देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 221–230

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 221–230

पृष्ठ 221

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२१२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४०

एतत्प्रकाशनं मातुरुद्घाटनमुरोजयोः ।

तस्मादवश्यं यत्नेन गोपनीयमिदं सदा ॥

देयं भक्ताय शिष्याय ज्येष्ठपुत्राय चैव हि ।

सुशीलाय सुवेषाय देवीभक्तियुताय च ॥

श्राद्धकाले पठेदेतद् ब्राह्मणानां समीपतः ।

तृप्तास्तत्पितरः सर्वे प्रयान्ति परमं पदम् ॥

व्यास उवाच

इत्युक्त्वा सा भगवती तत्रैवान्तरधीयत ।

देवाश्च मुदिताः सर्वे देवीदर्शनतोऽभवन् ॥

ततो हिमालये जज्ञे देवी हैमवती तु सा ।

या गौरीति प्रसिद्धासीद्दत्ता सा शङ्कराय च ॥

ततः स्कन्दः समुद्भूतस्तारकस्तेन पातितः ।

समुद्रमन्थने पूर्वं रत्नान्यासुर्नराधिप ॥

तत्र देवैः स्तुता देवी लक्ष्मीप्राप्त्यर्थमादरात् ।

तेषामनुग्रहार्थाय निर्गता तु रमा ततः ॥

वैकुण्ठाय सुरैर्दत्ता तेन तस्य शमोऽभवत् ।

इति ते कथितं राजन् देवीमाहात्म्यमुत्तमम् ॥

गौरीलक्ष्म्योः समुद्भूतिविषयं सर्वकामदम् ।

न वाच्यं त्वेतदन्यस्मै रहस्यं कथितं यतः ॥

गीतारहस्य भूतेयं गोपनीया प्रयत्नतः ।

सर्वमुक्तं समासेन यत्पृष्टं तत्त्वयानघ ।

पवित्रं पावनं दिव्यं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥

नहीं देना चाहिये | अनधिकारीके समक्ष इसे प्रकाशित ३५ करना अपनी माताके वक्षःस्थलको प्रकट करने के समान है, अत: इसे सदा प्रयत्नपूर्वक अवश्य गोपनीय रखना चाहिये ॥ ३४-३५ ॥ भक्तिसम्पन्न शिष्यको तथा सुशील, सुन्दर और ३६ देवीभक्तिपरायण ज्येष्ठ पुत्रको ही इसका उपदेश करना चाहिये ॥ ३६ ॥

श्राद्धके अवसरपर जो मनुष्य ब्राह्मणोंके समीप ३७ | इसका पाठ करता है, उसके सभी पितर तृप्त होकर परम पदको प्राप्त हो जाते हैं ॥ ३७ ॥

व्यासजी बोले- [ हे जनमेजय! ] ऐसा कहकर वे भगवती वहीं पर अन्तर्धान हो गयीं और देवीके ३८ दर्शनसे सभी देवता अत्यन्त प्रसन्न हो गये ॥३८ ॥

तदनन्तर वे देवी हैमवती हिमालयके यहाँ उत्पन्न हुईं, जो ‘ गौरी ' नामसे प्रसिद्ध हुईं । बादमें वे ३ ९ शंकरजीको प्रदान की गयीं । तत्पश्चात् कार्तिकेय उत्पन्न हुए और उन्होंने तारकासुरका संहार किया ॥ ३ ९ ३ ॥ हे नराधिप! पूर्व समयमें समुद्रमन्थनसे अनेक रत्न निकले । उस समय लक्ष्मीको प्रकट करनेके लिये ४० देवताओंने आदरपूर्वक भगवतीकी स्तुति की । तब उन देवताओंपर अनुग्रह करनेके लिये वे भगवती ही पुनः रमा ( लक्ष्मी ) - के रूपमें समुद्रसे प्रकट हुईं । देवताओंने ४१ उन लक्ष्मीको भगवान् विष्णुको सौंप दिया, इससे उन्हें परम शान्ति प्राप्त हुई । ४०- -४११३ > ॥ हे राजन्! मैंने आपसे भगवतीके इस उत्तम ४२ माहात्म्यका वर्णन कर दिया । गौरी तथा लक्ष्मीकी उत्पत्तिसे सम्बन्धित यह प्रसंग सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है । मेरे द्वारा कहे गये इस रहस्यको ४३ किसी दूसरेको नहीं बताना चाहिये; क्योंकि रहस्यमयी यह गीता सदा प्रयत्नपूर्वक गोपनीय है । हे अनघ! आपने जो कुछ पूछा था, वह सब मैंने आपको संक्षेपमें बता दिया । यह दिव्य प्रसंग [ स्वयं ] पवित्र है तथा दूसरों को भी पवित्र करनेवाला है । अब आप ४४ । पुनः क्या सुनना चाहते हैं? ॥४२–४४ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे देवीगीतायां बाह्यपूजाविधिवर्णनं नाम चत्वारिंशोऽध्यायः ॥। ४० ॥ II III ॥ सप्तमः स्कन्धः समाप्तः ॥

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॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण अष्टमः स्कन्धः अथ प्रथमोऽध्यायः प्रजाकी सृष्टिके लिये ब्रह्माजीकी प्रेरणासे मनुका देवीकी आराधना करना तथा देवीका उन्हें वरदान देना जनमेजय उवाच

सूर्यचन्द्रान्वयोत्थानां नृपाणां सत्कथाश्रितम् ।

चरितं भवता प्रोक्तं श्रुतं तदमृतास्पदम् ॥ १

अधुना श्रोतुमिच्छामि सा देवी जगदम्बिका ।

मन्वन्तरेषु सर्वेषु यद्यद्रूपेण पूज्यते ॥ २

यस्मिन्यस्मिंश्च वै स्थाने येन येन च कर्मणा । ( शरीरेण च देवेशी पूजनीया फलप्रदा । येनैव मन्त्रबीजेन यत्र यत्र च पूज्यते ॥ ) देव्या विराट्स्वरूपस्य वर्णनं च यथातथम् ॥ ३

