देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 151–160

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 151–160

पृष्ठ 151

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१४२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २७ राज्ञ्युवाच

अहमप्यत्र राजर्षे निपतिष्ये हुताशने ।

दुःखभारासहा देव सह यास्यामि वै त्वया ॥ ७२

त्वया सह मम श्रेयो गमनं नान्यथा भवेत् ।

सह स्वर्गं च नरकं त्वया भोक्ष्यामि मानद ।

श्रुत्वा राजा तदोवाच एवमस्तु पतिव्रते ॥ ७३ ।

रानी बोली- हे राजर्षे! हे देव! अत्यधिक दुःखके भारको सहन करनेमें असमर्थ मैं भी इस आगमें कूद पडूंगी और आपके साथ ही चलूँगी । हे मानद! आपके साथ जानेमें मेरा परम कल्याण है, इसमें सन्देह नहीं है । आपके साथ रहकर मैं स्वर्ग और नरक - सबकुछ भोगूँगी । यह सुनकर राजा बोले - हे पतिव्रते! ऐसा ही हो ॥ ७२-७३ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्रयां संहितायां सप्तमस्कन्धे हरिश्चन्द्रोपाख्याने राज्ञो हुताशनप्रवेशोद्योगवर्णनं नाम षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥

अथ सप्तविंशोऽध्यायः चिता बनाकर राजाका रोहितको उसपर लिटाना और राजा - रानीका भगवतीका ध्यानकर स्वयं भी पुत्रकी चितामें जल जानेको उद्यत होना, ब्रह्माजीसहित समस्त देवताओंका राजाके पास आना, इन्द्रका अमृत वर्षा करके रोहितको जीवित करना और राजा - रानीसे स्वर्ग चलनेके अयोध्यावासियोंके सूत उवाच

ततः कृत्वा चितां राजा आरोप्य तनयं स्वकम् ।

भार्यया सहितो राजा बद्धाञ्जलिपुटस्तदा ॥

चिन्तयन्परमेशानीं शताक्षीं जगदीश्वरीम् ।

पञ्चकोशान्तरगतां पुच्छब्रह्मस्वरूपिणीम् ॥

रक्ताम्बरपरीधानां करुणारससागराम् ।

नानायुधधरामम्बां जगत्पालनतत्पराम् ॥

तस्य चिन्तयमानस्य सर्वे देवाः सवासवाः ।

धर्मं प्रमुखतः कृत्वा समाजग्मुस्त्वरान्विताः ॥

आगत्य सर्वे प्रोचुस्ते राजञ्छृणु महाप्रभो ।

अहं पितामहः साक्षाद्धर्मश्च भगवान्स्वयम् ॥

साध्याः सविश्वे मरुतो लोकपालाः सचारणाः ।

नागाः सिद्धाः सगन्धर्वा रुद्राश्चैव तथाश्विनौ ॥

एते चान्येऽथ बहवो विश्वामित्रस्तथैव च ।

विश्वत्रयेण यो मैत्रीं कर्तुमिच्छति धर्मतः ॥

विश्वामित्रः स तेऽभीष्टमाहर्तुं सम्यगिच्छति । लिये आग्रह करना, राजाका सम्पूर्ण साथ स्वर्ग जानेका निश्चय सूतजी बोले- तत्पश्चात् राजा हरिश्चन्द्रने चिता तैयार करके उसपर अपने पुत्रको लिटा दिया और भार्यासहित १ दोनों हाथ जोड़कर वे शताक्षी ( सौ नेत्रोंवाली ) परमेश्वरी, जगत्की अधिष्ठात्री, पंचकोशके भीतर सदा विराजमान रहनेवाली, पुच्छब्रह्मस्वरूपिणी, रक्तवर्णका वस्त्र धारण २ करनेवाली, करुणारसकी सागरस्वरूपा, अनेक प्रकारके आयुध धारण करनेवाली और जगत्की रक्षा करनेमें निरन्तर तत्पर जगदम्बाका ध्यान करने लगे ॥ १ - -३ ॥ ३ इस प्रकार ध्यानमग्न उन राजा हरिश्चन्द्रके समक्ष इन्द्रसहित सभी देवता धर्मको आगे करके तुरन्त उपस्थित हुए ॥४ ॥

वहाँ आकर उन सबने कहा - हे राजन्! हे महाप्रभो! सुनिये, [ ब्रह्माने कहा - ] मैं साक्षात् ५ पितामह ब्रह्मा हूँ और ये स्वयं भगवान् धर्मदेव हैं; इसी प्रकार साध्यगण, विश्वेदेव, मरुद्गण, चारणोंसहित लोकपाल, नाग, सिद्ध, गन्धर्वोंके साथ रुद्रगण, दोनों ६ अश्विनीकुमार, महर्षि विश्वामित्र तथा अन्य ये बहुतसे देवता भी यहाँ उपस्थित हैं । जो धर्मपूर्वक तीनों लोकोंके साथ मित्रता करनेकी इच्छा रखते हैं, ७ वे विश्वामित्र सम्यक् प्रकारसे आपका अभीष्ट सिद्ध करनेकी अभिलाषा प्रकट कर रहे हैं ॥ ५–७३ ॥

पृष्ठ 152

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अ ० २७ ] धर्म उवाच मा राजन् साहसं कार्षीर्धर्मोऽहं त्वामुपागतः तितिक्षादमसत्त्वाद्यैस्त्वद्गुणैः परितोषितः । इन्द्र उवाच हरिश्चन्द्र महाभाग प्राप्तः शक्रोऽस्मि तेऽन्तिकम् ॥

त्वया भार्यापुत्रेण जिता लोकाः सनातनाः ।

आरोह त्रिदिवं राजन् भार्यापुत्रसमन्वितः ॥

सुदुष्प्रापं नरैरन्यैर्जितमात्मीयकर्मभिः । सूत उवाच ततोऽमृतमयं वर्षमपमृत्युविनाशनम् ॥

