देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 241–250

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 241–250

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२३२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ७ विमानैराकुले देवयानेऽवतरती च सा । हुईं चन्द्रमण्डलको आप्लावित करके ब्रह्मलोक में चन्द्रमण्डलमाप्लाव्य पतन्ती ब्रह्मसद्मनि ॥ २० | पहुँचीं । हे नारद! वहाँ ब्रह्मलोकमें वे देवी गंगा चार चतुर्धा भिद्यमाना सा ब्रह्मलोके च नारद । भागों में विभक्त होकर चार नामोंसे चारों दिशाओंमें प्रवाहित हुईं और अन्तमें वे नद तथा नदियोंके स्वामी चतुर्भिर्नामभिर्देवी चतुर्दिशमभिसृता ॥ २१ समुद्रमें मिल गयीं ॥ १ ९ - २१३ ॥ सरितां च नदीनां च पतिमेवान्वपद्यत सीता चालकनन्दा च चतुर्भद्रेति नामभिः सीता च ब्रह्मसदनाच्छिखरेभ्यः क्षमाभृताम् । केसराभिधनाम्ना च प्रस्त्रवन्ती च स्वर्णदी

गन्धमादनमूर्ध्नाह पतिता पापहारिणी ।

अन्तरेण तु भद्राश्ववर्षं प्राच्यां समागता ॥

क्षारोदधिं गता सा तु नदी देवपूजिता ।

ततो माल्यवतः शृङ्गाद् द्वितीया परिनिर्गता ॥

ततो वेगवती भूत्वा केतुमालं समागता ।

चक्षुर्नाम्नी देवनदी प्रतीच्यां दिश्युपागता ॥

सरितां पतिमाविष्टा सा गङ्गा देववन्दिता ।

ततस्तृतीया धारा तु नाम्ना ख्याता च नारद ॥

पुण्या चालकनन्दा वै दक्षिणेनाब्जभूपदात् ।

वनानि गिरिकूटानि समतिक्रम्य चागता ॥

हेमकूटं गिरिवरं प्राप्तातोऽपीह निर्गता ।

अतिवेगवती भूत्वा भारतं चागतापरा ॥

दक्षिणं जलधिं प्राप्ता तृतीया सा सरिद्वरा ।

यस्याः स्नानाय सरतां मनुजानां पदे पदे ॥

राजसूयाश्वमेधादि फलं तु न हि दुर्लभम् ।

ततश्चतुर्थी धारा तु शृङ्गवत्पर्वतात्पुनः ॥

भद्राभिधा संस्रवन्ती कुरून्सन्तर्प्य चोत्तरान् ।

समुद्रं समनुप्राप्ता गङ्गा त्रैलोक्यपावनी ॥

अन्ये नदाश्च नद्यश्च वर्षे वर्षेऽपि सन्ति हि ।

बहुशो मेरुमन्दारप्रसूताश्चैव नारद ॥

। सीता, चतु: ( चक्षु ), अलकनन्दा और भद्रा-॥ २२ इन चार नामोंसे वे प्रसिद्ध हैं । उनमेंसे सभी पापों का शमन करनेवाली सीता नामसे विख्यात गंगा ब्रह्मलोकसे उतरकर केसर नामक पर्वतोंके ॥ २३ शिखरसे गिरती हुईं गन्धमादनपर्वतके शिखरपर गिरीं और वहाँसे भद्राश्ववर्षके बीचसे होती हुई पूर्व दिशामें चली गयीं । इसके बाद देवताओंसे २४ पूजित वे देवनदी गंगा क्षारोदधिमें जाकर मिल गयीं ॥ २२–२४३ ॥ २५ तदनन्तर चक्षु नामवाली दूसरी गंगा माल्यवान्पर्वतके शिखरसे निकलीं और अत्यन्त वेगके साथ बहती हुई मालवर्षमें आ गयीं । पुनः देववन्द्या वे देवनदी २६ गंगा पश्चिम दिशामें आ गयीं और अन्तमें सागरमें समाविष्ट हो गयीं ॥ २५-२६३ ॥ २७ हे नारद! तीसरी वह पुण्यमयी धारा अलकनन्दा नामसे विख्यात है । वह ब्रह्मलोकके दक्षिणसे होकर बहुत - से वनों और पर्वत शिखरोंको पार करके २८ पर्वत श्रेष्ठ हेमकूटपर पहुँची । यहाँसे भी निकलकर वह अत्यन्त वेगके साथ बहती हुई भारतवर्ष में आ गयी । इसके बाद नदियोंमें श्रेष्ठ अलकनन्दा नामक २ ९ वह तीसरी नदी दक्षिण समुद्रमें मिल गयी, जिसमें स्नानके लिये प्रस्थान करनेवाले मनुष्योंको पग - पगपर ३० राजसूय तथा अश्वमेध आदिका फल भी दुर्लभ नहीं है ॥ २७–३० ॥ तदनन्तर भद्रा नामक चौथी धारा श्रृंगवान्पर्वतसे ३१ निकली । तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाली यह गंगा उत्तर कुरुप्रदेशोंको भलीभाँति तृप्त करती हुई अन्तमें ३२ समुद्रमें मिल गयी ॥ ३१-३२ ॥ हे नारद! अन्य बहुतसे नद और नदियाँ प्रत्येक वर्षमें हैं । प्रायः ये सभी मेरु और मन्दारपर्वतसे ही ३३ निकले हुए हैं ॥ ३३ ॥