येन ध्यानेन तत्सूक्ष्मे स्वरूपे स्यान्मतेर्गतिः ।

तत्सर्वं वद विप्रर्षे येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ॥ ४

व्यास उवाच

शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि देव्याराधनमुत्तमम् ।

यत्कृतेन श्रुतेनापि नरः श्रेयोऽत्र विन्दते ॥ ५

एवमेतन्नारदेन पृष्टो नारायणः पुरा ।

तस्मै यदुक्तवान्देवो योगचर्याप्रवर्तकः ॥ ६

एकदा नारदः श्रीमान्पर्यटन्पृथिवीमिमाम् ।

नारायणाश्रमं प्राप्तो गतखेदश्च तस्थिवान् ॥ ७

तस्मै योगात्मने नत्वा ब्रह्मदेवतनूद्भवः ।

पर्यपृच्छदिमं चार्थं यत्पृष्टो भवतानघ ॥ ८

जनमेजय बोले- [ हे मुने! ] आपने सूर्यवंश तथा चन्द्रवंशमें उत्पन्न राजाओंका जो उत्तम कथाओंसे अन्वित तथा अमृतमय चरित्र वर्णित किया, उसे मैंने सुना ॥ १ ॥

सम्पूर्ण मन्वन्तरोंमें जिस - जिस स्थानपर तथा जिस - जिस कर्मसे एवं जिस - जिस रूपसे उन देवी जगदम्बाकी पूजा की जाती है, अब उसे मैं सुनना चाहता हूँ । ( सभी फल प्रदान करनेवाली वे पूज्या देवीश्वरी जिस बीज - मन्त्रसे, जहाँ - जहाँ तथा जिस रूपमें पूजी जाती हैं, उसे सुनाइये । ) साथ ही भगवतीके विराट् स्वरूपका वर्णन यथार्थरूपमें सुनना चाहता हूँ॥२-३ ॥ विप्रर्षे! जिस ध्यानसे उन भगवतीके सूक्ष्म स्वरूपमें बुद्धि स्थिर हो जाय, वह सब मुझे बतलाइये जिससे मैं कल्याणको प्राप्त हो जाऊँ ॥ ४ ॥

व्यासजी बोले - हे राजन्! सुनिये, अब मैं देवीकी उत्तम आराधनाके विषयमें कह रहा हूँ, जिसे करने अथवा सुननेसे भी मनुष्य इस लोकमें कल्याण प्राप्त कर लेता है ॥ ५ ॥

इसी प्रकार पूर्वकालमें नारदजीके द्वारा योगचर्याके प्रवर्तक भगवान् नारायणसे पूछे जानेपर उन्होंने नारदजीसे जो कहा था, वही मैं बता रहा हूँ ॥ ६ ॥

एक बार श्रीमान् नारद इस पृथ्वीपर विचरण करते हुए नारायणके आश्रमपर पहुँचे और वहाँ निश्चिन्त होकर बैठ गये । हे अनघ! तत्पश्चात् उन योगात्मा नारायणको प्रणाम करके ब्रह्माजीके पुत्र नारदने उनसे । यही प्रश्न पूछा था, जो आपने मुझसे पूछा है ॥ ७-८ ॥

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२१४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १ नारद उवाच

देवदेव महादेव पुराणपुरुषोत्तम ।

जगदाधार सर्वज्ञ श्लाघनीयोरुसद्गुण ॥

जगतस्तत्त्वमाद्यं यत्तन्मे वद यथेप्सितम् ।

जायते कुत एवेदं कुतश्चेदं प्रतिष्ठितम् ॥

कुतोऽन्तं प्राप्नुयात्काले कुत्र सर्वफलोदयः ।

केन ज्ञातेन मायैषा मोहभूर्नाशमाप्नुयात् ॥

कयार्चया किं जपेन किं ध्यानेनात्महृत्कजे ।

प्रकाशो जायते देव तमस्यर्कोदयो यथा ॥

एतत्प्रश्नोत्तरं देव ब्रूहि सर्वमशेषतः ।

यथा लोकस्तरेदन्धतमसं त्वञ्जसैव हि ॥

व्यास उवाच

एवं देवर्षिणा पृष्टः प्राचीनो मुनिसत्तमः ।

नारायणो महायोगी प्रतिनन्द्य वचोऽब्रवीत् ॥

श्रीनारायण उवाच

शृणु देवर्षिवर्यात्र जगतस्तत्त्वमुत्तमम् ।

येन ज्ञातेन मर्त्यो हि जायते न जगद्भ्रमे ॥

जगतस्तत्त्वमित्येव देवी प्रोक्ता मयापि हि ।

ऋषिभिर्देवगन्धर्वैरन्यैश्चापि मनीषिभिः ॥

सा जगत्सृजते देवी तया च प्रतिपाल्यते ।

तया च नाश्यते सर्वमिति प्रोक्तं गुणत्रयात् ॥

तस्याः स्वरूपं वक्ष्यामि देव्याः सिद्धर्षिपूजितम् ।

स्मरतां सर्वपापघ्नं कामदं मोक्षदं तथा ॥

मनुः स्वायम्भुवस्त्वाद्यः पद्मपुत्रः प्रतापवान् ।

शतरूपापतिः श्रीमान्सर्वमन्वन्तराधिपः ॥

नारदजी बोले – हे देवदेव! हे महादेव! हे पुराणपुरुषोत्तम! हे जगदाधार! हे सर्वज्ञ! हे श्लाघनीय! हे विपुल सद्गुणोंसे सम्पन्न! इस जगत्का जो आदितत्त्व है, उसे आप यथेच्छरूपसे मुझे बताइये । यह जगत् किससे उत्पन्न होता है, किससे इसकी रक्षा होती है, किसके द्वारा इसका संहार होता है, किस १० समय सभी कर्मोंका फल उदित होता है तथा किस ज्ञानके हो जानेपर इस मोहमयी मायाका नाश हो जाता है? ॥ ९ -११ ॥ ११ हे देव! किस पूजासे, किस जपसे और किस ध्यानसे अन्धकारमें सूर्योदयकी भाँति अपने हृदयकमलमें प्रकाश उत्पन्न होता है? ॥ १२ ॥

