देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 211–220

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 211–220

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२०२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३८

नैमिषे तु महास्थाने देवी सा लिङ्गधारिणी ।

पुरुहूता पुष्कराक्षे आषाढौ च रतिस्तथा ॥ २०

चण्डमुण्डी महास्थाने दण्डिनी परमेश्वरी ।

भारभूतौ भवेद्भूतिर्नाकुले नकुलेश्वरी ॥ २१

चन्द्रिका तु हरिश्चन्द्रे श्रीगिरौ शाङ्करी स्मृता ।

जप्येश्वरे त्रिशूला स्यात्सूक्ष्मा चाम्रातकेश्वरे ॥ २२

शाङ्करी तु महाकाले शर्वाणी मध्यमाभिधे ।

केदाराख्ये महाक्षेत्रे देवी सा मार्गदायिनी ॥ २३

भैरवाख्ये भैरवी सा गयायां मङ्गला स्मृता ।

स्थाणुप्रिया कुरुक्षेत्रे स्वायम्भुव्यपि नाकुले ॥ २४

कनखले भवेदुग्रा विश्वेशा विमलेश्वरे ।

अट्टहासे महानन्दा महेन्द्रे तु महान्तका ॥२५

भीमे भीमेश्वरी प्रोक्ता स्थाने वस्त्रापथे पुनः ।

भवानी शाङ्करी प्रोक्ता रुद्राणी त्वर्धकोटिके ॥ २६

अविमुक्ते विशालाक्षी महाभागा महालये ।

गोकर्णे भद्रकर्णी स्याद्भद्रा स्याद्भकर्णके ॥ २७

उत्पलाक्षी सुवर्णाक्षे स्थाण्वीशा स्थाणुसंज्ञके ।

कमलालये तु कमला प्रचण्डा छगलण्डके ॥ २८

कुरण्डले त्रिसन्ध्या स्यान्माकोटे मुकुटेश्वरी ।

मण्डलेशे शाण्डकी स्यात्काली कालञ्जरे पुनः ॥ २ ९

शङ्कुकर्णे ध्वनिः प्रोक्ता स्थूला स्यात्स्थूलकेश्वरे ।

ज्ञानिनां हृदयाम्भोजे हृल्लेखा परमेश्वरी ॥ ३०

प्रोक्तानीमानि स्थानानि देव्याः प्रियतमानि च ।

तत्तत्क्षेत्रस्य माहात्म्यं श्रुत्वा पूर्वं नगोत्तम ॥ ३१

महास्थान नैमिषारण्यमें लिंगधारिणी विराजमान हैं पुष्कराक्षमें देवी पुरुहूता और आषाढीमें भगवती रति प्रतिष्ठित हैं ॥ १ ९ -२० ॥ चण्डमुण्डी नामक महान् स्थानमें परमेश्वरी दण्डिनी और भारभूतिमें देवी भूति तथा नाकुलमें देवी नकुलेश्वरी विराजमान हैं । हरिश्चन्द्र नामक स्थानमें भगवती चन्द्रिका और श्रीगिरिपर शांकरी प्रतिष्ठित कही गयी हैं । जप्येश्वर स्थानमें त्रिशूला और आम्रातकेश्वरमें देवी सूक्ष्मा हैं ॥ २१-२२ ॥ महाकालक्षेत्रमें शांकरी, मध्यम नामक स्थानमें शर्वाणी और केदार नामक महान् क्षेत्रमें वे भगवती मार्गदायिनी अधिष्ठित हैं । भैरव नामक स्थानमें भगवती भैरवी और गयामें भगवती मंगला प्रतिष्ठित कही गयी हैं । कुरुक्षेत्रमें देवी स्थाणु-प्रिया और नाकुलमें भगवती स्वायम्भुवीका स्थान है ॥२३-२४ ॥ कनखल में भगवती उग्रा, विमलेश्वरमें विश्वेशा, अट्टहासमें महानन्दा और महेन्द्रपर्वतपर देवी महान्तका विराजमान हैं । भीमपर्वतपर भगवती भीमेश्वरी, वस्त्रापथ नामक स्थानमें भवानी शांकरी और अर्धकोटिपर्वतपर भगवती रुद्राणी प्रतिष्ठित कही गयी हैं ॥ २५-२६ ॥ अविमुक्तक्षेत्र ( काशी ) - में भगवती विशालाक्षी, महालय क्षेत्रमें महाभागा, गोकर्णमें भद्रकर्णी और भद्रकर्णकमें देवी भद्रा विराजमान हैं । सुवर्णाक्ष नामक स्थानमें भगवती उत्पलाक्षी, स्थाणुसंज्ञक स्थानमें देवी स्थाण्वीशा, कमलालयमें कमला, छगलण्डकमें प्रचण्डा, कुरण्डलमें त्रिसन्ध्या, माकोटमें मुकुटेश्वरी, मण्डलेशमें शाण्डकी और कालंजरपर्वतपर काली प्रतिष्ठित हैं । शंकुकर्णपर्वतपर भगवती ध्वनि विराजमान बतायी गयी हैं । स्थूलकेश्वरपर भगवती स्थूला हैं । परमेश्वरी हृल्लेखा ज्ञानियोंके हृदयकमलमें विराजमान रहती हैं ॥ २७ – ३० ॥ बताये गये ये स्थान देवीके लिये अत्यन्त । प्रिय हैं । हे पर्वतराज! पहले उन क्षेत्रोंका माहात्म्य

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अ ० ३८ ]

