देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 191–200

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 191–200

पृष्ठ 191

देवी भागवत उत्तरार्द्ध, पृष्ठ 191 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१८२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३४ व्यास उवाच

इति भीतान्सुरान्दृष्ट्वा जगदम्बा कृपार्णवा ।

संहृत्य रूपं घोरं तद्दर्शयामास सुन्दरम् ॥ ५४

पाशाङ्कुशवराभीतिधरं सर्वाङ्गकोमलम् ।

करुणापूर्णनयनं मन्दस्मितमुखाम्बुजम् ॥ ५५

दृष्ट्वा तत्सुन्दरं रूपं तदा भीतिविवर्जिताः ।

शान्तचित्ताः प्रणेमुस्ते हर्षगद्गदनिः स्वनाः ॥ ५६

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्रयां व्यासजी बोले – देवताओंको भयभीत देखकर कृपासिन्धु जगदम्बाने उस घोर रूपको छिपाकर और पाश, अंकुश, वर तथा अभय मुद्रासे युक्त, समस्त कोमल अंगोंवाले, करुणासे परिपूर्ण नेत्रोंवाले एवं मन्द मन्द मुसकान– युक्त मुखकमलवाले मनोहर रूपका दर्शन करा दिया ॥ ५४-५५ ॥ तब भगवतीका वह सुन्दर रूप देखकर वे देवता भयरहित हो गये और शान्तचित्त होकर हर्षयुक्त । गद्गद वाणीसे देवीको प्रणाम करने लगे ॥ ५६ ॥

संहितायां सप्तमस्कन्धे श्रीदेवीविरारूपदर्शनसहितं देवकृततत्स्तववर्णनं नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥

OP अथ चतुस्त्रिंशोऽध्यायः भगवतीका हिमालय तथा देवताओंसे परमपदकी प्राप्तिका उपाय बताना देव्युवाच

क्व यूयं मन्दभाग्या वै क्वेदं रूपं महाद्भुतम् ।

तथापि भक्तवात्सल्यादीदृशं दर्शितं मया ॥ १

न वेदाध्ययनैर्योगैर्न दानैस्तपसेज्यया ।

रूपं द्रष्टुमिदं शक्यं केवलं मत्कृपां विना ॥ २

प्रकृतं शृणु राजेन्द्र परमात्मात्र जीवताम् ।

उपाधियोगात्सम्प्राप्तः कर्तृत्वादिकमप्युत ॥ ३

क्रियाः करोति विविधा धर्माधर्मैकहेतवः ।

नानायोनीस्ततः प्राप्य सुखदुःखैश्च युज्यते ॥ ४

पुनस्तत्संस्कृतिवशान्नानाकर्मरतः सदा ।

नानादेहान्समाप्नोति सुखदुःखैश्च युज्यते ॥ ५

घटीयन्त्रवदेतस्य न विरामः कदापि हि ।

अज्ञानमेव मूलं स्यात्ततः कामः क्रियास्ततः ॥ ६

देवी बोलीं- कहाँ तुम सब मन्दभाग्य देवता और कहाँ मेरा यह अद्भुत रूप, तथापि भक्तवत्सलताके कारण मैंने आपलोगोंको ऐसे रूपका दर्शन कराया है । केवल मेरी कृपाको छोड़कर वेदाध्ययन, योग, दान, तपस्या और यज्ञ आदि किन्ही भी साधनसे मेरे उस रूपका दर्शन नहीं किया जा सकता ॥ १-२ ॥ हे राजेन्द्र! अब ब्रह्मविद्याविषयक पूर्व प्रसंग सुनिये । परमात्मा ही उपाधिभेदसे जीवसंज्ञा प्राप्त करता है और उसमें कर्तृत्व आदि आ जाता है । वह धर्म - अधर्महेतुभूत विविध प्रकारके कर्म करने लगता है । फिर कर्मोंके अनुसार अनेक योनियोंमें जन्म प्राप्त करके वह सुख - दुःखका भोग करता है ॥३-४ ॥ पुनः अपने उन संस्कारोंके प्रभावसे वह सदा नानाविध कर्मोंमें प्रवृत्त रहता है, अनेक प्रकार शरीर धारण करता है और सुखों तथा दुःखोंका भोग करता है । घटीयन्त्रकी भाँति इस जीवको कभी भी विश्राम नहीं मिलता । अज्ञान ही उसका कारण है; उसी अज्ञानसे कामना और पुनः क्रियाओंका प्रादुर्भाव | होता है॥५-६ ॥

पृष्ठ 192

देवी भागवत उत्तरार्द्ध, पृष्ठ 192 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ३४ ] सप्तम स्कन्ध १८३

तस्मादज्ञाननाशाय यतेत नियतं नरः ।

एतद्धि जन्मसाफल्यं यदज्ञानस्य नाशनम् ॥ ७

पुरुषार्थसमाप्तिश्च जीवन्मुक्तदशापि च ।

अज्ञाननाशने शक्ता विद्यैव तु पटीयसी ॥ ८

न कर्म तज्जं नोपास्तिर्विरोधाभावतो गिरे ।

प्रत्युताशाज्ञाननाशे कर्मणा नैव भाव्यताम् ॥ ९

अनर्थदानि कर्माणि पुनः पुनरुशन्ति हि ।

ततो रागस्ततो द्वेषस्ततोऽनर्थो महान्भवेत् ॥ १०

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन ज्ञानं सम्पादयेन्नरः ।

कुर्वन्नेवेह कर्माणीत्यतः कर्माप्यवश्यकम् ॥ ११

ज्ञानादेव हि कैवल्यमतः स्यात्तत्समुच्चयः ।

सहायतां व्रजेत्कर्म ज्ञानस्य हितकारि च ॥ १२

इति केचिद्वदन्त्यत्र तद्विरोधान्न सम्भवेत् ।

ज्ञानाद्धृद्ग्रन्थिभेदः स्याद्धृद्ग्रन्थौ कर्मसम्भवः ॥ १३

यौगपद्यं न सम्भाव्यं विरोधात्तु ततस्तयोः ।

तमः प्रकाशयोर्यद्वद्यौगपद्यं न सम्भव ॥ १४

तस्मात्सर्वाणि कर्माणि वैदिकानि महामते ।

चित्तशुद्धयन्तमेव स्युस्तानि कुर्यात्प्रयत्नतः ॥ १५

शमो दमस्तितिक्षा च वैराग्यं सत्त्वसम्भवः ।

तावत्पर्यन्तमेव स्युः कर्माणि न ततः परम् ॥ १६

तदन्ते चैव संन्यस्य संश्रयेद् गुरुमात्मवान् ।

श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठं च भक्त्या निर्व्याजया पुनः ॥ १७

