देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 261–270
देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 261–270
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२५२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १३ तद्वर्षपुरुषाः सर्वे सत्यव्रतक्रतुव्रतौ ॥२३
दानव्रतानुव्रतौ च चतुर्वर्णा उदीरिताः ।
भगवन्तं प्राणवायुं प्राणायामेन संयुताः ॥ २४
यजन्ति निर्धूतरजस्तमसः परमं हरिम् ।
अन्तः प्रविश्य भूतानि यो बिभर्त्यात्मकेतुभिः ॥ २५
अन्तर्यामीश्वरः साक्षात्पातु नो यद्वशे इदम् ।
परस्ताद्दधिमण्डोदात्ततस्तु बहुविस्तरः ॥ २६
पुष्करद्वीपनामायं शाकद्वीपद्विसंगुणः ।
स्वसमानेन स्वादूदकेनायं परिवेष्टितः ॥ २७
यत्रास्ते पुष्करं भ्राजदग्निचूडानिभानि च ।
पत्राणि विशदानीह स्वर्णपत्रायुतायुतम् ॥ २८
श्रीमद्भगवतश्चेदमासनं परमेष्ठिनः ।
कल्पितं लोकगुरुणा सर्वलोकसिसृक्षया ॥ २ ९
तद्वीप एक एवायं मानसोत्तरनामकः ।
अर्वाचीनपराचीनवर्षयोरवधिर्गिरिः ॥३०
उच्छ्रायायामयोः संख्यायुतयोजनसम्मिता ।
यत्र दिक्षु च चत्वारि चतसृषु पुराणि ह ॥ ३१
इन्द्रादिलोकपालानां यदुपर्यर्कनिर्गमः ।
मेरुं प्रदक्षिणीकुर्वन् भानुः पर्येति यत्र हि ॥ ३२
संवत्सरात्मकं चक्रं देवाहोरात्रतो भ्रमन् ।
प्रयव्रतोऽधिपो वीतिहोत्रः स्वात्मजकद्वयम् ॥ ३३
वर्षद्वये परिस्थाप्य वर्षनामधरं क्रमात् ।
रमणो धातकिश्चैव तत्तद्वर्षपती उभौ ॥ ३४
कृताः स्वयं पूर्वजवद्भगवद्भक्तितत्पराः । उस वर्षके सभी पुरुष सत्यव्रत, क्रतुव्रत, दानव्रत और अनुव्रत - इन चार वर्णोंवाले कहे गये हैं । वे प्राणायामके द्वारा अपने रजोगुण तथा तमोगुणको नष्ट करके प्राणवायुरूप परमेश्वर भगवान् श्रीहरिकी इस प्रकार उपासना करते हैं । ' जो प्राणादिवृत्तिरूप अपनी ध्वजाओंके सहित प्राणियोंके भीतर प्रवेश करके उनका पालन करते हैं तथा यह सम्पूर्ण जगत् जिनके अधीन है, वे साक्षात् अन्तर्यामी भगवान् वायु हमारी रक्षा करें ॥ २३ - २५३ ॥ इसी प्रकार उस दधिमण्डोद समुद्रसे आगे बहुत विस्तारवाला पुष्कर नामक अन्य द्वीप है, यह शाकद्वीपसे दो गुने विस्तारका है । यह अपने समान विस्तारवाले स्वादिष्ट जलके समुद्रसे चारों ओरसे
घिरा हुआ है । २६-२७ ॥
अग्निकी शिखाके समान प्रकाशमान विशाल पंखुड़ियोंवाला तथा लाखों स्वर्णमय पत्रोंवाला एक पुष्कर ( कमल ) इस द्वीपमें विराजमान है । समस्त लोकोंकी रचना करनेकी कामनासे लोकगुरु श्रीहरिने भगवान् ब्रह्माके आसनके रूपमें उस कमलकी रचना की ॥ २८-२९ ॥ उस द्वीपमें उसके पूर्वी तथा पश्चिमी वर्षोंकी सीमा निश्चित करनेवाला मानसोत्तर नामक एक ही पर्वत है । यह दस हजार योजन ऊँचा तथा इतना ही विस्तृत है । इसकी चारों दिशाओंमें इन्द्र आदि लोकपालोंके चार पुर हैं और इनके ऊपरसे होकर सूर्य निकलते हैं और वे सुमेरुकी प्रदक्षिणा करते हुए संवत्सरात्मक चक्रके रूपमें देवताओंके दिन ( उत्तरायण ) तथा रात ( दक्षिणायन ) -के क्रमसे घूमते हुए परिक्रमण करते रहते हैं ॥ ३०-३२ ॥ उस द्वीपके अधिपति प्रियव्रतपुत्र वीतिहोत्र उसे दो वर्षोंमें बाँटकर वर्षोंके ही नामवाले अपने दो पुत्रों रमण तथा धातकीको उन वर्षोंका स्वामी नियुक्त करके स्वयं अपने बड़े भाइयोंकी भाँति भगवान् श्रीहरिकी भक्तिमें संलग्न हो गये ॥ ३३-३४३ ॥