तदुक्तेन विधानेन पश्चाद्देवीं प्रपूजयेत् ।

अथवा सर्वक्षेत्राणि काश्यां सन्ति नगोत्तम ॥

अतस्तत्र वसेन्नित्यं देवीभक्तिपरायणः ।

तानि स्थानानि सम्पश्यञ्जपन्देवीं निरन्तरम् ॥

ध्यायंस्तच्चरणाम्भोजं मुक्तो भवति बन्धनात् ।

इमानि देवीनामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत् ॥

भस्मीभवन्ति पापानि तत्क्षणान्नग सत्वरम् ।

श्राद्धकाले पठेदेतान्यमलानि द्विजाग्रतः ॥

मुक्तास्तत्पितरः सर्वे प्रयान्ति परमां गतिम् ।

अधुना कथयिष्यामि व्रतानि तव सुव्रत ॥

नारीभिश्च नरैश्चैव कर्तव्यानि प्रयत्नतः ।

व्रतमनन्ततृतीयाख्यं रसकल्याणिनीव्रतम् ॥

आर्द्रानन्दकरं नाम्ना तृतीयाया व्रतं च यत् ।

शुक्रवारव्रतं चैव तथा कृष्णचतुर्दशी ॥

भौमवारव्रतं चैव प्रदोषव्रतमेव च ।

यत्र देवो महादेवो देवीं संस्थाप्य विष्टरे ॥

नृत्यं करोति पुरतः सार्धं देवैर्निशामुखे ।

तत्रोपोष्य रजन्यादौ प्रदोषे पूजयेच्छिवाम् ॥

प्रतिपक्षं विशेषेण तद्देवीप्रीतिकारकम् ।

सोमवारव्रतं चैव ममातिप्रियकृन्नग ॥

तत्रापि देवीं सम्पूज्य रात्रौ भोजनमाचरेत् ।

नवरात्रद्वयं चैव व्रतं प्रीतिकरं मम ॥

एवमन्यान्यपि विभो नित्यनैमित्तिकानि च ।

व्रतानि कुरुते यो वै मत्प्रीत्यर्थं विमत्सरः ॥

सप्तम स्कन्ध २०३ सुनकर तत्पश्चात् शास्त्रोक्त विधिसे भगवतीकी पूजा ३२ करनी चाहिये अथवा हे नगश्रेष्ठ! ये सभी क्षेत्र काशीमें भी स्थित हैं, इसलिये देवीकी भक्तिमें तत्पर रहनेवाले मनुष्यको निरन्तर वहाँ रहना चाहिये । वहाँ रहकर उन ३३ स्थानोंका दर्शन, भगवतीके मन्त्रोंका निरन्तर जप और उनके चरणकमलका नित्य ध्यान करनेवाला मनुष्य भवबन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ ३१–३३३ ॥ ३४ हे नग! जो मनुष्य प्रातः काल उठकर भगवतीके इन नामोंका पाठ करता है, उसके समस्त पाप उसी क्षण शीघ्र ही भस्म हो जाते हैं । जो व्यक्ति श्राद्ध ३५ समय ब्राह्मणोंके समक्ष इन पवित्र नामोंका पाठ करता है, उसके सभी पितर मुक्त होकर परम गतिको प्राप्त हो जाते हैं ॥ ३४-३५३ ॥ ३६ हे सुव्रत! अब मैं देवीके व्रतोंके विषयमें आपको बताऊँगा । सभी स्त्रियों और पुरुषोंको ये व्रत प्रयत्नपूर्वक करने चाहिये ॥ ३६३ ॥

३७ व्रतोंमें जो तृतीयाके व्रत हैं; वे अनन्ततृतीया, रसकल्याणिनी और आर्द्रानन्दकर नामसे प्रसिद्ध हैं । शुक्रवार, कृष्णचतुर्दशी तथा भौमवारको देवीका व्रत ३८ किया जाता है । प्रदोष भी देवीव्रत है; उस दिन देवाधिदेव भगवान् शिव सायंकालके समय देवी पार्वतीको कुशासनपर विराजमान करके उनके ३ ९ समक्ष देवताओंके साथ नृत्य करते हैं । उस दिन उपवास करके सायंकालके प्रदोषमें भगवती शिवाकी पूजा करनी चाहिये । देवीको विशेषरूपसे ४० सन्तुष्ट करनेवाला यह प्रदोष प्रत्येक पक्षमें करना चाहिये ॥ ३७ - ४०३ ॥ हे पर्वत! सोमवारका व्रत मुझे अत्यधिक सन्तुष्ट ४१ करनेवाला है । इस व्रतमें भी [ उपवास करके ] भगवतीकी पूजाकर रातमें भोजन करना चाहिये । इसी प्रकार चैत्र और आश्विन महीनोंके दोनों नवरात्रव्रत ४२ मेरे लिये अत्यन्त प्रियकर हैं । ४१-४२ ॥ हे विभो! इसी प्रकार और भी नित्य तथा नैमित्तिक व्रत हैं । जो मनुष्य राग - द्वेषसे रहित होकर ४३ | मेरी प्रसन्नताके लिये इन व्रतोंको करता है, वह मेरा

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२०४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३ ९

