देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 201–210
देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 201–210
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१ ९ २ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३६ इत्येवं कथितं तात वायुधारणमुत्तमम् ॥
इदानीं धारणाख्यं तु शृणुष्वावहितो मम ।
दिक्कालाद्यनवच्छिन्नदेव्यां चेतो विधाय च ॥
तन्मयो भवति क्षिप्रं जीवब्रह्मैक्ययोजनात् ।
अथवा समलं चेतो यदि क्षिप्रं न सिद्ध्यति ॥
तदावयवयोगेन योगी योगान्समभ्यसेत् ।
मदीयहस्तपादादावङ्गे तु मधुरे नग ॥
चित्तं संस्थापयेन्मन्त्री स्थानं स्थानजयात्पुनः ।
विशुद्धचित्तः सर्वस्मिन्रूपे संस्थापयेन्मनः ॥
यावन्मनो लयं याति देव्यां संविदि पर्वत ।
तावदिष्टमनुं मन्त्री जपहोमैः समभ्यसेत् ॥
मन्त्राभ्यासेन योगेन ज्ञेयज्ञानाय कल्पते ।
न योगेन विना मन्त्रो न मन्त्रेण विना हि सः ॥
द्वयोरभ्यासयोगो हि ब्रह्मसंसिद्धिकारणम् । तमः परिवृते ं गेहे घटो दीपेन दृश्यते ॥ एवं मायावृतो ह्यात्मा मनुना गोचरीकृतः ।
इति योगविधिः कृत्स्नः साङ्गः प्रोक्तो मयाधुना ।
गुरूपदेशतो ज्ञेयो नान्यथा शास्त्रकोटिभिः ॥
५४ हे तात! इस प्रकार मैंने आपसे इस श्रेष्ठ प्राणायामका वर्णन किया है । अब आप सावधान होकर मुझसे धारणा नामक योगका श्रवण कीजिये । ५५ दिशा, काल आदिसे अपरिच्छिन्न मुझ भगवतीमें चित्त स्थिर करके जीव और ब्रह्मका ऐक्य हो जानेसे शीघ्र ही साधक तन्मय हो जाता है और यदि चित्तके मलयुक्त ५६ रहनेके कारण शीघ्रतापूर्वक सिद्धि प्राप्त न हो तो योगीको चाहिये कि मेरे विग्रहके अंगोंमें [ अपना मन स्थित करके ] निरन्तर योगका अभ्यास करता रहे । हे पर्वत! साधकको मेरे करचरणादि मधुर अंगोंमें चित्तको ५७ एक - एक करके केन्द्रित करना चाहिये और इस प्रकार विशुद्धचित्त होकर उसे मेरे समस्त रूपमें मनको स्थिर करना चाहिये । हे पर्वत! जबतक ५८ ज्ञानरूपिणी मुझ भगवतीमें मनका लय न हो जाय, तबतक मन्त्रजापकको जप- होमके द्वारा अपने इष्ट मन्त्रका अभ्यास करते रहना चाहिये ॥ ५४–५९ ॥ ५ ९ मन्त्राभ्यास- योगके द्वारा ज्ञेय तत्त्वका ज्ञान प्राप्त हो जाता है । योगके बिना मन्त्र सिद्ध नहीं होता और मन्त्र के बिना योग सिद्ध नहीं होता । अतः योग और ६० मन्त्र- इन दोनोंका अभ्यास - योग ही ब्रह्मसिद्धिका साधन है । अन्धकारसे आच्छादित घरमें स्थित घड़ा दीपक प्रकाशमें दिखायी देने लगता है, इसी प्रकार मायासे ६१ आवृत आत्मा मन्त्रके द्वारा दृष्टिगोचर होने लगता है । इस प्रकार मैंने अंगोंसहित सम्पूर्ण योगविधि इस समय आपको बतला दी । गुरुके उपदेशसे ही यह योग जाना जा सकता है, इसके विपरीत करोड़ों शास्त्रोंके द्वारा ६२ । भी यह प्राप्त नहीं किया जा सकता ॥ ६० - ६२ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे देवीगीतायां मन्त्रसिद्धिसाधनवर्णनं नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
अथ षट्त्रिंशोऽध्यायः भगवतीके द्वारा हिमालयको ज्ञानोपदेश - ब्रह्मस्वरूपका वर्णन देव्युवाच देवी बोलीं- हे राजन्! इस प्रकार आसनपर इत्यादियोगयुक्तात्मा ध्यायेन्मां ब्रह्मरूपिणीम् । सम्यक् विराजमान होकर योगसे युक्त चित्तवाले साधकको निष्कपट भक्तिके साथ मुझ ब्रह्मस्वरूपिणी भक्त्या निर्व्याजया राजन्नासने समुपस्थितः ॥ १ भगवतीका ध्यान करना चाहिये ॥१ ॥
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अ ० ३६ ] सप्तम स्कन्ध १ ९ ३
आविः सन्निहितं गुहाचरं नाम महत्पदम् ।
अत्रैतत्सर्वमर्पितमेजत्प्राणनिमिषच्च यत् ॥
एतज्जानथ सदसद्वरेण्यं परं विज्ञानाद्यद्वरिष्ठं प्रजानाम् । यदर्चिमद्यदणुभ्यो ऽणु च यस्मिल्लोका निहिता लोकिनश्च ॥
तदेतदक्षरं ब्रह्म स प्राणस्तदु वाङ्मनः ।
तदेतत्सत्यममृतं तद्वेद्धव्यं सौम्य विद्धि ॥
धनुर्गृहीत्वौपनिषदं महास्त्रं शरं ह्युपासानिशितं सन्धयीत । आयम्य तद्भावगतेन चेतसा लक्ष्यं तदेवाक्षरं सौम्य विद्धि ॥
प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते ।
अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ॥