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अ ० ८ ] तत्रापि भारतं वर्षं कर्मक्षेत्रमुशन्ति हि अन्यानि चाष्टवर्षाणि भौमस्वर्गप्रदानि च स्वर्गिणां पुण्यशेषस्य भोगस्थानानि नारद पुरुषाणां चायुतायुर्वज्राङ्गा देवसन्निभाः पुरुषा नागसाहस्त्रैर्दशभिः परिकल्पिताः महासौरतसन्तुष्टाः कलत्राढ्याः सुखान्विताः एकवर्षोनके चायुष्याप्तगर्भाः स्त्रियोऽपि हि त्रेतायुगसमः कालो वर्तते सर्वदैव हि अष्टम स्कन्ध २३३ । उन नौ वर्षोंमें भारतवर्ष कर्मक्षेत्र कहा गया है I ॥ ३४ अन्य आठ वर्ष पृथ्वीपर रहते हुए भी स्वर्ग - भोग प्रदान करनेवाले हैं । हे नारद! ये वर्ष स्वर्गमें रहनेवाले । पुरुषोंके शेष पुण्यों को भोगनेके स्थान हैं । देवताओंके ॥ ३५ समान स्वरूप तथा वज्रतुल्य अंगोंवाले उन पुरुषोंकी आयु दस हजार वर्ष होती है । दस हजार हाथियोंके । बलसे सम्पन्न वे पुरुष स्त्रियोंसे समन्वित, यथेच्छ ॥ ३६ कामक्रीडासे सन्तुष्ट तथा सुखी रहते हैं । वहाँकी स्त्रियाँ अपनी आयु समाप्त होनेके एक वर्ष पूर्वतक । गर्भ धारण करती हैं T । वहाँपर सदा त्रेतायुगके समान ॥ ३७ । समय विद्यमान रहता है ॥३४–३७ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामष्टमस्कन्धे भुवनकोशवर्णने पर्वतनदीवर्षादिवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥

अथाष्टमोऽध्यायः इलावृतवर्षमें भगवान् शंकरद्वारा भगवान् श्रीहरिके संकर्षणरूपकी आराधना तथा भद्राश्ववर्षमें भद्रश्रवाद्वारा हयग्रीवरूपकी उपासना श्रीनारायण उवाच

तेषु वर्षेषु देवेशाः पूर्वोक्तैः स्तवनैः सदा ।

पूजयन्ति महादेवीं जपध्यानसमाधिभिः ॥

सर्वर्तुकुसुमश्रेणी शोभिता वनराजयः ।

फलानां पल्लवानां च यत्र शोभा निरन्तरम् ॥

तेषु काननवर्षेषु वर्षपर्वतसानुषु ।

गिरिद्रोणीषु सर्वासु निर्मलोदकराशिषु ॥

विकचोत्पलमालासु हंससारससञ्चयैः ।

विमिश्रितेषु तेष्वेव पक्षिभिः कूजितेषु च ॥

जलक्रीडादिभिश्चित्रविनोदैः क्रीडयन्ति च ।

सुन्दरीललितभ्रूणां विलासायतनेषु च ॥

तत्रत्या विहरन्त्यत्र स्वैरं युवतिभिः सह ।

नवस्वपि च वर्षेषु भगवानादिपूरुषः ॥

( नारायणाख्यो लोकानामनुग्रहरसैकदृक् । )

देवीमाराधयन्नास्ते स च सर्वैश्च पूज्यते ।

आत्मव्यूहेनेज्ययासौ सन्निधत्ते समाहितः ॥

श्रीनारायण बोले- उन नौ वर्षोंमें रहनेवाले सभी देवेश पूर्वोक्त स्तोत्रों तथा जप, ध्यान और १ समाधिके द्वारा महादेवीकी उपासना करते हैं ॥ १ ॥

सभी ऋतुओंमें खिलनेवाले पुष्पोंके समूहोंसे सुशोभित अनेक वन उनमें विद्यमान हैं, जहाँ फलों २ तथा पल्लवोंकी शोभा निरन्तर बनी रहती है ॥ २ ॥

उन वर्षोंमें विद्यमान सभी वनोद्यानों, पर्वतशिखरों तथा सभी गिरिकन्दराओंमें और खिले हुए कमलोंसे ३ शोभायमान तथा हंस - सारस आदि भिन्न - भिन्न जातिके पक्षियोंकी ध्वनि निनादित निर्मल जलवाले सरोवरोंमें वहाँके देवतागण जल - क्रीड़ा आदि विचित्र विनोदों के ४ द्वारा क्रीडा करते हैं और ललित भौहोंवाली सुन्दरियोंके विलासभवनोंमें उन युवतियोंके साथ यथेच्छ विहार ५ करते हैं॥३–५३ ॥ उन नौ वर्षोंमें ( सभी लोकोंपर अनुग्रहरससे परिपूर्ण दृष्टि रखनेवाले नारायण नामसे प्रसिद्ध ) ६ भगवान् आदिपुरुष भगवतीकी आराधना करते हुए विराजमान रहते हैं और वहाँ सभी लोग उनकी पूजा करते हैं । वे भगवान् लोकोंसे पूजा स्वीकार करनेके निमित्त अपनी विभिन्न मूर्तियोंके रूपमें समाहित ७ होकर वहाँ विराजमान रहते हैं । ६ - ७ ॥

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२३४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ८

इलावृते तु भगवान् पद्मजाक्षिसमुद्भवः ।

एक एव भवो देवो नित्यं वसति साङ्गनः ॥

तत्क्षेत्रे नापर: कश्चित्प्रवेशं वितनोति च ।

भवान्याः शापतस्तत्र पुमान्स्त्री भवति स्फुटम् ॥

भवानीनाथकैः स्त्रीणामसंख्यैर्गणकोटिभिः ।

संरुध्यमानो देवेशो देवं सङ्कर्षणं भजन् ॥

आत्मना ध्यानयोगेन सर्वभूतहितेच्छया ।

तां तामसीं तुरीयां च मूर्तिं प्रकृतिमात्मनः ॥

उपधाव चैकाग्रमनसा भगवानजः । श्रीभगवानुवाच ॐ नमो भगवते महापुरुषाय सर्वगुणसंख्यानायानन्तायाव्यक्ताय नम इति ॥ भजे भजन्यारणपादपङ्कजं भगस्य कृत्स्नस्य परं परायणम् । भक्तेष्वलं भावितभूतभावनं भवापहं त्वा भव भावमीश्वरम् ॥ न यस्य मायागुणकर्मवृत्तिभि-र्निरीक्षितो ह्यण्वपि दृष्टिरज्यते । ईशे यथा नो जितमन्युरंहसा कस्तं न मन्येत जिगीषुरात्मनः ॥ असदृशो यः प्रतिभाति मायया क्षीबेव मध्वासवताम्रलोचनः । न नागवध्वोऽर्हण ईशिरे ह्रिया यत्पादयोः स्पर्शनधर्षितेन्द्रियाः ॥ इलावृतवर्षमें भगवान् श्रीहरि ब्रह्माजीके नेत्रसे ८ उत्पन्न भवरूपमें अपनी भार्या भवानीके साथ नित्य निवास करते हैं ॥ ८ ॥