प्राप्नोति मम सायुज्यं स मे भक्तः स मे प्रियः ।

उत्सवानपि कुर्वीत दोलोत्सवमुखान्विभो ॥

शयनोत्सवं तथा कुर्यात्तथा जागरणोत्सवम् ।

रथोत्सवं च मे कुर्याद्दमनोत्सवमेव च ॥

पवित्रोत्सवमेवापि श्रावणे प्रीतिकारकम् ।

मम भक्तः सदा कुर्यादेवमन्यान्महोत्सवान् ॥

मद्भक्तान्भोजयेत्प्रीत्या तथा चैव सुवासिनीः ।

कुमारीर्वटुकांश्चापि मद्बुद्ध्या तद्गतान्तरः ॥

वित्तशाठ्येन रहितो यजेदेतान्सुमादिभिः ।

य एवं कुरुते भक्त्या प्रतिवर्षमतन्द्रितः ॥

स धन्यः कृतकृत्योऽसौ मत्प्रीतेः पात्रमञ्जसा ।

सर्वमुक्तं समासेन मम प्रीतिप्रदायकम् ।

नाशिष्याय प्रदातव्यं नाभक्ताय कदाचन ॥

सायुज्यपद प्राप्त कर लेता है । वह मेरा भक्त है और ४४ मुझे अतिप्रिय है । हे विभो! व्रतोंके अवसरपर झूला सजाकर उत्सव मनाना चाहिये । मेरा शयनोत्सव, जागरणोत्सव, रथोत्सव और दमनोत्सव आयोजित करना चाहिये ॥ ४३–४५ ॥ ४५ श्रावण महीनेमें होनेवाला पवित्रोत्सव भी मेरे लिये प्रीतिकारक है । मेरे भक्तको चाहिये कि वह इसी तरहसे अन्य महोत्सवोंको भी सदा ४६ मनाये | उन अवसरोंपर मेरे भक्तों, सुवासिनी स्त्रियों, कुमारी कन्याओं और बटुकोंको मेरा ही स्वरूप समझकर उनमें मन स्थित करके उन्हें प्रेमपूर्वक भोजन कराना चाहिये, साथ ही धनकी कृपणतासे ४७ रहित होकर पुष्प आदिसे इनकी पूजा करनी चाहिये ॥ ४६-४७३ ॥ जो मनुष्य सावधान होकर भक्तिपूर्वक प्रत्येक ४८ वर्ष ऐसा करता है, वह धन्य तथा कृतकृत्य है और वह शीघ्र ही मेरा प्रियपात्र बन जाता है । मुझे प्रसन्नता प्रदान करनेवाला यह सब प्रसंग मैंने संक्षेपमें आपसे कह दिया । उपदेश न माननेवाले तथा मुझमें भक्ति न रखनेवाले मनुष्यके समक्ष इसे कभी भी प्रकाशित नहीं ४ ९ | करना चाहिये ॥ ४८-४९ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्रयां संहितायां सप्तमस्कन्धे देवीगीतायां श्रीदेव्या महोत्सवव्रतस्थानवर्णनं नामाष्टत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥

अथैकोनचत्वारिंशोऽध्याय देवी - पूजनके विविध प्रकारोंका वर्णन हिमालय उवाच

देवदेवि महेशानि करुणासागरेऽम्बिके ।

ब्रूहि पूजाविधिं सम्यग्यथावदधुना निजम् ॥

श्रीदेव्युवाच

वक्ष्ये पूजाविधिं राजन्नम्बिकाया यथाप्रियम् ।

अत्यन्तश्रद्धया सार्धं शृणु पर्वतपुङ्गव ॥

हिमालय बोले - हे देवेश्वरि! हे महेश्वरि! हे करुणासागरे! हे अम्बिके! अब आप १ यथार्थरूपसे अपने पूजनकी विधिको भलीभाँति बतलाइये ॥ १ ॥

श्रीदेवी बोलीं- हे राजन्! हे पर्वतश्रेष्ठ! मैं यथार्थरूपमें जगदम्बाको प्रसन्न करनेवाली पूजाविधि बता रही हूँ, महती श्रद्धाके साथ आप २ | इसे सुनिये ॥ २ ॥

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अ ० ३ ९ ] सप्तम स्कन्ध २०५

द्विविधा मम पूजा स्याद् बाह्या चाभ्यन्तरापि च ।

बाह्यापि द्विविधा प्रोक्ता वैदिकी तान्त्रिकी तथा ॥

वैदिक्यर्चापि द्विविधा मूर्तिभेदेन भूधर ।

वैदिकी वैदिकैः कार्या वेददीक्षासमन्वितैः ॥

तन्त्रोक्तदीक्षावद्भिस्तु तान्त्रिकी संश्रिता भवेत् ।

इत्थं पूजारहस्यं च न ज्ञात्वा विपरीतकम् ॥

करोति यो नरो मूढः स पतत्येव सर्वथा ।

तत्र या वैदिकी प्रोक्ता प्रथमा तां वदाम्यहम् ॥

यन्मे साक्षात्परं रूपं दृष्टवानसि भूधर ।

अनन्तशीर्षनयनमनन्तचरणं महत् ॥

सर्वशक्तिसमायुक्तं प्रेरकं यत्परात्परम् ।

तदेव पूजयेन्नित्यं नमेद् ध्यायेत्स्मरेदपि ॥

इत्येतत्प्रथमार्चायाः स्वरूपं कथितं नग ।

शान्त: समाहितमना दम्भाहङ्कारवर्जितः ॥

तत्परो भव तद्याजी तदेव शरणं व्रज ।

तदेव चेतसा पश्य जप ध्यायस्व सर्वदा ॥

अनन्यया प्रेमयुक्तभक्त्या मद्भावमाश्रितः ।

यज्ञैर्यज तपोदानैर्मामेव परितोषय ॥

इत्थं ममानुग्रहतो मोक्ष्यसे भवबन्धनात् ।

मत्परा ये मदासक्तचित्ता भक्तवरा मताः ॥

प्रतिजाने भवादस्मादुद्धराम्यचिरेण तु ।

ध्यानेन कर्मयुक्तेन भक्तिज्ञानेन वा पुनः ॥

प्राप्याहं सर्वथा राजन्न तु केवलकर्मभिः । मेरी पूजा ' दो प्रकारकी है- बाह्य और आभ्यन्तर । ३ बाह्य पूजा भी वैदिकी और तान्त्रिकी - दो प्रकारकी कही गयी है ॥ ३ ॥

हे भूधर! वैदिकी पूजा भी मूर्तिभेदसे दो ४ प्रकारकी होती है । वेददीक्षासे सम्पन्न वैदिकोंद्वारा वैदिकी पूजा की जानी चाहिये और तन्त्रोक्त दीक्षासे युक्त पुरुषोंके द्वारा तान्त्रिकी पूजा की जानी चाहिये । ५ इस प्रकार पूजाके रहस्यको न समझकर जो अज्ञानी मनुष्य इसके विपरीत करता है, उसका सर्वथा अध: पतन हो जाता है ॥ ४-५३ ॥ ६ उसमें जो पहली वैदिकी पूजा कही गयी है, उसे मैं बता रही हूँ, हे भूधर! तुम अनन्त मस्तक, नेत्र तथा चरणवाले मेरे जिस महान् रूपका ७ साक्षात् दर्शन कर चुके हो और जो समस्त शक्तियोंसे सम्पन्न, प्रेरणा प्रदान करनेवाला तथा परात्पर है; उसी रूपका नित्य पूजन, नमन, ध्यान तथा स्मरण करना ८ चाहिये । हे नग! मेरी प्रथम पूजाका यही स्वरूप बताया गया है । आप शान्त होकर समाहित मनसे और दम्भ तथा अहंकारसे रहित होकर उसके ९ परायण होइये, उसीका यजन कीजिये, उसीकी शरणमें जाइये और चित्तसे सदा उसीका दर्शन - जप-ध्यान कीजिये ॥ ६–१० ॥ १० अनन्य एवं प्रेमपूर्ण भक्तिसे मेरे उपासक बनकर यज्ञोंके द्वारा मेरी पूजा कीजिये और तपस्या तथा दानके द्वारा मुझे पूर्णरूपसे सन्तुष्ट ११ कीजिये । ऐसा करनेपर मेरी कृपासे आप भवबन्धनसे छूट जायँगे ॥११३ ॥

