देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 161–170

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 161–170

पृष्ठ 161

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१५२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २८ देवा ऊचुः

जगद्भ्रमविवर्तैककारणे परमेश्वरि ।

नमः शाकम्भरि शिवे नमस्ते शतलोचने ॥

सर्वोपनिषदुष्टे दुर्गमासुरनाशिनि ।

नमो मायेश्वरि शिवे पञ्चकोशान्तरस्थिते ॥

चेतसा निर्विकल्पेन यां ध्यायन्ति मुनीश्वराः ।

प्रणवार्थस्वरूपां तां भजामो भुवनेश्वरीम् ॥

अनन्तकोटिब्रह्माण्डजननीं दिव्यविग्रहाम् ।

ब्रह्मविष्ण्वादिजननीं सर्वभावैर्नता वयम् ॥

कः कुर्यात्पामरान्दृष्ट्वा रोदनं सकलेश्वरः ।

सदयां परमेशानीं शताक्षीं मातरं विना ॥

व्यास उवाच

इति स्तुता सुरैर्देवी ब्रह्मविष्ण्वादिभिर्वरैः ।

पूजिता विविधैर्द्रव्यैः सन्तुष्टाभूच्च तत्क्षणे ॥

प्रसन्ना सा तदा देवी वेदानाहृत्य सा ददौ ।

ब्राह्मणेभ्यो विशेषेण प्रोवाच पिकभाषिणी ॥

ममेयं तनुरुत्कृष्टा पालनीया विशेषतः ।

यया विनानर्थ एष जातो दृष्टोऽधुनैव हि ॥

पूज्याहं सर्वदा सेव्या युष्माभिः सर्वदैव हि ।

नातः परतरं किञ्चित्कल्याणायोपदिश्यते ॥

पठनीयं ममैतद्धि माहात्म्यं सर्वदोत्तमम् ।

तेन तुष्टा भविष्यामि हरिष्यामि तथापदः ॥

दुर्गमासुरहन्त्रीत्वादुर्गेति मम नाम यः ।

गृह्णाति च शताक्षीति मायां भित्त्वा व्रजत्यसौ ॥

किमुक्तेनात्र बहुना सारं वक्ष्यामि तत्त्वतः ।

संसेव्याहं सदा देवाः सर्वैरपि सुरासुरैः ॥

देवता बोले- भ्रान्ति तथा अविद्याजन्य मोहसे युक्त इस जगत्की एकमात्र कारण हे परमेश्वरि! ६ ९ आपको नमस्कार है । हे शिवे! हे शाकम्भरि! हे शतलोचने! आपको नमस्कार है । समस्त उपनिषदोंका उद्घोष करनेवाली तथा दुर्गम नामक दैत्यका संहार ७० करनेवाली हे मायेश्वरि! पंचकोशके भीतर सदा विराजमान रहनेवाली हे शिवे! आपको नमस्कार है । मुनीश्वर विशुद्ध मनसे जिनका ध्यान करते हैं, उन ७१ प्रणवके अर्थरूप विग्रहवाली भगवती भुवनेश्वरीका हम आश्रय ग्रहण करते हैं । अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंका प्रादुर्भाव करनेवाली, ब्रह्मा - विष्णु आदिको उत्पन्न ७२ करनेवाली तथा दिव्य विग्रहवाली भगवतीके समक्ष हमलोग सम्पूर्ण भावसे नतमस्तक हैं । दयामयी परमेश्वरी माता शताक्षीके अतिरिक्त ऐसा कौन सर्वेश्वर ७३ है, जो दीन - दु: खी प्राणियोंको देखकर रुदन कर सकता है? ॥ ६ ९ -७३ ॥ व्यासजी बोले - – [ हे राजन्! ] ब्रह्मा, विष्णु आदि श्रेष्ठ देवताओंके इस प्रकार स्तवन तथा विविध द्रव्योंसे पूजन करनेपर भगवती उसी क्षण सन्तुष्ट हो ७४ गयीं ॥ ७४ ॥

कोयलके समान मधुर स्वरवाली उन भगवतीने दुर्गम दैत्यसे वेदोंको वापस लाकर सौंप दिया और ७५ विशेषरूपसे ब्राह्मणोंसे कहा- जिस वेदराशिके अभावमें यह अनर्थ उत्पन्न हुआ था और उस अनर्थको आपलोगोंने अभी - अभी प्रत्यक्ष देखा भी है, वह वेदराशि मेरा ७६ उत्कृष्ट विग्रह है; आपलोगोंको विशेषरूपसे इसकी रक्षा करनी चाहिये । आपलोगोंको सर्वदा मेरी पूजा तथा सेवा करनी चाहिये । आपलोगोंके कल्याणके ७७ लिये इससे बढ़कर कोई अन्य उपदेश नहीं है । आपलोगोंको चाहिये कि मेरे इस उत्तम माहात्म्यका सर्वदा पाठ करें, उससे प्रसन्न होकर मैं आपलोगों के ७८ समस्त कष्ट दूर कर दूँगी । दुर्गम असुरका संहार करनेके कारण दुर्गा तथा शताक्षी– मेरे इन नामोंका जो प्राणी उच्चारण करता है, वह मायाका भेदन करके मेरे ७ ९ लोकको प्राप्त होता है । अब अधिक कहनेकी क्या आवश्यकता । हे देवगण! मैं वस्तुतः साररूपमें यही कहती हूँ कि सभी देवताओं तथा दैत्योंको सर्वदा मेरी ८० उपासना करनी चाहिये ॥ ७५-८० ॥

पृष्ठ 162

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अ ० २ ९ ] व्यास उवाच

इत्युक्त्वान्तर्हिता देवी देवानां चैव ` पश्यताम् ।

सन्तोषं जनयन्त्येवं सच्चिदानन्दरूपिणी ॥

एतत्ते सर्वमाख्यातं रहस्यं परमं महत् ।

गोपनीयं प्रयत्नेन सर्वकल्याणकारकम् ॥

य इमं शृणुयान्नित्यमध्यायं भक्तितत्परः । सर्वान्कामानवाप्नोति देवीलोके महीयते । सप्तम स्कन्ध १५३ व्यासजी बोले – [ हे राजन्! ] सच्चिदानन्द-स्वरूपिणी जगदम्बा ऐसा कहकर देवताओंको आनन्दित ८१ करती हुई उनके देखते - देखते अन्तर्धान हो गयीं । यह सब मैंने आपको बता दिया । सबका कल्याण करनेवाले इस अति महान् रहस्यको प्रयत्नपूर्वक ८२ | गोपनीय रखना चाहिये, जो मनुष्य भक्तिपरायण होकर इस अध्यायका नित्य श्रवण करता है, वह सभी मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है और देवीलोकमें ८३ । प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥ ८१ - ८३ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे शताक्षीचरित्रवर्णनं नामाष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥

अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः व्यासजीका राजा जनमेजयसे भगवतीकी महिमाका वर्णन करना और उनसे उन्हींकी आराधना करनेको कहना, भगवान् तथा लक्ष्मीका अन्तर्धान होना व्यास उवाच

इत्येवं सूर्यवंश्यानां राज्ञां चरितमुत्तमम् ।

सोमवंशोद्भवानां च वर्णनीयं मया कियत् ॥

पराशक्तिप्रसादेन महत्त्वं प्रतिपेदिरे ।

राजन् सुनिश्चितं विद्धि पराशक्तिप्रसादतः ॥

यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।

तत्तदेवावगच्छ त्वं पराशक्त्यंशसम्भवम् ॥

एते चान्ये च राजानः पराशक्तेरुपासकाः ।

संसारतरुमूलस्य कुठारा अभवन्नृप ॥

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन संसेव्या भुवनेश्वरी ।

पलालमिव धान्यार्थी त्यजेदन्यमशेषतः ॥

आमथ्य वेददुग्धाब्धि प्राप्तं रत्नं मया नृप ।

पराशक्तिपदाम्भोजं कृतकृत्योऽस्म्यहं ततः ॥

शंकर और विष्णुके अभिमानको देखकर गौरी और शिव तथा विष्णुका शक्तिहीन होना व्यासजी बोले – हे राजन्! इस प्रकार मैंने यत्किंचित् सूर्यवंशी और चन्द्रवंशी राजाओंके १ उत्तम चरित्रका वर्णन किया । हे राजन्! पराशक्ति भगवतीकी कृपासे उन राजाओंने महती प्रतिष्ठा प्राप्त की थी । आप यह निश्चितरूपसे जान लीजिये कि उन पराशक्तिकी कृपासे सब कुछ सिद्ध हो २ जाता है । जो - जो विभूतियुक्त अर्थात् ऐश्वर्ययुक्त, कान्तियुक्त तथा शक्तियुक्त पदार्थ हैं; उन सबको आप उन्हीं परम शक्तिमयी भगवतीके अंशसे ही उत्पन्न ३ समझिये ॥१-३ ॥ हे नृप! ये तथा अन्य बहुतसे पराशक्तिके उपासक राजागण संसाररूपी वृक्षकी जड़ काटने ४ लिये कुठारके समान हो चुके हैं । अतएव जिस प्रकार धान्य चाहनेवाला व्यक्ति पुआल छोड़ देता है, उसी प्रकार अन्य व्यवसायोंका पूर्णरूपसे त्याग कर देना चाहिये और सम्पूर्ण प्रयत्नके साथ भुवनेश्वरीकी ५ उपासना करनी चाहिये ॥ ४-५ ॥ हे नृप! वेदरूपी क्षीरसागरका मन्थन करके मैंने भगवती पराशक्तिके चरण - कमलरूपी रत्नको प्राप्त ६ किया है, उससे मैं कृतार्थ हो गया हूँ ॥ ६ ॥

पृष्ठ 163

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१५४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २ ९

