देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 231–240

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 231–240

पृष्ठ 231

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२२२ प्रजाः सृजत पुत्रेति पितुराज्ञां समादधत् स्वायम्भुवः प्रजासर्गमकरोत्पृथिवीपतिः प्रियव्रतोत्तानपादौ मनुपुत्रौ महौजसौ कन्यास्तिस्त्रः प्रसूताश्च तासां नामानि मे शृणु आकूतिः प्रथमा कन्या द्वितीया देवहूतिका तृतीया च प्रसूतिर्हि विख्याता लोकपावनी आकूतिं रुचये प्रादात्कर्दमाय च मध्यमाम् दक्षायादात्प्रसूतिं च यासां लोक इमाः प्रजाः रुचेः प्रजज्ञे भगवान् यज्ञो नामादिपूरुषः आकूत्यां देवहूत्यां च कपिलोऽसौ च कर्दमात् सांख्याचार्यः सर्वलोके विख्यातः कपिलो विभुः दक्षात्प्रसूत्यां कन्याश्च बहुशो जज्ञिरे प्रजाः यासां सन्तानसम्भूता देवतिर्यङ्नरादयः प्रसूता लोकविख्याताः सर्वे सर्गप्रवर्तकाः यज्ञश्च भगवान् स्वायम्भुवमन्वन्तरे विभुः । मनुं ररक्ष रक्षोभ्यो यामैर्देवगणैर्वृतः कपिलोऽपि महायोगी भगवान् स्वाश्रमे स्थितः देवहूत्यै परं ज्ञानं सर्वाविद्यानिवर्तकम् ॥ सविशेषं ध्यानयोगमध्यात्मज्ञाननिश्चयम् । कापिलं शास्त्रमाख्यातं सर्वाज्ञानविनाशनम् उपदिश्य महायोगी स ययौ पुलहाश्रमम् अद्यापि वर्तते देवः सांख्याचार्यो महाशयः यन्नामस्मरणेनापि सांख्ययोगश्च सिद्ध्यति तं वन्दे कपिलं योगाचार्यं सर्ववरप्रदम् श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३ । ' हे पुत्र! प्रजाओंका सृजन करो ' पिताकी इस ॥ ९ आज्ञाको पृथ्वीपति स्वायम्भुव मनुने हृदयमें धारण कर लिया और वे प्रजा - सृष्टि करने लगे ॥ ९ ॥

। मनुसे प्रियव्रत तथा उत्तानपाद नामक दो महान् ॥ १० ओजस्वी पुत्र और तीन कन्याएँ उत्पन्न हुईं, उनके नाम मुझसे सुनिये; पहली कन्या आकूति, दूसरी । देवहूति तथा लोकपावनी तीसरी कन्या प्रसूति नामसे ॥ ११ विख्यात हुई ॥ १०-११ ॥ उन्होंने आकूतिका रुचिके साथ, मध्यम कन्या देवहूतिका कर्दमके साथ और प्रसूतिका विवाह । दक्षप्रजापतिके साथ कर दिया, जिनकी ये प्रजाएँ ॥ १२ लोकमें फैली हुई हैं ॥ १२ ॥

रुचिके द्वारा आकूतिसे यज्ञरूप भगवान् आदिपुरुष । प्रकट हुए । कर्दमऋषिके द्वारा देवहूतिसे कपिल ॥ १३ उत्पन्न हुए । परम ऐश्वर्यशाली उन कपिलमुनिने सभी लोकोंमें सांख्यशास्त्र के आचार्यके रूपमें । प्रसिद्धि प्राप्त की । इसी प्रकार दक्षके द्वारा प्रसूतिसे ॥ १४ सन्तानके रूपमें बहुत - सी कन्याएँ उत्पन्न हुईं; जिनकी सन्तानोंके रूपमें देवता, पशु और मानव आदि उत्पन्न । होकर लोकमें प्रसिद्ध हुए; वे सभी इस सृष्टिके प्रवर्तक हैं ॥ १३ – १५ ॥ ॥ १५ सर्वसमर्थ भगवान् यज्ञपुरुषने याम नामक देवताओंके साथ मिलकर स्वायम्भुव मन्वन्तरमें राक्षसोंसे मनुकी रक्षा की थी ॥ १६ ॥

॥ १६ महान् योगी भगवान् कपिलने अपने आश्रममें रहकर माता देवहूतिको सभी अविद्याओंका नाश । करनेवाले परमज्ञानका उपदेश किया था ॥ १७ ॥

१७ उन्होंने ध्यानयोग तथा अध्यात्मज्ञानके सिद्धान्तका विशेषरूपसे प्रतिपादन किया । समस्त अज्ञानको नष्ट करनेवाला उनका शास्त्र कापिल शास्त्रके रूपमें ॥ १८ प्रसिद्ध हुआ ॥१८ ॥

वे महायोगी कपिल अपनी माताको उपदेश देकर ऋषि पुलहके आश्रमपर चले गये । सांख्यशास्त्रके । आचार्य महान् यशस्वी भगवान् कपिल आज भी ॥ १ ९ विद्यमान हैं ॥ १ ९ ॥ मैं सभी प्रकारके वर प्रदान करनेवाले उन । योगाचार्य कपिलको प्रणाम करता हूँ, जिनके नामके ॥ २० । स्मरणमात्रसे सांख्ययोग सिद्ध हो जाता है ॥ २० ॥

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अ ० ४ ]

एवमुक्तं मनोः कन्यावंशवर्णनमुत्तमम् ।

पठतां शृण्वतां चापि सर्वपापविनाशनम् ॥

अतः परं प्रवक्ष्यामि मनुपुत्रान्वयं शुभम् ।

यदाकर्णनमात्रेण परं पदमवाप्नुयात् ॥

द्वीपवर्षसमुद्रादिव्यवस्था यत्सुतैः कृता । व्यवहारप्रसिद्ध्यर्थं सर्वभूतसुखाप्तये अष्टम स्कन्ध २२३ हे नारद! इस प्रकार मैंने स्वायम्भुव मनुकी २१ कन्याओंके वंशका उत्तम वर्णन कर दिया, जिसके पढ़ने तथा सुननेवालोंके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ २१ ॥

इसके बाद मैं मनु - पुत्रोंके पवित्र वंशका वर्णन करूँगा, जिसके श्रवणमात्रसे मनुष्य परम पद प्राप्त २२ कर लेता है ॥ २२ ॥

उन मनुपुत्रोंने व्यवहारकी सिद्धिके लिये और सभी प्राणियोंकी सुख - प्राप्ति के लिये द्वीप, वर्ष और ॥ २३ । समुद्र आदिकी व्यवस्था की है ॥२३ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामष्टमस्कन्धे भुवनकोशविस्तारे स्वायम्भुवमनुवंशकीर्तनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