जो मेरे ऊपर निर्भर रहते हैं और अपना चित्त १२ मुझमें लगाये रखते हैं, वे मेरे उत्तम भक्त माने गये हैं । यह मेरी प्रतिज्ञा है कि मैं शीघ्र ही इस भवसागरसे उनका उद्धार कर देती हूँ ॥ १२३ ॥

१३ हे राजन्! मैं सर्वथा कर्मयुक्त ध्यानसे अथवा भक्तिपूर्ण ज्ञानसे ही प्राप्त हो सकती हूँ । केवल कर्मोंसे ही मेरी प्राप्ति सम्भव नहीं है ॥ १३३ ॥

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२०६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३ ९ धर्मात्सञ्जायते भक्तिर्भक्त्या सञ्जायते परम् ॥

श्रुतिस्मृतिभ्यामुदितं यत्स धर्मः प्रकीर्तितः ।

अन्यशास्त्रेण यः प्रोक्तो धर्माभासः स उच्यते ॥

सर्वज्ञात्सर्वशक्तेश्च मत्तो वेदः समुत्थितः ।

अज्ञानस्य ममाभावादप्रमाणा न च श्रुतिः ॥

स्मृतयश्च श्रुतेरर्थं गृहीत्वैव च निर्गताः ।

मन्वादीनां श्रुतीनां च ततः प्रामाण्यमिष्यते ॥

क्वचित्कदाचित्तन्त्रार्थकटाक्षेण परोदितम् ।

धर्मं वदन्ति सोंऽशस्तु नैव ग्राह्योऽस्ति वैदिकैः ॥

अन्येषां शास्त्रकर्तॄणामज्ञानं प्रभवत्वतः ।

अज्ञानदोषदुष्टत्वात्तदुक्तेर्न प्रमाणता ॥

तस्मान्मुमुक्षुर्धर्मार्थं सर्वथा वेदमाश्रयेत् ।

राजाज्ञा च यथा लोके हन्यते न कदाचन ॥

सर्वेशान्या ममाज्ञा सा श्रुतिस्त्याज्या कथं नृभिः ।

मदाज्ञारक्षणार्थं तु ब्रह्मक्षत्रियजातयः ॥

मया सृष्टास्ततो ज्ञेयं रहस्यं मे श्रुतेर्वचः ।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भूधर ॥

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदा वेषान्बिभर्म्यहम् ।

देवदैत्यविभागश्चाप्यत एवाभवन्नृप ॥

ये न कुर्वन्ति तद्धर्मं तच्छिक्षार्थं मया सदा ।

सम्पादितास्तु नरकास्त्रासो यच्छ्रवणाद्भवेत् ॥

१४ धर्मसे भक्ति उत्पन्न होती है और भक्तिसे परब्रह्मका ज्ञान प्राप्त होता है । श्रुति और स्मृतिके द्वारा जो कुछ भी प्रतिपादित है, वही धर्म कहा गया १५ है । अन्य शास्त्रोंके द्वारा जो निरूपित किया गया है, उसे धर्माभास कहा जाता है ॥ १४-१५ ॥ मुझ सर्वज्ञ तथा सर्वशक्तिसम्पन्न भगवतीसे वेद उत्पन्न हुआ है और इस प्रकार मुझमें अज्ञानका १६ अभाव रहनेके कारण श्रुति भी अप्रामाणिक नहीं है । श्रुति अर्थको लेकर ही स्मृतियाँ निकली हुई हैं । अतः श्रुतियों और मनु आदि स्मृतियोंकी प्रामाणिकता १७ स्वयंसिद्ध है ॥ १६-१७ ॥ स्मृति आदिमें कहीं - कहीं कटाक्षपूर्वक वामाचार-सम्बन्धी वेदविरुद्ध कही गयी बातको भी लोग धर्मके रूपमें स्वीकार करते हैं, किंतु वैदिक विद्वानोंके द्वारा १८ वह अंश कभी भी ग्राह्य नहीं है ॥ १८ ॥

अन्य शास्त्रकर्ताओंके वाक्य अज्ञानमूलक भी हो सकते हैं । अतः अज्ञानदोषसे दूषित होनेके कारण १ ९ उनकी उक्तिकी कोई प्रामाणिकता नहीं है । इसलिये मोक्षकी अभिलाषा रखनेवालेको धर्मकी प्राप्तिके लिये सदा वेदका आश्रय ग्रहण करना चाहिये ॥ १ ९ ३ ॥ २० जिस प्रकार लोकमें राजाकी आज्ञाकी अवहेलना कभी नहीं की जाती, वैसे ही मनुष्य मुझ सर्वेश्वरी भगवतीकी आज्ञास्वरूपिणी उस श्रुतिका त्याग कैसे कर सकते हैं? मेरी आज्ञाके पालनके लिये ही तो २१ ब्राह्मण और क्षत्रिय आदि जातियाँ मेरे द्वारा सृजित की गयी हैं । अब मेरी श्रुतिकी वाणीका रहस्य समझ लीजिये ॥ २०-२१३ ॥ २२ हे भूधर! जब - जब धर्मकी हानि होती है और अधर्मकी वृद्धि होती है, तब - तब मैं विभिन्न अवतार धारण करती हूँ । हे राजन्! इसीलिये देवताओं और

दैत्योंका विभाग हुआ है । २२-२३ ॥

२३ जो लोग उन धर्मोंका सदा आचरण नहीं करते, उन्हें शिक्षा देनेके लिये मैंने अनेक नरकोंकी व्यवस्था कर रखी है, जिनके सुननेमात्रसे भय उत्पन्न २४ | हो जाता है ॥२४ ॥

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अ ० ३ ९ ] सप्तम स्कन्ध २०७ यो वेदधर्ममुज्झित्य धर्ममन्यं समाश्रयेत् राजा प्रवासयेद्देशान्निजादेतानधर्मिणः ब्राह्मणैर्न च सम्भाष्याः पंक्तिग्राह्या न च द्विजैः अन्यानि यानि शास्त्राणि लोकेऽस्मिन्विविधानि च श्रुतिस्मृतिविरुद्धानि तामसान्येव सर्वशः वामं कापालकं चैव कौलकं भैरवागमः शिवेन मोहनार्थाय प्रणीतो नान्यहेतुकः दक्षशापाद् भृगोः शापाद्दधीचस्य च शापतः दग्धा ये ब्राह्मणवरा वेदमार्गबहिष्कृताः तेषामुद्धरणार्थाय सोपानक्रमतः सदा शैवाश्च वैष्णवाश्चैव सौराः शाक्तास्तथैव च गाणपत्या आगमाश्च प्रणीताः शङ्करेण तु तत्र वेदविरुद्धोऽशोऽप्युक्त एव क्वचित्क्वचित् वैदिकैस्तद्ग्रहे दोषो न भवत्येव कर्हिचित् ॥