इन्द्रः प्रासृजदाकाशाच्चितामध्यगते शिशौ ।

पुष्पवृष्टिश्च महती दुन्दुभिस्वन एव च ॥

समुत्तस्थौ मृतः पुत्रो राज्ञस्तस्य महात्मनः ।

सुकुमारतनुः स्वस्थः प्रसन्नः प्रीतमानसः ॥

ततो राजा हरिश्चन्द्रः परिष्वज्य सुतं तदा ।

सभार्यः स्वश्रिया युक्तो दिव्यमाल्याम्बरावृतः ॥

स्वस्थः सम्पूर्णहृदयो मुदा परमयावृतः ।

बभूव तत्क्षणादिन्द्रो भूपं चैवमभाषत ॥

सभार्यस्त्वं सपुत्रश्च स्वर्लोकं सद्गतिं पराम् ।

समारोह महाभाग निजानां कर्मणां फलम् ॥

हरिश्चन्द्र उवाच

देवराजाननुज्ञातः स्वामिना श्वपचेन हि ।

अकृत्वा निष्कृतिं तस्य नारोक्ष्ये वै सुरालयम् ॥

धर्म उवाच

तवैवं भाविनं क्लेशमवगम्यात्ममायया ।

आत्मा श्वपचतां नीतो दर्शितं तच्च पक्कणम् ॥

सप्तम स्कन्ध १४३ धर्म बोले - हे राजन्! आप ऐसा साहस मत ॥ ८ कीजिये । आपमें जो सहनशीलता, इन्द्रियोंपर नियन्त्रण रखनेकी शक्ति तथा सत्त्व आदि गुण विद्यमान हैं; उनसे परम सन्तुष्ट होकर मैं साक्षात् धर्म आपके पास आया हूँ ॥८ ॥

इन्द्र बोले – हे महाभाग हरिश्चन्द्र! मैं इन्द्र आपके समक्ष उपस्थित हूँ । हे राजन्! आज स्त्री-पुत्रसहित आपने सनातन लोकोंपर विजय प्राप्त कर १० ली है । अतः अब आप अपनी भार्या तथा पुत्रको साथमें लेकर अपने श्रेष्ठ कर्मोंके द्वारा प्राप्त करनेयोग्य तथा अन्य लोगोंके लिये अत्यन्त दुर्लभ स्वर्गके लिये प्रस्थान कीजिये ॥ ९ -१० ॥ ११ सूतजी बोले- तत्पश्चात् इन्द्रने आकाशसे चिताके मध्यभागमें सोये हुए शिशु रोहितपर अपमृत्युका नाश करनेवाली अमृतमयी वृष्टि आरम्भ कर दी । उस १२ समय पुष्पोंकी विपुल वर्षा तथा दुन्दुभियोंकी तेज ध्वनि होने लगी ॥ ११-१२ ॥ महान् आत्मावाले उन राजा हरिश्चन्द्रके १३ | सुकुमार अंगोंवाले मृत पुत्र रोहित स्वस्थ, प्रसन्न तथा आनन्दचित्त हो गये । तब राजाने अपने पुत्रको हृदयसे लगा लिया । तत्पश्चात् पत्नीसहित वे राजा हरिश्चन्द्र १४ दिव्य मालाओं तथा वस्त्रोंसे सहसा अलंकृत हो गये । उनके मनमें शान्ति छा गयी, उनके हृदय हर्षसे भर गये और वे परम आनन्दसे समन्वित हो गये । उस १५ समय इन्द्रने राजासे कहा- हे महाभाग! अब आप स्त्री- पुत्रसहित स्वर्गलोकके लिये प्रस्थान कीजिये । आपने परम सद्गति प्राप्त की है, यह आपके अपने १६ ही कर्मोंका फल है॥१३–१६ ॥ हरिश्चन्द्र बोले – हे देवराज! अपने स्वामी चाण्डालसे बिना आज्ञा प्राप्त किये और बिना उनका प्रत्युपकार किये, मैं स्वर्गलोक नहीं १७ जाऊँगा ॥ १७ ॥

धर्म बोले- आपके भावी क्लेशके सम्बन्धमें विचार करके मैं ही अपनी मायाके प्रभावसे चाण्डाल बन गया था । आपको जो चाण्डालका घर दिखायी १८ । पड़ा था, वह भी मेरी माया ही थी ॥ १८ ॥

पृष्ठ 153

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१४४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २७ इन्द्र उवाच

प्रार्थ्यते यत्परं स्थानं समस्तैर्मनुजैर्भुवि ।

तदारोह हरिश्चन्द्र स्थानं पुण्यकृतां नृणाम् ॥

हरिश्चन्द्र उवाच

देवराज नमस्तुभ्यं वाक्यं चेदं निबोध मे ।

मच्छोकमग्नमनसः कौसले नगरे नराः ॥

तिष्ठन्ति तानपास्यैवं कथं यास्याम्यहं दिवम् ।

ब्रह्महत्या सुरापानं गोवधः स्त्रीवधस्तथा ॥

तुल्यमेभिर्महत्पापं भक्तत्यागादुदाहृतम् ।

भजन्तं भक्तमत्याज्यं त्यजतः स्यात्कथं सुखम् ॥

तैर्विना न प्रयास्यामि तस्माच्छक्र दिवं व्रज ।

यदि ते सहिताः स्वर्गं मया यान्ति सुरेश्वर ॥

ततोऽहमपि यास्यामि नरकं वापि तैः सह । इन्द्र उवाच बहूनि पुण्यपापानि तेषां भिन्नानि वै नृप ॥ कथं सङ्घातभोज्यं त्वं भूप स्वर्गमभीप्ससि । हरिश्चन्द्र उवाच भुट्टे शक्र नृपो राज्यं प्रभावात्प्रकृतेर्ध्रुवम् ॥

