देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 181–190

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 181–190

पृष्ठ 181

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१७२ यस्यास्तु जठरे सन्ति ब्रह्माण्डानां च कोटयः । सैव यस्य सुता जाता को वा स्यात्तत्समो भुवि न जानेऽस्मत्पितॄणां किं स्थानं स्यान्निर्मितं परम् एतादृशानां वासाय येषां वंशेऽस्ति मादृशः इदं यथा च दत्तं मे कृपया प्रेमपूर्णया सर्ववेदान्तसिद्धं च त्वद्रूपं ब्रूहि मे तथा योगं च भक्तिसहितं ज्ञानं च श्रुतिसम्मतम् । वदस्व परमेशानि त्वमेवाहं यतो भवेः व्यास उवाच इति तस्य वचः श्रुत्वा प्रसन्नमुखपङ्कजा वक्तुमारभताम्बा सा रहस्यं श्रुतिगूहितम् श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३२ जिनके उदरमें करोड़ों ब्रह्माण्ड स्थित हैं, वे ही ॥ ७० जगदम्बा जिसकी कन्या होकर जन्म लें, उसके समान इस पृथ्वीपर कौन हो सकता है? ॥ ७० ॥

। जिनके वंशमें मेरे जैसा [ भाग्यशाली ] उत्पन्न हुआ है, मेरे ऐसे उन पूर्वजोंके निवासके लिये कैसा श्रेष्ठ ॥ ७१ स्थान निर्मित हुआ होगा - यह मैं नहीं जानता ॥ ७१ ॥

जिस प्रकार आपने स्नेहपूर्ण कृपा करके मुझे | गौरीका पिता होनेका अवसर प्रदान किया, उसी ॥ ७२ प्रकार अब आप सम्पूर्ण वेदान्तके सिद्धान्तभूत अपने स्वरूपको मुझे बताइये ॥ ७२ ॥

हे परमेश्वरि! वेदसम्मत ज्ञान, भक्ति तथा ॥ ७३ योगका मुझे उपदेश करें, जिससे मैं आपके स्वरूपको प्राप्त हो जाऊँ ॥ ७३ ॥

व्यासजी बोले – उनकी यह बात सुनकर प्रसन्नतासे प्रफुल्लित मुखकमलवाली उन भगवतीने । श्रुतियोंमें निहित रहस्यका वर्णन करना आरम्भ ॥ ७४ | किया ॥ ७४ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे हिमालयगृहे पार्वतीजन्मविषये देवान् प्रति देवीकथनवर्णनं नामैकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥

अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः देवीगीताके प्रसंगमें भगवतीका हिमालयसे माया तथा अपने स्वरूपका वर्णन देव्युवाच

शृण्वन्तु निर्जराः सर्वे व्याहरन्त्या वचो मम ।

यस्य श्रवणमात्रेण मद्रूपत्वं प्रपद्यते ॥

अहमेवास पूर्वं तु नान्यत्किञ्चिन्नगाधिप ।

तदात्मरूपं चित्संवित्परब्रह्मैकनामकम् ॥

अप्रतर्क्यमनिर्देश्यमनौपम्यमनामयम् 1 तस्य काचित्स्वतः सिद्धा शक्तिर्मायेति विश्रुता ॥

न सती सा नासती सा नोभयात्मा विरोधतः ।

एतद्विलक्षणा काचिद्वस्तुभूतास्ति सर्वदा ॥

देवी बोलीं- सभी देवता मेरे द्वारा कहे जानेवाले वचनको सुनें, जिसके श्रवणमात्रसे मनुष्य मेरे स्वरूपको प्राप्त हो जाता है ॥ १ ॥

१ हे पर्वतराज! पूर्वमें केवल मैं ही थी और कुछ भी नहीं था । उस समय मेरा रूप चित्, संवित् ( ज्ञानस्वरूप ) और परब्रह्म नामवाला था । उसके २ सम्बन्धमें कोई तर्क नहीं किया जा सकता, इदमित्थं रूपसे उसका निर्देश नहीं किया जा सकता, उसकी कोई उपमा नहीं है तथा वह विकाररहित है ॥ २३ ॥

भगवतीकी कोई स्वत: सिद्ध शक्ति है, जो माया ३ नामसे प्रसिद्ध है । वह शक्ति न सत् है, न असत् है और दोनोंमें विरोध होनेके कारण वह सत् - असत्— उभयरूप भी नहीं है । सत् - असत् इन दोनोंसे विलक्षण ४ ४ । वह माया कोई अन्य ही वस्तु है ॥ ३४ ॥

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अ ० ३२ ]

पावकस्योष्णतेवेयमुष्णांशोरिव दीधितिः ।

चन्द्रस्य चन्द्रिकेवेयं ममेयं सहजा ध्रुवा ॥

तस्यां कर्माणि जीवानां जीवाः कालाश्च सञ्चरे ।

अभेदेन विलीनाः स्युः सुषुप्तौ व्यवहारवत् ॥

स्वशक्तेश्च समायोगादहं बीजात्मतां गता ।

स्वाधारावरणात्तस्या दोषत्वं च समागतम् ॥

चैतन्यस्य समायोगान्निमित्तत्वं च कथ्यते ।

प्रपञ्चपरिणामाच्च समवायित्वमुच्यते ॥

केचित्तां तप इत्याहुस्तमः केचिज्जडं परे ।

ज्ञानं मायां प्रधानं च प्रकृतिं शक्तिमप्यजाम् ॥

विमर्श इति तां प्राहुः शैवशास्त्रविशारदाः ।

अविद्यामितरे प्राहुर्वेदतत्त्वार्थचिन्तकाः ॥

एवं नानाविधानि स्युर्नामानि निगमादिषु ।

तस्या जडत्वं दृश्यत्वाज्ज्ञाननाशात्ततोऽसती ॥।

चैतन्यस्य न दृश्यत्वं दृश्यत्वे जडमेव तत् ।

स्वप्रकाशं च चैतन्यं न परेण प्रकाशितम् ॥

अनवस्थादोषसत्त्वान्न स्वेनापि प्रकाशितम् ।

कर्मकर्त्रीविरोधः स्यात्तस्मात्तद्दीपवत्स्वयम् ॥

प्रकाशमानमन्येषां भासकं विद्धि पर्वत ।

अतएव च नित्यत्वं सिद्धसंवित्तनोर्मम ॥

सप्तम स्कन्ध १७३ जैसे अग्निमें उसकी उष्णता सदा रहती है, ५ सूर्यमें प्रकाशकी किरण रहती है और चन्द्रमामें उसकी चन्द्रिका विद्यमान रहती है, उसी प्रकार यह माया निश्चितरूपसे सदा मेरी सहचरी है ॥ ५ ॥