पञ्चब्रह्मासनारूढा नास्त्यन्या कापि देवता ।

तत एव महादेव्या पञ्चब्रह्मासनं कृतम् ॥

पञ्चभ्यस्त्वधिकं वस्तु वेदेऽव्यक्तमितीर्यते ।

यस्मिन्नोतं च प्रोतं च सैव श्रीभुवनेश्वरी ॥

तामविज्ञाय राजेन्द्र नैव मुक्तो भवेन्नरः ।

यदा चर्मवदाकाशं वेष्टयिष्यन्ति मानवाः ॥

तदा शिवामविज्ञाय दुःखस्यान्तो भविष्यति ।

अत एव श्रुतौ प्राहुः श्वेताश्वतरशाखिनः ॥

ध्यानयोगानुगता अपश्य-देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम् ॥

तस्मात् सर्वप्रयत्नेन जन्मसाफल्यहेतवे ।

लज्जया वा भयेनापि भक्त्या वा प्रेमयुक्तया ।

सर्वसङ्गं परित्यज्य मनो हृदि निरुध्य च ॥

तन्निष्ठस्तत्परो भूयादिति वेदान्तडिण्डिमः ।

येन केन मिषेणापि स्वपंस्तिष्ठन्व्रजन्नपि ॥

कीर्तयेत्सततं देवीं स वै मुच्येत बन्धनात् ।

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन भज राजन् महेश्वरीम् ॥

विरारूपां सूत्ररूपां तथान्तर्यामिरूपिणीम् ।

सोपानक्रमतः पूर्वं ततः शुद्धे तु चेतसि ॥

सच्चिदानन्दलक्ष्यार्थरूपां तां ब्रह्मरूपिणीम् ।

आराधय परां शक्तिं प्रपञ्चोल्लासवर्जिताम् ॥

तस्यां चित्तलयो यः स तस्या आराधनं स्मृतम् । पंचब्रह्मके आसनपर कोई अन्य देवता स्थित ७ नहीं है अर्थात् इन पंचदेवोंके अतिरिक्त उनका अतिक्रमण करके उनके अधिष्ठाताके रूपमें अपना प्रभाव स्थापित करनेमें कोई अन्य देवता समर्थ नहीं है, अतः ब्रह्मके रूपमें मान्यताप्राप्त उन पंचब्रह्मको ८ भगवतीने अपना आसन बना लिया अर्थात् उन पंचदेवोंकी अधिष्ठात्री शक्तिके रूपमें वे अधिष्ठित हुईं । इन पाँचोंसे परेकी वस्तुको वेदमें ' अव्यक्त ' ९ कहा गया है । जिस अव्यक्तमें यह सम्पूर्ण जगत् ओत - प्रोत है, वह श्रीभुवनेश्वरी ही हैं । हे राजेन्द्र! उन भगवतीके स्वरूपको जाने बिना मनुष्य मुक्त नहीं हो सकता॥७-८३ ॥ १० जब मनुष्य आकाशको चर्मसे आच्छादित कर लेंगे तब शिवाको न जानकर भी दुःखका अन्त होगा अर्थात् जैसे चर्मसे आकाशका ढकना सम्भव नहीं है, ११ वैसे ही शिवातत्त्वके ज्ञानके बिना दुःखका अन्त होना सम्भव नहीं है । अतः श्वेताश्वतरशाखाध्यायी मनीषियोंने श्रुतिमें ऐसा कहा है कि उन महापुरुषोंने अपने गुणोंसे व्यक्त न होनेवाली दिव्यशक्तिसम्पन्न भगवती जगदम्बाका दर्शन ध्यानयोगद्वारा प्राप्त किया था ॥ ९ -११ ॥ १२ अतः जन्म सफल करनेके निमित्त सभी आसक्तियोंका परित्याग करके तथा अपने मनको हृदयमें रोककर लज्जा, भय अथवा प्रेममय भक्तिके साथ किसी भी तरहसे सम्यक् प्रयत्न करके उन १३ भगवतीमें पूर्ण निष्ठा तथा तत्परता रखनी चाहिये— ऐसा वेदान्तका स्पष्ट उद्घोष है । जो मनुष्य जिस किसी भी बहाने सोते, बैठते अथवा चलते समय १४ भगवतीका निरन्तर कीर्तन करता है, वह [ सांसारिक ] बन्धनसे निश्चितरूपसे छूट जाता है । १२ - १३३ ॥ अतः हे राजन्! आप विराट् रूपवाली, सूक्ष्म रूपवाली तथा अन्तर्यामिस्वरूपिणी महेश्वरीकी उपासना १५ कीजिये । इस प्रकार आप पहले सोपान - क्रमसे उपासना करके पुनः अन्तःकरण शुद्ध हो जानेपर सांसारिक प्रपंच तथा उल्लासरहित सच्चिदानन्द, लक्ष्यार्थरूपिणी १६ तथा ब्रह्मरूपिणी उन पराशक्ति भगवतीकी आराधना कीजिये । उन भगवतीमें चित्तको जो लीन कर देना है, वही उनका आराधन कहा गया है ॥ १४–१६३ ॥

पृष्ठ 164

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अ ० २ ९ ] राजन् राज्ञां पराशक्तिभक्तानां चरितं मया

धार्मिकाणां सूर्यसोमवंशजानां मनस्विनाम् ।

पावनं कीर्तिदं धर्मबुद्धिदं सद्गतिप्रदम् ॥

कथितं पुण्यदं पश्चात्किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि । जनमेजय उवाच गौरीलक्ष्मीसरस्वत्यो दत्ताः पूर्वं पराम्बया ॥

हराय हरये तद्वन्नाभिपद्मोद्भवाय च ।

तुषाराद्रेश्च दक्षस्य गौरी कन्येति विश्रुतम् ॥

क्षीरोदधेश्च कन्येति महालक्ष्मीरिति स्मृतम् ।

मूलदेव्युद्भवानां च कथं कन्यात्वमन्ययोः ॥

असम्भाव्यमिदं भाति संशयोऽत्र महामुने ।

छिन्धि ज्ञानासिना तं त्वं संशयच्छेदतत्परः ॥

व्यास उवाच

शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि रहस्यं परमाद्भुतम् ।

देवीभक्तस्य ते किञ्चिदवाच्यं न हि विद्यते ॥

देवीत्रयं यदा देवत्रयायादात्पराम्बिका ।

तदाप्रभृति ते देवाः सृष्टिकार्याणि चक्रिरे ॥

कस्मिंश्चित्समये राजन् दैत्या हालाहलाभिधाः ।

महापराक्रमा जातास्त्रैलोक्यं तैर्जितं क्षणात् ॥

ब्रह्मणो वरदानेन दर्पिता रजताचलम् ।

रुरुधुर्निजसेनाभिस्तथा वैकुण्ठमेव च च ॥ ॥

कामारिः कैटभारिश्च युद्धोद्योगं च चक्रतुः ।

षष्टिवर्षसहस्त्राणामभूद्युद्धं महोत्कटम् ॥

हाहाकारो महानासीद्देवदानवसेनयोः ।

महताथ प्रयत्नेन ताभ्यां ते दानवा हताः ॥

सप्तम स्कन्ध १५५ ॥ १७ हे राजन्! इस प्रकार मैंने सूर्य और चन्द्र - वंशमें उत्पन्न, पराशक्तिके उपासक, धर्मपरायण तथा मनस्वी राजाओंके कीर्ति, धर्म, बुद्धि, उत्तम गति तथा १८ पुण्य प्रदान करनेवाले पावन चरित्रका वर्णन कर दिया, अब आप दूसरा कौन - सा प्रसंग सुनना चाहते हैं? ॥ १७-१८३ ॥ जनमेजय बोले- हे मुने! पूर्वमें मणिद्वीप-१ ९ निवासिनी पराम्बा भगवतीने गौरी, लक्ष्मी और सरस्वतीको उत्पन्न कर उन्हें क्रमशः शिव, विष्णु तथा पद्मयोनि ब्रह्माको सौंप दिया था । साथ ही यह २० भी सुना गया है कि गौरी हिमालय तथा दक्षप्रजापतिकी कन्या हैं और महालक्ष्मी क्षीरसमुद्रकी कन्या हैं-ऐसा कहा गया है । मूलप्रकृति भगवतीसे उत्पन्न ये २१ देवियाँ दूसरोंकी कन्याएँ कैसे हुईं? महामुने! यह असम्भव - सी बात प्रतीत होती है, इसमें मुझे सन्देह है । अतः सन्देहोंका छेदन करनेमें पूर्ण तत्पर आप मेरे २२ उस संशयको अपने ज्ञानरूपी खड्गसे काट दीजिये ॥ १ ९ –२२ ॥ व्यासजी बोले- हे राजन्! सुनिये, मैं आपको परम अद्भुत रहस्य बतलाता हूँ । आप-सदृश देवीभक्त के लिये भगवतीका कोई भी रहस्य २३ छिपानेयोग्य नहीं है ॥ २३ ॥

जब पराम्बिकाने तीनों देवियाँ उन तीनों देवताओंको सौंप दीं, उसी समयसे उन देवताओंने २४ सृष्टिके कार्य आरम्भ कर दिये ॥२४ ॥

