देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 251–260

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 251–260

पृष्ठ 251

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२४२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १०

किम्पुरुषे वर्षेऽस्मिन्भगवन्तं दाशरथिं च सर्वेशम् ।

सीतारामं देवं श्रीहनुमानादिपूरुषं स्तौति ॥ १३

हनुमानुवाच ॐ नमो भगवते उत्तमश्लोकाय नम इति । आर्यलक्षणशीलव्रताय नम उपशिक्षितात्मने । उपासितलोकाय नमः । साधुवादनिकषणाय नमो ब्रह्मण्यदेवाय महापुरुषाय महाभागाय नम इति । यत्तद्विशुद्धानुभवात्ममेकं स्वतेजसा ध्वस्तगुणव्यवस्थम् । प्रत्यक् प्रशान्तं सुधियोपलम्भनं ह्यनामरूपं निरहं प्रपद्ये ॥ १४ मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणं रक्षोवधायैव न केवलं विभो । कुतोऽन्यथा स्याद्रमतः स्व आत्मनः सीताकृतानि व्यसनानीश्वरस्य ॥ १५ न वै स आत्मात्मवतां सुहृत्तमः सक्तस्त्रिलोक्यां भगवान्वासुदेवः । न स्त्रीकृतं कश्मलमश्नुवीत न लक्ष्मणं चापि विहातुमर्हति ॥ १६ । किम्पुरुषवर्षमें श्रीहनुमानजी सम्पूर्ण जगत्के शासक आदिपुरुष दशरथपुत्र भगवान् श्रीसीतारामकी इस प्रकार स्तुति करते हैं ॥ १३ ॥

हनुमान् बोले- उत्तम कीर्तिवाले ओंकारस्वरूप भगवान् श्रीरामको नमस्कार है । श्रेष्ठ पुरुषोंके लक्षण, शील और व्रतसे सम्पन्न श्रीरामको नमस्कार है; संयत चित्तवाले तथा लोकाराधनमें तत्पर श्रीरामको नमस्कार है; साधुताकी परीक्षाके लिये कसौटीस्वरूप श्रीरामको नमस्कार है; ब्राह्मणोंके परम भक्त एवं महान् भाग्यशाली महापुरुष श्रीरामको नमस्कार है । जो विशुद्ध बोधस्वरूप, अद्वितीय, अपने तेजसे गुणोंकी जाग्रत् आदि अवस्थाओंका निवारण करनेवाले, सर्वान्तरात्मा, परम शान्त, निर्मल बुद्धिके द्वारा ग्रहण किये जानेयोग्य, नाम - रूपसे रहित तथा अहंकारशून्य हैं; उन आप भगवान्‌की मैं शरण ग्रहण करता हूँ ॥१४ ॥

हे प्रभो! आपका मनुष्यावतार केवल राक्षसोंके वधके लिये ही नहीं है, अपितु इसका मुख्य उद्देश्य तो मनुष्यों को शिक्षा देना है, अन्यथा, अपने स्वरूपमें ही रमण करनेवाले साक्षात् आप जगदीश्वरको सीताजीके वियोगमें इतना दुःख कैसे हो सकता था ॥१५ ॥

आप धीर पुरुषोंके आत्मा ' और प्रियतम भगवान् वासुदेव हैं; त्रिलोकीकी किसी भी वस्तुमें आपकी आसक्ति नहीं है । आप न तो सीताजीके लिये मोहको ही प्राप्त हो सकते हैं और न लक्ष्मणजीका त्याग ही कर सकते हैं? ॥ १६ ॥

१. यहाँ शंका होती है कि भगवान् तो सभीके आत्मा हैं, फिर यहाँ उन्हें आत्मवान् ( धीर ) पुरुषोंके ही आत्मा क्यों बताया गया? इसका कारण यही है कि सबके आत्मा होते हुए भी उन्हें केवल आत्मज्ञानी पुरुष ही अपने आत्मारूपसे अनुभव करते हैं - अन्य पुरुष नहीं । श्रुतिमें जहाँ कहीं आत्मसाक्षात्कारकी बात आयी है, वहीं आत्मवेत्ताके लिये ' धीर ' शब्दका प्रयोग किया है । जैसे ' कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षत ' इति नः शुश्रुम धीराणाम् ' इत्यादि । इसीलिये यहाँ भी भगवान्‌को आत्मवान् या धीर पुरुषका आत्मा बताया है । २. एक बार भगवान् श्रीराम एकान्तमें एक देवदूतसे बात कर रहे थे । उस समय लक्ष्मणजी पहरेपर थे और भगवान्‌की आज्ञा थी कि यदि इस समय कोई भीतर आयेगा तो वह मेरे हाथसे मारा जायगा । इतनेमें ही दुर्वासामुनि चले आये और उन्होंने लक्ष्मणजीको अपने आनेकी सूचना देनेके लिये भीतर जानेको विवश किया । इससे अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार भगवान् बड़े असमंजसमें पड़ गये । तब वसिष्ठजीने कहा कि लक्ष्मणजीके प्राण न लेकर उन्हें त्याग देना चाहिये; क्योंकि अपने प्रियजनका त्याग मृत्युदण्डके समान ही है । इसीसे भगवान्ने उन्हें त्याग दिया ।

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अ ० ११ ] अष्टम न जन्म नूनं महतो न सौभगं

न वाङ् न बुद्धिर्नाकृतिस्तोषहेतुः ।

तैर्यद्विसृष्टानपि नो वनौकस-श्चकार सख्ये बत लक्ष्मणाग्रजः ॥ १७

सुरोऽसुरो वाप्यथवा नरोऽनरः सर्वात्मना यः सुकृतज्ञमुत्तमम् । भजेत रामं मनुजाकृतिं मनुजाकृतिं हरिं य उत्तराननयत्कोसलान् दिवम् ॥ १८ श्रीनारायण उवाच

एवं किम्पुरुषे वर्षे सत्यसन्धं दृढव्रतम् ।

रामं राजीवपत्राक्षं हनुमान् वानरोत्तमः ॥ १ ९

स्तौति गायति भक्त्या च सम्पूजयति सर्वशः ।

य एतच्छृणुयाच्चित्रं रामचन्द्रकथानकम् ।

सर्वपापविशुद्धात्मा याति रामसलोकताम् ॥ २०

स्कन्ध २४३ न उत्तम कुलमें जन्म, न सुन्दरता, न वाक्चातुर्य, न तो बुद्धि और न तो श्रेष्ठ योनि ही आपकी प्रसन्नताके कारण हो सकते हैं; यही बात दिखानेके लिये हे लक्ष्मणाग्रज! आपने इन सभी गुणोंसे रहित हम वनवासी वानरोंसे मित्रता की है ॥ १७ ॥