जैसे सुषुप्ति - अवस्थामें व्यवहार समाप्त ६ हो जाता है, उसी प्रकार प्रलयकालमें समस्त जीव, काल तथा जीवोंके कर्म उन्हीं भगवतीमें अभेदरूपसे विलीन हो जाते हैं ॥ ६ ॥

मैं अपनी उसी शक्तिके समायोगसे बीजरूपको ७ प्राप्त हुई अर्थात् मुझमें सृष्टिके कर्तृत्वका उदय हुआ । उस मायाके अपने आधाररूपी आवरणके कारण मुझमें उसका कुछ दोष आ गया अर्थात् चैतन्यादिका तिरोधान हो गया ॥ ७ ॥

८ चैतन्यके सम्बन्धसे मुझे संसारका निमित्तकारण कहा जाता है और मेरा परिणामरूप यह सृष्टिप्रपंच मुझसे ही उत्पन्न होता है तथा मुझमें ही विलीन होता है, अतः मुझे समवायिकारण कहा जाता है ॥ ८ ॥

९ कुछ लोग उस शक्तिको तप, कुछ लोग तम तथा दूसरे लोग उसे जड— - ऐसा कहते हैं 1 । इसी प्रकार कुछ लोग उसे ज्ञान, माया, प्रधान, प्रकृति, शक्ति तथा अजा कहते हैं और शैवशास्त्रके मनीषी उसे विमर्श १० भी कहते हैं । वेदतत्त्वार्थको जाननेवाले अन्य पुरुष उसे अविद्या कहते हैं । इस प्रकार वेद आदिमें उस शक्तिके नानाविध नाम प्रतिपादित हैं ॥ ९ -१०३ ॥ केवल दिखायी देनेके कारण वह जड है ११ और ज्ञानप्राप्तिसे नष्ट होनेके कारण वह असत् है । चैतन्य दिखायी नहीं पड़ता और जो दिखायी पड़ता है, वह जड ही है । चैतन्य स्वयं प्रकाशस्वरूप १२ है, वह दूसरेसे प्रकाशित नहीं होता । वह अपने द्वारा भी प्रकाशित नहीं है; क्योंकि इससे अनवस्थाका दोष आ जायगा । कर्मत्व और कर्तृत्व- ये दोनों विरुद्ध धर्म एक अधिकरणमें नहीं रह सकते, अतः १३ यह नहीं कहा जा सकता कि वह चैतन्य अपने द्वारा प्रकाशित होता है । प्रत्युत हे पर्वत! दीपककी भाँति प्रकाशमान उसे सूर्य आदि दूसरोंका प्रकाशक समझिये । अतएव मेरे ज्ञानरूप शरीरका नित्यत्व १४ | स्पष्टतः सिद्ध है ॥११–१४ ॥

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१७४ जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्यादौ दृश्यस्य व्यभिचारतः । संविदो व्यभिचारश्च नानुभूतोऽस्ति कर्हिचित् यदि तस्याप्यनुभवस्तर्ह्ययं येन साक्षिणा अनुभूतः स एवात्र शिष्टः संविद्वपुः पुरा अतएव च नित्यत्वं प्रोक्तं सच्छास्त्रकोविदैः । आनन्दरूपता चास्याः परप्रेमास्पदत्वतः मान भूवं हि भूयासमिति प्रेमात्मनि स्थितम् । सर्वस्यान्यस्य मिथ्यात्वादसङ्गत्वं स्फुटं मम अपरिच्छिन्नताप्येवमत एव मता मम । तच्च ज्ञानं नात्मधर्मो धर्मत्वे जडतात्मनः ज्ञानस्य जडशेषत्वं न दृष्टं न च सम्भवि चिद्धर्मत्वं तथा नास्ति चितश्चिन्न हि भिद्यते तस्मादात्मा ज्ञानरूपः सुखरूपश्च सर्वदा सत्य: पूर्णोऽप्यसङ्गश्च द्वैतजालविवर्जितः स पुनः कामकर्मादियुक्तया स्वीयमायया । पूर्वानुभूतसंस्कारात् कालकर्मविपाकतः अविवेकाच्च तत्त्वस्य सिसृक्षावान्प्रजायते अबुद्धिपूर्वः सर्वोऽयं कथितस्ते नगाधिप एतद्धि यन्मया प्रोक्तं मम रूपमलौकिकम् अव्याकृतं तदव्यक्तं मायाशबलमित्यपि श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३२ जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति आदि अवस्थाओंमें ॥ १५ संवित् ( ज्ञानस्वरूप स्वयं ) का अभाव प्रतीत न होकर प्रत्युत तीनों अवस्थाओंका अभाव अनुभवमें आता है, इस प्रकार कभी भी संवित्का अभाव अनुभवमें नहीं । आता है । अतः संवित्के अभावका अनुभव न होनेके ॥ १६ कारण उसका नित्यत्व स्वतः सिद्ध है । यदि किसीको संवित् अभावका अनुभव होता है तो जिस साक्षीके द्वारा उस संविद्रूपके अभावका अनुभव होता है, वही संवित्का स्वरूप होगा । अतः उत्तम शास्त्रोंके ॥ १७ ज्ञाता विद्वानोंने उसे नित्य कहा है । वह परम प्रेमास्पद है, अतः उसमें आनन्दरूपता भी है ॥ १५–१७ ॥ पूर्वमें मेरा अभाव था, ऐसा नहीं; मैं तब भी थी और प्रेमरूपमें सबकी आत्मामें स्थित थी । अन्य ॥ १८ सभी वस्तुओंके मिथ्या होनेके कारण मेरा उन वस्तुओंसे सम्बन्ध न रहना स्वयं स्पष्ट है; अतः यह मेरे रूपकी अपरिच्छिन्नता ( व्यापकता ) भी कही गयी है । वह ज्ञान आत्माका धर्म नहीं है, अन्यथा ॥ १ ९ धर्मत्व होनेसे उसमें जडता आ सकती है । ज्ञानके किसी भी अंशमें जडता और अनित्यताको न कभी । देखा गया और न देखा जा सकता है । ज्ञानरूप चित् आत्मरूप चित्का धर्म नहीं है; क्योंकि आत्मरूप चित् ॥ २० और ज्ञानरूप चित् एक ही हैं और धर्मिधर्मीभाव एकत्र सम्भव नहीं है । अतः आत्मा सर्वदा ज्ञानरूप । तथा सुखरूप है; वह सत्य, पूर्ण और असंग है तथा ॥ २१ द्वैत - जालसे रहित है ॥ १८-२१ ॥ वही आत्मा काम अर्थात् इच्छा तथा कर्म अर्थात् अदृष्ट आदिके साथ युक्त होकर अपनी मायासे पूर्वमें किये गये अनुभवोंके संस्कार, कालके द्वारा किये गये ॥ २२ कर्मके परिपाक और तत्त्वोंके अविवेकसे सृष्टि करनेकी इच्छावाला हो जाता है । हे पर्वतराज हिमालय! मैंने आपसे अबुद्धिपूर्वक ( शयनके अनन्तर परमात्माकी । जो जागरणरूप अवस्था है वह बुद्धिपूर्वक नहीं है ) ॥ २३ हुए इस सृष्टिक्रमका वर्णन किया है ॥ २२-२३ ॥ यह मैंने आपसे अपने जिस रूपके विषयमें कहा है; वह अलौकिक, अव्याकृत ( प्रारम्भिक ), अव्यक्त । ( सृष्टिका आदिकारण ) तथा मायाशबल ( मायासे ॥ २४ | आवृत ) भी है || २४ ॥

