देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 31–40
देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 31–40
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३० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ०५
द्रष्टायं सर्वलोकस्य कर्मसाक्षी दिवाकरः ।
कश्यपाच्चैव सम्भूतो नैवं भाषितुमर्हथः ॥
कुलकन्या पतिं त्यक्त्वा कथमन्यं भजेन्नरम् ।
असारेऽस्मिन्हि संसारे जानन्तौ धर्मनिर्णयम् ॥
यथेच्छं गच्छतं देवौ शापं दास्यामि वानघौ ।
सुकन्याहं च शर्यातेः पतिभक्तिपरायणा ॥
व्यास उवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तस्या नासत्यौ विस्मितौ भृशम् ।
तावब्रूतां पुनस्त्वेनां शङ्कमानौ भयं मुनेः ॥
राजपुत्रि प्रसन्नौ ते धर्मेण वरवर्णिनि ।
वरं वरय सुश्रोणि दास्यावः श्रेयसे तव ॥
जानीहि प्रमदे नूनमावां देवभिषग्वरौ ।
युवानं रूपसम्पन्नं प्रकुर्यावः पतिं तव ॥
ततस्त्रयाणामस्माकं पतिमेकतमं वृणु ।
समानरूपदेहानां मध्ये चातुर्यपण्डिते ॥
सा तयोर्वचनं श्रुत्वा विस्मिता स्वपतिं तदा ।
गत्वोवाच तयोर्वाक्यं ताभ्यामुक्तं यदद्भुतम् ॥
सुकन्योवाच
स्वामिन् सूर्यसुतौ देवौ सम्प्राप्तौ च्यवनाश्रमे ।
दृष्टौ मया दिव्यदेहौ नासत्यौ भृगुनन्दन ॥
वीक्ष्य मां चारुसर्वाङ्गीं जातौ कामातुरावुभौ ।
कथितं वचनं स्वामिन् पतिं ते नवयौवनम् ॥
दिव्यदेहं करिष्यावश्चक्षुष्मन्तं मुनिं किल ।
एतेन समयेनाद्य तं शृणु त्वं मयोदितम् ॥
कश्यपसे उत्पन्न हुए भगवान् सूर्य समस्त ४ प्राणियोंके कर्मोंके साक्षी हैं । ये सब कुछ देखते रहते हैं । [ इन्हींके साक्षात् पुत्ररूप ] आपलोगोंको ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये ॥ ४ ॥
कोई भी कुलीन कन्या अपने पतिको छोड़कर किसी अन्य पुरुषको इस सारहीन जगत्में भला कैसे स्वीकार कर सकती है? धर्मसिद्धान्तोंको जाननेवाले आप दोनों अपनी इच्छाके अनुसार जहाँ चाहें चले ६ जाइये, अन्यथा हे निष्पाप देवताओ! मैं आपलोंगोको शाप दे दूँगी; पतिकी भक्तिमें तत्पर रहनेवाली मैं महाराज शर्यातिकी पुत्री सुकन्या हूँ ॥ ५-६ ॥ व्यासजी बोले - [ हे राजन्! ] सुकन्याकी यह ७ बात सुनकर अश्विनीकुमार बहुत विस्मयमें पड़ गये । उसके बाद मुनि च्यवनके भयसे सशंकित उन दोनोंने सुकन्यासे कहा – ॥७ ॥
८ सुन्दर अंगोंवाली हे राजपुत्रि! तुम्हारे इस पतिधर्मसे हम दोनों परम प्रसन्न हैं । हे सुश्रोणि! तुम वर माँगो, हम तुम्हारे कल्याणार्थ अवश्य देंगे ॥ ८ ॥
हे प्रमदे! तुम यह निश्चय जान लो कि ९ हम देवताओंके श्रेष्ठ वैद्य हैं । हम [ अपनी चिकित्सासे ] तुम्हारे पतिको रूपवान् तथा युवा बना देंगे । हे चातुर्यपण्डिते! जब हम ऐसा कर दें, तब तुम १० समानरूप और देहवाले हम तीनोंमेंसे किसी एकको पति चुन लेना ॥ ९ -१० ॥ तब उन दोनोंकी बात सुनकर सुकन्याको बड़ा ११ आश्चर्य हुआ । अपने पतिके पास जाकर वह सुकन्या अश्विनीकुमारोंके द्वारा कही गयी वह अद्भुत बात उनसे कहने लगी ॥ ११ ॥
सुकन्या बोली- हे स्वामिन्! आपके आश्रममें सूर्यपुत्र दोनों अश्विनीकुमार आये हुए हैं । १२ हे भृगुनन्दन! दिव्य देहवाले उन देवताओंको मैंने स्वयं देखा है ॥ १२ ॥
मुझ सर्वांगसुन्दरीको देखते ही वे दोनों कामासक्त १३ हो गये । हे स्वामिन्! उन्होंने मुझसे यह बात कही-' हमलोग तुम्हारे पति इन च्यवनमुनिको निश्चय ही नवयौवनसे सम्पन्न, दिव्य शरीरवाला तथा नेत्रोंसे युक्त १४ | बना देंगे, इसमें यह एक शर्त है, उसे तुम मुझसे सुन
