नरकमें पड़नेके भयसे आपको धोखा देता रहा । पुत्रहीन व्यक्तिकी गति नहीं होती और उसे स्वर्ग नहीं १० मिलता - इस शास्त्रवचनसे मैं डर गया था, इसीलिये मैंने आपकी अवहेलना की ॥ ९ -१० ॥ हे विभो! आप ज्ञानसम्पन्न हैं, अतः मुझ ११ अज्ञानीके अपराधपर ध्यान न दें । इस समय मैं बहुत दुःखित तथा भयंकर रोगसे ग्रस्त हूँ और अपने पुत्रसे वंचित हो गया हूँ ॥११ ॥
१२ हे महाराज! हे प्रभो! मुझे ज्ञात नहीं कि मेरा पुत्र कहाँ चला गया है । हे कृपानिधे! ऐसा प्रतीत होता है कि मारे जानेके डरसे वह मुझे धोखा देकर १३ वनमें चला गया है । तब मैंने धन देकर इस ब्राह्मण-बालकको खरीदा और फिर आपको सन्तुष्ट करने के लिये इस क्रीतपुत्रसे यह यज्ञ आरम्भ कर दिया । अब आपका दर्शन प्राप्त हो जानेसे मेरा महान् दुःख दूर १४ हो गया और आपके प्रसन्न हो जानेपर [ भयंकर ] जलोदर रोगसे होनेवाला सारा कष्ट भी समाप्त हो जायगा ॥ १२ - १४ ॥ व्यासजी बोले - रोगग्रस्त राजा हरिश्चन्द्रकी १५ यह बात सुनकर देवदेवेश्वर दयालु वरुण नृपश्रेष्ठ हरिश्चन्द्रसे कहने लगे — ॥ १५ ॥
वरुण बोले- हे राजन्! अत्यन्त दुःखी होकर मेरी स्तुति करते हुए इस शुनःशेपको आप मुक्त कर १६ दें । अब आपका यह यज्ञ भलीभाँति पूरा हो जायगा और आप रोगसे भी मुक्त हो जायँगे ॥१६ ॥
यह कहकर वरुणदेवने वहाँ यज्ञमण्डपमें स्थित राजा हरिश्चन्द्रको सभी सभासदोंके समक्ष ही रोगरहित १७ कर दिया ॥ १७ ॥
महात्मा वरुणदेवके द्वारा उस ब्राह्मणपुत्रके बन्धनमुक्त करा देनेपर वहाँ यज्ञमण्डपमें जय - जयकारकी १८ ध्वनि होने लगी ॥ १८ ॥
अत्यन्त भीषण रोगसे तत्काल मुक्त हो जानेपर राजा हरिश्चन्द्र बहुत प्रसन्न हुए और शुनःशेप भी यज्ञस्तम्भसे १ ९ । मुक्त होकर अत्यन्त स्वस्थचित्त हो गया ॥ १ ९ ॥
पृष्ठ 104
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० १७ ]
राजा त्विमं मखं पूर्णं चकार विनयान्वितः ।
शुनःशेपस्तदा सभ्यानित्युवाच कृताञ्जलिः ॥
भो भोः सभ्याः सुधर्मज्ञाः ब्रुवन्तु धर्मनिर्णयम् ।
वेदशास्त्रानुसारेण यथार्थवादिनः किल ॥
पुत्रोऽहं कस्य सर्वज्ञाः पिता मे कोऽग्रतः परम् ।
भवतां वचनात्तस्य शरणं प्रव्रजाम्यहम् ॥
इत्युक्ते वचने तत्र सभ्याः प्रोचुः परस्परम् । सभ्या ऊचुः अजीगर्तस्य पुत्रोऽयं कस्यान्यस्य भवेदसौ ॥
अङ्गादङ्गात्समुद्भूतः पालितस्तेन भक्तितः ।
अन्यस्य कस्य पुत्रोऽसौ प्रभवेदिति निश्चयः ॥
तच्छ्रुत्वा वामदेवस्तु तानुवाच सभासदः ।
विक्रीतस्तेन तातेन द्रव्यलोभात्सुतः किल ॥
पुत्रोऽयं धनदातुश्च राज्ञस्तत्र न संशयः ।
अथवा वरुणस्यैष पाशान्मुक्तोऽस्त्यनेन वै ॥
अन्नदाता भयत्राता तथा विद्याप्रदश्च यः ।
तथा वित्तप्रदश्चैव पञ्चैते पितरः स्मृताः ॥
तदा केचित्पितुः प्राहुः केचिद्राज्ञस्तथापरे ।
वरुणस्येति संवादे निर्णयं न ययुश्च ते ॥
इत्थं सन्देहमापन्ने वसिष्ठो वाक्यमब्रवीत् ।
सभ्यान्विवदतस्तत्र सर्वज्ञः सर्वपूजितः ॥
शृणुध्वं भो महाभागा निर्णयं श्रुतिसम्मतम् ।
निःस्नेहेन यदा पित्रा विक्रीतोऽयं सुतः शिशुः ॥
सम्बन्धस्तु गतस्तस्य तदैव धनसंग्रहात् ।