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अ ० ३२ ] सप्तम

प्रोच्यते सर्वशास्त्रेषु सर्वकारणकारणम् ।

तत्त्वानामादिभूतं च सच्चिदानन्दविग्रहम् ॥ २५

सर्वकर्मघनीभूतमिच्छाज्ञानक्रियाश्रयम् 1 ह्रींकारमन्त्रवाच्यं तदादितत्त्वं तदुच्यते ॥ २६

तस्मादाकाश उत्पन्नः शब्दतन्मात्ररूपकः ।

भवेत्स्पर्शात्मको वायुस्तेजोरूपात्मकं पुनः ॥ २७

जलं रसात्मकं पश्चात्ततो गन्धात्मिका धरा ।

शब्दैकगुण आकाशो वायुः स्पर्शरवान्वितः ॥ २८

शब्दस्पर्शरूपगुणं तेज इत्युच्यते बुधैः ।

शब्दस्पर्शरूपरसैरापो वेदगुणाः स्मृताः ॥२ ९

शब्दस्पर्शरूपरसगन्धैः पञ्चगुणा धरा ।

तेभ्योऽभवन्महत्सूत्रं यल्लिङ्गं परिचक्षते ॥ ३०

सर्वात्मकं तत्सम्प्रोक्तं सूक्ष्मदेहोऽयमात्मनः ।

अव्यक्तं कारणो देहः स चोक्तः पूर्वमेव हि ॥ ३१

यस्मिञ्जगद्बीजरूपं स्थितं लिङ्गोद्भवो यतः ।

ततः स्थूलानि भूतानि पञ्चीकरणमार्गतः ॥ ३२

पञ्चसंख्यानि जायन्ते तत्प्रकारस्त्वथोच्यते ।

पूर्वोक्तानि च भूतानि प्रत्येकं विभजेद् द्विधा ॥ ३३

एकैकं भागमेकस्य चतुर्धा विभजेद् गिरे ।

स्वस्वेतरद्वितीयांशे योजनात्पञ्च पञ्च ते ॥३४

तत्कार्यं च विराड्देहः स्थूलदेहोऽयमात्मनः ।

पञ्चभूतस्थसत्त्वांशैः श्रोत्रादीनां समुद्भवः ॥ ३५

स्कन्ध १७५ समस्त शास्त्रोंमें इसे सभी कारणोंका कारण; महत्, अहंकार आदि तत्त्वोंका आदिकारण तथा सत्-चित् - आनन्दमय विग्रहवाला बताया गया है ॥ २५ ॥

उस रूपको सम्पूर्ण कर्मोंका साक्षी, इच्छा - ज्ञान तथा क्रियाशक्तिका अधिष्ठान, ह्रींकार मन्त्रका वाच्य ( अर्थ ) और आदितत्त्व कहा गया है ॥ २६ ॥

उसीसे शब्दतन्मात्रावाला आकाश, स्पर्शतन्मात्रावाला वायु और पुनः रूपतन्मात्रावाला तेज उत्पन्न हुआ । इसके बाद रसात्मक जल तथा पुनः गन्धात्मक पृथ्वीकी [ क्रमशः ] उत्पत्ति हुई । आकाश शब्द नामक एक गुणसे; वायु शब्द तथा स्पर्श- इन दो गुणोंसे और तेज शब्द, स्पर्श, रूप— इन तीन गुणोंसे युक्त हुए - ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं । इसी प्रकार शब्द, स्पर्श, रूप तथा रस - ये चार गुण जलके कहे गये हैं । शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध - इन पाँच गुणोंसे युक्त पृथ्वी है ॥ २७–२९ ३ ॥ उन्हीं पृथ्वी आदि सूक्ष्म भूतोंसे महान् व्यापक सूत्र उत्पन्न हुआ, जिसे लिंग शब्दसे कहा जाता है; वह सर्वात्मक कहा गया है । यही परमात्माका सूक्ष्म शरीर है । जिसमें यह जगत् बीजरूपमें स्थित है और जिससे लिंगदेहकी उत्पत्ति हुई है, वह अव्यक्त कहा जाता है और वह परब्रह्मका कारणशरीर है; उसके विषयमें पहले ही कहा जा चुका है । ३०-३१३ ॥ तदनन्तर उसी अव्यक्तशरीर ( लिंगशरीर ) -से पंचीकरणप्रक्रियाके द्वारा पाँच स्थूल भूत उत्पन्न होते हैं । अब उस पंचीकरणप्रक्रियाका वर्णन किया जा रहा है । पूर्वमें कहे गये पाँच भूतों ( पृथ्वी, जल, तेज, वायु तथा आकाश ) -में प्रत्येक भूतके दो बराबर-बराबर भाग करके प्रत्येक भूतके प्रथम आधे भागको । पुनः चार भागों में विभक्त कर दे । इस प्रकार प्रथम भागके विभक्त चतुर्थांशको अन्य चार भूतोंके अवशिष्ट अर्धांशमें संयोजित कर दे । इस प्रकार प्रत्येक भूतके अर्धांशमें तदतिरिक्त चार भूतोंके अंशका योग होनेसे पाँचों स्थूल भूतोंका निर्माण हो जाता है । इस प्रकार पंचीकृतभूतरूपी कारणके द्वारा जो कार्य ( सृष्टिप्रपंच ) उत्पन्न हुआ, वही विराट् शरीर है और वही । परमात्माका स्थूल देह है । हे राजेन्द्र! पंचभूतोंमें