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अ ० ५ ] समावयवरूपं च करिष्यावः पतिं तव तत्र त्रयाणामस्माकं पतिमेकतमं वृणु तच्छ्रुत्वाहमिहायाता प्रष्टुं त्वां कार्यमद्भुतम् किं कर्तव्यमतः साधो ब्रूह्यस्मिन्कार्यसङ्कटे देवमायापि दुर्ज्ञेया न जाने कपटं तयोः यदाज्ञापय सर्वज्ञ तत्करोमि तवेप्सितम् च्यवन उवाच गच्छ कान्तेऽद्य नासत्यौ वचनान्मम सुव्रते आनयस्व समीपं मे शीघ्रं देवभिषग्वरौ क्रियतामाशु तद्वाक्यं नात्र कार्या विचारणा व्यास उवाच एवं सा समनुज्ञाता तत्र गत्वा वचोऽब्रवीत् क्रियतामाशु नासत्यौ समयेन सुरोत्तमौ तच्छ्रुत्वा चाश्विनौ वाक्यं तस्यास्तौ तत्र चागतौ ऊचतू राजपुत्रीं तां पतिस्तव विशत्वपः रूपार्थं च्यवनस्तूर्णं ततोऽम्भः प्रविवेश ह अश्विनावपि पश्चात्तत्प्रविष्टौ सर उत्तमम् ततस्ते निःसृतास्तस्मात्सरसस्तत्क्षणात्त्रयः तुल्यरूपा दिव्यदेहा युवानः सदृशाः किल दिव्यकुण्डलभूषाढ्याः समानावयवास्तथा तेऽब्रुवन्सहिताः सर्वे वृणीष्व वरवर्णिनि अस्माकमीप्सितं भद्रे पतिं त्वममलानने यस्मिन्वाप्यधिका प्रीतिस्तं वृणुष्व वरानने सप्तम स्कन्ध ३१ । लो । जब हम तुम्हारे पतिको अपने समान अंग तथा ॥ १५ रूपवाला बना दें, तब तुम्हें हम तीनोंमेंसे किसी एकको पति चुन लेना होगा ' ॥ १३-१५ ॥ । उनकी यह बात सुनकर आपसे इस अद्भुत कार्यके विषयमें पूछनेके लिये मैं यहाँ आयी हूँ । हे ॥ १६ साधो! अब आप मुझे बतायें कि इस संकटमय कार्यके आ जानेपर मुझे क्या करना चाहिये? । देवताओंकी माया बड़ी दुर्बोध होती है । उन दोनोंके ॥ १७ इस छद्मको मैं नहीं समझ पा रही हूँ । अतः हे सर्वज्ञ! अब आप ही मुझे आदेश दीजिये, आपकी जो इच्छा होगी, मैं वही करूँगी ॥ १६-१७ ॥ । च्यवन बोले - हे कान्ते! हे सुव्रते! मेरी आज्ञाके अनुसार तुम देवताओंके श्रेष्ठ चिकित्सक ॥ १८ अश्विनी - कुमारोंके समीप ज्ओ और उन्हें मेरे पास शीघ्र ले आओ । तुम उनकी शर्त । लो, इसमें किसी प्रकारका सोच -चाहिये ॥ १८३ ॥
व्यासजी बोले- इस प्रकार ॥ १ ९ पा जानेपर वह अश्विनीकुमारोंके बोली- हे देवश्रेष्ठ अश्विनीकुमारो! । अनुसार शीघ्र ही कार्य करें ॥ १ ९ तुरंत स्वीकार कर विचार नहीं करना च्यवनमुनिकी आज्ञा पास जाकर उनसे आपलोग प्रतिज्ञाके ३ ॥ ॥ २० सुकन्याकी बात सुनकर वे अश्विनीकुमार वहाँ आये और राजकुमारीसे बोले - ' तुम्हारे पति इस । सरोवरमें प्रवेश करें । ' तब रूपप्राप्तिके लिये च्यवनमुनि ॥ २१ शीघ्रतापूर्वक सरोवरमें प्रविष्ट हो गये । उनके बादमें दोनों अश्विनीकुमारोंने भी उस उत्तम सरोवरमें प्रवेश किया ॥ २०- -२१३ ॥ । तदनन्तर वे तीनों तुरंत ही उस सरोवरसे बाहर ॥ २२ निकल आये । उन तीनोंका शरीर दिव्य था, वे समान रूपवाले थे और एकसमान युवा बन गये थे । शरीरके । सभी समान अंगोंवाले वे तीनों युवक दिव्य कुण्डलों ॥ २३ तथा आभूषणोंसे सुशोभित थे ॥ २२-२३ ॥ वे सभी एक साथ बोल उठे - ' हे वरवर्णिनि! । भद्रे! हे अमलानने! हम लोगोंमें जिसे तुम चाहती हो, उसका पतिरूपमें वरण कर लो । हे वरानने! ॥ २४ जिसमें तुम्हारी सबसे अधिक प्रीति हो, उसे पतिरूपमें । चुन लो ॥ २४३ ॥
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३२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ०५ व्यास उवाच सा दृष्ट्वा तुल्यरूपांस्तान्समानवयसस्तथा ॥
एकस्वरांस्तुल्यवेषांस्त्रीन्वै देवसुतोपमान् ।
सा तु संशयमापन्ना वीक्ष्य तान्सदृशाकृतीन् ॥
अजानन्ती पतिं सम्यग्व्याकुला समचिन्तयत् ।
किं करोमि त्रयस्तुल्याः कं वृणोमि न वेद्मयहम् ॥
पतिं देवसुता ह्येते संशये पतितास्म्यहम् ।
इन्द्रजालमिदं सम्यग्देवाभ्यामिह कल्पितम् ॥
कर्तव्यं किं मया चात्र मरणं समुपागतम् ।
न मया पतिमुत्सृज्य वरणीयः कथञ्चन ॥
देवस्त्वाधुनिकः कश्चिदित्येषा मम धारणा ।
इति सञ्चिन्त्य मनसा परां विश्वेश्वरीं शिवाम् ॥
दध्यौ भगवतीं देवीं तुष्टाव च कृशोदरी । सुकन्योवाच शरणं त्वां जगन्मातः प्राप्तास्मि भृशदुःखिता ॥
रक्ष मेऽद्य सतीधर्मं नमामि चरणौ तव ।
नमः पद्मोद्भवे देवि नमः शङ्करवल्लभे ॥
विष्णुप्रिये नमो लक्ष्मि वेदमातः सरस्वति ।
इदं जगत्त्वया सृष्टं सर्वं स्थावरजङ्गमम् ॥
पासि त्वमिदमव्यग्रा तथात्सि लोकशान्तये ।
ब्रह्मविष्णुमहेशानां जननी त्वं सुसम्मता ॥
बुद्धिदासि त्वमज्ञानां ज्ञानिनां मोक्षदा सदा । आज्ञा त्वं प्रकृतिः पूर्णा पुरुषप्रियदर्शना ।
भुक्तिमुक्तिप्रदासि त्वं प्राणिनां विशदात्मनाम् ।
अज्ञानां दुःखदा कामं सत्त्वानां सुखसाधना ॥