हरिश्चन्द्रस्य सञ्जातः पुत्रोऽसौ क्रीत एव च ॥
सप्तम स्कन्ध ९ ५ तत्पश्चात् राजा हरिश्चन्द्र ने अत्यन्त विनम्रतापूर्वक २० इस यज्ञको सम्पन्न किया | इसके बाद शुनःशेपने हाथ जोड़कर सभासदों से कहा- हे सभासद्गण! आपलोग धर्मशास्त्रके पूर्ण ज्ञाता तथा यथार्थवादी हैं; अतः आपलोग २१ वेदशास्त्रानुसार धर्मका निर्णय कीजिये ॥ २०-२१ ॥ हे सर्वज्ञ [ ऋषिगण ]! अब मैं किसका पुत्र हुआ और आगे मेरा पिता कौन होगा? आपलोगोंके २२ वचनानुसार ही मैं उसीकी शरण में जाऊँगा । शुनःशेपके द्वारा यह वचन कहे जानेपर सभी सभासद् आपसमें परामर्श करने लगे ॥ २२३ ॥
सभासद् बोले — यह तो अजीगर्तका पुत्र है, तब यह अन्य किसका पुत्र हो सकता है? यह उसीके २३ अंगसे उत्पन्न हुआ है तथा उसीने स्नेहपूर्वक इसका लालन - पालन किया है तो फिर यह अन्य किस व्यक्तिका पुत्र हो सकता है, हमलोगों का यही निर्णय २४ है ॥ २३-२४ ॥ यह निर्णय सुनकर महर्षि वामदेवने उन सभासदोंसे कहा कि उस पिताने धनके लोभसे अपने पुत्रको बेच २५ दिया है, इसलिये अब यह बालक धन देकर क्रय करनेवाले राजा हरिश्चन्द्रका पुत्र हुआ; इसमें संशय नहीं है । अथवा यह वरुणदेवका पुत्र हुआ; क्योंकि २६ इन्होंने ही इसे बन्धनसे मुक्त कराया है ॥ २५-२६ ॥ अन्न प्रदान करनेवाला, भयसे बचानेवाला, विद्याका दान करनेवाला, धन प्रदान करनेवाला और २७ जन्म देनेवाला - ये पाँच पिता कहे गये हैं ॥२७ ॥
उस समय कुछ सभासदोंने उसे पिता अजीगर्तका पुत्र, कुछ सभासदोंने राजा हरिश्चन्द्रका पुत्र और २८ अन्यने उसे वरुणदेवका पुत्र बतलाया । इस प्रकार परस्पर बातचीतमें वे किसी निर्णयपर नहीं पहुँचे ॥ २८ ॥
इस तरहकी सन्देहकी स्थिति उत्पन्न हो जानेपर २ ९ सर्वज्ञ तथा सर्वपूजित महर्षि वसिष्ठने वहाँ परस्पर विवाद करते हुए सभासदोंसे यह बात कही – हे महाभाग! अब आपलोग मेरा वेदानुकूल निर्णय ३० सुनिये - जिस समय इसके पिता अजीगर्तने स्नेहका त्याग करके इस बालकको बेच दिया था, उसी समय धन लेते ही अपने पुत्रसे उसका सम्बन्ध समाप्त हो ३१ । गया और यह राजा हरिश्चन्द्रका क्रीतपुत्र हो गया ।
पृष्ठ 105
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
९ ६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १७
यूपे बद्धो यदा राज्ञा तदा तस्य न वै सुतः ।
वरुणस्तु स्तुतोऽनेन तेन तुष्टेन मोचितः ॥
तस्मान्नायं महाभागा ह्यसौ पुत्रः प्रचेतसः ।
यो यं स्तौति महामन्त्रैः सोऽपि तुष्टो ददाति च ॥
धनं प्राणान्पशून् राज्यं तथा मोक्षं किलेप्सितम् ।
कौशिकस्य सुतश्चायमरिष्टे येन रक्षितः ॥
मन्त्रं दत्त्वा महावीर्यं वरुणस्यातिसङ्कटे । व्यास उवाच श्रुत्वा वाक्यं वसिष्ठस्य बाढमूचुः सभासदः ॥
विश्वामित्रस्तु जग्राह तं करे दक्षिणे तदा ।
एहि पुत्र गृहं मे त्वमित्युक्त्वा प्रेमपूरितः ॥
शुनःशेपो जगामाशु तेनैव सह सत्वरः ।
वरुणस्तु प्रसन्नात्मा जगाम च स्वमालयम् ॥