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१७६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३२

ज्ञानेन्द्रियाणां राजेन्द्र प्रत्येकं मिलितैस्तु तैः ।

अन्तःकरणमेकं स्याद् वृत्तिभेदाच्चतुर्विधम् ॥

यदा तु संकल्पविकल्पकृत्यं तदा भवेत्तन्मन इत्यभिख्यम् । स्याद् बुद्धिसंज्ञं च यदा प्रवेत्ति सुनिश्चितं संशयहीनरूपम् ॥

अनुसन्धानरूपं तच्चित्तं च परिकीर्तितम् ।

अहङ्कृत्यात्मवृत्त्या तु तदहङ्कारतां गतम् ॥

तेषां रजोंशैर्जातानि क्रमात्कर्मेन्द्रियाणि च ।

प्रत्येकं मिलितैस्तैस्तु प्राणो भवति पञ्चधा ॥

हृदि प्राणो गुदेऽपानो नाभिस्थस्तु समानकः ।

कण्ठदेशेऽप्युदानः स्याद् व्यानः सर्वशरीरगः ॥

ज्ञानेन्द्रियाणि पञ्चैव पञ्चकर्मेन्द्रियाणि च ।

प्राणादिपञ्चकं चैव धिया च सहितं मनः ॥

एतत्सूक्ष्मं शरीरं स्यान्मम लिङ्गं यदुच्यते ।

तत्र या प्रकृतिः प्रोक्ता सा राजन्द्विविधा स्मृता ॥।

सत्त्वात्मिका तु माया स्यादविद्या गुणमिश्रिता ।

स्वाश्रयं या तु संरक्षेत्सा मायेति निगद्यते ॥

तस्यां यत्प्रतिबिम्बं स्याद् बिम्बभूतस्य चेशितुः ।

स ईश्वरः समाख्यातः स्वाश्रयज्ञानवान्परः ॥

सर्वज्ञः सर्वकर्ता च सर्वानुग्रहकारकः ।

अविद्यायां तु यत्किञ्चित्प्रतिबिम्बं नगाधिप ॥

तदेव जीवसंज्ञं स्यात्सर्वदुःखाश्रयं पुनः ।

सम्प्रोक्तं देहत्रयमविद्यया ॥

स्थित सत्त्वांशोंके परस्पर मिलनेसे श्रोत्र आदि पाँच ३६ ज्ञानेन्द्रियों तथा एक अन्त: करणकी उत्पत्ति हुई, जो वृत्तिभेदसे चार प्रकार ( मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार ) -का हो जाता है ॥ ३२–३६ ॥ जब उसमें संकल्प - विकल्पवृत्तिका उदय होता है, तब उस अन्त: करणको मन कहा जाता है । जब वह अन्त: करण संशयरहित निश्चयात्मक वृत्तिसे युक्त ३७ होता है, तब उसकी बुद्धि संज्ञा होती है । अनुसन्धान ( चिन्तन ) - वृत्तिके आनेपर वही अन्तःकरण चित्त कहा जाता है और अहंकृतिवृत्तिसे संयुक्त होनेपर वह ३८ अन्त: करण अहंकारसंज्ञक हो जाता है ॥ ३७-३८ ॥ तदनन्तर उन पाँच भूतोंके राजस अंशोंसे क्रमशः पाँच कर्मेन्द्रियाँ उत्पन्न हुईं । प्रत्येक राजस ३ ९ अंशोंके मिलनेसे पाँच प्रकारके प्राण उत्पन्न हुए । प्राण हृदयमें, अपान गुदामें, समान नाभिमें, उदान कंठमें तथा व्यान सम्पूर्ण शरीरमें व्याप्त हुआ । ४० इस प्रकार पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, प्राण आदि पाँच वायु और बुद्धिसहित मन - इन्हीं सत्रह अवयवोंवाला मेरा सूक्ष्म शरीर है, जिसे लिंग शब्दसे ४१ भी कहा जाता है ॥ ३ ९ –४१३ ॥ हे राजन्! जो प्रकृति कही गयी है, वह भी दो भेदोंवाली बतायी गयी है । शुद्धसत्त्वप्रधान प्रकृति माया है तथा मलिनसत्त्वप्रधान प्रकृति ४२ अविद्या है । जो प्रकृति अपने आश्रित रहनेवालेकी रक्षा करती है अर्थात् आवरण या व्यामोह नहीं करती, उसे माया कहा जाता है । उस शुद्ध सत्त्वप्रधान ४३ मायामें बिम्बरूप परमात्माका जो प्रतिबिम्ब होता है, वही ईश्वर कहा गया है । वह ईश्वर अपने आश्रय अर्थात् व्यापक ब्रह्मको जाननेवाला, परात्पर, सर्वज्ञ, ४४ सब कुछ करनेवाला तथा समस्त प्राणियोंके ऊपर कृपा करनेवाला है ॥ ४२–४४३ ॥ हे पर्वतराज हिमालय! [ मलिनसत्त्वप्रधान ] ४५ अविद्यामें जो परमात्माका प्रतिबिम्ब है, वही जीव कहा जाता है और वही जीव अविद्याके द्वारा आनन्दांशका आवरण कर देनेके कारण सभी दुःखोंका ४६ आश्रय हो जाता है । माया - अविद्याके कारण ईश्वर