सिद्धिदा योगिनामम्ब जयदा कीर्तिदा पुनः । व्यासजी बोले – देवकुमारोंके समान प्रतीत २५ होनेवाले उन तीनोंको रूप, अवस्था, स्वर, वेषभूषा तथा आकृतिमें पूर्णतः एक जैसा देखकर वह सुकन्या बड़े असमंजसमें पड़ गयी ॥ २५-२६ ॥ २६ वह अपने पति [ च्यवनमुनि ] - को ठीक - ठीक पहचान नहीं पा रही थी, अतः व्याकुल होकर सोचने लगी - मैं क्या करूँ? ये तीनों देवकुमार एक जैसे हैं । २७ अतः मैं यह नहीं समझ पा रही हूँ कि इनमेंसे मैं पतिरूपमें किसका वरण करूँ? मैं तो बड़े संशयकी स्थितिमें पड़ गयी हूँ । दोनों देवताओं ( अश्विनीकुमारों ) - ने यह विचित्र २८ इन्द्रजाल यहाँ रच डाला है; इस स्थितिमें मुझे अब क्या करना चाहिये? मेरे लिये तो यह मृत्यु ही उपस्थित हो गयी है । मैं अपने पतिको छोड़कर किसी दूसरेको कभी २ ९ नहीं चुन सकती, चाहे वह कोई परम सुन्दर देवता ही
क्यों न हो— यह मेरा दृढ़ विचार है । २७ - २ ९ ३ ॥
इस प्रकार मनमें भलीभाँति सोचकर क्षीण ३० कटि प्रदेशवाली वह सुकन्या कल्याणस्वरूपिणी पराम्बा भगवती भुवनेश्वरीके ध्यानमें लीन हो गयी और उनकी स्तुति करने लगी ॥ ३०३ ॥
सुकन्या बोली - हे जगदम्बे! मैं महान् कष्टसे पीड़ित होकर आपकी शरणमें आयी हूँ । आप मेरे पातिव्रत्य ३१ धर्मकी रक्षा करें; मैं आपके चरणोंमें प्रणाम करती हूँ । हे पद्मोद्भवे! आपको नमस्कार है । हे शंकरप्रिये! हे देवि! आपको नमस्कार है । हे विष्णुकी प्रिया लक्ष्मी! ३२ हे वेदमाता सरस्वती! आपको नमस्कार है ॥ ३१-३२३ ॥ आपने ही इस सम्पूर्ण चराचर जगत्का सृजन किया है । आप ही सावधान होकर जगत्का पालन ३३ करती हैं और [ प्रलयकालमें ] लोक - शान्तिके लिये इसे अपनेमें लीन भी कर लेती हैं ॥ ३३३ ॥
आप ब्रह्मा, विष्णु तथा महेशकी सुसम्मत जननी ३४ हैं । आप अज्ञानियोंको बुद्धि तथा ज्ञानियोंको सदा मोक्ष प्रदान करनेवाली हैं । परम पुरुषके लिये प्रिय दर्शनवाली आप आज्ञामयी तथा पूर्ण प्रकृतिस्वरूपिणी ३५ हैं । आप श्रेष्ठ विचारवाले प्राणियोंको भोग तथा मोक्ष प्रदान करती हैं । आप ही अज्ञानियोंको दुःख देती हैं तथा सात्त्विक प्राणियोंके सुखका साधन भी आप ही ३६ हैं । हे माता! आप ही योगिजनोंको सिद्धि, विजय
तथा कीर्ति भी प्रदान करती हैं । ३४ - ३६३ ॥
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अ ० ५ ] सप्तम स्कन्ध ३३ शरणं त्वां प्रपन्नास्मि विस्मयं परमं गता ॥
पतिं दर्शय में मातर्मग्नास्मि शोकसागरे ।
देवाभ्यां चरितं कूटं कं वृणोमि विमोहिता ॥
पतिं दर्शय सर्वज्ञे विदित्वा मे सतीव्रतम् । व्यास उवाच एवं स्तुता तदा देवी तथा त्रिपुरसुन्दरी ॥
हृदयेऽस्यास्तदा ज्ञानं ददावाशु सुखोदयम् ।
निश्चित्य मनसा तुल्यवयोरूपधरान्सती ॥
प्रसमीक्ष्य तु तान्सर्वान्वव्रे बाला स्वकं पतिम् ।
वृतेऽथ च्यवने देवौ सन्तुष्टौ तौ बभूवतुः ॥
सतीधर्मं समालोक्य सम्प्रीतौ ददतुर्वरम् ।
भगवत्याः प्रसादेन प्रसन्नौ तौ सुरोत्तमौ ॥
मुनिमामन्त्र्य तरसा गमनायोद्यतावुभौ ।
लब्ध्वा तु च्यवनो रूपं नेत्रे भार्यां च यौवनम् ॥
हृष्टोऽब्रवीन्महातेजास्तौ नासत्याविदं वचः ।
उपकारः कृतोऽयं मे युवाभ्यां सुरसत्तमौ ॥
किं ब्रवीमि सुखं प्राप्तं संसारेऽस्मिन्ननुत्तमे ।
प्राप्य भार्यां सुकेशान्तां दुःखं मेऽभवदन्वहम् ॥
अन्धस्य चातिवृद्धस्य भोगहीनस्य कानने ।
युवाभ्यां नयने दत्ते यौवनं रूपमद्भुतम् ॥
सम्पादितं ततः किञ्चिदुपकर्तुमहं ब्रुवे ।
उपकारिणि मित्रे यो नोपकुर्यात्कथञ्चन ॥
तं धिगस्तु नरं देवौ भवेच्च ऋणवान्भुवि । ३७ हे माता! महान् असमंजसमें पड़ी हुई मैं इस समय आपकी शरणमें आयी हूँ । आप मेरे पतिको दिखानेकी कृपा करें । मैं इस समय शोक - सागरमें डूबी हुई हूँ; क्योंकि इन दोनों देवताओं ( अश्विनीकुमारों ) - ने ३८ अत्यन्त कपटपूर्ण चरित्र उपस्थित कर दिया है । मेरी बुद्धि तो कुण्ठित हो गयी है । मैं इनमें किसका वरण करूँ? हे सर्वज्ञे! मेरे पातिव्रत्यपर सम्यक् ध्यान देकर आप मेरे पतिका दर्शन करा दें ॥ ३७-३८३ ॥ व्यासजी बोले – इस प्रकार सुकन्याके स्तुति ३ ९ करनेपर भगवती त्रिपुरसुन्दरीने शीघ्र ही सुखका उदय करनेवाला ज्ञान उसके हृदयमें उत्पन्न कर दिया ॥ ३ ९ ३ ॥ तदनन्तर [ अपने पतिको पा लेनेका ] मनमें ४० निश्चय करके साध्वी सुकन्याने समान रूप तथा अवस्थावाले उन तीनोंपर भलीभाँति दृष्टिपात करके अपने पतिका वरण कर लिया ॥ ४०३ ॥