उस क्षेत्रमें कोई दूसरा प्रवेश नहीं कर सकता है । वहाँ जानेपर भवानीके शापसे पुरुष तत्काल नारी हो जाता है ॥ ९ ॥

वहाँ भवानीकी सेवामें संलग्न असंख्य स्त्रियों तथा अपने करोड़ों गणोंसे घिरे हुए देवेश्वर भगवान् १० शिव संकर्षणदेवकी आराधना करते हैं । वे अजन्मा भगवान् शिव सभी प्राणियोंके कल्याणार्थ तामस प्रकृतिवाली अपनी ही उस संकर्षण नामक चौथी ११ मूर्तिका एकाग्र मनसे ध्यानयोगके द्वारा चिन्तन करते रहते हैं॥१०-११३ ॥ श्रीभगवान् बोले — सभी गुणोंके अभिव्यक्तिरूप, अनन्त, अव्यक्त और ॐकारस्वरूप परम पुरुष भगवान्‌को नमस्कार है ॥ १२ ॥

हे भजनीय प्रभो! भक्तोंके आश्रयस्वरूप चरण-१२ कमलवाले, समग्र ऐश्वर्योंके परम आश्रय, भक्तोंके सामने अपना भूतभावनस्वरूप प्रकट करनेवाले और उनका सांसारिक बन्धन दूर करनेवाले, किंतु अभक्तोंको सदा भव - बन्धनमें बाँधे रहनेवाले आप परमेश्वरका मैं भजन करता हूँ ॥ १३ ॥

हे प्रभो! मैं क्रोधको नहीं जीत सका हूँ तथा १३ मेरी दृष्टि पापसे लिप्त हो जाती है, किंतु आप तो संसारका नियमन करनेके लिये साक्षीरूपसे उसके व्यापारोंको देखते रहते हैं । फिर भी मेरी तरह आपकी दृष्टि उन मायिक गुणों तथा कर्म - वृत्तियोंसे प्रभावित नहीं होती I । ऐसी स्थितिमें अपने मनको वशमें करनेकी इच्छावाला कौन पुरुष ऐसे आपका आदर नहीं १४ करेगा ॥ १४ ॥

मधुपान करके लाल आँखोंवाले मदमत्तकी भाँति जो प्रभु मायाके कारण विकृत नेत्रोंवाले दिखायी पड़ते हैं, जिन प्रभुके चरणोंका स्पर्श करके नागपत्नियोंका मन मोहित हो जाता है और लज्जावश वे अन्य प्रकारसे उपासना नहीं कर पातीं [ उन प्रभुको मेरा

१५ नमस्कार है । ] ॥ १५ ॥

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अ ०८ ] अष्टम यमाहुरस्य स्थितिजन्मसंयमं त्रिभिर्विहीनं यमनन्तमृषयः । न वेद सिद्धार्थमिव क्वचित्स्थितं भूमण्डलं मूर्धसहस्रधामसु ॥ १६ यस्याद्य आसीद् गुणविग्रहो महान् विज्ञानधिष्ण्यो भगवानजः किल । यत्संवृतोऽहं त्रिवृता स्वतेजसा वैकारिकं तामसमैन्द्रियं सृजे ॥ १७ एते वयं यस्य वशे महात्मनः स्थिताः शकुन्ता इव सूत्रयन्त्रिताः । महानहंवैकृततामसेन्द्रियाः सृजाम सर्वे यदनुग्रहादिदम् ॥ १८ यन्निर्मितां कर्ह्यपि कर्मपर्वणीं मायां जनोऽयं गुरुसर्गमोहितः । न वेद निस्तारणयोगमञ्जसा तस्मै नमस्ते विलयोदयात्मने ॥ १ ९ श्रीनारायण उवाच

एवं स भगवान् रुद्रो देवं सङ्कर्षणं प्रभुम् ।

इलावृतमुपासीत देवीगणसमाहितः ॥ २०

तथैव धर्मपुत्रोऽसौ नाम्ना भद्रश्रवा इति ।

तत्कुलस्यापि पतयः पुरुषा भद्रसेवकाः ॥ २१

भद्राश्ववर्षे तां मूर्तिं वासुदेवस्य विश्रुताम् ।

हयमूर्तिभिदा तां तु हयग्रीवपदाङ्किताम् ॥ २२

परमेण समाध्यन्यवारकेण नियन्त्रिताम् ।

एवमेव च तां मूर्तिं गृणन्त उपयान्ति च ॥ २३

भद्रश्रवस ऊचुः ॐ नमो भगवते धर्मायात्मविशोधनाय नम इति । अहो विचित्रं भगवद्विचेष्टितं घ्नन्तं जनोऽयं हि मिषन्न पश्यति । ध्यायन्न सद्यर्हि विकर्म सेवितुं निर्हृत्य पुत्रं पितरं जिजीविषुः ॥ २४ । स्कन्ध २३५ वेद मन्त्र जिन्हें इस जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और लयका कारण बताते हैं; परंतु वे तीनोंसे रहित हैं और जिन्हें ऋषिगण अनन्त कहते हैं, जिनके सहस्र मस्तकों पर स्थित यह भूमण्डल सरसोंके दानेके समान प्रतीत होता है और जिन्हें यह भी नहीं ज्ञात होता कि वह कहाँ स्थित है [ उन प्रभुको मेरा नमस्कार है । ] ॥। १६ ॥ जिनसे उत्पन्न हुआ मैं अहंकाररूप अपने त्रिगुणमय तेजसे देवता, इन्द्रिय और भूतोंकी रचना करता हूँ - वे विज्ञानके आश्रय भगवान् ब्रह्माजी भी आपके ही महत्तत्त्वसंज्ञक प्रथम गुणमय स्वरूप हैं ॥ १७ ॥

महत्तत्त्व, अहंकार, इन्द्रियाभिमानी देवता, इन्द्रियाँ और पंचमहाभूत आदि हम सभी महात्मालोग डोरीमें बँधे हुए पक्षीकी भाँति जिनकी क्रियाशक्तिके वशीभूत होकर और जिनकी कृपाके द्वारा इस जगत्की रचना करते हैं [ उन प्रभुको मेरा नमस्कार है । ] ॥ १८ ॥