देवता, असुर, वानर अथवा मनुष्य जो कोई भी हो, उस उपकारीके थोड़े उपकारको भी बहुत अधिक माननेवाले, नररूपधारी श्रेष्ठ श्रीरामस्वरूप आप श्रीहरिका सब प्रकारसे भजन करना चाहिये, जो दिव्य धामको प्रस्थान करते समय सभी उत्तरकोसलवासियोंको भी अपने साथ लेते गये थे ॥ १८ ॥

श्रीनारायण बोले - [ हे नारद! ] इस प्रकार किम्पुरुषवर्षमें वानरश्रेष्ठ हनुमान् सत्यप्रतिज्ञ, दृढव्रती तथा कमलपत्रके समान नेत्रोंवाले भगवान् श्रीरामकी भक्तिपूर्वक स्तुति करते हैं, उनके गुण गाते हैं तथा भलीभाँति उनकी पूजा करते हैं । जो पुरुष भगवान् श्रीरामचन्द्रके इस अद्भुत कथाप्रसंगका श्रवण करता है; वह पापोंसे मुक्त होकर विशुद्ध आत्मावाला हो जाता है । और श्रीरामके परम धामको प्राप्त होता है ॥ १ ९ -२० ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामष्टमस्कन्धे भुवनकोशवर्णने हिरण्मयकिम्पुरुषवर्षवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥

अथैकादशोऽध्यायः जम्बूद्वीपस्थित भारतवर्षमें श्रीनारदजीके द्वारा नारायणरूपकी स्तुति-उपासना तथा भारतवर्षकी महिमाका कथन श्रीनारायण उवाच

भारताख्ये च वर्षेऽस्मिन्नहमादिजपूरुषः ।

तिष्ठामि भवता चैव स्तवनं क्रियतेऽनिशम् ॥ १

नारद उवाच ॐ नमो भगवते उपशमशीलायोपर-तानात्म्याय नमोऽकिञ्चनवित्ताय ऋषिऋषभाय नरनारायणाय परमहंसपरमगुरवे आत्मारामाधि-पतये नमो नम इति । कर्तास्य सर्गादिषु यो न बध्यते नहन्यते देहगतोऽपि दैहिकैः । द्रष्टुर्न दृश्यस्य गुणैर्विदूष्यते तस्मै नमोऽसक्तविविक्तसाक्षिणे ॥ २ श्रीनारायण बोले- [ हे नारद! ] भारत नामक इस वर्षमें आदिपुरुष मैं सदा विराजमान रहता हूँ और यहाँ आप निरन्तर मेरी स्तुति करते रहते हैं ॥ १ ॥

नारद बोले- – शान्त स्वभाववाले, अहंकारसे रहित, निर्धनोंके परम धन, ऋषियोंमें श्रेष्ठ, परमहंसोंके परम गुरु, आत्मारामोंके अधिपति तथा ओंकारस्वरूप भगवान् नरनारायणको बार- बार नमस्कार है । जो विश्वकी उत्पत्ति आदिमें उनके कर्ता होकर भी कर्तृत्व अभिमानसे नहीं बँधते, जो देहमें रहते भी भूख - प्यास आदि दैहिक गुण - धर्मोके वशीभूत नहीं होते तथा द्रष्टा होते हुए भी जिनकी दृष्टि दृश्यके गुण - - त दोषोंसे दूषित नहीं होती; उन असंग तथा विशुद्ध । साक्षिस्वरूप भगवान् नारायणको नमस्कार है ॥२ ॥

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२४४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ११ इदं हि योगेश्वरयोगनैपुणं हिरण्यगर्भो भगवाञ्जगाद यत् । यदन्तकाले त्वयि निर्गुणे मनो भक्तया दधीतोज्झितदुष्कलेवरः ॥ ३ यथैहिकामुष्मिककामलम्पटः

सुतेषु दारेषु धनेषु चिन्तयन् ।

शङ्केत विद्वान् कुकलेवरात्यया-द्यस्तस्य यत्नः श्रम एव केवलम् ॥ ४

तन्नः प्रभो त्वं त्वं कुकलेवरार्पितां त्वं माययाहं ममतामधोक्षज । भिन्द्याम येनाशु वयं सुदुर्भिदां विधेहि योगं त्वयि नः स्वभावजम् ॥ ५

एवं स्तौति सदा देवं नारायणमनामयम् ।

नारदो मुनिशार्दूलः प्रज्ञाताखिलसारदृक् ॥ ६

अस्मिन् वै भारते वर्षे सरिच्छैलास्तु सन्ति हि ।

तान्प्रवक्ष्यामि देवर्षे शृणुष्वैकाग्रमानसः ॥ ७

मलयो मङ्गलप्रस्थो मैनाकश्च त्रिकूटकः ।

ऋषभः कूटकः कोल्लः सह्यो देवगिरिस्तथा ॥ ८

ऋष्यमूकश्च श्रीशैलो व्यङ्कटाद्रिर्महेन्द्रकः ।

वारिधारश्च विन्ध्यश्च मुक्तिमानृक्षपर्वतः ॥ ९

पारियात्रस्तथा द्रोणश्चित्रकूटगिरिस्तथा ।

गोवर्धनो रैवतकः ककुभो नीलपर्वतः ॥ १०

गौरमुखश्चेन्द्रकीलो गिरिः कामगिरिस्तथा ।

एते चान्येऽप्यसंख्याता गिरयो बहुपुण्यदाः ॥ ११

एतदुत्पन्नसरितः शतशोऽथ सहस्रशः ।

पानावगाहनस्नानदर्शनोत्कीर्तनैरपि ॥ १२

नाशयन्ति च पापानि त्रिविधानि शरीरिणाम् ।

ताम्रपर्णी चन्द्रवशा कृतमाला वटोदका ॥ १३

वैहायसी च कावेरी वेणा चैव पयस्विनी ।

तुङ्गभद्रा कृष्णवेणा शर्करावर्तका तथा ॥ १४

गोदावरी भीमरथी निर्विन्ध्या च पयोष्णिका ।

तापी रेवा च सुरसा नर्मदा च सरस्वती ॥ १५

चर्मण्वती च सिन्धुश्च अन्धशोणौ महानदौ । ऋषिकुल्या त्रिसामा च वेदस्मृतिर्महानदी । १६ हे योगेश्वर! हिरण्यगर्भ ब्रह्माजीने योगसाधनकी सबसे बड़ी कुशलता यही बतलायी है कि मनुष्य अन्तकालमें देहाभिमानको छोड़कर भक्तिपूर्वक आप गुणातीतमें अपना मन लगाये ॥ ३ ॥