वेदान्तश्रवणं कुर्यान्नित्यमेवमतन्द्रितः ।

तत्त्वमस्यादिवाक्यस्य नित्यमर्थं विचारयेत् ॥ १८

तत्त्वमस्यादिवाक्यं तु जीवब्रह्मैक्यबोधकम् ।

ऐक्ये ज्ञाते निर्भयस्तु मद्रूपो हि प्रजायते ॥ १ ९ ।

अतः अज्ञानके नाशके लिये मनुष्यको निश्चितरूपसे प्रयत्न करना चाहिये । अज्ञानका नष्ट हो जाना ही जीवनकी सफलता है । अज्ञानके नष्ट हो जानेपर पुरुषार्थकी समाप्ति तथा जीवन्मुक्त दशाकी उपलब्धि हो जाती है । विद्या ही अज्ञानका नाश करनेमें पूर्ण समर्थ है ॥ ७-८ ॥ हे गिरे! अज्ञानसे ही कर्म होता है, इसलिये कर्मका अज्ञानसे विरोध नहीं है । अज्ञानके नाश हो जानेसे कर्म और उपासना आदिका अभाव हो जायगा, प्रत्युत आशारूपी अज्ञानके नाश हो जानेपर कर्मका अभाव हो जायगा । अनर्थकारी कर्म बार - बार होते रहते हैं । उसीसे राग, उसीसे द्वेष और फिर उसीसे महान् अनर्थकी उत्पत्ति होती है । अतः मनुष्यको पूर्ण प्रयत्नके साथ ज्ञानका अर्जन करना चाहिये । ' कुर्वन्नेवेह कर्माणि ' इस श्रुतिवचनके अनुसार कर्म भी आवश्यक है । साथ ही ज्ञानसे ही कैवल्यपदकी प्राप्ति सम्भव है, अतः मोक्षके लिये कर्म और ज्ञान - दोनोंका समुच्चय आवश्यक है, साथ ही हितकारक कर्म ज्ञानकी सहायता करता है - ऐसा कुछ लोग कहते हैं, किंतु उन दोनों ( ज्ञान तथा कर्म ) - के परस्पर विरोधी होनेसे वैसा सम्भव नहीं है ॥ ९ –१२३ ॥ ज्ञानसे हृदय - ग्रन्थिका भेदन होता है और हृदय-ग्रन्थिमें कर्म उत्पन्न होता है । फिर उन दोनों ( ज्ञान और कर्म ) - में परस्पर विरोधभाव होनेसे वे एक स्थानपर उसी तरह नहीं रह सकते, जैसे अन्धकार और प्रकाशका एक साथ रहना सम्भव नहीं है ॥ १३-१४ ॥ हे महामते! इसलिये समस्त वैदिक कर्म जो चित्तकी शुद्धिके लिये होते हैं, उन्हें प्रयत्नपूर्वक करना चाहिये । शम, दम, तितिक्षा, वैराग्य और सत्त्वका प्रादुर्भाव - इनकी प्राप्तितक ही कर्म आवश्यक हैं, इसके बाद नहीं ॥ १५-१६ ॥ तदनन्तर ज्ञानी मनुष्यको चाहिये कि वह संन्यासी होकर श्रोत्रिय एवं ब्रह्मनिष्ठ गुरुका आश्रय ग्रहण करे और पुनः सावधान होकर निष्कपट भक्तिके साथ प्रतिदिन वेदान्तका श्रवण करे । साथ ही ' तत्त्वमसि ' आदि वाक्यके अर्थका वह नित्य चिन्तन करे; क्योंकि तत्त्वमसि आदि वाक्य जीव और ब्रह्मकी एकता बोधक हैं । ऐक्यका बोध हो जानेपर मनुष्य निर्भय होकर मेरा रूप बन जाता है ॥ १७ – १ ९ ॥

पृष्ठ 193

देवी भागवत उत्तरार्द्ध, पृष्ठ 193 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१८४ पदार्थावगतिः पूर्वं वाक्यार्थावगतिस्ततः तत्पदस्य च वाक्यार्थो गिरेऽहं परिकीर्तितः त्वंपदस्य च वाच्यार्थी जीव एव न संशयः उभयोरैक्यमसिना पदेन प्रोच्यते बुधैः ॥ वाच्यार्थयोर्विरुद्धत्वादैक्यं नैव घटेत ह लक्षणातः प्रकर्तव्या तत्त्वमोः श्रुतिसंस्थयोः चिन्मात्रं तु तयोर्लक्ष्यं तयोरैक्यस्य सम्भवः श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३४ । हे पर्वत! वाक्यार्थमें पदार्थज्ञान कारण होता है, ॥ २० अतः पहले पदार्थका ज्ञान होता है, उसके बाद वाक्यार्थकी प्रतीति होती है । हे पर्वत! ' तत् ' पदके । वाच्यार्थके रूपमें मैं ही कही गयी हूँ । ' त्वम् ' पदका वाच्यार्थ जीव ही है, इसमें कोई संशय नहीं है । २१ विद्वान् पुरुष ' असि ' पदसे ' तत् ' और ' त्वम् ' – इन दोनों पदोंकी एकता बतलाते हैं ॥ २० - २१ ॥ । इन दोनों पदोंके वाच्यार्थ परस्पर विरोधी होनेसे ॥ २२ इन पदार्थोंकी एकता सम्भव नहीं है, अतः श्रुतिप्रतिपादित इन ‘ तत् ’ और ‘ त्वम् ’ – दोनों पदोंके वाच्यार्थमें विशेषण-। रूपसे सन्निविष्ट सर्वज्ञत्व और अल्पज्ञत्व धर्मका भागत्यागलक्षणा द्वारा त्याग करके केवल चैतन्यांशको तयोरैक्यं तथा ज्ञात्वा स्वाभेदेनाद्वयो भवेत् ॥ २३ ग्रहण करनेसे उनकी एकता सम्भव होती है । उनके देवदत्तः स एवायमितिवल्लक्षणा स्मृता स्थूलादिदेहरहितो ब्रह्म सम्पद्यते नरः पञ्चीकृतमहाभूतसम्भूतः स्थूलदेहकः भोगालयो जराव्याधिसंयुतः सर्वकर्मणाम् मिथ्याभूतोऽयमाभाति स्फुटं मायामयत्वतः सोऽयं स्थूल उपाधिः स्यादात्मनो मे नगेश्वर ज्ञानकर्मेन्द्रिययुतं प्राणपञ्चकसंयुतम् मनोबुद्धियुतं चैतत्सूक्ष्मं तत्कवयो विदुः अपञ्चीकृतभूतोत्थं सूक्ष्मदेहोऽयमात्मनः द्वितीयोऽयमुपाधिः स्यात्सुखादेरवबोधकः अनाद्यनिर्वाच्यमिदमज्ञानं तु तृतीयकः देहोऽयमात्मनो भाति कारणात्मा नगेश्वर उपाधिविलये जाते केवलात्मावशिष्यते देहत्रये पञ्चकोशा अन्तःस्थाः सन्ति सर्वदा ऐक्यका इस प्रकार बोध हो जानेपर स्वगत भेद समाप्त । होकर अद्वैत बुद्धिका उदय हो जाता है । २२-२३ ॥ ॥ २४ ' वह यही देवदत्त है ' - इस वाक्यार्थमें देवदत्त और तत् पदके अभेद - बोधके लिये जैसे लक्षणा आवश्यक । है, वैसी ही लक्षणा यहाँ समझनी चाहिये । स्थूलादि देहमें जीवका जो स्वरूपाध्यास है, उसकी निवृत्ति हो ॥ २५ जानेपर वह जीव ब्रह्म ही हो जाता है ॥ २४ ॥