हे राजन्! एक समयकी बात है कि हालाहल नामवाले अनेक महापराक्रमी दैत्य उत्पन्न हुए और २५ उन्होंने क्षणभरमें तीनों लोकोंको जीत लिया ॥ २५ ॥

ब्रह्माजीके वरदानसे अभिमानमें चूर उन दैत्योंने अपनी सेनाओंके साथ कैलास और वैकुण्ठको २६ २६ | घेर लिया ॥ २६ ॥

तब भगवान् शंकर और विष्णु उनके साथ युद्धके लिये तत्पर हो गये और साठ हजार वर्षोंतक २७ । उनके बीच अत्यन्त भीषण युद्ध होता रहा । देवता और दानव - दोनों सेनाओंमें महान् हाहाकार मच गया । तब अन्तमें उन दोनोंने बड़े प्रयत्नके साथ उन २८ । दैत्योंको मार डाला ॥ २७-२८ ॥

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१५६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २ ९

स्वस्वस्थानेषु गत्वा तावभिमानं च चक्रतुः ।

स्वशक्त्योर्निकटे राजन् यद्वशादेव ते हताः ॥

अभिमानं तयोर्ज्ञात्वा छलहास्यं च चक्रतुः ।

महालक्ष्मीश्च गौरी च हास्यं दृष्ट्वा तयोस्तु तौ ॥

देवावतीव संक्रुद्धौ मोहितावादिमायया ।

दुरुत्तरं च ददतुरवमानपुरःसरम् ॥

ततस्ते देवते तस्मिन्क्षणे त्यक्त्वा तु तौ पुनः ।

अन्तर्हिते चाभवतां हाहाकारस्तदा ह्यभूत् ॥

निस्तेजस्कौ च निःशक्ती विक्षिप्तौ च विचेतनौ ।

अवमानात्तयोः शक्त्योर्जातौ हरिहरौ तदा ॥

ब्रह्मा चिन्तातुरो जातः किमेतत्समुपस्थितम् ।

प्रधानौ देवतामध्ये कथं कार्याक्षमावमू ॥

अकाण्डे किं निमित्तेन संकटं समुपस्थितम् ।

प्रलयो भविता किं वा जगतोऽस्य निरागसः ॥

निमित्तं नैव जानेऽहं कथं कार्या प्रतिक्रिया ।

इति चिन्तातुरोऽत्यर्थं दध्यौ मीलितलोचनः ॥

पराशक्तिप्रकोपात्तु जातमेतदिति स्म ह ।

जानंस्तदा सावधानः पद्मजोऽभून्नृपोत्तम ॥

ततस्तयोश्च यत्कार्यं स्वयमेवाऽकरोत्तदा ।

स्वशक्तेश्च प्रभावेण कियत्कालं तपोनिधिः ॥

ततस्तयोस्तु स्वस्त्यर्थं मन्वादीन्स्वसुतानथ । आह्वयामास धर्मात्मा सनकादींश्च सत्वरः उवाच वचनं तेभ्यः सन्नतेभ्यस्तपोनिधिः । कार्यासक्तोऽहमधुना तपः कर्तुं न च क्षमः पराशक्तेस्तु तोषार्थं जगद्धारयुतोऽस्म्यहम् । शिवविष्णू च विक्षिप्तौ पराशक्तिप्रकोपतः हे राजन्! तत्पश्चात् वे शंकर तथा विष्णु २ ९ अपने - अपने लोकको जाकर अपनी शक्तियों ( गौरी तथा लक्ष्मी ) - के समक्ष, जिनके बल - प्रभावसे वे उन दैत्योंको मार सके थे, अपने बलका अभिमान करने ३० | लगे ॥ २ ९ ॥ उन दोनोंका यह अभिमान देखकर महालक्ष्मी तथा गौरी छद्मपूर्ण हास करने लगीं । तब उन दोनों ३१ देवियोंकी हँसी देखकर आदिमायाके प्रभावसे विमोहित वे दोनों देवता अत्यन्त कुपित हो उठे और अवहेलनापूर्वक अनुचित उत्तर देने लगे ॥ ३०-३१ ॥ ३२ तदनन्तर वे दोनों देवियाँ उसी क्षण उन दोनों ( शंकर तथा विष्णु ) - से पृथक् होकर अन्तर्धान हो गयीं, इससे हाहाकार मच गया ॥ ३२ ॥

३३ उन दोनों शक्तियोंके अपमानके कारण उस समय विष्णु तथा शंकर निस्तेज, शक्तिहीन, विक्षिप्त तथा चेतनारहित हो गये ॥ ३३ ॥

३४ इसपर ब्रह्माजी चिन्तासे अधीर हो गये और सोचने लगे कि यह क्या हो गया? देवताओंमें प्रधान वे विष्णु तथा शिव अपना - अपना कार्य करनेमें ३५ असमर्थ क्यों हो गये? यह संकट अचानक किस कारणसे उपस्थित हो गया? क्या इस निरपराध ३६ जगत्‌का प्रलय हो जायगा? मैं इसका कारण नहीं जान पा रहा हूँ, तो फिर इस स्थितिमें इसका प्रतीकार कैसे किया जाय ॥ ३४-३५३ ॥ ३७ इसी महान् चिन्तामें निमग्न ब्रह्माजीने नेत्र बन्द करके ध्यान लगाया और तब उन्होंने जाना कि पराशक्तिके प्रकोपसे ही यह सब घटित हुआ है । हे ३८ नृपश्रेष्ठ! यह जानते ही ब्रह्माजी सावधान हो गये । इसके अनन्तर विष्णु तथा शंकरका जो कार्य था, उसे तपोनिधि ब्रह्माजी अपनी शक्तिके प्रभावसे कुछ ॥ ३ ९ समयतक स्वयं करते रहे ॥ ३६–३८ ॥ तदनन्तर धर्मात्मा ब्रह्माजीने उन विष्णु तथा शंकरके कल्याणार्थ अपने मनु आदि तथा सनक ॥ ४० आदि पुत्रोंका शीघ्र आह्वान किया । तपोनिधि ब्रह्माजीने अपने समक्ष सिर झुकाये हुए उन कुमारोंसे कहा— मैं संसारके भारसे युक्त हूँ । अतः कार्यमें अत्यधिक ॥ ४१ आसक्त रहनेके कारण मैं इस समय पराशक्ति जगदम्बाको

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अ ० ३० ]