४१ इस प्रकार सुकन्याके द्वारा च्यवनमुनिके वरण कर लिये जानेपर वे दोनों देवता परम सन्तुष्ट हुए और सुकन्याका सतीधर्म देखकर उन्होंने उसे अति प्रसन्नतापूर्वक वर प्रदान किया ॥४१३ ॥
४२ तत्पश्चात् भगवतीकी कृपासे प्रसन्नताको प्राप्त वे दोनों देवश्रेष्ठ अश्विनीकुमार मुनिसे आज्ञा लेकर तुरंत वहाँसे प्रस्थान करनेको उद्यत हो गये ॥ ४२ ॥
४३ सुन्दर रूप, नेत्र, यौवन तथा अपनी भार्याको पाकर च्यवनमुनि अत्यन्त हर्षित हुए । उन महातेजस्वी मुनिने अश्विनीकुमारोंसे यह वचन कहा - हे देववरो! आप दोनोंने मेरा यह महान् उपकार किया है । क्या ४४ कहूँ, ऐसा हो जानेसे इस सुन्दर संसारमें अब मुझे परम सुख मिल गया है । इसके पूर्व मुझ अन्धे, अत्यन्त वृद्ध तथा भोग - सामर्थ्य से हीन पुरुषको ऐसी ४५ सुन्दर केशपाशवाली भार्या पाकर भी इस वनमें सदा दुःख ही दुःख रहता था ॥ ४३ – ४५ १३ ॥ आपलोगोंने मुझे नेत्र, युवावस्था तथा अद्भुत ४६ रूप प्रदान किया है, अतः मैं भी आपका कुछ उपकार करूँ; इसके लिये आपसे प्रार्थना कर रहा हूँ । हे देवताओ! जो मनुष्य उपकार करनेवाले मित्रका किसी प्रकारका उपकार नहीं करता, उस मनुष्यको धिक्कार ४७ है । ऐसा मनुष्य पृथ्वीलोकमें अपने उपकारी मित्रका ऋणी होता है ॥ ४६-४७३ ॥ 1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] -2 A
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३४ तस्माद्वां वाञ्छितं किञ्चिद्दातुमिच्छामि साम्प्रतम् आत्मनो ऋणमोक्षाय देवेशौ नूतनस्य च । प्रार्थितं वां प्रदास्यामि यदलभ्यं सुरासुरैः
ब्रुवाथां वां मनोद्दिष्टं प्रीतोऽस्मि सुकृतेन वाम् ।
श्रुत्वा तौ तु मुनेर्वाक्यमभिमन्त्र्य परस्परम् ॥
तमूचतुर्मुनिश्रेष्ठं सुकन्यासहितं स्थितम् । मुने पितुः प्रसादेन सर्वं नो मनसेप्सितम् उत्कण्ठा सोमपानस्य वर्तते नौ सुरैः सह भिषजाविति देवेन निषिद्धौ चमसग्रहे शक्रेण वितते यज्ञे ब्रह्मणः कनकाचले तस्मात्त्वमपि धर्मज्ञ यदि शक्तोऽसि तापस कार्यमेतद्धि कर्तव्यं वाञ्छितं नौ सुसम्मतम् एतद्विज्ञाय वा ब्रह्मन्कुरु वां सोमपायिनौ पिपासास्ति सुदुष्प्रापा त्वत्तः समुपयास्यति च्यवनस्तु तयोः प्राह तच्छ्रुत्वा वचनं मृदु यदहं रूपसम्पन्नो वयसा च समन्वितः कृतो भवद्भ्यां वृद्धः सन्भार्यां च प्राप्तवानिति तस्माद्युवां करिष्यामि प्रीत्याहं सोमपायिनौ मिषतो देवराजस्य सत्यमेतद् ब्रवीम्यहम् राजस्तु वितते यज्ञे शर्यातेरमितद्युतेः इत्याकर्ण्य वचो हृष्टौ तौ दिवं प्रतिजग्मतुः च्यवनस्तां गृहीत्वा तु जगामाश्रममण्डलम् श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ५ ॥ ४८ अतएव हे देवेश्वरो! मुझे नूतन शरीर प्रदान करनेके आपके ऋणसे मुक्तिके लिये मैं इस समय आपकी कोई अभिलषित वस्तु आपको प्रदान करना ॥ ४ ९ चाहता हूँ । मैं आप दोनोंको वह अभीष्ट वस्तु प्रदान करूँगा, जो देवताओं तथा दानवोंके लिये भी अलभ्य है । मैं आपलोगोंके इस उत्तम कार्यसे बहुत ५० प्रसन्न हूँ; अब आपलोग अपना मनोरथ व्यक्त करें ॥ ४८-४९ ३ ॥ च्यवनमुनिका वचन सुनकर परस्पर विचार-॥ ५१ विमर्श करके वे दोनों अश्विनीकुमार सुकन्याके साथ बैठे हुए उन मुनिश्रेष्ठसे कहने लगे - हे मुने! पिताजीकी । कृपासे हमारा सारा मनोरथ पूर्ण हो चुका है, किंतु ॥ ५२ देवताओंके साथ सम्मिलित होकर सोमरस पीनेकी हमारी इच्छा शेष रह गयी है । एक बार सुमेरुपर्वतपर । ब्रह्माजीके महायज्ञमें इन्द्रदेवने हम दोनोंको ' वैद्य ' ॥ ५३ कहकर सोमपात्र ग्रहण करनेसे रोक दिया था । अतएव हे धर्मज्ञ! हे तापस! यदि आप समर्थ हों तो । हमारा यह कार्य कर दीजिये । हे ब्रह्मन्! हमारी इस । ५४ प्रिय इच्छापर विचार करके आप हम दोनोंको सोमपानका अधिकारी बना दीजिये । सोमपानकी । अभिलाषा हमारे लिये अत्यन्त दुर्लभ हो गयी है, वह ॥ ५५ आपसे शान्त हो जायगी ॥ ५०–५४३ ॥ उन दोनोंकी यह बात सुनकर च्यवनमुनिने मधुर । वाणीमें कहा- आप दोनोंने मुझ वृद्धको रूपवान् तथा ॥ ५६ युवावस्था से सम्पन्न बना दिया है और [ आपके अनुग्रहसे ] मैंने साध्वी भार्या भी प्राप्त कर ली है ॥ अतः मैं अमित - तेजस्वी राजा शर्यातिके विशाल ॥ ५७ यज्ञमें देवराज इन्द्रके समक्ष ही आप दोनोंको प्रसन्नतापूर्वक सोमपानका अधिकारी बना दूँगा; मैं । यह सत्य कह रहा हूँ । यह बात सुनकर अश्विनीकुमारोंने ॥ ५८ हर्षपूर्वक स्वर्गके लिये प्रस्थान किया और च्यवनमुनि भी सुकन्याको साथ लेकर अपने आश्रमपर चले ॥ ५ ९ | गये ॥ ५५–५९ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे अश्विभ्यां च्यवनद्वारा सोमपानाय प्रतिज्ञावर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] -2 B
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अ ० ६ ] सप्तम स्कन्ध ३५ अथ षष्ठोऽध्यायः राजा शर्यातिके यज्ञमें च्यवनमुनिका अश्विनीकुमारोंको सोमरस देना जनमेजय उवाच
च्यवनेन कथं वैद्यौ तौ कृतौ सोमपायिनौ ।
वचनं च कथं सत्यं जातं तस्य महात्मनः ॥
मानुषस्य बलं कीदृग्देवराजबलं प्रति ।
निषिद्धौ भिषजौ तेन कृतौ तौ सोमपायिनौ ॥
धर्मनिष्ठ तदाश्चर्यं विस्तरेण वद प्रभो ।
चरितं च्यवनस्याद्य श्रोतुकामोऽस्मि सर्वथा ॥
व्यास उवाच
निशामय महाराज चरितं परमाद्भुतम् ।
च्यवनस्य मखे तस्मिञ्छर्यातेर्भुवि भारत ॥
सुकन्यां सुन्दरीं प्राप्य च्यवनः सुरसन्निभः ।
विजहार प्रसन्नात्मा देवकन्यामिवापरः ॥
कदाचिदथ शर्यातिभार्या चिन्तातुरा भृशम् ।
पतिं प्राह वेपमाना वचनं रुदती प्रिया ॥
राजन् पुत्री त्वया दत्ता मुनयेऽन्धाय कानने ।
मृता जीवति वा सा तु द्रष्टव्या सर्वथा त्वया ॥
गच्छ नाथ मुनेस्तावदाश्रमं द्रष्टुमादरात् ।
किं करोति सुकन्या सा प्राप्य नाथं तथाविधम् ॥
पुत्रीदुःखेन राजर्षे दग्धास्मि सर्वथा हृदि । तामानय विशालाक्षीं तपःक्षामां मदन्तिके पश्यामि सर्वथा पुत्रीं कृशाङ्गीं वल्कलावृताम् । अन्धं पतिं समासाद्य दुःखभाजं कृशोदरीम् जनमेजय बोले - [ हे व्यासजी! ] च्यवनने उन दोनों वैद्योंको सोमरस पीनेका अधिकारी किस प्रकार बनाया? उन महात्मा च्यवनकी बात कैसे सत्य १ सिद्ध हुई? ॥ १ ॥
देवराज इन्द्रके बलके सामने मानव - बलकी क्या तुलना हो सकती है? फिर भी उन इन्द्रके द्वारा २ सोमरसके पानसे निषिद्ध किये गये उन दोनों अश्विनी-कुमारोंको च्यवनमुनिने सोमरस - पानका अधिकारी बना दिया । हे धर्मनिष्ठ! हे प्रभो! इस आश्चर्यमय ३ विषयका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये; क्योंकि मैं इस समय च्यवनमुनिका चरित्र पूर्णरूपसे सुननेका इच्छुक हूँ॥२-३ ॥ व्यासजी बोले – हे महाराज! हे भारत! राजा शर्यातिने जब भूमण्डलपर यज्ञ किया था, च्यवनमुनिके ४ तत्कालीन उस अत्यन्त अद्भुत चरित्रके विषयमें सुनिये । दूसरे देवताके समान तेजस्वी मुनि च्यवन सुन्दर रूपवाली उस देवकन्यास्वरूपिणी सुकन्याको ५ पाकर प्रसन्नचित्त हो गये और उसके साथ विहार करने लगे॥४-५ ॥ एक समयकी बात है - महाराज शर्यातिकी पत्नी [ अपनी कन्याके विषयमें ] अत्यन्त चिन्तित हो ६ उठीं । काँपती और रोती हुई वे अपने पतिसे बोलीं-हे राजन्! आपने वनमें एक अन्धे मुनिको पुत्री सौंप दी थी । वह न जाने जीवित है अथवा मर गयी । अतः ७ । आपको उसे सम्यक् रूपसे देखना चाहिये ॥ ६-७ ॥ हे नाथ! आप मुनि च्यवनके आश्रम में आदरपूर्वक यह देखनेके लिये जाइये कि उस प्रकारका पति पाकर ८ वह सुकन्या क्या कर रही है? ॥ ८ ॥
राजर्षे! पुत्री दुःखके कारण मेरा हृदय जल रहा है । तपस्या करनेसे क्षीण शरीरवाली मेरी उस विशालनयना पुत्रीको मेरे पास ले आइये ॥ ९ ॥
॥ नेत्रहीन पति पाकर महान् कष्ट भोगनेवाली, [ तपके कारण ] कृश शरीरवाली, वल्कल धारण करनेवाली तथा क्षीण कटिप्रदेशवाली अपनी पुत्रीको ॥ १० । मैं देखना चाहती हूँ ॥ १० ॥
1898 श्रीमद्देवी..... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –2 C
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३६ शर्यातिरुवाच
गच्छामोऽद्य विशालाक्षि सुकन्यां द्रष्टुमादरात् ।
प्रियपुत्रीं वरारोहे मुनिं तं संशितव्रतम् ॥
व्यास उवाच एवमुक्त्वा तु शर्यातिः कामिनीं शोकसंकुलाम् । जगाम रथमारुह्य त्वरितश्चाश्रमं मुनेः