१२ हे देव! इन सभी प्रश्नोंका उत्तर पूर्णरूपसे बताइये, जिससे इस संसारके प्राणी अज्ञानान्धकारमय जगत्को शीघ्रता से पार कर लें ॥ १३ ॥

१३ व्यासजी बोले - [ हे राजन्! ] देवर्षि नारदके इस प्रकार पूछनेपर महायोगी, मुनिश्रेष्ठ तथा सनातन पुरुष भगवान् नारायणने साधुवाद देकर यह वचन कहा ॥ १४ ॥

१४ श्रीनारायण बोले- हे देवर्षिश्रेष्ठ! अब आप जगत्का उत्तम तत्त्व सुनिये, जिसे जान लेनेपर मनुष्य सांसारिक भ्रममें नहीं पड़ता ॥ १५ ॥

इस जगत्का एकमात्र तत्त्व भगवती जगदम्बा ही हैं - ऐसा मैं बता चुका हूँ और ऋषियों, देवताओं, १५ गन्धर्वों तथा अन्य मनीषियोंने भी ऐसा ही कहा है ॥ १६ ॥

तीनों गुणों ( सत्त्व, रज, तम ) - से युक्त होनेके १६ कारण वे भगवती ही सम्पूर्ण जगत्की रचना करती हैं, वे ही पालन करती हैं और वे ही संहार करती हैं - ऐसा कहा गया है ॥१७ ॥

१७ अब मैं भगवतीके सिद्ध ऋषिपूजित स्वरूपका वर्णन करूँगा; जो स्मरण करनेवालोंके सभी पापों का नाश करनेवाला, उनके मनोरथोंको पूर्ण करनेवाला १८ तथा उन्हें मोक्ष प्रदान करनेवाला है ॥ १८ ॥

ब्रह्माके पुत्र तथा शतरूपाके पति स्वायम्भुव मनु आदि मनु हैं । उन प्रतापी तथा श्रीमान् मनुको समस्त १ ९ मन्वन्तरोंका अधिपति कहा जाता है ॥१ ९ ॥

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अ ० १ ] अष्टम

स मनुः पितरं देवं प्रजापतिमकल्मषम् ।

भक्त्या पर्यचरत्पूर्वं तमुवाचात्मभूः सुतम् ॥ २०

पुत्र पुत्र त्वया कार्यं देव्याराधनमुत्तमम् ।

तत्प्रसादेन ते तात प्रजासर्गः प्रसिद्ध्यति ॥ २१

एवमुक्तः प्रजास्स्रष्ट्रा मनुः स्वायम्भुवो विराट् ।

जगद्योनिं तदा देवीं तपसातर्पयद् विभुः ॥ २२

तुष्टाव देवीं देवेशीं समाहितमतिः किल ।

आद्यां मायां सर्वशक्तिं सर्वकारणकारणाम् ॥ २३

मनुरुवाच

नमो नमस्ते देवेशि जगत्कारणकारणे ।

शङ्खचक्रगदाहस्ते नारायणहृदाश्रिते ॥ २४

वेदमूर्त्ते जगन्मातः कारणस्थानरूपिणि ।

वेदत्रयप्रमाणज्ञे सर्वदेव शिवे ॥ २५

माहेश्वरि महाभागे महामाये महोदये ।

महादेवप्रियावासे महादेवप्रियंकरि ॥२६

गोपेन्द्रस्य प्रिये ज्येष्ठे महानन्दे महोत्सवे ।

महामारीभयहरे नमो देवादिपूजिते ॥ २७

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।

शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ २८

यतश्चेदं यया विश्वमोतं प्रोतं च सर्वदा ।

चैतन्यमेकमाद्यन्तरहितं तेजसां निधिम् ॥ २ ९

ब्रह्मा यदीक्षणात्सर्वं करोति च हरिः सदा ।

पालयत्यपि विश्वेशः संहर्ता यदनुग्रहात् ॥ ३०

स्कन्ध २१५ पूर्वकालमें एक बार वे स्वायम्भुव मनु अपने पुण्यात्मा पिता प्रजापति ब्रह्माके पास भक्तिपूर्वक सेवामें संलग्न थे । तब ब्रह्माजीने उन पुत्र मनुसे कहा –हे पुत्र! हे पुत्र! तुम्हें भगवतीकी उत्तम आराधना करनी चाहिये । हे तात! उन्हींके अनुग्रहसे प्रजासृष्टिका तुम्हारा कार्य सिद्ध हो सकेगा ॥ २०-२१ ॥ प्रजाओंकी सृष्टि करनेवाले ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर महान् ऐश्वर्यशाली स्वायम्भुव मनु अपनी तपस्यासे जगत्‌की योनिरूपा भगवतीको प्रसन्न करनेमें तत्पर हो गये । उन्होंने एकाग्रचित्त होकर मायास्वरूपिणी, सर्वशक्तिमयी, सभी कारणोंकी भी कारण, देवेश्वरी आद्या भगवतीका स्तवन आरम्भ किया ॥ २२-२३ ॥ मनु बोले – जगत्के कारणोंकी भी कारण, नारायणके हृदयमें विराजमान तथा हाथोंमें शंख-चक्र - गदा धारण करनेवाली हे देवेश्वरि! आपको बार - बार नमस्कार है ॥ २४ ॥

वेदमूर्तिस्वरूपिणी, जगज्जननी, कारणस्थान-स्वरूपा, तीनों वेदोंके प्रमाण जाननेवाली, समस्त देवोंद्वारा नमस्कृत, कल्याणमयी, परमेश्वरी, परमभाग्यशालिनी, अनन्त मायासे सम्पन्न, महान् अभ्युदयवाली, महादेवकी प्रिय आवासरूपिणी, महादेवका प्रिय करनेवाली, गोपेन्द्रकी प्रिया, ज्येष्ठा, महान् आनन्दस्वरूपिणी, महोत्सवा, महामारीके भयका नाश करनेवाली तथा देवता आदिके द्वारा पूजित हे भगवति! आपको नमस्कार है ॥ २५–२७ ॥ सभी मंगलोंका भी मंगल करनेवाली, सबका कल्याण करनेवाली, सभी पुरुषार्थोंको सिद्ध करनेवाली, शरणागतजनोंकी रक्षा करनेवाली तथा तीन नेत्रोंवाली हे गौरि! हे नारायणि! आपको नमस्कार है ॥ २८ ॥