यजते च महायज्ञैः कर्म पूर्तं करोति च ।

तच्च तेषां प्रभावेण मया सर्वमनुष्ठितम् ॥

उपदादान्न सन्त्यक्ष्ये तानहं स्वर्गलिप्सया ।

तस्माद्यन्मम देवेश किञ्चिदस्ति सुचेष्टितम् ॥

दत्तमिष्टमथो जप्तं सामान्यं तैस्तदस्तु नः ।

बहुकालोपभोज्यं च फलं यन्मम कर्मगम् ॥

तदस्तु दिनमप्येकं तैः समं त्वत्प्रसादतः । इन्द्र बोले - हे हरिश्चन्द्र! पृथ्वीपर रहनेवाले मनुष्य जिस श्रेष्ठ स्थानकी प्राप्तिहेतु कामना करते हैं, १ ९ पुण्यात्मा पुरुषोंके उस पवित्र स्थानके लिये अब आप प्रस्थान कीजिये ॥ १ ९ ॥ हरिश्चन्द्र बोले - हे देवराज! आपको नमस्कार है । अब मेरी एक बात सुन लीजिये । अयोध्या नगरमें रहनेवाले सभी मानव मेरे शोक सन्तप्त मनवाले हैं, २० उन्हें यहाँ छोड़कर मैं स्वर्ग कैसे जाऊँगा? ब्रह्महत्या, सुरापान, गोवध और स्त्रीहत्या - जैसे महापातकोंके ही समान अपने भक्तोंका त्याग भी महान् पाप बताया २१ गया है । श्रद्धालु भक्त त्याज्य नहीं होता है, उसे त्यागनेवालेको सुख भला कैसे मिल सकता है? अतएव हे इन्द्र! उन्हें छोड़कर मैं स्वर्ग नहीं जाऊँगा, २२ अब आप स्वर्ग प्रस्थान करें । हे सुरेन्द्र! यदि मेरे साथ वे भी स्वर्ग चलें तो मैं स्वर्ग चल सकता हूँ । उनके साथ यदि नरकमें जाना हो तो मैं वहाँ भी चला २३ जाऊँगा ॥ २० – २३३ ॥ इन्द्र बोले - हे राजन्! उन अयोध्याके नागरिकोंके भिन्न - भिन्न प्रकारके पुण्य और पाप हैं । हे भूप! समस्त जन - समूहके लिये स्वर्ग उपभोगका २४ साधन हो जाय - ऐसी इच्छा आप क्यों प्रकट कर रहे हैं? ॥ २४३ ॥

हरिश्चन्द्र बोले - हे इन्द्र! प्रजाके प्रभावसे ही राजा राज्यका भोग करता है, यह सुनिश्चित है और उन्हींकी सहायतासे ही राजा बड़े - बड़े यज्ञोंके २५ द्वारा देवताओंकी उपासना करता है और पूर्तकर्म ( कुएँ - तालाब आदिका निर्माण ) करता है । मैंने भी उन्हींके बलपर यह सब कृत्य किया है । उनके २६ द्वारा की गयी सहायताके कारण मैं स्वर्गके लोभसे उनका त्याग नहीं करूँगा । अतः हे देवेश! मैंने जो कुछ भी उत्तम कार्य किया हो; दान, यज्ञ और जप २७ आदि किया हो, उसका फल हमें उन सभीके साथ प्राप्त हो; और मेरे उत्तम कर्मके फलस्वरूप बहुत समयतक भोग करनेका जो फल मिल रहा हो, वह २८ भले ही एक दिनके लिये हो, उन नागरिकोंके साथ भोगनेके लिये मुझे आपकी कृपासे मिल जाय ॥ २५–२८३ ॥

पृष्ठ 154

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अ ० २७ ] सप्तम सूत उवाच एवं भविष्यतीत्युक्त्वा शक्रस्त्रिभुवनेश्वरः ॥ २ ९

प्रसन्नचेता धर्मश्च विश्वामित्रश्च गाधिजः ।

गत्वा तु नगरं सर्वे चातुर्वर्ण्यसमाकुलम् ॥ ३०

हरिश्चन्द्रस्य निकटे प्रोवाच विबुधाधिपः ।

आगच्छन्तु जनाः शीघ्रं स्वर्गलोकं सुदुर्लभम् ॥ ३१

धर्मप्रसादात्सम्प्राप्तं सर्वैर्युष्माभिरेव तु ।

हरिश्चन्द्रोऽपि तान्सर्वाञ्जनान्नगरवासिनः ॥ ३२

प्राह राजा धर्मपरो दिवमारुह्यतामिति । सूत उवाच तदिन्द्रस्य वचः श्रुत्वा प्रीतास्तस्य च भूपतेः ॥ ३३

ये संसारेषु निर्विण्णास्ते धुरं स्वसुतेषु वै ।

कृत्वा प्रहृष्टमनसो दिवमारुरुहुर्जनाः ॥ ३४

विमानवरमारूढाः सर्वे भास्वरविग्रहाः ।

तदा सम्भूतहर्षास्ते हरिश्चन्द्रश्च पार्थिव: ॥ ३५

राज्येऽभिषिच्य तनयं रोहिताख्यं महामनाः ।

अयोध्याख्ये पुरे रम्ये हृष्टपुष्टजनान्विते ॥ ३६

तनयं सुहृदश्चापि प्रतिपूज्याभिनन्द्य च ।

पुण्येन लभ्यां विपुलां देवादीनां सुदुर्लभाम् ॥ ३७

सम्प्राप्य कीर्तिमतुलां विमाने स महीपतिः ।

आसाञ्चक्रे कामगमे क्षुद्रघण्टाविराजिते ॥ ३८

ततस्तर्हि समालोक्य श्लोकमन्त्रं तदा जगौ ।

दैत्याचार्यो महाभागः सर्वशास्त्रार्थतत्त्ववित् ॥ ३ ९

शुक्र उवाच

अहो तितिक्षामाहात्म्यमहो दानफलं महत् ।

यदागतो हरिश्चन्द्रो महेन्द्रस्य सलोकताम् ॥ ४०

सूत उवाच

एतत्ते सर्वमाख्यातं हरिश्चन्द्रस्य चेष्टितम् ।

यः शृणोति च दुःखार्तः स सुखं लभतेऽन्वहम् ॥ ४१

स्कन्ध १४५ सूतजी बोले- त्रिलोकीके स्वामी इन्द्रने ‘ ऐसा ही होगा ' – इस प्रकार कहा । इससे धर्म और गाधिपुत्र विश्वामित्रके मनमें प्रसन्नता छा गयी । तदनन्तर वे सभी लोग चारों वर्णोंके लोगोंसे भरी हुई अयोध्या नगरीमें पहुँचे । वहाँपर सुरपति इन्द्रने राजा हरिश्चन्द्रके सन्निकट आकर कहा - हे नागरिको! अब आप सभी लोग परम दुर्लभ स्वर्गलोक चलिये । धर्मके फलस्वरूप ही आप सभीको यह स्वर्ग सुलभ हुआ है | २ ९ – ३१३ ॥ तत्पश्चात् धर्मपरायण राजा हरिश्चन्द्रने उन सभी नगरवासियोंसे कहा कि आप सभी लोग मेरे साथ स्वर्गलोक प्रस्थान कीजिये ॥ ३२३ ॥