लौकिक तथा पारलौकिक भोगोंकी लालसा रखनेवाला मूढ मनुष्य जैसे पुत्र, स्त्री और धनकी चिन्ता करता हुआ मृत्युसे डरता है, उसी प्रकार यदि विद्वान् भी इस कुत्सित शरीरके छूट जानेके भयसे युक्त रहे तो ज्ञानप्राप्तिके लिये किया हुआ उसका सारा प्रयत्न केवल परिश्रममात्र है ॥ ४ ॥

अतः हे अधोक्षज! हे प्रभो! आप हमें अपना स्वाभाविक प्रेमरूप भक्तियोग प्रदान कीजिये, जिससे इस निन्दनीय शरीरमें आपकी मायाके कारण बद्धमूल हुई दुर्भेद्य अहंता तथा ममताको हम तुरंत काट डालें ॥५ ॥

इस प्रकार अखिल ज्ञातव्य रहस्योंको देखनेवाले मुनिश्रेष्ठ नारद निर्विकार भगवान् नारायणकी स्तुति करते रहते हैं ॥ ६ ॥

[ नारायण बोले- ] हे देवर्षे! इस भारतवर्षमें अनेक नदियाँ तथा पर्वत हैं; अब मैं उनका वर्णन करूँगा; आप एकाग्रचित्त होकर सुनिये ॥७ ॥

मलय, मंगलप्रस्थ, मैनाक, त्रिकूट, ऋषभ, कुटक, कोल्ल, सह्य, देवगिरि, ऋष्यमूक, श्रीशैल, व्यंकटाद्रि, महेन्द्र, वारिधार, विन्ध्य, मुक्तिमान्, ऋक्ष, पारियात्र, द्रोण, चित्रकूट, गोवर्धन, रैवतक, ककुभ, नील, गौरमुख, इन्द्रकील तथा कामगिरि पर्वत हैं । इनके अतिरिक्त भी प्रचुर पुण्य प्रदान करनेवाले अन्य असंख्य पर्वत हैं ॥ ८–११ ॥ इन पर्वतोंसे निकली हुई सैकड़ों - हजारों नदियाँ हैं; जिनका जल पीने, जिनमें डुबकी लगाकर स्नान करने, दर्शन करने तथा जिनके नामका उच्चारण करनेसे मनुष्योंके तीनों प्रकारके पाप नष्ट हो जाते हैं । ताम्रपर्णी, चन्द्रवशा, कृतमाला, वटोदका, वैहायसी, कावेरी, वेणा, पयस्विनी, तुंगभद्रा, कृष्णवेणा, शर्करावर्तका, गोदावरी, भीमरथी, निर्विन्ध्या, पयोष्णिका, तापी, रेवा, सुरसा, नर्मदा, सरस्वती, चर्मण्वती, सिन्धु, अन्ध तथा

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अ ० ११ ] अष्टम

कौशिकी यमुना चैव मन्दाकिनी दृषद्वती ।

गोमती सरयू रोधवती सप्तवती तथा ॥ १७

सुषोमा च शतद्रुश्च चन्द्रभागा मरुद्वृधा ।

वितस्ता च असिक्नी च विश्वा चेति प्रकीर्तिताः ॥ १८

अस्मिन्वर्षे लब्धजन्मपुरुषैः स्वस्वकर्मभिः ।

शुक्ललोहितकृष्णाख्यैर्दिव्यमानुषनारकाः ॥

भवन्ति विविधा भोगाः सर्वेषां च निवासिनाम् ।

यथा वर्णविधानेनापवर्गो भवति स्फुटम् ॥ २०

एतदेव च वर्षस्य प्राधान्यं कार्यसिद्धितः ।

वदन्ति मुनयो वेदवादिनः स्वर्गवासिनः ॥ २१

अहो अमीषां किमकारि शोभनं प्रसन्न एषां स्विदुत स्वयं हरिः । यैर्जन्म लब्धं नृषु भारताजिरे मुकुन्दसेवौपयिकं स्पृहा हि नः ॥ २२

किं दुष्करैर्नः क्रतुभिस्तपोव्रतै-र्दानादिभिर्वा द्युजयेन फल्गुना ।

न यत्र नारायणपादपङ्कज-स्मृति: प्रमुष्टातिशयेन्द्रियोत्सवात् ॥ २३

कल्पायुषां स्थानजयात्पुनर्भवा-त्क्षणायुषां भारतभूजयो वरम् । क्षणेन मर्त्येन कृतं मनस्विनः संन्यस्य संयान्त्यभयं पदं हरेः ॥ २४ न यत्र वैकुण्ठकथासुधापगा न साधवो भागवतास्तदाश्रयाः । न यत्र यज्ञेशमखा महोत्सवाः सुरेशलोकोऽपि न वै स सेव्यताम् ॥ २५ स्कन्ध २४५ शोण नामवाले दो महान् नद, ऋषिकुल्या, त्रिसामा, वेदस्मृति, महानदी, कौशिकी, यमुना, मन्दाकिनी, दृषद्वती, गोमती, सरयू, रोधवती, सप्तवती, सुषोमा, शतद्रु, चन्द्रभागा, मरुवृधा, वितस्ता, असिक्नी और विश्वा - ये प्रसिद्ध नदियाँ हैं । १२ - १८ ॥ इस भारतवर्षमें जन्म लेनेवाले पुरुष अपने-अपने शुक्ल ( सात्त्विक ), लोहित ( राजस ) तथा कृष्ण ( तामस ) कर्मोंके कारण क्रमशः देव, मनुष्य तथा नारकीय भोगोंको प्राप्त करते हैं । भारतवर्ष में निवास करनेवाले सभी लोगोंको अनेक प्रकारके भोग सुलभ होते हैं । अपने वर्णधर्मके नियमोंका पालन करनेसे मोक्षतक निश्चितरूपसे प्राप्त हो जाता है ॥ १ ९ -२० ॥ इस मोक्षरूपी महान् कार्यकी सिद्धिका साधन होनेके कारण ही स्वर्गके निवासी वेदज्ञ मुनिगण भारतवर्षकी महिमाका इस प्रकार वर्णन करते हैं— ॥२१ ॥

अहो! जिन जीवोंने भारतवर्षमें भगवान्की सेवा योग्य जन्म प्राप्त किया है, उन्होंने ऐसा क्या पुण्य किया है? अथवा इनपर स्वयं श्रीहरि ही प्रसन्न हो गये हैं । इस सौभाग्यके लिये तो हमलोग भी लालायित रहते हैं ॥ २२ ॥

