देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 21–30

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 21–30

पृष्ठ 21

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२०

क्षमापयसि चेन्मां त्वं कुरु मे वचनं नृप ।

देहि मे परिचर्यार्थं कन्यां कमललोचनाम् ॥

तुष्येऽनया महाराज पुत्र्या तव महामते । करिष्यामि तपश्चाहं सा मे सेवां करिष्यति एवं कृते सुखं मे स्यात्तव चैव भविष्यति । सन्तुष्टे मयि राजेन्द्र सैनिकानां न संशयः विचिन्त्य मनसा भूप कन्यादानं समाचर न चात्र दूषणं किञ्चित्तापसोऽहं यतव्रतः व्यास उवाच शर्यातिर्वचनं श्रुत्वा मुनेश्चिन्तातुरोऽभवत् न दास्येऽप्यथवा दास्ये किञ्चिन्नोवाच भारत कथमन्धाय वृद्धाय कुरूपाय सुतामिमाम् देवकन्योपमां दत्त्वा सुखी स्यामात्मसम्भवाम् को वात्मनः सुखार्थाय पुत्र्याः संसारजं सुखम् हरतेऽल्पमतिः पापो जानन्नपि शुभाशुभम् प्राप्य सा च्यवनं सुभ्रूः पञ्चबाणशरार्दिता । अन्धं वृद्धं पतिं प्राप्य कथं कालं नयिष्यति यौवने दुर्जयः कामो विशेषेण सुरूपया आत्मतुल्यं पतिं प्राप्य किमु वृद्धं विलोचनम् ॥ गौतमं तापसं प्राप्य रूपयौवनसंयुता अहल्या वासवेनाशु वञ्चिता वरवर्णिनी शप्ता च पतिना पश्चाज्ज्ञात्वा धर्मविपर्ययम् तस्माद्भवतु मे दुःखं न ददामि सुकन्यकाम् ॥ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३ हे राजन्! यदि आप क्षमा करनेके लिये मुझसे १ ९ कहते हैं तो मेरी एक बात मान लीजिये । मेरी सेवाके लिये कमलके समान नेत्रोंवाली अपनी कन्या मुझे सौंप दीजिये ॥ १ ९ ॥ हे महाराज! मैं आपकी इस कन्यापर प्रसन्न हूँ । ॥ २० हे महामते! मैं तपस्या करूँगा और वह मेरी सेवा करेगी ॥ २० ॥

हे राजन्! ऐसा करनेपर मुझे सुख मिलेगा और ॥ २१ आपका भी कल्याण होगा । मेरे प्रसन्न हो जानेपर आपके सैनिकोंको भी सुख प्राप्त होगा, इसमें सन्देह नहीं है ॥ २१ ॥

। भूप! मनमें यह विचार करके आप कन्यादान ॥ २२ कर दीजिये । इसमें आपको कुछ भी दोष नहीं लगेगा; क्योंकि मैं एक संयमशील तपस्वी हूँ ॥२२ ॥

व्यासजी बोले- हे भारत! मुनिकी बात सुनकर राजा शर्याति घोर चिन्तामें पड़ गये । ' दूँगा ' या ' नहीं । दूँगा ' – कुछ भी उन्होंने नहीं कहा ॥२३ ॥

॥ २३ वे सोचने लगे कि देवकन्याके तुल्य अपनी यह पुत्री इस अन्धे, कुरूप तथा बूढ़े मुनिको देकर मैं कैसे । सुखी रह सकता हूँ! ॥ २४ ॥

॥ २४ ऐसा अल्पबुद्धि तथा पापी कौन होगा, जो शुभ तथा अशुभका ज्ञान रखते हुए भी अपने सुखके लिये अपनी । ही कन्याके सांसारिक सुखको नष्ट कर देगा! ॥ २५ ॥

अन्धे तथा वृद्ध च्यवनमुनिको पतिरूपमें प्राप्त ॥ २५ करके सुन्दर भौंहोंवाली तथा कामबाणसे व्यथित वह कन्या उनके साथ किस प्रकार अपना जीवन व्यतीत करेगी!॥ २६ ॥

॥ २६ अपने अनुकूल पति पाकर भी यौवनावस्थामें [ किसी स्त्रीके द्वारा ] और वह भी विशेष रूपसे । रूपसम्पन्न स्त्रीके द्वारा कामको जीतना अत्यन्त २७ कठिन है तो फिर इस वृद्ध तथा नेत्रहीन पतिको पाकर उसकी क्या स्थिति होगी? ॥ २७ ॥

। तपस्वी गौतमऋषिको पतिरूपमें प्राप्त करके रूप तथा यौवनसे युक्त सुन्दरी अहल्या इन्द्रके द्वारा ॥ २८ शीघ्र ही ठग ली गयी थी और बादमें इसे धर्मविरुद्ध जानकर उसके पति गौतमने शाप दे दिया था । अतएव । मुझे कष्ट भले ही मिले, किंतु मैं मुनिको अपनी पुत्री २ ९ । सुकन्या नहीं दूँगा ॥ २८-२९ ॥

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अ ० ३ ] सप्तम

इति सञ्चिन्त्य शर्यातिर्विमनाः स्वगृहं ययौ ।

सचिवांश्च समादाय मन्त्रं चक्रे ऽतिदुःखितः ॥ ३०

भो मन्त्रिणो ब्रुवन्त्वद्य किं कर्तव्यं मयाधुना ।

पुत्री देयाथ विप्राय भोक्तव्यं दुःखमेव वा ॥ ३१

विचारयध्वं मिलिता हितं स्यान्मम वै कथम् । मन्त्रिण ऊचुः किं ब्रूमोऽस्मिन्महाराज सङ्कटेऽतिदुरासदे ॥ ३२ दुर्भगाय सुकन्यैषा कथं देयातिसुन्दरी । व्यास उवाच तदा चिन्ताकुलं वीक्ष्य पितरं मन्त्रिणस्तदा ॥ ३३