यस्मिन्द्यौश्च पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणैश्च सर्वैः । तमेवैकं जानथात्मानमन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः ॥
अरा इव रथनाभौ संहता यत्र नाड्यः ।
स एषोऽन्तश्चरते बहुधा जायमानः ॥
ओमित्येवं ध्यायथात्मानं
स्वस्ति वः पाराय तमसः परस्तात् ।
दिव्ये ब्रह्मपुरे व्योम्नि आत्मा सम्प्रतिष्ठितः ॥
जो प्रकाशस्वरूप, सबके अत्यन्त समीप स्थित, २ हृदयरूपी गुफामें स्थित होनेके कारण ' गुहाचर ' नामसे प्रसिद्ध परम तत्त्व है; उसीमें जितने भी चेष्टायुक्त, श्वास लेनेवाले तथा नेत्र खोलने - मूँदनेवाले प्राणी हैं - वे सब उस ब्रह्ममें ही कल्पित हैं ॥ २ ॥
जो सत्कारणरूप माया तथा असत्कार्यरूप जगत् — इन दोनोंकी अपेक्षा श्रेष्ठ, प्राणियोंके ज्ञानसे परे अर्थात् उनके ज्ञानका अविषय, सर्वोत्कृष्ट तथा ३ सबको प्रकाशित करनेवाला, अणुसे भी अणु ( सूक्ष्म ) है और जिसमें सभी लोक तथा उसमें रहनेवाले प्राणी स्थित हैं— उस ब्रह्मको आपलोग जानिये ॥ ३ ॥
४ जो अक्षरब्रह्म है - वही सबका प्राण है, वही वाणी है, वही सबका मन है, वही परम सत्य तथा अमृतस्वरूप है । अतः हे सौम्य [ पर्वतराज ]! उस भेदन करनेयोग्य ब्रह्मस्वरूप लक्ष्यका भेदन करो ॥ ४ ॥
हे सौम्य! उपनिषदरूपी महान् धनुषास्त्र कर उसपर उपासनाद्वारा तीक्ष्ण किये गये बाणको स्थापित करो और इसके बाद विषयोंसे विरक्त और ५ भगवद्भावभावित चित्तके द्वारा उस बाणको खींचकर उस अक्षररूप ब्रह्मको लक्ष्य करके वेधन करो ॥ ५ ॥
प्रणव धनुष, जीवात्मा बाण और ब्रह्म उसका ६ लक्ष्य कहा जाता है । प्रमादरहित होकर उसका भेदन करना चाहिये और बाणकी भाँति उसमें तन्मय हो जाना चाहिये ॥ ६ ॥
जिसमें स्वर्ग, पृथ्वी, अन्तरिक्ष और सम्पूर्ण प्राणोंके सहित मन ओतप्रोत है, उसी एकमात्र परब्रह्मको जानो और अन्य बातोंका परित्याग कर दो; [ भवसागरसे ७ पार होनेके लिये ] यही अमृतका सेतु है ॥ ७ ॥
रथके चक्केमें लगे अरोंकी भाँति जिस हृदयमें शरीरकी नाडियाँ एकत्र स्थित हैं - उसी हृदयमें विविध रूपों में प्रकट होनेवाला परब्रह्म निरन्तर संचरण ८ करता है ॥ ८ ॥
संसारसमुद्रसे पार होनेके लिये ' ओम्'-इस प्रणवमन्त्रके जपसे परमात्माका ध्यान करो । आपका कल्याण हो । वह परमात्मा अन्धकारसे सर्वथा परे ब्रह्मलोकस्वरूप दिव्य आकाश ( हृदय ) -९ में प्रतिष्ठित है ॥९ ॥
1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] -7 A
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१ ९ ४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३६ मनोमयः प्राणशरीरनेता प्रतिष्ठितोऽन्ने हृदयं सन्निधाय । तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति आनन्दरूपममृतं द्विभाति ॥
भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः ।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे ॥
हिरण्मये परे कोशे विराजं ब्रह्म निष्कलम् ।
तच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तद्यदात्मविदो विदुः ॥
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद्ब्रह्म
पश्चाद्ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण ।
अधश्चोर्ध्वं च प्रसृतं ब्रह्मैवेदं विश्वं वरिष्ठम् ॥
एतादृगनुभवो यस्य स कृतार्थो नरोत्तमः ।
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ॥
द्वितीयाद्वै भयं राजंस्तदभावाद् बिभेति न ।
न तद्वियोगो मेऽप्यस्ति मद्वियोगोऽपि तस्य न ॥
अहमेव स सोऽहं वै निश्चितं विद्धि पर्वत ।
मद्दर्शनं तु तत्र स्याद्यत्र ज्ञानी स्थितो मम ॥
1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –7 B वह परब्रह्म मनोमय है और सबके प्राण तथा शरीरका नियमन करता है । वह समस्त प्राणियोंके हृदयमें निहित रहकर अन्नमय स्थूल शरीरमें प्रतिष्ठित है । जो आनन्दस्वरूप तथा अमृतमय परमात्मा सर्वत्र प्रकाशित १० हो रहा है, उसे विज्ञान ( अपरोक्षानुभूति ) - के द्वारा बुद्धिमान् पुरुष भलीभाँति दृष्टिगत कर लेते हैं ॥ १० ॥
