देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 171–180
देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 171–180
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१६२ व्यास उवाच शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि देवीपीठानि साम्प्रतम् येषां श्रवणमात्रेण पापहीनो भवेन्नरः येषु येषु च पीठेषूपास्येयं सिद्धिकाङ्क्षिभिः भूतिकामैरभिध्येया तानि वक्ष्यामि तत्त्वतः वाराणस्यां विशालाक्षी गौरीमुखनिवासिनी क्षेत्रे वै नैमिषारण्ये प्रोक्ता सा लिङ्गधारिणी प्रयागे ललिता प्रोक्ता कामुकी गन्धमादने मानसे कुमुदा प्रोक्ता दक्षिणे चोत्तरे तथा विश्वकामा भगवती विश्वकामप्रपूरणी गोमन्ते गोमती देवी मन्दरे कामचारिणी ॥
मदोत्कटा चैत्ररथे जयन्ती हस्तिनापुरे ।
गौरी प्रोक्ता कान्यकुब्जे रम्भा तु मलयाचले ॥
एकाम्रपीठे सम्प्रोक्ता देवी सा कीर्तिमत्यपि ।
विश्वे विश्वेश्वरीं प्राहुः पुरुहूतां च पुष्करे ॥
केदारपीठे सम्प्रोक्ता देवी सन्मार्गदायिनी । मन्दा हिमवतः पृष्ठे गोकर्णे भद्रकर्णिका
स्थानेश्वरे भवानी तु बिल्वके बिल्वपत्रिका ।
श्रीशैले माधवी प्रोक्ता भद्रा भद्रेश्वरे तथा ॥
वराहशैले तु जया कमला कमलालये ।
रुद्राणी रुद्रकोट्यां तु काली कालञ्जरे तथा ॥
शालग्रामे महादेवी शिवलिङ्गे जलप्रिया ।
महालिङ्गे तु कपिला माकोटे मुकुटेश्वरी ॥
मायापुर्यां कुमारी स्यात्सन्ताने ललिताम्बिका ।
गयायां मङ्गला प्रोक्ता विमला पुरुषोत्तमे ॥
उत्पलाक्षी सहस्त्राक्षे हिरण्याक्षे महोत्पला ।
विपाशायाममोघाक्षी पाडला पुण्ड्रवर्धने ॥
नारायणी सुपार्श्वे तु त्रिकूटे रुद्रसुन्दरी ।
विपुले विपुला देवी कल्याणी मलयाचले ॥
1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –6 B श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३० व्यासजी बोले- हे राजन्! सुनिये, अब मैं । देवीपीठोंका वर्णन कर रहा हूँ, जिनके श्रवणमात्रसे ॥ ५३ मनुष्य पापरहित हो जाता है । सिद्धिकी अभिलाषा रखनेवाले तथा ऐश्वर्यकी कामना करनेवाले पुरुषोंके । द्वारा जिन - जिन स्थानोंपर इन देवीकी उपासना तथा ॥ ५४ इनका ध्यान किया जाना चाहिये, उन स्थानोंको मैं । तत्त्वपूर्वक बता रहा हूँ ॥ ५३-५४ ॥ वाराणसीमें गौरीके मुखमें निवास करनेवाली ॥ ५५ देवी विशालाक्षी प्रतिष्ठित हैं और नैमिषारण्यक्षेत्रमें वे । लिंगधारिणी नामसे कही गयी हैं ॥ ५५ ॥
॥ ५६ उन्हें प्रयागमें ' ललिता ' तथा गन्धमादनपर्वतपर । ' कामुकी ' नामसे कहा गया है । वे दक्षिण मानसरोवरमें ' कुमुदा ' तथा उत्तर मानसरोवरमें सभी कामनाएँ पूर्ण ५७ करनेवाली भगवती ' विश्वकामा ' कही गयी हैं । उन्हें गोमन्तपर देवी ‘ गोमती ', मन्दराचलपर ' कामचारिणी ', ५८ चैत्ररथमें ' मदोत्कटा ', हस्तिनापुरमें ' जयन्ती ', कान्यकुब्जमें ' गौरी ' तथा मलयाचलपर ' रम्भा ' कहा गया है ॥५६-५८ ॥ ५ ९ वे भगवती एकाम्रपीठपर ' कीर्तिमती ' नामवाली कही गयी हैं । लोग उन्हें विश्वपीठपर ' विश्वेश्वरी ' ॥ ६० और पुष्करमें ' पुरुहूता ' नामवाली कहते हैं ॥ ५ ९ ॥ वे देवी केदारपीठमें ' सन्मार्गदायिनी ', हिमवत्पृष्ठपर ' मन्दा ', गोकर्णमें ' भद्रकर्णिका ', स्थानेश्वरमें ' भवानी ', ६१ बिल्वकमें ' बिल्वपत्रिका ', श्रीशैलमें ' माधवी ' तथा भद्रेश्वरमें ' भद्रा ' कही गयी हैं ॥ ६०-६१ ॥ उन्हें वराहपर्वतपर ' जया ', कमलालयमें ६२' कमला ', रुद्रकोटिमें ' रुद्राणी ', कालंजरमें ' काली ', शालग्राममें ' महादेवी ', शिवलिंगमें ' जलप्रिया ', ६३ महालिङ्गमें ' कपिला ' और माकोटमें ' मुकुटेश्वरी ' कहा गया है ॥ ६२-६३ ॥ वे भगवती मायापुरीमें ' कुमारी ', सन्तानपीठमें ६४ ‘ ललिताम्बिका ', गयामें ‘ मंगला ' और पुरुषोत्तमक्षेत्रमें ' विमला ' कही गयी हैं । वे सहस्राक्षमें ' उत्पलाक्षी ', ६५ हिरण्याक्षमें ' महोत्पला ', विपाशामें ‘ अमोघाक्षी ’, पुण्ड्रवर्धनमें ‘ पाडला ', सुपार्श्वमें ' नारायणी ', त्रिकूटमें ' रुद्रसुन्दरी ', विपुल क्षेत्रमें ' विपुला ', मलयाचलपर ६६ | देवी ' कल्याणी ', सह्याद्रिपर्वतपर ' एकवीरा ', हरिश्चन्द्रमें
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अ ० ३० ] सप्तम
सह्याद्रावेकवीरा तु हरिश्चन्द्रे तु चन्द्रिका ।
रमणा रामतीर्थे तु यमुनायां मृगावती ॥ ६७
कोटवी कोटतीर्थे तु सुगन्धा माधवे वने ।