सुकन्या विङ्गितं ज्ञात्वा प्रहस्येदमुवाच ह ।

पितः कस्माद्भवानद्य चिन्ताव्याकुलितेन्द्रियः ॥ ३४

मत्कृते दुःखसंविग्नो विषण्णवदनोऽसि वै ।

अहं गत्वा मुनिं तत्र समाश्वास्य भयार्दितम् ॥ ३५

करिष्यामि प्रसन्नं तमात्मदानेन वै पितः ।

इति राजा वचः श्रुत्वा भाषितं यत्सुकन्यया ॥ ३६

तामुवाच प्रसन्नात्मा सचिवानां च शृण्वताम् ।

कथं पुत्रि त्वमन्धस्य परिचर्यां वनेऽबला ॥ ३७

करिष्यसि जरार्तस्य क्रोधनस्य विशेषतः ।

कथमन्धाय चानेन रूपेण रतिसन्निभाम् ॥ ३८

ददामि जरया ग्रस्तदेहाय सुखवाञ्छया ।

पित्रा पुत्री प्रदातव्या वयोज्ञातिबलाय च ॥ ३ ९

धनधान्यसमृद्धाय नाधनाय कदाचन ।

क्व ते रूपं विशालाक्षि क्वासौ वृद्धो वनेचरः ॥ ४०

कथं देया मया पुत्री तस्मै नातिवराय च । स्कन्ध २१ ऐसा विचार करके राजा शर्याति सन्तप्त मनसे अपने घर चले गये और अत्यन्त विषादग्रस्त होकर उन्होंने मन्त्रियोंको बुलाकर उनसे मन्त्रणा की -हे मन्त्रियो! आपलोग बताइये कि मैं इस समय क्या करूँ? अपनी पुत्री मुनिको सौंप दूँ अथवा स्वयं दुःख भोगूँ? अब आपलोग मिलकर इसपर सम्यक् विचार कीजिये कि मेरा हित किस प्रकार होगा? ॥ ३०-३१३ ॥ मन्त्रिगण बोले - हे महाराज! इस विषम संकटकी स्थितिमें हम आपसे क्या कहें? यह अत्यन्त लावण्यमयी सुकन्या इस अभागेको देना कैसे उचित होगा? ॥ ३२३ ॥

व्यासजी बोले – [ हे राजन्! ] तब अपने पिता तथा मन्त्रियोंको चिन्तासे आकुल देखकर सुकन्या उनका अभिप्राय समझ गयी और मुसकराकर बोली- हे पिताजी! आज आप चिन्तासे व्याकुल इन्द्रियोंवाले किसलिये हैं? निश्चित ही आप मेरे लिये ही अत्यन्त दुःखार्त तथा म्लानमुख हैं । अतएव हे पिताजी! मैं अभी भयाक्रान्त मुनि च्यवनके पास जाकर और उन्हें आश्वस्त करके अपनेको अर्पितकर प्रसन्न करूँगी ॥ ३३–३५३ ॥ इस प्रकार सुकन्याने जो बात कही, उसे सुनकर प्रसन्न मनवाले राजा शर्यातिने सचिवोंके समक्ष उससे कहा- हे पुत्रि! तुम अबला हो, अतएव वृद्धतासे ग्रस्त उस अन्धे तथा विशेष रूपसे क्रोधी मुनिकी सेवा उस वनमें कैसे कर पाओगी? ॥३६-३७३ ॥ मैं इस प्रकारके रूपसे युक्त तथा रतिके तुल्य सुन्दरी कन्याको वार्धक्यसे ग्रस्त शरीरवाले अन्धे मुनिको अपने सुखके लिये भला कैसे दे दूँ? पिताको चाहिये कि वह अपनी पुत्री समान अवस्था, जाति तथा सामर्थ्यवाले और धन - धान्यसे सम्पन्न व्यक्तिको सौंपे, किंतु धनहीनको कभी भी नहीं सौंपे ॥ ३८-३९ ३ ॥ हे विशाल नयनोंवाली पुत्रि! कहाँ तो तुम ऐसी रूपवती और कहाँ वनमें रहनेवाला वह वृद्ध मुनि! ऐसी स्थितिमें मैं अपनी पुत्रीको उस अयोग्यको भला कैसे अर्पित करूँ? ॥ ४०३ ॥

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२२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३ उटजे नियतं वासो यस्य नित्यं मनोहरे कथमम्बुजपत्राक्षि कल्पनीयो मया तव मरणं मे वरं प्राप्तं सैनिकानां तथैव च न ते प्रदानमन्धाय रोचते पिकभाषिणि भवितव्यं भवत्येव धैर्यं नैव त्यजाम्यहम् सुस्थिरा भव सुश्रोणि न दास्येऽन्धाय कर्हिचित् राज्यं तिष्ठतु वा यातु देहोऽयं च तथैव मे न त्वां दास्याम्यहं तस्मै नेत्रहीनाय बालिके सुकन्या तं तदा प्राह श्रुत्वा तद्वचनं पितुः प्रसन्नवदनातीव स्नेहयुक्तमिदं वचः सुकन्योवाच न मे चिन्ता पितः कार्या देहि मां मुनयेऽधुना सुखं भवतु सर्वेषां लोकानां मत्कृतेन हि सेवयिष्यामि सन्तुष्टा पतिं परमपावनम् भक्त्या परमया चापि वृद्धं च विजने वने सतीधर्मपरा चाहं चरिष्यामि सुसम्मतम् न भोगेच्छास्ति मे तात स्वस्थं चित्तं ममानघ व्यास उवाच तच्छ्रुत्वा ' भाषितं तस्या मन्त्रिणो विस्मयं गताः राजा च परमप्रीतो जगाम मुनिसन्निधौ गत्वा प्रणम्य शिरसा तमुवाच तपोधनम् स्वामिन् गृहाण पुत्रीं मे सेवार्थं विधिवद्विभो इत्युक्त्वासौ ददौ पुत्रीं विवाहविधिना नृपः ॥ ४१ हे मनोहरे! हे कमलपत्रके समान नेत्रोंवाली! छोटी - सी पर्णकुटीमें जो सदा निवास करता है, ऐसे । वरके साथ तुम्हारे विवाहकी कल्पना भी मैं कैसे कर ॥ ४२ सकता हूँ! ॥४१३ ॥