ऋत्विजश्च तथा सभ्याः स्वगृहान्निर्ययुस्तदा । राजापि रोगनिर्मुक्तो बभूवातिमुदान्वितः प्रजास्तु पालयामास सुप्रसन्नेन चेतसा । रोहिताख्यस्तु तच्छ्रुत्वा वृत्तान्तं वरुणस्य ह आजगाम गृहं प्रीतो दुर्गमाद्वनपर्वतात् । दूता राजानमभ्येत्य प्रोचुः पुत्रं समागतम् मुदितोऽसौ जगामाशु सम्मुखः कोसलाधिपः दृष्ट्वा पितरमायान्तं प्रेमोद्रिक्तः सुसम्भ्रमः दण्डवत्पतितो भूमावश्रुपूर्णमुखः शुचा बादमें जब राजाने यज्ञके स्तम्भमें इस बालकको बाँध ३२ दिया, तब यह उनका भी पुत्र नहीं रहा । जब इसने वरुणदेवकी स्तुति की, तब उन्होंने प्रसन्न होकर इसे बन्धनमुक्त करा दिया, अतः हे महाभाग सभासद्गण! यह वरुणदेवका भी पुत्र नहीं हो सकता । इसका ३३ कारण यह है कि जब जो व्यक्ति महामन्त्रोंके द्वारा जिस देवताकी स्तुति करता है, तभी वह प्रसन्न होकर उस व्यक्तिकी कामनाके अनुसार उसे धन, प्राण, पशु, ३४ राज्य तथा मोक्ष प्रदान करता है । वास्तवमें यह बालक मुनि विश्वामित्रका पुत्र हुआ, जिन्होंने विषम प्राण - संकटके समय परम शक्तिशाली वरुणमन्त्र देकर
इसकी रक्षा की है । २ ९ –३४३ ॥
व्यासजी बोले- हे राजन्! महर्षि वसिष्ठकी ३५ बात सुनकर सभासदोंने ' बहुत ठीक ' ऐसा कहकर उनका समर्थन कर दिया । तब मुनि विश्वामित्र प्रेमसे पूरित हो उठे । ' हे पुत्र! अब तुम मेरे आश्रममें चलो ' – ऐसा कहकर उन्होंने उसका दाहिना हाथ ३६ पकड़ लिया । तब शुनःशेप भी तुरंत उनके साथ शीघ्रतापूर्वक चल दिया और वरुणदेव भी प्रसन्नचित्त होकर अपने लोकको चले गये । सभी ऋत्विक् और ३७ सभासद् भी अपने - अपने भवनोंके लिये प्रस्थित हो गये ॥ ३५ – ३७३ ॥ राजा हरिश्चन्द्र भी जलोदर रोगसे मुक्त हो जानेसे परम आनन्दित हो गये । वे अत्यन्त प्रसन्न ॥ ३८ । मनसे प्रजापालनमें तत्पर हो गये ॥ ३८३ ॥
इधर, वरुणदेवसम्बन्धी सारा वृत्तान्त सुनकर राजकुमार रोहितको बड़ी प्रसन्नता हुई और वे दुर्गम ॥ ३ ९ वनों तथा पर्वतोंको पार करते हुए अपने राजमहलके पास आ पहुँचे ॥ ३ ९ ३ ॥ तब दूतोंने राजाके पास जाकर उनसे पुत्रके आ जानेकी बात बतायी । यह सुनते ही कोसलराज ॥ ४० हरिश्चन्द्र बहुत प्रसन्न हुए और वे शीघ्र उसके समीप । पहुँच गये ॥४० ॥
पिताको आया हुआ देखकर रोहितका प्रेम ॥ ४१ उमड़ पड़ा और वे बड़े सम्मानपूर्वक भूमिपर दण्डकी भाँति गिर पड़े । शोकके कारण रोहितका मुखमण्डल । असे भीग गया ॥ ४११३ ॥
पृष्ठ 106
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० १७ ] सप्तम राजापि तं समुत्थाप्य परिरभ्य मुदान्वितः ॥ ४२
तमाघ्राय सुतं मूर्ध्नि पप्रच्छ कुशलं पुनः ।
उत्सङ्गे तं समारोप्य मुदितो मेदिनीपतिः ॥ ४३
उष्णैर्नेत्रजलैः शीर्षण्यभिषेकमथाकरोत् ।
राज्यं शशास तेनासौ पुत्रेणातिप्रियेण च ॥ ४४
वृत्तान्तं नरमेधस्य कथयामास विस्तरात् ।
राजसूयं क्रतुवरं चकार नृपसत्तमः ॥ ४५
वसिष्ठं पूजयित्वाथ होतारमकरोद्विभुः ।
समाप्ते त्वथ यज्ञेशे वसिष्ठोऽतीव पूजितः ॥ ४६
शक्रस्य सदनं रम्यं जगाम मुनिरादरात् ।
विश्वामित्रोऽपि तत्रैव वसिष्ठेन च सङ्गतः ॥ ४७
मिलित्वा तौ स्थितौ देवसदने मुनिसत्तम ।
विश्वामित्रोऽपि पप्रच्छ वसिष्ठं प्रतिपूजितम् ॥ ४८