हमने कठोर यज्ञ, तप, व्रत, दान आदिके द्वारा जो यह तुच्छ स्वर्ग प्राप्त किया है, इससे क्या लाभ? यहाँ तो इन्द्रियोंके भोगोंकी अधिकता के कारण स्मरणशक्ति क्षीण हो जानेसे भगवान्‌के चरणकमलोंकी स्मृति होती ही नहीं ॥ २३ ॥

इस स्वर्गके निवासियोंकी आयु एक कल्पकी होनेपर भी उन्हें पुनः जन्म लेना पड़ता है । उसकी अपेक्षा भारतभूमिमें अल्प आयुवाला होकर जन्म लेना श्रेष्ठ है; क्योंकि यहाँ धीर पुरुष एक क्षणमें ही अपने इस मर्त्य शरीरसे किये हुए सम्पूर्ण कर्म भगवान्‌को अर्पण करके उनका अभयपद प्राप्त कर लेते हैं ॥ २४ ॥

जहाँ भगवत्कथाकी अमृतमयी सरिता प्रवाहित नहीं होती, जहाँ उसके उद्गमस्थानस्वरूप भगवद्भक्त साधुजन निवास नहीं करते और जहाँ समारोहपूर्वक भगवान् यज्ञेश्वरकी पूजा - अर्चा नहीं होती, वह चाहे ब्रह्मलोक ही क्यों न हो, उसका सेवन नहीं | करना चाहिये ॥ २५ ॥

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२४६ प्राप्ता नृजातिं त्विह ये च जन्तवो ज्ञानक्रियाद्रव्यकलापसम्भृताम् । वै यतेरन्न पुनर्भवाय ते भूयो वनौका इव यान्ति बन्धनम् ॥ यैः श्रद्धया बर्हिषि भागशो हवि-र्निरुप्तमिष्टं विधिमन्त्रवस्तुतः । एकः पृथङ्नामभिराहुतो मुदा गृह्णाति पूर्णः स्वयमाशिषां प्रभुः ॥ सत्यं दिशत्यर्थितमर्थितो नृणां

नैवार्थदो यत्पुनरर्थिता यतः ।

स्वयं विधत्ते भजतामनिच्छता-मिच्छापिधानं निजपादपल्लवम् ॥

( यद्यत्र नः स्वर्गसुखावशेषितं स्विष्टस्य पूर्तस्य कृतस्य शोभनम् । तेनाब्जनाभे स्मृतिमज्जन्म नः स्या-द्वर्षे हरिर्भजतां शं तनोति ॥ ) श्रीनारायण उवाच

एवं स्वर्गगता देवाः सिद्धाश्च परमर्षयः ।

प्रवदन्ति च माहात्म्यं भारतस्य सुशोभनम् ॥

जम्बुद्वीपस्य चाष्टौ हि उपद्वीपाः स्मृताः परे ।

हयमार्गान्विशोधद्भिः सागरैः परिकल्पिताः ॥

स्वर्णप्रस्थश्चन्द्रशुक्र आवर्तनरमाणकौ ।

मन्दरोपाख्यहरिणः पाञ्चजन्यस्तथैव च ॥

सिंहलश्चैव लङ्केति उपद्वीपाष्टकं स्मृतम् । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ११ भारतवर्षमें उत्तम ज्ञान, कर्म तथा द्रव्य आदिसे सम्पन्न मानवयोनि प्राप्त करके भी जो प्राणी पुनर्भव ( आवागमन ) - रूप बन्धनसे छूटनेका प्रयत्न नहीं करते, वे [ व्याधकी फाँसीसे मुक्त २६ होकर फल आदिके लोभसे उसी वृक्षपर विहार करनेवाले ] जंगली पक्षियोंकी भाँति पुनः बन्धनमें पड़ते हैं ॥ २६ ॥

भारतवासियोंका कैसा सौभाग्य है कि जब वे यज्ञमें भिन्न - भिन्न देवताओंके उद्देश्यसे अलग-अलग भाग रखकर विधि, मन्त्र और द्रव्य आदिके २७ योगसे भक्तिपूर्वक हवि प्रदान करते हैं, तब भिन्न - भिन्न नामोंसे पुकारे जानेपर सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाले वे एक पूर्णब्रह्म श्रीहरि स्वयं ही प्रसन्न होकर उस हविभागको ग्रहण करते हैं ॥ २७ ॥

यह ठीक है कि भगवान् सकाम पुरुषोंके माँगनेपर उन्हें अभीष्ट पदार्थ देते हैं, किंतु यह २८ भगवान्‌का वास्तविक दान नहीं है; क्योंकि उन वस्तुओंको पा लेनेपर भी मनुष्यके मनमें पुनः कामनाएँ होती ही रहती हैं । इसके विपरीत जो उनका निष्कामभावसे भजन करते हैं, उन्हें तो वे साक्षात् अपने चरणकमल ही दे देते हैं- जो अन्य समस्त इच्छाओंको समाप्त कर देनेवाले हैं ॥ २८ ॥

( अतः अबतक स्वर्गसुख भोग लेनेके बाद हमारे पूर्वकृत यज्ञ और पूर्त कर्मोंसे यदि कुछ भी पुण्य अवशिष्ट हो, तो उसके प्रभावसे हमें इस भारतवर्षमें भगवान् की स्मृतिसे युक्त मनुष्यजन्म मिले; क्योंकि श्रीहरि अपना भजन करनेवाले प्राणियोंका परम २ ९ कल्याण करते हैं । ) श्रीनारायण बोले- [ हे नारद! ] इस प्रकार स्वर्गको प्राप्त देवता, सिद्ध और महर्षिगण भारतवर्षकी ३० उत्तम महिमाका गान करते हैं ॥ २ ९ ॥ जम्बूद्वीपमें अन्य आठ उपद्वीप भी बताये गये हैं । खोये हुए घोड़ेके मार्गोंका अन्वेषण करनेवाले सगरके पुत्रोंने इन उपद्वीपोंकी कल्पना की थी । ३१ स्वर्णप्रस्थ, चन्द्रशुक्र, आवर्तन, रमाणक, मन्दरहरिण, पांचजन्य, सिंहल और लंका - ये आठ उपद्वीप