पृष्ठ 186

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अ ० ३३ ] सप्तम

देहत्रयाभिमानाच्चाप्यभून्नामत्रयं पुनः ।

प्राज्ञस्तु कारणात्मा स्यात्सूक्ष्मदेही तु तैजसः ॥ ४७

स्थूलदेही तु विश्वाख्यस्त्रिविधः परिकीर्तितः ।

एवमीशोऽपि सम्प्रोक्त ईशसूत्रविराट्पदैः ॥ ४८

प्रथमो व्यष्टिरूपस्तु समष्ट्यात्मा परः स्मृतः ।

स हि सर्वेश्वरः साक्षाज्जीवानुग्रहकाम्यया ॥ ४ ९

करोति विविधं विश्वं नानाभोगाश्रयं पुनः ।

मच्छक्तिप्रेरितो नित्यं मयि राजन् प्रकल्पितः ॥ ५० ।

स्कन्ध १७७ और जीव- इन दोनोंके तीन देह तथा देहत्रयके अभिमानके कारण तीन नाम कहे जाते हैं । कारणदेहाभिमानी जीवको प्राज्ञ, सूक्ष्मदेहाभिमानीको तैजस तथा स्थूलदेहाभिमानीको विश्व - इन तीन प्रकारवाला कहा गया है । इसी प्रकार ईश्वर भी ईश, सूत्र तथा विराट् नामोंसे कहा गया है । जीवको व्यष्टिरूप तथा परमेश्वरको समष्टिरूप कहा गया है । वे सर्वेश्वर मेरी मायाशक्तिसे प्रेरित होकर जीवोंपर कृपा ' करने की कामना विविध भोगोंसे युक्त विश्वोंकी सृष्टि करते हैं । हे राजन्! मेरी शक्तिके अधीन होकर वे ईश्वर रज्जुमें सर्पकी भाँति मुझ ब्रह्मरूपिणीमें नित्य कल्पित हैं ॥ ४५–५० ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे देवीगीतायां देव्या व्यष्टिसमष्टिरूपवर्णनं नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥

अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः भगवतीका अपनी सर्वव्यापकता बताते हुए विराट्रूप प्रकट करना, भयभीत देवताओंकी स्तुति से प्रसन्न भगवतीका पुनः सौम्यरूप धारण करना देव्युवाच

मन्मायाशक्तिसंक्लृप्तं जगत्सर्वं चराचरम् ।

सापि मत्तः पृथङ्माया नास्त्येव परमार्थतः ॥ १

व्यवहारदृशा सेयं विद्या मायेति विश्रुता ।

तत्त्वदृष्ट्या तु नास्त्येव तत्त्वमेवास्ति केवलम् ॥ २

साहं सर्वं जगत्सृष्ट्वा तदन्तः प्रविशाम्यहम् ।

मायाकर्मादिसहिता गिरे प्राणपुरःसरा ॥ ३

लोकान्तरगतिर्नोचेत्कथं स्यादिति हेतुना ।

यथा यथा भवन्त्येव मायाभेदास्तथा तथा ॥ ४

उपाधिभेदाद्भिन्नाहं घटाकाशादयो यथा ।

उच्चनीचादिवस्तूनि भासयन्भास्करः सदा ॥ ५

न दुष्यति तथैवाहं दोषैर्लिप्ता कदापि न । देवी बोलीं- [ हे हिमालय! ] यह सम्पूर्ण चराचर जगत् मेरी मायाशक्तिसे ही उत्पन्न हुआ है 1 परमार्थदृष्टिसे विचार करनेपर वह माया भी मुझसे पृथक् नहीं है । व्यवहारदृष्टिसे वह विद्या ही ' माया ’ इस नामसे प्रसिद्ध है । तत्त्वदृष्टिसे भेदसम्बन्ध नहीं है, दोनों एक ही तत्त्व हैं ॥ १-२ ॥ हे गिरे! मैं सम्पूर्ण जगत्का सृजनकर माया और कर्म आदिके साथ प्राणोंको आगे करके उस जगत्के भीतर प्रवेश करती हूँ, अन्यथा संसारके सभी क्रिया-कलाप कैसे हो पाते? इसी कारणसे मैं ऐसा करती हूँ । माया भेदानुसार मेरे विभिन्न कार्य होते हैं । जिस प्रकार आकाश एक होते हुए भी घटाकाश आदि अनेक नामोंसे व्यवहृत है, उसी प्रकार मैं एक होती हुई भी उपाधिभेदसे भिन्न हूँ ॥ ३-४३ ॥ जिस प्रकार उत्तम और निकृष्ट - सभी वस्तुओंको सदा प्रकाशित करता हुआ सूर्य कभी भी दूषित नहीं होता, उसी प्रकार मैं कभी उपाधियोंके दोषोंसे लिप्त नहीं होती हूँ ॥५३ ॥