यह जगत् जिनसे उत्पन्न हुआ है तथा जिनसे पूर्णतया ओतप्रोत है; उन भगवतीके चैतन्यमय, अद्वितीय आदि - अन्तसे रहित तथा तेजोंके निधानभूत रूपको नमस्कार है ॥ २ ९ ॥ जिनकी कृपादृष्टिसे ब्रह्मा सम्पूर्ण सृष्टि करते हैं, विष्णु सदा पालन करते हैं और जिनके अनुग्रहसे विश्वेश्वर शिव संहार करते हैं, उन जगदम्बाको | नमस्कार है ॥ ३० ॥

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२१६ मधुकैटभसम्भूतभयार्तः पद्मसम्भवः यस्याः स्तवेन मुमुचे घोरदैत्यभवाम्बुधेः त्वं ह्रीः कीर्तिः स्मृतिः कान्तिः कमला गिरिजा सती दाक्षायणी वेदगर्भा सिद्धिदात्री सदाभया स्तोष्ये त्वां च नमस्यामि पूजयामि जपामि च ध्यायामि भावये वीक्षे श्रोष्ये देवि प्रसीद मे ॥ ब्रह्मा वेदनिधिः कृष्णो लक्ष्म्यावासः पुरन्दरः त्रिलोकाधिपतिः पाशी यादसाम्पतिरुत्तमः कुबेरो निधिनाथोऽभूद्यमो जातः परेतराट् नैर्ऋतो रक्षसां नाथः सोमो जातो ह्यपोमयः त्रिलोकवन्द्ये लोकेशि महामाङ्गल्यरूपिणि नमस्तेऽस्तु पुनर्भूयो जगन्मातर्नमो नमः श्रीनारायण उवाच एवं स्तुता भगवती दुर्गा नारायणी परा प्रसन्ना प्राह देवर्षे ब्रह्मपुत्रमिदं वचः ॥ देव्युवाच वरं वरय राजेन्द्र ब्रह्मपुत्र यदिच्छसि । प्रसन्नाहं स्तवेनात्र भक्त्या चाराधनेन च मनुरुवाच

यदि देवि प्रसन्नासि भक्त्या कारुणिकोत्तमे ।

तदा निर्विघ्नतः सृष्टिः प्रजायाः स्यात्तवाज्ञया ॥

देव्युवाच

प्रजासर्गः प्रभवतु ममानुग्रहतः किल ।

निर्विघ्नेन च राजेन्द्र वृद्धिश्चाप्युत्तरोत्तरम् ॥

यः कश्चित्पठते स्तोत्रं मद्भक्त्या त्वत्कृतं सदा । तेषां विद्या प्रजासिद्धिः कीर्तिः कान्त्युदयः खलु श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १ । मधु - कैटभके द्वारा उत्पन्न किये गये भयसे ॥ ३१ व्याकुल ब्रह्माने जिनकी स्तुति करके भयंकर दैत्यरूपी भव - सागरसे मुक्ति प्राप्त की थी, ( उन भगवतीको । नमस्कार है | ) ॥ ३१ ॥

॥ ३२ आप ह्री, कीर्ति, स्मृति, कान्ति, कमला, गिरिजा, सती, दाक्षायणी, वेदगर्भा, सिद्धिदात्री तथा अभया । नामसे सर्वदा प्रसिद्ध हैं । हे देवि! मैं आपकी स्तुति ३३ करता हूँ, आपको नमस्कार करता हूँ, आपकी पूजा करता हूँ, आपका जप करता हूँ, आपका ध्यान करता । हूँ, आपकी भावना करता हूँ, आपका दर्शन करता हूँ ॥ ३४ तथा आपका चरित्र सुनता हूँ; आप मुझपर प्रसन्न हो जाइये ॥ ३२-३३ ॥ । आपके ही अनुग्रहसे ब्रह्माजी वेदके निधि, || ३५ श्रीहरि लक्ष्मीके स्वामी, इन्द्र त्रिलोकीके अधिपति, वरुण जलचर जन्तुओंके श्रेष्ठ नायक, कुबेर धनके । स्वामी, यमराज प्रेतोंके अधिपति, नैर्ऋत राक्षसोंके ॥ ३६ नाथ और चन्द्रमा रसमय बन गये हैं ॥ ३४-३५ ॥ हे त्रिलोकवन्द्ये! हे लोकेश्वरि! हे महामांगल्यस्वरूपिणि! आपको नमस्कार है । हे । जगन्मातः! आपको बार - बार प्रणाम है ॥ ३६ ॥

३७ श्रीनारायण बोले- हे देवर्षे! इस प्रकार स्तुति करनेपर परारूपा नारायणी भगवती दुर्गा प्रसन्न होकर ब्रह्मा पुत्र मनुसे यह वचन कहने लगीं ॥ ३७ ॥

देवी बोलीं- हे राजेन्द्र! मैं आपके द्वारा ॥ ३८ भक्तिपूर्वक की गयी इस स्तुति तथा आराधनासे प्रसन्न हूँ । अतः हे ब्रह्मपुत्र! आप जो वर चाहते हैं, उसे माँग लें ॥३८ ॥

मनु बोले - – [ भक्तोंपर ] महान् अनुकम्पा करनेवाली हे देवि! यदि आप मेरी भक्तिसे प्रसन्न हैं तो मेरी यही ३ ९ याचना है कि आपकी आज्ञासे प्रजाकी सृष्टि निर्विघ्नतापूर्वक सम्पन्न हो ॥ ३ ९ ॥ देवी बोलीं- हे राजेन्द्र! मेरे अनुग्रहसे प्रजासृष्टि अवश्य सम्पन्न होगी और निर्विघ्नतापूर्वक निरन्तर ४० उसकी वृद्धि भी होती रहेगी ॥४० ॥

जो कोई भी मनुष्य मेरी भक्तिसे युक्त होकर आपके द्वारा की गयी इस स्तुतिका पाठ करेगा; ॥ ४१ । उसकी विद्या, सन्तान - सुख तथा कीर्ति बढ़ेगी तथा