तस्मात्तां परमां शक्तिं यूयं सन्तोषयन्त्वथ ।

अत्यद्भुतं तपः कृत्वा भक्त्या परमया युताः ॥

यथा तौ पूर्ववृत्तौ च स्यातां शक्तियुतावपि ।

तथा कुरुत मत्पुत्रा यशोवृद्धिर्भवेद्धि वः ॥

कुले यस्य भवेज्जन्म तयोः शक्त्योस्तु तत्कुलम् ।

पावयेज्जगतीं सर्वां कृतकृत्यं स्वयं भवेत् ॥

व्यास उवाच

पितामहवचः श्रुत्वा गताः सर्वे वनान्तरे ।

रिराधयिषवः सर्वे दक्षाद्या विमलान्तराः ॥

सप्तम स्कन्ध १५७ प्रसन्न करनेके लिये तपस्या करनेमें समर्थ नहीं हूँ । ४२ उन पराशक्तिके प्रकोपके कारण विष्णु तथा शिव विक्षिप्त हो गये हैं, अतः आपलोग परम भक्तिसे युक्त होकर अद्भुत तप करके उन पराशक्ति जगदम्बाको प्रसन्न कीजिये ॥ ३ ९ –४२ ॥ ४३ हे मेरे पुत्रो! जिस भी प्रकारसे शिव तथा विष्णु पूर्वकी भाँति हो जायँ और अपनी शक्तियोंसे सम्पन्न हो सकें, आपलोग वैसा प्रयत्न कीजिये; इससे आपलोगोंका यश ही बढ़ेगा । जिस कुलमें उन दोनों शक्तियोंका जन्म होगा, वह कुल सम्पूर्ण ४४ जगत्को पवित्र कर देगा और स्वयं कृतार्थ हो जायगा ॥ ४३-४४ ॥ व्यासजी बोले- पितामह ब्रह्माकी बात सुनकर विशुद्ध अन्तःकरणवाले उनके दक्ष आदि सभी पुत्र भगवती जगदम्बाकी आराधना करनेकी इच्छासे ४५ । वनमें चले गये ॥ ४५ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे भगवतीं समाराधयिषूणां देवानां तपः करणवर्णनं नामैकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २ ९ ॥ अथ त्रिंशोऽध्यायः शक्तिपीठोंकी उत्पत्तिकी कथा व्यास उवाच

ततस्ते तु वनोद्देशे हिमाचलतटाश्रयाः ।

मायाबीजजपासक्तास्तपश्चेरुः समाहिताः ॥

ध्यायतां परमां शक्तिं लक्षवर्षाण्यभून्नृप ।

ततः प्रसन्ना देवी सा प्रत्यक्षं दर्शनं ददौ ॥

पाशाङ्कुशवराभीतिचतुर्बाहुस्त्रिलोचना I करुणारससम्पूर्णा सच्चिदानन्दरूपिणी ॥

दृष्ट्वा तां सर्वजननीं तुष्टुवुर्मुनयोऽमलाः ।

नमस्ते विश्वरूपायै वैश्वानरमूर्तये ॥

तथा उनके नाम एवं उनका माहात्म्य व्यासजी बोले- हे राजन्! तत्पश्चात् वे वन-प्रदेशमें हिमालयकी तलहटीमें स्थित रहकर समाहितचित्त १ हो मायाबीज ( भुवनेश्वरीमन्त्र ) - के जपमें तत्पर रहते हुए घोर तप करने लगे ॥ १ ॥

हे राजन्! एक लाख वर्षपर्यन्त उन पराशक्तिका ध्यान करते रहनेके उपरान्त देवी उनके ऊपर प्रसन्न २ हो गयीं और उन्होंने प्रत्यक्ष दर्शन दिया । उस समय उन्होंने अपने चारों हाथोंमें पाश, अंकुश, वर और अभय मुद्रा धारण कर रखी थीं, वे तीन नेत्रोंसे युक्त थीं, वे करुणारससे परिपूर्ण थीं और उनका विग्रह ३ सत्, चित् तथा आनन्दसे सम्पन्न था॥२-३ ॥ उन सर्वजननीको देखकर विशुद्ध चित्तवाले वे मुनिगण उनकी स्तुति करने लगे - विश्वरूप तथा वैश्वानररूपवाली आपको नमस्कार है । जिसमें समग्र ४ लिंगदेह ओत - प्रोत होकर व्यवस्थित है, उस सूत्ररूप

पृष्ठ 167

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१५८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३०

नमस्तेजसरूपायै सूत्रात्म नमः ।

यस्मिन्सर्वे लिङ्गदेहा ओतप्रोता व्यवस्थिताः ॥

नमः प्राज्ञस्वरूपायै नमोऽव्याकृतमूर्तये ।

नमः प्रत्यक्स्वरूपायै नमस्ते ब्रह्ममूर्तये ॥

नमस्ते सर्वरूपायै सर्वलक्ष्यात्ममूर्तये इति स्तुत्वा जगद्धात्रीं भक्तिगद्गदया गिरा प्रणेमुश्चरणाम्भोजं दक्षाद्या मुनयोऽमलाः ततः प्रसन्ना सा देवी प्रोवाच पिकभाषिणी

वरं ब्रूत महाभागा वरदाहं सदा मता ।

तस्यास्तु वचनं श्रुत्वा हरविष्ण्वोस्तनोः शमम् ॥

तयोस्तच्छक्तिलाभं च वव्रिरे नृपसत्तम ।

दक्षोऽथ पुनरप्याह जन्म देवि कुले मम ॥

भवेत्तवाम्ब येनाहं कृतकृत्यो भवे इति ।

जपं ध्यानं तथा पूजां स्थानानि विविधानि च ॥

वद मे परमेशानि स्वमुखेनैव केवलम् । देव्युवाच मच्छक्त्योरवमानाच्च जातावस्था तयोर्द्वयोः ॥

