देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 91–100
देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 91–100
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८२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १५
इति तस्य वचः श्रुत्वा राजा चिन्तां चकार ह ।
कथं हन्मि सुतं जातं जलजेन समाननम् ॥४
लोकपालः समायातो विप्रवेषेण वीर्यवान् । न देवहेलनं कार्यं सर्वथा शुभमिच्छता । ५
पुत्रस्नेहः सुदुश्छेद्यः सर्वथा प्राणिभिः सदा ।
किं करोमि कथं मे स्यात्सुखं सन्ततिसम्भवम् ॥ ६
धैर्यमालम्ब्य भूपालस्तं नत्वा प्रतिपूज्य च ।
उवाच वचनं श्लक्ष्णं युक्तं विनयपूर्वकम् ॥ ७
राजोवाच
देवदेव तवानुज्ञां करोमि करुणानिधे ।
वेदोक्तेन विधानेन मखं च बहुदक्षिणम् ॥ ८
पुत्रे जाते दशाहेन कर्मयोग्यो भवेत्पिता ।
मासेन शुध्येज्जननी दम्पती तत्र कारणम् ॥ ९
सर्वज्ञोऽसि प्रचेतस्त्वं धर्मं जानासि शाश्वतम् ।
कृपां कुरु त्वं वारीश क्षमस्व परमेश्वर ॥ १०
व्यास उवाच
इत्युक्तस्तु प्रचेतास्तं प्रत्युवाच जनाधिपम् ।
स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि कुरु कार्याणि पार्थिव ॥ ११
आगमिष्यामि मासान्ते यष्टव्यं सर्वथा त्वया ।
कृत्वौत्थानिकमाचारं पुत्रस्य नृपसत्तम ॥ १२
इत्युक्त्वा श्लक्ष्णया वाचा राजानं यादसां पतिः ।
हरिश्चन्द्रो मुदं प्राप गते पाशिनि पार्थिवः ॥ १३
कोटिशः प्रददौ गास्ता घटोध्नीर्हेमपूरिताः ।
विप्रेभ्यां वेदविद्भ्यश्च तथैव तिलपर्वतान् ॥ १४
वरुणदेवकी बात सुनकर राजा चिन्तित हो उठे कि कमलके समान मुखवाले इस नवजात पुत्रका वध कैसे करूँ अर्थात् इसे बलिपशु बनाकर यज्ञ कैसे करूँ? किंतु स्वयं लोकपाल तथा पराक्रमी वरुणदेव विप्रवेषमें आये हुए हैं । अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले व्यक्तिको देवताओंका अनादर कभी नहीं करना चाहिये । साथ ही, पुत्रस्नेहको दूर करना भी तो प्राणियोंके लिये सर्वदा अत्यन्त दुष्कर कार्य है । अतः अब मैं कौन - सा उपाय करूँ, जिससे मुझे सन्तानजनित सुख प्राप्त हो ॥ ४-६ ॥ तब धैर्य धारण करके राजा हरिश्चन्द्रने वरुणदेवको प्रणामकर उनकी पूजा की और वे विनम्रतापूर्वक मधुर तथा युक्तियुक्त वचन कहने लगे ॥७ ॥
राजा बोले- हे देवदेव! मैं आपकी आज्ञाका पालन करूँगा । हे करुणानिधान! मैं वेदोक्त विधि-विधानसे प्रचुर दक्षिणावाला यज्ञ करूँगा, किंतु अभी यज्ञ न करनेका कारण यह है कि पुत्र उत्पन्न होनेके दस दिन बाद पिता शुद्ध होकर कर्मानुष्ठानके योग्य होता है और एक महीनेमें माता शुद्ध होती है । अतः जबतक पति - पत्नी दोनों शुद्ध नहीं हो जाते, तबतक यज्ञ कैसे होगा? वरुणदेव! आप तो सर्वज्ञ हैं और सनातन धर्मको भलीभाँति जानते हैं । हे वारीश! आप मुझपर दया कीजिये, हे परमेश्वर! मुझे क्षमा कीजिये ॥ ८–१० ॥ व्यासजी बोले – हे राजन्! राजा हरिश्चन्द्रके यह कहनेपर वरुणदेवने उनसे कहा- हे पृथ्वीपते! आपका कल्याण हो; अब मैं जा रहा हूँ और आप अपने कार्य सम्पन्न करें । नृपश्रेष्ठ! अब मैं एक मासके अन्तमें आऊँगा, तब आप अपने पुत्रका जातकर्म, नामकरण आदि संस्कार करनेके पश्चात् ही भलीभाँति मेरा यज्ञ कीजियेगा ॥ ११-१२ ॥ जलाधिपति वरुणदेव मधुर वाणीमें राजा हरिश्चन्द्रसे ऐसा कहकर जब चले गये तो वे अत्यन्त प्रसन्न हुए । वरुणदेवके चले जानेपर राजाने वेदज्ञ ब्राह्मणोंको घट- जैसे बड़े - बड़े थनवाली तथा स्वर्णाभूषणोंसे अलंकृत करोड़ों गायों और तिलके । पर्वतोंका दान किया॥१३-१४ ॥
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अ ० १५ ] सप्तम
राजा पुत्रमुखं दृष्ट्वा सुखमाप महत्तरम् ।
नामास्य रोहितश्चेति चकार विधिपूर्वकम् ॥ १५
पूर्णे मासे ततः पाशी विप्रवेषेण भूपतेः ।
आजगाम गृहे सद्यो यजस्वेति ब्रुवन्मुहुः ॥ १६
वीक्ष्य तं नृपतिर्देवं निमग्नः शोकसागरे ।
प्रणिपत्य कृतातिथ्यं तमुवाच कृताञ्जलिः ॥ १७
दिष्ट्या देव त्वमायातो गृहं मे पावितं प्रभो ।
मखं करोमि वारीश विधिवद्वाञ्छितं तव ॥ १८
अदन्तो न पशुः श्लाघ्य इत्याहुर्वेदवादिनः ।
तस्माद्दन्तोद्भवे तेऽहं करिष्यामि महामखम् ॥ १ ९
व्यास उवाच