अथ महाराज प्रियव्रतका आख्यान श्रीनारायण उवाच मनोः स्वायम्भुवस्यासीज्ज्येष्ठः पुत्रः प्रियव्रतः पितुः सेवापरो नित्यं सत्यधर्मपरायणः प्रजापतेर्दुहितरं सुरूपां विश्वकर्मणः बर्हिष्मतीं चोपयेमे समानां शीलकर्मभिः तस्यां पुत्रान्दश गुणैरन्वितान्भावितात्मनः जनयामास कन्यां चोर्जस्वतीं च यवीयसीम् ॥ आग्नीध्रश्चेध्मजिह्वश्च यज्ञबाहुस्तृतीयकः महावीरश्चतुर्थस्तु पञ्चमो रुक्मशुक्रकः घृतपृष्ठश्च सवनो मेधातिथिरथाष्टमः वीतिहोत्रः कविश्चेति दशैते वह्निनामकाः एतेषां दशपुत्राणां त्रयोऽप्यासन्विरागिणः कविश्च सवनश्चैव महावीर इति त्रयः आत्मविद्यापरिष्णाताः सर्वे ते ह्यूर्ध्वरेतसः आश्रमे परहंसाख्ये निःस्पृहा ह्यभवन्मुदाः अपरस्यां च जायायां त्रयः पुत्राश्च जज्ञिरे उत्तमस्तामसश्चैव रैवतश्चेति विश्रुताः मन्वन्तराधिपतय एते पुत्रा महौजसः चतुर्थोऽध्यायः तथा समुद्र और द्वीपोंकी उत्पत्तिका प्रसंग श्रीनारायण बोले – [ हे नारद! ] स्वायम्भुव । मनुके ज्येष्ठ पुत्र प्रियव्रत थे, वे नित्य पिताकी ॥ १ सेवामें संलग्न रहते थे तथा सत्य - धर्मका पालन करते थे ॥१ ॥

। विश्वकर्मा नामक प्रजापतिकी सुन्दर रूपवाली ॥ २ कन्या बर्हिष्मतीके साथ प्रियव्रतने विवाह किया था, । जो स्वभाव तथा कर्ममें उन्हींके सदृश थी ॥२ ॥

३ प्रियव्रतने दस गुणी पुत्रों । उत्पन्न किया, ॥ ४ आग्नीध्र, । घृतपृष्ठ, सवन, ॥ ५ नामोंसे ये दसों । इन दस उस बर्हिष्मतीसे पवित्र आत्मावाले और ऊर्जस्वती नामक एक कन्याको जो सबसे छोटी थी ॥ ३ ॥

इध्मजिह्व, यज्ञबाहु, महावीर, रुक्मशुक्र, मेधातिथि, वीतिहोत्र और कवि – इन पुत्र अग्निसंज्ञक कहे गये हैं ॥ ४-५ ॥ पुत्रोंमें कवि, सवन और महावीर -ये तीन पुत्र विरागी हो गये । आत्मविद्यामें निष्णात ॥ ६ तथा ब्रह्मचर्यव्रतके पालक वे सभी पुत्र परमहंस । नामक आश्रममें आनन्दपूर्वक स्पृहारहित भावसे रहने ॥ ७ लगे॥६-७ ॥ प्रियव्रतकी दूसरी पत्नीसे तीन पुत्र उत्पन्न हुए; । जो उत्तम, तामस और रैवत- इन नामोंसे विख्यात ॥ ८ हुए । ये महान् प्रतापी पुत्र एक - एक मन्वन्तरके । अधिपति बने ॥ ८३ ॥

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२२४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४ प्रियव्रतः स राजेन्द्रो बुभुजे जगतीमिमाम् ॥ एकादशार्बुदाब्दानामव्याहतबलेन्द्रियः 1 यदा सूर्यः पृथिव्याश्च विभागे प्रथमेऽतपत् ॥

भागे द्वितीये तत्रासीदन्धकारोदयः किल ।

एवं व्यतिकरं राजा विलोक्य मनसा चिरम् ॥

प्रशास्ति मयि भूम्यां च तमः प्रादुर्भवेत्कथम् ।

एवं निवारयिष्यामि भूमौ योगबलेन च ॥

एवं व्यवसितो राजा पुत्रः स्वायम्भुवस्य सः ।

रथेनादित्यवर्णेन सप्तकृत्वः प्रकाशयन् ॥

तस्यापि गच्छतो राज्ञो भूमौ यद्रथनेमयः । पतितास्ते समुद्राख्यां भेजिरे लोकहेतवे जाताः प्रदेशास्ते सप्त द्वीपा भूमौ विभागशः । रथनेमिसमुत्थास्ते परिखाः सप्त सिन्धवः यत आसंस्ततः सप्त भुवो द्वीपा हि ते स्मृताः जम्बुद्वीप: प्लक्षद्वीपः शाल्मलीद्वीपसंज्ञकः कुशद्वीप: क्रौञ्चद्वीपः शाकद्वीपश्च पुष्करः तेषां च परिमाणं तु द्विगुणं चोत्तरोत्तरम् समन्ततश्चोपक्लृप्तं बहिर्भागक्रमेण च क्षारोदेक्षुरसोदौ च सुरोदश्च घृतोदकः क्षीरोदो दधिमण्डोदः शुद्धोदश्चेति ते स्मृताः सप्तैते प्रतिविख्याताः पृथिव्यां सिन्धवस्तदा प्रथमो जम्बुद्वीपाख्यो यः क्षारोदेन वेष्टितः तत्पतिं विदधे राजा पुत्रमाग्नीध्रसंज्ञकम् प्लक्षद्वीपे द्वितीयेऽस्मिन्द्वीपेक्षुरससंप्लुते जातस्तदधिपः प्रयव्रत इध्मादिजिह्वकः शाल्मलीद्वीप एतस्मिन्सुरोदधिपरिप्लुते यज्ञबाहुं तदधिपं करोति स्म प्रियव्रतः अपराजेय बल तथा इन्द्रियोंवाले महाराज प्रियव्रतने इस पृथ्वीपर ग्यारह अर्बुद वर्षोंतक राज्य किया ॥ ९ ३ ॥ एक बारकी बात है - जब सूर्य पृथ्वीके १० प्रथम भागमें प्रकाशित हो रहे थे, तब दूसरे भागमें अन्धकार हो गया । इस प्रकारका संकट देखकर राजाके मनमें तत्काल यह विचार उत्पन्न हुआ कि ११ मेरे शासन करते हुए पृथ्वीपर अन्धकार कैसे उत्पन्न हुआ? मैं अपने योगबल से पृथ्वीपरसे इसका निवारण १२ कर दूँगा ॥ १०–१२ ॥ ऐसा निश्चय करके स्वायम्भुव मनुके पुत्र उन प्रियव्रतने सूर्य - सदृश तेजवाले रथपर आसीन १३ होकर जगत्‌को प्रकाशित करते हुए पृथ्वीकी सात प्रदक्षिणाएँ कीं ॥ १३ ॥