सूतजी बोले – देवराज इन्द्र तथा राजा हरिश्चन्द्रका वचन सुनकर सभी नागरिक प्रफुल्लित हो उठे । जो नागरिक सांसारिकतासे विरक्त हो चुके थे, वे गृहस्थीका भार अपने पुत्रोंको सौंपकर प्रसन्न मनसे स्वर्ग जानेके लिये तैयार हो गये । वे सभी लोग उत्तम विमानोंपर चढ़ गये । उनके शरीरसे सूर्यके समान तेज निकलने लगा । उस समय वे परम आनन्दित हो गये । उदार चित्तवाले राजा हरिश्चन्द्र भी हृष्ट - पुष्ट नागरिकोंसे युक्त अयोध्या नामक रमणीक पुरीमें अपने रोहित नामसे प्रसिद्ध पुत्रका राज्याभिषेक करके अपने पुत्र तथा सुहृदोंका सम्मान-पूजन करके और पुण्यसे प्राप्त होनेवाली तथा देवता आदिके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ महान् कीर्तिको प्राप्त करके छोटी - छोटी घण्टियोंसे सुशोभित तथा इच्छाके अनुसार चलनेवाले विमानपर बैठ गये॥३३–३८ ॥ यह सब देखकर दैत्योंके आचार्य एवं सभी शास्त्रोंके अर्थों तथा तत्त्वोंको जाननेवाले महाभाग शुक्राचार्यने यह श्लोकरूपी मन्त्र उच्चारित किया -॥३ ९ ॥ शुक्राचार्य बोले- अहो, सहिष्णुताकी ऐसी महिमा और दानका इतना महान् फल कि राजा हरिश्चन्द्रने इन्द्रका लोक प्राप्त कर लिया ॥ ४० ॥

सूतजी बोले- इस प्रकार राजा हरिश्चन्द्रके सम्पूर्ण चरित्रका वर्णन मैंने आपलोगोंसे कर दिया । जो दुःखी प्राणी इस आख्यानका श्रवण करता है, वह । सदा सुखी रहता है । इसका श्रवण करनेसे स्वर्गकी

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१४६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २८ स्वर्गार्थी प्राप्नुयात्स्वर्गं सुतार्थी सुतमाप्नुयात् । इच्छा रखनेवाला स्वर्ग प्राप्त कर लेता है, पुत्रकी अभिलाषा रखनेवाला पुत्र प्राप्त कर लेता है, पत्नीकी कामना करनेवाला पत्नी प्राप्त कर लेता है और राज्यकी वांछा रखनेवाला राज्य प्राप्त कर भार्यार्थी प्राप्नुयाद्भार्यां राज्यार्थी राज्यमाप्नुयात् ॥ ४२ | लेता है ॥ ४१-४२ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे हरिश्चन्द्राख्यान श्रवणफलवर्णनं नाम सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥

अथाष्टाविंशोऽध्यायः दुर्गम दैत्यकी तपस्या; वर - प्राप्ति तथा अत्याचार, देवताओंका भगवतीकी प्रार्थना करना, भगवतीका शताक्षी और शाकम्भरीरूपमें प्राकट्य, दुर्गमका वध और देवगणोंद्वारा भगवतीकी स्तुति जनमेजय उवाच

विचित्रमिदमाख्यानं हरिश्चन्द्रस्य कीर्तितम् ।

शताक्षीपादभक्तस्य राजर्षेर्धार्मिकस्य च ॥ १

शताक्षी सा कुतो जाता देवी भगवती शिवा ।

तत्कारणं वद मुने सार्थकं जन्म मे कुरु ॥ २

को हि देव्या गुणाञ्छृण्वंस्तृप्तिं यास्यति शुद्धधीः ।

पदे पदेऽश्वमेधस्य फलमक्षय्यमश्नुते ॥ ३

व्यास उवाच शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि शताक्षीसम्भवं शुभम् । जनमेजय बोले- हे मुने! भगवती शताक्षीके चरणोंके उपासक एवं धर्मपरायण राजर्षि हरिश्चन्द्रकी यह बड़ी अद्भुत कथा आपने कही । हे मुने! वे कल्याणमयी देवी भगवती किस प्रकारसे शताक्षी ( सौ नेत्रोंवाली ) हुईं? उसका कारण बताइये । मेरे जन्मको सार्थक कीजिये | कौन ऐसा विमल बुद्धिवाला मनुष्य होगा, जो भगवतीके गुणोंका श्रवण करके पूर्णरूपसे तृप्त हो जाय! इसे सुननेसे पद - पदपर अश्वमेध-यज्ञका फल मनुष्यको प्राप्त होता है ॥ १-३ ॥ व्यासजी बोले- हे राजन्! मैं शताक्षीकी मंगलकारिणी उत्पत्तिका वर्णन करता हूँ, आप सुनिये । आपसदृश देवीभक्तके प्रति कोई भी बात मेरे लिये तवावाच्यं न मे किञ्चिद्देवीभक्तस्य विद्यते ॥ ४

दुर्गमाख्यो महादैत्यः पूर्वं परमदारुणः ।

हिरण्याक्षान्वये जातो रुरुपुत्रो महाखलः ॥ ५

देवानां तु बलं वेदो नाशे तस्य सुरा अपि ।

नंक्ष्यन्त्येव न संदेहो विधेयं तावदेव तत् ॥ ६

विमृश्यैतत्तपश्चर्यां गतः कर्तुं हिमालये ।

ब्रह्माणं मनसा ध्यात्वा वायुभक्षो व्यतिष्ठत ॥ ७

सहस्रवर्षपर्यन्तं चकार परमं तपः ।

तेजसा तस्य लोकास्तु सन्तप्ताः ससुरासुराः ॥ ८

अवाच्य नहीं है ॥ ४ ॥

प्राचीन कालकी बात है - दुर्गम नामक एक अत्यन्त भयंकर महादैत्य था । हिरण्याक्षके वंशमें उत्पन्न वह महान् दुष्ट दुर्गम रुरुका पुत्र था ॥५ ॥

' देवताओंका बल वेद है । उस वेदके नष्ट हो जानेपर देवताओंका भी नाश हो जायगा, इसमें सन्देह नहीं है । अत: पहले वही ( वेदनाश ) किया जाना चाहिये ' – ऐसा सोचकर वह तप करनेके लिये हिमालयपर्वतपर चला गया । वहाँपर मनमें ब्रह्माजीका ध्यान करके उसने केवल वायु पीकर रहते हुए एक हजार वर्षतक कठोर तपस्या की । उसके तेजसे देव-| दानवसहित समस्त प्राणी सन्तप्त हो उठे॥६–८ ॥