उस कार्य - कारणरूप परमात्माको देख लेनेपर इस जीवके हृदयकी ग्रन्थिका भेदन हो जाता है ११ अर्थात् अनात्मपदार्थोंमें स्वरूपाध्यास समाप्त हो जाता है, सभी सन्देह दूर हो जाते हैं और सभी कर्म क्षीण हो जाते हैं ॥११ ॥
वह निष्कल ( व्यापक ) ब्रह्म स्वर्णमय परकोश १२ ( आनन्दमयकोश ) - में विराजमान है । वह शुभ्र तथा परम प्रकाशित वस्तुओंका भी प्रकाशक है । उसे आत्मज्ञानी पुरुष ही जान पाते हैं ॥ १२ ॥
वहाँ न तो सूर्य प्रकाश फैला सकता है, न चन्द्रमा और ताराओंका समुदाय ही, न ये बिजलियाँ ही वहाँ प्रकाशित हो सकती हैं; फिर यह लौकिक अग्नि कैसे प्रकाशित हो सकती है । उसीके प्रकाशित १३ होनेपर सब प्रकाशित होते हैं । यह सम्पूर्ण जगत् उसीके प्रकाशसे आलोकित होता है ॥ १३ ॥
यह अमृतस्वरूप ब्रह्म ही आगे है, यह ब्रह्म ही पीछे है और यह ब्रह्म ही दाहिनी तथा बायीं ओर स्थित है । यह ब्रह्म ही ऊपर तथा नीचे फैला हुआ १४ है । यह समग्र जगत् सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म ही है ॥१४ ॥
जिसका इस प्रकारका अनुभव है, वह श्रेष्ठ मनुष्य कृतार्थ है । ब्रह्मको प्राप्त पुरुष नित्य प्रसन्नचित्त रहता है; वह न शोक करता है और न किसी १५ प्रकारकी आकांक्षा रखता है ॥१५ ॥
हे राजन्! भय दूसरेसे हुआ करता है; द्वैतभाव न रहनेपर [ संसारसे ] भय नहीं होता । उस ज्ञानीसे मेरा कभी वियोग नहीं होता और मुझसे उस ज्ञानीका १६ वियोग कभी नहीं होता ॥ १६ ॥
हे पर्वत! आप यह निश्चित जान लीजिये कि मैं ही वह हूँ और वही मेरा स्वरूप है । जिस किसी भी स्थानमें ज्ञानी रहे, उसको वहीं मेरा दर्शन होता १७ | रहता है ॥१७ ॥
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अ ० ३६ ]
नाहं तीर्थे न कैलासे वैकुण्ठे वा न कर्हिचित् ।
वसामि किं तु मज्जानिहृदयाम्भोजमध्यमे ॥
मत्पूजाकोटिफलदं सकृन्मज्ञ्ज्ञानिनोऽर्चनम् ।
कुलं पवित्रं तस्यास्ति जननी कृतकृत्यका ॥
विश्वम्भरा पुण्यवती चिल्लयो यस्य चेतसः ।
ब्रह्मज्ञानं तु यत्पृष्टं त्वया पर्वतसत्तम ॥
कथितं तन्मया सर्वं नातो वक्तव्यमस्ति हि ।
इदं ज्येष्ठाय पुत्राय भक्तियुक्ताय शीलिने ॥
शिष्याय च यथोक्ताय वक्तव्यं नान्यथा क्वचित् ।
यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ ॥
तस्यैते कथिता ह्यर्था: प्रकाशन्ते महात्मनः ।
येनोपदिष्टा विद्येयं स एव परमेश्वरः ॥
यस्यायं सुकृतं कर्तुमसमर्थस्ततो ऋणी ।
पित्रोरप्यधिकः प्रोक्तो ब्रह्मजन्मप्रदायकः ॥
पितृजातं जन्म नष्टं नेत्थं जातं कदाचन ।
तस्मै न ह्येदित्यादि निगमो ऽप्यवदन्नग ॥
तस्माच्छास्त्रस्य सिद्धान्तो ब्रह्मदाता गुरुः परः ।
शिवे रुष्टे गुरुस्त्राता गुरौ रुष्टे न शङ्करः ॥
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन श्रीगुरुं तोषयेन्नग ।
कायेन मनसा वाचा सर्वदा तत्परो भवेत् ॥
अन्यथा तु कृतघ्नः स्यात्कृतघ्ने नास्ति निष्कृतिः । सप्तम स्कन्ध १ ९ ५ मैं कभी भी न तीर्थमें, न कैलासपर और न तो १८ वैकुण्ठमें ही निवास करती हूँ । मैं केवल अपने ज्ञानी भक्तके हृदयकमलमें निवास करती हूँ । मेरे ज्ञानपरायण भक्तकी एक बारकी पूजा मेरी करोड़ों पूजाओंका फल प्रदान करती है ॥ १८३ ॥
१ ९ जिसका चित्त चित्स्वरूप ब्रह्ममें लीन हो गया, उसका कुल पवित्र हो गया, उसकी जननी कृतकृत्य हो गयी और पृथ्वी उसे धारण करके पुण्यवती हो २० गयी ॥ १ ९ ३ ॥ हे पर्वतश्रेष्ठ! आपने जो ब्रह्मज्ञानके सम्बन्धमें पूछा था, वह सब मैंने बता दिया । अब इसके आगे बतानेयोग्य कुछ शेष नहीं है । भक्तिसम्पन्न तथा २१ शीलवान् ज्येष्ठ पुत्र तथा इसी प्रकारके गुणवाले शिष्यको इसे बताना चाहिये, किसी दूसरे से इसे कभी प्रकाशित नहीं करना चाहिये । जिसकी परमदेव परमेश्वरमें परम भक्ति है तथा जिस प्रकार परमेश्वरमें २२ है; उसी प्रकार गुरुमें भी है, उस महात्मा पुरुषके हृदयमें ही ये बताये हुए रहस्यमय अर्थ प्रकाशित होते हैं ॥ २०–२२३ ॥ २३ जिसके द्वारा इस ब्रह्मविद्याका उपदेश दिया जाता है, वह साक्षात् परमेश्वर ही है । उपदिष्ट विद्याका प्रत्युपकार करनेमें मनुष्य सर्वथा असमर्थ है, इसलिये वह गुरुका सदा ऋणी रहता है । २४ ब्रह्मजन्म प्रदान करनेवाला ( ब्रह्म - तत्त्वका साक्षात्कार करानेवाला ) गुरु माता - पितासे भी श्रेष्ठ कहा गया है; क्योंकि माता - पितासे प्राप्त जीवन तो नष्ट २५ हो जाता है, किंतु गुरुद्वारा प्राप्त ब्रह्मजन्म कभी नष्ट नहीं होता ॥ २३ - २४३ ॥ हे पर्वत! ' तस्मै न द्रुह्येत् ' अर्थात् उन गुरुसे द्रोह नहीं करना चाहिये । इत्यादि वचन वेदने भी कहे हैं । २६ अतः शास्त्रसिद्धान्त है कि ब्रह्मज्ञानदाता गुरु सबसे श्रेष्ठ होता है । हे नग! शिवके रुष्ट होनेपर गुरु रक्षा कर सकते हैं, किंतु गुरुके रुष्ट होनेपर शंकर भी रक्षा नहीं कर सकते, अतः पूर्ण प्रयत्नसे गुरुको सन्तुष्ट २७ रखना चाहिये । तन - मन - वचनसे सर्वदा गुरुपरायण रहना चाहिये, अन्यथा कृतघ्न होना पड़ता है और कृतघ्न हो जानेपर उद्धार नहीं होता ॥ २५ - २७३ ॥ 1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –7 C
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१ ९ ६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३७ इन्द्रेणाथर्वणायोक्ता अश्विभ्यां कथने तस्य अश्वीयं तच्छिरो नष्टं पुनः संयोजितं स्वीयं इति संकटसम्पाद्या शिरश्छेदप्रतिज्ञया ॥
शिरश्छिन्नं च वज्रिणा ।
दृष्ट्वा वैद्यौ सुरोत्तमौ ॥
ताभ्यां मुनिशिरस्तदा । ब्रह्मविद्या नगाधिप । २८ पूर्व समयकी बात है - अथर्वणमुनिके द्वारा इन्द्रसे ब्रह्मविद्याकी याचना किये जानेपर इन्द्रने अथर्वणमुनिको ब्रह्मविद्या इस शर्तपर बतायी कि किसी अन्यको बतानेपर आपका सिर काट लूँगा । अश्विनीकुमारोंके याचना करनेपर मुनिने २ ९ | उन्हें ब्रह्मविद्याका उपदेश कर दिया और इन्द्रने मुनिका सिर काट लिया । तदनन्तर सुरश्रेष्ठ दोनों वैद्योंने उनके सिरको कटा देखकर घोड़ेका सिर मुनिपर पुनः जोड़ दिया । हे भूधर! हे पर्वतराज! इस प्रकार महान् संकटसे सम्पादित होनेवाली ब्रह्मविद्याको जिसने प्राप्त कर लिया, वह धन्य लब्धा येन स धन्यः स्यात्कृतकृत्यश्च भूधर ॥ ३० तथा कृतकृत्य है ॥२८–३० ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे देवीगीतायां ब्रह्मविद्योपदेशवर्णनं नाम षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥
अथ सप्तत्रिंशोऽध्यायः भगवतीद्वारा अपनी हिमालय उवाच
स्वीयां भक्तिं वदस्वाम्ब येन ज्ञानं सुखेन हि ।
जायेत मनुजस्यास्य मध्यमस्याविरागिणः ॥ १
देव्युवाच
मार्गास्त्रयो मे विख्याता मोक्षप्राप्तौ नगाधिप ।
कर्मयोगो ज्ञानयोगो भक्तियोगश्च सत्तम ॥ २
त्रयाणामप्ययं योग्यः कर्तुं शक्योऽस्ति सर्वथा ।
सुलभत्वान्मानसत्वात्कायचित्ताद्यपीडनात् ॥ ३
गुणभेदान्मनुष्याणां सा भक्तिस्त्रिविधा मता ।
परपीडां समुद्दिश्य दम्भं कृत्वा पुरःसरम् ॥ ४
मात्सर्यक्रोधयुक्तो यस्तस्य भक्तिस्तु तामसी ।
परपीडादिरहितः स्वकल्याणार्थमेव च ॥ ५
श्रेष्ठ भक्तिका वर्णन हिमालय बोले - हे अम्ब! वह भक्ति बतानेकी कृपा कीजिये, अपरिपक्व वैराग्यवाले मध्यम सुगमतापूर्वक ज्ञान हो जाय ॥१ ॥
देवी बोलीं- हे पर्वतराज! हे साधनभूत कर्मयोग, ज्ञानयोग और तीन मार्ग प्रसिद्ध हैं । इन तीनोंमें आप मुझे अपनी जिस भक्तिके द्वारा अधिकारीको भी सत्तम! मोक्षप्राप्तिके भक्तियोग — ये मेरे भी यह भक्तियोग सर्वथा सुलभ होने, [ बाह्य साधनोंसे निरपेक्ष केवल ] मनसे सम्पादित होने और शरीर तथा चित्त आदिको पीड़ा न पहुँचानेके कारण सरलतापूर्वक किया जा सकता है ॥ २-३ ॥ मनुष्योंके गुणभेदके अनुसार वह भक्ति भी तीन प्रकारकी कही गयी है । जो मनुष्य डाह तथा क्रोधसे युक्त होकर दम्भपूर्वक दूसरोंको संतप्त करनेके उद्देश्यसे भक्ति करता है, उसकी वह भक्ति तामसी होती है ॥ ४३ ॥
हे पर्वतराज! सर्वदा हृदयमें कामनाएँ रखनेवाला, यश चाहनेवाला तथा भोगका लोलुप जो मनुष्य परपीडासे 1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] —7 D
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अ ० ३७ ] सप्तम स्कन्ध १ ९ ७ नित्यं सकामो हृदयं यशोऽर्थी भोगलोलुपः । तत्तत्फलसमावाप्त्यै मामुपास्तेऽतिभक्तितः