पंचीकरणसे युक्त पाँच महाभूतोंसे रचित यह । स्थूल शरीर सभी कर्मोंके भोगोंका आश्रय है । यह ॥ २६ देह वृद्धत्व एवं रोगसे संयुक्त होनेवाला है । हे पर्वतराज! मायामय होनेके कारण ही यह मिथ्याभूत । देह सत्य प्रतीत होता है । यह स्थूल शरीर भी मेरी

आत्माकी ही उपाधि है । २५-२६ ॥

॥ २७

यह जो पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच प्राण, मन तथा बुद्धिसे युक्त है तथा अपंचीकृत भूतोंसे । उत्पन्न है, उसे विद्वानोंने सूक्ष्म शरीर कहा है । सुख-॥ २८ दुःखका बोध करनेवाला यह सूक्ष्म शरीर आत्माकी

दूसरी उपाधि है । २७-२८ ॥

। हे पर्वतराज! अनादि, अनिर्वचनीय और अज्ञानमूलक जो यह कारण शरीर है, वही आत्माके तीसरे शरीर के ॥ २ ९ रूपमें प्रतीत होता है । तीनों उपाधियों ( स्थूल, सूक्ष्म तथा कारण शरीर ) - का विलय हो जानेपर केवल परमात्मा । ही शेष रह जाता है । इन तीनों देहोंके भीतर पंचकोश ॥ ३० सदा स्थित रहते हैं । पंचकोशका परित्याग कर देनेपर

पृष्ठ 194

देवी भागवत उत्तरार्द्ध, पृष्ठ 194 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ३४ ]

पञ्चकोशपरित्यागे ब्रह्मपुच्छं हि लभ्यते ।

नेतिनेतीत्यादिवाक्यैर्मम रूपं यदुच्यते ॥

न जायते म्रियते तत्कदाचि-नायं भूत्वा न बभूव कश्चित् । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥

हतं चेन्मन्यते हन्तुं हतश्चेन्मन्यते हतम् ।

उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥

अणोरणीयान्महतो महीया-नात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम् । तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुः प्रसादान्महिमानमस्य ॥

आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु ।

बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥

इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान् ।

आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ॥

यस्त्वविद्वान्भवति चामनस्कश्च सदाशुचिः ।

न तत्पदमवाप्नोति संसारं चाधिगच्छति ॥

यस्तु विज्ञानवान्भवति समनस्कः सदा शुचिः ।

स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद्भूयो न जायते ॥

विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवान्नरः ।

सोऽध्वनः पारमाप्नोति मदीयं यत्परं पदम् ॥

सप्तम स्कन्ध १८५ ब्रह्ममें प्रतिष्ठा प्राप्त होती है, जो ' नेति नेति ' आदि ३१ श्रुतिवाक्योंके द्वारा सम्बोधित किया जाता है और जिसे मेरा ही रूप कहा जाता है ॥ २ ९ -३१ ॥ यह आत्मा न कभी उत्पन्न होता है और न कभी मरता है । यह होकर फिर कभी हुआ भी नहीं । यह आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत तथा पुरातन है । शरीरके मारे जानेपर भी यह नहीं मारा जाता ३२ है ॥ ३२ ॥

यदि कोई मारनेवाला आत्माको मारनेमें समर्थ मानता है और यदि कोई मारा जानेवाला व्यक्ति अपनेको मरा हुआ मानता है तो वे दोनों ही ३३ आत्मस्वरूपको नहीं जानते; क्योंकि यह आत्मा न तो मारता है और न तो मारा जाता है ॥ ३३ ॥

यह आत्मा अणुसे भी सूक्ष्म है और महानसे भी महान् है । यह आत्मा ( परमात्मा ) इस जीवात्माके हृदयरूप गुफा ( बुद्धि ) - में निहित रहनेवाला है । संकल्प - विकल्परहित और चिन्तामुक्त साधक ही ३४ परमात्माकी उस महिमाको परब्रह्म परमेश्वरकी कृपासे देख पाता है ॥ ३४ ॥

जीवात्माको रथका स्वामी और शरीरको रथ समझिये । बुद्धिको सारथि और मनको ही लगाम ३५ | समझिये ॥ ३५ ॥

विद्वान् लोग इन्द्रियोंको घोड़े, विषयोंको उन घोड़ोंके विचरनेका मार्ग बतलाते हैं और शरीर, इन्द्रिय तथा मन - इनके साथ रहनेवाले जीवात्माको ३६ भोक्ता कहते हैं ॥ ३६ ॥