गोदावर्यां त्रिसन्ध्या तु गङ्गाद्वारे रतिप्रिया ॥ ६८
शिवकुण्डे शुभानन्दा नन्दिनी देविकातटे ।
रुक्मिणी द्वारवत्यां तु राधा वृन्दावने वने ॥ ६ ९
देवकी मथुरायां तु पाताले परमेश्वरी ।
चित्रकूटे तथा सीता विन्ध्ये विन्ध्याधिवासिनी ॥ ७०
करवीरे महालक्ष्मीरुमा देवी विनायके ।
आरोग्या वैद्यनाथे तु महाकाले महेश्वरी ॥ ७१
अभयेत्युष्णतीर्थेषु नितम्बा विन्ध्यपर्वते ।
माण्डव्ये माण्डवी नाम स्वाहा माहेश्वरीपुरे ॥ ७२
छगलण्डे प्रचण्डा तु चण्डिकामरकण्टके ।
सोमेश्वरे वरारोहा प्रभासे पुष्करावती ॥ ७३
देवमाता सरस्वत्यां पारावारा तटे स्मृता ।
महालये महाभागा पयोष्णयां पिङ्गलेश्वरी ॥ ७४
सिंहिका कृतशौचे तु कार्तिके त्वतिशाङ्करी ।
उत्पलावर्तके लोला सुभद्रा शोणसङ्गमे ॥ ७५
माता सिद्धवने लक्ष्मीरनङ्का भरताश्रमे ।
जालन्धरे विश्वमुखी तारा किष्किन्धपर्वते ॥ ७६
देवदारुवने पुष्टिर्मेधा काश्मीरमण्डले ।
भीमा देवी हिमाद्रौ तु तुष्टिर्विश्वेश्वरे तथा ॥ ७७
कपालमोचने शुद्धिर्माता कामावरोहणे ।
शङ्खोद्धारे धारा नाम धृतिः पिण्डारके तथा ॥ ७८
कला तु चन्द्रभागायामच्छोदे शिवधारिणी ।
वेणायाममृता नाम बदर्यामुर्वशी तथा ॥ ७ ९
औषधिश्चोत्तरकुरौ कुशद्वीपे कुशोदका ।
मन्मथा हेमकूटे तु कुमुदे सत्यवादिनी ॥ ८०
अश्वत्थे वन्दनीया तु निधिर्वैश्रवणालये ।
गायत्री वेदवदने पार्वती शिवसन्निधौ ॥ ८१
देवलोके तथेन्द्राणी ब्रह्मास्येषु सरस्वती ।
सूर्यबिम्बे प्रभा नाम मातॄणां वैष्णवी मता ॥ ८२
अरुन्धती सतीनां तु रामासु च तिलोत्तमा ।
चित्ते ब्रह्मकला नाम शक्तिः सर्वशरीरिणाम् ॥ ८३
स्कन्ध १६३ ‘ चन्द्रिका ', रामतीर्थमें ‘ रमणा ', यमुनामें ' मृगावती ', कोटतीर्थमें ' कोटवी ', माधववनमें ' सुगन्धा ', गोदावरीमें ‘ त्रिसन्ध्या ’, गंगाद्वारमें ' रतिप्रिया ', शिवकुण्डमें ' शुभानन्दा ', देविकातटपर ' नन्दिनी ', द्वारकामें ' रुक्मिणी ', वृन्दावनमें ' राधा ', मथुरामें ' देवकी ', पातालमें ' परमेश्वरी ', चित्रकूटमें ' सीता ', विन्ध्याचलपर ' विन्ध्यवासिनी ', करवीरक्षेत्रमें ' महालक्ष्मी ', विनायकक्षेत्रमें देवी ‘ उमा ’, वैद्यनाथधाममें ‘ आरोग्या ', महाकालमें ' महेश्वरी ', उष्णतीर्थोंमें ' अभया ', विन्ध्यपर्वतपर ' नितम्बा ', माण्डव्यक्षेत्रमें ‘ माण्डवी ' तथा माहेश्वरीपुरमें ' स्वाहा ' नामसे प्रतिष्ठित हैं ॥ ६४–७२ ॥ वे देवी छगलण्डमें ' प्रचण्डा ', अमरकण्टकमें ' चण्डिका ', सोमेश्वरमें ' वरारोहा ', प्रभासक्षेत्रमें ‘ पुष्करावती ’, सरस्वतीतीर्थमें ‘ देवमाता ’, समुद्रतटपर ' पारावारा ', महालय में ' महाभागा ' और पयोष्णीमें ' पिंगलेश्वरी ' नामसे प्रसिद्ध हुईं ॥ ७३-७४ ॥ वे कृतशौचक्षेत्रमें ' सिंहिका ', कार्तिक क्षेत्र में ' अतिशांकरी ', उत्पलावर्तकमें ' लोला ', सोनभद्रनदके संगमपर ' सुभद्रा ', सिद्धवनमें माता ' लक्ष्मी ', भरताश्रमतीर्थमें ‘ अनंगा ’, जालन्धरपर्वतपर ' विश्वमुखी ', किष्किन्धापर्वतपर ‘ तारा ’, देवदारुवनमें ' पुष्टि ', काश्मीर-मण्डलमें ' मेधा ', हिमाद्रिपर देवी ‘ भीमा ’, विश्वेश्वरक्षेत्र में ' तुष्टि ', कपालमोचनतीर्थमें ' शुद्धि ', कामावरोहणतीर्थमें ' माता ', शंखोद्धारतीर्थमें ' धारा ' और पिण्डारकतीर्थमें ' धृति ' नाम से विख्यात हैं॥७५–७८ ॥ चन्द्रभागानदीके तटपर ' कला ', अच्छोदक्षेत्रमें ' शिवधारिणी ', वेणानदीके किनारे ' अमृता ', बदरीवनमें ' उर्वशी ', उत्तरकुरुप्रदेशमें ' औषधि ', कुशद्वीपमें ' कुशोदका ', हेमकूटपर्वतपर ' मन्मथा ' कुमुदवनमें ‘ सत्यवादिनी ', अश्वत्थतीर्थमें ‘ वन्दनीया ', वैश्रवणालयक्षेत्रमें ‘ निधि ', वेदवदनतीर्थमें ' गायत्री ', भगवान् शिवके सांनिध्यमें ' पार्वती ', देवलोकमें ' इन्द्राणी ', ब्रह्माके मुखोंमें ' सरस्वती ', सूर्यके बिम्बमें ‘ प्रभा ’ तथा मातृकाओंमें ‘ वैष्णवी ' नामसे कही गयी हैं । सतियोंमें ' अरुन्धती ', अप्सराओंमें ' तिलोत्तमा ' और सभी शरीरधारियोंके चित्तमें ' ब्रह्मकला ' नामसे वे शक्ति प्रसिद्ध हैं ॥ ७ ९ -८३ ॥ 1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –6 C