भेदबुद्ध्या तु मां स्वस्मादन्यां जानाति पामरः ।
तस्य भक्तिः समाख्याता नगाधिप तु राजसी ॥
परमेशार्पणं कर्म पापसंक्षालनाय च ।
वेदोक्तत्वादवश्यं तत्कर्तव्यं तु मयानिशम् ॥
इति निश्चितबुद्धिस्तु भेदबुद्धिमुपाश्रितः ।
करोति प्रीतये कर्म भक्तिः सा नग सात्त्विकी ॥
परभक्तेः प्रापिकेयं भेदबुद्धयवलम्बनात् ।
पूर्वप्रोक्ते ह्युभे भक्ती न परप्रापिके मते ॥
अधुना परभक्तिं तु प्रोच्यमानां निबोध मे ।
मद्गुणश्रवणं नित्यं मम नामानुकीर्तनम् ॥
कल्याणगुणरत्नानामाकरायां मयि स्थिरम् ।
चेतसो वर्तनं चैव तैलधारासमं सदा ॥
हेतुस्तु तत्र को वापि न कदाचिद्भवेदपि । सामीप्यसाष्टिसायुज्यसालोक्यानां न चैषणा मत्सेवातोऽधिकं किञ्चिन्नैव जानाति कर्हिचित् । सेव्यसेवकताभावात्तत्र मोक्षं न वाञ्छति परानुरक्त्या मामेव चिन्तयेद्यो ह्यतन्द्रितः । स्वाभेदेनैव मां नित्यं जानाति न विभेदतः मद्रूपत्वेन जीवानां चिन्तनं कुरुते तु यः यथा स्वस्यात्मनि प्रीतिस्तथैव च परात्मनि चैतन्यस्य समानत्वान्न भेदं कुरुते तु यः सर्वत्र वर्तमानानां सर्वरूपां च सर्वदा नमते यजते चैवाप्याचाण्डालान्तमीश्वर न कुत्रापि द्रोहबुद्धिं कुरुते भेदवर्जनात् रहित होकर मात्र अपने ही कल्याणके लिये उन - उन ॥ फलोंकी प्राप्तिके लिये अत्यन्त भक्तिपूर्वक मेरी उपासना करता है, साथ ही वह मन्दमति भेदबुद्धिके कारण मुझ भगवतीको अपनेसे भिन्न समझता है, उसकी वह ७ भक्ति राजसी कही गयी है॥५–७ ॥ हे नग! जो मनुष्य अपना पाप धो डालनेके लिये अपना कर्म परमेश्वरको अर्पित कर देता है और ८ ' वेदकी आज्ञाके अनुसार मुझे प्रतिदिन वही वेदनिर्दिष्ट कर्म अवश्य करना चाहिये ' – ऐसा मनमें निश्चित | करके [ सेव्य - सेवक ] - की भेदबुद्धिका आश्रय लेकर मेरी प्रसन्नताके लिये कर्म करता है; उस मनुष्यकी वह भक्ति सात्त्विकी होती है ॥ ८ - ९ ॥ [ सेव्य - सेवककी ] भेदबुद्धिका सहारा लेकर १० की गयी यह सात्त्विकी भक्ति पराभक्तिकी प्राप्ति करानेवाली सिद्ध होती है । पूर्वमें कही गयी तामसी ११ और राजसी - दोनों भक्तियाँ पराभक्तिकी प्राप्तिका साधन नहीं मानी गयी हैं ॥ १० ॥
अब मैं पराभक्तिका वर्णन कर रही हूँ, आप उसे १२ सुनिये - नित्य मेरे गुणोंका श्रवण और मेरे नामका संकीर्तन करना, कल्याण एवं गुणस्वरूप रत्नोंकी भण्डार मुझ भगवतीमें तैलधाराकी भाँति अपना चित्त ॥ १३ सर्वदा लगाये रखना, किसी प्रकारकी हेतुभावना कभी नहीं होने देना, सामीप्य; साष्टि; सायुज्य और सालोक्य मुक्तियोंकी कामना न होना - इन गुणोंसे युक्त जो भक्त ॥ १४ मेरी सेवासे बढ़कर किसी भी वस्तुको कभी श्रेष्ठ नहीं समझता और सेव्य - सेवककी उत्कृष्ट भावनाके कारण मोक्षकी भी आकांक्षा ॥ १५ सावधान होकर जो । मुझमें तथा अपनेमें ॥ १६ रखते हुए मुझे नित्य रूपका चिन्तन करता । है; वैसी ही दूसरोंमें नहीं रखता, परम भक्तिके साथ मेरा ही ध्यान करता रहता है, भेदबुद्धि छोड़कर अभेदबुद्धि जानता है, सभी जीवोंमें मेरे ही है, जैसी प्रीति अपने प्रति होती भी रखता है, चैतन्यपरब्रह्मकी ॥ १७ समानरूपसे सर्वत्र व्याप्ति समझकर किसीमें भी भेद नहीं करता, हे राजन्! सर्वत्र विद्यमान् सभी प्राणियों में । मुझ सर्वरूपिणीको विराजमान जानकर मेरा नमन तथा ॥ १८ पूजन करता है, चाण्डालतकमें मेरी ही भावना करता
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१ ९ ८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३७
मत्स्थानदर्शने श्रद्धा मद्भक्तदर्शने तथा ।
मच्छास्त्रश्रवणे श्रद्धा मन्त्रतन्त्रादिषु प्रभो ॥
मयि प्रेमाकुलमती रोमाञ्चिततनुः सदा ।
प्रेमाश्रुजलपूर्णाक्षः कण्ठगद्गदनिःस्वनः ॥
अनन्येनैव भावेन पूजयेद्यो नगाधिप ।
मामीश्वरीं जगद्योनिं सर्वकारणकारणम् ॥
व्रतानि मम दिव्यानि नित्यनैमित्तिकान्यपि ।
नित्यं यः कुरुते भक्त्या वित्तशाठ्यविवर्जितः ॥
मदुत्सवदिदृक्षा च मदुत्सवकृतिस्तथा ।
जायते यस्य नियतं स्वभावादेव भूधर ॥
उच्चैर्गायंश्च नामानि ममैव खलु नृत्यति ।
अहङ्कारादिरहितो देहतादात्म्यवर्जितः ॥
प्रारब्धेन यथा यच्च क्रियते तत्तथा भवेत् ।
न मे चिन्तास्ति तत्रापि देहसंरक्षणादिषु ॥