जो मनुष्य सदा अज्ञानी, असंयतचित्त और अपवित्र रहता है; वह उस परम पदको नहीं प्राप्त कर पाता और बार - बार संसारमें जन्म लेता रहता ३७है । किंतु जो सदा ज्ञानशील, संयतचित्त और पवित्र रहता है; वह तो उस परम पदको प्राप्त कर लेता है, जहाँसे लौटकर पुनः जन्म धारण नहीं करना ३८ | पड़ता ॥ ३७-३८ ॥ जो मनुष्य विवेकयुक्त बुद्धिरूप सारथिसे सम्पन्न और मनरूप लगामको वशमें रखनेवाला है, वह संसारमार्गसे पार जो मेरा परम पद है; उसे प्राप्त कर ३ ९ | लेता है || ३ ९ ॥

पृष्ठ 195

देवी भागवत उत्तरार्द्ध, पृष्ठ 195 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१८६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३४

इत्थं श्रुत्या च मत्या च निश्चित्यात्मानमात्मना ।

भावयेन्मामात्मरूपां निदिध्यासनतोऽपि च ॥

योगवृत्तेः पुरा स्वस्मिन्भावयेदक्षरत्रयम् ।

देवीप्रणवसंज्ञस्य ध्यानार्थं मन्त्रवाच्ययोः ॥

हकारः स्थूलदेहः स्याद्रकारः सूक्ष्मदेहकः ।

ईकारः कारणात्मासौ ह्रींकारोऽहं तुरीयकम् ॥

एवं समष्टिदेहेऽपि ज्ञात्वा बीजत्रयं क्रमात् ।

समष्टिव्यष्ट्योरेकत्वं भावयेन्मतिमान्नरः ॥

समाधिकालात्पूर्वं तु भावयित्वैवमादृतः ।

ततो ध्यायेन्निलीनाक्षो देवीं मां जगदीश्वरम् ॥

प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ।

निवृत्तविषयाकाङ्क्षो वीतदोषो विमत्सरः ॥

भक्त्या निर्व्याजया युक्तो गुहायां निःस्वने स्थले ।

हकारं विश्वमात्मानं रकारे प्रविलापयेत् ॥

रकारं तैजसं देवमीकारे प्रविलापयेत् ।

ईकारं प्राज्ञमात्मानं ह्रींकारे प्रविलापयेत् ॥

वाच्यवाचकताहीनं द्वैतभावविवर्जितम् । अखण्डं सच्चिदानन्दं भावयेत्तच्छिखान्तरे इति ध्यानेन मां राजन् साक्षात्कृत्य नरोत्तमः । मद्रूप एव भवति द्वयोरप्येकता यतः इस प्रकार [ वेदान्त-- ] श्रवण तथा मननके द्वारा ४० अपने यथार्थ स्वरूपका निश्चय करके बार - बार गम्भीर चिन्तन - मननके द्वारा मुझ परमात्मस्वरूपिणी भगवतीकी भावना करनी चाहिये ॥ ४० ॥

मन्त्र और अर्थके स्वरूपके सम्यक् ध्यानके ४१ लिये सर्वप्रथम योगाभ्यासमें प्रतिष्ठित होकर देवीप्रणव नामक मन्त्रके तीनों अक्षरोंकी अपने भीतर भावना करनी चाहिये ॥ ४१ ॥

' हकार ' स्थूलदेह, ' रकार ' सूक्ष्मदेह और ४२ ईकार कारणदेह है । ' ह्रीं ' यह चतुर्थरूप स्वयं मैं हूँ । इस प्रकार बुद्धिमान् मनुष्यको चाहिये कि समष्टि शरीरमें भी क्रमशः तीनों बीजोंको समझकर समष्टि और व्यष्टि- इन दोनों रूपोंकी एकताका चिन्तन ४३ | करे ॥ ४२-४३ ॥ समाधिकालके पूर्व ही आदरपूर्वक इस प्रकारकी भावना करके पुनः उसके बाद दोनों नेत्र बन्दकर मुझ भगवती जगदीश्वरीका ध्यान करना ४४ चाहिये ॥ ४४ ॥

उस समय साधकको चाहिये कि वह किसी गुफा अथवा शब्दरहित एकान्त स्थानमें आसीन होकर विषयभोगोंकी कामनासे रहित, ४५ दोषमुक्त तथा ईर्ष्याशून्य रहते हुए और नासिकाके भीतर विचरणशील प्राण तथा अपान वायुको समान स्थितिमें करके निष्कपट भक्तिसे सम्पन्न होकर विश्वात्मारूप हकारको रकारमें समाविष्ट करे ४६ अर्थात् हकारवाच्य स्थूलदेहको रकारवाच्य सूक्ष्म-देहमें लीन करे, तैजस देवस्वरूप रकारको ईकारमें समाविष्ट करे अर्थात् रकारवाच्य तैजस— ४७ सूक्ष्मदेहको ईकारवाच्य कारणदेहमें लीन करे और प्राज्ञस्वरूप ईकारको ह्रींकारमें समाविष्ट करे अर्थात् ईकारवाच्य कारणदेहको ह्रींकारवाच्य ब्रह्ममें लीन करे ॥ ४५ - ४७ ॥ ॥ ४८ तब वाच्य - वाचकसे रहित, समस्त द्वैतभावसे परे अखण्ड सच्चिदानन्दकी भावना अपने शिखास्थान ( सहस्रार ) - में करे । हे राजन्! इस प्रकारके ध्यानसे श्रेष्ठ पुरुष मेरा साक्षात्कार करके मेरे ही रूपवाला ॥ ४ ९ । हो जाता है; क्योंकि दोनोंमें सदा एकता सिद्ध है । इस

पृष्ठ 196

देवी भागवत उत्तरार्द्ध, पृष्ठ 196 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ३५ ] सप्तम स्कन्ध १८७ योगयुक्त्यानया दृष्ट्वा मामात्मानं परात्परम् । योगरीतिसे मुझ परमात्मरूप परात्पर भगवतीका दर्शन करके साधक तत्क्षण कर्मसहित अपने अज्ञानका नाश अज्ञानस्य सकार्यस्य तत्क्षणे नाशको भवेत् ॥ ५० करनेवाला हो जाता है ॥ ४८–५० ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे देवीगीतायां ज्ञानस्य मोक्षहेतुत्ववर्णनं नाम चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥

0 ~~ अथ पञ्चत्रिंशोऽध्यायः भगवतीद्वारा यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा तथा कुण्डलीजागरणकी विधि बताना हिमालय उवाच

योगं वद महेशानि साङ्गं संवित्प्रदायकम् ।

कृतेन येन योग्योऽहं भवेयं तत्त्वदर्शने ॥

देव्युवाच

न योगो नभसः पृष्ठे न भूमौ न रसातले ।

ऐक्यं जीवात्मनोराहुर्योगं योगविशारदाः ॥

तत्प्रत्यूहाः षडाख्याता योगविघ्नकरानघ ।

कामक्रोधौ लोभमोहौ मदमात्सर्यसंज्ञकौ ॥

योगाङ्गैरेव भित्त्वा तान्योगिनो योगमाप्नुयुः ।

यमं नियममासनप्राणायामौ ततः परम् ॥

प्रत्याहारं धारणाख्यं ध्यानं सार्धं समाधिना ।

अष्टाङ्गान्याहुरेतानि योगिनां योगसाधने ॥

अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यं दयार्जवम् ।

क्षमा धृतिर्मिताहारः शौचं चेति यमा दश ॥

तपः सन्तोष आस्तिक्यं दानं देवस्य पूजनम् ।

सिद्धान्तश्रवणं चैव ह्रीर्मतिश्च जपो हुतम् ॥

दशैते नियमाः प्रोक्ता मया पर्वतनायक ।

पद्मासनं स्वस्तिकं च भद्रं वज्रासनं तथा ॥

वीरासनमिति प्रोक्तं क्रमादासनपञ्चकम् ।

ऊर्वोरुपरि विन्यस्य सम्यक्पादतले शुभे ॥

अङ्गुष्ठौ च निबध्नीयाद्धस्ताभ्यां व्युत्क्रमात्ततः ।

पद्मासनमिति प्रोक्तं योगिनां हृदयङ्गमम् ॥

हिमालय बोले - हे महेश्वरि! अब आप ज्ञान प्रदान करनेवाले योगका सांगोपांग वर्णन कीजिये, जिसकी १ साधनासे मैं तत्त्वदर्शनकी प्राप्तिके योग्य हो जाऊँ ॥ १ ॥

देवी बोलीं- यह योग न आकाशमण्डलमें है, न पृथ्वीतलपर है और न तो रसातलमें ही है । योगविद्या विद्वानोंने जीव और आत्माके ऐक्यको ही २ योग कहा है ॥ २ ॥

हे अनघ! उस योगमें विघ्न उत्पन्न करनेवाले काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य नामक-३ ये छ: प्रकारके दोष बताये गये हैं ॥३ ॥

अतः योगके अंगोंके द्वारा उन विघ्नोंका उच्छेद ४ करके योगियोंको योगकी प्राप्ति करनी चाहिये । योगियोंके लिये योगसिद्धिहेतु यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि - ये ५ आठ अंग बताये गये हैं॥४-५ ॥ अहिंसा, सत्य, अस्तेय ( चोरी न करना ), ब्रह्मचर्य, दया, सरलता, क्षमा, धृति, परिमित आहार ६ और शौच- ये दस प्रकारके यम कहे गये हैं ॥ ६ ॥

हे पर्वतराज! तप, संतोष, आस्तिकता, दान, देवपूजन, ७ शास्त्रसिद्धान्तोंका श्रवण, लज्जा, सद्बुद्धि, जप और हवन - ये दस नियम मेरे द्वारा कहे गये हैं ॥ ७ ॥

पद्मासन, स्वस्तिकासन, भद्रासन, वज्रासन और ८ वीरासन - क्रमशः ये पाँच आसन बतलाये गये हैं । दोनों पैरोंके दोनों शुभ तलवोंको सम्यक् रूपसे जंघोंपर ९ रखकर पीठकी ओरसे हाथोंको ले जाकर दाहिने हाथ से दाहिने पैर के अँगूठेको और बायें हाथसे बायें पैरके अँगूठेको पकड़े; योगियोंके हृदयमें प्रसन्नता उत्पन्न १० । करनेवाला यह पद्मासन कहा गया है ॥ ८–१० ॥

पृष्ठ 197

देवी भागवत उत्तरार्द्ध, पृष्ठ 197 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१८८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३५

जानूर्वोरन्तरे सम्यक्कृत्वा पादतले शुभे ।

ऋजुकायो विशेद्योगी स्वस्तिकं तत्प्रचक्षते ॥

सीवन्याः पार्श्वयोर्न्यस्य गुल्फयुग्मं सुनिश्चितम् ।

वृषणाधः पादपार्णी पाणिभ्यां परिबन्धयेत् ॥

भद्रासनमिति प्रोक्तं योगिभिः परिपूजितम् ।

ऊर्वोः पादौ क्रमान्न्यस्य जान्वोः प्रत्यङ्मुखाङ्गुली ॥

करौ विदध्यादाख्यातं वज्रासनमनुत्तमम् ।

एकं पादमधः कृत्वा विन्यस्योरुं तथोत्तरे ॥

ऋजुकायो विशेद्योगी वीरासनमितीरितम् ।

इडयाकर्षयेद्वायुं बाह्यं षोडशमात्रया ॥

धारयेत्पूरितं योगी चतुःषष्ट्या तु मात्रया ।

सुषुम्णामध्यगं सम्यग्द्वात्रिंशन्मात्रया शनैः ॥

नाड्या पिङ्गलया चैव रेचयेद्योगवित्तमः ।

प्राणायाममिमं प्राहुर्योगशास्त्रविशारदाः ॥

भूयो भूयः क्रमात्तस्य बाह्यमेवं समाचरेत् ।

मात्रावृद्धिक्रमेणैव सम्यग्द्वादश षोडश ॥

जपध्यानादिभिः सार्धं सगर्भं तं विदुर्बुधाः । तदपेतं विगर्भं च प्राणायामं परे विदुः क्रमादभ्यस्यतः पुंसो देहे स्वेदोद्गमोऽधमः मध्यमः कम्पसंयुक्तो भूमित्यागः परो मतः उत्तमस्य गुणावाप्तिर्यावच्छीलनमिष्यते जाँघ और घुटनेके बीचमें पैरके दोनों सुन्दर ११ तलवोंको अच्छी तरह करके योगीको शरीर सीधाकर बैठना चाहिये । इसे स्वस्तिकासन कहा जाता है ॥ ११ ॥