मेरी तथा मेरे सैनिकोंकी मृत्यु हो जाय यह तो । मेरे लिये उत्तम है, किंतु हे पिकभाषिणि! तुम्हें एक अन्धेको सौंप देना मुझे अच्छा नहीं लग रहा है ॥ ४२३ ॥

॥ ४३ होनहार तो होकर ही रहता है, किंतु मैं अपने धैर्यका त्याग नहीं करूँगा और हे सुश्रोणि! तुम । निश्चिन्त रहो; मैं तुम्हें उस अन्धे मुनिको कभी भी ॥ ४४ नहीं सौंप सकता ॥ ४३३ ॥

हे पुत्र! मेरा राज्य और यहाँतक कि मेरा । शरीर भी रहे अथवा चला जाय, ॥ ४५ नेत्रहीन मुनिको तुम्हें किसी भी दूँगा ॥ ४४३ ॥

। तत्पश्चात् पिताका वह वचन प्रसन्न मुखवाली सुकन्याने उनसे यह कहा— ॥ ४५३ ॥

॥ ४६ सुकन्या बोली - हे पिताजी! किंतु मैं उस स्थितिमें नहीं सुनकर अत्यन्त स्नेहयुक्त वचन मेरे लिये आप चिन्ता न करें और अब मुझे मुनिको सौंप दीजिये; । क्योंकि मेरे लिये ऐसा कर देनेसे सम्पूर्ण प्रजाको सुख ॥ ४७ प्राप्त होगा । मैं हर प्रकारसे सन्तुष्ट होकर उस निर्जन वनमें अपने परम पवित्र वृद्ध पतिकी अगाध श्रद्धासे । सेवा करूँगी और शास्त्रसम्मत सती - धर्मका पूर्ण तत्परताके साथ पालन करूँगी । हे निष्पाप पिताजी! ॥ ४८ भोग - विलासमें मेरी अभिरुचि नहीं है । आप अपने चित्तमें स्थिरता रखिये ॥ ४६–४८३ ॥ । व्यासजी बोले - – उस सुकन्याकी बातें सुनकर सभी मन्त्री आश्चर्यमें पड़ गये और राजा भी परम ॥ ४ ९ प्रसन्न होकर मुनिके पास गये ॥ ४ ९ ३ ॥ वहाँ पहुँचकर उन तपोनिधिको सिर झुकाकर । प्रणाम करके राजाने कहा -- हे स्वामिन्! हे प्रभो! मेरी इस पुत्रीको आप अपनी सेवाके लिये विधिपूर्वक ॥ ५० स्वीकार कीजिये ॥ ५०३ ॥

ऐसा कहकर उन राजाने विधि - विधानसे । विवाह सम्पन्न करके अपनी पुत्री मुनिको सौंप दी ॥ ५१ और उस कन्याको ग्रहण करके च्यवनऋषि भी प्रसन्न

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अ ० ३ ]

प्रतिगृह्य मुनिः कन्यां प्रसन्नो भार्गवोऽभवत् ।

पारिबर्हं न जग्राह दीयमानं नृपेण ह ॥

कन्यामेवाग्रहीत्कामं परिचर्यार्थमात्मनः ।

प्रसन्नेऽस्मिन्मुनौ जातं सैनिकानां सुखं तदा ॥

राज्ञश्च परमाह्लादः सञ्जातस्तत्क्षणादपि ।

दत्त्वा पुत्रीं यदा राजा गमनाय गृहं प्रति ॥

मतिं चकार तन्वङ्गी तदोवाच नृपं सुता । सुकन्योवाच गृहाण मम वासांसि भूषणानि च मे पितः ॥

वल्कलं परिधानाय प्रयच्छाजिनमुत्तमम् ।

वेषं तु मुनिपत्नीनां कृत्वा तपसि सेवनम् ॥

करिष्यामि तथा तात यथा ते कीर्तिरच्युता ।

भविष्यति भुवः पृष्ठे तथा स्वर्गे रसातले ॥

परलोकसुखायाहं चरिष्यामि दिवानिशम् ।

दत्त्वान्धाय च वृद्धाय सुन्दरीं युवतीं तु माम् ॥

चिन्ता त्वया न कर्तव्या शीलनाशसमुद्भवा ।

अरुन्धती वसिष्ठस्य धर्मपत्नी यथा भुवि ॥

तथैवाहं भविष्यामि नात्र कार्या विचारणा । अनसूया यथा साध्वी भार्याः प्रथिता भुवि

तथैवाहं भविष्यामि पुत्री कीर्तिकरी तव ।

सुकन्यावचनं श्रुत्वा राजा परमधर्मवित् ॥

दत्त्वाजिनं रुरोदाशु वीक्ष्य तां चारुहासिनीम् ।

त्यक्त्वा भूषणवासांसि मुनिवेषधरां सुताम् ॥

विवर्णवदनो भूत्वा स्थितस्तत्रैव पार्थिवः । राज्ञ्यः सर्वाः सुतां दृष्ट्वा वल्कलाजिनधारिणीम् रुरुदुर्भृशशोकार्ता वेपमाना इवाभवन् । सप्तम स्कन्ध २३ हो गये । मुनिने राजा द्वारा प्रदत्त उपहार ग्रहण नहीं ५२ किया । अपनी सेवाके लिये उन्होंने केवल राजकुमारीको ही स्वीकार किया ॥ ५१-५२३ ॥ उन मुनिके प्रसन्न हो जानेपर सैनिकोंको सुख ५३ प्राप्त हो गया । उसी समयसे राजा भी परम आह्लादित रहने लगे ॥ ५३३ ॥

जब राजा शर्यातिने मुनिको पुत्री सौंपकर घर ५४ चलनेका विचार किया, तब कोमल अंगोंवाली राजकुमारी सुकन्या राजासे कहने लगी- ॥ ५४३ ॥

सुकन्या बोली - हे पिताजी! आप मेरे वस्त्र तथा आभूषण ले लीजिये और पहननेके लिये मुझे ५५ वल्कल एवं उत्तम मृगचर्म प्रदान कीजिये । मैं मुनिपत्नियोंका वेष बनाकर तपमें निरत रहती हुई पतिसेवा करूँगी; जिससे पृथ्वीतल, रसातल ५६ और स्वर्गलोकमें भी आपकी कीर्ति अक्षुण्ण रहेगी; परलोकके सुखके लिये मैं दिन - रात मुनिकी सेवा करती रहूँगी॥५५–५७३ ॥ ५७ सुन्दर तथा यौवनसम्पन्न अपनी पुत्री मुझ सुकन्याको एक अन्धे तथा वृद्ध मुनिको सौंपकर मेरे आचरणच्युत हो जानेकी शंका करके आप तनिक भी ५८ चिन्ता न कीजियेगा ॥ ५८३ ॥