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१७८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३३ मयि बुद्ध्यादिकर्तृत्वमध्यस्यैवापरे जनाः वदन्ति चात्मा कर्मेति विमूढा न सुबुद्धयः अज्ञानभेदतस्तद्वन्मायाया भेदतस्तथा जीवेश्वरविभागश्च कल्पितो माययैव तु घटाकाशमहाकाशविभागः कल्पितो यथा तथैव कल्पितो भेदो जीवात्मपरमात्मनोः यथा जीवबहुत्वं च माययैव न च स्वतः तथेश्वरबहुत्वं च मायया न स्वभावतः देहेन्द्रियादिसङ्घातवासनाभेदभेदिता अविद्या जीवभेदस्य हेतुर्नान्यः प्रकीर्तितः गुणानां वासनाभेदभेदिता या धराधर माया सा परभेदस्य हेतुर्नान्यः कदाचन मयि सर्वमिदं प्रोतमोतं च धरणीधर ईश्वरोऽहं च सूत्रात्मा विराडात्माऽहमस्मि च ब्रह्माहं विष्णुरुद्रौ च गौरी ब्राह्मी च वैष्णवी सूर्योऽहं तारकाश्चाहं तारकेशस्तथास्म्यहम् पशुपक्षिस्वरूपाहं चाण्डालोऽहं च तस्करः व्याधोऽहं क्रूरकर्माहं सत्कर्माहं महाजनः स्त्रीपुन्नपुंसकाकारो ऽप्यहमेव न संशयः यच्च किञ्चित्क्वचिद्वस्तु दृश्यते श्रूयतेऽपि वा अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्याहं सर्वदा स्थिता न तदस्ति मया त्यक्तं वस्तु किञ्चिच्चराचरम् यद्यस्ति चेत्तच्छून्यं स्याद्वन्ध्यापुत्रोपमं हि तत् ॥ ६ कुछ अज्ञानी मुझमें बुद्धि इत्यादिके कर्तृत्वका आरोपकर मुझे आत्मा तथा कर्मकी संज्ञा देते हैं, । किंतु विज्ञजन ऐसा नहीं करते । जिस प्रकार ॥ ७ घटरूप उपाधिके द्वारा महाकाशका घटाकाशसे भेद कल्पित होता है, उसी प्रकार [ ईश्वर तथा । जीवमें वास्तविक भेद न होनेपर भी ] अज्ञानरूप उपाधिके द्वारा ही जीवका ईश्वरसे भेद मायाके द्वारा ॥ ८ कल्पित है ॥ ६–८३ ॥ जैसे मायाके प्रभावसे ही जीव अनेक प्रतीत होते । हैं; जो वास्तवमें अनेक नहीं हैं, वैसे ही माया ॥ ९ । प्रभावसे ईश्वरकी भी विविधताका भान होता है न कि अपने स्वभाववश ॥ ९ ३ ॥ । विभिन्न जीवोंके देह तथा इन्द्रियके समूहमें जैसे ॥ १० भेदकी प्रतीति अविद्याके कारण है ( वास्तविक नहीं है ), उसी प्रकार जीवोंमें भेद अविद्याके कारण है, । इसमें दूसरेको हेतु नहीं बताया गया है । हे धराधर! गुणों ( सत्त्व, रज तथा तम ) - में उन गुणों के कार्यरूप ॥ ११ वासनाके भेदसे जो भिन्नताकी प्रतीति करनेवाली है, । वही माया एक पदार्थसे दूसरे पदार्थमें भेदका हेतु है, कोई अन्य कभी नहीं ॥ १०-११३ ॥ ॥ १२ हे धरणीधर! यह समग्र जगत् मुझमें ओतप्रोत है । मैं ईश्वर हूँ, मैं सूत्रात्मा हूँ तथा मैं ही विराट् । आत्मा हूँ । मैं ही ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्र हूँ । गौरी, ॥ १३ ब्राह्मी और वैष्णवी भी मैं ही हूँ ॥ १२-१३ ॥ मैं ही सूर्य हूँ, मैं ही चन्द्रमा हूँ और तारे भी । मैं ही हूँ । पशु - पक्षी आदि भी मेरे ही स्वरूप हैं । ॥ १४ चाण्डाल, तस्कर, व्याध, क्रूर कर्म करनेवाला, सत्कर्म करनेवाला तथा महान् पुरुष - ये सब मैं ही हूँ । स्त्री, । पुरुष तथा नपुंसकके रूपमें मैं ही हूँ; इसमें कोई संशय ॥ १५ नहीं है ॥ १४-१५ ॥ जो कुछ भी वस्तु जहाँ कहीं भी देखने या । सुनने में आती है - वह चाहे भीतर अथवा बाहर कहीं भी विद्यमान हो, उन सबको व्याप्तकर उनमें सर्वदा ॥ १६ मैं ही स्थित रहती हूँ ॥ १६ ॥

चराचर कोई भी वस्तु मुझसे रहित नहीं है । यदि मुझसे शून्य कोई वस्तु मान ली जाय तो वह ॥ १७ । वन्ध्यापुत्रके समान असम्भव ही है ॥१७ ॥

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अ ० ३३ ] सप्तम स्कन्ध १७ ९

रज्जुर्यथा सर्पमालाभेदैरेका विभाति हि ।

तथैवेशादिरूपेण भाम्यहं नात्र संशयः ॥

अधिष्ठानातिरेकेण कल्पितं तन्न भासते ।

तस्मान्मत्सत्तयैवैतत्सत्तावान्नान्यथा भवेत् ॥

हिमालय उवाच

यथा वदसि देवेशि समष्ट्यात्मवपुस्त्विदम् ।

तथैव द्रष्टुमिच्छामि यदि देवि कृपा मयि ॥

व्यास उवाच

इति तस्य वचः श्रुत्वा सर्वे देवाः सविष्णवः ।

ननन्दुर्मुदितात्मानः पूजयन्तश्च तद्वचः ॥

अथ देवमतं ज्ञात्वा भक्तकामदुघा शिवा ।

अदर्शयन्निजं रूपं भक्तकामप्रपूरणी ॥

अपश्यंस्ते महादेव्या विरारूपं परात्परम् ।

द्यौर्मस्तकं भवेद्यस्य चन्द्रसूर्यौ च चक्षुषी ॥

दिशः श्रोत्रे वचो वेदाः प्राणो वायुः प्रकीर्तितः ।

विश्वं हृदयमित्याहुः पृथिवी जघनं स्मृतम् ॥

नभस्तलं नाभिसरो ज्योतिश्चक्रमुरःस्थलम् ।

महर्लोकस्तु ग्रीवा स्याज्जनोलोको मुखं स्मृतम् ॥

तपोलोको रराटिस्तु सत्यलोकादधः स्थितः ।

इन्द्रादयो बाहवः स्युः शब्दः श्रोत्रं महेशितुः ॥

नासत्यदस्त्रौ नासे स्तो गन्धो घ्राणं स्मृतो बुधैः ।

मुखमग्निः समाख्यातो दिवारात्री च पक्ष्मणी ॥

ब्रह्मस्थानं विजृम्भोऽप्यापस्तालुः प्रकीर्तिताः ।

रसो जिह्वा समाख्याता यमो दंष्ट्राः प्रकीर्तिताः ॥

जिस प्रकार एक रस्सी भ्रमवश सर्प अथवा १८ मालाके रूपमें प्रतीत होती है, उसी प्रकार मैं ही ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि रूपसे प्रतीत होती हूँ; इसमें कोई संशय नहीं है । अधिष्ठानकी सत्ताके अतिरिक्त कल्पित वस्तुकी सत्ता नहीं होती । [ उसकी प्रतीति अधिष्ठानकी १ ९ सत्ताके कारण होती है । ] अतः मेरी सत्तासे ही वह जगत् सत्तावान् है, इसके अतिरिक्त दूसरी बात नहीं हो सकती ॥ १८-१९ ॥ हिमालयने कहा- हे देवेश्वरि! हे देवि! यदि २० मुझपर आपकी कृपा हो तो आपने अपने इस समष्ट्यात्मक विराट् रूपका जैसा वर्णन किया है, आपके उसी रूपको मैं देखना चाहता हूँ ॥ २० ॥

व्यासजी बोले- उन हिमालयकी यह बात सुनकर विष्णुसहित सभी देवता प्रसन्नचित्त हो गये २१ और उनकी बातका अनुमोदन करते हुए आनन्दित हो गये ॥ २१ ॥