उन राजा प्रियव्रतके परिक्रमण करते समय ॥ १४ पृथ्वीपर जहाँ - जहाँ रथके पहिये पड़े थे, वे स्थान लोक - हितके लिये सात समुद्र बन गये ॥ १४ ॥

पृथ्वीकी परिक्रमाके बीचके स्थल विभागानुसार ॥ १५ सात द्वीपके रूपमें हो गये और रथके पहियोंके । धँससे बने हुए सात समुद्र उनकी परिखा ( खाई ) -॥ १६ के रूपमें हो गये ॥१५ ॥

तभीसे पृथ्वीपर सात द्वीप हो गये; जो जम्बूद्वीप, । प्लक्षद्वीप, शाल्मलिद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप ॥१७ । और पुष्करद्वीपके नामसे प्रसिद्ध हुए । उत्तरोत्तर क्रमसे । उनका परिमाण दुगुना है ॥ १६-१७ ॥ उन द्वीपोंके बाहर चारों ओर विभाग - क्रमसे ॥ १८ समुद्र आप्लावित हैं । वे क्षारोद, इक्षुरसोद, सुरोद, । घृतोद, क्षीरोद, दधिमण्डोद और शुद्धोद नामसे जाने गये । तभी से भूमण्डलपर ये सातों समुद्र विख्यात हो ॥ १ ९ गये ॥ १८-१९ ॥ । क्षारोद समुद्रसे घिरा हुआ जो पहला द्वीप है, ॥ २० वह जम्बूद्वीप नामसे विख्यात है । राजा प्रियव्रतने अपने आग्नीध्र नामक पुत्रको उस द्वीपका स्वामी । बनाया था ॥ २० ॥

॥ २१ प्रियव्रत - पुत्र इध्मजिह्व इक्षुरससे आप्लावित इस । दूसरे प्लक्षद्वीपके शासक हुए ॥ २१ ॥

महाराज प्रियव्रतने सुरोदधिसे आप्लावित शाल्मली ॥ २२ । द्वीपका राजा अपने पुत्र यज्ञबाहुको बनाया ॥ २२ ॥

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अ ० ५ ] कुशद्वीपेऽतिरम्ये च घृतोदेनोपवेष्टिते । हिरण्यरेता राजाभूत्प्रियव्रततनूजनिः क्रौञ्चद्वीपे पञ्चमे तु क्षीरोदपरिसंप्लुते । प्रैयव्रतो घृतपृष्ठः पतिरासीन्महाबलः शाकद्वीपे चारुतरे दधिमण्डोदसंकुले मेधातिथिरभूद्राजा प्रियव्रतसुतो वरः पुष्करद्वीपके शुद्धोदकसिन्धुसमाकुले । वीतिहोत्रो बभूवासौ राजा जनकसम्मतः कन्यामूर्जस्वतीनाम्नीं ददावुशनसे विभुः आसीत्तस्यां देवयानी कन्या काव्यस्य विश्रुता एवं विभज्य पुत्रेभ्यः सप्तद्वीपान् प्रियव्रतः विवेकवशगो भूत्वा योगमार्गाश्रितोऽभवत् अष्टम स्कन्ध २२५ प्रियव्रतके पुत्र हिरण्यरेता घृतोद नामक समुद्रसे ॥ २३ घिरे हुए अति रमणीक कुशद्वीपके राजा हुए ॥ २३ ॥

महान् बलशाली प्रियव्रतपुत्र घृतपृष्ठ क्षीरसागरके द्वारा चारों ओरसे घिरे क्रौंचद्वीप नामक पाँचवें द्वीप ॥ २४ स्वामी हुए ॥२४ ॥

प्रियव्रतके उत्तम पुत्र मेधातिथि दधिमण्डोद । नामक समुद्रसे आवृत तथा अन्य द्वीपोंसे अपेक्षाकृत सुन्दर शाकद्वीप राजा बने ॥ २५ ॥

॥ २५ अपने पिता प्रियव्रतकी अनुमति पाकर पुत्र वीतिहोत्र शुद्धोद नामक समुद्रसे घिरे पुष्करद्वीपके राजा हुए ॥ २६ ॥

॥ २६ महाराज प्रियव्रतने अपनी ऊर्जस्वती नामक कन्या शुक्राचार्यको अर्पित कर दी थी । शुक्राचार्यकी । सर्वविश्रुत कन्या देवयानी उन्हीं ऊर्जस्वतीके गर्भसे ॥ २७ उत्पन्न हुई थी ॥२७ ॥

इस प्रकार अपने पुत्रोंमें सातों द्वीपोंका विभाजन । करके महाराज प्रियव्रतने विवेकसम्पन्न होकर योगमार्गका ॥ २८ आश्रय ग्रहण किया ॥ २८ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामष्टमस्कन्धे भुवनकोशविषये प्रियव्रतवंशवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

अथ पञ्चमोऽध्यायः भूमण्डलपर स्थित विभिन्न श्रीनारायण उवाच

देवर्षे शृणु विस्तारं द्वीपवर्षविभेदतः ।

भूमण्डलस्य सर्वस्य यथा देवप्रकल्पितम् ॥

समासात्सम्प्रवक्ष्यामि नालं विस्तरतः क्वचित् ।

जम्बुद्वीपः प्रथमतः प्रमाणे लक्षयोजनः ॥

विशालो वर्तुलाकारो यथाब्जस्य च कर्णिका ।

नव वर्षाणि यस्मिंश्च नवसाहस्त्रयोजनैः ॥

आयामैः परिसंख्यानि गिरिभिः परितः श्रितैः ।

अष्टाभिर्दीर्घरूपैश्च सुविभक्तानि सर्वतः ॥

1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –8 A द्वीपों और वर्षोंका संक्षिप्त परिचय श्रीनारायण बोले – हे देवर्षे! अब आप द्वीप तथा वर्षके भेदसे देवताओंके द्वारा किये गये सम्पूर्ण १ भूमण्डलके विस्तारके विषयमें सुनिये । इस प्रसंगमें कहीं भी विस्तार न करके मैं संक्षेपमें ही वर्णन करूँगा । सर्वप्रथम एक लाख योजन परिमाणवाले २ जम्बूद्वीपका निर्माण हुआ । यह अति विशाल द्वीप आकृतिमें जैसी कमलकी कर्णिका होती है, वैसा ३ ही गोल है । इस द्वीपमें कुल नौ हजार योजनतक विस्तारवाले नौ वर्ष कहे गये हैं, जो चारों ओर से घिरे हुए अतिविशाल रूपवाले आठ पर्वतोंसे अच्छी तरहसे ४ । विभाजित हैं ॥ १-४ ॥