पृष्ठ 156

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अ ० २८ ] सप्तम

ततः प्रसन्नो भगवान् हंसारूढश्चतुर्मुखः ।

ययौ तस्मै वरं दातुं प्रसन्नमुखपङ्कजः ॥

समाधिस्थं मीलिताक्षं स्फुटमाह चतुर्मुखः ।

वरं वरय भद्रं ते यस्ते मनसि वर्तते ॥ १०

तवाद्य तपसा तुष्टो वरदेशो ऽहमागतः ।

श्रुत्वा ब्रह्ममुखाद्वाणीं व्युत्थितः स समाधितः ॥ १ ९

पूजयित्वा वरं वने वेदान्देहि सुरेश्वर ।

त्रिषु लोकेषु ये मन्त्रा ब्राह्मणेषु सुरेष्वपि ॥ १२

विद्य तु सान्निध्ये मम सन्तु महेश्वर ।

बलं च देहि येन स्याद्देवानां च पराजयः ॥ १३

इति तस्य वचः श्रुत्वा तथास्त्विति वचो वदन् ।

जगाम सत्यलोकं तु चतुर्वेदेश्वरः परः ॥ १४

ततः प्रभृति विप्रैस्तु विस्मृता वेदराशयः ।

स्नानसन्ध्यानित्यहोमश्राद्धयज्ञजपादयः ॥ १५

विलुप्ता धरणीपृष्ठे हाहाकारो महानभूत् ।

किमिदं किमिदं चेति विप्रा ऊचुः परस्परम् ॥ १६

वेदाभावात्तदस्माभिः कर्तव्यं किमतः परम् ।

इति भूमौ महानर्थे जाते परमदारुणे ॥ १७

निर्जराः सजरा जाता हविर्भागाद्यभावतः ।

रुरोध स तदा दैत्यो नगरीममरावतीम् ॥ १८

अशक्तास्तेन ते योद्धुं वज्रदेहासुरेण च ।

पलायनं तदा कृत्वा निर्गता निर्जराः क्वचित् ॥ १ ९

निलयं गिरिदुर्गेषु रत्नसानुगुहासु च ।

संस्थिताः परमां शक्तिं ध्यायन्तस्ते पराम्बिकाम् ॥ २०

स्कन्ध १४७ तब [ उसके तपसे ] प्रसन्न होकर विकसित कमलके समान सुन्दर मुखवाले चतुर्मुख भगवान् ब्रह्मा हंसपर आरूढ़ होकर उसे वर देनेके लिये वहाँ गये॥९॥

नेत्र मूँदकर समाधिकी स्थितिमें बैठे हुए उस दैत्यसे चार मुखवाले ब्रह्माजीने स्पष्ट वाणीमें कहा-' तुम्हारा कल्याण हो । तुम्हारे मनमें जो भी इच्छा हो, उसे वरके रूपमें माँग लो । वरदाताओंका स्वामी मैं तुम्हारी तपस्यासे प्रसन्न होकर इस समय उपस्थित हुआ हूँ'॥१०३ ॥

ब्रह्माजीके मुखसे यह वाणी सुनकर वह दैत्य समाधिसे उठ खड़ा हुआ और उसने पूजा करके वर माँगते हुए कहा - हे सुरेश्वर! मुझे सभी वेद देनेकी कृपा कीजिये । साथ ही हे महेश्वर! तीनों लोकों में ब्राह्मणों और देवताओंके पास जो मन्त्र हों, वे सब मेरे पास आ जायँ और मुझे वह बल दीजिये, जिससे मेरे द्वारा देवताओंकी पराजय हो जाय ॥ ११–१३ ॥ उसकी यह बात सुनकर चारों वेदोंके परम अधिष्ठाता ब्रह्माजी ' ऐसा ही हो ' - यह वचन कहते हुए सत्यलोक चले गये ॥ १४ ॥

उसी समयसे ब्राह्मणोंको समस्त वेद विस्मृत हो गये । स्नान, संध्या, नित्य होम, श्राद्ध, यज्ञ और जप आदिका लोप हो गया, जिससे भूमण्डलमें बड़ा हाहाकार मच गया । ब्राह्मण आपसमें कहने लगे— ' यह क्या हो गया, यह क्या हो गया; अब इसके बाद वेदके अभावकी स्थितिमें हमलोगोंको क्या करना चाहिये? ' ॥ १५-१६३ ॥ इस प्रकार जगत्में अत्यन्त भयंकर तथा घोर अनर्थ उत्पन्न होनेपर हविभाग न मिलनेके कारण सभी देवता जरारहित होते हुए भी जराग्रस्त हो गये । तब उसने देवताओंकी नगरी अमरावतीको घेर लिया ॥ १७ - १८ ॥ देवतागण वज्र के समान शरीरवाले उस दैत्य के साथ युद्ध करनेमें असमर्थ हो गये । अतः भागकर वे देवता पर्वतकी कन्दराओं और सुमेरुपर्वतकी गुफाओं में स्थान बनाकर परम शक्तिस्वरूपा पराम्बिकाका ध्यान । करते हुए रहने लगे ॥१ ९ -२० ॥

पृष्ठ 157

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१४८

अग्नौ होमाद्यभावात्तु वृष्ट्यभावोऽप्यभून्नृप ।

वृष्टेरभावे संशुष्कं निर्जलं चापि भूतलम् ॥

कूपवापीतडागाश्च सरितः शुष्कतां गताः अनावृष्टिरियं राजन्नभूच्च शतवार्षिकी मृताः प्रजाश्च बहुधा गोमहिष्यादयस्तथा । गृहे गृहे मनुष्याणामभवच्छवसंग्रहः