पृष्ठ 256

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अ ० १२ ] अष्टम स्कन्ध २४७ जम्बुद्वीपस्य मानं हि कीर्तितं विस्तरेण च ॥ ३२ प्रसिद्ध हैं । इस प्रकार मैंने विस्तारके साथ जम्बूद्वीपका परिमाण बता दिया । अब इसके बाद प्लक्ष आदि छः अतः परं प्रवक्ष्यामि प्लक्षादिद्वीपषट्ककम् ॥ ३३ द्वीपोंका वर्णन करूँगा ॥ ३०– -३३ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामष्टमस्कन्धे भुवनकोशवर्णने भारतवर्षवर्णनं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥

अथ द्वादशोऽध्यायः प्लक्ष, शाल्मलि श्रीनारायण उवाच

जम्बुद्वीपो यथा चायं यत्प्रमाणेन कीर्तितः ।

तावता सर्वतः क्षारोदधिना परिवेष्टितः ॥

जम्ब्वाख्येन यथा मेरुस्तथा क्षारोदकेन च ।

क्षारोदधिस्तु द्विगुणः प्लक्षाख्येनोपवेष्टितः ॥

यथैव परिखा बाह्योपवनेन हि वेष्ट्यते ।

प्लक्षाख्यश्च स्वयं जम्बुप्रमाणो द्वीपरूपधृक् ॥

हिरण्मयोऽग्निस्तत्रैव तिष्ठतीति विनिश्चयः ।

प्रियव्रतात्मजस्तत्र सप्तजिह्व इति स्मृतः ॥

अग्निस्तदधिपस्त्विध्मजिह्वः स्वं द्वीपमेव च ।

विभज्य सप्तवर्षाणि स्वपुत्रेभ्यो ददौ विभुः ॥

स्वयमात्मविदां मान्यां योगचर्यां समाश्रितः ।

तेनैव चात्मयोगेन भगवन्तमुपागतः ॥

शिवं च यवसं भद्रं शान्तं क्षेमामृते तथा ।

अभयं चेति सप्तैव तद्वर्षाणि सदेक्षताम् ॥

तेषु प्रोक्ता नदीः सप्त गिरयः सप्त चैव हि ।

अरुणा नृम्णाङ्गिरसी सावित्री सुप्रभातिका ॥

ऋतम्भरा सत्यम्भरा इति नद्यः प्रकीर्तिताः ।

मणिकूटो वज्रकूट इन्द्रसेनस्तथैव च ॥

ज्योतिष्मान्वै सुपर्णश्च हिरण्यष्ठीव एव च ।

मेघमाल इति ख्याताः प्लक्षद्वीपस्य पर्वताः ॥

नदीनां जलमात्रेण दर्शनस्पर्शनादिभिः ।

निर्धूताशेषरजसो निस्तमस्काः प्रजास्तथा ॥

और कुशद्वीपका वर्णन श्रीनारायण बोले - [ हे नारद! ] यह जम्बूद्वीप जैसा और जितने परिमाणवाला बताया गया है, वह १ उतने ही परिमाणवाले क्षारसमुद्रसे चारों ओरसे उसी प्रकार घिरा है, जैसे मेरुपर्वत जम्बूद्वीपसे घिरा हुआ है । क्षारसमुद्र भी अपनेसे दूने परिमाणवाले प्लक्षद्वीपसे २ उसी प्रकार घिरा हुआ है, जिस प्रकार कोई परिखा ( खाई ) बाहरके उपवनसे घिरी रहती है । जम्बूद्वीपमें जितना बड़ा जामुनका वृक्ष है, उतने ही विस्तारवाला ३ प्लक्ष ( पाकड़ ) -का वृक्ष उस प्लक्षद्वीपमें है, इसीसे वह प्लक्षद्वीप नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ १ - ३ ॥ ४ सुवर्णमय अग्निदेव वहीं पर निश्चितरूपसे प्रतिष्ठित हैं । सात जिह्वाओंवाले ये अग्निदेव प्रियव्रतके पुत्र कहे गये हैं । ' इध्मजिह्व ' नामवाले ये अग्निदेव उस द्वीप ५ अधिपति थे, जिन्होंने अपने द्वीपको सात वर्षोंमें विभक्तकर अपने पुत्रोंको सौंप दिया । तदनन्तर वे ६ ऐश्वर्यशाली इध्मजिह्व आत्मज्ञानियोंके द्वारा मान्य योगसाधनमें तत्पर हो गये । उसी आत्मयोगके साधनसे उन्होंने भगवान्का सांनिध्य प्राप्त किया ॥ ४–६ ॥ ७ शिव, यवस, भद्र, शान्त, क्षेम, अमृत और अभय - प्लक्षद्वीपके ये सात वर्ष उन पुत्रोंके नामोंसे ८ विख्यात हैं । उन वर्षोंमें सात नदियाँ तथा सात पर्वत कहे गये हैं । अरुणा, नृम्णा, आंगिरसी, सावित्री, सुप्रभातिका, ऋतम्भरा और सत्यम्भरा - इन नामोंसे ९ नदियाँ तथा मणिकूट, वज्रकूट, इन्द्रसेन, ज्योतिष्मान्, सुपर्ण, हिरण्यष्ठीव और मेघमाल - इन नामोंसे प्लक्षद्वीप पर्वत प्रसिद्ध हैं ॥ ७–१० ॥ १० प्लक्षद्वीपकी नदियोंके जलके केवल दर्शन, स्पर्श आदिसे वहाँकी प्रजाका सम्पूर्ण पाप समाप्त हो जाता ११ । है और उनका अज्ञानान्धकार मिट जाता है ॥ ११ ॥

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२४८ हंसश्चैव पतङ्गश्च ऊर्ध्वायन इतीव च सत्याङ्गसंज्ञाश्चत्वारो वर्णाः प्लक्षस्य द्वीपके सहस्त्रायुः प्रमाणाश्च विविधोपमदर्शनाः स्वर्गद्वारं त्रयीविद्याविधिनार्कं यजन्ति ते प्रत्नस्य विष्णो रूपं च सत्यर्तस्य च ब्रह्मणः । अमृतस्य च मृत्योश्च सूर्यमात्मानमीमहि