तदनन्तर देवताओंकी इच्छा जानकर भक्तोंकी २२ कामना पूर्ण करनेवाली तथा भक्तोंके लिये कामधेनुतुल्य भगवती शिवाने अपना रूप दिखा दिया । वे देवता महादेवीके उस परात्पर विराट्रूपका दर्शन करने लगे; २३ जिसका मस्तक आकाश है, चन्द्रमा और सूर्य जिसके नेत्र हैं, दिशाएँ कान हैं और वेद वाणी है । वायुको उस रूपका प्राण कहा गया है । विश्व ही उसका २४ हृदय कहा गया है और पृथ्वी उस रूपकी जंघा कही

गयी है । २२ - २४ ॥

पाताल उस रूपकी नाभि, ज्योतिश्चक्र वक्ष: स्थल और महर्लोक ग्रीवा है । जनलोकको उसका मुख २५ कहा गया है । सत्यलोकसे नीचे रहनेवाला तपोलोक उसका ललाट है । इन्द्र आदि उन महेश्वरीके बाहु हैं और शब्द श्रोत्र हैं ॥ २५-२६ ॥ २६ नासत्य और दस्र ( दोनों अश्विनीकुमार ) उनकी नासिका हैं । विद्वान् लोगोंने गन्धको उनकी घ्राणेन्द्रिय कहा है । अग्निको मुख कहा गया है । दिन २७ और रात उनके पक्ष्म ( बरौनी ) हैं । ब्रह्मस्थान भौंहोंका विस्तार है । जलको भगवतीका तालु कहा गया है । रस जिह्वा कही गयी है और यमको उनकी दाढ़ें २८ बताया गया है | २७-२८ ॥

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१८० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३३

दन्ताः स्नेहकला यस्य हासो माया प्रकीर्तिता ।

सर्गस्त्वपाङ्गमोक्षः स्याद् व्रीडोर्ध्वोष्ठो महेशितुः ॥

लोभः स्यादधरोष्ठोऽस्याधर्ममार्गस्तु पृष्ठभूः ।

प्रजापतिश्च मेढ्रं स्याद्यः स्स्रष्टा जगतीतले ॥

कुक्षिः समुद्रा गिरयो स्थीनि देव्या महेशितुः ।

नद्यो नाड्यः समाख्याता वृक्षाः केशाः प्रकीर्तिताः ॥

कौमारयौवनजरा वयोऽस्य गतिरुत्तमा ।

बलाहकास्तु केशाः स्युः सन्ध्ये ते वाससी विभोः ॥

राजञ्छ्रीजगदम्बायाश्चन्द्रमास्तु मनः स्मृतः ।

विज्ञानशक्तिस्तु हरी रुद्रोऽन्तःकरणं स्मृतम् ॥

अश्वादिजातयः सर्वाः श्रोणिदेशे स्थिता विभोः ।

अतलादिमहालोकाः कट्यधोभागतां गताः ॥

एतादृशं महारूपं ददृशुः सुरपुङ्गवाः ।

ज्वालामालासहस्त्राढ्यं लेलिहानं च जिह्वया ॥

दंष्ट्राकटकटारावं वमन्तं वह्निमक्षिभिः ।

नानायुधधरं वीरं ब्रह्मक्षत्रौदनं च यत् ॥

सहस्त्रशीर्षनयनं सहस्त्रचरणं तथा ।

कोटिसूर्यप्रतीकाशं विद्युत्कोटिसमप्रभम् ॥

भयङ्करं महाघोरं हृदक्ष्णोस्त्रासकारकम् ।

ददृशुस्ते सुराः सर्वे हाहाकारं च चक्रिरे ॥

विकम्पमानहृदया मूर्च्छामापुर्दुरत्ययाम् ।

स्मरणं च गतं तेषां जगदम्बेयमित्यपि ॥

अथ ते ये स्थिता वेदाश्चतुर्दिक्षु महाविभोः ।

बोधयामासुरत्युग्रं मूर्च्छातो मूर्च्छितान्सुरान् ॥

अथ ते धैर्यमालम्ब्य लब्ध्वा च श्रुतिमुत्तमाम् ।

प्रेमाश्रुपूर्णनयना रुद्धकण्ठास्तु निर्जराः ॥

स्नेहकी कलाएँ उस रूपके दाँत हैं, मायाको २ ९ उसका हास कहा गया है । सृष्टि उन महेश्वरीका कटाक्षपात और लज्जा उनका ऊपरी ओष्ठ है । लोभ उनका नीचेका ओष्ठ और अधर्ममार्ग उनका पृष्ठभाग ३० है । जो पृथ्वीलोक स्रष्टा कहे जाते हैं, वे प्रजापति ब्रह्मा उस विराट्रूपकी जननेन्द्रिय हैं ॥ २ ९ - ३० ॥ समुद्र उन देवी महेश्वरीकी कुक्षि और पर्वत ३१ उनकी अस्थियाँ हैं । नदियाँ उनकी नाडियाँ कही गयी हैं और वृक्ष उनके केश बताये गये हैं । कुमार, यौवन और बुढ़ापा — ये अवस्थाएँ उनकी उत्तम गति हैं I । मेघ ३२ । उनके सिरके केश हैं । [ प्रात: और सायं ] दोनों सन्ध्याएँ उन ऐश्वर्यमयी देवीके दो वस्त्र हैं ॥ ३१-३२ ॥ हे राजन्! चन्द्रमाको श्रीजगदम्बाका मन कहा ३३ गया है । विष्णुको उनकी विज्ञानशक्ति और रुद्रको उनका अन्तःकरण बताया गया है । अश्व आदि जातियाँ उन ऐश्वर्यशालिनी भगवतीके कटिप्रदेशमें स्थित हैं और ३४ अतलसे लेकर पातालतकके सभी महान् लोक उनके कटिप्रदेशके नीचेके भाग हैं ॥ ३३-३४ ॥ श्रेष्ठ देवताओंने हजारों प्रकारकी ज्वालाओंसे ३५ युक्त, जीभसे बार- बार ओठ चाटते हुए, दाँत कट-कटाकर चीखनेकी ध्वनि करते हुए, आँखोंसे अग्नि उगलते हुए, अनेक प्रकारके आयुध धारण किये हुए, ३६ पराक्रमी, ब्राह्मण - क्षत्रिय ओदनरूप, हजार मस्तक, हजार नेत्र और हजार चरणोंसे सम्पन्न, करोड़ों ३७ सूर्योंके समान तेजयुक्त तथा करोड़ों बिजलियोंके समान प्रभासे प्रदीप्त, भयंकर, महाभीषण तथा हृदय और नेत्रोंके लिये सन्त्रासकारक ऐसे विराट्रूपका ३८ दर्शन किया । जब उन देवताओंने इसे देखा तब वे हाहाकार करने लगे, उनके हृदय काँप उठे, उन्हें घोर मूर्च्छा आ गयी और उनकी यह स्मृति भी समाप्त हो ३ ९ गयी कि यही भगवती जगदम्बा हैं ॥ ३५–३९ ॥ उन महाविभुकी चारों दिशाओं में जो वेद विराजमान थे, उन्होंने मूर्च्छित देवताओंको अत्यन्त घोर मूर्च्छासे ४० चेतना प्रदान की । इसके बाद धैर्य धारणकर वे देवताश्रेष्ठ श्रुति प्राप्त करके प्रेमाश्रुओंसे परिपूर्ण नेत्रों तथा रुँधे हुए कंठसे गद्गद वाणीमें उनकी स्तुति ४१ | करने लगे ॥ ४० - ४१ ॥