इत्युक्तस्तेन वरुणस्तथेत्युक्त्वा ययावथ ।
हरिश्चन्द्रो मुदं प्राप्य विजहार गृहाश्रमे ॥ २०
पुनर्दन्तोद्भवं ज्ञात्वा प्रचेता द्विजरूपवान् ।
आजगाम गृहे तस्य कुरु कार्यमिति ब्रुवन् ॥ २१
भूपालोऽपि जलाधीशं वीक्ष्य प्राप्तं द्विजाकृतिम् ।
प्रणम्यासनसम्मानैः पूजयामास सादरम् ॥ २२
स्तुत्वा प्रोवाच वचनं विनयानतकन्धरः ।
करोमि विधिवत्कामं मखं प्रबलदक्षिणम् ॥ २३
बालोऽप्यकृतचौलोऽयं गर्भकेशो न सम्मतः ।
यज्ञार्थे पशुकरणे मया वृद्धमुखाच्छ्रुतम् ॥ २४
तावत्क्षमस्व वारीश विधिं जानासि शाश्वतम् ।
कर्तव्यः सर्वथा यज्ञो मुण्डनान्ते शिशोः किल ॥ २५
स्कन्ध ८३ अपने पुत्रका मुख देखकर राजा हरिश्चन्द्र परम आनन्दित हुए और उन्होंने विधिपूर्वक उसका नाम ' रोहित ' रखा ॥ १५ ॥
तत्पश्चात् एक मास बीतनेपर वरुणदेव ब्राह्मणका वेष धारणकर ' शीघ्र यज्ञ करो ' - ऐसा बार - बार कहते हुए पुनः राजाके घर आये ॥१६ ॥
वरुणदेवको देखकर राजा हरिश्चन्द्र शोकसागरमें डूब गये । उन्हें प्रणाम तथा उनका अतिथिसत्कार करके राजाने दोनों हाथ जोड़कर कहा - हे देव! मैं कितना भाग्यशाली हूँ कि आप मेरे यहाँ पधारे हुए हैं । हे प्रभो! आपने आज मेरे भवनको पवित्र कर दिया है । हे वारीश! मैं विधिपूर्वक आपका अभिलषित यज्ञ अवश्य करूँगा । वेदवेत्ताओंने कहा है कि दन्तविहीन पशु यज्ञके लिये श्रेष्ठ नहीं होता, अतः इस पुत्रके दाँत निकल आनेके बाद मैं आपका महायज्ञ करूँगा॥१७–१९ ॥ व्यासजी बोले - हे राजन्! राजा हरिश्चन्द्रके ऐसा कहनेपर वरुणदेव ' वैसा ही हो ' - यह कहकर वहाँसे लौट गये । इधर, राजा हरिश्चन्द्र आनन्दित होकर गृहस्थाश्रममें रहने लगे ॥२० ॥
उसके बाद बालकको दाँत निकल आनेकी बात जानकर वरुणदेव ब्राह्मणका रूप धारणकर 4 ' अब मेरा कार्य कर दो ' - ऐसा बोलते हुए राजा । महलमें पुनः पहुँचे ॥२१ ॥
ब्राह्मणके वेषमें जलाधिनाथ वरुणको आया देखकर राजाने उन्हें प्रणाम किया और आसन, अर्घ्य, पाद्य आदिके द्वारा आदरपूर्वक उनकी पूजा की । तदनन्तर राजाने उनकी स्तुति करके विनम्रतापूर्वक सिर झुकाकर कहा - ' मैं प्रचुर दान - दक्षिणाके साथ विधिपूर्वक आपका यज्ञ करूँगा; किंतु अभी तो इस बालकका चूडाकर्म- संस्कार भी नहीं हुआ है । मैंने वृद्धजनोंके मुखसे सुना है कि गर्भकालीन केशवाला बालक यज्ञके लिये पशु बनानेके योग्य नहीं माना गया है । हे जलेश्वर! आप सनातन विधि तो जानते ही हैं, अतः चूडाकरणतककी अवधिके लिये मुझे क्षमा कीजिये । मैं इस बालकके मुण्डन - संस्कारके । पश्चात् आपका यज्ञ अवश्य करूँगा ॥ २२ - २५ ॥
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८४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १५
तस्येति वचनं श्रुत्वा प्रचेताः प्राह तं पुनः ।
प्रतारयसि मां राजन् पुनः पुनरिदं ब्रुवन् ॥
अपि ते सर्वसामग्री वर्तते नृपतेऽधुना ।
पुत्रस्नेहनिबद्धस्त्वं वञ्चयस्येव साम्प्रतम् ॥
क्षौरकर्मविधिं कृत्वा न कर्तासि मखं यदि ।
तदाहं दारुणं शापं दास्ये कोपसमन्वितः ॥
अद्य गच्छामि राजेन्द्र वचनात्तव मानद ।
न मृषा वचनं कार्यं त्वयेक्ष्वाकुकुलोद्भव ॥
इत्याभाष्य ययावाशु प्रचेता नृपतेर्गृहात् ।
राजा परमसन्तुष्टो ननन्द भवने तदा ॥
चूडाकरणकाले तु प्रवृत्ते परमोत्सवे ।
सम्प्राप्तस्तरसा पाशी भवनं नृपतेः पुनः ॥
यदाङ्के सुतमादाय राज्ञी नृपतिसन्निधौ ।
उपविष्टा क्रियाकाले तदैव वरुणोऽभ्यगात् ॥
कुरु कर्मेति विस्पष्टं वचनं कथयन्नृपम् ।
विप्ररूपधरः श्रीमान् प्रत्यक्ष इव पावकः ॥
नृपतिस्तं समालोक्य बभूवातीव विह्वलः ।
नमश्चकार तं भीत्या कृताञ्जलिपुटः पुरः ॥
विधिवत्पूजयित्वा तं राजोवाच विनीतवान् ।
स्वामिन् कार्यं करोम्यद्य मखस्य विधिपूर्वकम् ॥
वक्तव्यमस्ति तत्रापि शृणुष्वैकमना विभो ।
युक्तं चेन्मन्यसे स्वामिंस्तद् ब्रवीमि तवाग्रतः ॥
ब्राह्मणः क्षत्रियां वैश्यस्त्रयो वर्णा द्विजातयः ।
संस्कृताश्चान्यथा शूद्रा एवं वेदविदो विदुः ॥
तब राजाका यह वचन सुनकर वरुणदेवने उनसे २६ | कहा- हे राजन्! आप बार - बार यही कहते हुए मुझे धोखा दे रहे हैं ॥ २६ ॥