वीक्ष्य विस्मयचित्तस्तं सभायां तु शचीपतेः । विश्वामित्र उवाच क्वेयं पूजा त्वया प्राप्ता महती मुनिसत्तम ॥ ४ ९ कृता केन महाभाग सत्यं ब्रूहि ममान्तिके । वसिष्ठ उवाच यजमानोऽस्ति मे राजा हरिश्चन्द्रः प्रतापवान् ॥ ५०
राजसूयः कृतस्तेन राज्ञा प्रवरदक्षिणः ।
नेदृशोऽस्ति नृपश्चान्यः सत्यवादी धृतव्रतः ॥ ५१
दाता च धर्मशीलश्च प्रजारञ्जनतत्परः ।
तस्य यज्ञे मया पूजा प्राप्ता कौशिकनन्दन ॥ ५२
( किं पृच्छसि पुनः सत्यं ब्रवीम्यकृत्रिमं द्विज । )
हरिश्चन्द्रसमो राजा न भूतो न भविष्यति ।
सत्यवादी तथा दाता शूरः परमधार्मिकः ॥ ५३
स्कन्ध ९ ७ राजा हरिश्चन्द्रने भी उन्हें उठाकर हृदयसे लगा लिया और आनन्दपूर्वक पुत्रका मस्तक सूँघकर उससे कुशल - क्षेम पूछा । राजकुमार रोहितको गोदमें बिठाकर हर्षसे परिपूर्ण पृथ्वीपति हरिश्चन्द्रने प्रेमातिरेकके कारण नेत्रोंसे गिरते हुए उष्ण अश्रुओंसे उनका अभिषेक कर दिया । वे अपने परम प्रिय पुत्र रोहितके साथ राज्यका शासन करने लगे । बादमें उन्होंने राजकुमारसे यज्ञकी सारी बातें विस्तारपूर्वक बतलायीं ॥ ४२ – ४४ ॥ कुछ दिनोंके अनन्तर नृपश्रेष्ठ हरिश्चन्द्रने सभी यज्ञोंमें उत्तम राजसूययज्ञ प्रारम्भ किया । राजाने गुरु वसिष्ठकी पूजा करके उन्हें उस यज्ञका ' होता ' बनाया ॥ ४५३ ॥
उस सर्वश्रेष्ठ यज्ञके समाप्त होनेपर वसिष्ठजीका बहुत अधिक सम्मान किया गया । तदनन्तर मुनि वसिष्ठ श्रद्धापूर्वक इन्द्रकी रमणीक नगरी अमरावतीपुरीमें गये ॥ ४६ ॥
वहीं पर विश्वामित्र भी वसिष्ठजीको मिल गये । मिलनेके बाद वे दोनों महर्षि देवसभामें एक साथ बैठे । तब ऐसी विशेष पूजा पाये हुए महर्षि वसिष्ठको देखकर विश्वामित्रके मनमें महान् आश्चर्य हुआ और वे हे मुनिश्रेष्ठ! ऐसा सम्बोधन करके शचीपति इन्द्रकी सभामें ही उनसे पूछने लगे ॥ ४७-४८३ ॥ विश्वामित्र बोले - – हे मुनिश्रेष्ठ! आपने इतना बड़ा सम्मान कहाँ पाया? हे महाभाग! आपकी ऐसी पूजा किसने की; आप मुझे यह बात सच - सच बतलाइये ॥ ४ ९ ३ ॥ वसिष्ठजी बोले- परम प्रतापी राजा हरिश्चन्द्र मेरे यजमान हैं । उन्होंने प्रचुर दक्षिणावाला राजसूययज्ञ किया है । उनके जैसा सत्यवादी, दृढव्रती, दानी, धर्मपरायण तथा प्रजाको प्रसन्न रखनेवाला दूसरा राजा नहीं है । हे विश्वामित्र! उन्हींके यज्ञमें मुझे यह पूजा प्राप्त हुई है । ( हे द्विज! आप मुझसे बार - बार क्या पूछ रहे हैं! मैं आपसे सत्य तथा यथार्थ कह रहा हूँ । ) हरिश्चन्द्रके समान सत्यवादी, दानी, पराक्रमी तथा परम धार्मिक राजा न तो हुआ है और न | होगा ॥ ५०–५३ ॥ 1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –4 A
पृष्ठ 107
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
९ ८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १८ व्यास उवाच व्यासजी बोले- हे राजन्! उनकी यह बात इति तस्य वचः श्रुत्वा विश्वामित्रो ऽतिकोपनः । सुनकर विश्वामित्रजी बहुत कुपित हो उठे और क्रोधसे बभूव क्रोधसंरक्तलोचनोऽप्यब्रवीच्च तम् ॥५४ आँखें लाल करके उनसे कहने लगे - ॥५४ ॥