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१६४ इमान्यष्ट शतानि स्युः पीठानि जनमेजय तत्संख्याकास्तदीशान्यो देव्यश्च परिकीर्तिताः सतीदेव्यङ्गभूतानि पीठानि कथितानि च अन्यान्यपि प्रसङ्गेन यानि मुख्यानि भूतले यः स्मरेच्छृणुयाद्वापि नामाष्टशतमुत्तमम् सर्वपापविनिर्मुक्तो देवीलोकं परं व्रजेत् एतेषु सर्वपीठेषु गच्छेद्यात्राविधानतः सन्तर्पयेच्च पित्रादीञ्छ्राद्धादीनि विधाय च कुर्याच्च महतीं पूजां भगवत्या विधानतः क्षमापयेज्जगद्धात्रीं जगदम्बां मुहुर्मुहुः कृतकृत्यं स्वमात्मानं जानीयाज्जनमेजय भक्ष्यभोज्यादिभिः सर्वान्ब्राह्मणान्भोजयेत्ततः सुवासिनी: कुमारीश्च बटुकादींस्तथा नृप तस्मिन्क्षेत्रे स्थिता ये तु चाण्डालाद्या अपि प्रभो देवीरूपाः स्मृताः सर्वे पूजनीयास्ततो हि ते श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३० । हे जनमेजय! ये एक सौ आठ सिद्धपीठ हैं और ॥ ८४ उन स्थानोंपर उतनी ही परमेश्वरी देवियाँ कही गयी हैं । भगवती सतीके अंगोंसे सम्बन्धित पीठोंको मैंने । बतला दिया; साथ ही इस पृथ्वीतलपर और भी अन्य ॥ ८५ जो प्रमुख स्थान हैं, प्रसंगवश उनका भी वर्णन कर दिया ॥ ८४-८५ ॥ । जो मनुष्य इन एक सौ आठ उत्तम नामोंका स्मरण अथवा श्रवण करता है, वह समस्त पापोंसे ॥ ८६ मुक्त होकर भगवतीके परम धाममें पहुँच जाता । है ॥ ८६ ॥
विधानके अनुसार इन सभी तीर्थोंकी यात्रा ॥ ८७ करनी चाहिये और वहाँ श्राद्ध आदि सम्पन्न करके पितरोंको सन्तृप्त करना चाहिये । तदनन्तर विधिपूर्वक । भगवतीकी विशिष्ट पूजा करनी चाहिये और फिर ॥ ८८ जगद्धात्री जगदम्बासे [ अपने अपराधके लिये ] बार-बार क्षमा - याचना करनी चाहिये । हे जनमेजय! ऐसा । करके अपने आपको कृतकृत्य समझना चाहिये । हे ॥ ८ ९ राजन्! तदनन्तर भक्ष्य और भोज्य आदि पदार्थ सभी ब्राह्मणों, सुवासिनी स्त्रियों, कुमारिकाओं तथा बटुओं । आदिको खिलाने चाहिये ॥ ८७-८९ ३ ॥ ॥ ९ ० हे प्रभो! उस क्षेत्रमें रहनेवाले जो चाण्डाल आदि हैं, वे भी देवीरूप कहे गये हैं । अतः उन । सबकी भी पूजा करनी चाहिये । उन सिद्धपीठक्षेत्रों में प्रतिग्रहादिकं सर्वं तेषु क्षेत्रेषु वर्जयेत् ॥ ९९ सभी प्रकारके दानग्रहण आदिका निषेध करना यथाशक्ति पुरश्चर्यां कुर्यान्मन्त्रस्य सत्तमः मायाबीजेन देवेशीं तत्तत्पीठाधिवासिनीम् पूजयेदनिशं राजन् पुरश्चरणकृद्भवेत् । वित्तशाठ्यं न कुर्वीत देवीभक्तिपरो नरः य एवं कुरुते यात्रां श्रीदेव्याः प्रीतमानसः सहस्रकल्पपर्यन्तं ब्रह्मलोके महत्तरे वसन्ति पितरस्तस्य सोऽपि देवीपुरे तथा अन्ते लब्ध्वा परं ज्ञानं भवेन्मुक्तो भवाम्बुधेः 1898 श्रीमद्देवी..... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] —6 D चाहिये । श्रेष्ठ साधकको चाहिये कि वह उन क्षेत्रों में । यथाशक्ति मन्त्रका पुरश्चरण करे और मायाबीज मन्त्रसे उन - उन क्षेत्रोंकी अधिष्ठात्री देवेश्वरीकी निरन्तर ॥ ९ २ उपासना करे । हे राजन्! इस प्रकार साधकको पुरश्चरणकर्ममें तत्पर रहना चाहिये । देवीकी भक्तिमें परायण पुरुषको चाहिये कि वह अनुष्ठान करते समय ॥ ९ ३ द्रव्यके व्ययमें कृपणता न करे॥९ ० – ९ ३ ॥ जो मनुष्य इस प्रकार श्रीदेवीके सिद्धपीठोंकी । प्रसन्न मनसे यात्रा करता है, उसके पितर हजार ॥ ९ ४ । कल्पोंतक महत्तर ब्रह्मलोकमें निवास करते हैं और अन्तमें वह भी परम ज्ञान प्राप्त करके संसार - सागरसे । मुक्त हो जाता है तथा देवीलोकमें निवास करता ॥ ९ ५ | है ॥ ९ ४ - ९ ५ ॥
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अ ० ३१ ] सप्तम
नामाष्टशतजापेन बहवः सिद्धतां गताः ।
यत्रैतल्लिखितं साक्षात्पुस्तके वापि तिष्ठति ॥ ९ ६
ग्रहमारी भयादीनि तत्र नैव भवन्ति हि ।
सौभाग्यं वर्धते नित्यं यथा पर्वणि वारिधिः ॥ ९ ७
न तस्य दुर्लभं किञ्चिन्नामाष्टशतजापिनः ।
कृतकृत्यो भवेन्नूनं देवीभक्तिपरायणः ॥ ९ ८
नमन्ति देवतास्तं वै देवीरूपो हि स स्मृतः ।
सर्वथा पूज्यते देवैः किं पुनर्मनुजोत्तमैः ॥ ९९
श्राद्धकाले पठेदेतन्नामाष्टशतमुत्तमम् ।
तृप्तास्तत्पितरः सर्वे प्रयान्ति परमां गतिम् ॥ १००
इमानि मुक्तिक्षेत्राणि साक्षात्संविन्मयानि च ।
सिद्धपीठानि राजेन्द्र संश्रयेन्मतिमान्नरः ॥ १०१
पृष्टं यत्तत्त्वया राजन्नुक्तं सर्वं महेशितुः ।
रहस्यातिरहस्यं च किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ १०२