हे राजन्! इस समय आपके पास यज्ञकी सम्पूर्ण २७ सामग्री तो विद्यमान है, किंतु पुत्रस्नेहमें बँधे होनेके कारण आप मुझे इस बार भी धोखा दे रहे हैं ॥ २७ ॥
अब इसका मुण्डन - संस्कार हो जानेके बाद भी यदि आप यज्ञ नहीं करेंगे, तो मैं कोपाविष्ट होकर २८ आपको भीषण शाप दे दूँगा । हे राजेन्द्र! हे मानद! आज तो मैं आपकी बात मानकर चला जा रहा हूँ, किंतु हे इक्ष्वाकुवंशज! आप अपनी बात असत्य मत २ ९ कीजियेगा ॥ २८-२९ ॥ ऐसा कहकर वरुणदेव राजाके भवनसे तुरंत चले गये । तब राजा हरिश्चन्द्र भी अत्यन्त प्रसन्न ३० होकर अपने राजमहलमें आनन्द करने लगे ॥ ३० ॥
इसके बाद जब चूडाकरणके समय महान् उत्सव मनाया जा रहा था, उसी समय वरुणदेव ३१ शीघ्रतापूर्वक राजाके महलमें पुनः आ पहुँचे । महारानी शैव्या पुत्र को अपनी गोदमें लेकर राजाके पासमें बैठी थीं और ज्यों ही मुण्डनका कार्य आरम्भ हुआ, उसी ३२ समय साक्षात् अग्निके समान तेजवाले विप्ररूपधारी श्रीमान् वरुणदेव ‘ यज्ञकर्म करो ' - ऐसा स्पष्ट वचन बोलते हुए राजाके समीप पहुँच गये ॥ ३१ - ३३ ॥ ३३ उन्हें देखकर राजा हरिश्चन्द्र बहुत व्याकुल हो गये । राजाने डरते हुए उन्हें नमस्कार किया और वे दोनों हाथ जोड़कर उनके आगे खड़े हो गये ॥ ३४ ॥
३४ तत्पश्चात् वरुणदेवकी विधिपूर्वक पूजा करके विनयशील राजा हरिश्चन्द्रने उनसे कहा- - हे स्वामिन्! मैं आज ही विधिपूर्वक आपका यज्ञकार्य करूँगा, किंतु हे विभो! इस सम्बन्धमें मुझे आपसे कुछ कहना ३५ है, आप एकाग्रचित्त होकर उसे सुनें । हे स्वामिन्! मैं आपके समक्ष उसे अब कह रहा हूँ, यदि आप उचित समझें तो स्वीकार कर लें ॥ ३५-३६ ॥ ३६ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य – ये तीनों वर्ण संस्कार - सम्पन्न हो जानेके बाद ही द्विजाति कहलाते हैं, अन्यथा ये शूद्र रहते हैं - ऐसा वेदवेत्ताओंने कहा ३७ है; इसलिये मेरा यह पुत्र अभी शूद्रके समान है । कोई
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अ ० १५ ]
तस्मादयं सुतो मेऽद्य शूद्रवद्वर्तते शिशुः ।
उपनीतः क्रियार्हः स्यादिति वेदेषु निर्णयः ॥
राज्ञामेकादशे वर्षे सदोपनयनं स्मृतम् ।
अष्टमे ब्राह्मणानां च वैश्यानां द्वादशे किल ॥
दयसे यदि देवेश दीनं मां सेवकं तव ।
तदोपनीय कर्तास्मि पशुना यज्ञमुत्तमम् ॥
लोकपालोऽसि धर्मज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।
मन्यसे मद्वचः सत्यं तद् गच्छ भवनं विभो ॥
व्यास उवाच
इति तस्य वचः श्रुत्वा दयावान् यादसां पतिः ।
ओमित्युक्त्वा ययावाशु प्रसन्नवदनो नृपः ॥
गतेऽथ वरुणे राजा बभूवातिमुदान्वितः ।
सुखं प्राप्य सुतस्यैवं राजा मुदमवाप ह ॥
चकार राजकार्याणि हरिश्चन्द्रस्तदा नृपः ।
कालेन व्रजता पुत्रो बभूव दशवार्षिकः ॥
तस्योपवीतसामग्रीं विभूतिसदृशीं नृपः ।
चकार ब्राह्मणैः शिष्टैरन्वितः सचिवैस्तथा ॥
एकादशे सुतस्याब्दे व्रतबन्धविधौ नृपः ।
विदधे विधिवत्कार्यं चित्ते चिन्तातुरः पुनः ॥
वर्तमाने तथा कार्ये उपनीते कुमारके । आजगामाथ वरुणो विप्रवेषधरस्तदा
तं वीक्ष्य नृपतिस्तूर्णं प्रणम्य पुरतः स्थितः ।
कृताञ्जलिपुटः प्रीतः प्रत्युवाच सुरोत्तमम् ॥
देव दत्तोपवीतोऽयं पशुयोग्योऽस्ति मे सुतः । प्रसादात्तव मे शोको गतो वन्ध्यापवादजः सप्तम स्कन्ध ८५ बालक उपनयन - संस्कारसे संम्पन्न हो जानेके पश्चात् ३८ ही यज्ञ - क्रियाके योग्य होता है - ऐसा निर्णय वेदोंमें उल्लिखित है । । क्षत्रियोंका उपनयन संस्कार ग्यारहवें वर्ष, ब्राह्मणोंका आठवें वर्ष और वैश्योंका बारहवें ३ ९ वर्षमें हो जाना बताया गया है ॥ ३७ - ३ ९ ॥ हे देवेश! यदि आप मुझ दीन सेवकपर दया करें तो मैं इसका उपनयनसंस्कार करनेके पश्चात् इसे ४० यज्ञ - पशु बनाकर आपका श्रेष्ठ यज्ञ करूँ ॥ ४० ॥
सभी शास्त्रोंके विद्वान् तथा धर्मके ज्ञाता हे विभो! आप लोकपाल हैं, यदि आप मेरी बात सत्य ४१ मानते हों, तो अपने भवनको लौट जाइये ॥ ४१ ॥
व्यासजी बोले – उनकी यह बात सुनकर दयालु वरुणदेव ' ठीक है ' - ऐसा कहकर वहाँसे तुरंत चले गये और राजा प्रसन्न मुखमण्डलवाले हो गये ॥ ४२ ॥
४२ वरुणदेवके चले जानेपर राजा हरिश्चन्द्र परम आनन्दित हुए । इस प्रकार पुत्र सुख प्राप्त करके राजाको अपार हर्ष प्राप्त हुआ ॥ ४३ ॥