गत्वाश्रमसमीपे तु तमपश्यन्महीपतिः ।
नवयौवनसम्पन्नं देवपुत्रोपमं मुनिम् ॥
तं विलोक्यामराकारं विस्मयं नृपतिर्गतः किं कृतं कुत्सितं कर्म पुत्र्या लोकविगर्हितम् निहतोऽसौ मुनिर्वृद्धस्त्वनयान्यः पतिः कृतः कामपीडितया कामं प्रशान्तो ऽप्यतिनिर्धनः दुःसहोऽयं पुष्पधन्वा विशेषेण च यौवने कुले कलङ्कः सुमहाननया मानवे कृतः धिक्तस्य जीवितं लोके यस्य पुत्री हि कुत्सिता सर्वपापैस्तु दुःखाय पुत्री भवति देहिनाम् ॥ मया त्वनुचितं कर्म कृतं स्वार्थस्य सिद्धये वृद्धायान्धाय या दत्ता पुत्री सर्वात्मना किल कन्या योग्याय दातव्या पित्रा सर्वात्मना किल तादृशं हि फलं प्राप्तं यादृशं वै कृतं मया श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ६ शर्याति बोले - हे विशालाक्षि! हे वरारोहे! मैं अभी अपनी प्रिय पुत्री सुकन्याको आदरपूर्वक देखनेके लिये उत्तम व्रतका आचरण करनेवाले उन ११ च्यवनऋषिके पास जा रहा हूँ ॥११ ॥
व्यासजी बोले- शोकसे अत्यन्त व्याकुल अपनी पत्नीसे ऐसा कहकर राजा शर्याति रथपर बैठकर च्यवनमुनिके आश्रमकी ओर तुरंत चल पड़े ॥ १२ ॥
॥ १२ आश्रमके निकट पहुँचकर राजा शर्यातिने देवपुत्रके समान प्रतीत होनेवाले एक नवयौवनसे सम्पन्न मुनिको वहाँ देखा ॥ १३ ॥
॥ १३ राजा मेरी । कर्म ॥ १४ उन । कर देवताओंके स्वरूपवाले उस मुनिको देखकर शर्याति विस्मयमें पड़ गये T । वे सोचने लगे कि पुत्रीने लोकमें निन्दा करानेवाला यह कैसा नीच कर डाला है? ॥ १४ ॥
प्रतीत होता है कि इसने कामपीड़ित होकर वृद्ध, शान्तचित्त तथा अति निर्धन मुनिका वध दिया एवं किसी अन्यको अपना पति बना ॥ १५ लिया है । यह कामदेव बड़ा दु: सह है और युवावस्थामें तो यह विशेषरूपसे और भी दुःसह । हो जाता है । इस पुत्रीने तो मनुवंशमें बड़ा भारी कलंक लगा दिया ॥ १५-१६ ॥ ॥ १६ जिस मनुष्यकी पुत्री ऐसा नीच कर्म करनेवाली हो, संसारमें उसके जीवनको धिक्कार है । ऐसी । पुत्री मनुष्योंके लिये सभी पापोंसे बढ़कर दुःख १७ देनेवाली होती है । मैंने भी तो स्वार्थकी सिद्धिके लिये ऐसा अनुचित कार्य कर दिया था, जो कि । जानबूझकर नेत्रहीन और वृद्ध मुनिको अपनी पुत्री ॥ १८ सौंप दी । पिताको चाहिये कि वह भलीभाँति सोच-समझकर ही एक योग्य वरको अपनी कन्या प्रदान । करे । मैंने जैसा कर्म किया था, वैसा फल भी पाया ॥ १७-१९ ॥ ॥ १ ९ अब यदि मैं पापकर्म करनेवाली इस दुश्चरित्र कन्याको मार डालता हूँ, तो मुझे दुस्तर स्त्री - हत्या हन्मि चेदद्य तनयां दुःशीलां पापकारिणीम् । और विशेषरूपसे पुत्री - हत्याका बड़ा भारी दोष स्त्रीहत्या दुस्तरा स्यान्मे तथा पुत्र्या विशेषतः ॥ २० लगेगा ॥ २० ॥
1898 श्रीमद्देवी..... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –2 D
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अ ० ६ ]
मनुवंशस्तु विख्यातः सकलङ्कः कृतो मया ।
लोकापवादो बलवान्दुस्त्याज्या स्नेहशृङ्खला ॥
किं करोमीति चिन्ताब्धौ यदा मग्नः स पार्थिवः ।
सुकन्यया तदा दैवाद् दृष्टश्चिन्ताकुलः पिता ॥
सा दृष्ट्वा तं जगामाशु सुकन्या पितुरन्तिके ।
गत्वा पप्रच्छ भूपालं प्रेमपूरितमानसा ॥
किं विचारयसे राजंश्चिन्ताव्याकुलिताननः ।
उपविष्टं मुनिं वीक्ष्य युवानमम्बुजेक्षणम् ॥
एह्येहि पुरुषव्याघ्र प्रणमस्व पतिं मम ।
मा विषादं नृपश्रेष्ठ साम्प्रतं कुरु मानव ॥
व्यास उवाच
इति पुत्र्या वचः श्रुत्वा शर्यातिः क्रोधपीडितः ।
प्रोवाच वचनं राजा पुरःस्थां तनयां ततः ॥
राजोवाच
क्व मुनिश्च्यवनः पुत्रि वृद्धोऽन्धस्तापसोत्तमः ।
कोऽयं युवा मदोन्मत्तः सन्देहोऽत्र महान्मम ॥
मुनिः किं निहतः पापे त्वया दुष्कृतकारिणि ।
नूतनोऽसौ पतिः कामात्कृतः कुलविनाशिनि ॥
सोऽहं चिन्तातुरस्तं न पश्याम्याश्रमसंस्थितम् ।
किं कृतं दुष्कृतं कर्म कुलटाचरितं किल ॥
निमग्नोऽहं दुराचारे शोकाब्धौ त्वत्कृतेऽधुना ।
दृष्ट्वैनं पुरुषं दिव्यमदृष्ट्वा च्यवनं मुनिम् ॥