प्लक्षादिषु च सर्वेषु पञ्चद्वीपेषु नारद ।

आयुरिन्द्रियमोजश्च बलं बुद्धिः सहोऽपि च ॥

विक्रमः सर्वलोकानां सिद्धिरौत्पत्तिकी सदा ।

प्लक्षद्वीपात्परं चेक्षुरसोदः सरिताम्पतिः ॥

प्लक्षद्वीपं समग्रं च परिवार्यावतिष्ठते ।

शाल्मलाख्यस्ततो द्वीपश्चास्माद् द्विगुणविस्तरः ॥

समानेन सुरोदेन सिन्धुना परिवेष्टितः ।

यत्र वै शाल्मलीवृक्षः प्लक्षायामः प्रकीर्तितः ॥

स्थानं तत्पक्षिराजस्य गरुडस्य महात्मनः ।

तस्य द्वीपस्य नाथो हि यज्ञबाहुः प्रियव्रतात् ॥

जातः स एव सप्तभ्यः स्वपुत्रेभ्यो ददौ धराम् ।

तद्वर्षाणां च नामानि कथितानि निबोधत ॥

सुरोचनं सौमनस्यं रमणं देववर्षकम् ।

पारिभद्रं तथा चाप्यायनं विज्ञातनामकम् ॥

तेषु वर्षाद्रयः सप्त सप्तैव सरितः स्मृताः ।

सरसः शतशृङ्गश्च वामदेवश्च कन्दकः ॥

कुमुदः पुष्पवर्षश्च सहस्त्रश्रुतिरेव च ।

एते च पर्वताः सप्त नदीनामानि चोच्यते ॥

अनुमतिः सिनीवाली सरस्वती कुहूस्तथा ।

रजनी चैव नन्दा च राकेति परिकीर्तिताः ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १२ । उस प्लक्षद्वीपमें हंस, पतंग, ऊर्ध्वायन और ॥ १२ सत्यांग नामवाले चार वर्णके लोग निवास करते हैं ॥ १२ ॥

। उनकी आयु एक हजार वर्षकी होती है और ॥ १३ वे देखनेमें विलक्षण प्रतीत होते हैं । वे तीनों वेदोंमें बताये गये विधानसे स्वर्गके द्वारस्वरूप भगवान् सूर्यकी इस प्रकार उपासना करते हैं - जो सत्य, ऋत, ॥ १४ वेद तथा सत्कर्मके अधिष्ठाता हैं; अमृत और मृत्यु जिनके विग्रह हैं, हम उन शाश्वत विष्णुरूप भगवान् सूर्यकी शरण लेते हैं ॥ १३-१४ ॥ १५ हे नारद! प्लक्ष आदि सभी पाँचों द्वीपोंमें वहाँके सभी प्राणियोंमें आयु, इन्द्रिय, मनोबल, इन्द्रियबल, १६ शारीरिकबल, बुद्धि और पराक्रम - ये सब स्वाभाविक रूपसे सिद्ध रहते हैं ॥ १५३ ॥

सभी सरिताओंका पति इक्षुरसका समुद्र प्लक्षद्वीपसे १७ भी बड़ा है । वह सम्पूर्ण प्लक्षद्वीपको सभी ओरसे घेरकर स्थित है ॥ १६३ ॥

इस प्लक्षद्वीपके बाद इससे भी दूने विस्तारवाला १८ शाल्मल नामक द्वीप है, जो अपने ही विस्तारवाले सुरोद नामक समुद्र से घिरा हुआ है । वहाँपर एक शाल्मली ( सेमर ) - का वृक्ष है, जो [ प्लक्षद्वीपमें १ ९ स्थित ] ' पाकर ' के वृक्षके विस्तारवाला कहा गया है ॥ १७-१८ ॥ वह शाल्मलीद्वीप पक्षियोंके स्वामी महात्मा २० गरुडका निवासस्थान है । महाराज प्रियव्रतके ही पुत्र यज्ञबाहु उस द्वीपके शासक हुए । उन्होंने अपने सात पुत्रोंमें पृथ्वीको [ विभक्त करके ] प्रदान कर दिया है । २१ अब उन वर्षोंके जो नाम बताये गये हैं; उन्हें सुनिये-सुरोचन, सौमनस्य, रमण, देववर्षक, पारिभद्र, आप्यायन २२ और विज्ञात ॥ १ ९ –२१ ॥ उन वर्षोंमें सात पर्वत और सात ही नदियाँ कही गयी हैं । सरस, शतश्रृंग, वामदेव, कन्दक, कुमुद, २३ | पुष्पवर्ष और सहस्रश्रुति - ये सात पर्वत हैं और अब नदियोंके नाम बताये जाते हैं; अनुमति, सिनीवाली, सरस्वती, कुहू, रजनी, नन्दा और राका - ये नदियाँ २४ | बतायी गयी हैं॥२२-२४ ॥