जिस प्रकार पृथ्वीलोकमें वसिष्ठकी धर्मपत्नी अरुन्धती थी, उसी प्रकार मैं भी होऊँगी और ५ ९ जिस प्रकार अत्रिकी साध्वी भार्या अनसूया प्रसिद्ध हुईं, उसी प्रकार आपकी पुत्री मैं सुकन्या भी [ अपने पातिव्रत्यके प्रभावसे ] कीर्ति बढ़ानेवाली ॥ ६० होऊँगी; इसमें आपको सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ ५ ९ -६०३ ॥ सुकन्याकी बात सुनकर महान् धर्मज्ञ राजा ६१ शर्याति वस्त्रके रूपमें उसे मृगचर्म प्रदान करके रोने लगे । उस सुन्दर मुसकानवाली अपनी पुत्रीको शीघ्र ही आभूषण तथा वस्त्र त्यागकर मुनिवेष धारण ६२ किये देखकर राजा म्लानमुख होकर वहींपर ठहरे रहे ॥ ६१-६२३ ॥ अपनी पुत्रीको वल्कल तथा मृगचर्म धारण की ॥ ६३ हुई देखकर सभी रानियाँ भी रो पड़ीं । वे परम शोकाकुल हो उठीं और काँपने लगीं ॥ ६३३ ॥

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२४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४ तामापृच्छ्य महीपालो मन्त्रिभिः परिवारितः । [ व्यासजी बोले- ] हे राजन्! तत्पश्चात् अपनी उस समर्पित पुत्री सुकन्यासे विदा लेकर तथा उसे वहीं छोड़कर चिन्तित राजा मन्त्रियोंके साथ

art स्वनगरं राजन् मुक्त्वा पुत्रीं शुचार्पिताम् ॥ ६४ । अपने नगरको चले गये ॥६४ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे च्यवनसुकन्ययोर्गार्हस्थ्यवर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

अथ सुकन्याकी पतिसेवा तथा व्यास उवाच गते राजनि सा बाला पतिसेवापरायणा बभूव च तथाग्नीनां सेवने धर्मतत्परा फलान्यादाय स्वादूनि मूलानि विविधानि च ददौ सा मुनये बाला पतिसेवापरायणा पतिं तप्तोदकेनाशु स्नापयित्वा मृगत्वचा परिवेष्ट्य शुभायां तु बृस्यां स्थापितवत्यपि तिलान् यवकुशानग्रे परिकल्प्य कमण्डलुम् तमुवाच नित्यकर्म कुरुष्व मुनिसत्तम तमुत्थाप्य करे कृत्वा समाप्ते नित्यकर्मणि बृस्यां वा संस्तरे बाला भर्तारं संन्यवेशयत् पश्चादानीय पक्वानि फलानि च नृपात्मजा चतुर्थोऽध्यायः वनमें अश्विनीकुमारोंसे भेंटका वर्णन व्यासजी बोले - [ हे जनमेजय! ] राजा । शर्यातिके चले जानेपर सुकन्या अपने पति च्यवन-मुनिकी सेवामें संलग्न हो गयी । धर्मपरायण वह ॥ १ उस आश्रममें अग्नियोंकी सेवामें सदा निरत रहने लगी ॥ १ ॥

। सर्वदा पतिसेवामें संलग्न रहनेवाली वह बाला ॥ २ विविध प्रकारके स्वादिष्ट फल तथा कन्द - मूल लाकर मुनिको अर्पण करती थी ॥ २ ॥

। वह [ शीतकालमें ] ऊष्ण जलसे उन्हें शीघ्रता-॥ ३ पूर्वक स्नान करानेके पश्चात् मृगचर्म पहनाकर पवित्र आसनपर विराजमान कर देती थी । पुन: उनके । आगे तिल, जौ, कुशा और कमण्डलु रखकर उनसे कहती थी - मुनिश्रेष्ठ! अब आप अपना नित्यकर्म ॥ ४ करें ॥ ३-४ ॥ मुनिका नित्यकर्म समाप्त हो जानेपर वह सुकन्या । पतिका हाथ पकड़कर उठाती और पुनः किसी आसन ॥ ५ अथवा कोमल शय्यापर उन्हें बिठा देती थी ॥ ५ ॥

तत्पश्चात् वह राजकुमारी पके हुए फल तथा । भली - भाँति सिद्ध किये गये नीवारान्न ( धान्यविशेष ) भोजयामास च्यवनं नीवारान्नं सुसंस्कृतम् ॥ ६ च्यवन - मुनिको भोजन कराती थी ॥ ६ ॥

भुक्तवन्तं पतिं तृप्तं दत्त्वाचमनमादरात् पश्चाच्च पूगं पत्राणि ददौ चादरसंयुता गृहीतमुखवासं तं संवेश्य च शुभासने गृहीत्वाज्ञां शरीरस्य चकार साधनं ततः वह सुकन्या भोजन करके तृप्त हुए पतिको आदरपूर्वक आचमन करानेके पश्चात् बड़े प्रेमके साथ

उन्हें ताम्बूल तथा पूगीफल प्रदान करती थी ॥ ७ ॥

॥ ७ च्यवनमुनिके मुखशुद्धि कर लेनेपर सुकन्या उन्हें सुन्दर आसनपर बिठा देती थी । तत्पश्चात् उनसे । आज्ञा लेकर वह अपने शरीर - सम्बन्धी कृत्य सम्पन्न ॥ ८ करती थी ॥ ८ ॥