नैतादृश: प्रकर्तव्यो मेऽपराधः कदाचन ।

अधुना मत्कृपालेशाच्छरीरे स्वस्थता तयोः ॥

भविष्यति च ते शक्ती त्वद्गृहे क्षीरसागरे ।

जनिष्यतस्तत्र ताभ्यां प्राप्स्यतः प्रेरिते मया ॥

मायाबीजं हि मन्त्रो मे मुख्यः प्रियकरः सदा ।

ध्यानं विराट्स्वरूपं मेऽथवा त्वत्पुरतः स्थितम् ॥

सच्चिदानन्दरूपं वा स्थानं सर्वं जगन्मम ।

युष्माभिः सर्वदा चाहं पूज्या ध्येया च सर्वदा ॥

विग्रहवाली तथा तेजसम्पन्न रूपवाली आपको बार-५ बार नमस्कार है । प्राज्ञस्वरूपवाली आपको नमस्कार है, अव्यक्तस्वरूपवाली आपको नमस्कार है, प्रत्यक्स्वरूप आपको नमस्कार है और परब्रह्मका स्वरूप धारण ६ करनेवाली आपको नमस्कार है । समस्त रूपोंवाली आपको नमस्कार है तथा सभी प्राणियोंमें आत्ममूर्तिके रूपमें । लक्षित होनेवाली आपको नमस्कार है ॥ ४–६३ ॥ ॥ ७ इस प्रकार भक्तियुक्त गद्गद वाणीसे उन जगद्धात्रीकी स्तुति करके निर्मल मनवाले दक्ष आदि । मुनियोंने भगवती चरण - कमलमें प्रणाम किया । तब ॥ ८ कोयलके समान मधुर वचन बोलनेवाली उन देवीने प्रसन्न होकर कहा - हे महान् भाग्यशाली मुनियो! आपलोग वर माँगिये, मैं सदा वर प्रदान करनेवाली ९ मानी जाती हूँ॥७-८३ ॥ हे नृपश्रेष्ठ! उनकी वाणी सुनकर मुनियोंने यह वरदान माँगा कि शंकर तथा विष्णुका शरीर स्वस्थ हो जाय और उन्हें पुन: वही पूर्व शक्तियाँ प्राप्त हो १० जायँ ॥ ९ ३ ॥ इसके बाद दक्षने कहा- हे देवि! हे अम्ब! मेरे कुलमें आपका जन्म हो, जिससे मैं कृतकृत्य हो ११ जाऊँ । हे परमेश्वरि! आप अपने मुखसे अपने जप, ध्यान, पूजा तथा विविध स्थानोंके विषयमें बतानेकी कृपा कीजिये ॥ १०-११३ ॥ देवी बोलीं- मेरी शक्तियोंका अपमान करनेसे १२ ही उन दोनों ( विष्णु तथा शिव ) - की यह दशा हुई है । उन्हें मेरे प्रति ऐसा अपराध कभी नहीं करना चाहिये । अब मेरी लेशमात्र कृपासे ही उन दोनोंके शरीरमें १३ स्वस्थता आ जायगी । साथ ही गौरी और लक्ष्मी नामक वे दोनों शक्तियाँ आपके घरमें तथा क्षीरसागरमें जन्म लेंगी और मेरेद्वारा प्रेरित किये जानेपर वे १४ शक्तियाँ उन दोनोंको प्राप्त हो जायँगी ॥१२–१४ ॥ मुझे सदा प्रसन्न करनेवाला ' मायाबीज ' ही मेरा प्रधान मन्त्र है । मेरे विराट् रूपका अथवा आपके १५ समक्ष उपस्थित इस रूपका अथवा सच्चिदानन्द रूपका ध्यान करना चाहिये । सम्पूर्ण जगत् ही मेरा निवास - स्थान है । आपलोगोंको सर्वदा मेरा पूजन १६ । तथा ध्यान करना चाहिये ॥ १५-१६ ॥

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अ ० ३० ] व्यास उवाच

इत्युक्त्वान्तर्दधे देवी मणिद्वीपाधिवासिनी ।

दक्षाद्या मुनयः सर्वे ब्रह्माणं पुनराययुः ॥

ब्रह्मणे सर्ववृत्तान्तं कथयामासुरादरात् ।

हरो हरिश्च स्वस्थौ तौ स्वस्वकार्यक्षमौ नृप ॥

जातौ पराम्बाकृपया गर्वेण रहितौ तदा ।

कदाचिदथ काले तु महः शाक्तमवातरत् ॥

दक्षगेहे महाराज त्रैलोक्येऽप्युत्सवोऽभवत् ।

देवाः प्रमुदिताः सर्वे पुष्पवृष्टिं च चक्रिरे ॥

नेदुर्दुन्दुभयः स्वर्गे करकोणाहता नृप ।

मनांस्यासन्प्रसन्नानि साधूनाममलात्मनाम् ॥

सरितो मार्गवाहिन्यः सुप्रभोऽभूद्दिवाकरः ।

मङ्गलायां तु जातायां जातं सर्वत्र मङ्गलम् ॥

तस्या नाम सतीं चक्रे सत्यत्वात्परसंविदः ।

ददौ पुनः शिवायाथ तस्य शक्तिस्तु याभवत् ॥

सा पुनर्ज्वलने दग्धा दैवयोगान्मनोर्नृप । जनमेजय उवाच अनर्थकरमेतत्ते श्रावितं वचनं मुने ॥

एतादृशं महद्वस्तु कथं दग्धं हुताशने ।

यन्नामस्मरणान्नृणां संसाराग्निभयं न हि ॥

केन कर्मविपाकेन मनोर्दग्धं तदेव हि । व्यास उवाच शृणु राजन् पुरा वृत्तं सतीदाहस्य कारणम् ॥

कदाचिदथ दुर्वासा गतो जाम्बूनदेश्वरीम् ।

ददर्श देवीं तत्रासौ मायाबीजं जजाप सः ॥

सप्तम स्कन्ध १५ ९ व्यासजी बोले- ऐसा कहकर मणिद्वीपमें निवास करनेवाली भगवती जगदम्बा अन्तर्धान हो गयीं । तब १७ दक्ष आदि सभी मुनिगण ब्रह्माजीके पास लौट आये और उन्होंने ब्रह्माजीसे आदरपूर्वक सारा वृत्तान्त कह दिया ॥ १७३ ॥

हे राजन्! तब पराम्बाकी कृपासे वे दोनों विष्णु १८ तथा शिव स्वस्थ हो गये, उनमें अपने - अपने कार्य-सम्पादनकी क्षमता आ गयी और वे अभिमानरहित भी हो गये ॥ १८३ ॥