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२२६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ५

धनुर्वत्संस्थिते ज्ञेये द्वे वर्षे दक्षिणोत्तरे ।

दीर्घाणि तत्र चत्वारि चतुरस्रमिलावृतम् ॥ ५

इलावृतं मध्यवर्षं यन्नाभ्यां सुप्रतिष्ठितः ।

सौवर्णो गिरिराजोऽयं लक्षयोजनमुच्छ्रितः ॥

कर्णिकारूप एवायं भूगोलकमलस्य च ।

मूर्ध्नि द्वात्रिंशत्सहस्रयोजनैर्विततस्त्वयम् ॥ ७

मूले षोडशसाहस्त्रस्तावतान्तर्गतः क्षितौ ।

इलावृतस्योत्तरतो नीलः श्वेतश्च शृङ्गवान् ॥ ८

त्रयो वै गिरयः प्रोक्ता मर्यादावधयस्त्रिषु ।

रम्यकाख्ये तथा वर्षे द्वितीये च हिरण्मये ॥

कुरुवर्षे तृतीये तु मर्यादां व्यञ्जयन्ति ते ।

प्रागायता उभयतः क्षारोदावधयस्तथा ॥ १०

द्विसहस्त्रपृथुतरास्तथा एकैकशः क्रमात् ।

पूर्वात्पूर्वाच्चोत्तरस्यां दशांशादधिकांशतः ॥ ११

दैर्घ्य एव ह्रसन्तीमे नानानदनदीयुताः ।

इलावृताद्दक्षिणतो निषधो हेमकूटकः ॥ १२

हिमालयश्चेति त्रयः प्राग्विस्तीर्णाः सुशोभनाः ।

अयुतोत्सेधभाजस्ते योजनैः परिकीर्तिताः ॥ १३

हरिवर्षं किम्पुरुषं भारतं च यथातथम् ।

विभागात्कथयन्त्येते मर्यादागिरयस्त्रयः ॥ १४

इलावृतात्पश्चिमतो माल्यवान्नामपर्वतः ।

पूर्वेण च ततः श्रीमान् गन्धमादनपर्वतः ॥ १५

आनीलनिषधं त्वेतौ चायतौ द्विसहस्त्रतः ।

योजनैः पृथुतां यातौ मर्यादाकारकौ गिरी ॥ १६

केतुमालाख्यभद्राश्ववर्षयोः प्रथितौ च तौ ।

मन्दरश्च तथा मेरुमन्दरश्च सुपार्श्वकः ॥ १७

कुमुदश्चेति विख्याता गिरयो मेरुपादकाः ।

योजनायुतविस्तारोन्नाहा मेरोश्चतुर्दिशम् ॥ १८

अवष्टम्भकरास्ते तु सर्वतोऽभिविराजिताः । 1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] -8 B धनुषके आकारकी भाँति दो वर्षोंको दक्षिण-उत्तरतक फैला हुआ जानना चाहिये । वहीं चार और विशाल वर्ष हैं । इलावृत नामका वर्ष चौकोर है । यह इलावृत मध्यवर्ष भी कहा जाता है; जिसकी नाभि ( मध्यभाग ) - में एक लाख योजन ऊँचाईवाला सुवर्णमय सुमेरु नामक पर्वतराज विद्यमान है । यह पर्वत ही गोलाकार पृथ्वीरूप कमलकी कर्णिकाके रूपमें स्थित है । इस पर्वतका शिखरभाग बत्तीस हजार योजनके विस्तार में है, इसका मूलभाग ( तलहटी ) सोलह हजार योजनतक पृथ्वीपर फैला है और इतने ही योजनतक पृथ्वीके भीतर प्रविष्ट है ॥ ५ – ७३ ॥ इलावृतके उत्तरमें उसकी सीमाके रूपमें नील, श्वेत और श्रृंगवान् — ये तीन पर्वत कहे गये हैं ॥ ८३ ॥

वे पर्वत रम्यक नामक वर्ष, दूसरे हिरण्मयवर्ष तथा तीसरे कुरुवर्षकी सीमा व्यक्त करते हैं ॥ ९ ३ ॥ वे वर्ष आगेकी ओर फैले हुए हैं । दोनों ओरकी सीमा क्षार समुद्र है । वे दो हजार योजन विस्तारवाले हैं । वे क्रमशः एकसे एक पूर्वकी ओर दशांशमें बढ़ते गये हैं और उत्तरमें एक - एक दशांशका अन्तर चौड़ाईमें कम होता गया है । ये वर्ष अनेक नदियों तथा सरोवरोंसे युक्त हैं ॥ १०-११३ ॥ इलावृतके दक्षिणमें निषध, हेमकूट और हिमालय नामक अत्यन्त सुन्दर तीन पर्वत पूर्वकी ओर फैले हुए हैं । वे दस हजार योजन ऊँचाईवाले कहे जाते हैं । हरिवर्ष, किम्पुरुष और भारतवर्ष – इन तीनोंका विभागानुसार यथार्थ वर्णन किया गया है । ये तीनों पर्वत ( निषध, हेमकूट और हिमालय ) उक्त तीनों वर्षोंकी सीमा हैं ॥ १२–१४ ॥ इलावृतके पश्चिममें माल्यवान् नामक पर्वत और पूर्वी ओर श्रीयुक्त गन्धमादनपर्वत स्थित हैं । ये दोनों पर्वत नीलपर्वतसे लेकर निषधपर्वततक लम्बाई में फैले हैं और चौड़ाईमें इनका विस्तार दो हजार योजन है । वे दोनों पर्वत केतुमाल और भद्राश्व- इन दोनों वर्षोंकी सीमा निश्चित करते हैं ॥ १५-१६ ॥ मन्दर, मेरुमन्दर, सुपार्श्व और कुमुद - – ये चारों पर्वत सुमेरुगिरिके पादके रूपमें कहे गये हैं । दस - दस हजार योजन ऊँचाईवाले ये पर्वत सभी ओरसे सुमेरुको सहारा दिये हुए चारों दिशाओंमें विराजमान हैं ॥ १७-१८३ ॥