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अ ० ४ ] सप्तम स्कन्ध २५

फलाहारं स्वयं कृत्वा पुनर्गत्वा च सन्निधौ ।

प्रोवाच प्रणयोपेता किमाज्ञापयसे प्रभो ॥

पादसंवाहनं तेऽद्य करोमि यदि मन्यसे ।

एवं सेवापरा नित्यं बभूव पतितत्परा ॥

सायं होमावसाने सा फलान्याहृत्य सुन्दरी ।

अर्पयामास मुनये स्वादूनि च मृदूनि च ॥

ततः शेषाणि बुभुजे प्रेमयुक्ता तदाज्ञया ।

सुस्पर्शास्तरणं कृत्वा शाययामास तं मुदा ॥

सुप्ते सुखं प्रिये कान्ता पादसंवाहनं तदा ।

चकार पृच्छती धर्मं कुलस्त्रीणां कृशोदरी ॥

पादसंवाहनं कृत्वा निशि भक्तिपरायणा ।

निद्रितं च मुनिं ज्ञात्वा सुष्वाप चरणान्तिके ॥

शुचौ प्रतिष्ठितं वीक्ष्य तालवृन्तेन भामिनी ।

कुर्वाणा शीतलं वायुं सिषेवे स्वपतिं तदा ॥

हेमन्ते काष्ठसम्भारं कृत्वाग्निज्वलनं पुरः ।

स्थापयित्वा तथापृच्छत्सुखं तेऽस्तीति चासकृत् ॥

ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय जलं पात्रं च मृत्तिकाम् ।

समर्पयित्वा शौचार्थं समुत्थाप्य पतिं प्रिया ॥

स्थानाद्दूरे च संस्थाप्य दूरं गत्वा स्थिराभवत् ।

कृतशौचं पतिं ज्ञात्वा गत्वा जग्राह तं पुनः ॥

आनीयाश्रममव्यग्रा चोपवेश्यासने शुभे ।

मृज्जलाभ्यां च प्रक्षाल्य पादावस्य यथाविधि ॥

दत्त्वाचमनपात्रं तु दन्तधावनमाहरत् ।

समर्प्य दन्तकाष्ठं च यथोक्तं नृपनन्दिनी ॥

चकारोष्णं जलं शुद्धं समानीतं सुपावनम् ।

स्नानार्थं जलमाहृत्य पप्रच्छ प्रणयान्विता ॥

तत्पश्चात् स्वयं फलाहार करके वह पुनः ९ मुनिके पास जाकर नम्रतापूर्वक उनसे कहती थी— ' हे प्रभो! मुझे क्या आज्ञा दे रहे हैं? यदि आपकी सम्मति हो तो मैं अब आपके चरण दबाऊँ । ' इस प्रकार १० पतिपरायणा वह सुकन्या उनकी सेवामें सदा संलग्न रहती थी ॥ ९ -१० ॥ सायंकालीन हवन समाप्त हो जानेपर वह ११ सुन्दरी स्वादिष्ट तथा मधुर फल लाकर मुनिको अर्पित करती थी । पुनः उनकी आज्ञासे भोजनसे बचे हुए आहारको बड़े प्रेमके साथ स्वयं ग्रहण करती थी । १२ इसके बाद अत्यन्त कोमल तथा सुन्दर आसन बिछाकर उन्हें प्रेमपूर्वक उसपर लिटा देती थी ॥ ११ - १२ ॥ अपने प्रिय पतिके सुखपूर्वक शयन करनेपर वह १३ सुन्दरी उनके पैर दबाने लगती थी । उस समय क्षीण कटि प्रदेशवाली वह सुकन्या कुलीन स्त्रियोंके धर्म विषयमें उनसे पूछा करती थी ॥१३ ॥

१४ चरण दबा करके रातमें वह भक्तिपरायणा सुकन्या जब यह जान जाती थी कि च्यवनमुनि सो गये हैं, तब वह भी उनके चरणोंके पास ही सो जाती थी ॥ १४ ॥

१५ ग्रीष्मकालमें अपने पति च्यवनमुनिको बैठा देखकर वह सुन्दरी सुकन्या ताड़के पंखेसे शीतल १६ वायु करती हुई उनकी सेवामें तत्पर रहती थी । शीतकालमें सूखी लकड़ियाँ एकत्रकर उनके सम्मुख प्रज्वलित अग्नि रख करके वह उनसे बार- बार पूछा १७ करती थी कि आप सुखपूर्वक तो हैं? ॥ १५-१६ ॥ ब्राह्ममुहूर्त में उठकर वह सुकन्या जल, पात्र तथा मिट्टी पतिके पास रखकर उन्हें शौचके लिये उठाती १८ थी । इसके बाद उन्हें आश्रमसे कुछ दूर ले जाकर बैठा देनेके बाद वहाँसे स्वयं कुछ दूर हटकर बैठी रहती थी । ' मेरे पतिदेव शौच कर चुके होंगे ' – ऐसा १ ९ जानकर वह उनके पास जा करके उन्हें उठाती थी और आश्रममें ले आकर अत्यन्त सावधानीपूर्वक एक सुन्दर आसनपर बिठा देती थी । तत्पश्चात् मिट्टी और २० जलसे विधिवत् उनके दोनों चरण धोकर फिर आचमनपात्र दे करके दन्तधावन ( दातौन ) ले आती थी । शास्त्रोक्त दातौन मुनिको देनेके बाद वह राजकुमारी २१ | मुनिके स्नानके लिये लाये गये शुद्ध तथा परम पवित्र

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२६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४