सत्त्वादि गुणोंकी सृष्टिसे मोहित यह जीव जिनके द्वारा रचित तथा कर्मबन्धनमें बाँधनेवाली मायाको तो कदाचित् जान लेता है, किंतु उससे छूटनेका उपाय उसे सरलतापूर्वक नहीं ज्ञात हो पाता — उन जगत्की उत्पत्ति तथा लयरूप आप परमात्माको मेरा नमस्कार है ॥१ ९ ॥ श्रीनारायण बोले - [ हे नारद! ] इस प्रकार देवीके गणोंसे घिरे हुए वे भगवान् रुद्र इलावृतवर्षमें सर्वसमर्थ परमेश्वर संकर्षणकी उपासना करते हैं ॥ २० ॥

उसी प्रकार भद्राश्ववर्षमें भद्रश्रवा नामक वे धर्मपुत्र और उनके कुलके प्रधान पुरुष तथा सेवक भी भगवान् वासुदेवकी हयग्रीव नामसे प्रसिद्ध हयमूर्तिको एकनिष्ठ परम समाधिके द्वारा अपने हृदयमें धारण किये रहते हैं और इस प्रकार उस हयमूर्तिरूप भगवान् वासुदेवकी स्तुति करते हुए उनके समीप रहते हैं ॥ २१–२३ ॥ भद्रश्रवा बोले - – चित्तको शुद्ध करनेवाले ओंकारस्वरूप भगवान् धर्मको नमस्कार है । अहो, ईश्वरकी लीला बड़ी विचित्र है कि यह जीव सम्पूर्ण लोकोंका संहार करनेवाले कालको देखता हुआ भी नहीं देखता और तुच्छ विषयोंका सेवन करनेके लिये कुत्सित चिन्तन करता हुआ अपने ही पुत्र तथा पिताको जलाकर भी स्वयं जीवित रहनेकी इच्छा करता है ॥ २४ ॥

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२३६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ९ वदन्ति विश्वं कवयः स्म नश्वरं पश्यन्ति चाध्यात्मविदो विपश्चितः । तथापि मुह्यन्ति तवाज मायया सुविस्मितं कृत्यमजं नतोऽस्मि तम् ॥ २५ विश्वोद्भवस्थाननिरोधकर्म ते ह्यकर्तुरङ्गीकृतमप्यपावृतः युक्तं न चित्रं त्वयि कार्यकारणे सर्वात्मनि व्यतिरिक्ते च वस्तुतः ॥ २६ वेदान् युगान्ते तमसा तिरस्कृतान् रसातलाद्यो नृतुरङ्गविग्रहः । प्रत्याददे वै कवयेऽभियाचते तस्मै नमस्ते वितथेहिताय ते ॥ २७

एवं स्तुवन्ति देवेशं हयशीर्षं हरिं च ते ।

भद्रश्रवसनामानो वर्णयन्ति च तद्गुणान् ॥ २८

एषां चरितमेतद्धि यः पठेच्छ्रावयेच्च यः ।

पापकंचुकमुत्सृज्य देवीलोकं व्रजेच्च सः ॥ २ ९

हे अज! विद्वान् पुरुष इस विश्वको नाशवान् बताते हैं और अध्यात्मको जाननेवाले सूक्ष्मदर्शी महात्मा भी जगत्को इसी रूपमें देखते हैं, फिर भी वे आपकी मायासे मोहित हो जाते हैं । अतः मैं विस्मयकारक कृत्यवाले उस अजन्मा प्रभुको नमस्कार करता हूँ ॥ २५ ॥ मायाके

आवरणसे रहित आपने अकर्ता होते हुए भी विश्वकी उत्पत्ति, पालन तथा संहारका कार्य अंगीकृत किया है । यह उचित ही है, सर्वात्मरूप तथा कार्यकारणभावसे सर्वथा अतीत आपके लिये यह कोई आश्चर्य नहीं है ॥ २६ ॥ जब प्रलयकालमें तमोगुणसे युक्त दैत्यगण

ain चुरा ले गये थे तब ब्रह्माजीके प्रार्थना करनेपर मनुष्य और अश्व संयुक्त विग्रहवाले जिन्होंने रसातलसे उन्हें ला दिया था, ऐसा अमोघ हित करनेवाले उन आप प्रभुको नमस्कार है ॥ २७ ॥ इस प्रकार भद्रश्रवा नामवाले

वे महात्मागण हयग्रीवरूप देवेश्वर श्रीहरिकी स्तुति करते हैं और उनके गुणोंका संकीर्तन करते हैं ॥ २८ ॥

जो मनुष्य इनके इस चरित्रको पढ़ता है और दूसरोंको सुनाता है, वह पापरूपी केंचुलसे मुक्त होकर देवीलोकको प्राप्त होता है ॥२ ९ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामष्टमस्कन्धे भुवनकोशवर्णने इलावृतभद्राश्ववर्षवर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥

O अथ नवमोऽध्यायः हरिवर्षमें प्रह्लादके द्वारा नृसिंहरूपकी आराधना, केतुमालवर्षमें श्रीलक्ष्मीजीके द्वारा कामदेवरूपकी तथा रम्यकवर्षमें मनुजीके द्वारा मत्स्यरूपकी स्तुति - उपासना श्रीनारायण उवाच

हरिवर्षे च भगवान्नृहरिः पापनाशनः ।

वर्तते योगयुक्तात्मा भक्तानुग्रहकारकः ॥ १

तस्य तद्दयितं रूपं महाभागवतोऽसुरः ।

पश्यन्भक्तिसमायुक्तः स्तौति तद्गुणतत्त्ववित् ॥ २

प्रह्लाद उवाच ॐ नमो भगवते नरसिंहाय नमस्तेजस्तेजसे आविराविर्भव वज्रदंष्ट्र कर्माशयान् रन्धय रन्धय तमो ग्रस ग्रस ॐ स्वाहा । अभयं ममात्मनि भूयिष्ठाः ॥ ॐ ॥ श्रीनारायण बोले - [ हे नारद! ] पापोंका नाश करनेवाले, योगसे युक्त आत्मावाले तथा भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले भगवान् नृसिंह हरिवर्षमें प्रतिष्ठित हैं ॥ १ ॥