स्कन्ध १६५ इन एक सौ आठ नामोंके जपसे अनेक लोग सिद्धि प्राप्त कर चुके हैं । जहाँपर यह अष्टोत्तरशतनाम स्वयं लिखा हुआ अथवा पुस्तकमें अंकित रूपमें स्थित रहता है, उस स्थानपर ग्रहों तथा महामारी आदिके उपद्रवका भय नहीं रहता और पर्वपर जैसे समुद्र बढ़ता है, वैसे ही वहाँ सौभाग्यकी नित्य वृद्धि होती है ॥ ९ ६ - ९ ७ ॥ इन एक सौ आठ नामोंका जप करनेवालेके लिये कुछ भी दुर्लभ नहीं रह जाता; ऐसा वह देवीभक्तिपरायण निश्चय ही कृतकृत्य हो जाता है । देवता भी उसे नमस्कार करते हैं; क्योंकि उसे देवीका ही रूप कहा गया है । देवतागण सब तरहसे उसकी पूजा करते हैं, तो फिर श्रेष्ठ मनुष्योंकी बात ही क्या! ॥ ९ ८ - ९९ ॥ जो व्यक्ति अपने पितरोंके श्राद्धके समय इस उत्तम अष्टोत्तरशतनामका पाठ करता है, उसके सभी पितर तृप्त होकर परम गति प्राप्त करते हैं ॥ १०० ॥
हे राजेन्द्र! ये सिद्धपीठ प्रत्यक्षज्ञानस्वरूप तथा मुक्तिक्षेत्र हैं, अतः बुद्धिमान् मनुष्यको इनका आश्रय ग्रहण करना चाहिये ॥ १०१ ॥
हे राजन्! आपने भगवती महेश्वरीके अत्यन्त निगूढ रहस्यके विषयमें जो कुछ पूछा था, वह सब मैंने बता । दिया; अब आप पुनः क्या सुनना चाहते हैं? ॥ १०२ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे देवीपीठवर्णनं नाम त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥
अथैकत्रिंशोऽध्यायः तारकासुरसे पीड़ित देवताओं द्वारा भगवतीकी स्तुति तथा भगवतीका हिमालयकी पुत्रीके रूपमें जनमेजय उवाच
धराधराधीशमौलावाविरासीत्परं महः ।
यदुक्तं भवता पूर्वं विस्तरात्तद्वदस्व मे ॥
को विरज्येत मतिमान् पिबञ्छक्तिकथामृतम् ।
सुधां तु पिबतां मृत्युः स नैतच्छृण्वतो भवेत् ॥
प्रकट होनेका आश्वासन देना जनमेजय बोले - [ हे मुने! ] हिमालयके शिखरपर आविर्भूत जिस परम ज्योतिके विषयमें आप १ पहले बता चुके हैं, उसे मुझे विस्तारसे बताइये ॥ १ ॥
ऐसा कौन बुद्धिमान् मनुष्य होगा, जो भगवतीके कथामृतका पान करता हुआ उससे विरत हो जाय; क्योंकि अमृत पीनेवालोंकी मृत्यु तो सम्भव है, किंतु इस २ । कथामृतका पान करनेवालेकी मृत्यु नहीं हो सकती ॥ २ ॥
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१६६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३१ व्यास उवाच
धन्योऽसि कृतकृत्योऽसि शिक्षितोऽसि महात्मभिः ।
भाग्यवानसि यद्देव्यां निर्व्याजा भक्तिरस्ति ते ॥ ३
शृणु राजन् पुरा वृत्तं सतीदेहेऽग्निभर्जिते ।
भ्रान्तः शिवस्तु बभ्राम क्वचिद्देशे स्थिरोऽभवत् ॥ ४
प्रपञ्चभानरहितः समाधिगतमानसः ।
ध्यायन्देवीस्वरूपं तु कालं निन्ये स आत्मवान् ॥ ५
सौभाग्यरहितं जातं त्रैलोक्यं सचराचरम् ।
शक्तिहीनं जगत्सर्वं साब्धिद्वीपं सपर्वतम् ॥ ६
आनन्दः शुष्कतां यातः सर्वेषां हृदयान्तरे ।
उदासीनाः सर्वलोकाश्चिन्ताजर्जरचेतसः ॥ ७
सदा दुःखोदधौ मग्ना रोगग्रस्तास्तदाभवन् ।
ग्रहाणां देवतानां च वैपरीत्येन वर्तनम् ॥ ८
अधिभूताधिदैवानां सत्यभावान्नृपाभवन् ।
अथास्मिन्नेव काले तु तारकाख्यो महासुरः ॥ ९
ब्रह्मदत्तवरो दैत्योऽभवत्त्रैलोक्यनायकः ।
शिवौरसस्तु यः पुत्रः स ते हन्ता भविष्यति ॥ १०
इति कल्पितमृत्युः स देवदेवैर्महासुरः ।
शिवौरससुताभावाज्जगर्ज च ननन्द च ॥ ११
तेन चोपद्रुताः सर्वे स्वस्थानात्प्रच्युताः सुराः ।
शिवौरससुताभावाच्चिन्तामापुर्दुरत्ययाम् ॥१२
नाङ्गना शङ्करस्यास्ति कथं तत्सुतसम्भवः ।
अस्माकं भाग्यहीनानां कथं कार्यं भविष्यति ॥ १३
व्यासजी बोले- - आप धन्य हैं, कृतकृत्य हैं, भाग्यवान् हैं और महात्माओंद्वारा शिक्षित किये गये हैं; इसीसे भगवतीके प्रति आपकी निश्छल भक्ति है ॥३ ॥
हे राजन्! एक प्राचीन कथा सुनिये । अग्निमें सतीदेहके दग्ध हो जानेपर भगवान् शिव व्याकुल होकर इधर - उधर भ्रमण करने लगे और अन्तमें किसी स्थानपर ठहर गये । इसके बाद उन आत्मनिष्ठ शिवने प्रपंचज्ञानसे शून्य होकर मनको समाधिस्थ करके भगवतीके स्वरूपका ध्यान करते हुए कुछ समय वहीं पर व्यतीत किया ॥ ४-५ ॥ स्थावर - जंगममय तीनों लोक सौभाग्यसे रहित हो गये । समुद्रों, द्वीपों और पर्वतोंसहित सम्पूर्ण जगत् शक्तिहीन हो गया । सभी प्राणियोंके हृदयमें प्रवहमान आनन्द सूख गया और सभी लोग चिन्तासे पीड़ित मनवाले तथा खिन्नमनस्क हो गये । सभी दुःखरूपी समुद्रमें डूब गये और रोगग्रस्त हो गये । हे राजन्! सतीके अभाव से उस समय ग्रहों, देवताओं, अधिभूत तथा अधिदैवत— इन सबका व्यवहार विपरीत हो गया और समस्त प्राणी अपनी मर्यादासे विचलित हो गये ॥ ६–८३ ॥ उसी समय तारक नामक एक महान् असुर उत्पन्न हुआ । वह दैत्य ब्रह्माजीसे वरदान पाकर तीनों लोकोंका शासक हो गया । भगवान् शंकरका जो औरस पुत्र होगा, वही तुम्हारा संहारक होगा-देवाधिदेव ब्रह्माद्वारा इस प्रकारकी कल्पित मृत्युका वर पाकर वह महासुर तारक शंकरजीके औरस पुत्रके अभावके कारण [ निर्भीक होकर ] गर्जन तथा निनाद करने लगा ॥ ९ -११ ॥ इससे सभी देवता अपना - अपना स्थान छोड़कर भाग गये । शिवका कोई औरस पुत्र न होनेके कारण देवताओंको महान् चिन्ता हुई । वे सोचने लगे कि शंकरजीकी भार्या तो है नहीं, तो पुत्रोत्पत्ति कैसे होगी? ऐसी स्थितिमें हम भाग्यहीनोंका कार्य किस प्रकार सिद्ध होगा? ॥ १२-१३ ॥
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अ ० ३१ ]
इति चिन्तातुराः सर्वे जग्मुर्वैकुण्ठमण्डले ।
शशंसुर्हरिमेकान्ते स चोपायं जगाद ह ॥
कुतश्चिन्तातुराः सर्वे कामकल्पद्रुमा शिवा ।
जागर्ति भुवनेशानी मणिद्वीपाधिवासिनी ॥
अस्माकमनया देव तदुपेक्षास्ति नान्यथा ।
शिक्षैवेयं जगन्मात्रा कृतास्मच्छिक्षणाय च ॥
लालने ताडने मातुर्नाकारुण्यं यथार्भके ।
तद्वदेव जगन्मातुर्नियन्त्र्या गुणदोषयोः ॥
अपराध भवत्येव तनयस्य पदे पदे । कोऽपरः सहते लोके केवलं मातरं विना तस्माद्यूयं पराम्बां तां शरणं यात मा चिरम् । निर्व्याजया चित्तवृत्त्या सा वः कार्यं विधास्यति
इत्यादिश्य सुरान्सर्वान्महाविष्णुः स्वजायया ।
संयुतो निर्जगामाशु देवैः सह सुराधिपः ॥
आजगाम महाशैलं हिमवन्तं नगाधिपम् अभवंश्च सुराः सर्वे पुरश्चरणकर्मिणः अम्बायज्ञविधानज्ञा अम्बायज्ञं च चक्रिरे तृतीयादिव्रतान्याशु चक्रुः सर्वे सुरा नृप केचित्समाधिनिष्णाताः केचिन्नामपरायणाः केचित्सूक्तपराः केचिन्नामपारायणोत्सुकाः मन्त्रपारायणपराः केचित्कृच्छ्रादिकारिणः अन्तर्यागपराः केचित्केचिन्यासपरायणाः हृल्लेखया पराशक्तेः पूजां चकुरतन्द्रिता इत्येवं बहुवर्षाणि कालोऽगाज्जनमेजय सप्तम स्कन्ध १६७ इस प्रकारकी चिन्तासे व्याकुल सभी देवता १४ वैकुण्ठलोक गये और उन्होंने एकान्तमें भगवान् विष्णुसे सब कुछ बताया । इसपर उन्होंने उपाय बताते हुए कहा - आप सब चिन्तासे व्यग्र क्यों हो रहे हैं? वे भगवती शिवा कामनाएँ पूर्ण करनेवाले कल्पवृक्षके १५ समान हैं । मणिद्वीपमें विराजमान रहनेवाली भगवती भुवनेश्वरी सदा जागती रहती हैं ॥ १४-१५ ॥ हमलोगोंके दोषके कारण ही हमारे प्रति १६ उनकी उपेक्षा है, कोई अन्य कारण नहीं है । हमें सीख प्रदान करनेके लिये ही जगदम्बाने हमें यह शिक्षा प्रदान की है ॥ १६ ॥
१७ जिस प्रकार प्यार करने अथवा डाँटने - फटकारने— किसी भी स्थिति में माता बालकके प्रति निर्दयताका व्यवहार नहीं करती, वैसे ही गुण - दोषपर नियन्त्रण करनेवाली ॥ १८ जगदम्बाके विषयमें भी जानना चाहिये ॥ १७ ॥
पुत्रसे तो पग - पगपर अपराध होता है, माताको छोड़कर जगत् में दूसरा कौन उसे सह सकता है । ॥ १ ९ अतः आपलोग निष्कपट चित्तवृत्तिके साथ उन भगवती पराम्बाकी शरण में अविलम्ब जाइये । वे आपलोगों का कार्य अवश्य सिद्ध करेंगी ॥ १८-१९ ॥ २० सभी देवताओंको यह उपदेश देकर देवेश्वर महाविष्णु अपनी भार्या लक्ष्मी तथा देवताओंके साथ । शीघ्र चल पड़े और महाद्रि गिरिराज हिमालयपर आ ॥ २१ गये । वहाँ सभी देवता पुरश्चरण कर्ममें संलग्न हो गये । हे राजन्! अम्बायज्ञकी विधि जाननेवाले देवतागण । अम्बायज्ञ करने लगे । सभी देवता शीघ्रतापूर्वक तृतीया आदि व्रत सम्पादित करनेमें लग गये ॥ २० - २२ ॥ ॥ २२ कुछ लोग समाधि लगाकर बैठ गये, कुछ लोग । भगवतीके नामजपमें लीन हो गये, कुछ लोग सूक्तपाठ करने लगे और कुछ लोग नामोंका पारायण करनेमें ॥ २३ निष्णात हो गये । इसी प्रकार कुछ देवता मन्त्रपारायणमें तत्पर हो गये, कुछ कृच्छ्रव्रत करने लगे, कुछ अन्तर्याग । करनेमें संलग्न हो गये और कुछ देवता न्यास आदिमें ॥ २४ तत्पर हो गये । कुछ देवता सावधान होकर हल्लेखाबीज-मन्त्रसे पराशक्ति जगदम्बाकी पूजा करने लगे । हे । जनमेजय! इस प्रकार बहुत वर्षोंतक भगवतीकी ॥ २५ । आराधना करते हुए समय व्यतीत हुआ ॥ २३ - २५ ॥
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१६८ अकस्माच्चैत्रमासीयनवम्यां च भृगोर्दिने प्रादुर्बभूव पुरतस्तन्महः श्रुतिबोधितम् ॥
चतुर्दिक्षु चतुर्वेदैर्मूर्तिमद्भिरभिष्टुतम् ।
कोटिसूर्यप्रतीकाशं चन्द्रकोटिसुशीतलम् ॥