सर्वथा वेदभिन्नार्थे नाधिकारी द्विजो भवेत् ।

वेदाधिकारहीनस्तु भवेत्तत्राधिकारवान् ॥

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन वैदिको वेदमाश्रयेत् धर्मेण सहितं ज्ञानं परं ब्रह्म प्रकाशयेत् सर्वेषणाः परित्यज्य मामेव शरणं गताः सर्वभूतदयावन्तो मानाहङ्कारवर्जिताः मच्चित्ता मद्गतप्राणा मत्स्थानकथने रताः संन्यासिनो वनस्थाश्च गृहस्था ब्रह्मचारिणः उपासन्ते सदा भक्त्या योगमैश्वरसंज्ञितम् तेषां नित्याभियुक्तानामहमज्ञानजं तमः ज्ञानसूर्यप्रकाशेन नाशयामि न संशयः ॥ जो लोग वेदप्रतिपादित धर्मका परित्याग करके ॥ २५ अन्य धर्मका आश्रय लेते हैं, राजाको चाहिये कि वह ऐसे अधर्मियोंको अपने राज्यसे निष्कासित कर दे ॥ ब्राह्मण उन अधार्मिकोंसे सम्भाषण न करें और ॥ २६ द्विजगण उन्हें अपनी पंक्तिमें न बैठायें ॥ २५३ ॥

इस लोक में श्रुति - स्मृतिविरुद्ध नानाविध अन्य । जो भी शास्त्र हैं, वे हर प्रकारसे तामस हैं । वाम, ॥ २७ कापालक, कौलक और भैरवागम — ऐसे ही शास्त्र हैं, जो मोहमें डाल देनेके लिये शिवजीके द्वारा प्रतिपादित । किये गये हैं- इसके अतिरिक्त अन्य कोई भी कारण ॥ २८ नहीं है ॥ २६-२७३ ॥ । वेदमार्गसे च्युत होनेके कारण जो उच्च कोटिके ॥ २ ९ ब्राह्मण दक्षप्रजापतिके शापसे, महर्षि भृगुके शापसे और महर्षि दधीचिके शापसे दग्ध कर दिये गये थे; । उनके उद्धारके लिये भगवान् शंकरने सोपान क्रमसे ॥ ३० शैव, वैष्णव, सौर, शाक्त तथा गाणपत्य आगमोंकी रचना की । उनमें कहीं - कहीं वेदविरुद्ध अंश भी कहा । गया है । वैदिकोंको उस अंशके ग्रहण कर लेनेमें कोई ३१ दोष नहीं होता है ॥२८-३१ ॥ वेदसे सर्वथा भिन्न अर्थको स्वीकार करनेके लिये द्वि अधिकारी नहीं है । वेदाधिकारसे रहित व्यक्ति ही ३२ । उसे ग्रहण करनेका अधिकारी है । अतः वैदिक पुरुषको पूरे प्रयत्नके साथ वेदका ही आश्रय ग्रहण करना । चाहिये; क्योंकि वेद - प्रतिपादित धर्मसे युक्त ज्ञान ही ॥ ३३ परब्रह्मको प्रकाशित कर सकता है॥३२-३३ ॥ । सम्पूर्ण इच्छाओंको त्यागकर मेरी ही शरणको प्राप्त, सभी प्राणियोंपर दया करनेवाले, मान - अहंकारसे ॥ ३४ रहित, मनसे मेरा ही चिन्तन करनेवाले, मुझमें ही । अपना प्राण समर्पित करनेवाले तथा मेरे स्थानोंका ॥ ३५ वर्णन करनेमें संलग्न रहनेवाले जो संन्यासी, वानप्रस्थ, गृहस्थ और ब्रह्मचारी मेरे ऐश्वरसंज्ञक योगकी सदा । भक्तिपूर्वक उपासना करते हैं- मुझमें निरन्तर अनुरक्त ॥ ३६ रहनेवाले उन साधकोंके अज्ञानजनित अन्धकारको मैं ज्ञानरूपी सूर्यके प्रकाशसे नष्ट कर देती हूँ; इसमें सन्देह नहीं है॥३४–३६३ ॥

पृष्ठ 217

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२०८ इत्थं वैदिकपूजायाः प्रथमाया नगाधिप

स्वरूपमुक्तं संक्षेपाद् द्वितीयाया अथो ब्रुवे ।

मूर्ती वा स्थण्डिले वापि तथा सूर्येन्दुमण्डले ॥

जलेऽथवा बाणलिङ्गे यन्त्रे वापि महापटे ।

तथा श्रीहृदयाम्भोजे ध्यात्वा देवीं परात्पराम् ॥

सगुणां करुणापूर्णां तरुणीमरुणारुणाम् ।

सौन्दर्यसारसीमां तां सर्वावयवसुन्दरीम् ॥

शृङ्गाररससम्पूर्णा सदा भक्तार्तिकातराम् । प्रसादसुमुखीमम्बां चन्द्रखण्डशिखण्डिनीम् श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३ ९ ॥ ३७ हे पर्वतराज! इस प्रकार मैंने पहली वैदिक पूजाके स्वरूपका संक्षेपमें वर्णन कर दिया । अब दूसरी पूजाके विषयमें बता रही हूँ ॥ ३७३ ॥