भगवान् के गुण- तत्त्वोंको जाननेवाले परम भागवत असुर प्रह्लाद उनके दयामयरूपका दर्शन करते हुए भक्तिभावसे युक्त होकर उनकी स्तुति करते हैं ॥२ ॥

प्रह्लाद बोले — तेजोंके भी तेज ॐ कारस्वरूप भगवान् नरसिंहको बार - बार नमस्कार है । हे वज्रदंष्ट्र! आप मेरे सामने प्रकट होइये, प्रकट होइये, मेरे कर्मविषयोंको जला डालिये, जला डालिये और मेरे अज्ञानरूप अन्धकारको नष्ट कीजिये, ॐ स्वाहा; मुझे अभय दीजिये तथा मेरे अन्तःकरणमें प्रतिष्ठित होइये । ॐ क्षौं ।

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अ ० ९ ] अष्टम स्वस्त्यस्तु विश्वस्य खलः प्रसीदतां ध्यायन्तु भूतानि शिवं मिथो धिया । मनश्च भद्रं भजतादधोक्षजे आवेश्यतां नो मतिरप्यहैतुकी ॥ ३ मागारदारात्मजवित्तबन्धुषु सङ्गो यदि स्याद्भगवत्प्रियेषु नः । यः प्राणवृत्त्या परितुष्ट आत्मवान् सिद्धयत्यदूरान्न तथेन्द्रियप्रियः ॥ ४ यत्सङ्गलब्धं निजवीर्यवैभवं तीर्थं मुहुः संस्पृशतां हि मानसम् । हरत्यजोऽन्तः श्रुतिभिर्गतोऽङ्गजं को वै न सेवेत मुकुन्दविक्रमम् ॥ ५ यस्यास्ति भक्तिर्भगवत्यकिञ्चना सर्वैर्गुणैस्तत्र समासते सुराः । हरावभक्तस्य कुतो महद्गुणा मनोरथेनासति धावतो बहिः ॥ ६ हरिर्हि साक्षाद्भगवाञ्छरीरिणा-मात्मा झषाणामिव तोयमीप्सितम् । हित्वा महांस्तं यदि सज्जते गृहे तदा महत्त्वं वयसा दम्पतीनाम् ॥ ७ तस्माद्रजोरागविषादमन्यु-मानस्पृहाभयदैन्याधिमूलम् हित्वा गृहं संसृतिचक्रवालं नृसिंहपादं भजतां कुतो भयम् ॥ ८

एवं दैत्यपतिः सोऽपि भक्त्यानुदिनमीडते ।

नृहरिं पापमातङ्गहरिं हृत्पद्मवासिनम् ॥ ९

स्कन्ध २३७ हे प्रभो! अखिल जगत्का कल्याण हो, दुष्टलोग शुद्ध भावनासे युक्त हों, सभी प्राणी अपने मनमें एक दूसरे कल्याणका चिन्तन करें, हम सबका मन शुभ मार्ग में प्रवृत्त हो और हमारी मति निष्कामभावसे युक्त होकर भगवान् श्रीहरिमें प्रविष्ट हो ॥३ ॥

[ हे भगवन्! ] घर, स्त्री, पुत्र, धन और बन्धु-बान्धवोंमें हमारी आसक्ति न हो और यदि हो तो भगवान्‌के प्रियजनोंमें हो । जो संयमी पुरुष केवल प्राण - रक्षाके योग्य आहारसे सन्तुष्ट रहता है, वह शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त कर लेता है, किंतु इन्द्रियप्रिय व्यक्ति वैसा नहीं कर पाता ॥४ ॥

जिन भगवद्भक्तोंके संगसे भगवान् के तीर्थतुल्य चरित्र सुननेको मिलते हैं, जो उनकी असाधारण शक्ति- वैभवके सूचक हैं तथा जिनका बार - बार सेवन करनेवालोंके कानोंके मार्गसे भगवान् हृदयमें प्रवेश करके उनके सभी प्रकारके मानसिक तथा दैहिक कष्टोंको हर लेते हैं- - उन भगवद्भक्तोंका संग कौन नहीं करना चाहेगा? ॥५ ॥

भगवान्में जिस पुरुषकी निष्काम भक्ति होती है, उसके हृदयमें देवता, धर्म, ज्ञान आदि सभी गुणोंसहित निवास करते हैं, किंतु अनेक मनोरथोंसे युक्त होकर बाहरी विषय - सुखकी ओर दौड़नेवाले भगवद्भक्तिरहित मनुष्यमें महान् गुण कहाँसे हो सकते हैं? ॥ ६ ॥

जैसे मछलियोंको जल अत्यन्त प्रिय है, उसी प्रकार साक्षात् भगवान् श्रीहरि ही सभी देहधारियोंकी आत्मा हैं । उनका त्याग करके यदि कोई महत्त्वाभिमानी घरमें आसक्त रहता है तो उस दशामें दम्पतियोंका महत्त्व केवल उनकी आयुको लेकर माना जाता है, गुणोंकी दृष्टिसे कदापि नहीं ॥ ७ ॥

अतएव तृष्णा, राग, विषाद, क्रोध, मान, कामना, भय, दीनता, मानसिक सन्तापके मूल और जन्म-मरणरूप संसारचक्रका वहन करनेवाले गृहका परित्याग करके भगवान् नृसिंहके चरणका आश्रय लेनेवालोंको भय कहाँ! ॥८ ॥

[ हे नारद! ] इस प्रकार वे दैत्यपति प्रह्लाद पापरूपी हाथियोंके लिये सिंहस्वरूप तथा हृदयकमलमें निवास करनेवाले भगवान् नृसिंहकी भक्तिपूर्वक निरन्तर स्तुति करते रहते हैं ॥९ ॥

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२३८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ९