सीवनीके दोनों ओर दोनों एड़ियोंको अण्डकोषके नीचे अच्छी तरह रखकर दोनों पैरोंको हाथोंसे १२ पकड़कर बैठना चाहिये । योगियोंके द्वारा सम्यक् पूजित यह आसन भद्रासन कहा गया है ॥ १२३ ॥

दोनों पैरोंको क्रमशः दोनों जाँघोंपर रखकर दोनों घुटनोंके निचले भागमें सीधी अँगुलीवाले दोनों हाथ स्थापित १३ करके बैठनेको अत्युत्तम वज्रासन कहा गया है ॥ १३३ ॥

एक पैरको नीचे करके उसके ऊपर दूसरे पैरका जंघा रखकर योगीको शरीर सीधा करके बैठना १४ चाहिये; यह वीरासन कहा गया है ॥ १४३ ॥

योगी सोलह बार प्रणवका उच्चारण करनेमें लगने-वाले समयतक इडा अर्थात् बायीं नासिकासे बाहरकी वायुको खींचे ( पूरक ), पुन: इस पूरित वायुको चौंसठ १५ बार प्रणवके उच्चारणसमयतक सुषुम्नाके मध्य रोके रहे ( कुम्भक ) और इसके बाद योगविद्को चाहिये कि बत्तीस बार प्रणवके उच्चारणमें जितना समय लगे-उतने समयमें धीरे - धीरे पिंगला नाडी अर्थात् दायीं नासिकाके १६ द्वारा उस वायुको बाहर करे ( रेचक ) । योगशास्त्र के विद्वान् इस प्रक्रियाको ' प्राणायाम ' कहते हैं ॥ १५ - – १७ ॥ इस प्रकार पुनः - पुनः बाहरकी वायुको लेकर १७ क्रमसे पूरक, कुंभक तथा रेचक करके प्राणायामका अभ्यास मात्रा ( प्रणवके उच्चारणके समय ) - की वृद्धिके अनुसार करना चाहिये । इस प्रकार प्राणायाम पहले बारह बार, तदनन्तर सोलह बार इसके बाद १८ क्रमशः उत्तरोत्तर वृद्धि करनी चाहिये ॥१८ ॥

जो प्राणायाम [ अपने इष्टके ] जप- ध्यान आदिसे युक्त होता है, उसे विद्वज्जनोंने सगर्भ प्राणायाम ॥ १ ९ और उस जप- ध्यानसे रहित प्राणायामको विगर्भ प्राणायाम कहा है ॥ १ ९ ॥ इस प्रकार क्रमसे अभ्यास करते हुए मनुष्यके शरीरमें । पसीना आ जाय तो उसे अधम, कम्पन उत्पन्न होनेपर ॥ २० मध्यम और जमीन छोड़कर ऊपर उठनेपर उत्तम प्राणायाम कहा गया है । जबतक उत्तम प्राणायामतक पहुँचा जाय, । तबतक अभ्यास करते रहना चाहिये ॥ २०३ ॥

पृष्ठ 198

देवी भागवत उत्तरार्द्ध, पृष्ठ 198 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ३५ ] इन्द्रियाणां विचरतां विषयेषु निरर्गलम् बलादाहरणं तेभ्यः प्रत्याहारोऽभिधीयते अङ्गुष्ठगुल्फजानूरुमूलाधोलिङ्गनाभिषु हृद्ग्रीवाकण्ठदेशेषु लम्बिकायां ततो नसि भ्रूमध्ये मस्तके मूर्ध्नि द्वादशान्ते यथाविधि धारणं प्राणमरुतो धारणेति निगद्यते । समाहितेन मनसा चैतन्यान्तरवर्तिना आत्मन्यभीष्टदेवानां ध्यानं ध्यानमिहोच्यते । समत्वभावना नित्यं जीवात्मपरमात्मनोः

समाधिमाहुर्मुनयः प्रोक्तमष्टाङ्गलक्षणम् ।

इदानीं कथये तेऽहं मन्त्रयोगमनुत्तमम् ॥

विश्वं शरीरमित्युक्तं पञ्चभूतात्मकं नग । सप्तम स्कन्ध १८ ९ ॥ २१ अपने - अपने विषयोंमें स्वच्छन्दरूपसे विचरण करती हुई इन्द्रियोंको उन विषयोंसे बलपूर्वक हटानेको । प्रत्याहार कहा जाता है ॥ २१३ ॥

॥ २२ अँगूठा, एड़ी, घुटना, जाँघ, गुदा, लिंग, नाभि, हृदय, ग्रीवा, कण्ठ, भ्रूमध्य और मस्तक - इन बारह । स्थानोंमें प्राणवायुको विधिपूर्वक धारण किये रखनेको ॥ २३ धारणा कहा जाता है ॥ २२-२३३ ॥ चेतन आत्मामें मनको स्थित करके एकाग्रचित्त होकर अपने भीतर अभीष्ट देवताका सतत चिन्तन ॥ २४ करनेको ध्यान कहा जाता है ॥ २४३ ॥

मुनियोंने जीवात्मा और परमात्मामें नित्य ' समत्व ' भावना रखनेको समाधि कहा है । यह ॥ २५ मैंने आपको अष्टांगयोगका लक्षण बतला दिया । अब मैं आपसे उत्कृष्ट मन्त्रयोगका वर्णन कर रही हूँ ॥ २५-२६ ॥ २६ हे नग! इस पंचभूतात्मक शरीरको ' विश्व ' कहा जाता है । चन्द्र, सूर्य और अग्निके तेजसे युक्त होनेपर ( इडा - पिंगला- सुषुम्नामें योगसाधनसे ) जीव-चन्द्रसूर्याग्नितेजोभिर्जीवब्रह्मैक्यरूपकम् ॥ २७ ब्रह्मकी एकता होती है ॥२७ ॥