विद्युत्कोटिसमानाभमरुणं तत्परं महः । नैव चोर्ध्वं न तिर्यक्च न मध्ये परिजग्रभत्
आद्यन्तरहितं तत्तु न हस्ताद्यङ्गसंयुतम् ।
न च स्त्रीरूपमथवा न पुंरूपमथोभयम् ॥
दीप्त्या पिधानं नेत्राणां तेषामासीन्महीपते ।
पुनश्च धैर्यमालम्ब्य यावत्ते ददृशुः सुराः ॥
तावत्तदेव स्त्रीरूपेणाभाद्दिव्यं मनोहरम् ।
अतीव रमणीयाङ्गीं कुमारीं नवयौवनाम् ॥
उद्यत्पीनकुचद्वन्द्वनिन्दिताम्भोजकुड्मलाम् ।
रणत्किङ्किणिकाजालसिञ्जन्मञ्जीरमेखलाम् ॥
कनकाङ्गदकेयूरग्रैवेयकविभूषिताम् अनर्घ्यमणिसम्भिन्नगलबन्धविराजिताम् ॥ तनुकेतकसंराजन्नीलभ्रमरकुन्तलाम् I नितम्बबिम्बसुभगां रोमराजिविराजिताम् ॥ कर्पूरशकलोन्मिश्रताम्बूलपूरिताननाम् I कनत्कनकताटङ्कविटङ्कवदनाम्बुजाम् ॥ अष्टमीचन्द्रविम्बाभललाटामायतभ्रुवम् I रक्तारविन्दनयनामुन्नसां मधुराधराम् ॥ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३१ । तदनन्तर चैत्रमासकी शुक्लपक्षकी नवमी २६ तिथिमें शुक्रवारको श्रुतियोंद्वारा प्रतिपादित एक महान् ज्योति अकस्मात् सबके समक्ष प्रकट हुई । चारों वेद मूर्तिमान् होकर चारों दिशाओंमें उसकी स्तुति कर रहे थे, वह ज्योति करोड़ों सूर्योकी प्रभाके समान आलोकित २७ थी, उसमें करोड़ों चन्द्रमाओंकी शीतलता विद्यमान थी, वह करोड़ों बिजलियोंके समान अरुण आभासे युक्त थी, वह परम ज्योति न ऊँची, न तिरछी, न ॥ २८ मध्यमें अपितु सभी ओर व्याप्त थी । आदि और अन्तसे हीन वह तेज हाथ आदि अंगोंसे युक्त नहीं था । वह तेज न स्त्रीरूप, न पुरुषरूप अथवा न २ ९ उभयरूपमें ही था ॥ २६–२९ ॥ हे राजन्! उस ज्योतिकी दीप्तिसे उन देवताओंकी आँखें बन्द हो गयीं । इसके बाद धैर्य धारणकर जब देवताओंने देखा तब वह दिव्य तथा ३० मनोहर आभा उन्हें नव - यौवनसे सम्पन्न अति सुन्दर अंगोंवाली तथा कुमारी अवस्थावाली स्त्रीके रूपमें दृष्टिगोचर हुई ॥ ३०-३१ ॥ ३१ उनके उन्नत तथा विशाल दोनों वक्ष: स्थल पूर्ण विकसित कमलको भी तिरस्कृत कर रहे थे । वे बजती हुई किंकिणी तथा मधुर ध्वनि करती ३२ हुई नूपुर एवं करधनी धारण किये हुए थीं । वे सुवर्णके बाजूबन्द, मुकुट तथा कण्ठहारसे सुशोभित थीं । वे बहुमूल्य मणियोंसे जड़ा हुआ हार गलेमें धारण किये हुए थीं । केतकीके नूतन पत्तों ३३ समान उनके कपोलोंपर काले भ्रमरसदृश केश लटक रहे थे । उनका नितम्बस्थल अत्यन्त मनोहर था । वे सुन्दर रोमावलियोंसे अत्यन्त शोभा पा रही ३४ थीं । उनका मुख कर्पूरके छोटे - छोटे टुकड़ोंसे युक्त ताम्बूलसे परिपूर्ण था । उनके कमलसदृश मुखपर सुवर्णमय कुण्डलकी मधुर ध्वनि हो रही थी । उनका ललाट अष्टमीके चन्द्रमण्डलकी आभाके समान ३५ | सुशोभित हो रहा था और उसपर उनकी फैली हुई विशाल भौंहें महान् शोभा पा रही थीं । उनके नेत्र लाल कमलके समान थे, नासिका उन्नत थी तथा ३६ ओष्ठ मधुर थे || ३२ - ३६ ॥
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अ ० ३१ ] सप्तम स्कन्ध १६ ९
कुन्दकुड्मलदन्ताग्रां मुक्ताहारविराजिताम् ।
रत्नसम्भिन्नमुकुटां चन्द्ररेखावतंसिनीम् ॥
मल्लिकामालतीमालाकेशपाशविराजिताम् ।
काश्मीरबिन्दुनिटिलां नेत्रत्रयविलासिनीम् ॥
पाशाङ्कुशवराभीतिचतुर्बाहुं त्रिलोचनाम् ।
रक्तवस्त्रपरीधानां दाडिमीकुसुमप्रभाम् ॥
सर्वशृङ्गारवेषाढ्यां सर्वदेवनमस्कृताम् ।
सर्वाशापूरिकां सर्वमातरं सर्वमोहिनीम् ॥
प्रसादसुमुखीमम्बां मन्दस्मितमुखाम्बुजाम् ।
अव्याजकरुणामूर्तिं ददृशुः पुरतः सुराः ॥
दृष्ट्वा तां करुणामूर्तिं प्रणेमुः सादरं सुराः ।
वक्तुं नाशक्नुवन् किञ्चिद्वाष्पसंरुद्धनिःस्वनाः ॥
कथञ्चित्स्थैर्यमालम्ब्य भक्त्या चानतकन्धराः ।
प्रेमाश्रुपूर्णनयनास्तुष्टुवुर्जगदम्बिकाम् ॥
देवा ऊचुः
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः ।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम् ॥