केतुमाले च वर्षे हि भगवान्स्मररूपधृक् ।

आस्ते तद्वर्षनाथानां पूजनीयश्च सर्वदा ॥ १०

एतेनोपासते स्तोत्रजालेन च रमाब्धिजा ।

तद्वर्षनाथा सततं महतां मानदायिका ॥ ११

रमोवाच ॐ ह्रां ह्रीं हूं ॐ नमो भगवते हृषीकेशाय सर्वगुणविशेषैर्विलक्षितात्मने आकूतीनां चित्तीनां चेतसां विशेषाणां चाधिपतये षोडशकलाय छन्दोमयायान्नमयायामृतमयाय सर्वमयाय महसे ओजसे बलाय कान्ताय कामाय नमस्ते उभयत्र भूयात् । स्त्रियो व्रतैस्त्वां हृषीकेश्वरं स्वतो ह्याराध्य लोके पतिमाशासतेऽन्यम् । तासां न ते वै परिपान्त्यपत्यं प्रियं धनायूंषि यतोऽस्वतन्त्राः ॥ १२ स वै पतिः स्यादकुतोभयः स्वतः समन्ततः पाति भयातुरं जनम् । स एक एवेतरथा मिथो भयं नैवात्मलाभादधिमन्यते परम् ॥ १३ या तस्य ते पादसरोरुहार्हणं न कामयेत्साखिलकामलम्पटा । तदेव रासीप्सितमीप्सितोऽर्चितो यद्भग्नयाच्ञा भगवन् प्रतप्यते ॥। १४ मत्प्राप्तयेऽजेशसुरासुरादय-स्तप्यन्त उग्रं तप ऐन्द्रिये धियः । ऋते भवत्पादपरायणान्न मां विदन्त्यहं त्वद्धृदया यतोऽजित ॥ १५ केतुमालवर्षमें भगवान् श्रीहरि कामदेवका रूप धारण करके प्रतिष्ठित हैं । उस वर्षके अधीश्वरों के लिये वे सर्वदा पूजनीय हैं ॥ १० ॥

इस वर्षकी अधीश्वरी तथा महान् लोगोंको सम्मान देनेवाली समुद्रतनया लक्ष्मीजी इस स्तोत्रसमूहसे निरन्तर उनकी उपासना करती हैं ॥११ ॥

रमा बोलीं- इन्द्रियोंके स्वामी, सम्पूर्ण श्रेष्ठ वस्तुओंसे लक्षित आत्मावाले, ज्ञान- क्रिया - संकल्पशक्ति आदि चित्तके धर्मों तथा उनके विषयोंके अधिपति, सोलह कलाओंसे सम्पन्न, वेदोक्त कर्मोंसे प्राप्त होनेवाले, अन्नमय, अमृतमय, सर्वमय, महनीय, ओजवान्, बलशाली तथा कान्तियुक्त भगवान् कामदेवको ॐ ह्रां ह्रीं हूं ॐ – इन बीजमन्त्रोंके साथ सब ओरसे नमस्कार है । [ हे प्रभो! ] स्त्रियाँ अनेक प्रकारके व्रतोंद्वारा आप हृषीकेश्वरकी आराधना करके लोकमें अन्य पतिकी इच्छा किया करती हैं; किंतु वे पति उनके प्रिय पुत्र, धन और आयुकी रक्षा नहीं कर पाते हैं; क्योंकि वे स्वयं ही परतन्त्र होते हैं ॥ १२ ॥

[ हे परमात्मन्! ] पति तो वह होता है, जो स्वयं किसीसे भयभीत न रहकर भयग्रस्त जनकी भलीभाँति रक्षा करता है । वैसे पति एकमात्र आप ही हैं; यदि एक से अधिक पति माने जायँ तो उन्हें परस्पर भयकी सम्भावना रहती है । अत: आप अपनी प्राप्तिसे बढ़कर और कोई लाभ नहीं मानते ॥ १३ ॥

हे भगवन्! जो स्त्री आपके चरणकमलोंके पूजनकी कामना करती है और अन्य वस्तुकी अभिलाषा नहीं करती, उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं; किंतु जो किसी एक कामनाको लेकर आपकी उपासना करती है, उसे आप केवल वही वस्तु देते हैं और जब भोगके पश्चात् वह वस्तु नष्ट हो जाती है तो उसके लिये उसे दुःखित होना पड़ता है ॥ १४ ॥

अजित! इन्द्रियसुख पानेका विचार रखनेवाले ब्रह्मा, रुद्र, देव तथा दानव आदि मेरी प्राप्तिके लिये कठिन तप करते हैं; किंतु आपके चरणकमलोंकी उपासना करनेवालेके अतिरिक्त अन्य कोई भी मुझे प्राप्त नहीं कर सकते; क्योंकि मेरा हृदय सदा आपमें । ही लगा रहता है ॥ १५ ॥

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अ ० ९ ] अष्टम स त्वं ममाप्यच्युत शीर्षिण वन्दितं कराम्बुजं यत्त्वदधायि सात्वताम् । बिभर्षि मां लक्ष्म वरेण्य मायया क ईश्वरस्येहितमूहितुं विभुः ॥ १६

एवं कामं स्तुवन्त्येव लोकबन्धुस्वरूपिणम् ।

प्रजापतिमुखा वर्षनाथाः कामस्य सिद्धये ॥ १७

रम्यके नामवर्षे च मूर्तिं भगवतः पराम् ।

मात्स्यां देवासुरैर्वन्द्यां मनुः स्तौति निरन्तरम् ॥ १८

मनुरुवाच ॐ नमो भगवते मुख्यतमाय नमः सत्त्वाय प्राणायजसे बलाय महामत्स्याय नमः ।

अन्तर्बहिश्चाखिललोकपालकै-रदृष्टरूपो विचरस्युरुस्वनः ।

स ईश्वरस्त्वं य इदं वशे नय-न्नाम्ना यथा दारुमयीं नरः स्त्रियम् ॥ १ ९

यं लोकपालाः किल मत्सरज्वरा हित्वा यतन्तोऽपि पृथक् समेत्य च । पातुं न शेकुर्द्विपदश्चतुष्पदः सरीसृपं स्थाणु यदत्र दृश्यते ॥ २० भवान् युगान्तार्णव ऊर्मिमालिनि क्षोणीमिमामोषधिवीरुधां निधिम् । मया सहोरुक्रम तेऽज ओजसा तस्मै जगत्प्राणगणात्मने नमः ॥ २१