किमाज्ञापयसे ब्रह्मन् कृतं वै दन्तधावनम् ।

उष्णोदकं सुसम्पन्नं कुरु स्नानं समन्त्रकम् ॥

वर्तते होमकालोऽयं सन्ध्या पूर्वा प्रवर्तते ।

विधिवद्भवनं कृत्वा देवतापूजनं कुरु ॥

एवं कन्या पतिं लब्ध्वा तपस्विनमनिन्दिता ।

नित्यं पर्यचरत्प्रीत्या तपसा नियमेन च ॥

अग्नीनामतिथीनां च शुश्रूषां कुर्वती सदा । आराधयामास मुदा च्यवनं सा शुभानना । कस्मिंश्चिदथ काले तु रविजावश्विनावुभौ । च्यवनस्याश्रमाभ्याशे क्रीडमानौ समागतौ जले स्नात्वा तु तां कन्यां निवृत्तां स्वाश्रमं प्रति । गच्छन्तीं चारुसर्वाङ्गीं रविपुत्रावपश्यताम् तां दृष्ट्वा देवकन्याभां गत्वा चान्तिकमादरात् । ऊचतुः समभिद्रुत्य नासत्यावतिमोहितौ क्षणं तिष्ठ वरारोहे प्रष्टुं त्वां गजगामिनि आवां देवसुतौ प्राप्तौ ब्रूहि सत्यं शुचिस्मिते पुत्री कस्य पतिः कस्ते कथमुद्यानमागता एकाकिनी तडागेऽस्मिन् स्नानार्थं चारुलोचने द्वितीया श्रीरिवाभासि कान्त्या कमललोचने इच्छामस्तु वयं ज्ञातुं तत्त्वमाख्याहि शोभने कोमलौं चरणौ कान्ते स्थितौ भूमावनावृतौ हृदयं कुरुतः पीडां चलन्तौ चललोचने विमानाहांसि तन्वङ्गि कथं पद्भ्यां व्रजस्यदः अनावृनात्र विपिनं किमर्थं गमनं तव जलको गरम करने लगती थी । तत्पश्चात् उस जलको २२ ले आकर प्रेमपूर्वक उनसे पूछती थी — ‘ हे ब्रह्मन्! आप क्या आज्ञा दे रहे हैं? आपने दन्तधावन तो कर लिया? उष्ण जल तैयार है, अतः अब आप मन्त्रोच्चारपूर्वक स्नान कर लीजिये | हवन और प्रातः कालीन संध्याका २३ समय उपस्थित है; आप विधिपूर्वक अग्निहोत्र करके देवताओंका पूजन कीजिये ' ॥ १७–२३ ॥ इस प्रकार वह श्रेष्ठ सुकन्या तपस्वी पति २४ प्राप्तकर तप तथा नियमके साथ प्रेमपूर्वक प्रतिदिन उनकी सेवा करती रहती थी ॥ २४ ॥

सुन्दर मुखवाली वह सुकन्या अग्नि तथा २५ अतिथियोंकी सेवा करती हुई प्रसन्नतापूर्वक सदा च्यवनमुनिकी सेवामें तल्लीन रहती थी ॥ २५ ॥

किसी समय सूर्यके पुत्र दोनों अश्विनीकुमार क्रीड़ा ॥ २६ करते हुए च्यवनमुनिके आश्रमके पास आ पहुँचे ॥ २६ ॥

उन अश्विनीकुमारोंने जलमें स्नान करके निवृत्त हुई तथा अपने आश्रमकी ओर जाती हुई उस ॥ २७ सर्वांगसुन्दरी सुकन्याको देख लिया ॥ २७ ॥

देवकन्याके समान कान्तिवाली उस सुकन्याको देखकर दोनों अश्विनीकुमार अत्यधिक मुग्ध हो गये ॥ २८ और शीघ्र ही उसके पास पहुँचकर आदरपूर्वक कहने लगे- ॥ २८ ॥

। हे वरारोहे! थोड़ी देर ठहरो । हे गजगामिनि! हम ॥ २ ९ दोनों सूर्यदेवके पुत्र अश्विनीकुमार तुमसे कुछ पूछनेके लिये यहाँ आये हैं । हे शुचिस्मिते! सच - सच बताओ । कि तुम किसकी पुत्री हो, तुम्हारे पति कौन हैं? हे चारुलोचने! इस सरोवरमें स्नान करनेके लिये तुम ॥ ३० अकेली ही उद्यानमें क्यों आयी हुई हो? ॥ २ ९ -३० ॥ । हे कमललोचने! तुम तो सौन्दर्यमें दूसरी लक्ष्मीकी भाँति प्रतीत हो रही हो । हे शोभने! हम यह रहस्य ॥ ३१ जानना चाहते हैं, तुम बताओ ॥ ३१ ॥

हे कान्ते! हे चंचल नयनोंवाली! जब तुम्हारे । ये कोमल तथा नग्न चरण कठोर भूमिपर पड़ते हैं तथा ॥ ३२ आगेकी ओर बढ़ते हैं, तब ये हमारे हृदयमें व्यथा उत्पन्न करते हैं । हे तन्वंगि! तुम विमानपर चलनेयोग्य हो; तब । तुम नंगे पाँव पैदल ही क्यों चल रही हो? इस वनमें ॥ ३३ तुम्हारा भ्रमण क्यों हो रहा है? ॥ ३२-३३ ॥

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अ ० ४ ]

दासीशतसमायुक्ता कथं न त्वं विनिर्गता ।

राजपुत्र्यप्सरा वासि वद सत्यं वरानने ॥

धन्या माता यतो जाता धन्योऽसौ जनकस्तव । वक्तुं त्वां नैव शक्तौ च भर्तुर्भाग्यं तवानघे ।

देवलोकाधिका भूमिरियं चैव सुलोचने ।

प्रचलंश्चरणस्तेऽद्य सम्पावयति भूतलम् ॥

सौभाग्याश्च मृगाः कामं ये त्वां पश्यन्ति वै वने ।

ये चान्ये पक्षिणः सर्वे भूरियं चातिपावना ॥

स्तुत्यालं तव चात्यर्थं सत्यं ब्रूहि सुलोचने ।

पिता कस्ते पतिः क्वासौ द्रष्टुमिच्छास्ति सादरम् ॥

व्यास उवाच

तयोरिति वचः श्रुत्वा राजकन्यातिसुन्दरी ।

तावुवाच त्रपाक्रान्ता देवपुत्री नृपात्मजा ॥

शर्यातितनयां मां वां वित्तं भार्यां मुनेरिह ।

च्यवनस्य सतीं कान्तां पित्रा दत्तां यदृच्छया ॥

पतिरन्धोऽस्ति मे देवौ वृद्धश्चातीव तापसः ।

तस्य सेवामहोरात्रं करोमि प्रीतिमानसा ॥

कौ युवां किमिहायातौ पतिस्तिष्ठति चाश्रमे ।

तत्रागत्य प्रकुरुतमाश्रमं चाद्य पावनम् ॥

तदाकर्ण्य वचो दस्त्रावूचतुस्तां नराधिप ।

कथं त्वमपि कल्याणि पित्रा दत्ता तपस्विने ॥

भ्राजसेऽस्मिन्वनोद्देशे विद्युत्सौदामिनी यथा ।

न देवेष्वपि तुल्या हि तव दृष्टास्ति भामिनि ॥

सप्तम स्कन्ध २७ तुम सैकड़ों दासियोंको साथ लेकर घरसे क्यों ३४ नहीं निकली? हे वरानने! तुम राजपुत्री हो अथवा अप्सरा हो, यह सच सच बता दो ॥ ३४ ॥