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अ ० अष्टम स्कन्ध २२७ एतेषु गिरिषु प्राप्ताः पादपाश्चूतजम्बुनी ॥

कदम्बन्यग्रोध इति चत्वारः पर्वताः स्थिताः ।

केतवो गिरिराजेषु एकादशशतोच्छ्रयाः ॥

तावद्विटपविस्ताराः शताख्यपरिणाहिनः ।

चत्वारश्च ह्रदास्तेषु पयोमध्विक्षुसज्जलाः ॥

यदुपस्पर्शिनो देवा योगैश्वर्याणि विन्दते ।

देवोद्यानानि चत्वारि भवन्ति ललनासुखाः ॥

नन्दनं चैत्ररथकं वैभ्राजं सर्वभद्रकम् ।

येषु स्थित्वामरगणा ललनायूथसंयुताः ॥

उपदेवगणैर्गीतमहिमानो महाशयाः ।

विहरन्ति स्वतन्त्रास्ते यथाकामं यथासुखम् ॥

मन्दरोत्सङ्गसंस्थस्य देवचूतस्य मस्तकात् ।

एकादशशतोच्छ्रायात्फलान्यमृतभाञ्जि च ॥

गिरिकूटप्रमाणानि सुस्वादूनि मृदूनि च ।

तेषां विशीर्यमाणानां फलानां सुरसेन च ॥

अरुणोदसवर्णेन अरुणोदा प्रवर्तते ।

नदी रम्यजला देवदैत्यराजप्रपूजिता ॥

अरुणाख्या महाराज वर्तते पापहारिणी ।

पूजयन्ति च तां देवीं सर्वकामफलप्रदाम् ॥

नानोपहारबलिभिः कल्मषघ्न्यभयप्रदाम् ।

तस्याः कृपावलोकेन क्षेमारोग्यं व्रजन्ति ते ॥

आद्या मायातुलानन्ता पुष्टिरीश्वरमालिनी ।

दुष्टनाशकरी कान्तिदायिनीति स्मृता भुवि ॥

अस्याः पूजाप्रभावेण जाम्बूनदमुदावहत् ॥

१ ९ इन पर्वतोंपर आम, जामुन, कदम्ब तथा बरगद के वृक्ष स्थित हैं, जो इन पर्वतराजोंकी ध्वजाओंके रूपमें विराजमान हैं । इनमेंसे सभी वृक्ष ग्यारह सौ योजन २० ऊँचाईवाले हैं, इतना ही इनकी शाखाओंका विस्तार है और ये सौ योजन मोटाईवाले हैं ॥ १ ९ -२०३ ॥ इन पर्वतोंपर दूध, मधु, ईखके रस और सुस्वादु २१ जलसे परिपूर्ण चार सरोवर हैं; जिनमें स्नान, आचमन आदि करनेवाले देवता योग सम्बन्धी महाशक्तियाँ २२ प्राप्त कर लेते हैं ॥ २१३ ॥

वहाँ स्त्रियोंको सुख प्रदान करनेवाले नन्दन, चैत्ररथ, वैभ्राज और सर्वभद्र नामक चार देवोद्यान हैं । २३ गन्धर्व आदि उपदेवताओंके द्वारा गायी जानेवाली महिमासे युक्त महाभाग देवतागण सुन्दर अंगनाओंके साथ वहाँ निवास करते हैं और स्वतन्त्र होकर २४ सुखपूर्वक यथेच्छ विहार करते हैं ॥ २२ - २४ ॥ मन्दराचलके शिखरपर विराजमान ग्यारह सौ योजन ऊँचे दिव्य आम्रवृक्षके फल अमृतमय २५ पर्वत शिखरके समान विशाल, अत्यन्त स्वादिष्ट तथा कोमल होते हैं । उस वृक्षके ऊँचे शिरोभागसे गिरकर विदीर्ण हुए उन फलोंके सुस्वादु एवं लाल २६ वर्णवाले रससे ' अरुणोदा ' नामक नदी बन गयी । रम्य जलवाली यह नदी बड़े - बड़े देवताओं तथा दैत्योंद्वारा पूजी जाती है ॥ २५–२७ ॥ २७ हे महाराज! उसी पर्वतपर पापनाशिनी भगवती 4 ' अरुणा ' प्रतिष्ठित हैं । लोग अनेकविध उपहारों तथा बलिसे समस्त मनोरथ पूर्ण करनेवाली, पापोंका शमन २८ करनेवाली तथा अभय प्रदान करनेवाली उन भगवतीका पूजन करते हैं । उनकी कृपादृष्टिमात्रसे वे कल्याण २ ९ तथा आरोग्य प्राप्त कर लेते हैं॥२८-२९ ॥ ये आद्या, माया, अतुला, अनन्ता, पुष्टि, ईश्वरमालिनी, दुष्टनाशकरी और कान्तिदायिनी— ३० इन नामोंसे भूमण्डलपर विख्यात हैं । इन्हींके पूजा - प्रभावसे जाम्बूनद नामक सुवर्ण उत्पन्न हुआ ३१ | है ॥ ३०-३१ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामष्टमस्कन्धे भुवनलोकवर्णने द्वीपवर्षविभेदवर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –8C

पृष्ठ 237

देवी भागवत उत्तरार्द्ध, पृष्ठ 237 का मूल पृष्ठ
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२२८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ६ अथ भूमण्डलके विभिन्न पर्वतोंसे श्रीनारायण उवाच