एवं स्तौति च देवेशं मनुः पार्थिवसत्तमः ।

मत्स्यावतारं देवेशं संशयच्छेदकारणम् ॥ २२ ।

स्कन्ध २३ ९ हे अच्युत! आप अपने जिस वन्दनीय करकमलको भक्तोंके मस्तकपर रखते हैं, उसे मेरे भी सिरपर रखिये । हे वरेण्य! आप मुझे केवल श्रीवत्सरूपसे अपने वक्षःस्थलपर ही धारण करते हैं । मायासे की हुई आप परमेश्वरकी लीलाको जाननेमें भला कौन समर्थ है? ॥१६ ॥

[ हे नारद! ] इस प्रकार [ केतुमालवर्षमें ] लक्ष्मीजी तथा इस वर्षके अन्य प्रजापति आदि प्रमुख अधीश्वर भी कामनासिद्धिके लिये कामदेव-रूपधारी लोकबन्धुस्वरूपी श्रीहरिकी स्तुति करते हैं ॥ १७ ॥

रम्यक नामक वर्षमें मनुजी भगवान् श्रीहरिकी देवदानवपूजित सर्वश्रेष्ठ मत्स्यमूर्तिकी निरन्तर इस प्रकार स्तुति करते रहते हैं ॥ १८ ॥

मनुजी बोले - सबसे प्रधान, सत्त्वमय, प्राणसूत्रात्मा, ओजस्वी तथा बलयुक्त ॐकारस्वरूप भगवान् महामत्स्यको बार- बार नमस्कार है । आप सभी प्राणियोंके भीतर और बाहर संचरण करते हैं । आपके रूपको ब्रह्मा आदि सभी लोकपाल भी नहीं देख सकते । वेद ही आपका महान् शब्द है । वे ईश्वर आप ही हैं । ब्राह्मण आदि विधिनिषेधात्मकरूप डोरीसे इस जगत्‌को अपने अधीन करके उसे उसी प्रकार नचाते हैं, जैसे कोई नट कठपुतलीको नचाता है ॥ १ ९ ॥ आपके प्रति ईर्ष्याभावसे भरे हुए लोकपाल आपको छोड़कर अलग - अलग तथा मिलकर भी मनुष्य, पशु, नाग आदि जंगम तथा स्थावर प्राणियोंकी रक्षा करनेका प्रयत्न करते हुए भी रक्षा नहीं कर सके ॥ २० ॥

हे अजन्मा प्रभो! जब ऊँची लहरोंसे युक्त प्रलयकालीन समुद्र विद्यमान था, तब आप औषधियों और लताओंकी निधिस्वरूप पृथ्वी तथा मुझको लेकर उस समुद्रमें उत्साहपूर्वक क्रीडा कर रहे थे; जगत्के समस्त प्राणसमुदायके नियन्ता आप भगवान् मत्स्यको नमस्कार है ॥२१ ॥

इस प्रकार राजाओंमें श्रेष्ठ मनुजी सभी संशयोंको समूल समाप्त कर देनेवाले मत्स्यरूपमें अवतीर्ण देवेश्वर भगवान् श्रीहरिकी स्तुति करते हैं ॥ २२ ॥

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२४० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १० ध्यानयोगेन देवस्य निर्धूताशेषकल्मषः । भगवान्‌के ध्यानयोगके द्वारा अपने सम्पूर्ण पापोंको नष्ट कर चुके तथा महाभागवतोंमें श्रेष्ठ मनुजी भक्तिपूर्वक भगवान् की उपासना करते हुए यहाँ

आस्ते परिचरन्भक्त्या महाभागवतोत्तमः ॥ २३ । प्रतिष्ठित रहते हैं ॥ २३ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्रयां संहितायामष्टमस्कन्धे भुवनकोशवर्णने हरिवर्षकेतुमालरम्यकवर्षवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥

अथ दशमोऽध्यायः हिरण्मयवर्षमें अर्यमाके द्वारा कच्छपरूपकी आराधना, उत्तरकुरुवर्षमें पृथ्वीद्वारा वाराहरूपकी एवं किम्पुरुषवर्षमें श्रीहनुमान्जीके द्वारा श्रीरामचन्द्ररूपकी स्तुति - उपासना श्रीनारायण उवाच

हिरण्मये नाम वर्षे भगवान्कूर्मरूपधृक् ।

आस्ते योगपतिः सोऽयमर्यम्णा पूज्य ईड्यते ॥ १

अर्यमोवाच ॐ नमो भगवते अकूपाराय सर्वसत्त्वगुण-विशेषणाय नोपलक्षितस्थानाय नमो वर्ष्मणे नमो भूने नमोऽवस्थानाय नमस्ते ।

यद्रूपमेतन्निजमाययार्पित-मर्थस्वरूपं बहुरूपरूपितम् ।

संख्या न यस्यास्त्ययथोपलम्भना-तस्मै नमस्तेऽव्यपदेशरूपिणे ॥ २ ।

जरायुजं स्वेदजमण्डजोद्भिदं चराचरं देवर्षिपितृभूतमैन्द्रियम् । द्यौः खं क्षितिः शैलसरित्समुद्रं द्वीपग्रहर्क्षेत्यभिधेय एकः ॥ ३ यस्मिन्नसंख्येयविशेषनाम-रूपाकृतौ कविभिः कल्पितेयम् । संख्या यया तत्त्वदृशापनीयते तस्मै नमः सांख्यनिदर्शनाय ते ॥४

एवं स्तुवति देवेशमर्यमा सह वर्षपैः ।

गीयते चापि भजते सर्वभूतभवं प्रभुम् ॥ ५

श्रीनारायण बोले - [ हे नारद! ] हिरण्मय नामक वर्षमें भगवान् श्रीहरि कूर्मरूप धारण करके विराजमान हैं । यहाँ अर्यमाके द्वारा उन योगेश्वरभगवान्की पूजा तथा स्तुति की जाती है ॥ १ ॥

अर्यमा बोले – सम्पूर्ण सत्त्व आदि गुण-विशेषणोंसे युक्त, जलमें रहनेके कारण अलक्षित स्थानवाले, कालसे सर्वथा अतीत, आधारस्वरूप तथा ॐकाररूप भगवान् कूर्मको बार- बार नमस्कार है । [ हे प्रभो! ] अनेक रूपोंमें दिखायी देनेवाला यह जगत् यद्यपि मिथ्या ही निश्चय होता है, इसलिये इसकी वस्तुतः कोई संख्या नहीं है; तथापि यह मायासे प्रकाशित होनेवाला आपका ही रूप है, ऐसे उन अनिर्वचनीय आपको नमस्कार है ॥२ ॥