तुम्हारी माता धन्य हैं, जिनसे तुम उत्पन्न हुई हो । तुम्हारे वे पिता भी धन्य हैं । हे अनघे! तुम्हारे ३५ पतिके भाग्यके विषयमें तो हम तुमसे कह ही नहीं सकते ॥ ३५ ॥

हे सुलोचने! यहाँकी भूमि देवलोक से भी ३६ बढ़कर है । पृथ्वीतलपर पड़ता हुआ तुम्हारा चरण इसे पवित्र बना रहा है ॥ ३६ ॥

इस वनमें रहनेवाले सभी मृग तथा दूसरे पक्षी ३७ जो तुम्हें देख रहे हैं, वे परम भाग्यशाली हैं । यह भूमि भी परम पवित्र हो गयी है ॥ ३७ ॥

सुलोचने! तुम्हारी अधिक प्रशंसा क्या करें? अब तुम सत्य बता दो कि तुम्हारे पिता कौन हैं और ३८ तुम्हारे पतिदेव कहाँ रहते हैं? उन्हें आदरपूर्वक देखनेकी हमारी इच्छा है ॥ ३८ ॥

व्यासजी बोले- अश्विनीकुमारोंकी यह बात सुनकर परम सुन्दरी राजकुमारी सुकन्या अत्यन्त ३ ९ लज्जित हो गयी । देवकन्याके सदृश वह राजपुत्री उनसे कहने लगी- ॥ ३ ९ ॥ आपलोग मुझे राजा शर्यातिकी पुत्री तथा च्यवन-मुनिकी भार्या समझें । मैं एक पतिव्रता स्त्री हूँ । मेरे ४० पिताजीने स्वेच्छासे मुझे इन्हें सौंप दिया है ॥ ४० ॥

हे देवताओ! मेरे पतिदेव वृद्ध तथा नेत्रहीन हैं । वे परम तपस्वी हैं । मैं प्रसन्न मनसे दिन - रात उनकी ४१ सेवा करती रहती हूँ ॥४१ ॥

आप दोनों कौन हैं और यहाँ क्यों पधारे हुए

हैं? मेरे पतिदेव इस समय आश्रममें विराजमान हैं ।

४२ आपलोग वहाँ चलकर आश्रमको पवित्र कीजिये ॥ ४२ ॥

हे राजन्! अश्विनीकुमारोंने सुकन्याकी बात सुनकर उससे कहा - हे कल्याणि! तुम्हारे पिताने तुम्हें उन तपस्वीको कैसे सौंप दिया? ॥ ४३ ॥

४३ तुम तो बादलमें चमकनेवाली विद्युत्की भाँति इस वन - प्रदेशमें सुशोभित हो रही हो । हे भामिनि! तुम्हारे सदृश स्त्री तो देवताओंके यहाँ भी नहीं देखी ४४ | गयी है ॥ ४४ ॥

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२८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४

त्वं दिव्याम्बरयोग्यासि शोभसे नाजिनैर्वृता ।

सर्वाभरणसंयुक्ता नीलालकवरूथिनी ॥

अहो विधेर्दुष्कलितं विचेष्टितं यदत्र रम्भोरु वने विषीदसि । विशालनेत्रेऽन्धमिमं पतिं प्रिये मुनिं समासाद्य जरातुरं भृशम् ॥ वृथा वृतस्तेन भृशं न शोभसे नवं वयः प्राप्य सुनृत्यपण्डिते । मनोभवेनाशु शराः सुसन्धिताः पतन्ति कस्मिन्पतिरीदृशस्तव ॥ त्वमन्धभार्या नवयौवनान्विता कृतासि धात्रा ननु मन्दबुद्धिना । न चैनमर्हस्यसितायते क्षणे पतिं त्वमन्यं कुरु चारुलोचने ॥ वृथैव जीवितमम्बुजेक्षणे

पतिं च सम्प्राप्य मुनिं गतेक्षणम् ।

वने निवासं च तथाजिनाम्बर-प्रधारणं योग्यतरं न मन्महे ॥

अतोऽनवद्याङ्ग्युभयोस्त्वमेकं वरं कुरुष्वावहिता सुलोचने । किं यौवनं मानिनि सङ्करोषि वृथा मुनिं सुन्दरि सेवमाना ॥ किं सेव भाग्यविवर्जितं तं समुज्झितं पोषणरक्षणाभ्याम् । त्यक्त्वा मुनिं सर्वसुखापवर्जितं भजानवद्याङ्ग्युभयोस्त्वमेकम् ॥ त्वं नन्दने चैत्ररथे वने च कुरुष्व कान्ते प्रथितं विहारम् । अन्धेन वृद्धेन कथं हि कालं विनेष्यसे मानिनि मानहीनम् ॥ काले केशपाशवाली तुम दिव्य वस्त्र तथा सर्वविध ४५ आभूषण धारण करनेके योग्य हो । इन वल्कल वस्त्रोंको धारण करके तुम शोभा नहीं पा रही हो ॥ ४५ ॥

हे रम्भोरु! हे विशालनेत्रे! हे प्रिये! विधाताने यह कैसा मूर्खतापूर्ण कृत्य किया है, जो कि तुम वार्धक्यसे पीड़ित इस नेत्रहीन मुनिको पतिरूपमें प्राप्त ४६ करके इस वनमें महान् कष्ट भोग रही हो! ॥ ४६ ॥

हे नृत्यविशारदे! तुमने इन्हें व्यर्थ ही वरण किया । नवीन अवस्था प्राप्त करके तुम उनके साथ शोभा नहीं पा रही हो । भलीभाँति लक्ष्य साध करके कामदेवके द्वारा वेगपूर्वक छोड़े गये बाण किसपर ४७ गिरेंगे; तुम्हारे पति तो इस प्रकारके [ असमर्थ ] हैं ॥ ४७ ॥