४३ तदनन्तर राजा हरिश्चन्द्र अपने राज- कार्यमें तत्पर हो गये । इस प्रकार समय बीतनेके साथ उनका पुत्र दस वर्षका हो गया ॥ ४४ ॥
४४ तब राजाने श्रेष्ठ ब्राह्मण तथा सचिवोंकी सम्मति अनुसार अपने विभवके अनुरूप राजकुमारके उपनयन-संस्कारकी सामग्री एकत्र की ॥ ४५ ॥
४५ पुत्रका ग्यारहवाँ वर्ष लगते ही राजाने व्रतबन्ध विधान के अनुसार विधिवत् कार्य आरम्भ किया, किंतु उनके मनमें चिन्ताके कारण बड़ी उद्विग्नता थी । जब ४६ राजकुमारका यज्ञोपवीत हो गया तथा इससे सम्बन्धित अन्य कार्य हो रहे थे, उसी समय वरुणदेव ब्राह्मणका वेष धारण करके वहाँ आ पहुँचे ॥ ४६-४७ ॥ ॥ ४७ उन्हें देखते ही राजा हरिश्चन्द्र तुरंत प्रणामकर उनके सामने खड़े हो गये और दोनों हाथ जोड़कर प्रसन्नतापूर्वक सुरश्रेष्ठ वरुणदेवसे बोले – हे देव! ४८ अब यज्ञोपवीत हो जानेके बाद मेरा पुत्र यज्ञपशुके योग्य हो गया है और अब आपकी कृपासे मेरा निःसन्तान रहनेसे होनेवाली लोकनिन्दासे उत्पन्न ॥ ४ ९ । शोक भी दूर हो चुका है ॥ ४८-४९ ॥
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८६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १५
कर्तुमिच्छाम्यहं यज्ञं प्रभूतवरदक्षिणम् ।
समये शृणु धर्मज्ञ सत्यमद्य ब्रवीम्यहम् ॥
समावर्तनकर्मान्ते करिष्यामि तवेप्सितम् ।
ममोपरि दयां कृत्वा तावत्त्वं क्षन्तुमर्हसि ॥
वरुण उवाच
प्रतारयसि मां राजन् पुत्रप्रेमाकुलो भृशम् ।
मुहुर्मुहुर्मतिं कृत्वा युक्तियुक्तां महामते ॥
गच्छाम्यद्य महाराज वचसा तव नोदितः ।
आगमिष्यामि समये समावर्तनकर्मणि ॥
इत्युक्त्वा प्रययौ पाशी तमापृच्छ्य विशांपते ।
राजा प्रमुदितः कार्यं चकार च यथोत्तरम् ॥
आगतं वरुणं दृष्ट्वा कुमारोऽतिविचक्षणः ।
यज्ञस्य समयं ज्ञात्वा तदा चिन्तातुरोऽभवत् ॥
शोकस्य कारणं राज्ञः पर्यपृच्छदितस्ततः ।
ज्ञात्वात्मवधमायुष्मन् गमनाय मतिं दधौ ॥
निश्चयं परमं कृत्वा सम्मन्त्र्य सचिवात्मजैः ।
प्रययौ नगरात्तस्मान्निर्गत्य वनमप्यसौ ॥
गते पुत्रे नृपः कामं दुःखितोऽभूद् भृशं तदा ।
प्रेरयामास दूतान्स्वांस्तस्यान्वेषणकाम्यया ॥
एवं गतेऽथ कालेऽसौ वरुणस्तद्गृहं गतः ।
राजानं शोकसन्तप्तं कुरु यज्ञमिति ब्रुवन् ॥
राजा प्रणम्य तं प्राह देवदेव करोमि किम् ।
न जाने क्वापि पुत्रो मे गतस्त्वद्य भयाकुलः ॥
अब मैं चाहता हूँ कि प्रचुर दक्षिणावाला ५० आपका श्रेष्ठ यज्ञ उपयुक्त अवसरपर कर डालूँ । हे धर्मज्ञ! आज मैं आपसे सत्य बात कह रहा हूँ, उसे सुन लीजिये । इस बालकके समावर्तन - संस्कारके पश्चात् मैं आपका अभिलषित यज्ञ करूँगा, मेरे ५१ ऊपर दया करके आप तबतकके लिये मुझे क्षमा करें ॥ ५०-५१ ॥ वरुण बोले- हे राजन्! हे महामते! अत्यधिक पुत्र - प्रेममें बँधे होनेके कारण आप ५२ बार - बार कोई - न - कोई युक्तिसंगत बुद्धिका प्रयोग करके मुझे धोखा देते चले आ रहे हैं । हे महाराज! आपकी बात मानकर आज तो मैं बिना कुछ कहे ५३ चला जा रहा हूँ, किंतु समावर्तन - कर्मके समय पुनः आऊँगा ॥५२-५३ ॥ हे राजा जनमेजय! राजा हरिश्चन्द्रसे यह कहकर तथा उनसे विदा लेकर वरुणदेव चले गये ५४ । और राजा हर्षित होकर आगेका काम करने लगे ॥ ५४ ॥
परम प्रतिभासम्पन्न राजकुमार ( रोहित ) बार-बार वरुणदेवको आते देखकर और यज्ञ - सम्बन्धी ५५ प्रतिज्ञा जानकर चिन्तित हो उठे ॥ ५५ ॥
उन्होंने राजाके शोकका कारण इधर - उधर लोगोंसे पूछा । हे आयुष्मान् जनमेजय! वरुणदेवके ५६ यज्ञमें होनेवाले अपने वधकी बात जानकर राजकुमारने भाग जानेका निश्चय किया । तदनन्तर मन्त्रिकुमारोंसे परामर्श करनेके बाद दृढ़ निश्चय ५७ करके उस नगरसे निकलकर वे वनकी ओर चल पड़े ॥ ५६-५७ ॥ पुत्रके चले जानेपर राजा बहुत दु: खी हुए और उन्होंने राजकुमारको खोजने के उद्देश्यसे अपने ५८ दूतोंको भेजा ॥५८ ॥
इस प्रकार कुछ समय बीतनेके पश्चात् वे वरुणदेव शोक संतप्त राजासे ' मेरा यज्ञ करो ' – ऐसा ५ ९ बोलते हुए उनके घर पहुँचे ॥५ ९ ॥ राजाने उन्हें प्रणाम करके कहा - हे देवदेव! अब मैं क्या करूँ? भयसे व्याकुल होकर मेरा पुत्र ६० न जाने कहाँ चला गया है? ॥ ६० ॥
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अ ० १६ ]