अरुणोदा नदी या तु मया प्रोक्ता च नारद ।

मन्दरान्निपतन्ती सा पूर्वेणेलावृतं प्लवेत् ॥

यज्जोषणाद्भवान्याश्चानुचरीणां स्त्रियामपि ।

यक्षगन्धर्वपत्नीनां देहगन्धवहोनिलः ॥

वासयत्यभितो भूमिं दशयोजनसंख्यया ।

एवं जम्बूफलानां च तुङ्गदेशनिपातनात् ॥

विशीर्यतामनस्थीनां कुञ्जराङ्गप्रमाणिनाम् ।

रसेन च नदी जम्बूनाम्नी मेर्वाख्यमन्दरात् ॥

पतन्ती भूमिभागे च दक्षिणेलावृतं गता ।

देवी जम्बूफलास्वादतुष्टा जम्ब्वादिनी स्मृता ॥

तत्रत्यानां च लोकानां देवनागर्षिरक्षसाम् ।

पूजनीयपदा मान्या सर्वभूतदयाकरी ॥

पावनी पापिनां रोगनाशिनी स्मरतामपि ।

कीर्तिता विघ्नसंहर्त्री माननीया दिवौकसाम् ॥

कोकिलाक्षी कामकला करुणा कामपूजिता ।

कठोरविग्रहा धन्या नाकिमान्या गभस्तिनी ॥

एभिर्नामपदैः कामं जपनीया सदा नृणाम् ।

जम्बूनदीरोधसोर्या मृत्तिकातीरवर्तिनी ॥

जम्बूरसेनानुविद्ध्यमाना वाय्वर्कयोगतः ।

विद्याधरामरस्त्रीणां भूषणं विविधं महत् ॥

जाम्बूनदं सुवर्णं च प्रोक्तं देवविनिर्मितम् ।

यत्सुवर्णं च विबुधा योषिद्भिः कामुकाः सदा ॥

मुकुटं कटिसूत्रं च केयूरादीन्प्रकुर्वते । 1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –8 D षष्ठोऽध्यायः निकलनेवाली विभिन्न नदियोंका वर्णन श्रीनारायण बोले- हे नारद! मैंने अरुणोदा नामक जिस नदीका वर्णन किया है, वह मन्दरपर्वतसे १ निकलकर इलावृतके पूर्व भागमें प्रवाहित होती है ॥ १ ॥

भगवतीकी अनुचरी स्त्रियों तथा यक्षों और गन्धर्वोंकी पत्नियोंके अरुणोदाके जलमें स्नान करनेसे २ उनके शरीरकी दिव्य गन्धसे उसका जल सुवासित हो जाता है । उस सुगन्धको लेकर बहता हुआ पवन चारों ओरकी दशयोजनपर्यन्त भूमिको सुगन्धित कर ३ देता है ॥ २३ ॥

इसी प्रकार पर्वतकी अधिक ऊँचाईसे गिरनेके कारण हाथी के शरीरके समान विशाल आकारवाले ४ गुठलीरहित जम्बू - फलोंके फटनेसे निकले हुए रसके द्वारा जम्बू नामक नदी बन गयी । वह मेरुमन्दरसे पृथ्वीतलपर गिरती हुई इलावृतवर्षसे दक्षिणकी ओर प्रवाहित होने लगी ॥ ३-४३ ॥ ५ जम्बूफलके स्वादसे सन्तुष्ट होनेवाली भगवती ' जम्ब्वादिनी ' नामसे विख्यात हैं । वहाँके देवता, नाग, ऋषि, राक्षस तथा अन्य लोगोंके लिये सभी ६ प्राणियोंपर दया करनेवाली ये भगवती मान्य तथा पूजा योग्य हैं । ये स्मरण करनेवाले पापियोंको पवित्र कर देनेवाली तथा उनके रोगोंको नष्ट ७ कर देनेवाली हैं । देवताओंकी भी वन्दनीया इन भगवतीका कीर्तन करनेसे विघ्नोंका नाश हो जाता है । कोकिलाक्षी, कामकला, करुणा, कामपूजिता, ८ कठोरविग्रहा, धन्या, नाकिमान्या, गभस्तिनी — इन नामोंका उच्चारण करके मनुष्योंको सदा देवीका जप करना चाहिये ॥ ५–८३ ॥ ९ जम्बूनदी तटों पर विद्यमान जो मिट्टी है, वह जम्बू- 1- रससे सिक्त होकर और पुनः सूर्य तथा वायुके सम्पर्क से सुवर्ण बन जाती है । उसीसे विद्याधरों और १० देवताओंकी स्त्रियोंके अनेक उत्तम आभूषण बने हैं, वह जाम्बूनद सुवर्ण देवनिर्मित कहा गया है । सदा अपनी स्त्रियोंकी कामना पूर्ण करनेवाले देवतागण ११ उसी सुवर्णसे मुकुट, करधनी और केयूर आदिका निर्माण करते हैं॥९ –११३ ॥

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अ ० ६ ] अष्टम महाकदम्बः सम्प्रोक्तः सुपार्श्वगिरिसंस्थितः ॥ १२