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अ ० १२ ] अष्टम स्कन्ध २४ ९

तद्वर्षपुरुषाः सर्वे चातुर्वर्ण्यसमाह्वयाः ।

श्रुतधरो वीर्यधरो वसुन्धर इषुन्धरः ॥ २५

भगवन्तं वेदमयं यजन्ते सोममीश्वरम् ।

स्वगोभिः पितृदेवेभ्यो विभजन्कृष्णशुक्लयोः ॥ २६

सर्वासां च प्रजानां च राजा सोमः प्रसीदतु ।

एवं सुरोदाद् द्विगुणः स्वमानेन प्रकीर्तितः ॥ २७

घृतोदेनावृतः सोऽयं कुशद्वीपः प्रकाशते ।

यस्मिन्नास्ते कुशस्तम्बो द्वीपाख्याकारणो ज्वलन् ॥ २८

स्वशष्परोचिषा काष्ठा भासयन्परितिष्ठते ।

हिरण्यरेतास्तद्द्वीपपतिः प्रयव्रतः स्वराट् ॥ २ ९

स्वपुत्रेभ्यश्च सप्तभ्यस्तद्द्वीपं सप्तधाभजत् ।

वसुश्च वसुदानश्च तथा दृढरुचिः परः ॥ ३०

नाभिगुप्तस्तुत्यव्रतौ विविक्तनामदेवकौ ।

तेषां वर्षेषु सप्तैव सीमागिरिवराः स्मृताः ॥३१

नद्यः सप्तैव सन्तीह तन्नामानि निबोधत ।

चक्रस्तथा चतुःशृङ्गः कपिलश्चित्रकूटकः ॥३२

देवानीकश्चोर्ध्वरोमा द्रविणः सप्त पर्वताः ।

रसकुल्या मधुकुल्या मित्रविन्दा तथैव च ॥ ३३

श्रुतविन्दा देवगर्भा घृतच्युन्मन्दमालिके ।

यत्पयोभिः कुशद्वीपवासिनः सर्व एव ते ॥ ३४

कुशल: कोविदश्चैवाप्यभियुक्तस्तथैव च ।

कुलकश्चेति संज्ञाभिश्चतुर्वर्णाः प्रकीर्तिताः ॥ ३५

जातवेदसरूपं तं देवं कर्मजकौशलैः ।

यजन्ते देववर्याभाः सर्वे सर्वविदो जनाः ॥ ३६ ।

उन वर्षोंमें निवास करनेवाले श्रुतधर, वीर्यधर, वसुन्धर और इषुन्धर नामक चार वर्णोंके सभी पुरुष साक्षात् वेदस्वरूप ऐश्वर्यसम्पन्न भगवान् चन्द्रमाकी इस प्रकार उपासना करते हैं - अपनी किरणोंसे पितरोंके लिये कृष्ण तथा देवताओंके लिये शुक्लमार्गका विभाजन करनेवाले और सम्पूर्ण प्रजाओंके राजा भगवान् सोम प्रसन्न हों ॥ २५-२६३ ॥ इसी प्रकार सुरोदकी अपेक्षा दूने विस्तारवाला कुशद्वीप बताया गया है । यह भी अपने ही समान विस्तारवाले घृतोद नामक समुद्रसे घिरा हुआ हैं इसमें कुशोंका एक महान् पुंज प्रकाशित होता रहता है, इसीसे इस द्वीपको कुशद्वीप कहा गया है । प्रज्वलित होता हुआ यह अपनी कोमल शिखाओंकी कान्तिसे सभी दिशाओंको प्रकाशित करता हुआ वहाँ प्रतिष्ठित है ॥ २७-२८३ ॥ उस कुशद्वीपके अधिपति प्रियव्रतपुत्र महाराज हिरण्यरेताने उस द्वीपको अपने सात पुत्रोंमें सात भागोंमें विभाजित कर दिया । वसु, वसुदान, दृढरुचि, नाभिगुप्त, स्तुत्यव्रत, विविक्त और नामदेव – ये उनके नाम थे ॥ २ ९ -३०३ ॥ उनके वर्षोंमें उनकी सीमा निर्धारित करनेवाले सात ही श्रेष्ठ पर्वत कहे गये हैं और सात ही नदियाँ भी हैं । उनके नाम सुनिये - चक्र, चतुःशृंग, कपिल, चित्रकूट, देवानीक, ऊर्ध्वरोमा और द्रविड— ये सात पर्वत हैं और रसकुल्या, मधुकुल्या, मित्रविन्दा, श्रुतविन्दा, देवगर्भा, घृतच्युता तथा मन्दमालिका– ये नदियाँ हैं, जिनके जलमें कुशद्वीपके निवासी स्नान करते हैं । वे सब कुशल, कोविद, अभियुक्त और कुलक – इन नामोंसे चार वर्णोंवाले कहे हैं । श्रेष्ठ देवताओंके सदृश तेजस्वी तथा सर्वज्ञ वहाँके सभी लोग अपने यज्ञ आदि कुशलकर्मोंद्वारा अग्निस्वरूप उन भगवान् श्रीहरिकी उपासना करते हैं | ३१ - ३६ ॥

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२५० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १३ परस्य ब्रह्मणः साक्षाज्जातवेदोऽसि हव्यवाट् । उस द्वीपमें निवास करनेवाले सभी पुरुष अग्निदेवकी इस प्रकार स्तुति करते हैं - ' हे जातवेद! आप देवानां पुरुषाङ्गानां यज्ञेन पुरुषं यज । परब्रह्मको साक्षात् हवि पहुँचानेवाले हैं । अतः भगवान्के अंगभूत देवताओंके यजनद्वारा आप उन परम पुरुषका

एवं यजन्ते ज्वलनं सर्वे द्वीपाधिवासिनः ॥ ३७ । ही यजन करें ' ॥ ३७ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामष्टमस्कन्धे भुवनकोशवर्णने प्लक्षद्वीपकुशद्वीपवर्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥

अथ त्रयोदशोऽध्यायः क्रौंच, शाक और नारद उवाच

शिष्टद्वीपप्रमाणं च वद सर्वार्थदर्शन ।

येन विज्ञातमात्रेण परानन्दमयो भवेत् ॥ १

श्रीनारायण उवाच

कुशद्वीपस्य परितो घृतोदावरणं महत् ।

ततो बहिः क्रौञ्चद्वीपो द्विगुणः स्यात्स्वमानतः ॥ २

क्षीरोदेनावृतो भाति यस्मिन्क्रौञ्चाद्रिरस्ति च ।

नामनिर्वर्तकः सोऽयं द्वीपस्य परिवर्तते ॥ ३

योऽसौ गुहस्य शक्त्या च भिन्नकुक्षिः पुराभवत् ।

क्षीरोदेनासिच्यमानो वरुणेन च रक्षितः ॥ ४

घृतपृष्ठो नाम यस्य विभाति किल नायकः ।

प्रियव्रतात्मजः श्रीमान् सर्वलोकनमस्कृतः ॥ ५

स्वद्वीपं तु विभज्यैव सप्तधा स्वात्मजान्ददौ ।

पुत्रनामसु वर्षेषु वर्षपान्सन्निवेशयन् ॥

स्वयं भगवतस्तस्य शरणं सञ्जगाम ह ।

आमो मधुरुहश्चैव मेघपृष्ठः सुधामकः ॥ ७

भ्राजिष्ठो लोहितार्णश्च वनस्पतिरितीव च ।

नगा नद्यश्च सप्तैव विख्याता भुवि सर्वतः ॥ ८

शुक्लो वै वर्धमानश्च भोजनश्चोपबर्हणः ।

नन्दश्च नन्दनः सर्वतोभद्र इति कीर्तिताः ॥ ९

पुष्करद्वीपका वर्णन नारदजी बोले - हे सर्वार्थदर्शन! अब आप शेष द्वीपोंके परिमाण बतलाइये, जिन्हें जाननेमात्रसे मनुष्य परम आनन्दमय हो जाता है ॥ १ ॥

श्रीनारायण बोले – [ हे नारद! ] कुशद्वीपके चारों ओर घृतके समुद्रका महान् आवरण है । उसके बाहर उससे दूने परिमाणवाला क्रौंचद्वीप है, जो अपने ही समान विस्तारवाले क्षीरसमुद्रसे घिरा हुआ सुशोभित होता है । उसमें क्रौंच नामक पर्वत विद्यमान है, उसीके कारण इसका नाम क्रौंचद्वीप पड़ गया ॥ २-३ ॥ पूर्वकालमें स्वामी कार्तिकेयकी शक्तिके प्रहारसे इसका कटिप्रदेश कट गया था, किंतु क्षीरसमुद्रसे सिंचित और वरुणदेवसे रक्षित होकर यह पुनः स्थिर हो गया ॥४ ॥