विश्वामित्र उवाच एवं स्तौषि नृपं मिथ्यावादिनं कपटप्रियम् वञ्चितो वरुणो येन प्रतिश्रुत्य वरं पुनः मम जन्मार्जितं पुण्यं तपसः पठितस्य च । त्वदीयं वातितपसो ग्लहं कुरु महामते
अहं चेत्तं नृपं सद्यो न करोम्यतिसंस्तुतम् ।
असत्यवादिनं काममदातारं महाखलम् ॥
आजन्मसञ्चितं सर्वं पुण्यं मम विनश्यतु । अन्यथा त्वत्कृतं सर्वं पुण्यं त्विति पणावहे लहं कृत्वा ततस्तौ तु विवदन्तौ मुनी तदा स्वाश्रमं स्वर्गलोकाच्च गतौ परमकोपनौ विश्वामित्र बोले- आप ऐसे मिथ्याभाषी तथा कपटी राजाकी प्रशंसा कर रहे हैं, जिसने पुत्रप्राप्तिका । वर पाकर प्रतिज्ञा करके भी वरुणदेवको बार - बार ॥ ५५ धोखा दिया ॥ ५५ ॥
हे महामते! इस जन्ममें मेरे द्वारा किये गये तप तथा वेदाध्ययनके फलस्वरूप संचित पुण्य तथा अपने ॥ ५६ महान् तपकी शर्त लगा लीजिये । यदि मैं आपके द्वारा अति प्रशंसित किये गये राजा हरिश्चन्द्रको शीघ्र ही मिथ्याभाषी, दान न देनेवाला तथा महादुष्ट न ५७ प्रमाणित कर दूँ तो सम्पूर्ण जन्मका मेरा संचित पुण्य नष्ट हो जाय; अन्यथा आपके द्वारा उपार्जित सारा पुण्य नष्ट हो जाय - इसी बातकी हम दोनों शर्त लगा ॥ ५८ लें॥५६–५८ ॥ तब यह शर्त लगाकर अत्यधिक कुपित हुए वे । दोनों मुनि परस्पर विवाद करते हुए स्वर्गलोकसे ॥ ५ ९ । अपने - अपने आश्रमको लौट गये ॥ ५ ९ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे वसिष्ठविश्वामित्रपणवर्णनं नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
अथाष्टादशोऽध्यायः विश्वामित्रका मायाशूकरके द्वारा व्यास उवाच
कदाचित्तु हरिश्चन्द्रो मृगयार्थं वनं ययौ ।
अपश्यद्रुदतीं बालां सुन्दरीं चारुलोचनाम् ॥ १
तामपृच्छन्महाराजः कामिनीं करुणापरः ।
पद्मपत्रविशालाक्षि किं रोदिषि वरानने ॥ २
केनासि पीडितात्यर्थं किं ते दुःखं वदाशु मे ।
का च त्वं विजने घोरे कस्ते भर्ता पिताथवा ॥ ३
हरिश्चन्द्रके उद्यानको नष्ट कराना व्यासजी बोले --- राजन्! किसी समय राजा हरिश्चन्द्र आखेट करनेके लिये वनमें गये हुए थे । उन्होंने वहाँ मनोहर नेत्रोंवाली रोती हुई एक सुन्दर युवतीको देखा ॥ १ करुणामय महाराज हरिश्चन्द्रने उस कामिनीसे पूछा - कमलपत्रके समान विशाल नेत्रोंवाली हे वरानने! तुम क्यों रो रही हो, तुम्हें किसने कष्ट दिया है, तुम्हें कौन - सा अपार दुःख आ पड़ा है, इस निर्जन वनमें रहनेवाली तुम कौन हो और तुम्हारे पिता तथा पति कौन हैं? यह सब मुझे शीघ्र बताओ ॥ २-३ ॥ 1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –4 B
पृष्ठ 108
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० १८ ] सप्तम स्कन्ध ९९
न बाधते च राज्ये मे राक्षसोऽपि पराङ्गनाम् ।
तं हन्मि तरसा कान्ते यस्त्वां सुन्दरि बाधते ॥
ब्रूहि दुःखं वरारोहे स्वस्था भव कृशोदरि ।
विषये मम पापात्मा न तिष्ठति सुमध्यमे ॥
इति तस्य वचः श्रुत्वा नारी तमब्रवीन्नृपम् ।
प्रमृज्याश्रूणि वदनाद्धरिश्चन्द्रं नृपोत्तमम् ॥
नार्युवाच
राजन् मां बाधतेत्यर्थं विश्वामित्रो महामुनिः ।
तपः करोति यद्घोरं मदर्थं कौशिको वने ॥