सर्वत्र गिरिदुर्गेषु मुनीनामाश्रमेषु च ।
अन्वेषितो मे दूतैस्तु न प्राप्तो यादसांपते ॥
आज्ञापय महाराज किं करोमि गते सुते ।
न मे दोषोऽत्र सर्वज्ञ भाग्यदोषस्तु सर्वथा ॥
व्यास उवाच इति भूपवचः श्रुत्वा प्रचेताः कुपितो भृशम् । शशाप च नृपं क्रोधाद्वञ्चितस्तु पुनः पुनः नृपतेऽहं त्वया यस्माद्वचसा च प्रवञ्चितः । तस्माज्जलोदरो व्याधिस्त्वां तुदत्वतिदारुणः व्यास उवाच इति शप्तो महीपालः कुपितेन प्रचेतसा । पीडितोऽभूत्तदा राजा व्याधिना दुःखदेन तु एवं शप्त्वा नृपं पाशी जगाम निजमास्पदम् । राजा प्राप्य महाव्याधिं बभूवातीव दुःखितः सप्तम स्कन्ध ८७ हे वरुणदेव! मैंने अपने दूतोंसे पर्वतकी कन्दराओं ६१ तथा मुनियोंके आश्रमोंमें उसे सर्वत्र खोजवाया, किंतु वह कहीं नहीं मिला । हे महाराज! पुत्रके चले जानेपर अब आप ही बताइये कि मैं क्या करूँ? हे ६२ सर्वज्ञ! इसमें मेरा कोई दोष नहीं है, इसमें हर प्रकारसे भाग्यका ही दोष है ॥६१-६२ ॥ व्यासजी बोले- हे जनमेजय! राजाकी यह बात सुनकर वरुणदेव अत्यन्त कुपित हुए । राजाके द्वारा ॥ ६३ बार - बार धोखा दिये जानेके कारण उन्होंने क्रोधपूर्वक शाप दे दिया- ' हे राजन्! आपने तरह - तरह की बातों से मुझे सदा धोखा दिया है, इसलिये अत्यन्त भयंकर ॥ ६४ जलोदर रोग आपको पीड़ित करे ' ॥ ६३-६४ ॥ व्यासजी बोले - हे राजन्! तब वरुणदेवके कुपित होकर इस प्रकारका शाप देनेसे राजा हरिश्चन्द्र कष्टदायक जलोदर रोगसे ग्रस्त हो गये ॥ ६५ ॥
॥ ६५ इस प्रकार राजाको शाप देकर पाश धारण करनेवाले वरुणदेव अपने लोकको चले गये और राजा हरिश्चन्द्र उस महाव्याधिसे ग्रस्त होकर महान् ॥ ६६ । कष्टमें पड़ गये ॥६६ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे हरिश्चन्द्रस्य जलोदरव्याधिप्राप्तिवर्णनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
अथ षोडशोऽध्यायः राजा हरिश्चन्द्रका शुनःशेपको व्यास उवाच
गतेऽथ वरुणे राजा रोगेणातीव पीडितः ।
दुःखाद्दुःखं परं प्राप्य व्यथितोऽभूद् भृशं तदा ॥
कुमारोऽसौ वने श्रुत्वा पितरं रोगपीडितम् ।
गमनाय मतिं राजंश्चकार स्नेहयन्त्रितः ॥
संवत्सरे व्यतीते तु पितरं द्रष्टुमादरात् ।
गन्तुकामं तु तं ज्ञात्वा शक्रस्तत्राजगाम ह ॥
वासवस्तु तदा रूपं कृत्वा विप्रस्य सत्वरः ।
वारयामास युक्त्या वै कुमारं गन्तुमुद्यतम् ॥
स्तम्भमें बाँधकर यज्ञ प्रारम्भ करना व्यासजी बोले - – [ हे राजन्! ] वरुणदेवके चले जानेपर राजा हरिश्चन्द्र [ जलोदर ] रोगसे १ अत्यन्त पीड़ित हुए; एक - पर- एक महान् कष्ट पाकर वे अति व्याकुल हो उठे ॥१ ॥
हे राजन्! वनमें स्थित राजकुमार रोहितने अपने पिताके [ जलोदर ] रोगसे पीड़ित होनेकी बात सुनकर २ स्नेहमें बँधे होनेके कारण [ अयोध्या ] लौट जानेका विचार किया ॥ २ ॥
एक वर्ष बीतने पर जब रोहितने अपने पिताका ३ आदरपूर्वक दर्शन करनेके लिये अयोध्या जानेकी इच्छा की तब यह जानकर इन्द्र उसके पास पहुँचे । शीघ्र ही ब्राह्मणका रूप धारण करके इन्द्रने अपने पिताके दर्शनार्थ ४ जानेको उद्यत राजकुमारको युक्तिपूर्वक रोका ॥३-४ ॥
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८८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १६ इन्द्र उवाच
राजपुत्र न जानासि राजनीतिं सुदुर्लभाम् ।
अतः करोषि मूढस्त्वं गमनाय मतिं वृथा ॥
पिता तव महाभाग ब्राह्मणैर्वेदपारगैः ।
कारयिष्यति होमं ते ज्वलितेऽथ विभावसौ ॥
आत्मा हि वल्लभस्तात सर्वेषां प्राणिनां खलु ।
तदर्थे वल्लभाः सन्ति पुत्रदारधनादयः ॥
आत्मनो देहरक्षार्थं हत्वा त्वां वल्लभं सुतम् ।
हवनं कारयित्वासौ रोगमुक्तो भविष्यति ॥
तस्मात्त्वया न गन्तव्यं राजपुत्र पितुर्गृहे ।
मृते पितरि गन्तव्यं राज्यार्थे सर्वथा पुनः ॥
एवं निषेधितस्तत्र वासवेन नृपात्मजः ।
वनमध्ये स्थितः कामं पुनः संवत्सरं नृप ॥
अत्यन्तं दुःखितं श्रुत्वा हरिश्चन्द्रं तदात्मजः ।
गमनाय मतिं चक्रे मरणे कृतनिश्चयः ॥
तुराषाड् द्विजरूपेण तत्रागत्य च रोहितम् ।
निवारयामास सुतं युक्तिवाक्यैः पुनः पुनः ॥
हरिश्चन्द्रोऽतिदुःखार्तो वसिष्ठं स्वपुरोहितम् ।