इस द्वीपके शासक प्रियव्रतपुत्र घृतपृष्ठ थे । सम्पूर्ण लोकके वन्दनीय उन श्रीमान् ने अपने द्वीपको सात वर्षोंमें विभक्त करके अपने सात पुत्रोंको दे दिया । इस प्रकार पुत्रोंके ही नामवाले वर्षोंके अधिपतिके रूपमें पुत्रोंको नियुक्त करके उन्होंने स्वयं भगवान् श्रीहरिका आश्रय ग्रहण कर लिया ॥ ५-६ ॥ आम, मधुरुह, मेघपृष्ठ, सुधामक, भ्राजिष्ठ, लोहितार्ण और वनस्पति – ये उनके सात पुत्र हैं । [ उनके वर्षोंमें ] सात पर्वत तथा सात नदियाँ इस सम्पूर्ण भूमण्डल पर प्रसिद्ध हैं । शुक्ल, वर्धमान, भाजन, उपबर्हण, नन्द, नन्दन और सर्वतोभद्र — ये पर्वत कहे गये हैं ॥७ – ९ ॥

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अ ० १३ ] अष्टम स्कन्ध २५१

अभया अमृतौघा चार्यका तीर्थवतीति च ।

वृत्तिरूपवती शुक्ला पवित्रवतिका तथा ॥

एतासामुदकं पुण्यं चातुर्वर्ण्येन पीयते ।

पुरुषऋषभौ तद्वद् द्रविणाख्यश्च देवकः ॥

एते चतुर्वर्णजाताः पुरुषा निवसन्ति हि ।

तत्रत्याः पुरुषा आपोमयं देवमपां पतिम् ॥

पूर्णेनाञ्जलिना भक्त्या यजन्ते विविधक्रियाः ।

आपः पुरुषवीर्याः स्थ पुनन्तीर्भूर्भुवः स्वरः ॥

ता नः पुनीतामीवघ्नीः स्पृशतामात्मना भुवः ।

इति मन्त्रजपान्ते च स्तुवन्ति विविधैः स्तवैः ॥

एवं परस्तात्क्षीरोदात्परितश्चोपवेशितः ।

द्वात्रिंशल्लक्षसंख्याकयोजनायाममाश्रितः ॥

स्वमानेन च द्वीपोऽयं दधिमण्डोदकेन च ।

शाकद्वीपो विशिष्टोऽयं यस्मिञ्छाको महीरुहः ॥

स्वक्षेत्रव्यपदेशस्य कारणं स हि नारद ।

प्रयव्रतोऽधिपस्तस्य मेधातिथिरिति स्मृतः ॥

विभज्य सप्त वर्षाणि पुत्रनामानि तेषु च ।

सप्त पुत्रान्निजान् स्थाप्य स्वयं योगगतिं गतः ॥

पुरोजवो मनः पूर्वजवोऽथ पवमानकः ।

धूम्रानीकश्चित्ररेफो बहुरूपोऽथ विश्वधृक् ॥

मर्यादागिरयः सप्त नद्यः सप्तैव कीर्तिताः ।

ईशान ऊरुशृङ्गोऽथ बलभद्रः शतकेशरः ॥

सहस्त्रस्रोतको देवपालोऽप्यन्ते महाशनः ।

एतेऽद्रयः सप्त चोक्ताः सरिन्नामानि सप्त च ॥

अनघा प्रथमायुर्दा उभयस्पृष्टिरेव च ।

अपराजिता पञ्चपदी सहस्त्रश्रुतिरेव च ॥

ततो निजधृतिश्चोक्ताः सप्त नद्यो महोज्ज्वलाः । अभया, अमृतौघा, आर्यका, तीर्थवती, वृत्तिरूपवती, १० शुक्ला और पवित्रवतिका - ये सात नदियाँ हैं । इन नदियोंका पवित्र जल वहाँके चार वर्णोंके समुदायद्वारा पीया जाता है । पुरुष, ऋषभ, द्रविण और देवक— ११ ये चार वर्णोंके पुरुष वहाँ निवास करते हैं । वहाँके पुरुष जलसे भरी हुई अंजलिके द्वारा विविध क्रियाएँ करते हुए भक्तिपूर्वक जलके स्वामी जलरूप १२ भगवान् वरुणदेवकी उपासना इस प्रकार करते हैं - ' हे जलदेवता! आपको परमात्मासे सामर्थ्य प्राप्त है । आप भूः भुवः और स्वः - इन तीनों १३ लोकोंको पवित्र करते हैं; क्योंकि आप स्वरूपसे पापों का नाश करनेवाले हैं । हम अपने शरीरसे १४ आपका स्पर्श करते हैं, आप हमारे अंगोंको पवित्र करें ' - इस मन्त्र जपके पश्चात् वे विविध स्तोत्रोंसे उनकी स्तुति करते हैं ॥१०–१४ ॥ १५ इसी प्रकार क्षीरसमुद्रसे आगे उसके चारों ओर बत्तीस लाख योजन विस्तारवाला शाकद्वीप फैला हुआ है । यह द्वीप भी अपने ही समान परिमाणवाले १६ दधिमण्डोदक समुद्रसे घिरा हुआ है । यह शाकद्वीप एक विशिष्ट द्वीप है, जिसमें ' शाक ' नामक एक १७ विशाल वृक्ष स्थित है । हे नारद! वही वृक्ष इस क्षेत्रके नामका कारण है । प्रियव्रतपुत्र मेधातिथि उस द्वीपके अधिपति कहे जाते हैं । वे इस द्वीपको सात वर्षोंमें १८ विभाजित करके उनमें उन्हींके समान नामवाले अपने सात पुत्रोंको नियुक्तकर स्वयं योगगतिकी प्राप्तिके उद्देश्यसे निकल पड़े । पुरोजव, मनोजव, पवमान, १ ९ धूम्रानीक, चित्ररेफ, बहुरूप और विश्वधृक् - – ये उनके सात पुत्र थे ॥ १५ – १ ९ ॥ इसकी मर्यादा ( सीमा ) निश्चित करनेवाले सात २० प्रसिद्ध पर्वत हैं तथा सात ही नदियाँ हैं । ईशान, उरुशृंग, बलभद्र, शतकेसर, सहस्रस्रोत, देवपाल और २१ महाशन - – ये सात पर्वत वहाँ विद्यमान कहे गये हैं इसी तरह वहाँकी सात नदियोंके भी नाम हैं - अनघा, आयुर्दा, उभयस्पृष्टि, अपराजिता, पंचपदी, सहस्रश्रुति २२ और निजधृति - ये सात परम पवित्र नदियाँ बतायी गयी हैं ॥ २०–२२३ ॥