३८ मूर्ति, वेदी, सूर्य - चन्द्रमण्डल, जल, बाणलिंग, यन्त्र, महापट अथवा हृदयकमलमें सगुण रूपवाली परात्पर भगवतीका इस प्रकार ध्यान करे कि वे ३ ९ करुणासे परिपूर्ण हैं, तरुण अवस्थामें विद्यमान हैं, अरुणके समान अरुण आभासे युक्त हैं और सौन्दर्यके सारतत्त्वकी सीमा हैं । इनके सम्पूर्ण अंग परम मनोहर हैं, वे शृंगाररससे परिपूर्ण हैं तथा सदा भक्तोंके दुःखसे ४० दुःखी रहा करती हैं । इन जगदम्बाका मुखमण्डल प्रसन्नतासे युक्त रहता है; वे मस्तकपर बालचन्द्रमा तथा मयूरपंख धारण की हुई हैं; उन्होंने पाश, अंकुश, ॥ ४१ वर तथा अभयमुद्रा धारण कर रखा है; वे आनन्दमयरूपसे सम्पन्न हैं - इस प्रकार ध्यान करके अपने वित्त-पाशाङ्कुशवराभीतिधरामानन्दरूपिणीम् 1 सामर्थ्यके अनुसार विभिन्न उपचारोंसे भगवतीकी पूजयेदुपचारैश्च यथावित्तानुसारतः यावदान्तरपूजायामधिकारो भवेन्न हि तावद् बाह्यामिमां पूजां श्रयेज्जाते तु तां त्यजेत् ॥ आभ्यन्तरा तु या पूजा सा तु संविल्लयः स्मृतः संविदेव परं रूपमुपाधिरहितं मम अतः संविदि मद्रूपे चेतः स्थाप्यं निराश्रयम् संविद्रूपातिरिक्तं तु मिथ्या मायामयं जगत् अतः संसारनाशाय साक्षिणीमात्मरूपिणीम् भावयेन्निर्मनस्केन योगयुक्तेन चेतसा अतः परं बाह्यपूजाविस्तारः कथ्यते मया सावधानेन मनसा शृणु पर्वतसत्तम ॥ ४२ पूजा करनी चाहिये ॥ ३८–४२ ॥ जबतक अन्तःपूजामें अधिकार नहीं हो जाता, तबतक यह बाह्यपूजा करनी चाहिये । पुनः ४३ अन्तःपूजामें अधिकार हो जानेपर उस बाह्यपूजाको छोड़ देना चाहिये । जो आभ्यन्तरपूजा है, उसे । ज्ञानरूप मुझ ब्रह्ममें चित्तका लय होना कहा गया है । ॥ ४४ उपाधिरहित ज्ञान ही मेरा परम रूप है, अतः मेरे ज्ञानमयरूपमें अपना आश्रयहीन चित्त लगा देना । चाहिये ॥ ४३-४४३ ॥ इस ज्ञानमयरूपके अतिरिक्त यह मायामय ॥ ४५ जगत् पूर्णत: मिथ्या है । अतः भव - बन्धनके नाशके । लिये एकनिष्ठ तथा योगयुक्त चित्तसे मुझ सर्व-साक्षिणी तथा आत्मस्वरूपिणी भगवतीका चिन्तन ॥ ४६ करना चाहिये ॥ ४५-४६ ॥ हे पर्वतश्रेष्ठ! इसके बाद मैं बाह्यपूजाका । विस्तारपूर्वक वर्णन कर रही हूँ, आप सावधान ॥ ४७ । मनसे सुनिये ॥ ४७ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे देवीगीतायां श्रीदेव्याः पूजाविधिवर्णनं नामैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३ ९ ॥

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अ ० ४० ] सप्तम स्कन्ध २० ९ अथ चत्वारिंशोऽध्यायः देवीकी पूजा - विधि तथा फलश्रुति देव्युवाच

प्रातरुत्थाय शिरसि संस्मरेत्पद्ममुज्ज्वलम् ।

कर्पूराभं स्मरेत्तत्र श्रीगुरुं निजरूपिणम् ॥

सुप्रसन्नं लसद्भूषाभूषितं शक्तिसंयुतम् ।

नमस्कृत्य ततो देवीं कुण्डलीं संस्मरेद् बुधः ॥

प्रकाशमानां प्रथमे प्रयाणे प्रतिप्रयाणेऽप्यमृतायमानाम् अन्तः पदव्यामनुसंचरन्ती-मानन्दरूपामबलां प्रपद्ये ॥

ध्यात्वैवं तच्छिखामध्ये सच्चिदानन्दरूपिणीम् ।

मां ध्यायेदथ शौचादिक्रियाः सर्वाः समापयेत् ॥

अग्निहोत्रं ततो हुत्वा मत्प्रीत्यर्थं द्विजोत्तमः । होमान्ते स्वासने स्थित्वा पूजासङ्कल्पमाचरेत् भूतशुद्धिं पुरा कृत्वा मातृकान्यासमेव च । हृल्लेखामातृकान्यासं नित्यमेव समाचरेत् मूलाधारे हकारं च हृदये च रकारकम् भ्रूमध्ये तद्वदीकारं ह्रींकारं मस्तके न्यसेत् तत्तन्मन्त्रोदितानन्यान्यासान्सर्वान्समाचरेत् कल्पयेत्स्वात्मनो देहे पीठं धर्मादिभिः पुनः ततो ध्यायेन्महादेवीं प्राणायामैर्विजृम्भिते हृदम्भोजे मम स्थाने पञ्चप्रेतासने बुधः देवी बोलीं- प्रातः काल उठकर सिरमें प्रतिष्ठित ब्रह्मरन्ध्र ( सहस्रार - चक्र ) - में कर्पूरके समान आभावाले १ उज्ज्वल कमलका ध्यान करना चाहिये । उसपर अत्यन्त प्रसन्न, वस्त्र - आभूषणसे सुसज्जित तथा शक्तिसे सम्पन्न अपने ही स्वरूपवाले श्रीगुरु विराजमान हैं - ऐसी भावना करनी चाहिये । उन्हें प्रणाम करनेके २ अनन्तर विद्वान् साधकको भगवती कुण्डलिनी शक्तिका इस प्रकार ध्यान करना चाहिये - प्रथम प्रयाणमें अर्थात् ब्रह्मरन्ध्रमें संचरण करनेपर प्रकाश - पुंजरूपवाली, प्रतिप्रयाणमें अर्थात् मूलाधारमें संचरण करनेपर अमृतमयस्वरूपवाली तथा अन्तः पदमें अर्थात् सुषुम्णा ३ नाड़ीमें विराजनेपर आनन्दमयी स्त्रीरूपिणी देवी कुण्डलिनीकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ ॥ १ - ३ ॥ इस प्रकार कुण्डलिनी शक्तिका ध्यान करके उसकी शिखाके मध्यमें सच्चिदानन्दरूपिणी मुझ ४ भगवतीका ध्यान करना चाहिये । इसके बाद शौच आदि सभी नित्य क्रियाएँ सम्पन्न करनी चाहिये ॥ ४ ॥