इति भक्तिस्तु या प्रोक्ता परभक्तिस्तु सा स्मृता ।
यस्यां देव्यतिरिक्तं तु न किञ्चिदपि भाव्यते ॥
इत्थं जाता परा भक्तिर्यस्य भूधर तत्त्वतः ।
तदैव तस्य चिन्मात्रे मद्रूपे विलयो भवेत् ॥
भक्तेस्तु या पराकाष्ठा सैव ज्ञानं प्रकीर्तितम् ।
वैराग्यस्य च सीमा सा ज्ञाने तदुभयं यतः ॥
भक्तौ कृतायां यस्यापि प्रारब्धवशतो नग ।
न जायते मम ज्ञानं मणिद्वीपं स गच्छति ॥
तत्र गत्वाखिलान्भोगाननिच्छन्नपि चर्च्छति ।
तदन्ते मम चिद्रूपज्ञानं सम्यग्भवेन्नग ॥
है और भेदका परित्याग करके किसीसे भी १ ९ द्रोहभाव नहीं रखता, हे प्रभो! जो मेरे स्थानोंके दर्शन, मेरे भक्तोंके दर्शन, मेरे शास्त्रोंके श्रवण तथा मेरे तन्त्र - मन्त्रों आदिमें श्रद्धा रखता है, हे २० | पर्वतराज! जो मेरे प्रति प्रेमसे आकुल चित्तवाला, मेरा निरन्तर चिन्तन करते हुए पुलकित शरीरवाला, प्रेमके आँसुओंसे परिपूर्ण नेत्रोंवाला तथा कंठ २१ गद्गद होनेसे अवरुद्ध वाणीवाला होकर जगत्को उत्पन्न करनेवाली तथा सभी कारणोंकी कारण मुझ परमेश्वरीका अनन्य भावसे पूजन करता है, जो मेरे २२ नित्य तथा नैमित्तिक सभी दिव्य व्रतोंको धनकी कृपणतासे रहित होकर भक्तिपूर्वक नित्य करता है, भूधर! जो स्वभावसे ही मेरा उत्सव देखनेकी २३ अभिलाषा रखता है तथा मेरा उत्सव आयोजित करता है तथा जो अहंकार आदिसे रहित तथा देहभावनासे विहीन होकर ऊँचे स्वरसे मेरे २४ नामोंका ही कीर्तन करते हुए नृत्य करता है और प्रारब्धके द्वारा जैसा जो किया जाता है, वह वैसा ही होता है, इसलिये अपने शरीरकी रक्षा आदि २५ करनेकी भी कोई चिन्ता नहीं करता है, ऐसे पुरुषोंकी जो भक्ति कही गयी, वह पराभक्तिके नामसे विख्यात है, जिसमें देवीको छोड़कर अन्य किसीकी भी भावना २६ नहीं की जाती ॥११–२६ ॥ हे भूधर! इस प्रकारकी पराभक्ति जिसके हृदयमें उत्पन्न हो जाती है, उसका उसी क्षण मेरे चिन्मयरूपमें २७ विलय हो जाता है ॥ २७ ॥
भक्तिकी जो पराकाष्ठा है, उसीको ज्ञान कहा गया है और वही वैराग्यकी सीमा भी है; क्योंकि ज्ञान २८ प्राप्त हो जानेपर भक्ति और वैराग्य- ये दोनों ही स्वयं सिद्ध हो जाते हैं ॥ २८ ॥
हे नग! मेरी भक्ति करनेपर भी जिसे प्रारब्धवश २ ९ मेरा ज्ञान नहीं हो पाता है, वह मेरे धाम ' मणिद्वीप में जाता है । वहाँ जाकर समस्त प्रकारके भोगोंमें अनासक्त होता हुआ वह अपना समय व्यतीत करता है । हे ३० नग! अन्तमें उसे मेरे चिन्मयरूपका सम्यक् ज्ञान हो
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अ ० ३७ ] सप्तम
तेन मुक्तः सदैव स्याज्ज्ञानान्मुक्तिर्न चान्यथा ।
इहैव यस्य ज्ञानं स्याद्धृद्गतप्रत्यगात्मनः ॥ ३१
मम संवित्परतनोस्तस्य प्राणा व्रजन्ति न ।
ब्रह्मैव संस्तदाप्नोति ब्रह्मैव ब्रह्म वेद यः ॥ ३२
कण्ठचामीकरसममज्ञानात्तु तिरोहितम् ।
ज्ञानादज्ञाननाशेन लब्धमेव हि लभ्यते ॥ ३३
विदिताविदितादन्यन्नगोत्तम वर्मम ।
यथादर्शे तथात्मनि यथा जले तथा पितृलोके ॥ ३४
छायातपौ यथा स्वच्छौ विविक्तौ तद्वदेव हि ।
मम लोके भवेज्ज्ञानं द्वैतभावविवर्जितम् ॥ ३५
यस्तु वैराग्यवानेव ज्ञानहीनो म्रियेत चेत् ।
ब्रह्मलोके वसेन्नित्यं यावत्कल्पं ततः परम् ॥ ३६
शुचीनां श्रीमतां गेहे भवेत्तस्य जनि: पुन: ।
करोति साधनं पश्चात्ततो ज्ञानं हि जायते ॥ ३७
अनेकजन्मभी राजन् ज्ञानं स्यान्नैकजन्मना ।
ततः सर्वप्रयत्नेन ज्ञानार्थं यत्नमाश्रयेत् ॥ ३८
नोचेन्महान् विनाशः स्याज्जन्मैतद्दुर्लभं पुनः ।
तत्रापि प्रथमे वर्णे वेदप्राप्तिश्च दुर्लभा ॥ ३ ९
शमादिषट्कसम्पत्तिर्योगसिद्धिस्तथैव च ।
तथोत्तमगुरुप्राप्तिः सर्वमेवात्र दुर्लभम् ॥ ४०
तथेन्द्रियाणां पटुता संस्कृतत्वं तनोस्तथा ।
अनेकजन्मपुण्यैस्तु मोक्षेच्छा जायते ततः ॥ ४१