तिस्रः कोट्यस्तदर्धेन शरीरे नाडयो मताः ।

तासु मुख्या दश प्रोक्तास्ताभ्यस्तिस्त्रो व्यवस्थिताः ॥

प्रधाना मेरुदण्डेऽत्र चन्द्रसूर्याग्निरूपिणी ।

इडा वामे स्थिता नाडी शुभ्रा तु चन्द्ररूपिणी ॥

शक्तिरूपा तु सा नाडी साक्षादमृतविग्रहा ।

दक्षिणे या पिङ्गलाख्या पुंरूपा सूर्यविग्रहा ॥

सर्वतेजोमयी सा तु सुषुम्णा वह्निरूपिणी ।

तस्या मध्ये विचित्राख्ये इच्छाज्ञानक्रियात्मकम् ॥

मध्ये स्वयम्भूलिङ्गं तु कोटिसूर्यसमप्रभम् ।

तदूर्ध्वं मायाबीजं तु हरात्माबिन्दुनादकम् ॥

तदूर्ध्वं तु शिखाकारा कुण्डली रक्तविग्रहा ।

देव्यात्मिका तु सा प्रोक्ता मदभिन्ना नगाधिप ॥

इस शरीरमें साढ़े तीन करोड़ नाड़ियाँ बतायी गयी हैं । उनमें दस नाड़ियाँ मुख्य कही गयी हैं । उनमें २८ भी तीन नाड़ियोंको प्रधान कहा गया है । चन्द्र, सूर्य तथा अग्निस्वरूपिणी – ये नाड़ियाँ मेरुदण्डमें व्यवस्थित रहती हैं । चन्द्ररूपिणी श्वेत ' इडा ' नाड़ी उसके बायीं २ ९ ओर स्थित है । शक्तिरूपा वह इडा नाड़ी साक्षात् अमृतस्वरूपिणी है । दायीं ओर जो ' पिंगला ' नामक नाड़ी है, वह पुरुषरूपिणी तथा सूर्यमूर्ति है । उनके ३० बीचमें जो सर्वतेजोमयी तथा अग्निरूपिणी नाड़ी स्थित है, वह ' सुषुम्ना ' है ॥ २८-३० ॥ उसके भीतर ' विचित्रा ' नामक नाड़ी स्थित है ३१ और उसके भीतर इच्छा - ज्ञान - क्रियाशक्तिसे सम्पन्न करोड़ों सूर्योंके तेजके समान स्वयम्भूलिंग है I । उसके ऊपर बिन्दुनाद ( ँ ) - सहित हरात्मा ( हकार, रेफ ३२ तथा ईकार ) - स्वरूप मायाबीज ( ह्रीं ) विराजमान है । उसके ऊपर रक्त विग्रहवाली शिखाके आकार की कुण्डलिनी है । हे पर्वतराज हिमालय! वह देव्यात्मिका ३३ । कही गयी है और मुझसे अभिन्न है ॥ ३१–३३ ॥

पृष्ठ 199

देवी भागवत उत्तरार्द्ध, पृष्ठ 199 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१ ९ ० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३५

तबाह्ये हेमरूपाभं वादिसान्तचतुर्दलम् ।

द्रुतहेमसमप्रख्यं पद्मं तत्र विचिन्तयेत् ॥

तदूर्ध्वं त्वनलप्रख्यं षड्दलं हीरकप्रभम् ।

बादिलान्तषड्वर्णेन स्वाधिष्ठानमनुत्तमम् ॥

मूलमाधारषट्कोणं मूलाधारं ततो विदुः ।

स्वशब्देन परं लिङ्गं स्वाधिष्ठानं ततो विदुः ॥

तदूर्ध्वं नाभिदेशे तु मणिपूरं महाप्रभम् ।

मेघाभं विद्युदाभं च बहुतेजोमयं ततः ॥

मणिवद्भिन्नं तत्पद्मं मणिपद्मं तथोच्यते ।

दशभिश्च दलैर्युक्तं डादिफान्ताक्षरान्वितम् ॥

विष्णुनाधिष्ठितं पद्मं विष्ण्वालोकनकारणम् ।

दूर्ध्वातं पद्ममुद्यदादित्यसन्निभम् ॥

कादिठान्तदलैरर्कपत्रैश्च समधिष्ठितम् ।

तन्मध्ये बाणलिङ्गं तु सूर्यायुतसमप्रभम् ॥

शब्दब्रह्ममयं शब्दानाहतं तत्र दृश्यते ।

अनाहताख्यं तत्पद्मं मुनिभिः परिकीर्तितम् ॥

आनन्दसदनं तत्तु पुरुषाधिष्ठितं परम् ।

तदूर्ध्वं तु विशुद्धाख्यं दलं षोडशपङ्कजम् ॥

स्वरैः षोडशभिर्युक्तं धूम्रवर्णं महाप्रभम् ।

विशुद्धं तनुते यस्माज्जीवस्य हंसलोकनात् ॥

विशुद्धं पद्ममाख्यातमाकाशाख्यं महाद्भुतम् । कुण्डलिनीके बाह्यभागमें स्वर्णवर्णके चतुर्दल ३४ | कमल [ मूलाधार ] ] - - का चिन्तन करना चाहिये, जिसपर व, श, ष, स - ये चार बीजाक्षर स्थित हैं । उसके ऊपर छः दलवाला उत्तम स्वाधिष्ठान पद्म स्थित है, जो अग्नि समान तेजोमय, हीरेकी चमकवाला और ३५ ब, भ, म, य, र, ल - इन छः बीजाक्षरोंसे युक्त है आधार षट्कोणपर स्थित होनेके कारण मूलाधार तथा स्व शब्दसे परम लिंगको इंगित करनेके कारण ३६ स्वाधिष्ठान संज्ञा है ॥ ३४–३६ ॥ इसके ऊपर नाभिदेशमें मेघ तथा विद्युत्के समान कान्तिवाला अत्यन्त तेजसम्पन्न और महान् प्रभासे युक्त मणिपूरक चक्र है । मणिके सदृश ३७ प्रभावाला होनेके कारण यह ' मणिपद्म ' भी कहा जाता है । यह दस दलोंसे युक्त है और ड, ढ, ण, त, थ, द, ध, न, प, फ - इन अक्षरोंसे समन्वित ३८ है । भगवान् विष्णुके द्वारा अधिष्ठित होनेके कारण यह कमल उनके दर्शनका महान् साधन है ॥ ३७-३८३ ॥ उसके ऊपर उगते हुए सूर्यके समान प्रभासे ३ ९ सम्पन्न अनाहत पद्म है । यह कमल क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ, ट, ठ– इन अक्षरोंसे युक्त बारह पत्रोंसे प्रतिष्ठित है । उसके मध्यमें दस हजार ४० सूर्योके समान प्रभावाला बाणलिंग स्थित है । बिना किसी आघातके इसमें शब्द होता रहता है । अतः मुनियोंके द्वारा उस शब्दब्रह्ममय पद्मको ' अनाहत ' कहा गया है । परमपुरुषद्वारा अधिष्ठित वह चक्र ४१ आनन्दसदन है ॥ ३ ९ -४१३ ॥ उसके ऊपर सोलह दलोंसे युक्त ' विशुद्ध ' नामक कमल है । महती प्रभासे युक्त तथा धूम्रवर्णवाला ४२ यह कमल अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ऋ, लृ, लृ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः - इन सोलह स्वरोंसे सम्पन्न है । इसमें हंसस्वरूप परमात्माके दर्शनसे जीव विशुद्ध आत्मस्वरूपको प्राप्त हो जाता है, इसीलिये ४३ इसे विशुद्ध पद्म ( विशुद्ध चक्र ) कहा गया है । इस महान् अद्भुत कमलको ' आकाशचक्र ' भी कहा गया है॥४२-४३३ ॥