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अ ० ३३ ] सप्तम स्कन्ध १८१ बाष्पगद्गदया वाचा स्तोतुं समुपचक्रिरे । देवा ऊचुः अपराधं क्षमस्वाम्ब पाहि दीनांस्त्वदुद्भवान् ॥

कोपं संहर देवेशि सभया रूपदर्शनात् ।

का ते स्तुतिः प्रकर्तव्या पामरैर्निर्जरैरिह ॥

स्वस्याप्यज्ञेय एवासौ यावान्यश्च स्वविक्रमः ।

तदर्वाग्जायमानानां कथं स विषयो भवेत् ॥

नमस्ते भुवनेशानि नमस्ते प्रणवात्मिके ।

सर्ववेदान्तसंसिद्धे नमो ह्रींकारमूर्तये ॥

यस्मादग्निः समुत्पन्नो यस्मात्सूर्यश्च चन्द्रमाः ।

यस्मादोषधयः सर्वास्तस्मै सर्वात्मने नमः ॥

यस्माच्च देवाः सम्भूताः साध्याः पक्षिण एव च ।

पशवश्च मनुष्याश्च तस्मै सर्वात्मने नमः ॥

प्राणापानौ व्रीहियवौ तपः श्रद्धा ऋतं तथा ।

ब्रह्मचर्यं विधिश्चैव यस्मात्तस्मै नमो नमः ॥

सप्तप्राणार्चिषो यस्मात्समिधः सप्त एव च ।

होमा: सप्त तथा लोकास्तस्मै सर्वात्मने नमः ॥

यस्मात्समुद्रा गिरयः सिन्धवः प्रचरन्ति च ।

यस्मादोषधयः सर्वा रसास्तस्मै नमो नमः ॥

यस्माद्यज्ञः समुद्भूतो दीक्षा यूपश्च दक्षिणाः ।

ऋचो यजूंषि सामानि तस्मै सर्वात्मने नमः ॥

नमः पुरस्तात्पृष्ठे च नमस्ते पार्श्वयोर्द्वयोः ।

अध ऊर्ध्वं चतुर्दिक्षु मातर्भूयो नमो नमः ॥

उपसंहर देवेशि रूपमेतदलौकिकम् ।

तदेव दर्शयास्माकं रूपं सुन्दरसुन्दरम् ॥

देवता बोले- हे अम्ब! हमारे अपराधोंको क्षमा कीजिये और अपने दीन सन्तानोंकी रक्षा ४२ कीजिये । हे देवेश्वरि! आप अपना क्रोध शान्त कर लीजिये; क्योंकि हमलोग यह रूप देखकर भयभीत हो गये हैं । हम मन्दबुद्धि देवता यहाँ आपकी कौन-४३ सी स्तुति कर सकते हैं? आपका अपना जितना तथा जैसा पराक्रम है, उसे आप स्वयं भी नहीं जानतीं, तो फिर वह बादमें प्रादुर्भूत होनेवाले हम देवताओंके ज्ञानका विषय कैसे हो सकता है? ॥ ४२–४४ ॥ ४४ हे भुवनेश्वरि! आपको नमस्कार है । हे प्रणवात्मिके! आपको नमस्कार है । समस्त वेदान्तोंसे प्रमाणित तथा ह्रींकाररूप धारण करनेवाली हे भगवति! आपको ४५ नमस्कार है ॥ ४५ ॥

जिनसे अग्नि उत्पन्न हुआ है, जिनसे सूर्य तथा चन्द्र आविर्भूत हुए हैं और जिनसे समस्त औषधियाँ ४६ उत्पन्न हुई हैं, उन सर्वात्माको नमस्कार है ॥ ४६ ॥

जिनसे सभी देवता, साध्यगण, पक्षी, पशु तथा मनुष्य उत्पन्न हुए हैं; उन सर्वात्माको नमस्कार ४७ है ॥ ४७ ॥

जिनसे प्राण, अपान, व्रीहि ( धान ), यव, तप, श्रद्धा, सत्य, ब्रह्मचर्य और विधिका आविर्भाव हुआ ४८ है; उन सर्वात्माको बार- बार नमस्कार है ॥४८ ॥

जिनसे सातों प्राण, सात अग्नियाँ, सात समिधाएँ, सात होम तथा सात लोक उत्पन्न हुए हैं; उन ४ ९ सर्वात्माको नमस्कार है ॥४ ९ ॥ जिनसे समुद्र, पर्वत तथा सभी सिन्धु निकलते हैं और जिनसे सभी औषधियाँ तथा रस उद्भूत होते ५० हैं, उन सर्वात्माको बार - बार नमस्कार है ॥ ५० ॥

जिनसे यज्ञ, दीक्षा, यूप, दक्षिणाएँ, ऋचाएँ, यजुर्वेद तथा सामवेदके मन्त्र उत्पन्न हुए हैं; उन ५१ सर्वात्माको नमस्कार है ॥ ५१ ॥

हे माता! आपको आगे पीछे, दोनों पार्श्वभाग, ऊपर, नीचे तथा चारों दिशाओंसे बार- बार नमस्कार ५२ | है ॥५२ ॥

हे देवेश्वरि! अब इस अलौकिक रूपको छिपा लीजिये और हमें उसी परम सुन्दर रूपका दर्शन ५३ | कराइये ॥ ५३ ॥ }