तस्य कोटरदेशेभ्यः पञ्च धाराश्च याः स्मृताः ।

सुपार्श्वगिरिमूर्नीह पतन्त्येता भुवं गताः ॥ १३

मधुधाराः पञ्च तास्तु पश्चिमेलावृतं प्लुताः ।

याश्चोपभुज्यमानानां देवानां मुखगन्धभृत् ॥ १४

वायुः समन्ततोऽगच्छञ्छतयोजनवासनः ।

धारेश्वरी महादेवी भक्तानां कार्यकारिणी ॥ १५

देवपूज्या महोत्साहा कालरूपा महानना ।

वसते कर्मफलदा कान्तारग्रहणेश्वरी ॥ १६

करालदेहा कालाङ्गी कामकोटिप्रवर्तिनी ।

इत्येतैर्नामभिः पूज्या देवी सर्वसुरेश्वरी ॥ १७

एवं कुमुदरूढो यो नाम्ना शतबलो वटः ।

तत्स्कन्धेभ्योऽधोमुखाश्च नदाः कुमुदमूर्धतः ॥ १८

पयोदधिमधुघृतगुडान्नाद्यम्बरादिभिः I शय्यासनाद्याभरणैः सर्वे कामदुघाश्च ते ॥ १ ९

उत्तरेणेलावृतं ते प्लावयन्ति समन्ततः ।

मीनाक्षी तत्तले देवी देवासुरनिषेविता ॥ २०

नीलाम्बरा रौद्रमुखी नीलालकयुता च सा ।

नाकिनां देवसंघानां फलदा वरदा च सा ॥ २१

अतिमान्यातिपूज्या च मत्तमातङ्गगामिनी ।

मदनोन्मादिनी मानप्रिया मानप्रियान्तरा ॥ २२

मारवेगधरा मारपूजिता मारमादिनी ।

मयूरवरशोभाढ्या शिखिवाहनगर्भभूः ॥ २३

एभिर्नामपदैर्वन्द्या देवी सा मीनलोचना ।

जपतां स्मरतां मानदात्री चेश्वरसङ्गिनी ॥ २४

तेषां नदानां पानीयपानानुगतचेतसाम् ।

प्रजानां न कदाचित्स्याद्वलीपलितलक्षणम् ॥ २५

क्लमस्वेदादिदौर्गन्ध्यं जरामयमृतिभ्रमाः ।

शीतोष्णवातवैवर्ण्यमुखोपप्लवसंचयाः ॥ २६

स्कन्ध २२ ९ कदम्बका एक विशाल वृक्ष सुपार्श्वपर्वतपर विराजमान बताया गया है । उसके कोटरोंसे जो पाँच धाराएँ निकली हुई बतायी गयी हैं, वे सुपार्श्वगिरिके शिखरपर गिरकर पृथ्वीतलपर आयीं । वे पाँचों मधुधाराएँ इलावृतवर्षके पश्चिमभागमें प्रवाहित होती हैं । इनका सेवन करनेवाले देवताओंके मुखकी सुगन्धि लेकर प्रवाहित होता हुआ पवन चारों ओर सौ योजनतककी भूमिको सुवासित कर देता है ॥ १२ – १४३ ॥ भक्तोंका काम सिद्ध करनेवाली महादेवी धारेश्वरी वहाँ वास करती हैं । देवपूज्या, महोत्साहा, कालरूपा, महानना, कर्मफलदा, कान्तारग्रहणेश्वरी, करालदेहा, कालांगी और कामकोटिप्रवर्तिनी - इन नामोंसे सर्वसुरेश्वरी भगवतीकी पूजा करनी चाहिये ॥ १५-१७ ॥ इसी प्रकार कुमुदपर्वतके ऊपर शतबल नामसे प्रसिद्ध जो वट - वृक्ष है, उसकी शाखाओंसे नीचे गिरते हुए रससे बहुतसे नद हो गये हैं; कुमुदगिरिके शिखरसे नीचे की ओर गिरनेवाले वे सभी नद दूध, दही, मधु, घी, गुड़, अन्न, वस्त्र, शय्या, आसन तथा आभूषण आदिके द्वारा सबके मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले हैं । वे इलावृतवर्षके उत्तरभागकी सम्पूर्ण भूमिको आप्लावित किये रहते हैं ॥ १८- १ ९ ३ ॥ इन्हींके तटपर देवताओं और दानवोंद्वारा नित्य उपासित भगवती मीनाक्षी प्रतिष्ठित हैं । नीलाम्बरा, रौद्रमुखी, नीलालकयुता, अतिमान्या, अतिपूज्या, मत्तमातंगगामिनी, मदनोन्मादिनी, मानप्रिया, मानप्रियान्तरा, मारवेगधरा, मारपूजिता, मारमादिनी, मयूरवरशोभाढ्या तथा शिखिवाहनगर्भभू - इन नामोंसे युक्त पदोंके द्वारा स्वर्गवासी देवताओंको अभीष्ट फल तथा वर प्रदान करनेवाली देवीकी वन्दना करनी चाहिये । सदा परब्रह्मसे सांनिध्य रखनेवाली वे भगवती मीनाक्षी जप तथा ध्यान करनेवाले प्राणियोंको सम्मान प्रदान करती | हैं ॥ २०–२४ ॥ उन नदोंका जल पीनेसे चैतन्य प्राप्त करनेवाले प्राणियोंके शरीरपर झुर्रियों तथा केशोंकी सफेदीके लक्षण कभी नहीं दिखायी पड़ते । थकान, पसीने आदिमें दुर्गन्धि, जरा, रोग, भय, मृत्यु, भ्रम, शीत एवं | उष्ण वायु - विकार, मुखपर उदासी एवं अन्य आपत्तियाँ

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२३० नापदश्चैव जायन्ते यावज्जीवं सुखं भवेत् । नैरन्तर्येण तत्स्याद्वै सुखं निरतिशायकम् तत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि सन्निवेशं च तद्गिरेः । सुवर्णमयनाम्नो वै सुमेरोः पर्वताः पृथक्

गिरयो विंशतिपराः कर्णिकाया इवेह ते ।

केसरीभूय सर्वेऽपि मेरोर्मूलविभागके ॥

परितश्चोपक्लृप्तास्ते तेषां नामानि शृण्वतः ।

कुरङ्गः कुरगश्चैव कुसुम्भोऽथो विकङ्कतः ॥

त्रिकूटः शिशिरश्चैव पतङ्गो रुचकस्तथा ।

निषधश्च शिनीवासः कपिलः शङ्ख एव च ॥

वैदूर्यश्चारुधिश्चैव हंसो ऋषभ एव च । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ७ कभी नहीं उत्पन्न होती हैं और जीवनपर्यन्त प्राणीको ॥ २७ सुख मिलता है और वह सुख पूर्णरूपसे निरन्तर

बढ़ता ही रहता है । २५-२७ ॥

॥ २८ हे नारद! अब मैं उस सुमेरु नामक सुवर्णमय पर्वतके अवान्तर पर्वतोंका वर्णन करूँगा । इस २ ९ पर्वतसे पृथक् बीस पर्वत हैं, जो कर्णिकाके समान हैं । उनके मूलभागमें सुमेरुपर्वत है और उसको ३० चारों ओरसे घेरकर वे सभी पर्वत पुष्पके केसरके रूपमें विराजमान हैं । उनके नाम ये हैं- शृण्वत, ३१ कुरंग, कुरग, कुसुम्भ, विकंकत, त्रिकूट, शिशिर, पतंग, रुचक, निषध, शिनीवास, कपिल, शंख, वैदूर्य, नागः कालञ्जरश्चैव नारदश्चेति विंशतिः ॥ ३२ अरुधि, हंस, ऋषभ, नाग, कालंजर और नारद - ये बीस पर्वत हैं ॥ २८–३२ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामष्टमस्कन्धे भुवनकोशवर्णने-अरुणोदादिनदीनां निसर्गस्थानवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥

अथ सप्तमोऽध्यायः सुमेरुपर्वतका वर्णन तथा गंगावतरणका आख्यान श्रीनारायण उवाच गिरी मेरुं च पूर्वेण द्वौ चाष्टादशयोजनैः सहस्त्रैरायतौ चोदग्द्विसहस्त्रं पृथूच्चकौ जठरो देवकूटश्च तावेतौ गिरिवर्यकौ मेरो: पश्चिमतोऽद्री द्वौ पवमानस्तथापरः पारियात्रश्च तौ तावद्विख्यातौ तुङ्गविस्तरौ मेरोर्दक्षिणतः ख्यातौ कैलासकरवीरकौ प्रागायतौ पूर्ववृत्तौ महापर्वतराजकौ । एवं चोत्तरतो मेरोस्त्रिशृङ्गमकरौ गिरी एतैश्चाद्रिवरैरष्टसंख्यैः परिवृतो गिरिः । सुमेरुः काञ्चनगिरिः परिभ्राजन् रविर्यथा मेरोर्मूर्धनि धातुर्हि पुरी पङ्कजजन्मनः । मध्यतश्चोपक्लृप्तेयं दशसाहस्त्रयोजनैः श्रीनारायण बोले - – हे नारद! सुमेरुगिरिके । पूर्वमें अठारह हजार योजन लम्बाई तथा दो हजार ॥ १ योजन चौड़ाई तथा ऊँचाईवाले दो पर्वत हैं । वे दोनों श्रेष्ठ पर्वत जठर और देवकूट हैं । सुमेरुके पश्चिममें । भी दो पर्वत हैं; उनमें पहला पवमान और दूसरा ॥ २ पारियात्र नामसे विख्यात है । वे दोनों पर्वत जठर तथा देवकूटके ही समान ऊँचाई तथा विस्तारवाले कहे गये । हैं । सुमेरुके दक्षिणमें कैलास और करवीर नामसे ॥ ३ विख्यात दो पर्वत हैं; ये दोनों विशाल पर्वतराज पहलेके ही समान लम्बाई तथा चौड़ाईवाले हैं । इसी ॥ ४ प्रकार सुमेरुके उत्तरमें त्रिशृंग और मकर नामक दो पर्वत स्थित हैं । सूर्यकी भाँति सदा प्रकाश करता हुआ यह सुवर्णमय सुमेरुपर्वत इन्हीं आठों पर्वतश्रेष्ठोंसे ॥ ५ चारों तरफसे घिरा हुआ है॥१–५ ॥ इस सुमेरुपर्वतके शिखरपर ठीक मध्यमें पद्मयोनि ब्रह्माजीकी पुरी है । यह दस हजार योजनके विस्तारमें ॥ ६ । विराजमान है ॥ ६ ॥