तामग्निवर्णां तपसा ज्वलन्तीं वैरोचनीं कर्मफलेषु जुष्टाम् । दुर्गां देव शरणमहं प्रपद्ये सुतरसि तरसे नमः ॥ देवीं वाचमजनयन्त देवा-स्तां विश्वरूपाः पशवो वदन्ति । सा नो मन्द्रेषमूर्जं दुहाना धेनुर्वागस्मानुपसुष्टुतैतु ॥ वे भगवती कुन्दकी पूर्ण विकसित कलियोंके ३७ समान सुन्दर दाँतोंसे सुशोभित थीं । वे मोतियोंकी माला धारण किये हुए थीं । वे रत्नजटित मुकुट पहने हुई थीं । वे चन्द्ररेखारूपी शिरोभूषणसे सुशोभित हो रही थीं; उनके केशकी वेणीमें मल्लिका और मालती ३८ पुष्पोंकी माला विद्यमान थी । केसरकी बिन्दीसे उनका ललाट सुशोभित था । वे तीन नेत्रोंसे शोभा पा रही थीं । तीन नेत्रोंवाली वे अपनी चारों भुजाओंमें पाश, ३ ९ अंकुश, वर और अभय मुद्राएँ धारण किये हुए थीं । वे लाल रंगका वस्त्र पहने हुए थीं । उनके शरीर की प्रभा दाडिमके पुष्पके समान थी । वे शृंगारके सभी ४० वेषोंसे अलंकृत थीं और समस्त देवताओंसे नमस्कृत हो रही थीं । इस प्रकार देवताओंने सभी प्राणियों की आशाओंको पूर्ण करनेवाली, सभीकी जननी, सबको ४१ मोहित करनेवाली, प्रसन्नतायुक्त सुन्दर मुखमण्डलवाली, मन्द - मन्द मुसकानयुक्त मुखकमलवाली और विशुद्ध करुणाकी साक्षात् मूर्तिस्वरूपा माता जगदम्बाको ४२ अपने सामने देखा ॥ ३७–४१ ॥ उन करुणामूर्ति भगवतीको देखकर देवताओंने आदरपूर्वक उन्हें प्रणाम किया । आनन्दाश्रुसे रुँधे हुए ४३ कण्ठवाले सभी देवता कुछ भी नहीं बोल सके ॥ ४२ ॥
किसी प्रकार धैर्य धारणकर प्रेमके आँसुओंसे परिपूर्ण नेत्रोंवाले वे देवगण शीश झुकाकर भक्तिपूर्वक जगदम्बिकाकी स्तुति करने लगे ॥ ४३ ॥
देवताओंने कहा- देवीको नमस्कार है, महादेवी ४४ शिवाको निरन्तर नमस्कार है, प्रकृति एवं भद्राको नमस्कार है; हमलोग नियमपूर्वक उन्हें प्रणाम करते हैं ॥ ४४ ॥
उन अग्निसदृश वर्णवाली, ज्ञानसे जगमगानेवाली, दीप्तिमयी, कर्मफलोंकी प्राप्तिहेतु सेवन की जानेवाली भगवती दुर्गाकी शरण हम ग्रहण करते हैं । पार ४५ करनेयोग्य संसार - सागरसे तरनेके लिये उन भगवतीको नमस्कार है ॥ ४५ ॥
विश्वरूप देवताओंने जिस वैखरी वाणीको उत्पन्न किया, उसीको अनेक प्रकारके प्राणी बोलते हैं । वे कामधेनुतुल्य, आनन्ददायिनी और अन्न तथा बल देनेवाली वाग्रूपिणी भगवती उत्तम स्तुति से ४६ । संतुष्ट होकर हमारे समीप पधारें ॥ ४६ ॥
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१७० कालरात्रिं ब्रह्मस्तुतां वैष्णवीं स्कन्दमातरम् सरस्वतीमदितिं दक्षदुहितरं नमामः पावनां शिवाम् ॥
महालक्ष्म्यै च विद्महे सर्वशक्त्यै च धीमहि ।
तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥
नमो विराट्स्वरूपिण्यै नमः सूत्रात्ममूर्तये । नमोऽव्याकृतरूपिण्यै नमः श्रीब्रह्ममूर्तये
यदज्ञानाज्जगद्भाति रज्जुसर्पस्त्रगादिवत् ।
यज्ज्ञानाल्लयमाप्नोति नुमस्तां भुवनेश्वरीम् ॥
नुमस्तत्पदलक्ष्यार्थां चिदेकरसरूपिणीम् ।
अखण्डानन्दरूपां तां वेदतात्पर्यभूमिकाम् ॥
पञ्चकोशातिरिक्तां तामवस्थात्रयसाक्षिणीम् ।
नुमस्त्वंपदलक्ष्यार्थं प्रत्यगात्मस्वरूपिणीम् ॥
नमः प्रणवरूपायै नमो ह्रींकारमूर्तये । नानामन्त्रात्मिकायै ते करुणायै नमो नमः
इति स्तुता तदा देवैर्मणिद्वीपाधिवासिनी ।
प्राह वाचा मधुरया मत्तकोकिलनिः स्वना ॥
देव्युवाच वदन्तु विबुधाः कार्यं यदर्थमिह सङ्गताः । वरदाहं सदा भक्तकामकल्पद्रुमास्मि च
तिष्ठन्त्यां मयि का चिन्ता युष्माकं भक्तिशालिनाम् ।
समुद्धरामि मद्भक्तान्दुःखसंसारसागरात् ॥
इति प्रतिज्ञां मे सत्यां जानीथ विबुधोत्तमाः । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३१ । हम सब देवतागण कालरात्रिस्वरूपिणी, वेदोंद्वारा ४७ स्तुत, विष्णुकी शक्तिस्वरूपा, स्कन्दमाता ( शिवशक्ति ), सरस्वती ( ब्रह्मशक्ति ), देवमाता अदिति, दक्षपुत्री सती तथा पावन भगवती शिवाको नमस्कार करते हैं ॥ ४७ ॥
हम महालक्ष्मीको जानते हैं और उन सर्वशक्ति-४८ | स्वरूपिणीका ध्यान करते हैं । वे भगवती हमें इस ज्ञान - ध्यानमें प्रवृत्त करें ॥ ४८ ॥
विराट्रूप धारण करनेवालीको नमस्कार ॥ ४ ९ है, सूक्ष्मरूप धारण करनेवालीको नमस्कार है, अव्यक्तरूप धारण करनेवालीको नमस्कार है और श्रीब्रह्ममूर्तिस्वरूपिणी देवीको नमस्कार है ॥ ४ ९ ॥ जिन भगवतीको न जाननेके कारण यह जगत् ५० मनुष्यको रस्सीमें सर्प, माला आदिकी भाँति प्रतीत होता है और जिसे जान लेनेपर यह भ्रान्ति नष्ट हो जाती है, उन जगदीश्वरीको हम नमस्कार करते हैं ॥ ५० ॥
५१ ' तत् ' पदकी लक्ष्यार्थ, एकमात्र चिन्मय स्वरूपवाली, अखण्डानन्दस्वरूपिणी तथा वेदोंके तात्पर्यकी भूमिकास्वरूपिणी उन भगवतीको हम नमन करते हैं ॥ ५१ ॥
५२ पंचकोशसे अतिरिक्त, तीनों अवस्थाओंकी साक्षिणी, ' त्वम् ' पदकी लक्ष्यार्थ तथा प्रत्यगात्मस्वरूपिणी उन जगदम्बाको हम नमस्कार करते हैं ॥ ५२ ॥