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अ ० २ ] अष्टम

जायन्ते धनधान्यानि शक्तिरप्रहता नृणाम् ।

सर्वत्र विजयो राजन् सुखं शत्रुपरिक्षयः ॥ ४२

श्रीनारायण उवाच

एवं दत्त्वा वरान् देवी मनवे ब्रह्मसूनवे ।

अन्तर्धानं गता चासीत्पश्यतस्तस्य धीमतः ॥ ४३

अथ लब्धवरो राजा ब्रह्मपुत्रः प्रतापवान् ।

ब्रह्माणमब्रवीत्तात स्थानं मे दीयतां रहः ॥ ४४

यत्राहं समधिष्ठाय प्रजाः स्त्रक्ष्यामि पुष्कलाः ।

यक्ष्यामि यज्ञैर्देवेशं तत्समादिश माचिरम् ॥ ४५

इति पुत्रवचः श्रुत्वा प्रजापतिपतिर्विभुः ।

चिन्तयामास सुचिरं कथं कार्यं भवेदिदम् ॥ ४६

सृजतो मे गतः कालो विपुलोऽनन्तसंख्यकः ।

धरा वार्भिः प्लुता मग्ना रसं याताखिलाश्रया ॥ ४७

इदं मच्चिन्तितं कार्यं भगवानादिपूरुषः ।

करिष्यति सहायो मे यदादेशेऽहमाश्रितः ॥ ४८

स्कन्ध २१७ कान्तिका उदय होगा और धन - धान्य निरन्तर बढ़ते रहेंगे । हे राजन्! उन मनुष्योंकी शक्ति कभी निष्फल नहीं होगी, सर्वत्र उनकी विजय होगी, उनके शत्रुओंका नाश होगा और वे सदा सुखी रहेंगे ॥ ४१-४२ ॥ श्रीनारायण बोले- ब्रह्माजीके पुत्र स्वायम्भुव मनुको इस प्रकारके वर देकर उन बुद्धिमान् मनुके देखते - देखते भगवती अन्तर्धान हो गयीं ॥ ४३ ॥

तत्पश्चात् वर प्राप्त करके महान् प्रतापी ब्रह्मापुत्र राजा स्वायम्भुव मनुने ब्रह्मासे कहा — हे तात! आप मुझे कोई ऐसा एकान्त स्थान दीजिये, जहाँ रहकर प्रचुर प्रजाओंकी सृष्टि और यज्ञोंके द्वारा देवेश्वरकी उपासना कर सकूँ । अतः अविलम्ब आदेश दीजिये ॥ ४४-४५ ॥ अपने पुत्रकी यह बात सुनकर प्रजापतियोंके भी स्वामी ऐश्वर्यशाली ब्रह्मा देरतक सोचने लगे कि यह कार्य कैसे सम्पन्न हो । प्रजाकी सृष्टि करते हुए मेरा अनन्तकालका बहुत समय बीत गया । सम्पूर्ण प्राणियोंको आश्रय प्रदान करनेवाली यह पृथ्वी जलके द्वारा आप्लावित हो गयी और जलमय होकर डूब गयी । अतः अब वे भगवान् आदिपुरुष मेरे सहायक बनकर मेरा यह सुचिन्तित कार्य सम्पन्न करेंगे, जिनके आदेशपर मैं आश्रित हूँ ॥ ४६–४८ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामष्टमस्कन्धे भुवनकोशप्रसङ्गे देव्या मनवे वरदानवर्णनं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

अथ द्वितीयोऽध्यायः ब्रह्माजीकी नासिकासे वराहके रूपमें भगवान् श्रीहरिका प्रकट होना और पृथ्वीका श्रीनारायण उवाच एवं मीमांसतस्तस्य पद्मयोनेः मन्वादिभिर्मुनिवरैर्मरीच्याद्यैः ध्यायतस्तस्य नासाग्राद्विरञ्चेः उद्धार करना

परन्तप ।

समन्ततः ॥

सहसानघ । , ब्रह्माजीका उनकी स्तुति करना श्रीनारायण बोले – हे परन्तप! मनु एवं मरीचि आदि श्रेष्ठ मुनियोंके द्वारा चारों ओरसे घिरे १ हुए उन पद्मयोनि ब्रह्माजीके मनमें अनेक प्रकारके विचार उत्पन्न हो रहे थे । हे अनघ! इस प्रकार ध्यान करते हुए उन ब्रह्माजीकी नासिकाके अग्रभागसे अंगुष्ठमात्र परिमाणवाला एक वराह - शिशु सहसा वराहपोतो निरगादेकाङ्गुलप्रमाणतः ॥ २ प्रकट हो गया ॥ १-२ ॥

पृष्ठ 227

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२१८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २

तस्यैव पश्यतः खस्थः क्षणेन किल नारद ।

करिमात्रं प्रववृधे तदद्भुततमं ह्यभूत् ॥

मरीचिमुख्यैर्विप्रेन्द्रैः सनकाद्यैश्च नारद ।

तद् दृष्ट्वा सौकरं रूपं तर्कयामास पद्मभूः ॥

किमेतत्सौकरव्याजं दिव्यं सत्त्वमवस्थितम् ।

अत्याश्चर्यमिदं जातं नासिकाया विनिःसृतम् ॥

दृष्टोऽङ्गुष्ठशिरोमात्रः क्षणाच्छैलेन्द्रसन्निभः ।

आहोस्विद्भगवान्किं वा यज्ञो मे खेदयन्मनः ॥

इति तर्कयतस्तस्य ब्रह्मणः परमात्मनः ।

वराहरूपो भगवाञ्जगर्जाचलसन्निभः ॥

विरञ्चि हर्षयामास संहतांश्च द्विजोत्तमान् ।

स्वगर्जशब्दमात्रेण दिक्प्रान्तमनुनादयन् ॥

ते निशम्य स्वखेदस्य क्षयिष्णुं घुर्धुरस्वनम् ।

जनस्तपः सत्यलोकवासिनोऽमरवर्यकाः ॥

छन्दोमयैः स्तोत्रवरैर्ऋक्सामाथर्वसम्भवैः ।

वचोभिः पुरुषं त्वाद्यं द्विजेन्द्राः पर्यवाकिरन् ॥

तेषां स्तोत्रं निशम्याद्यो भगवान् हरिरीश्वरः ।

कृपावलोकमात्रेणानुगृहीत्वाप आविशत् ॥

तस्यान्तर्विशतः क्रूरसटाघातप्रपीडितः ।

समुद्रोऽथाब्रवीद्देव रक्ष मां शरणार्तिहन् ॥

इत्याकर्ण्य समुद्रोक्तं वचनं हरिरीश्वरः ।

विदारयञ्जलचराञ्जगामान्तर्जले विभुः ॥

हे नारद! उन ब्रह्माजीके देखते - देखते वह ३ वराह - शिशु आकाशमें स्थित होकर क्षणभरमें बढ़कर एक विशालकाय हाथीके आकारका हो गया । वह एक महान् आश्चर्यजनक घटना थी ॥ ३ ॥

हे नारद! उस समय मरीचि आदि प्रधान ४ विप्रवरों तथा सनक आदि ऋषियोंके साथ बैठे ब्रह्माजी वह वराहरूप देखकर मन - ही - मन विचार करने लगे कि सूकरके व्याजसे यह कौन - सा दिव्य ५ प्राणी मेरी नासिकासे निकलकर मेरे सम्मुख उपस्थित हो गया । यह तो महान् आश्चर्य है । अभी - अभी अँगूठेके पोरके बराबर दिखायी पड़नेवाला यह क्षणभरमें ६ ही पर्वतराजके सदृश हो गया है । कहीं ऐसा तो नहीं कि स्वयं यज्ञरूप भगवान् विष्णु ही मेरे मनको खिन्न करते हुए इस रूपमें प्रकट हुए हों ॥ ४-६ ॥ परमात्मा ब्रह्माजी ऐसा सोच ही रहे थे कि उसी ७ समय पर्वतके समान आकृतिवाले वाराहरूपधारी उन भगवान् ने गर्जना की ॥ ७ ॥

उन्होंने अपने गर्जनमात्र से समस्त दिशाओंको ८ निनादित करते हुए ब्रह्माजी तथा वहाँ उपस्थित उत्तम ब्राह्मणोंके समुदायको हर्षित कर दिया ॥ ८ ॥

अपने खेदको नष्ट करनेवाली घुरघुराहटकी ध्वनि सुनकर जनलोक, तपलोक तथा सत्यलोकमें ९ निवास करनेवाले उन श्रेष्ठ देवताओं और विप्रवरोंने छन्दोबद्ध उत्तम स्तोत्रों तथा ऋक्, साम और अथर्ववेदसे सम्भूत पवित्र सूक्तोंसे आदिपुरुषकी स्तुति प्रारम्भ १० कर दी॥९ -१० ॥ उनकी स्तुति सुनकर ऐश्वर्यसम्पन्न वाराहरूप भगवान् श्रीहरि अपनी कृपादृष्टिमात्रसे उन्हें अनुगृहीत ११ करके जलमें प्रविष्ट हो गये ॥ ११ ॥

जलमें प्रविष्ट होते हुए उन भगवान्‌की सटाके आघातसे अत्यन्त पीड़ित समुद्रने उनसे कहा-शरणागतोंके दुःख दूर करनेवाले हे देव! मेरी रक्षा १२ कीजिये ॥ १२ ॥

समुद्र द्वारा कथित यह वचन सुनकर सर्वसमर्थ भगवान् श्रीहरि जलचर जीवोंको इधर - उधर हटाते १३ हुए अथाह जलमें चले गये ॥१३ ॥

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अ ० २ ]

इतस्ततोऽभिधावन्सन् विचिन्वन्पृथिवीं धराम् ।

आघ्रायाघ्राय सर्वेशो धरामासादयच्छनैः ॥

अन्तर्जलगतां भूमिं सर्वसत्त्वाश्रयां तदा ।

भूमिं स देवदेवेशो दंष्ट्रयोदाजहार ताम् ॥

तां समुद्धृत्य दंष्ट्राग्रे यज्ञेशो यज्ञपूरुषः ।

शुशुभे दिग्गजो यद्वदुद्धृत्याथ सुपद्मिनीम् ॥

तं दृष्ट्वा देवदेवेशो विरञ्चिः समनुः स्वराट् ।

तुष्टाव वाग्भिर्देवेशं दंष्ट्रोद्धृतवसुन्धरम् ॥

ब्रह्मोवाच

जितं ते पुण्डरीकाक्ष भक्तानामार्तिनाशन ।

खर्वीकृतसुराधार सर्वकामफलप्रद ॥

इयं च धरणी देव शोभते वसुधा तव ।

पद्मिनीव सुपत्राढ्या मतङ्गजकरोद्धृता ॥

इदं च ते शरीरं वै शोभते भूमिसङ्गमात् ।

उद्धृताम्बुजशुण्डाग्रकरीन्द्रतनुसन्निभम् ॥

नमो नमस्ते देवेश सृष्टिसंहारकारक ।

दानवानां विनाशाय कृतनानाकृते प्रभो ॥

अग्रतश्च नमस्तेऽस्तु पृष्ठतश्च नमो नमः ।

सर्वामराधारभूत बृहद्धाम नमोऽस्तु ते ॥

त्वयाहं च प्रजासर्गे नियुक्तः शक्तिबृंहितः ।

त्वदाज्ञावशतः सर्गं करोमि विकरोमि च ॥

त्वत्सहायेन देवेशा अमराश्च पुरा हरे ।

सुधां विभेजिरे सर्वे यथाकालं यथाबलम् ॥

अष्टम स्कन्ध २१ ९ इधर - उधर भ्रमण करते हुए, पृथ्वीको खोजते १४ हुए उन सर्वेश्वरने धीरे - धीरे सूँघ - सूँघकर अन्तमें सबको धारण करनेवाली उस पृथ्वीको पा लिया ॥ १४ ॥