पप्रच्छ रोगनाशाय तत्रोपायं सुनिश्चितम् ॥
तमाह ब्रह्मणः पुत्रो यज्ञं कुरु नृपोत्तम ।
क्रयक्रीतेन पुत्रेण शापमोक्षो भविष्यति ॥
पुत्रा दशविधाः प्रोक्ता ब्राह्मणैर्वेदपारगैः ।
द्रव्येणानीय तस्मात्त्वं पुत्रं कुरु नृपोत्तम ॥
वरुणोऽपि प्रसन्नः सन्सुखकारी भविष्यति ।
लोभात्कोऽपि द्विजः पुत्रं प्रदास्यति स्वराष्ट्रजः ॥
इन्द्र बोले – हे राजपुत्र! आप अत्यन्त दुष्कर राजनीतिके विषयमें नहीं जानते, इसीलिये मूर्खताको प्राप्त आपने अयोध्या जानेका व्यर्थ ही ५ विचार किया है ॥ ५ ॥
हे महाभाग! [ आपके वहाँ जानेपर ] आपके पिता वेदोंके पारगामी ब्राह्मणोंके द्वारा कराये गये ६ यज्ञमें प्रज्वलित अग्निमें आपकी आहुति दे देंगे ॥ ६ ॥
हे तात! अपना प्राण सभी जीवोंको अवश्य ही अत्यन्त प्रिय होता है । उसीकी रक्षाके ७ और धन आदि प्रिय लगते हैं ॥७ ॥
अपने शरीरकी रक्षाके निमित्त पुत्रका अग्निमें हवन करवाकर वे ८ जायँगे । अतएव हे राजपुत्र! इस लिये पुत्र, स्त्री आप जैसे प्रिय रोगसे मुक्त हो समय आपको पिताके घर नहीं जाना चाहिये । पिताके मर जानेपर ही राज्य करनेके लिये आप वहाँ जायँ ॥ ८- ९ ॥ ९ [ हे राजन्! ] इस प्रकार इन्द्रके मना कर देनेपर राजकुमार रोहित उस वनमें एक वर्षतक रुके रह गये ॥ १० ॥
१० इसके बाद राजकुमारने जब सुना कि मेरे पिता अब बहुत दुःखी हैं, तब उसने मर जानेका निश्चय करके उनके पास जानेका दृढ़ विचार कर लिया ॥ ११ ॥
११ तब इन्द्रने पुनः ब्राह्मणका रूप धारण करके वहाँ आकर राजकुमारको अपनी तर्कसंगत बातोंसे बार-बार समझाकर उसे अयोध्या जानेसे रोक दिया ॥ १२ ॥
१२ इधर, कष्टसे अत्यधिक पीड़ित राजा हरिश्चन्द्रने अपने पुरोहित वसिष्ठजीसे इस रोगके नाशका निश्चित उपाय पूछा ॥ १३ ॥
१३ इसपर ब्रह्मापुत्र वसिष्ठजीने कहा- हे नृपश्रेष्ठ! अब आप धनके द्वारा खरीदे गये पुत्रसे यज्ञ कीजिये; इससे आप शापसे मुक्त हो जायँगे ॥ १४ ॥
१४ हे नृपश्रेष्ठ! वेदके पारगामी ब्राह्मणोंने दस प्रकारके पुत्र बतलाये हैं । अतः आप अपने द्रव्यसे क्रीत एक बालकको ले आकर उसे अपना पुत्र १५ बना लीजिये | इससे वरुणदेव भी प्रसन्न होकर आपके लिये सुखकारी हो जायँगे । आपके राज्यका कोई - न - कोई द्विज धनके लोभसे अपना पुत्र बेच १६ | भी देगा ॥ १५-१६ ॥
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अ ० १६ ]
एवं प्रमोदितो राजा वसिष्ठेन महात्मना ।
प्रधानं प्रेरयामास तदन्वेषणकाम्यया ॥
अजीगर्तो द्विजः कश्चिद्विषये तस्य भूपतेः ।
तस्यासंश्च त्रयः पुत्रा निर्धनस्य विशेषतः ॥
प्रधानेनाप्यसौ पृष्टः पुत्रार्थं दुर्बलो द्विजः ।
गवां शतं ददामीति देहि पुत्रं मखाय वै ॥
शुनः पुच्छः शुनःशेपः शुनोलांगूल इत्यमी ।
तेषामेकतमं देहि ददामि तु गवां शतम् ॥
अजीगर्तस्तु तच्छ्रुत्वा क्षुधया पीडितो भृशम् ।
पुत्रं च कतमं तेभ्यो विक्रेतुं वै मनो दधे ॥
कार्याधिकारिणं ज्येष्ठं मत्वा नासावदादमुम् ।
कनिष्ठं नाप्यदान्माता ममैष इति वादिनी ॥
मध्यमं च शुनःशेपं ददौ गवां शतेन च ।
आनिनाय पशुं चक्रे नरमेधे नराधिपः ॥
रुदन्तं दुःखितं दीनं वेपमानं भृशातुरम् ।
यूपे बद्धं निरीक्ष्यामुं चुक्रुशुर्मुनयस्तदा ॥
शामित्राय पशुं चक्रे नरमेधे नराधिपः ।
शमिता नाददे शस्त्रं तमालम्भयितुं शिशुम् ॥
नाहं द्विजसुतं दीनं रुदन्तं करुणं भृशम् ।
हनिष्यामि स्वलोभार्थमित्युवाचाप्यसौ तदा ॥
इत्युक्त्वा विररामासौ कर्मणो दुष्करादथ ।
राजा सभासदः प्राह किं कर्तव्यमिति द्विजाः ॥
जातः किलकिलाशब्दों जनानां क्रोशतां तदा ।
क्रन्दमाने शुनःशेपे सभायां भृशमद्भुतम् ॥
सप्तम स्कन्ध ८ ९ महात्मा वसिष्ठजीकी बातसे परम प्रसन्नताको १७ प्राप्त राजा हरिश्चन्द्रने वैसा बालक ढूँढ़नेके उद्देश्यसे अपने प्रधान अमात्यको भेज दिया ॥ १७ ॥