तत्पश्चात् श्रेष्ठ द्विजको चाहिये कि मेरी ॥ ५ प्रसन्नताके लिये अग्निहोत्र करे । पुनः होमके अन्तमें अपने आसनपर बैठकर पूजनका संकल्प करना चाहिये । पहले भूतशुद्धि करके मातृकान्यास करे; ॥ ६ हल्लेखामातृकान्यास नित्य ही करना चाहिये । मूलाधारमें हकार, हृदयमें रकार, भ्रूमध्यमें ईकार तथा मस्तकमें ह्रींकारका न्यास करना चाहिये ॥ ॥ ७ तत् - तत् मन्त्रोंके कथनानुसार अन्य सभी न्यासोंको सम्पन्न करना चाहिये I । फिर अपने शरीरमें धर्म आदि सभी सत्कर्मोंसे परिपूर्ण एक दिव्य पीठकी कल्पना । करनी चाहिये ॥ ५–८ ॥ ॥ ८ तदनन्तर विज्ञ पुरुषको प्राणायामके प्रभावसे खिले हुए अपने हृदयकमलरूप स्थानमें पंचप्रेतासन । ऊपर महादेवीका ध्यान करना चाहिये । ब्रह्मा, विष्णु, ॥ ९ रुद्र, ईश्वर और सदाशिव - ये पाँचों महाप्रेत मेरे

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२१० ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च ईश्वरश्च सदाशिवः एते पञ्च महाप्रेताः पादमूले मम स्थिताः पञ्चभूतात्मका ह्येते पञ्चावस्थात्मका अपि अहं त्वव्यक्तचिद्रूपा तदतीतास्मि सर्वदा ततो विष्टरतां याताः शक्तितन्त्रेषु सर्वदा ध्यात्वैवं मानसैर्भोगैः पूजयेन्मां जपेदपि जपं समर्प्य श्रीदेव्यै ततोऽर्घ्यस्थापनं चरेत् । पात्रासादनकं कृत्वा पूजाद्रव्याणि शोधयेत्

जलेन तेन मनुना चास्त्रमन्त्रेण देशिकः ।

दिग्बन्धं च पुरा कृत्वा गुरून्नत्वा ततः परम् ॥

तदनुज्ञां समादाय बाह्यपीठे ततः परम् ।

हृदिस्थां भावितां मूर्तिं मम दिव्यां मनोहराम् ॥

आवाहयेत्ततः पीठे प्राणस्थापनविद्यया ।

आसनावाहने चार्घ्यं पाद्याद्याचमनं तथा ॥

स्नानं वासोद्वयं चैव भूषणानि च सर्वशः ।

गन्धपुष्पं यथायोग्यं दत्त्वा देव्यै स्वभक्तितः ॥

यन्त्रस्थानामावृतीनां पूजनं सम्यगाचरेत् ।

प्रतिवारमशक्तानां शुक्रवारो नियम्यते ॥

मूलदेवीप्रभारूपाः स्मर्तव्या अङ्गदेवताः ।

तत्प्रभापटलव्याप्तं त्रैलोक्यं च विचिन्तयेत् ॥

पुनरावृत्तिसहितां मूलदेवीं च पूजयेत् ।

गन्धादिभिः सुगन्धैस्तु तथा पुष्पैः सुवासितैः ॥

नैवेद्यैस्तर्पणैश्चैव ताम्बूलैर्दक्षिणादिभिः ।

तोषयेन्मां त्वत्कृतेन नाम्नां साहस्रकेण च ॥

कवचेन च सूक्तेनाहं रुद्रेभिरिति प्रभो ।

देव्यथर्वशिरोमन्त्रैर्हृल्लेखोपनिषद्धवैः ॥

महाविद्यामहामन्त्रैस्तोषयेन्मां मुहुर्मुहुः । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४० । पादमूलमें अवस्थित हैं । ये महाप्रेत पृथ्वी, जल, तेज, ॥ १० वायु और आकाश - इन पाँच भूतों एवं जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय तथा अतीत- इन पाँच अवस्थाओं के । स्वरूप हैं । चिन्मय तथा अव्यक्त - रूपवाली मैं इन ॥ ११ । सबसे सर्वथा परे हूँ । शक्तितन्त्रोंमें ब्रह्मा आदिका । आसनरूपमें परिणत होना सर्वदा प्रसिद्ध है । इस प्रकार ध्यान करके मानसिक भोगसामग्रियोंसे मेरी ॥ १२ पूजा करे और मेरा जप भी करे ॥ ९ -१२ ॥ श्रीदेवीको जप अर्पण करके अर्घ्य - स्थापन ॥ १३ करना चाहिये । सर्वप्रथम पूजन -पात्रोंको सामने रखकर साधक अस्त्रमन्त्र ( ॐ फट् ) - का उच्चारण करके जलसे पूजाद्रव्योंको शुद्ध करे । पुनः इसी मन्त्रसे १४ दिग्बन्ध करके गुरुको प्रणाम करनेके अनन्तर उनकी आज्ञा लेकर साधक अपने हृदयमें भावित मेरी दिव्य मनोहर मूर्तिको बाह्य पीठपर आवाहित करे । इसके १५ बाद प्राणप्रतिष्ठामन्त्रद्वारा पीठपर उस मूर्तिकी प्राणप्रतिष्ठा करे ॥ १३ – १५३ ॥ १६ इस प्रकार आसन, आवाहन, अर्घ्य, पाद्य, आचमन, स्नान, दो वस्त्र, हर प्रकारके आभूषण, गन्ध, पुष्प आदि भगवतीको यथोचितरूपसे भक्तिपूर्वक १७ अर्पण करके यन्त्रमें लिखित आवरणदेवताओंकी विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिये । प्रतिदिन पूजा करनेमें असमर्थ लोगोंके लिये देवीकी पूजाहेतु शुक्रवारका १८ दिन निर्धारित है ॥ १६-१८ ॥ मूलदेवीके प्रभास्वरूप आवरणदेवताओंका ध्यान १ ९ करना चाहिये । उन देवीके प्रभामण्डलमें त्रिलोक व्याप्त है - ऐसा चिन्तन करना चाहिये । इसके बाद सुगन्धित गन्ध आदि द्रव्यों, सुन्दर वाससे युक्त पुष्पों, २० विभिन्न प्रकारके नैवेद्यों, तर्पणों, ताम्बूलों तथा दक्षिणा आदिसे आवरणदेवताओंसहित मुझ मूलदेवीकी पूजा करनी चाहिये । तत्पश्चात् हे राजन्! आपके द्वारा २१ रचित सहस्रनामके द्वारा मुझे प्रसन्न करना चाहिये; साथ ही देवीकवच, ' अहं रुद्रेभिः ' इत्यादि सूक्त, २२ हृल्लेखोपनिषद् - सम्बन्धी देव्यथर्वशीर्ष मन्त्रों और महाविद्याके प्रधान मन्त्रोंसे मुझे बार- बार प्रसन्न करना चाहिये ॥ १ ९ –२२३ ॥