उस समय अगाध जलके भीतर प्रविष्ट तथा सभी प्राणियोंको आश्रय देनेवाली उस पृथ्वीको १५ देवदेवेश्वर श्रीहरिने अपने दाढ़ोंपर उठा लिया ॥ १५ ॥

उस पृथ्वीको अपने दाढ़पर रखे हुए यज्ञेश्वर तथा यज्ञपुरुष भगवान् श्रीहरि ऐसे सुशोभित हो रहे १६ थे मानो कोई दिग्गज कमलिनीको [ अपने दाँतपर ] उठाये हो ॥ १६ ॥

अपने दाढ़पर पृथ्वीको उठाये हुए उन देवेश्वरको १७ देखकर स्वराट् मनुसहित देवाधिदेव ब्रह्मा उनकी स्तुति करने लगे ॥ १७ ॥

ब्रह्माजी बोले- भक्तोंके कष्ट दूर करनेवाले, देवताओंके आवास स्वर्गको तिरस्कृत करनेवाले १८ तथा समस्त मनोभिलषित फल प्रदान करनेवाले हे कमलनयन! आपकी जय हो ॥ १८ ॥

हे देव! आपके दाढ़पर स्थित यह पृथ्वी उसी भाँति सुशोभित हो रही है, जैसे सुन्दर पत्रोंसे युक्त १ ९ कमलिनी किसी मतवाले हाथीकी सूँड़पर विराजमान हो ॥१ ९ ॥ पृथ्वी के साथ आपका यह शरीर कमलको उखाड़कर उसे अपनी सूँड़के अग्रभागपर धारण किये २० गजराज शरीरकी भाँति शोभायमान हो रहा है ॥ २० ॥

सृष्टि तथा संहार करनेवाले और दानवोंके विनाशके लिये अनेकविध रूप धारण करनेवाले हे २१ देवेश्वर! हे प्रभो! आपको बार- बार नमस्कार है ॥ २१ ॥

सभी देवताओंके आधारभूत! आपको आगेसे

नमस्कार है, आपको पीछेसे बार- बार नमस्कार है ।

हे बृहद्धाम! आपको नमस्कार है ॥ २२ ॥

२२ मैं आपके द्वारा शक्तिशाली बनाकर प्रजा-सृष्टिके कार्यमें नियुक्त किया गया हूँ । आपकी आज्ञाके वशमें होकर ही मैं सृष्टि करता हूँ और उसे २३ बिगाड़ता हूँ ॥ २३ ॥

हे हरे! आपकी सहायतासे ही पूर्व कालमें देवेश्वर तथा देवता बल तथा कालके अनुसार २४ । अमृतके विभाजनमें सफल हुए थे ॥ २४ ॥।

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२२० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २

इन्द्रस्त्रिलोकीसाम्राज्यं लब्धवांस्त्वन्निदेशतः ।

भुनक्ति लक्ष्मीं बहुलां सुरसंघप्रपूजितः ॥ २५

वह्निः पावकतां लब्ध्वा जाठरादिविभेदतः ।

देवासुरमनुष्याणां करोत्याप्यायनं तथा ॥ २६

धर्मराजोऽथ पितॄणामधिपः सर्वकर्मदृक् ।

कर्मणां फलदातासौ त्वन्नियोगादधीश्वरः ॥ २७

नैर्ऋतो रक्षसामीशो यक्षो विघ्नविनाशनः ।

सर्वेषां प्राणिनां कर्मसाक्षी त्वत्तः प्रजायते ॥ २८

वरुणो यादसामीशो लोकपालो जलाधिपः ।

त्वदाज्ञाबलमाश्रित्य लोकपालत्वमागतः ॥ २ ९

वायुर्गन्धवहः सर्वभूतप्राणनकारणम् ।

जातस्तव निदेशेन लोकपालो जगद्गुरुः ॥ ३०

कुबेरः किन्नरादीनां यक्षाणां जीवनाश्रयः ।

त्वदाज्ञान्तर्गतः सर्वलोकपेषु च मान्यभूः ॥ ३१

ईशानः सर्वरुद्राणामीश्वरान्तकरः प्रभुः ।

जातो लोकेशवन्द्योऽसौ सर्वदेवाधिपालकः ॥ ३२

नमस्तुभ्यं भगवते जगदीशाय कुर्महे ।

यस्यांशभागाः सर्वे हि जाता देवाः सहस्रशः ॥ ३३

नारद उवाच

एवं स्तुतो विश्वसृजा भगवानादिपूरुषः ।

लीलावलोकमात्रेणाप्यनुग्रहमवासृजत् ॥३४

तत्रैवाभ्यागतं दैत्यं हिरण्याक्षं महासुरम् ।

रुन्धानमध्वनो भीमं गदयाताडयद्धरिः ॥ ३५

आपके ही निर्देशसे इन्द्र त्रिलोकीका साम्राज्य प्राप्त कर सके हैं, देवसमुदायसे भलीभाँति पूजित होकर विपुल वैभवका उपभोग करते हैं और अग्निदेव दाहकताका गुण पाकर जठराग्नि आदिके भेदसे देवताओं, असुरों और मनुष्योंकी तृप्ति करते हैं ॥ २५-२६ ॥ आपके ही नियोगसे धर्मराज पितरोंके अधिपति, समस्त कर्मोंके साक्षी, कर्मोंका फल देनेवाले तथा अधीश्वर बने हुए हैं ॥ २७ ॥

विघ्नोंको दूर करनेवाले, सभी प्राणियोंके कर्मों के साक्षी और राक्षसोंके ईश्वर यक्षरूप नैर्ऋत भी आपसे ही उत्पन्न हुए हैं ॥ २८ ॥

आपकी ही आज्ञाका आश्रय लेकर लोकपाल वरुणने जलचर जीवोंके स्वामी, जलाधिपति और लोकपालका पद प्राप्त किया है ॥ २ ९ ॥ गन्ध प्रवाहित करनेवाले तथा सभी प्राणियों में प्राण - संचार करनेवाले वायु आपकी ही आज्ञासे लोकपाल और जगद्गुरु हो सके हैं ॥ ३० ॥