विधाता निश्चय ही मन्द बुद्धिवाले हैं, जो उन्होंने नवयौवनसे सम्पन्न तुम्हें नेत्रहीनकी पत्नी बना दिया । हे विशाललोचने! तुम इनके योग्य नहीं हो । ४८ अतः हे चारुलोचने! तुम किसी दूसरेको अपना पति बना लो ॥ ४८ ॥

हे कमललोचने! ऐसे नेत्रहीन मुनिको पतिरूपमें पाकर तुम्हारा जीवन व्यर्थ हो गया है । हमलोग इस तरहसे वनमें तुम्हारे निवास करने तथा वल्कलवस्त्र ४ ९ धारण करनेको उचित नहीं मानते हैं ॥ ४ ९ ॥ अतः हे प्रशस्त अंगोंवाली! तुम सम्यक् विचार करके हम दोनोंमेंसे किसी एकको अपना पति बना लो । हे सुलोचने! हे मानिनि! हे सुन्दरि! तुम इस [ अन्धे तथा बूढ़े ] मुनिकी सेवा करती हुई अपने ५० यौवनको व्यर्थ क्यों कर रही हो? ॥५० ॥

भाग्यसे हीन तथा पोषण - भरण और रक्षाके सामर्थ्यसे रहित उस मुनिकी सेवा तुम क्यों कर रही हो? हे निर्दोष अंगोंवाली! सभी प्रकारके सुखोपभोगोंसे वंचित इस मुनिको छोड़कर तुम हम दोनोंमेंसे किसी ५१ एकको स्वीकार कर लो ॥५१ ॥

हे कान्ते! हमें वरण करके तुम इन्द्रके नन्दनवनमें तथा कुबेरके चैत्ररथवनमें स्वेच्छापूर्वक विहार करो । हे मानिनि! तुम इस अन्धे तथा वृद्धके साथ अपमानित होकर अपना जीवन कैसे ५२ | बिताओगी? ॥ ५२ ॥

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अ ० ५ ] सप्तम स्कन्ध २ ९ भूपात्मजा त्वं शुभलक्षणा च जानासि संसारविहारभावम् । भाग्येन हीना विजने वनेऽत्र कालं कथं वाहयसे वृथा च ॥५३ तस्माद्भजस्व पिकभाषिणि चारुवक्त्रे एवं द्वयोस्तव सुखाय विशालनेत्रे । देवालयेषु च कृशोदर भुङ्क्ष्व भोगां-स्त्यक्त्वा मुनिं जरठमाशु नृपेन्द्रपुत्रि ॥ ५४ किं ते सुखं चात्र वने सुकेशि वृद्धेन सार्धं विजने मृगाक्षि । सेवा तथान्धस्य नवं वयश्च किं ते मतं भूपतिपुत्रि दुःखम् ॥ ५५ शशिमुखि त्वमतीव फलजलाहरणं तव नोचितम् ॥ ५६ । तुम समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न एक राजकुमारी हो तथा सांसारिक हाव - भावोंको भलीभाँति जानती हो । अतः तुम भाग्यहीन स्त्रीकी भाँति इस निर्जन वनमें अपना समय व्यर्थ क्यों बिता रही हो? ॥ ५३ ॥

अतः हे पिकभाषिणि! हे सुमुखि! हे विशालनेत्रे! तुम अपने सुखके लिये हम दोनोंमेंसे किसी एकको स्वीकार कर लो । कृश कटि प्रदेशवाली हे राजकुमारी! तुम इस वृद्ध मुनिको शीघ्र छोड़कर हमारे साथ देवभवनोंमें चलकर नानाविध सुखोंका भोग करो ॥५४ ॥

हे सुन्दर केशोंवाली! हे मृगनयनी! इस निर्जन वनमें एक वृद्धके साथ रहते हुए तुम्हें कौन -सा - स सुख है? एक तो तुम्हारी यह नयी युवावस्था और उसपर भी एक अन्धेकी सेवा तुम्हें करनी पड़ रही है । हे राजकुमारी! क्या दुःख भोगना ही तुम्हारा अभीष्ट है? ॥ ५५ ॥

हे चन्द्रमुखी! तुम अत्यन्त कोमल हो, अतः [ वनसे ] तुम्हारा इस प्रकार फल तथा जल ले आना कदापि उचित नहीं है ॥ ५६ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे अश्विनीकुमारयोः सुकन्यां प्रति बोधवचनवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

अथ पञ्चमोऽध्यायः अश्विनीकुमारोंका च्यवनमुनिको नेत्र तथा नवयौवनसे सम्पन्न बनाना व्यास उवाच

तयोस्तद्भाषितं श्रुत्वा वेपमाना नृपात्मजा ।

धैर्यमालम्ब्य तौ तत्र बभाषे मितभाषिणी ॥

देवौ वां रविपुत्रौ च सर्वज्ञौ सुरसम्मतौ ।

सतीं मां धर्मशीलां च नैवं वदितुमर्हथः ॥

पित्रा दत्ता सुरश्रेष्ठौ मुनये योगधर्मिणे ।

कथं गच्छामि तं मार्गं पुंश्चलीगणसेवितम् ॥

व्यासजी बोले- उन अश्विनीकुमारों की वह बात सुनकर मितभाषिणी राजपुत्री सुकन्या थर - थर काँपने लगी और धैर्य धारण करके उनसे १ बोली ॥ १ ॥

हे देवताओ! आप दोनों सूर्यपुत्र हैं । आपलोग सर्वज्ञ तथा देवताओंमें सम्मान्य हैं । मुझ पतिव्रता तथा धर्मपरायणा स्त्रीके प्रति आपको ऐसी बात नहीं २ कहनी चाहिये ॥२ ॥

हे सुरश्रेष्ठो! मेरे पिताजीने मुझे इन्हीं योग-परायण मुनिको सौंप दिया है, तब मैं व्यभिचारिणी स्त्रियोंके द्वारा सेवित उस मार्गका अनुसरण कैसे ३ | करूँ? ॥३ ॥