॥ ५३ प्रणवरूपवाली भगवतीको नमस्कार है । ह्रींकारविग्रहवाली भगवतीको नमस्कार है । अनेक मन्त्रोंके स्वरूपवाली आप करुणामयी देवीको बार-बार नमस्कार है ॥५३ ॥
५४ देवताओंके इस प्रकार स्तुति करनेपर मणिद्वीपमें निवास करनेवाली तथा मत्त कोयलके समान ध्वनि करनेवाली भगवती मधुर वाणीमें कहने लगीं ॥ ५४ ॥
देवी बोलीं- आप सभी देवतागण अपना वह ॥ ५५ कार्य बताइये, जिसके लिये आप सब यहाँ एकत्रित हुए हैं । सर्वदा वर प्रदान करनेवाली मैं भक्तोंकी कामना पूर्ण करनेहेतु कल्पवृक्ष हूँ ॥५५ ॥
मेरे रहते भक्तिपरायण आप सब देवताओंको ५६ | कौन - सी चिन्ता है? मैं इस दुःखमय संसारसागरसे अपने भक्तोंका उद्धार कर देती हूँ । हे श्रेष्ठ देवतागण! आपलोग मेरी इस प्रतिज्ञाको सत्य समझिये ॥ ५६३ ॥
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अ ० ३१ ] इति प्रेमाकुलां वाणीं श्रुत्वा सन्तुष्टमानसाः ॥ निर्भया निर्जरा राजन्नूचुर्दुःखं स्वकीयकम् । देवा ऊचुः नाज्ञातं किञ्चिदप्यत्र भवत्यास्ति जगत्त्रये ॥
सर्वज्ञया सर्वसाक्षिरूपिण्या परमेश्वरि ।
तारकेणासुरेन्द्रेण पीडिताः स्मो दिवानिशम् ॥
शिवाङ्गजाद्वधस्तस्य निर्मितो ब्रह्मणा शिवे ।
शिवाङ्गना तु नैवास्ति जानासि त्वं महेश्वरि ॥
सर्वज्ञपुरतः किं वा वक्तव्यं पामरैर्जनैः ।
एतदुद्देशतः प्रोक्तमपरं तर्कयाम्बिके ॥
सर्वदा चरणाम्भोजे भक्तिः स्यात्तव निश्चला ।
प्रार्थनीयमिदं मुख्यमपरं देहहेतवे ॥
इति तेषां वचः श्रुत्वा प्रोवाच परमेश्वरी ।
मम शक्तिस्तु या गौरी भविष्यति हिमालये ॥
शिवाय सा प्रदेया स्यात्सा वः कार्यं विधास्यति ।
भक्तिर्मच्चरणाम्भोजे भूयाद्युष्माकमादरात् ॥
हिमालयो हि मनसा मामुपास्तेऽतिभक्तितः ।
ततस्तस्य गृहे जन्म मम प्रियकरं मतम् ॥
व्यास उवाच हिमालयोऽपि तच्छ्रुत्वात्यनुग्रहकरं वचः । बाष्पैः संरुद्धकण्ठाक्षो महाराज्ञीं वचोऽब्रवीत् महत्तरं तं कुरुषे यस्यानुग्रहमिच्छसि । नोचेत्क्वाहं जडः स्थाणुः क्व त्वं सच्चित्स्वरूपिणी असम्भाव्यं जन्मशतैस्त्वत्पितृत्वं ममानघे । अश्वमेधादिपुण्यैर्वा पुण्यैर्वा तत्समाधिजैः अद्य प्रपञ्चे कीर्तिः स्याज्जगन्माता सुताभवत् । अहो हिमालयस्यास्य धन्योऽसौ भाग्यवानिति सप्तम स्कन्ध १७१ ५७ हे राजन्! भगवतीकी यह स्नेहमयी वाणी सुनकर देवताओंके मनमें अत्यन्त प्रसन्नता हुई और वे निर्भय होकर उनसे अपना दुःख कहने लगे ॥ ५७३ ॥
देवता बोले- हे परमेश्वरि! इस त्रिलोकीमें ऐसा ५८ कुछ भी नहीं है, जो सब कुछ जाननेवाली तथा सबकी साक्षिस्वरूपा आप भगवतीके लिये अज्ञात हो ॥ ५८३ ॥
हे शिवे! असुरराज तारक हमलोगोंको दिन - रात ५ ९ पीड़ित कर रहा है । ब्रह्माजीने शिवजीके औरसपुत्रके द्वारा उसका वध सुनिश्चित किया है । हे महेश्वरि! आप तो जानती ही हैं कि शिवकी कोई भार्या नहीं है ६० हम अल्पबुद्धि प्राणी सब कुछ जाननेवाली आपसे क्या कहें, [ आप देह धारणकर अवतरित हों ] इसी प्रयोजनसे ६१ हमलोगोंने आपसे निवेदन किया है । हे अम्बिके! दूसरी बात भी ध्यान रखें । आपके चरणकमलमें हमलोगों की अविचल भक्ति सर्वदा बनी रहे । देहकी रक्षाके निमित्त ६२ यह हमारा दूसरा मुख्य निवेदन है ॥ ५ ९ -६२ ॥ उनकी यह बात सुनकर भगवती परमेश्वरीने कहा-' गौरी ' नामक मेरी जो शक्ति है, वह हिमालयके घर ६३ आविर्भूत होगी | आपलोग ऐसा प्रयत्न कीजिये कि वह शिवको प्रदान कर दी जाय, वही गौरी आपलोगोंका कार्य सिद्ध करेगी । मेरे चरणकमलमें आपलोगोंकी भक्ति ६४ सदा आदरपूर्वक बनी रहे । हिमालय भी अत्यन्त भक्तिके साथ मनोयोगसे मेरी उपासना कर रहे हैं; अतः उनके घर जन्म लेना मैंने प्रियकर माना है । ६३–६५ ॥ ६५ व्यासजी बोले - – [ वहाँ देवताओंके साथ विद्यमान ] हिमालयने भी देवीकी वह अति कृपापूर्ण वाणी सुनकर आँसुओंसे रुँधे कंठ तथा अश्रुपूर्ण नेत्रोंसे महाराज्ञी भगवतीसे यह वचन कहा - आप जिसपर ॥ ६६ कृपा करना चाहती हैं, उसे अति महान् बना देती हैं अन्यथा कहाँ जड़ तथा स्थाणु मैं और कहाँ सच्चित्स्वरूपिणी आप ॥ ६६-६७ ॥ ॥ ६७ हे अनघे! सैकड़ों जन्मोंमें अश्वमेध आदि यज्ञों तथा समाधिसे प्राप्त होनेवाले पुण्योंसे भी आपका ॥ ६८ पिता बन पाना असम्भव है । अब जगत् में मेरी कीर्ति फैल जायगी । लोग कहेंगे - अहो! इस हिमालयकी पुत्रीके रूपमें स्वयं जगज्जननी उत्पन्न हुई हैं, ये बड़े ॥ ६ ९ धन्य तथा भाग्यशाली हैं ॥ ६८-६९ ॥