अनर्थे त्वेवमुद्भूते ब्राह्मणाः शान्तचेतसः ।

गत्वा हिमवतः पार्श्वे रिराधयिषवः शिवाम् ॥

समाधिध्यानपूजाभिर्देवीं तुष्टुवुरन्वहम् । निराहारास्तदासक्तास्तामेव शरणं ययुः दयां कुरु महेशानि पामरेषु जनेषु हि । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २८ हे राजन्! अग्निमें हवन आदि न होने के २१ कारण वर्षाका भी अभाव हो गया । वर्षाके अभावमें भूतल शुष्क तथा जलविहीन हो गया । कुएँ, । बावलियाँ, तालाब और नदियाँ - ये सभी सूख गये । ॥ २२ हे राजन्! यह अनावृष्टि सौ वर्षोंतक बनी रही, जिससे बहुत - सी प्रजाएँ और गाय - भैंस आदि पशु मर गये । इस प्रकार घर - घरमें मनुष्योंके शवके ढेर ॥ २३ लग गये॥२१–२३ ॥ इस प्रकार अनर्थके उपस्थित होनेपर शान्त चित्तवाले वे ब्राह्मण कल्याणस्वरूपिणी जगदम्बाक आराधना करनेके विचारसे हिमालयपर्वतपर २४ जाकर समाधि, ध्यान और पूजाके द्वारा भगवतीको निरन्तर प्रसन्न करने लगे । वे निराहार रहते हुए एकमात्र उन्हीं भगवतीमें चित्त लगाकर उनके ॥ २५ शरणापन्न हो गये [ और उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगे-- ] ॥ २४-२५ ॥ हे महेश्वरि! हम असहाय जनोंपर दया कीजिये । सर्वापराधयुक्तेषु नैतच्छ्लाघ्यं तवाम्बिके ॥ २६ | हे अम्बिके! समस्त अपराधोंसे युक्त हमलोगोंपर कृपा कोपं संहर देवेशि सर्वान्तर्यामिरूपिणि । त्वया यथा प्रेर्यतेऽयं करोति स तथा जनः नान्या गतिर्जनस्यास्य किं पश्यसि पुनः पुनः यथेच्छसि तथा कर्तुं समर्थासि महेश्वरि समुद्धर महेशानि संकटात्परमोत्थितात् । जीवनेन विनास्माकं कथं स्यात्स्थितिरम्बिके प्रसीद त्वं महेशानि प्रसीद जगदम्बिके अनन्तकोटिब्रह्माण्डनायिके ते नमो नमः ॥ नमः कूटस्थरूपायै चिद्रूपायै नमो नमः नमो वेदान्तवेद्यायै भुवनेश्यै नमो नमः नेति नेतीति वाक्यैर्या बोध्यते सकलागमैः तां सर्वकारणां देवीं सर्वभावेन सन्नताः न करना आपके लिये शोभनीय नहीं है । सभीके भीतर निवास करनेवाली हे देवेश्वरि! आप अपना कोप दूर ॥ २७ । कीजिये । आप प्राणीको जैसी प्रेरणा देती हैं, वैसा ही वह करता है । इस मानवकी अन्य गति है ही नहीं ॥ हे महेश्वरि! आप बार- बार क्या देख रही हैं? आप ॥ २८ जैसा चाहें, वैसा करनेमें पूर्ण समर्थ हैं । हे महंशानि! इस उत्पन्न हुए घोर संकटसे हमारा उद्धार कीजिये । हे अम्बिके! जीवनी शक्तिके अभावमें हमारी स्थिति ॥ २ ९ कैसे रह सकती है? हे महेश्वरि! आप प्रसन्न हो जाइये । हे जगदम्बिके! आप प्रसन्न हो जाइये ॥ अनन्तकोटि ब्रह्माण्डकी अधीश्वरि! आपको बार - बार ३० नमस्कार है । कूटस्थरूपिणी देवीको नमस्कार है, चिद्रूपा देवीको बार- बार नमस्कार है, वेदान्तोंके । द्वारा ज्ञात होनेवालीको नमस्कार है और अखिल ॥ ३१ भुवनकी स्वामिनीको बार- बार नमस्कार है । सम्पूर्ण आगमशास्त्र ' नेति नेति ' इन वचनोंसे जिनका ज्ञान । कराते हैं, हम सब प्रकारसे उन सर्वकारण - स्वरूपिणी

॥ ३२ भगवतीके शरणागत हैं । २६ – ३२ ॥

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अ ० २८ ]

इति सम्प्रार्थिता देवी भुवनेशी महेश्वरी ।

अनन्ताक्षिमयं रूपं दर्शयामास पार्वती ॥

नीलाञ्जनसमप्रख्यं नीलपद्मायतेक्षणम् ।

सुकर्कशसमोत्तुङ्गवृत्तपीनघनस्तनम् ॥

बाणमुष्टिं च कमलं पुष्पपल्लवमूलकान् ।

शाकादीन्फलसंयुक्ताननन्तरससंयुतान् ॥

क्षुत्तृड्जरापहान् हस्तैर्बिभ्रती च महाधनुः ।

सर्वसौन्दर्यसारं तद्रूपं लावण्यशोभितम् ॥

कोटिसूर्यप्रतीकाशं करुणारससागरम् ।

दर्शयित्वा जगद्धात्री सानन्तनयनोद्भवा ॥

मोचयामास लोकेषु वारिधाराः सहस्रशः ।

नवरात्रं महावृष्टिरभून्नेत्रोद्भवैर्जलैः ॥

दुःखितान्वीक्ष्य सकलान्नेत्राश्रूणि विमुञ्चती ।

तर्पितास्तेन ते लोका ओषध्यः सकला अपि ॥

नदीनदप्रवाहास्तैर्जलैः समभवन्नृप ।

निलीय संस्थिताः पूर्वं सुरास्ते निर्गता बहिः ॥

मिलित्वा ससुरा विप्रा देवीं समभितुष्टुवुः । नमो वेदान्तवेद्ये ते नमो ब्रह्मस्वरूपिणि ।