विहस्य तमुवाचाशु सा श्रुत्वा वचनं पितुः । गृहीत्वानीय पितरं भर्तुरन्तिकमादरात् सप्तम स्कन्ध ३७ मैंने तो इस परम प्रसिद्ध मनुवंशको कलंकित २१ कर दिया । एक ओर बलवती लोकनिन्दा है और दूसरी ओर न छोड़ी जा सकनेवाली [ सन्तानके प्रति ] स्नेहश्रृंखला; अब मैं क्या करूँ? इस प्रकार सोचते हुए राजा शर्याति जब चिन्ताके सागरमें डूबे हुए थे, २२ उसी समय सुकन्याने चिन्तासे आकुल अपने पिताको संयोगवश देख लिया ॥ २१-२२ ॥ उन्हें देखते ही प्रेमसे परिपूर्ण हृदयवाली वह २३ सुकन्या अपने पिता राजा शर्यातिके पास गयी और वहाँ जाकर उनसे पूछने लगी - हे राजन्! कमलके समानने वाले बैठे हुए इन युवा मुनिको देखकर २४ चिन्ताके कारण व्याकुल मुखमण्डलवाले आप इस समय क्या सोच रहे हैं? हे पुरुषव्याघ्र! इधर आइये और मेरे पतिको प्रणाम कीजिये | हे मनुवंशी राजेन्द्र! २५ । इस समय आप शोक मत कीजिये ॥ २३–२५ ॥ व्यासजी बोले- [ हे राजन्! ] तब अपनी पुत्री सुकन्याकी बात सुनकर क्रोधसे सन्तप्त राजा शर्याति अपने सामने खड़ी उस कन्यासे कहने लगे ॥ २६ ॥
२६ राजा बोले — हे पुत्रि! परम तपस्वी, वृद्ध तथा नेत्रहीन वे मुनि च्यवन कहाँ हैं और यह मदोन्मत्त युवक कौन है? इस विषयमें मुझे महान् सन्देह हो रहा है ॥ २७ ॥
दुराचारमें लिप्त रहनेवाली हे पापिनि! हे कुल-२७ नाशिनि! क्या तुमने च्यवनमुनिको मार डाला और कामके वशीभूत होकर इस पुरुषका नये पतिके रूपमें वरण कर लिया? ॥ २८ ॥
२८ इस आश्रममें रहनेवाले उन मुनिको मैं इस समय नहीं देख रहा हूँ, इसीलिये मैं चिन्ताग्रस्त हूँ । तुमने यह नीच कर्म क्यों किया? यह तो निश्चय ही २ ९ व्यभिचारिणी स्त्रियोंका चरित्र है ॥२ ९ ॥ हे दुराचारिणि! इस समय तुम्हारे पास इस दिव्य पुरुषको देखकर तथा उन च्यवनमुनिको न देखकर मैं तुम्हारे द्वारा उत्पन्न किये गये शोकसागरमें ३० डूबा हुआ हूँ ॥ ३० ॥
अपने पिताकी बात सुनकर उन्हें साथ लेकर वह सुकन्या तुरंत पतिके पास पहुँची और उनसे ॥ ३१ । आदरपूर्वक कहने लगी- ॥ ३१ ॥
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३८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ६ च्यवनोऽसौ मुनिस्तात जामाता ते न संशयः । अश्विभ्यामीदृशः कान्तः कृतः कमललोचनः यदृच्छयात्र सम्प्राप्तौ नासत्यावाश्रमे मम । ताभ्यां करुणया नूनं च्यवनस्तादृशः कृतः नाहं तव सुता तात तथा स्यां पापकारिणी । यथा त्वं मन्यसे राजन् विमूढो रूपसंशये
प्रणम त्वं मुनिं राजन् भार्गवं च्यवनं पितः ।
आपृच्छ कारणं सर्वं कथयिष्यति विस्तरम् ॥
इति श्रुत्वा वचः पुत्र्याः शर्यातिस्त्वरितस्तदा ।
प्रणनाम मुनिं तत्र गत्वा पप्रच्छ सादरम् ॥
राजोवाच कथयस्व स्ववृत्तान्तं भार्गवाशु यथोचितम् । नयने च कथं प्राप्ते क्व गता ते जरा पुनः संशयोऽयं महान्मेऽस्ति रूपं दृष्ट्वातिसुन्दरम् वद विस्तरतो ब्रह्मञ्छ्रुत्वाहं सुखमाप्नुयाम् ॥ च्यवन उवाच नासत्यावत्र सम्प्राप्तौ देवानां भिषजावुभौ उपकारः कृतस्ताभ्यां कृपया नृपसत्तम मया ताभ्यां वरो दत्त उपकारस्य हेतवे । करिष्यामि मखे राज्ञो भवन्तौ सोमपायिनौ एवं मया वयः प्राप्तं लोचने विमले तथा स्वस्थो भव महाराज संविशस्वासने शुभे इत्युक्तः स तु विप्रेण सभार्यः पृथिवीपतिः सुखोपविष्टः कल्याणीः कथाश्चक्रे महात्मना हे तात! ये आपके जामाता च्यवनमुनि ही हैं, इसमें ॥ ३२ कोई सन्देह नहीं है । अश्विनीकुमारोंने इन्हें ऐसा कान्तिमान् तथा कमलके समान नेत्रवाला बना दिया है ॥ ३२ । वे दोनों अश्विनीकुमार एक बार दैवयोगसे मेरे आश्रममें पधारे थे । उन्होंने ही दयालुतापूर्वक च्यवनमुनिको ॥ ३३ । ऐसा कर दिया है ॥ ३३ ॥
हे पिताजी! मैं आपकी पुत्री हूँ । हे राजन्! [ मेरे पतिदेवका ] यह रूप देखकर संशय में पड़े हुए आप ॥ ३४ मोहके वशीभूत होकर मुझे जैसी समझ रहे हैं, मैं वैसी पापकृत्य करनेवाली नहीं हूँ ॥ ३४ ॥
हे राजन्! भृगुवंशको सुशोभित करनेवाले ३५ च्यवनमुनिको आप प्रणाम करें । हे पिताजी! आप इन्हींसे पूछ लीजिये; ये आपको सारी बात विस्तारपूर्वक बता देंगे ॥ ३५ ॥
३६ तब पुत्रीकी यह बात सुनकर राजा शर्यातिने तुरंत मुनिके पास पहुँचकर उन्हें प्रणाम किया और वे उनसे आदरपूर्वक पूछने लगे ॥ ३६ ॥