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अ ० ४० ] क्षमापयेज्जगद्धात्रीं प्रेमार्द्रहृदयो नरः ॥

पुलकाङ्कितसर्वाङ्गैर्बाष्परुद्धाक्षिनिःस्वनः ।

नृत्यगीतादिघोषेण तोषयेन्मां मुहुर्मुहुः ॥

वेदपारायणैश्चैव पुराणैः सकलैरपि ।

प्रतिपाद्या यतोऽहं वै तस्मात्तैस्तोषयेत्तु माम् ॥

निजं सर्वस्वमपि मे सदेहं नित्यशोऽर्पयेत् । नित्यहोमं ततः कुर्याद् ब्राह्मणांश्च सुवासिनीः

वटुकान्यामरानन्यान्देवीबुद्धया तु भोजयेत् ।

नत्वा पुनः स्वहृदये व्युत्क्रमेण विसर्जयेत् ॥

सर्वं हृल्लेखया कुर्यात् पूजनं मम सुव्रत ।

हृल्लेखा सर्वमन्त्राणां नायिका परमा स्मृता ॥

हृल्लेखादर्पणे नित्यमहं तत्प्रतिबिम्बिता ।

तस्माद्धृल्लेखया दत्तं सर्वमन्त्रैः समर्पितम् ॥

गुरुं सम्पूज्य भूषाद्यैः कृतकृत्यत्वमावहेत् । य एवं पूजयेद्देवीं श्रीमद्भुवनसुन्दरीम्

न तस्य दुर्लभं किञ्चित्कदाचित्क्वचिदस्ति हि ।

देहान्ते तु मणिद्वीपं मम यात्येव सर्वथा ॥

ज्ञेयो देवीस्वरूपोऽसौ देवा नित्यं नमन्ति तम् इति ते कथितं राजन् महादेव्याः प्रपूजनम् विमृश्यैतदशेषेणाप्यधिकारानुरूपतः कुरु मे पूजनं तेन कृतार्थस्त्वं भविष्यसि इदं तु गीताशास्त्रं मे नाशिष्याय वदेत् क्वचित् नाभक्ताय प्रदातव्यं न धूर्ताय च दुर्हृदे सप्तम स्कन्ध २११ २३ तत्पश्चात् पुलकित समस्त अंगोंसे युक्त, अश्रुसे अवरुद्ध नेत्र तथा कण्ठवाला और प्रेमसे आर्द्र हृदयवाला वह साधक मुझ जगद्धात्रीके प्रति क्षमापराधके २४ लिये प्रार्थना करे; साथ ही नृत्य और गीत आदिकी ध्वनिसे मुझे बार - बार प्रसन्न करे । चूँकि मैं सभी वेदों तथा पुराणोंकी मुख्य प्रतिपाद्य विषय हूँ, अतः उनके २५ पाठ - पारायणोंसे मुझे प्रसन्न करना चाहिये । देहसहित अपना सब कुछ मुझे नित्य अर्पित कर देना चाहिये । तदनन्तर नित्य होम करे । ब्राह्मणों, सुवासिनी स्त्रियों, वटुकों तथा अन्य दीनलोगोंको देवीका रूप समझकर ॥ २६ उन्हें भोजन कराना चाहिये । पुनः नमस्कार करके अपने हृदयमें जिस क्रमसे आवाहन आदि किया हो, ठीक उसके विपरीत क्रमसे विसर्जन करना २७ चाहिये ॥ २३–२७ ॥ हे सुव्रत! मेरी सम्पूर्ण पूजा हृल्लेखा ( ह्रीं ) मन्त्र से सम्पन्न करनी चाहिये; क्योंकि यह हृल्लेखा २८ सभी मन्त्रोंकी परम नायिका कही गयी है । हृल्लेखारूपी दर्पणमें मैं निरन्तर प्रतिबिम्बित होती रहती हूँ; अतः हृल्लेखा मन्त्रोंके द्वारा मुझे अर्पित किया गया पदार्थ २ ९ सभी मन्त्रोंके द्वारा अर्पित किया गया समझा जाता है । भूषण आदि सामग्रियोंसे गुरुकी विधिवत् पूजा करके अपनेको कृतकृत्य समझना चाहिये ॥ २८-२९ ३ ॥ ॥ ३० जो मनुष्य इस प्रकार मुझ श्रीमद्भुवनसुन्दरी भगवतीकी पूजा करता है, उसके लिये कोई भी वस्तु किसी भी समयमें कहीं भी दुर्लभ नहीं ३१ रह सकती । देहावसान होनेपर वह निश्चित ही मेरे मणिद्वीपमें पहुँच जाता है । उसे देवीका ही । स्वरूप समझना चाहिये; देवता उसे नित्य प्रणाम करते हैं॥३०-३१३ ॥ ॥ ३२ हे राजन्! इस प्रकार मैंने आपसे महादेवीके पूजनके विषयमें बता दिया । आप इसपर भलीभाँति विचार करके अपने अधिकारके अनुरूप मेरा पूजन ॥ ३३ । कीजिये; उससे आप कृतार्थ हो जायँगे ॥३२-३३ ॥ जो सत् शिष्य नहीं है, उसे कभी भी मेरे इस । गीताशास्त्रको नहीं बताना चाहिये । साथ ही जो भक्त ॥ ३४ न हो, धूर्त हो तथा दुरात्मा हो, उसे भी इसका उपदेश