स्वमायया सर्वजगद्विधात्र्यै ते नमो नमः ।

भक्तकल्पद्रुमे देवि भक्तार्थं देहधारिणि ॥

नित्यतृप्ते निरुपमे भुवनेश्वरि ते नमः ।

अस्मच्छान्त्यर्थमतुलं लोचनानां सहस्रकम् ॥

त्वया यतो धृतं देवि शताक्षी त्वं ततो भव ।

क्षुधया पीडिता मातः स्तोतुं शक्तिर्न चास्ति नः ॥

कृपां कुरु महेशानि वेदानप्याहराम्बिके । सप्तम स्कन्ध १४ ९ इस प्रकार ब्राह्मणोंके प्रार्थना करनेपर समस्त ३३ भुवनपर शासन करनेवाली भगवती भुवनेशी महेश्वरी पार्वतीने उन्हें अनन्त नेत्रोंसे युक्त अपना रूप दिखाया । उनका विग्रह काले कज्जलके सदृश था, नीलकमलके ३४ समान विशाल नेत्रोंसे सम्पन्न था और अत्यन्त कठोर, समान आकार - प्रकारवाले, उन्नत, गोल, स्थूल एवं सुडौल स्तनोंसे सुशोभित था । वे अपने हाथोंमें ३५ मुट्ठीभर बाण, विशाल धनुष, कमल, पुष्प - पल्लव, जड़ तथा फलोंसे सम्पन्न, अनन्त रससे युक्त तथा भूख - प्यास और बुढ़ापेको दूर करनेवाले शाक आदि ३६ धारण किये हुए थीं ॥ ३३ – ३५३ ॥ सम्पूर्ण सुन्दरताके सारस्वरूप, कमनीयता - सम्पन्न, करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान और करुणारस के सागरस्वरूप उस विग्रहका दर्शन कराकर अनन्त ३७ नेत्रोंके साथ प्रकट वे जगद्धात्री भगवती समस्त लोकोंमें अपनी आँखोंसे सहस्रों जलधाराएँ गिराने लगीं । इस तरह उनके नेत्रोंसे निकले हुए जलसे नौ ३८ राततक महान् वृष्टि होती रही ॥ ३६-३८ ॥ समस्त प्राणियोंको दुःखी देखकर भगवती अपने नेत्रोंसे आँसू गिराती रहीं, उससे वे सभी प्राणी और ३ ९ सभी औषधियाँ भी तृप्त हो गयीं । हे राजन्! उस वृष्टिके द्वारा सभी नदियाँ और समुद्र जलसे परिपूर्ण हो गये । पहले जो देवता छिपकर रह रहे थे, वे अब बाहर ४० निकल आये । इसके बाद सभी देवता और ब्राह्मण एक साथ मिलकर देवीकी स्तुति करने लगे - ॥ ३ ९ -४०३ ॥ हे वेदान्तवेद्ये! आपको नमस्कार है । हे ४१ ब्रह्मस्वरूपिणि! आपको नमस्कार है । अपनी मायासे सम्पूर्ण जगत्की रचना करनेवाली, भक्तोंके लिये देह धारण करनेवाली तथा कल्पवृक्षके समान उनके मनोरथ ४२ पूर्ण करनेवाली हे देवि! आपको बार- बार नमस्कार है । सदा सन्तुष्ट रहनेवाली और सभी उपमाओंसे रहित हे भुवनेश्वरि! आपको नमस्कार है । हे देवि! हमारी ४३ शान्तिके लिये आपने सहस्र नेत्रोंसे सम्पन्न अनुपम रूप धारण किया है, अतः आप ' शताक्षी ' नामसे विख्यात हों । हे जननि! भूखसे अत्यन्त पीडित होनेके कारण ४४ आपकी स्तुति करनेके लिये हमलोगों में सामर्थ्य नहीं है । महेशानि! हे अम्बिके! अब आप कृपा कीजिये और हमें वेदोंको प्राप्त कराइये ॥ ४१ - ४४३ ॥

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१५० व्यास उवाच इति तेषां वचः श्रुत्वा शाकान्स्वकरसंस्थितान् ॥

स्वादूनि फलमूलानि भक्षणार्थं ददौ शिवा ।

नानाविधानि चान्नानि पशुभोज्यानि यानि च ॥

काम्यानन्तरसैर्युक्तान्यानवीनोद्भवं ददौ ।

शाकम्भरीति नामापि तद्दिनात्समभून्नृप ॥

ततः कोलाहले जाते दूतवाक्येन बोधितः ।

ससैन्यः सायुधो योद्धुं दुर्गमाख्योऽसुरो ययौ ॥

सहस्त्राक्षौहिणीयुक्तः शरान्मुञ्च॑स्त्वरान्वितः ।

रुरोध देवसैन्यं तद्यद्देव्यग्रे स्थितं पुरा ॥

तथा विप्रगणं चैव रोधयामास सर्वतः ।

ततः किलकिला शब्दः समभूद्देवमण्डले ॥

त्राहि त्राहीति वाक्यानि प्रोचुः सर्वे द्विजामराः ।

ततस्तेजोमयं चक्रं देवानां परितः शिवा ॥

चकार रक्षणार्थाय स्वयं तस्माद् बहिः स्थिता ।

ततः समभवद्युद्धं देव्या दैत्यस्य चोभयोः ॥

शरवर्षसमाच्छन्नं सूर्यमण्डलमद्भुतम् ।

परस्परशरोद्घर्षसमुद्भूताग्निसुप्रभम् ॥

कठोरज्याटणत्कारबधिरीकृतदिक्तटम् I ततो देवीशरीरात्तु निर्गतास्तीव्रशक्तयः ॥

कालिका तारिणी बाला त्रिपुरा भैरवी रमा ।

बगला चैव मातङ्गी तथा त्रिपुरसुन्दरी ॥

कामाक्षी तुलजा देवी जम्भिनी मोहिनी तथा ।

छिन्नमस्ता गुह्यकाली दशसाहस्रबाहुका ॥

द्वात्रिंशच्छक्तयश्चान्याश्चतुष्षष्टिमिताः पराः । असंख्यातास्ततो देव्यः समुद्भूतास्तु सायुधाः श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २८ व्यासजी बोले- उनका यह वचन सुनकर ४५ | कल्याण - कारिणी भगवतीने उन्हें खानेके लिये अपने हाथमें स्थित शाक तथा स्वादिष्ट फल- मूल प्रदान किये । साथ ही नानाविध अन्न तथा पशुओंके ४६ खानेयोग्य पदार्थ और अनन्त काम्य रसोंसे सम्पन्न भोज्य पदार्थ उन्हें नवीन अन्नोत्पत्तितकके लिये प्रदान किये । हे नृप! उसी दिनसे शाकम्भरी - यह उनका ४७ एक और भी नाम पड़ गया ॥ ४५ - ४७ ॥ इसके बाद जगत्में कोलाहल मच जाने तथा दूतके सब कुछ बता देनेपर वह दुर्गम नामक ४८ दैत्य युद्ध करनेके लिये अस्त्र - शस्त्र लेकर सेनाके साथ चल पड़ा । एक हजार अक्षौहिणी सेनासे युक्त उस दैत्यने शीघ्रतापूर्वक बाण छोड़ते हुए पहले ४ ९ देवीके आगे स्थित देवसेनाको अवरुद्ध कर दिया और उसी प्रकार उसने सभी ब्राह्मणोंको भी चारों ओरसे रोक दिया । इससे देवताओंकी मण्डलीमें चीख-५० पुकारकी ध्वनि होने लगी । सभी ब्राह्मण तथा देवता ' रक्षा लगे ॥ ५१ लिये ५२ दिया गयीं ५३ मध्य करो, रक्षा करो ' - इस प्रकारके शब्द बोलने ४८ – ५० ३ ॥ तत्पश्चात् भगवती शिवाने देवताओंकी रक्षा उनके चारों ओर तेजयुक्त चक्र ( मण्डल ) बना और स्वयं उससे बाहर आकर खड़ी हो ॥ ५१३ ॥