स्कन्ध १ ९९ जाता है । उस ज्ञानके प्रभावसे वह सदाके लिये मुक्त हो जाता है; क्योंकि ज्ञानसे ही मुक्ति होती है; इसमें सन्देह नहीं है । इस लोकमें जिस व्यक्तिको हृदयमें स्थित प्रत्यगात्माका स्वरूपावबोध हो जाता है, मेरे ज्ञानपरायण उस भक्तके प्राण उत्क्रमण नहीं करते अर्थात् इस शरीरमें ही प्राणोंका लय हो जाता है । जो मनुष्य ब्रह्मको जान लेता है, वह स्वयं ब्रह्मका ही रूप होकर उसी ब्रह्मको ही प्राप्त हो जाता है ॥ २ ९ –३२ ॥ जैसे कंठमें स्थित सोनेका हार भ्रमवश खो गयेके समान प्रतीत होने लगता है, किंतु भ्रमका नाश होते ही वह प्राप्त हो जाता है, जबकि वह मिला हुआ पहलेसे ही था । हे पर्वतश्रेष्ठ! मेरा स्वरूप ज्ञात और अज्ञातसे विलक्षण है । जैसे दर्पणपर परछाहीं पड़ती है, वैसे ही इस शरीरमें आत्माकी परछाहींका अनुभव होता है । जैसे जलमें प्रतिबिम्ब पड़ता है, वैसे ही पितृलोकमें अनुभव होता है । छाया और प्रकाश जैसे स्पष्टतः भिन्न दीखते हैं, वैसे ही मेरे लोकमें द्वैतभावसे रहित ज्ञानकी प्राप्ति होती है ॥ ३३ – ३५ ॥ यदि मनुष्य वैराग्ययुक्त होकर पूर्ण ज्ञानके बिना मृत्युको प्राप्त हो जाय तो एक कल्पतक निरन्तर ब्रह्मलोकमें निवास करता है । उसके बाद पवित्र श्रीमान् पुरुषोंके घरमें उसका जन्म होता है । वहाँपर वह साधना करता है और फिर उसमें ज्ञानका उदय होता है ॥ ३६-३७ ॥ हे राजन्! एक जन्ममें मनुष्यको ज्ञान नहीं होता, अपितु अनेक जन्मोंमें ज्ञानका आविर्भाव होता है । अतः पूर्ण प्रयत्नके साथ ज्ञानप्राप्तिके लिये उपायका आश्रय लेना चाहिये, अन्यथा महान् अनर्थ होता है; क्योंकि यह मनुष्य - जन्म अत्यन्त दुर्लभ है, उसमें भी ब्राह्मणवर्णमें और उसमें भी वेदज्ञानकी प्राप्ति होना महान् दुर्लभ है । साथ ही शम, दम आदि छः सम्पदाएँ, योगसिद्धि तथा उत्तम गुरुकी प्राप्ति-यह सब इस लोकमें दुर्लभ है । अनेक जन्मोंके पुण्यों इन्द्रियोंमें सदा कार्य करते रहनेकी क्षमता, शरीरका संस्कारसम्पन्न रहना तथा मोक्षकी अभिलाषा
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२०० साधने सफलेऽप्येवं जायमानेऽपि यो नरः । ज्ञानार्थं नैव यतते तस्य जन्म निरर्थकम्
तस्माद्राजन् यथाशक्त्या ज्ञानार्थं यत्नमाश्रयेत् ।
पदे पदेऽश्वमेधस्य फलमाप्नोति निश्चितम् ॥
घृतमिव पयसि निगूढं भूते भूते च वसति विज्ञानम् ।
सततं मन्थयितव्यं मनसा मन्थानभूतेन ॥
ज्ञानं लब्ध्वा कृतार्थः स्यादिति वेदान्तडिण्डिमः ।
सर्वमुक्तं समासेन किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३८ उत्पन्न होती है । जो मनुष्य इस प्रकारके सफल ॥ ४२ साधनसे युक्त रहनेपर भी ज्ञानके लिये प्रयत्न नहीं करता, उसका जन्म निरर्थक है ॥ ३८-४२ ॥ अतएव हे राजन्! मनुष्यको यथाशक्ति ज्ञानप्राप्तिके लिये प्रयत्नशील रहना चाहिये । उससे मनुष्य एक-४३ एक पदपर अश्वमेधयज्ञका फल निश्चितरूपसे प्राप्त करता है । दूधमें छिपे हुए घृतकी भाँति प्रत्येक प्राणीमें विज्ञान रहता है | उसे मनरूपी मथानीसे निरन्तर मथते ४४ रहना चाहिये और इस प्रकार उस विज्ञानको प्राप्त करके कृतार्थ हो जाना चाहिये - ऐसा वेदान्तका डिंडिमघोष है । [ हे पर्वतराज हिमालय! ] मैंने आपको सब कुछ संक्षेपमें बता दिया, अब आप पुनः क्या ४५ | सुनना चाहते हैं? ॥ ४३–४५ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे देवीगीतायां भक्तिमहिमवर्णनं नाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥
अथाष्टत्रिंशोऽध्यायः भगवतीके द्वारा देवीतीर्थों, हिमालय उवाच
कति स्थानानि देवेशि द्रष्टव्यानि महीतले ।
मुख्यानि च पवित्राणि देवीप्रियतमानि च ॥ १
व्रतान्यपि तथा यानि तुष्टिदान्युत्सवा अपि ।
तत्सर्वं वद मे मातः कृतकृत्यो यतो नरः ॥ २
देव्युवाच
सर्वं दृश्यं मम स्थानं सर्वे काला व्रतात्मकाः ।
उत्सवाः सर्वकालेषु यतोऽहं सर्वरूपिणी ॥ ३
तथापि भक्तवात्सल्यात्किञ्चित्किञ्चिदथोच्यते ।
शृणुष्वावहितो भूत्वा नगराज वचो मम ॥ ४
कोलापुरं महास्थानं यत्र लक्ष्मीः सदा स्थिता ।
मातुः पुरं द्वितीयं च रेणुकाधिष्ठितं परम् ॥ ५