१ ९ हे महाराज! कुछ समय व्यतीत होनेपर दक्षके भवनमें शक्तिसम्पन्न एक महान् तेज प्रकट हुआ । उस समय तीनों लोकोंमें उत्सव मनाया गया । सभी २० देवतागण प्रसन्न होकर पुष्पोंकी वर्षा करने लगे और वे स्वर्गमें हाथोंसे आघात करके दुन्दुभियाँ बजाने लगे । हे नृप! निर्मल मनवाले साधुपुरुषोंके मन प्रसन्न २१ हो गये, नदियाँ मार्गोंमें जलधारा बहाने लगीं और भगवान् सूर्य मनोहर प्रभासे युक्त हो गये । इस प्रकार मंगलमयी भगवतीके प्रकट होनेपर सभी स्थानों पर २२ मंगल ही मंगल हो गया ॥ १ ९ –२२ ॥ दक्षने सत्यस्वरूप होने तथा ब्रह्मस्वरूपिणी होनेके कारण उस देवीका नाम ' सती ' रखा और उन्हें २३ पुनः शिवको समर्पित कर दिया; क्योंकि वे पूर्वमें भी उन्हीं शिवकी शक्ति थीं । हे राजन्! वे ही सती पुनः दक्षके यज्ञमें दैवयोगसे अग्निमें जलकर भस्म हो गयीं ॥ २३३ ॥

२४ जनमेजय बोले- हे मुने! आपने यह तो बड़ा ही अनर्थकारी प्रसंग सुनाया । इस प्रकारकी महान् विभूति वे सती, जिनके नामके स्मरणमात्रसे मनुष्योंको संसाररूप अग्निका भय नहीं रहता, अग्निमें जलकर २५ भस्म क्यों हो गयीं? दक्षके किस प्रतिकूल कर्मके कारण वे सती भस्म हो गयीं? ॥ २४-२५३ ॥ व्यासजी बोले- हे राजन्! सतीके भस्म होनेका कारणसम्बन्धी प्राचीन वृत्तान्त सुनिये । किसी समय २६ ऋषि दुर्वासा [ जम्बूनदके तटपर स्थित ] भगवती जाम्बूनदेश्वरीके समीप गये । उन्होंने वहाँ देवीका दर्शन किया और वहींपर वे मायाबीज मन्त्रका जप २७ | करने लगे ॥ २६-२७ ॥

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१६० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३०

ततः प्रसन्ना देवेशी निजकण्ठगतां त्रजम् ।

भ्रमद्भ्रमरसंसक्तां मकरन्दमदाकुलाम् ॥

ददौ प्रसादभूतां तां जग्राह शिरसा मुनिः ।

ततो निर्गत्य तरसा व्योममार्गेण तापसः ॥

आजगाम स यत्रास्ते दक्षः साक्षात्सतीपिता ।

सन्दर्शनार्थमम्बाया ननाम च सतीपदे ॥

पृष्टो दक्षेण स मुनिर्माला कस्यास्त्यलौकिकी ।

कथं लब्धा त्वया नाथ दुर्लभा भुवि मानवैः ॥

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य प्रोवाचाश्रुयुतेक्षणः ।

देव्याः प्रसादमतुलं प्रेमगद्गदितान्तरः ॥

प्रार्थयामास तां मालां तं मुनिं स सतीपिता ।

अदेयं शक्तिभक्ताय नास्ति त्रैलोक्यमण्डले ॥

इति बुद्धया तु तां मालां मनवे स समर्पयत् ।

गृहीता शिरसा माला मनुना निजमन्दिरे ॥

स्थापिता शयनं यत्र दम्पत्योरतिसुन्दरम् ।

पशुकर्मरतो रात्रौ मालागन्धेन मोदितः ॥

अभवत्स महीपालस्तेन पापेन शङ्करे ।

शिवे द्वेषमतिर्जातो देव्यां सत्यां तथा नृप ॥

राजंस्तेनापराधेन तज्जन्यो देह एव च ।

सत्या योगाग्निना दग्धः सतीधर्मदिदृक्षया ॥

पुनश्च हिमवत्पृष्ठे प्रादुरासीत्तु तन्महः । जनमेजय उवाच दह्यमाने सतीदेहे जाते किमकरोच्छिवः प्राणाधिका सती तस्य तद्वियोगेन कातरः । व्यास उवाच ततः परं तु यज्जातं मया वक्तुं न शक्यते त्रैलोक्यप्रलयो जातः शिवकोपाग्निना नृप । उससे प्रसन्न होकर देवेश्वरीने दिव्य पुष्पोंके २८ | परागसे परिपूर्ण होनेके कारण उसपर मँडराते हुए भ्रमरोंसे सुशोभित अपने गलेमें पड़ी हुई माला मुनिको दे दी और उन्होंने सिर झुकाकर प्रसादरूपमें प्राप्त उस २ ९ मालाको स्वीकार कर लिया ॥ २८३ ॥

तदनन्तर वहाँसे तत्काल निकलकर वे तपस्वी मुनि दुर्वासा जगदम्बाके दर्शनार्थ आकाशमार्गसे वहाँ ३० आ गये, जहाँ साक्षात् सतीके पिता दक्ष विराजमान थे । मुनिने सतीके चरणोंमें नमन किया ॥ २ ९ -३० ॥ दक्षने उन मुनिसे पूछा - हे नाथ! यह अलौकिक ३१ माला किसकी है? पृथ्वीपर मनुष्योंके लिये परम दुर्लभ यह माला आपने कैसे प्राप्त कर ली? ॥३१ ॥

उनका यह वचन सुनकर प्रेमसे विह्वलहृदय तथा ३२ अश्रुपूरित नेत्रोंवाले मुनि दुर्वासाने कहा- यह भगवतीका अनुपम प्रसाद है ॥ ३२ ॥

तब सतीके पिता दक्षने उन मुनिसे उस मालाके ३३ लिये याचना की । ‘ तीनों लोकोंमें ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो देवीभक्तको न दी जा सके ' - ऐसा विचार ३४ करके मुनिने वह माला दक्षको दे दी । दक्षने सिर झुकाकर उस मालाको ग्रहण कर लिया और उसे अपने घरमें, जहाँपर पति - पत्नीकी अत्यन्त सुन्दर ३५ शय्या थी, वहीं पर रख दिया । उस मालाकी सुगन्धिसे मत होकर राजा दक्ष रातमें पशुकर्म ( स्त्री-समागम ) - में प्रवृत्त हुए । हे राजन्! उसी पाप - कर्मके ३६ प्रभावसे वे कल्याणकारी शंकर तथा देवी सतीके प्रति द्वेषबुद्धिवाले हो गये॥३३–३६ ॥ हे राजन्! उसी अपराधके परिणामस्वरूप सतीने ३७ सतीधर्म प्रदर्शित करनेके लिये उन दक्षसे उत्पन्न अपने शरीर को योगाग्नि से भस्म कर दिया । फिर वही ज्योति हिमालयके घर प्रादुर्भूत हुई ॥ ३७ ॥