राजा बोले- हे भार्गव! आप अपना सारा ॥ ३७ वृत्तान्त समुचितरूपसे मुझे शीघ्र बतलाइये । आपने फिरसे किस प्रकार अपने दोनों नेत्र प्राप्त किये और । आपका बुढ़ापा कैसे दूर हुआ? आपका परम सुन्दर रूप देखकर मुझे यह महान् सन्देह हो रहा है । हे ३८ ब्रह्मन्! आप विस्तारपूर्वक यह सब बतलाइये, जिसे सुनकर मुझे सुख प्राप्त हो ॥ ३७-३८ ॥ च्यवन बोले – हे नृपश्रेष्ठ! देवताओंकी चिकित्सा । करनेवाले दोनों अश्विनीकुमार एक बार यहाँ आये ॥ ३ ९ थे । उन दोनोंने ही कृपापूर्वक मेरा यह उपकार किया है । उस उपकारके बदले मैंने उन दोनोंको वर दिया है कि मैं आप दोनोंको राजा शर्यातिके यज्ञमें ॥ ४० सोमपानका अधिकारी बना दूँगा ॥ ३ ९ -४० ॥ हे महाराज! इस प्रकार अश्विनीकुमारोंद्वारा मुझे । यह युवावस्था तथा ये विमल नेत्र प्राप्त हुए हैं; आप निश्चिन्त रहें और इस पवित्र आसनपर विराजमान ॥ ४१ हों ॥ ४१ ॥
मुनिके यह कहने पर राजा शर्याति रानीसहित । सुखपूर्वक आसनपर बैठ गये । इसके बाद वे महात्मा ॥ ४२ । च्यवनजीसे कल्याणमयी बातें करने लगे ॥ ४२ ॥
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अ ० ६ ]
अथैनं भार्गवः प्राह राजानं परिसान्त्वयन् ।
याजयिष्यामि राजंस्त्वां सम्भारानुपकल्पय ॥
मया प्रतिश्रुतं ताभ्यां कर्तव्यौ सोमपौ युवाम् ।
तत्कर्तव्यं नृपश्रेष्ठ तव यज्ञेऽतिविस्तरे ॥
इन्द्रं निवारयिष्यामि क्रुद्धं तेजोबलेन वै ।
पाययिष्यामि राजेन्द्र सोमं सोममखे तव ॥
ततः परमसन्तुष्टः शर्यातिः पृथिवीपतिः ।
च्यवनस्य महाराज तद्वाक्यं प्रत्यपूजयत् ॥
सम्मान्य च्यवनं राजा जगाम नगरं प्रति ।
सभार्यश्चातिसन्तुष्टः कुर्वन्वार्तां मुनेः किल ॥
प्रशस्तेऽहनि यज्ञीये सर्वकामसमृद्धिमान् ।
कारयामास शर्यातिर्यज्ञायतनमुत्तमम् ॥
समानीय मुनीन्पूज्यान्वसिष्ठप्रमुखानसौ ।
भार्गवो याजयामास च्यवनः पृथिवीपतिम् ॥
वितते तु तथा यज्ञे देवाः सर्वे सवासवाः ।
आजग्मुश्चाश्विनौ तत्र सोमार्थमुपजग्मतुः ॥
इन्द्रस्तु शङ्कितस्तत्र वीक्ष्य तावश्विनावुभौ ।
पप्रच्छ च सुरान्सर्वान्किमेतौ समुपागतौ ॥
चिकित्सकौ न सोमा केनानीताविहेति च ।
नाब्रुवन्नमरास्तत्र राज्ञस्तु वितते मखे ॥
अगृह्णाच्च्यवनः सोममश्विनोर्देवयोस्तदा । शक्रस्तं वारयामास मा गृहाणैतयोर्ग्रहम् सप्तम स्कन्ध ३ ९ तत्पश्चात् भृगुवंशी च्यवनमुनिने राजाको ४३ सान्त्वना देते हुए उनसे कहा — हे राजन्! मैं आपसे यज्ञ कराऊँगा, आप यज्ञसम्बन्धी सामग्रियाँ जुटाइये । मैं दोनों अश्विनीकुमारोंसे प्रतिज्ञा कर चुका हूँ कि ‘ मैं आप दोनोंको सोमपानका अधिकारी बना दूँगा? " ४४ हे नृपश्रेष्ठ! आपके महान् यज्ञमें मुझे वह कार्य सम्पन्न करना है और हे राजेन्द्र! आपके सोमयज्ञमें इन्द्रके कोप करनेपर मैं अपने तेजबलसे उन्हें ४५ शान्त कर दूँगा और [ उन देववैद्योंको ] सोमरस पिलाऊँगा ॥ ४३–४५ ॥ हे राजन्! इस बातसे राजा शर्याति परम सन्तुष्ट हुए और उन्होंने च्यवनमुनिकी उस बातको आदरपूर्वक ४६ स्वीकार कर लिया ॥ ४६ ॥
तत्पश्चात् च्यवनमुनिका सम्मान करके परम सन्तुष्ट होकर राजा शर्याति अपनी पत्नीके साथ ४७ मुनिसे सम्बन्धित चर्चा करते हुए अपने नगरको चले गये ॥ ४७ ॥
तदनन्तर सम्पूर्ण कामनाओंसे परिपूर्ण राजा शर्यातिने किसी शुभ मुहूर्तमें एक उत्तम यज्ञशालाका ४८ निर्माण कराया ॥ ४८ ॥
इसके बाद वसिष्ठ आदि प्रमुख पूज्य मुनियोंको बुलाकर भृगुवंशी च्यवनमुनिने राजा शर्यातिसे यज्ञ ४ ९ कराना आरम्भ कर दिया ॥ ४ ९ ॥ उस महायज्ञमें इन्द्रसहित सभी देवता उपस्थित हुए और दोनों अश्विनीकुमार भी सोमपानकी इच्छासे वहाँ आये ॥५० ॥
५० वहाँ दोनों अश्विनीकुमारोंको भी उपस्थित देखकर इन्द्र सशंकित हो उठे और वे सभी देवताओंसे पूछने लगे – ' ये दोनों यहाँ क्यों आये हुए हैं? ये ५१ चिकित्सक हैं; अतः ये सोमरस पीनेके अधिकारी नहीं हैं । इन्हें यहाँ किसने बुलाया है? ' इसपर राजाके उस महायज्ञमें उपस्थित देवताओंने कोई उत्तर नहीं ५२ दिया ॥ ५१-५२ ॥ तत्पश्चात् जब च्यवनमुनि दोनों अश्विनीकुमारोंको सोमरस ग्रहण कराने लगे, तब इन्द्रने [ यह कहते हुए ] उन्हें रोका – ' इन दोनोंको सोमभाग ग्रहण मत ॥ ५३ | कराइये ' ॥ ५३ ॥