तेनाहं दुःखिता राजन् विषये तव सुव्रत ।
विद्धि मां कमनां कान्तां पीडितां मुनिना भृशम् ॥
राजोवाच
स्वस्था भव विशालाक्षि न ते दुःखं भविष्यति ।
तमहं वारयिष्यामि मुनिं तापपरायणम् ॥
इत्याश्वास्य स्त्रियं राजा तरसा मुनिसन्निधौ ।
नत्वा प्रणम्य शिरसा तमुवाच महीपतिः ॥
स्वामिन्किं क्रियतेऽत्यर्थं तपसा देहपीडनम् ।
किमर्थं ते समारम्भो ब्रूहि सत्यं महामते ॥
वाञ्छितं तव गाधेय करोमि सफलं किल ।
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ तरसा तपसालमतः परम् ॥
विषये मम सर्वज्ञ न कर्तव्यं सुदारुणम् ।
लोकपीडाकरं घोरं तपः केनापि कर्हिचित् ॥
इत्थं निषिध्य तं राजा विश्वामित्रं गृहं ययौ ।
मनसा क्रोधमाधाय गतोऽसौ कौशिको मुनिः ॥
हे कान्ते! मेरे राज्यमें तो राक्षस भी परायी ४ स्त्रीको कष्ट नहीं पहुँचाते । हे सुन्दरि! जो व्यक्ति तुम्हें पीड़ित करता होगा, उसे मैं अभी मार डालूँगा । हे वरारोहे! तुम मुझे अपना दुःख बताओ और निश्चिन्त हो जाओ । हे कृशोदरि! हे ५ सुमध्यमे! मेरे राज्यमें दुराचारी व्यक्ति नहीं रह सकता ॥ ४-५ ॥ उनकी यह बात सुनकर वह स्त्री अपने ६ मुखमण्डलके आँसू पोंछकर उन नृपश्रेष्ठ राजा हरिश्चन्द्रसे कहने लगी ॥ ६ ॥
नारी बोली - हे राजन्! मेरे लिये वनमें रहकर जो घोर तपस्या कर रहे हैं, वे महामुनि ७ विश्वामित्र मुझे बहुत कष्ट दे रहे हैं; उत्तम व्रतका पालन करनेवाले हे राजन्! आपके राज्यमें मैं इसी कारणसे दुःखी हूँ । उन मुनिके द्वारा अत्यधिक सतायी जानेवाली मुझ स्त्रीको आप ' कमना ' नामवाली ८ जान लीजिये ॥ ७-८ ॥ राजा बोले- हे विशाल नयनोंवाली! तुम प्रसन्नचित्त रहो, अब तुम्हें कष्ट नहीं होगा । तपस्यामें तत्पर रहनेवाले उन मुनिको मैं मना कर दूँगा ॥ ९ ॥
९ उस स्त्रीको यह आश्वासन देकर पृथ्वीपति राजा हरिश्चन्द्र शीघ्र ही मुनिके पास गये और नम्रतापूर्वक सिर झुकाकर प्रणाम करके उनसे बोले— १० हे स्वामिन्! आप ऐसी कठिन तपस्यासे अपने शरीरको अत्यधिक पीड़ित क्यों कर रहे हैं? हे महामते! किस प्रयोजनसे आप यह करनेके लिये उद्यत हैं? सच - सच बताइये ॥ १०-११ ॥ ११ हे गाधितनय! मैं आपकी अभिलाषा अवश्य पूर्ण करूँगा । अब इसी समय उठ जाइये और आगे तपस्या करनेका विचार त्याग दीजिये | हे सर्वज्ञ! मेरे १२ राज्यमें रहकर कभी किसीको भी अत्यन्त भीषण, लोकके लिये पीड़ाकारक तथा उग्र तप नहीं करना चाहिये ॥ १२-१३ ॥ १३ इस प्रकार विश्वामित्रजीको तपस्यासे रोककर राजा हरिश्चन्द्र अपने भवन चले गये और उनके इस कृत्यसे मुनि विश्वामित्र भी मन - ही - मन कुपित होकर १४ । वहाँसे चल दिये ॥१४ ॥
1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –4 C
पृष्ठ 109
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१००
स गत्वा चिन्तयामास नृपकृत्यमसाम्प्रतम् ।
वसिष्ठस्य च संवादं तपसः प्रतिषेधनम् ॥
कोपाविष्टेन मनसा प्रतीकारमथाकरोत् ।
विचिन्त्य बहुधा चित्ते दानवं घोरविग्रहम् ॥
प्रेषयामास तद्देशं विधाय सूकराकृतिम् ।
सोऽतिकायो महाकालः कुर्वन्नादं सुदारुणम् ॥