तदनन्तर भगवती और दैत्य दुर्गम- इन दोनोंके युद्ध होने लगा । बाणोंकी वर्षासे अद्भुत सूर्यमण्डल आच्छादित हो गया । बाणोंके परस्पर घर्षणसे तीव्र प्रभावाली अग्नि निकलने लगती थीं । धनुषकी कठोर ५४ प्रत्यंचाके टंकारसे अपने प्रान्तभागतक दिशाएँ बहरी-सी हो जाती थीं ॥ ५२-५३१ ॥ तत्पश्चात् देवीके शरीरसे अनेक उग्र शक्तियाँ ५५ प्रकट हुईं । उनमें कालिका, तारिणी, बाला, त्रिपुरा, भैरवी, रमा, बगला, मातंगी, त्रिपुरसुन्दरी, कामाक्षी, तुलजादेवी, जम्भिनी, मोहिनी, छिन्नमस्ता, ५६ गुह्यकाली तथा दस हजार हाथोंवाली देवी [ ये सोलह ], पुनः बत्तीस, इसके बाद चौंसठ और फिर अनन्त देवियाँ हाथोंमें अस्त्र - शस्त्र धारण किये हुए ॥ ५७ | प्रकट हुईं ॥ ५४–५७ ॥

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अ ० २८ ] सप्तम स्कन्ध १५१

मृदङ्गशङ्खवीणादिनादितं सङ्गरस्थलम् ।

शक्तिभिर्दैत्यसैन्ये तु नाशितेऽक्षौहिणीशते ॥

अग्रेसरः समभवद्दुर्गमो वाहिनीपतिः ।

शक्तिभिः सह युद्धं च चकार प्रथमं रिपुः ॥

महद्युद्धं समभवद्यत्राभूद्रक्तवाहिनी ।

अक्षौहिण्यस्तु ताः सर्वा विनष्टा दशभिर्दिनैः ॥

तत एकादशे प्राप्ते दिने परमदारुणे ।

रक्तमाल्याम्बरधरो रक्तगन्धानुलेपनः ॥

कृत्वोत्सवं महान्तं तु युद्धाय रथसंस्थितः ।

संरम्भेणैव महता शक्तीः सर्वा विजित्य च ॥

महादेवीरथाग्रे तु स्वरथं संन्यवेशयत् ।

ततोऽभवन्महद्युद्धं देव्या दैत्यस्य चोभयोः ॥

प्रहरद्वयपर्यन्तं हृदयत्रासकारकम् ।

ततः पञ्चदशात्युग्रबाणान्देवी मुमोच ह ॥

चतुर्भिश्चतुरो वाहान्बाणेनैकेन सारथिम् ।

द्वाभ्यां नेत्रे भुजौ द्वाभ्यां ध्वजमेकेन पत्रिणा ॥

पञ्चभिर्हृदयं तस्य विव्याध जगदम्बिका ।

ततो वमन् स रुधिरं ममार पुर ईशितुः ॥

तस्य तेजस्तु निर्गत्य देवीरूपे विवेश ह ।

हते तस्मिन्महावीर्ये शान्तमासीज्जगत्त्रयम् ॥

ततो ब्रह्मादयः सर्वे तुष्टुवुर्जगदम्बिकाम् ।

पुरस्कृत्य हरीशानौ भक्त्या गद्गदया गिरा ॥

वह युद्धस्थल मृदंग, शंख, वीणा आदि ५८ वाद्योंसे गूँज उठा । उन शक्तियोंके द्वारा दैत्योंकी एक सौ अक्षौहिणी सेनाका संहार कर दिये जानेपर देवशत्रु वह दैत्यसेनाध्यक्ष दुर्गम तुरन्त सामने आ ५ ९ खड़ा हुआ और शक्तियोंके साथ अद्भुत युद्ध करने लगा ॥ ५८-५९ ॥ जहाँ वह घोर युद्ध हो रहा था, वहाँ रक्तकी धारा बहने लगी । दस दिनोंमें उस दैत्यकी वे सभी ६० । अक्षौहिणी सेनाएँ नष्ट हो गयीं ॥६० ॥

तदनन्तर अत्यन्त भयंकर ग्यारहवाँ दिन आनेपर वह दैत्य लाल रंगकी माला एवं वस्त्र ६१ धारण किये तथा शरीरमें लाल चन्दन लगाये महान् उत्सव मनाकर युद्धके लिये रथपर आरूढ़ हुआ । बड़े उत्साहके साथ सभी शक्तियोंको जीतकर वह दैत्य महादेवीके रथके सामने अपना रथ ले ६२ गया॥६१-६२३ ॥ अब देवी और दुर्गम दैत्य – इन दोनोंमें भीषण युद्ध होने लगा । हृदयको त्रास पहुँचानेवाला ६३ वह युद्ध दो प्रहरतक होता रहा । इसके बाद भगवतीने पाँच भीषण बाण छोड़े, जिनमें चार बाणोंसे उसके चार घोड़ों और एक बाणसे सारथिको ६४ मार डाला । पुनः जगदम्बाने दो बाणोंसे उसके दोनों नेत्रोंको वेध दिया, दो बाणोंसे उसकी दोनों भुजाएँ एवं एक बाणसे उसकी ध्वजा काट डाली ६५ और पाँच बाणोंसे उसके वक्ष: स्थलका भेदन कर दिया ॥ ६३–६५३ ॥ तदनन्तर वह दैत्य रुधिरका वमन करता हुआ भगवती परमेश्वरीके सामने मृत्युको प्राप्त हो गया ६६ और उसके शरीरसे तेज निकलकर देवीके विग्रहमें प्रविष्ट हो गया । इस प्रकार उस महापराक्रमी दैत्यका संहार हो जानेपर तीनों लोकोंमें शान्ति व्याप्त हो ६७ गयी ॥ ६६-६७ ॥ इसके बाद ब्रह्मा आदि सभी देवता भगवान् विष्णु और शिवको आगे करके भक्तिपूर्वक गद्गद ६८ वाणीमें जगदम्बाकी स्तुति करने लगे ॥ ६८ ॥