राजा हरिश्चन्द्रके राज्यमें अजीगर्त नामक कोई १८ ब्राह्मण रहता था । अति निर्धन उस ब्राह्मणके तीन पुत्र थे । पुत्र खरीदनेके लिये गये हुए प्रधान सचिवने उस दुर्बल ब्राह्मणसे कहा- मैं आपको एक सौ गायें दूँगा; आप अपना पुत्र यज्ञके लिये मुझे दे दीजिये । १ ९' शुनः पुच्छ ', ' शुनःशेप ' तथा ' शुनोलांगूल ' नामक जो आपके तीन पुत्र हैं, उनमेंसे कोई एक मुझे दे दीजिये और उसके बदले मैं आपको एक सौ गायें २० दे दूँगा । यह सुनकर भूखसे अत्यधिक व्याकुल अजीगर्तने उनमेंसे किसी एक पुत्रको बेच डालनेका मनमें निश्चय कर लिया ॥ १८-२१ ॥ २१ ज्येष्ठ पुत्र पिण्डदान आदि कर्मोंका अधिकारी होता है - ऐसा सोचकर अजीगर्तने उसे नहीं दिया । कनिष्ठ पुत्रको ममताके कारण माताने यह कहकर २२ नहीं दिया कि यह मेरा है । अतः अजीगर्तने एक सौ गायें लेकर अपने मँझले पुत्र शुनःशेपको बेच दिया । तब मन्त्री उसे राजाके पास ले गये और राजाने उसे २३ यज्ञमें बलिपशु बनाया ॥ २२-२३ ॥ यज्ञीय स्तम्भमें धके निमित्त बाँधे गये उस बालकको रोते हुए, दुःखित, दीन, भयके मारे थर-२४ थर काँपते हुए तथा अत्यधिक व्याकुल देखकर उस समय ऋषिगण भी चिल्ला उठे ॥ २४ ॥
तभी राजा हरिश्चन्द्रने नरमेध यज्ञमें वध करनेके लिये उस बालकको पशुरूपसे शामित्र ( वधकर्ता ) -२५ को सौंप दिया, किंतु उसने आलम्भनके लिये उसपर शस्त्र नहीं चलाया । उस समय उसने यह भी कहा-' मैं दु: खित तथा करुण स्वरसे बहुत विलाप करते हुए २६ इस ब्राह्मणपुत्रको धनके लोभमें आकर नहीं मारूँगा ' । ऐसा कहकर वह उस घृणित कर्मसे विरत हो गया । तब राजा हरिश्चन्द्रने सभासदोंसे पूछा - ' हे विप्रगण! २७ अब क्या किया जाय? ' ॥ २५–२७ ॥ उसी समय शुनःशेपके बड़े विचित्र ढंगसे करुण-क्रन्दन करनेपर सभामें चीखती - चिल्लाती जनताके २८ । बीच हाहाकार मच गया ॥ २८ ॥
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९ ० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १६
अजीगर्तस्तदोत्थाय तमुवाच नृपोत्तमम् ।
राजन् कार्यं करिष्यामि तवाहं सुस्थिरो भव ॥
वेतनं द्विगुणं देहि हनिष्यामि पशुं किल ।
कर्तव्यं मखकार्यं वै मया तेऽद्य धनार्थिना ॥
दुःखितस्य धनार्थस्य सदासूया प्रसूयते । व्यास उवाच तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य हरिश्चन्द्रो मुदान्वितः ॥
तमुवाच ददाम्यद्य गवां शतमनुत्तमम् ।
तदाकर्ण्य पिता तस्य पुत्रं हन्तुं समुद्यतः ॥
लोभेनाकुलचित्तोऽसौ शामित्रे कृतनिश्चयः ।
समुद्यतं च तं दृष्ट्वा जनाः सर्वे सभासदः ॥
चुक्रुशुर्भृशदुःखार्ता हाहेति जगदुर्वचः ॥
पिशाचोऽयं महापापी क्रूरकर्मा द्विजाकृतिः ॥
यत्स्वयं स्वसुतं हन्तुमुद्यतः कुलपांसनः ।
धिक्चाण्डाल किमेतत्ते पापकर्म चिकीर्षितम् ॥
हत्वा सुतं धनं प्राप्य किं सुखं ते भविष्यति ।
आत्मा वै जायते पुत्र अङ्गाद्वै वेदभाषितम् ॥
तत्कथं पापबुद्धे त्वमात्मानं हन्तुमिच्छसि ।
एवं कोलाहले तत्र जाते कुशिकनन्दनः ॥
समीपं नृपतेर्गत्वा तमुवाच दयापरः । विश्वामित्र उवाच राजन्नमुं शुनःशेपं रुदन्तं भृशदुःखितम् ॥ क्रतुस्ते भविता पूर्णो रोगनाशश्च सर्वथा । तभी अजीगर्त उठकर उन नृपश्रेष्ठसे बोला-२ ९ हे राजन्! आप निश्चिन्त रहें, मैं स्वयं आपका यह कार्य करूँगा । उस ( वधकर्ता ) - को दिये जानेवाले धनसे दूना धन मुझे दीजिये, तो मैं इस बलिपशुका वध अवश्य कर दूँगा । धन - लोलुप होनेके कारण मैं ३० आज आपका यज्ञकार्य निश्चित रूपसे पूर्ण कर दूँगा; जो दुःखी है अथवा धनका लोभी है, उसके गुणों में भी दोष आ जाते हैं ॥ २ ९ -३०३ ॥ व्यासजी बोले - हे राजन्! अजीगर्तकी यह ३१ बात सुनकर राजा हरिश्चन्द्र बहुत प्रसन्न हुए और उससे बोले कि मैं अभी एक सौ श्रेष्ठ गायें आपको दूँगा ॥ ३१३ ॥
उनकी यह बात सुनकर अजीगर्त अपने पुत्र ३२ शुनःशेपका वध करने हेतु तैयार हो गया । लोभके कारण उद्विग्न चित्तवाले अजीगर्तने शामिता बननेका पूर्ण निश्चय कर लिया ॥ ३२३ ॥
३३ उसे हथियार उठाकर अपने पुत्रको मारनेहेतु उद्यत देखकर वहाँ उपस्थित सभासद्गण तथा सारी जनता दुःखसे विकल होकर चीखने - चिल्लाने लगी तथा हाय - हाय करते हुए कहने लगी कि ब्राह्मणके ३४ रूपमें यह पिशाच, महापापी तथा क्रूर कर्म करनेवाला है; यह अपने कुलको कलंकित करता हुआ स्वयं अपने ही पुत्रका वध करनेके लिये उद्यत है । हे ३५ चाण्डाल! तुम्हें धिक्कार है, तुमने यह पापकर्म करनेकी इच्छा क्यों की? पुत्रका वध करनेके बाद धन प्राप्त करके तुम कौन - सा सुख पा जाओगे? वेदोंमें कहा गया है कि पुत्ररूपमें अपनी आत्मा ही ३६ शरीरसे जन्म लेती है, इसलिये हे पापबुद्धि! तुम अपनी ही आत्माका वध किसलिये करना चाहते हो? | यज्ञस्थलमें इस प्रकारका कोलाहल होनेपर ३७ विश्वामित्रजी दयार्द्र हो गये और वे राजा हरिश्चन्द्रके पास जाकर उनसे कहने लगे ॥ ३३ – ३७१ ॥ विश्वामित्र बोले- हे राजन्! अत्यधिक दुःखित होकर करुण क्रन्दन करते हुए इस शुनः-३८ शेपको आप पाशमुक्त कर दीजिये । ऐसा करनेसे एक तो यज्ञ पूरा होगा और आपका रोग भी दूर हो जायगा ॥ ३८३ ॥