एकमात्र आप ही जरायुज, स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज, चर, अचर, देवता, ऋषि, पितर, भूत, इन्द्रिय, स्वर्ग, आकाश, पृथ्वी, पर्वत, नदी, समुद्र, द्वीप, ग्रह और नक्षत्र — इन नामोंसे विख्यात हैं ॥ ३ ॥

विद्वानोंने असंख्य नाम, रूप और आकृतियोंवाले आपमें जिन चौबीस तत्त्वोंकी संख्या निश्चित की है, वह जिस - जिस तत्त्वदृष्टिका उदय होनेपर निवृत्त हो जाती है, वह भी वस्तुत: आपका ही स्वरूप है; ऐसे सांख्य- सिद्धान्तस्वरूप आपको मेरा नमस्कार है ॥ ४ ॥

इस प्रकार अर्यमा हिरण्मयवर्षके अन्य अधीश्वरोंके साथ सभी प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाले कूर्मरूप देवेश्वर भगवान् श्रीहरिकी स्तुति, उनका गुणानुवाद तथा भजन करते हैं ॥५ ॥

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अ ० १० ] अष्टम

तथोत्तरेषु कुरुषु भगवान्यज्ञपूरुषः ।

आदिवाराहरूपोऽसौ धरण्या पूज्यते सदा ॥ ६

सम्पूज्य विधिवद्देवं तद्भक्त्यार्द्रार्द्रहृत्कजा ।

भूमिः स्तौति हरिं यज्ञवाराहं दैत्यमर्दनम् ॥ ७

भूरुवाच ॐ नमो भगवते मन्त्रतत्त्वलिङ्गाय यज्ञक्रतवे महाध्वरावयवाय महावराहाय नमः कर्मशुक्लाय त्रियुगाय नमस्ते ॥ ८ ॥

यस्य स्वरूपं कवयो विपश्चितो गुणेषु दारुविव जातवेदसम् । मध्नन्ति मथ्ना मनसा दिदृक्षवो गूढं क्रियार्थैर्नम ईरितात्मने ॥ ९ द्रव्यक्रियाहेत्वयनेशकर्तृभि-मयागुणैर्वस्तुभिरीक्षितात्मने 1 अन्वीक्षयाङ्गातिशयात्मबुद्धिभि-र्निरस्तमायाकृतये नमोऽस्तु ते ॥ १० विश्वस्थितिसंयमोदयं यस्येप्सितं नेप्सितुमीक्षितुर्गुणैः । माया यथाऽयो भ्रमते तदाश्रयं ग्राव्णो नमस्ते गुणकर्मसाक्षिणे ॥ ११ प्रमथ्य दैत्यं प्रतिवारणं मृधे यो मां रसाया जगदादिसुकरः । कृत्वाग्रदंष्ट्रं निरगादुदन्वतः क्रीडन्निवेभः प्रणतास्मि तं विभुम् ॥ १२ स्कन्ध २४१ उत्तरकुरुवर्षमें पृथ्वीदेवी आदिवराहरूप यज्ञपुरुष भगवान् श्रीहरिकी निरन्तर उपासना करती हैं ॥ ६ ॥

प्रेमरससे परिपूर्ण हृदयकमलवाली वे पृथ्वीदेवी दैत्योंका नाश करनेवाले यज्ञवराह श्रीहरिकी विधिपूर्वक पूजा करके भक्तिभावसे उनकी स्तुति करती हैं ॥७ ॥

पृथ्वी बोलीं- मन्त्रोंके द्वारा ज्ञेय तत्त्वोंवाले, यज्ञ तथा क्रतुस्वरूप, बड़े - बड़े यज्ञरूप अवयवोंवाले, सात्त्विक कर्मोंवाले तथा त्रियुगमूर्तिरूप आप ओंकार-स्वरूप भगवान् महावराहको बार - बार नमस्कार है ॥ ८ ॥

काष्ठोंमें छिपी हुई अग्निको प्रकट करनेके लिये मन्थन करनेवाले ऋत्विज्- गणोंकी भाँति परम प्रवीण विद्वान् पुरुष कर्मासक्ति एवं कर्मफलकी कामनासे छिपे हुए जिनके रूपको देखनेकी इच्छासे अपने विवेकयुक्त मनरूपी मथानीद्वारा शरीर एवं इन्द्रियोंको मथ डालते हैं; इस प्रकार मन्थनके पश्चात् अपने रूपको प्रकट करनेवाले आपको नमस्कार है॥९॥

हे प्रभो! विचार तथा यम - नियमादि योगांगों के साधनोंके प्रभावसे निश्चयात्मिका बुद्धिवाले महापुरुष द्रव्य ( विषय ), क्रियाहेतु ( इन्द्रिय- व्यापार ), अयन ( शरीर ), ईश और कर्ता ( अहंकार ) आदि मायाके कार्यों को देखकर जिनके वास्तविक स्वरूपका निश्चय करते हैं; ऐसे मायिक आकृतियोंसे रहित आपको नमस्कार है ॥१० ॥

जिसकी इच्छामात्रसे नि: स्पृह होती हुई भी प्रकृति गुणोंके द्वारा जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और संहारके कार्यमें इस प्रकार प्रवृत्त हो जाती है, जैसे चुम्बकका सम्पर्क पाकर लोहा गतिशील हो जाता है; उन आप सम्पूर्ण गुणों एवं कर्मोंके साक्षी श्रीहरिको नमस्कार है ॥११ ॥

जिन्होंने एक हाथीको पछाड़नेवाले दूसरे हाथीकी भाँति युद्धके अवसरपर खेल - खेलमें प्रतिद्वन्द्वी दैत्य हिरण्याक्षका लीलापूर्वक हनन करके मुझे अपने दाढ़ोंके अग्रभागपर उठाकर रसातलसे बाहर निकाल लिया, उन जगत्के आदिकारणस्वरूप सर्वशक्तिमान् भगवान् वराहको नमस्कार है ॥ १२ ॥