राज्ञश्चोपवने प्राप्तस्त्रासयन् रक्षकांस्तदा ।
मालतीनां च खण्डानि कदम्बानां तथैव च ॥
यूथिकानां च वृन्दानि कम्पयंश्च मुहुर्मुहुः ।
दन्तेन विलिखन्भूमिं समुन्मूलयते द्रुमान् ॥
चम्पकान्केतकीखण्डान्मल्लिकानां च पादपान् ।
करवीरानुशीरांश्च निचखान शुभान्मृदून् ॥
मुचुकुन्दानशोकांश्च बकुलांस्तिलकांस्तथा ।
उन्मूल्य कदनं तत्र चकार सूकरो वने ॥
वाटिकारक्षकाः सर्वे दुद्रुवुः शस्त्रपाणयः ।
हाहेति चुकुशुस्तत्र मालाकारा भृशातुराः ॥
बाणैः सन्ताड्यमानोऽपि यदा त्रस्तो न वै मृगः ।
रक्षकान्पीडयामास कोलः कालसमद्युतिः ॥
ते तदातिभयाक्रान्ता राजानं शरणं ययुः ।
तमूचुस्त्राहि त्राहीति वेपमाना भयाकुलाः ॥
तानागतान्समालोक्य भयार्तान्भूपतिस्तदा ।
पप्रच्छ किं भयं कस्मान्मां ब्रुवन्तु समागताः ॥
नाहं बिभेमि देवेभ्यो राक्षसेभ्यश्च रक्षकाः ।
कस्माद्भयं समुत्पन्नं तद् ब्रुवन्तु ममाग्रतः ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १८ घर जाकर विश्वामित्रजी राजा हरिश्चन्द्रके १५ अनुचित कृत्य, वसिष्ठकी कही हुई बात तथा तपस्यासे विरत कर दिये जानेके विषयमें सोचने लगे । वे कोपाविष्ट मनसे बदला लेनेके लिये तत्पर हो गये । १६ इस प्रकार मनमें बहुत प्रकारसे सोचकर उन्होंने एक भयानक शरीरवाले दानवको सूअरके रूपमें बनाकर उसे राजाके यहाँ भेजा ॥ १५-१६३ ॥ १७ महाकालके समान प्रतीत होनेवाला तथा विशाल शरीरवाला वह सूअर अत्यन्त भयावह शब्द करता हुआ राजा हरिश्चन्द्रके उपवन में पहुँच १८ गया । रक्षकोंको भयभीत करते हुए, मालतीकी तथा कदम्बोंकी लताको एवं जूहीसमूहोंको बार - बार रौंदते हुए और अपने दाँतसे जमीनको खोदते हुए उस सूअरने बड़े - बड़े वृक्षोंको जड़से उखाड़ १ ९ डाला; उसने चम्पक, केतकी, मल्लिका, कनेर तथा उशीरके सुन्दर तथा कोमल पौधोंको बींध डाला तथा मुचुकुन्द, अशोक, मौलसिरी एवं तिलक आदि २० वृक्षोंको उखाड़कर उस सूअरने उपवनको विनष्ट कर दिया ॥ १७ - २१ ॥ हाथोंमें शस्त्र लिये हुए उस उपवनकी रखवाली २१ करनेवाले सभी रक्षक वहाँसे भाग चले और अत्यन्त भयभीत मालियोंने हाय हायकी ध्वनि करते हुए चिल्लाना आरम्भ कर दिया ॥ २२ ॥
२२ साक्षात् कालके समान तेजवाला वह सूअर जब बाणोंसे मारे जानेपर भी त्रस्त नहीं हुआ और रक्षकोंको पीड़ित करता रहा, तब वे अत्यन्त २३ । भयाक्रान्त होकर राजा हरिश्चन्द्रकी शरणमें गये । भयसे व्याकुल तथा थर - थर काँपते हुए वे रक्षकगण ' रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये ' - ऐसा उनसे कहने २४ | लगे ॥ २३-२४ ॥ तब भयसे घबड़ाये हुए उन रक्षकोंको समक्ष उपस्थित देखकर राजाने उनसे पूछा- आपलोगोंको २५ क्या भय है और किसलिये आप सब यहाँ आये हुए हैं? मुझे यह बताइये | हे रक्षको! मैं देवताओं तथा राक्षसों - किसीसे भी नहीं डरता । तुम्हें यह भय २६ किससे उत्पन्न हुआ है, मेरे सामने उसे बताओ, मैं 1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –4 D
पृष्ठ 110
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० १८ ] सप्तम