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अ ० १६ ] सप्तम स्कन्ध ९ १ दयासमं नास्ति पुण्यं पापं हिंसासमं नहि ॥। ३ ९
रागिणां रोचनार्थाय नोदनेयं विचारय ।
आत्मदेहस्य रक्षार्थं परदेहनिकृन्तनम् ॥ ४०
न कर्तव्यं महाराज सर्वतः शुभमिच्छता ।
दयया सर्वभूतेषु सन्तुष्टो येन केन च ॥ ४१
सर्वेन्द्रियोपशान्त्या च तुष्यत्याशु जगत्पतिः ।
आत्मवत्सर्वभूतेषु चिन्तनीयं नृपोत्तम ॥ ४२
जीवितव्यं प्रियं नूनं सर्वेषां सर्वदा किल ।
त्वमिच्छसि सुखं कर्तुं देहे हत्वा त्वमुं द्विजम् ॥ ४३
कथं नेच्छेदसौ देहं रक्षितुं स्वसुखास्पदम् ।
पूर्वजन्मकृतं वैरं नानेन सह ते नृप ॥ ४४
येनामुं हन्तुकामस्त्वं द्विजपुत्रं निरागसम् ।
यो यं हन्ति विना वैरं स्वकामः सततं पुनः ॥ ४५
हन्तारं हन्ति तं प्राप्य जननं जननान्तरे ।
जनकोऽस्य सुदुष्टात्मा येनासौ ते समर्पितः ॥ ४६
स्वात्मजो धनलोभेन पापाचारः सुदुर्मतिः ।
एष्टव्या बहवः पुत्रा यद्येकोऽपि गयां व्रजेत् ॥ ४७
यजेत चाश्वमेधेन नीलं वा वृषमुत्सृजेत् । * लोके व्यवायामिषमद्यसेवा नित्यास्तु जन्तोर्न हि तत्र ( वेद विधिके रूपमें ऐसे ही कर्मोंके करनेकी आज्ञा दयाके समान कोई पुण्य नहीं है और हिंसाके समान कोई पाप नहीं है । यज्ञोंमें हिंसा करनेका जो विधिवाद बना, उसका उद्देश्य जिह्वालोलुपोंके जिह्वास्वादकी पूर्ति के माध्यम से उनमें यज्ञ करनेकी प्रवृत्ति बढ़ाना है, किंतु यथासम्भव हिंसासे विरत रहना ही शास्त्रका आशय है * ॥ ३ ९ ३ ॥ हे महाराज! सब प्रकारसे अपना कल्याण चाहनेवाले व्यक्तिको अपने शरीरकी रक्षाके लिये दूसरे शरीरको विनष्ट नहीं करना चाहिये ॥ ४०३ ॥
जो सभी प्राणियोंके प्रति दयाभाव रखता है, जो कुछ भी प्राप्त हो जाय; उसीसे सन्तोष करता और अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखता है, उसके ऊपर जगत्पति भगवान् श्रीविष्णु शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं ॥ ४१३ ॥
हे नृपश्रेष्ठ! सभी प्राणियोंमें आत्मभावका चिन्तन करना चाहिये । जिस प्रकार अपनेको देह प्रिय होती है, उसी प्रकार सभी जीवोंको अपना शरीर प्रिय होता है । आप इस शुनःशेप द्विजका वध करके शरीरको रोगमुक्त करके सुख प्राप्त करना चाहते हैं, तो यह बालक सुखके आश्रयस्वरूप अपने देहको क्यों नहीं बचाना चाहेगा ॥ ४२-४३३ ॥ हे नृप! इसके साथ आपका पूर्वजन्मका कोई वैर नहीं है, जो कि आप इस निरपराध द्विजपुत्रका वध करनेके इच्छुक हैं । जो व्यक्ति सदा अपनी कामनाकी पूर्ति के लिये बिना वैरभावके ही किसी प्राणीका वध करता है, दूसरी योनिमें जन्म लेकर वही जीव अपने संहर्ताका वध करता है ॥ ४४-४५३ ॥ इस बालकका पिता अत्यन्त दुष्टात्मा, दुर्बुद्धि तथा पापाचारी है, जिसने धनके लोभमें अपने ही पुत्रको आपके हाथों बेच डाला ॥ ४६३ ॥
लोगों को यह इच्छा रखनी चाहिये कि मेरे बहुतसे पुत्र हों, जिससे उनमें से कोई एक भी पुत्र गयातीर्थ जाय, अश्वमेधयज्ञ करे अथवा नील वृषभ छोड़े ॥ ४७३ ॥
चोदना । व्यवस्थितिस्तेषु विवाहयज्ञसुराग्रहैरासु निवृत्तिरिष्टा ॥ देता है कि जिनमें मनुष्यकी स्वाभाविक प्रवृत्ति नहीं होती । ) संसारमें देखा जाता है कि मैथुन, मांस और मद्यकी ओर प्राणीकी स्वाभाविक प्रवृत्ति हो जाती है । तब उसे उसमें प्रवृत्त करनेके लिये विधान तो हो ही नहीं सकता । ऐसी स्थितिमें विवाह, यज्ञ और सौत्रामणियज्ञके द्वारा ही जो उनके सेवनकी व्यवस्था दी गयी है, उसका अर्थ है लोगोंकी उच्छृंखल प्रवृत्तिका नियन्त्रण, उनका मर्यादामें स्थापन । वास्तवमें उनकी ओरसे लोगोंको हटाना ही श्रुतिको अभीष्ट है । ( श्रीमद्भा ० ११।५ । ११ )