जनमेजय बोले- [ हे मुने! ] जिन शिवके ॥ ३८ लिये सती प्राणोंसे भी अधिक प्रिय थीं, उन भगवान् शिवने सतीका शरीर भस्म हो जानेके उपरान्त उनके वियोगसे व्याकुल होकर क्या किया? ॥ ३८३ ॥

व्यासजी बोले- हे राजन्! उसके बाद जो ॥ ३ ९ कुछ हुआ, उसे कह सकने में मैं असमर्थ हूँ । शिवकी कोपाग्निसे तीनों लोकोंमें प्रलयकी स्थिति उत्पन्न हो

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अ ० ३० ] वीरभद्रः समुत्पन्नो भद्रकालीगणान्वितः ॥

त्रैलोक्यनाशनोद्युक्तो वीरभद्रो यदाभवत् ।

ब्रह्मादयस्तदा देवाः शङ्करं शरणं ययुः ॥

जाते सर्वस्वनाशेऽपि करुणानिधिरीश्वरः ।

अभयं दत्तवांस्तेभ्यो बस्तवक्त्रेण तं मनुम् ॥

अजीवयन्महात्मासौ ततः खिन्नो महेश्वरः ।

यज्ञवाटमुपागम्य रुरोद भृशदुःखितः ॥

अपश्यत्तां सतीं वह्नौ दह्यमानां तु चित्कलाम् ।

स्कन्धेऽप्यारोपयामास हा सतीति वदन्मुहुः ॥

बभ्राम भ्रान्तचित्तः सन्नानादेशेषु शङ्करः ।

तदा ब्रह्मादयो देवाश्चिन्तामापुरनुत्तमाम् ॥

विष्णुस्तु त्वरया तत्र धनुरुद्यम्य मार्गणैः ।

चिच्छेदावयवान्सत्यास्तत्तत्स्थानेषु तेऽपतन् ॥

तत्तत्स्थानेषु तत्रासीन्नानामूर्तिधरो हरः ।

उवाच च ततो देवान्स्थानेष्वेतेषु ये शिवाम् ॥

भजन्ति परया भक्त्या तेषां किञ्चिन्न दुर्लभम् । नित्यं सन्निहिता यत्र निजाङ्गेषु पराम्बिका स्थानेष्वेतेषु ये मर्त्याः पुरश्चरणकर्मिणः तेषां मन्त्राः प्रसिद्ध्यन्ति मायाबीजं विशेषतः इत्युक्त्वा शङ्करस्तेषु स्थानेषु विरहातुरः । कालं निन्ये नृपश्रेष्ठ जपध्यानसमाधिभिः जनमेजय उवाच कानि स्थानानि तानि स्युः सिद्धपीठानि चानघ कति संख्यानि नामानि कानि तेषां च मे वद तत्र स्थितानां देवीनां नामानि च कृपाकर कृतार्थोऽहं भवे येन तद्वदाशु महामुने सप्तम स्कन्ध १६१ ४० । गयी । उस समय वीरभद्र प्रकट हुए और जब वे वीरभद्र, भद्रकाली आदि गणोंको साथ लेकर तीनों लोकोंको नष्ट करनेके लिये तत्पर हुए, तब ४१ ब्रह्मा आदि देवता भगवान् शंकरकी शरणमें गये ॥ ३ ९ –४१ ॥ सर्वस्व - - न नाश हो जानेपर भी करुणानिधि परमेश्वर ४२ शिवने उन देवताओंको अभय प्रदान कर दिया और बकरेका सिर जोड़कर उन दक्षप्रजापतिको जीवित कर दिया । तदनन्तर वे महात्मा शिव उदास होकर ४३ यज्ञस्थलपर गये और अत्यन्त दुःखित होकर विलाप करने लगे ॥ ४२-४३ ॥ उन्होंने वहाँ चिन्मय शरीरवाली सतीको अग्निमें ४४ दग्ध होते हुए देखा । तब ' हा सती ' - ऐसा बार - बार बोलते हुए शिवने उस शरीरको अपने कन्धेपर रख लिया और भ्रमितचित्त होकर वे देश - देशमें भ्रमण ४५ करने लगे ॥४४३ ॥

इससे ब्रह्मा आदि देवता अत्यन्त चिन्तित हो उठे । विष्णुने शीघ्रतापूर्वक धनुष उठाकर बाणोंसे ४६ सतीके अंगोंको काट डाला । वे अंग जिन - जिन स्थानोंपर गिरे, उन - उन स्थानोंपर भगवान् शंकर अनेक विग्रह धारण करके प्रकट हो गये । ४५-४६३ ॥ ४७ तत्पश्चात् शिवने देवताओंसे कहा कि जो लोग इन स्थानोंपर महान् श्रद्धाके साथ भगवती शिवाकी ॥ ४८ आराधना करेंगे, उनके लिये कुछ भी दुर्लभ नहीं रहेगा; क्योंकि उन स्थानोंपर साक्षात् भगवती पराम्बा । अपने अंगोंमें सदा निहित हैं । जो मनुष्य इन स्थानोंपर ॥ ४ ९ पुरश्चरण करेंगे; उनके मन्त्र, विशेषरूपसे मायाबीज

मन्त्र अवश्य सिद्ध हो जायँगे । ४७ – ४ ९ ॥

हे नृपश्रेष्ठ! ऐसा कहकर सतीके विरहसे अधीर ॥ ५० भगवान् शिव उन स्थानोंमें जप, ध्यान और समाधिमें संलग्न होकर समय व्यतीत करने लगे ॥ ५० ॥

जनमेजय बोले - – हे अनघ! वे कौनसे । स्थान हैं, जो सिद्धपीठ हुए; वे संख्यामें कितने ॥ ५१ हैं, उनके क्या नाम हैं? मुझे बताइये । हे कृपाकर! हे महामुने! उन स्थानोंपर विराजमान देवियोंके नाम । भी शीघ्र बतला दीजिये, जिससे मैं कृतार्थ हो ॥ ५२ | जाऊँ ॥ ५१-५२ ॥ 1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] —6 A