पृष्ठ 200

देवी भागवत उत्तरार्द्ध, पृष्ठ 200 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ३५ ] आज्ञाचक्रं तदूर्ध्वं तु आत्मनाधिष्ठितं परम् ॥

आज्ञासंक्रमणं तत्र तेनाज्ञेति प्रकीर्तितम् ।

द्विदलं हृक्षसंयुक्तं पद्मं तत्सुमनोहरम् ॥

कैलासाख्यं तदूर्ध्वं तु रोधिनी तु तदूर्ध्वतः ।

एवं त्वाधारचक्राणि प्रोक्तानि तव सुव्रत ॥

सहस्रारयुतं बिन्दुस्थानं तदूर्ध्वमीरितम् ।

इत्येतत्कथितं सर्वं योगमार्गमनुत्तमम् ॥

आदौ पूरकयोगेनाप्याधारे योजयेन्मनः ।

गुदमेढ्रान्तरे शक्तिस्तामाकुञ्च्य प्रबोधयेत् ॥

लिङ्गभेदक्रमेणैव बिन्दुचक्रं च प्रापयेत् ।

शम्भुना तां परां शक्तिमेकीभूतां विचिन्तयेत् ॥

तत्रोत्थितामृतं यत्तु द्रुतलाक्षारसोपमम् ।

पाययित्वा तु तां शक्तिं मायाख्यां योगसिद्धिदाम् ॥

षट्चक्रदेवतास्तत्र सन्तर्प्यमृतधारया ।

आनयेत्तेन मार्गेण मूलाधारं ततः सुधीः ॥

एवमभ्यस्यमानस्याप्यहन्यहनि निश्चितम् ।

पूर्वोक्तदूषिता मन्त्राः सर्वे सिद्ध्यन्ति नान्यथा ॥

जरामरणदुःखाद्यैर्मुच्यते भवबन्धनात् ।

ये गुणाः सन्ति देव्या मे जगन्मातुर्यथा तथा ॥

ते गुणाः साधकवरे भवन्त्येव न चान्यथा । सप्तम स्कन्ध १ ९ १ ४४ उसके ऊपर परमात्माके द्वारा अधिष्ठित श्रेष्ठ ' आज्ञाचक्र ' है । उसमें परमात्माकी आज्ञाका संक्रमण होता है, इसीसे उसे ' आज्ञाचक्र'-ऐसा कहा गया है । वह कमल दो दलोंवाला, ह ४५ तथा क्ष- इन दो अक्षरोंसे युक्त और अत्यन्त मनोहर है ॥ ४४-४५ ॥ उसके ऊपर ' कैलास ' नामक चक्र और उसके ४६ भी ऊपर ' रोधिनी ' नामक चक्र स्थित है । हे सुव्रत! इस प्रकार मैंने आपको आधारचक्रोंके विषयमें बता दिया । इसके और भी ऊपर सहस्र दलोंसे सम्पन्न बिन्दुस्थानरूप ' सहस्रारचक्र ' बताया गया है । यह ४७ मैंने आपसे सम्पूर्ण श्रेष्ठ योगमार्गका वर्णन कर दिया ॥ ४६-४७ ॥ सर्वप्रथम पूरक प्राणायामके द्वारा मूलाधारमें ४८ मन लगाना चाहिये । तत्पश्चात् गुदा और मेढ्रके बीचमें वायुके द्वारा कुण्डलिनी शक्तिको समेटकर उसे जाग्रत् करना चाहिये । पुनः लिंग - भेदनके क्रमसे स्वयम्भूलिंगसे आरम्भ करके उस कुण्डलिनी ४ ९ शक्तिको बिन्दुचक्र [ सहस्रार ] - तक ले जाना चाहिये । इसके बाद उस परा शक्तिका सहस्रारमें स्थित परमेश्वर शम्भुके साथ ऐक्यभावसे ध्यान करना चाहिये ॥ ४८-४९ ॥ ५० वहाँ द्रवीभूत लाक्षारसके समान उत्पन्न अमृतका योगसिद्धि प्रदान करनेवाली माया नामक उस शक्तिको पान कराकर षट्चक्रमें स्थित देवताओंको उस अमृतधारासे ५१ सन्तृप्त करे । इसके बाद बुद्धिमान् साधक उसी मार्गसे कुण्डलिनी शक्तिको मूलाधारतक वापस लौटा लाये ॥ ५०-५१ ॥ इस प्रकार प्रतिदिन अभ्यास करनेपर साधकके ५२ पूर्वोक्त सभी दूषित मन्त्र भी निश्चितरूपसे सिद्ध हो जाते हैं; इसमें सन्देह नहीं है । इसके द्वारा साधक जरा - मरण आदि दुःखों तथा भवबन्धनसे मुक्त हो जाता है । जो गुण मुझ जगज्जननी भगवतीमें जिस ५३ प्रकार विद्यमान हैं, वे सभी गुण उसी प्रकार उस श्रेष्ठ साधकमें उत्पन्न हो जाते हैं; इसमें कोई संदेह नहीं है ॥ ५२-५३३ ॥