व्रतों तथा उत्सवोंका वर्णन हिमालय बोले – हे देवेश्वरि! इस पृथ्वीतलपर कौन - कौनसे पवित्र, मुख्य, दर्शनीय तथा आप भगवतीके लिये अत्यन्त प्रिय स्थान हैं? हे माता! आपको सन्तुष्ट करनेवाले जो - जो व्रत तथा उत्सव हों, उन सबको भी मुझे बताइये, जिससे मुझ जैसा प्राणी कृतकृत्य हो जाय ॥ १-२ ॥ देवी बोलीं- दृष्टिगोचर होनेवाले सभी स्थान मेरे अपने हैं, सभी काल व्रतयोग्य हैं तथा सभी समयोंमें मेरे उत्सव मनाये जा सकते हैं; क्योंकि मैं सर्वरूपिणी हूँ । फिर भी हे पर्वतराज! भक्तवात्सल्यके कारण मैं कतिपय स्थानोंको बता रही हूँ, आप सावधान होकर मेरा वचन सुनिये ॥ ३-४ ॥ कोलापुर एक अत्यन्त श्रेष्ठ स्थान है, जहाँ लक्ष्मी सदा निवास करती हैं । मातृपुर दूसरा परम स्थान है, जहाँ भगवती रेणुका विराजमान | हैं ॥ ५ ॥
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अ ० ३८ ]
तुलजापुरं तृतीयं स्यात्सप्तशृङ्गं तथैव च ।
हिङ्गुलाया महास्थानं ज्वालामुख्यास्तथैव च ॥
शाकम्भर्याः परं स्थानं भ्रामर्या: स्थानमुत्तमम् ।
श्रीरक्तदन्तिकास्थानं दुर्गास्थानं तथैव च ॥
विन्ध्याचलनिवासिन्याः स्थानं सर्वोत्तमोत्तमम् ।
अन्नपूर्णामहास्थानं काञ्चीपुरमनुत्तमम् ॥
भीमादेव्या परं स्थानं विमलास्थानमेव च ।
श्रीचन्द्रलामहास्थानं कौशिकीस्थानमेव च ॥
नीलाम्बायाः परं स्थानं नीलपर्वतमस्तके ।
जाम्बूनदेश्वरीस्थानं तथा श्रीनगरं शुभम् ॥
गुह्यकाल्या महास्थानं नेपाले यत्प्रतिष्ठितम् ।
मीनाक्ष्याः परमं स्थानं यच्च प्रोक्तं चिदम्बरे ॥
वेदारण्यं महास्थानं सुन्दर्याः समधिष्ठितम् ।
एकाम्बरं महास्थानं परशक्त्या प्रतिष्ठितम् ॥
महालसा परं स्थानं योगेश्वर्यास्तथैव च ।
तथा नीलसरस्वत्याः स्थानं चीनेषु विश्रुतम् ॥
वैद्यनाथे तु बगलास्थानं सर्वोत्तमं मतम् ।
श्रीमच्छ्रीभुवनेश्वर्या मणिद्वीपं मम स्मृतम् ॥
श्रीमत्त्रिपुरभैरव्याः कामाख्यायोनिमण्डलम् ।
भूमण्डले क्षेत्ररत्नं महामायाधिवासितम् ॥
नातः परतरं स्थानं क्वचिदस्ति धरातले ।
प्रतिमासं भवेद्देवी यत्र साक्षाद्रजस्वला ॥
तत्रत्या देवताः सर्वाः पर्वतात्मकतां गताः ।
पर्वतेषु वसन्त्येव महत्यो देवता अपि ॥
तत्रत्या पृथिवी सर्वा देवीरूपा स्मृता बुधैः ।
नातः परतरं स्थानं कामाख्यायोनिमण्डलात् ॥
गायत्र्याश्च परं स्थानं श्रीमत्पुष्करमीरितम् ।
अमरेशे चण्डिका स्यात्प्रभासे पुष्करेक्षिणी ॥
सप्तम स्कन्ध २०१ तीसरा स्थान तुलजापुर है । इसी प्रकार सप्तशृंग ६ भी एक स्थान है । हिंगुला, ज्वालामुखी, शाकम्भरी, भ्रामरी, रक्तदन्तिका और दुर्गा - इन देवियोंके उत्तम स्थान इन्हीं के नामोंसे विख्यात हैं ॥ ६-७ ॥ ७ भगवती विन्ध्यवासिनीका स्थान [ विन्ध्यपर्वत ] सर्वोत्कृष्ट है । देवी अन्नपूर्णाका परम स्थान श्रेष्ठ कांचीपुर ८ है । भगवती भीमा, विमला, श्रीचन्द्रला और कौशिकीके महास्थान इन्हीं के नामोंसे प्रसिद्ध हैं ॥ ८- ९ ॥ भगवती नीलाम्बाका परम स्थान नीलपर्वतके ९ शिखरपर है और देवी जाम्बूनदेश्वरीका पवित्र स्थान श्रीनगरमें है । भगवती गुह्यकालीका महान् स्थान है, जो १० नेपालमें प्रतिष्ठित है और देवी मीनाक्षीका श्रेष्ठ स्थान है, जो चिदम्बरमें स्थित बताया गया है ॥ १०-११ ॥ भगवती सुन्दरीका महान् स्थान वेदारण्यमें अधिष्ठित ११ है और भगवती पराशक्तिका महास्थान एकाम्बरमें स्थित है । भगवती महालसा और इसी प्रकार देवी १२ योगेश्वरीके ` महान् स्थान इन्हींके नामोंसे विख्यात हैं । भगवती नीलसरस्वतीका स्थान चीन देशमें स्थित कहा गया है ॥ १२-१३ ॥ १३ भगवती बगलाका सर्वोत्तम स्थान वैद्यनाथधाममें स्थित माना गया है । मुझ श्रीमत् - श्रीभुवनेश्वरीका १४ स्थान मणिद्वीप बताया गया है । श्रीमत्त्रिपुरभैरवीका महान् स्थान कामाख्यायोनिमण्डल है, यह भूमण्डलपर क्षेत्ररत्नस्वरूप है तथा महामायाद्वारा अधिवासित क्षेत्र १५ है ॥ १४-१५ ॥ धरातलपर इससे बढ़कर श्रेष्ठ स्थान कहीं नहीं है, यहाँ भगवती प्रत्येक माहमें साक्षात् रजस्वला हुआ १६ करती हैं । उस समय वहाँके सभी देवता पर्वतस्वरूप हो जाते हैं और अन्य महान् देवता भी वहाँ पर्वतोंपर १७ निवास करते हैं । विद्वान् पुरुषोंने वहाँकी सम्पूर्ण भूमिको देवीरूप कहा है । इस कामाख्यायोनिमण्डलसे १८ बढ़कर श्रेष्ठ स्थान कोई नहीं है ॥ १६ – १८ ॥ ऐश्वर्यमय पुष्करक्षेत्र भगवती गायत्रीका उत्तम स्थान कहा गया है । अमरेशमें चण्डिका १ ९ । तथा प्रभासमें भगवती पुष्करेक्षिणी विराजमान हैं ।