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अ ० ७ ] अष्टम

समानचतुरस्त्रां च शातकौम्भमयीं पुरीम् ।

वर्णयन्ति महात्मानः परावरविदो बुधाः ॥ ७

तां पुरीमनुलोकानामष्टानामीशिषां पराः ।

पुर्यः प्रख्यातसौवर्णरूपास्ताश्च यथादिशम् ॥ ८

यथारूपं सार्धनेत्रसहस्त्रप्रमिताः कृताः ।

मेरोर्नव पुराणि स्युर्मनोवत्यमरावती ॥ ९

तेजोवती संयमनी तथा कृष्णाङ्गनापरा ।

श्रद्धावती गन्धवती तथा चान्या महोदया ॥ १०

यशोवती च ब्रह्मेन्द्रवह्न्यादीनां यथाक्रमम् ।

तत्रैव यज्ञलिङ्गस्य विष्णोर्भगवतो विभोः ॥ ११ ।

वामपादाङ्गुष्ठनखनिर्भिन्नस्य च नारद ।

अण्डोर्ध्वभागरन्ध्रस्य मध्यात्संविशती दिवः ॥ १२

मूर्धन्यवततारेयं गङ्गा संविशती विभो ।

लोकानामखिलानां च पापहारिजलाकुला ॥ १३

इयं च साक्षाद्भगवत्पदी लोकेषु विश्रुता ।

कालेन महता सा तु युगसाहस्रकेण तु ॥ १४

दिवो मूर्धानमागत्य देवी देवनदीश्वरी ।

यत्तद्विष्णुपदं नाम स्थानं त्रैलोक्यविश्रुतम् ॥ १५

औत्तानपादिर्यत्रास्ते ध्रुवः परमपावनः ।

भगवत्पादयुगलं पद्मकोशरजो दधत् ॥ १६

अद्याप्यास्ते स राजर्षिः पदवीमचलां श्रितः ।

तत्र सप्तर्षयस्तस्य प्रभावज्ञा महाशयाः ॥ १७

प्रदक्षिणं प्रक्रमन्ति सर्वलोकहितेप्सवः ।

आत्यन्तिकी सिद्धिरियं तपतां सिद्धिदायिनी ॥ १८

आद्रियन्ते च शिरसा जटाजूटोषितेन च ।

ततो विष्णुपदाद्देवी नैकसाहस्रकोटिभिः ॥ १ ९

स्कन्ध २३१ तत्त्वज्ञानी विद्वान् महात्मागण समचौकोर इस स्वर्णमयी पुरीके विषयमें कहते हैं कि उस पुरीके चारों ओर आठ लोकपालोंकी श्रेष्ठ पुरियाँ प्रसिद्ध हैं । सुवर्णमयी वे पुरियाँ दिशा तथा रूपके अनुसार स्थापित हैं । ढाई हजार योजनके विस्तारमें इनकी रचना की गयी है ॥ ७-८३ ॥ इस प्रकार सुमेरुपर्वतपर ब्रह्मा तथा इन्द्र, अग्नि आदि लोकपालोंकी क्रमशः मनोवती, अमरावती, तेजोवती, संयमनी, कृष्णांगना, श्रद्धावती, गन्धवती, महोदया और यशोवती - ये नौ पुरियाँ प्रतिष्ठित हैं ॥ ९ -१०३ ॥ हे नारद! यज्ञमूर्ति सर्वव्यापी भगवान् विष्णुके बायें पैरके अँगूठेके नखसे आघातके कारण ब्रह्माण्डके ऊपरी भागमें हुए छिद्रके मध्यसे गंगा प्रकट हुईं और हे विभो! वे स्वर्गके शिखरपर आकर रुक गयीं । सम्पूर्ण प्राणियोंके पापोंका नाश करनेवाले जलसे परिपूर्ण ये गंगा संसारमें साक्षात् विष्णुपदीके नामसे प्रसिद्ध हैं ॥११ – १३३ ॥ हजार युगका अत्यन्त दीर्घ समय बीतने पर सम्पूर्ण देवनदियोंकी स्वामिनी वे भगवती गंगा स्वर्गके शिखरपर जहाँ आयी थीं, वह स्थान तीनों लोकमें ' विष्णुपद ' नामसे विख्यात है । यह वही स्थान है, जहाँ उत्तानपादके पुत्र परम पवित्र ध्रुव रहते हैं । भगवान्के दोनों चरणकमलोंके पवित्र पराग धारण किये हुए वे परम पुण्यात्मा राजर्षि ध्रुव अचल पदवीका आश्रय लेकर आज भी वहीं पर विराजमान हैं ॥ १४–१६३ ॥ गंगाके प्रवाहको जाननेवाले तथा सभी प्राणियोंके हितकी कामना करनेवाले उदारहृदय सप्तर्षि भी वहीं रहते हैं और उनकी प्रदक्षिणा किया करते हैं ॥ १७३ ॥

आत्यन्तिकी सिद्धि ( मोक्ष ) - स्वरूपिणी ये गंगा तपस्या करनेवाले पुरुषोंको सिद्धि देनेवाली हैं - ऐसा समझकर सिरपर जटाजूट धारण करनेवाले वे सिद्धगण उनमें निरन्तर स्नान करते रहते हैं ॥ १८३ ॥

तत्पश्चात् वे गंगा विष्णुपदसे चलकर हजारों-करोड़ों विमानोंसे व्याप्त देवमार्गपर अवतरित होती