हन्मि चैकेन बाणेन तं शत्रुं दुर्भगं किल ।
यो मेऽरातिः समुत्पन्नो लोके पापमतिः खलः ॥ २७
देवो वा दानवो वापि तं निहन्मि शरैः शितैः ।
क्व तिष्ठति कियद्रूपः कियद्बलसमन्वितः ॥ २८
मालाकारा ऊचुः
न देवो न च दैत्योऽस्ति न यक्षो न च किन्नरः ।
कश्चित्कोलो महाकायो राजंस्तिष्ठति कानने ॥ २ ९
पुष्पवृक्षानतिमृदून्दन्तेनोन्मूलयत्यसौ विदीर्णं तद्वनं सर्वं सूकरेणातिरंहसा ॥ ३०
विशिखैस्ताडितोऽस्माभिर्दृषद्भिर्लकुटैस्तथा ।
न बिभेति महाराज हन्तुमस्मानुपाद्रवत् ॥ ३१
व्यास उवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तेषां राजा कोपसमाकुलः ।
अश्वमारुह्य तरसा जगामोपवनं प्रति ॥ ३२
सैन्येन महता युक्तो गजाश्वरथसंयुतः ।
पदातिवृन्दसहितः प्रययौ वनमुत्तमम् ॥ ३३
तत्रापश्यन्महाकोलं घुर्घुरन्तं भयानकम् ।
वनं भग्नं च संवीक्ष्य राजा क्रोधयुतोऽभवत् ॥ ३४
चापे बाणं समारोप्य विकृष्य च शरासनम् ।
तं हन्तुं सूकरं पापं तरसा समुपाक्रमत् ॥ ३५
समालोक्य च राजानं चापहस्तं रुषाकुलम् ।
सम्मुखोऽभ्यद्रवत्तूर्णं कुर्वञ्छब्दं सुदारुणम् ॥ ३६
तमायान्तं समालोक्य वराहं विकृताननम् ।
मुमोच विशिखं तस्मिन्हन्तुकामो महीपतिः ॥ ३७
वञ्चयित्वाथ तद्वाणं सूकरस्तरसा बलात् । स्कन्ध १०१ उस अभागे शत्रुको एक ही बाणसे अभी मार डालता हूँ । जो पापबुद्धि तथा दुष्ट इस लोकमें मेरे शत्रुके रूपमें उत्पन्न हुआ हो, चाहे वह देवता हो या दानव, वह चाहे कहीं भी रहता हो, कैसे भी रूपवाला हो तथा कितना भी बलवान् हो, उसे मैं अपने तीक्ष्ण बाणोंसे मार डालूँगा॥२५—२८ ॥ मालाकार बोले - हे राजन्! वह न देवता है, न दैत्य है, न यक्ष है और न तो किन्नर ही है । विशाल शरीरवाला एक सूअर उपवनमें आया हुआ है । उसने अपने दाँतसे अत्यन्त कोमल पुष्पमय वृक्षोंको उखाड़ डाला है । अत्यन्त तीव्र गतिवाले उस सूअरने सारे उपवनको तहस - नहस कर दिया है । हे महाराज! बाणों, पत्थरों और लाठियोंसे हमलोगोंके प्रहार करनेपर भी वह भयभीत नहीं हुआ और हमें मारनेके लिये दौड़ पड़ा ॥ २ ९ –३१ ॥ व्यासजी बोले – उनकी यह बात सुनते ही राजा हरिश्चन्द्र कुपित हो उठे और उसी क्षण घोड़े पर सवार होकर उपवनकी ओर शीघ्रतापूर्वक | चल पड़े ॥ ३२ ॥
हाथी, घोड़े, रथ और पैदल चलनेवाले सैनिकोंसे युक्त एक विशाल सेनाके साथ वे उस श्रेष्ठ उपवनमें पहुँच गये ॥ ३३ ॥
वहाँ उन्होंने एक विशाल शरीरवाले भयानक सूअरको घुरघुराते हुए देखा । उसके द्वारा उजाड़े गये उपवनको देखकर राजा कुपित हो उठे । फिर वे धनुषपर बाण चढ़ाकर तथा धनुषको खींचकर उस दुष्ट सूअरको मारनेके लिये वेगपूर्वक आगे बढ़े ॥ ३४-३५ ॥ हाथमें धनुष लिये हुए कोपाविष्ट राजा हरिश्चन्द्रको देखकर वह सूअर अत्यन्त भयानक शब्द करता हुआ तुरंत उनके सामने आ गया ॥३६ ॥
उस विकृत मुखवाले सूअरको सामने आता हुआ देखकर राजा हरिश्चन्द्रने उसे मार डालनेकी इच्छासे उसपर बाण छोड़ा ॥ ३७ ॥
तब उस बाणसे अपनेको बचाकर वह सूअर राजाको बड़े वेगसे लाँघकर बलपूर्वक शीघ्रताके साथ
निर्जगाम महावेगात्तमुल्लंघ्य नृपं तदा ॥ ३८ । वहाँसे निकल भागा ॥ ३८ ॥