किन्नरों और यक्षोंके जीवनके आधारस्वरूप कुबेर आपकी आज्ञाके वशवर्ती रहकर ही समस्त लोकपालोंमें सम्मान प्राप्त करते हैं ॥ ३१ ॥

सभी देवताओंका अन्त करनेवाले, सभी देवोंके अधिपालक तथा तीनों लोकोंके ईश्वरके भी वन्दनीय भगवान् ईशान आपकी ही आज्ञासे सभी रुद्रोंमें प्रधान हो गये हैं ॥ ३२ ॥

आप जगदीश्वर परमात्माको हम नमस्कार करते हैं, जिनके अंशमात्रसे हजारों देवता उत्पन्न हुए हैं ॥ ३३ ॥

नारदजी बोले – इस प्रकार विश्वकी सृष्टि करनेवाले ब्रह्माजीके द्वारा स्तुत होनेपर आदिपुरुष भगवान् श्रीहरि अपनी लीला प्रदर्शित करते हुए उनपर अनुग्रह करनेके लिये तत्पर हो गये ॥ ३४ ॥

भगवान् श्रीहरिने उस समय वहाँ आये हुए महान् असुर तथा भयंकर दैत्य हिरण्याक्षको, जिसने उनका मार्ग रोक रखा था, अपनी गदासे मार | डाला ॥ ३५ ॥

पृष्ठ 230

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अ ० ३ ] अष्टम

तद्रक्तपङ्कदिग्धाङ्गो भगवानादिपूरुषः ।

उद्धृत्य धरणीं देवो दंष्ट्र्या लीलयाप्सु ताम् ॥ ३६

निवेश्य लोकनाथेशो जगाम स्थानमात्मनः ।

एतद्भगवतश्चित्रं धरण्युद्धरणं परम् ॥ ३७

शृणुयाद्यः पुमान् यश्च पठेच्चरितमुत्तमम् ।

सर्वपापविनिर्मुक्तो वैष्णवीं गतिमाप्नुयात् ॥ ३८ ।

स्कन्ध २२१ तत्पश्चात् उसके रक्तपंकसे लिप्त अंगोंवाले आदिपुरुष भगवान् श्रीहरिने पृथ्वीको अपने दाढ़से उठाकर लीलापूर्वक उसे जलके ऊपर स्थापित कर दिया । इसके बाद वे लोकनाथेश्वर भगवान् अपने धामको चले गये । जो मनुष्य पृथ्वीके उद्धारसे सम्बन्धित इस परम विचित्र तथा उत्तम भगवच्चरितको सुनेगा और पढ़ेगा, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर वैष्णवपद प्राप्त करेगा ॥ ३६–३८ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामष्टमस्कन्धे धरण्युद्धारवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥

अथ तृतीयोऽध्यायः महाराज मनुकी श्रीनारायण उवाच

महीं देवः प्रतिष्ठाप्य यथास्थाने च नारद ।

वैकुण्ठलोकमगमद् ब्रह्मोवाच स्वमात्मजम् ॥

स्वायम्भुव महाबाहो पुत्र तेजस्विनांवर ।

स्थाने महीमये तिष्ठ प्रजाः सृज यथोचितम् ॥

देशकालविभागेन यज्ञेशं पुरुषं यज ।

उच्चावचपदार्थैश्च यज्ञसाधनकैर्विभो ॥

धर्ममाचर शास्त्रोक्तं वर्णाश्रमनिबन्धनम् ।

एतेन क्रमयोगेन प्रजावृद्धिर्भविष्यति ॥

पुत्रानुत्पाद्य गुणतः कीर्त्या कान्त्यात्मरूपिणः ।

विद्याविनयसम्पन्नान् सदाचारवतां वरान् ॥

कन्याश्च दत्त्वा गुणवद्यशोवद्भ्यः समाहितः ।

मनः सम्यक् समाधाय प्रधानपुरुषे परे ॥

भक्तिसाधनयोगेन भगवत्परिचर्यया ।

गतिमिष्टां सदा वन्द्यां योगिनां गमिता भवान् ॥

इत्याश्वास्य मनुं पुत्रं पद्मयोनिः प्रजापतिः ।

प्रजासर्गे नियम्यामुं स्वधाम प्रत्यपद्यत ॥

वंश - परम्पराका वर्णन श्रीनारायण बोले- हे नारद! इस प्रकार पृथ्वीको यथास्थान प्रतिष्ठित करके भगवान् जब वैकुण्ठ चले १ गये तब ब्रह्माजीने अपने पुत्रसे कहा- ॥ १ ॥

तेजस्वियोंमें श्रेष्ठ तथा विशाल भुजाओंवाले हे पुत्र स्वायम्भुव! अब तुम उस स्थलमय स्थानपर २ रहकर समुचित रूपसे प्रजाओंकी सृष्टि करो । हे विभो! देश एवं कालके विभागके अनुसार यज्ञके साधनस्वरूप उत्तम तथा मध्यम सामग्रियोंसे यज्ञके ३ स्वामी परम पुरुषका यजन करो; शास्त्रोंमें वर्णित धर्मका आचरण करो और वर्णाश्रम व्यवस्थाका पालन करो । इस क्रमसे प्रवृत्त रहनेपर प्रजा - - वृद्धि ४ होती रहेगी । विद्या - विनयसे सम्पन्न, सदाचारियोंमें श्रेष्ठ और अपने गुण, कीर्ति तथा कान्तिके अनुरूप पुत्र उत्पन्न करके कन्याओंको गुणी तथा यशस्वी ५ पुरुषों को अर्पण करके और एकाग्रचित्त होकर अपने मनको पूर्णरूपसे प्रधान पुरुष परमेश्वरमें स्थित करके ६ भक्तिपूर्वक साधना तथा भगवान्‌की सेवाद्वारा आप योगियोंके लिये सदा वन्दनीय अभीष्ट गतिको प्राप्त कर लोगे ॥ २–७ ॥ ७ [ हे नारद! ] इस प्रकार अपने पुत्र स्वायम्भुव मनुको उपदेश देकर तथा उन्हें प्रजा - - सृष्टिके कार्यमें नियुक्त करके पद्मयोनि ब्रह्माजी अपने धामको ८ | चले गये ॥ ८ ॥