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अ ० १४ ] अष्टम स्कन्ध २५३ तद्वर्षपुरुषा ब्रह्मरूपिणं परमेश्वरम् ॥ ३५ सकर्मकेन योगेन यजन्ति परिशीलिताः ।
यत्तत्कर्ममयं लिङ्गं ब्रह्मलिङ्गं जनोऽर्चयेत् ।
एकान्तमद्वयं शान्तं तस्मै भगवते नमः ॥ ३६
उन वर्षोंमें निवास करनेवाले शीलसम्पन्न पुरुष ब्रह्मसालोक्यादिकी प्राप्ति करानेवाले कर्मयोगके द्वारा ब्रह्मस्वरूप परमेश्वरकी इस प्रकार उपासना करते हैं — ‘ कर्मफलस्वरूप, ब्रह्मके साक्षात् विग्रह, एकान्तस्वभाव, अद्वैत तथा शान्तस्वरूप जिन परमेश्वरकी लोग अर्चना करते हैं, उन भगवान् । श्रीहरिको नमस्कार है'॥३५-३६ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामष्टमस्कन्धे भुवनकोशवर्णने क्रौञ्चशाकपुष्करद्वीपवर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
अथ चतुर्दशोऽध्यायः लोकालोकपर्वतका वर्णन श्रीनारायण उवाच
ततः परस्तादचलो लोकालोकेति नामकः ।
अन्तराले च लोकालोकयोर्यः परिकल्पितः ॥
यावदस्ति च देवर्षे ह्यन्तरं मानसोत्तरात् ।
सुमेरोस्तावती शुद्धा काञ्चनी भूमिरस्ति हि ॥
दर्पणोदरतुल्या सा सर्वप्राणिविवर्जिता ।
यस्यां पदार्थः प्रहितो न किञ्चित्प्रत्युदीयते ॥
अतः सर्वप्राणिसङ्घरहिता सा च नारद ।
लोकालोक इति व्याख्या यदत्र परिकल्पिता ॥
लोकालोकान्तरे चास्य वर्तते सर्वदा स्थितिः ।
ईश्वरेण स लोकानां त्रयाणामन्तगः कृतः ॥
सूर्यादीनां ध्रुवान्तानां रश्मयो यद्वशादिह ।
अर्वाचीनाश्च त्रीँल्लोकानातन्वानाः कदापि हि ॥
पराचीनत्वभाजो हि न भवन्ति च नारद ।
तावदुन्नहनायामः पर्वतेन्द्रो महोदयः ॥
एतावाँल्लोकविन्यासोऽयं संस्थामानलक्षणैः ।
कविभिः स तु पञ्चाशत्कोटिभिर्गणितस्य च ॥
श्रीनारायण बोले- [ हे नारद! ] उसके आगे लोकालोक नामक पर्वत है, जो प्रकाशित तथा १ अप्रकाशित - दो प्रकारके लोकोंका विभाग करनेके लिये उनके मध्यमें स्थित है ॥ १ ॥
हे देवर्षे! मानसोत्तरपर्वतसे लेकर सुमेरुपर्वततक २ जितना अन्तर है, उतनी भूमि सुवर्णमयी तथा दर्पणके समान स्वच्छ है । वह भूमि सर्वसाधारण प्राणियोंसे रहित है । इसमें गिरी हुई कोई वस्तु फिर नहीं ३ मिलती । अतः हे नारद! वह भूमि [ देवताओंके अतिरिक्त ] सभी प्राणिसमुदायसे रहित है । इस पर्वतको लोकालोक जो कहा गया है, वह इसीलिये; क्योंकि ४ यह सूर्य से प्रकाशित तथा अप्रकाशित दो भागोंके मध्य स्थित है ॥ २–४३ ॥ भगवान्ने त्रिलोकीकी सीमा निर्धारित करनेके ५ लिये उस पर्वतका निर्माण किया है । हे नारद! सूर्य आदिसे लेकर ध्रुवपर्यन्त सभी ग्रहोंकी किरणें उसके अधीन होनेके कारण उसके एक ओरसे तीनों ६ लोकोंको प्रकाशित करती हैं और दूसरी ओरके लोक प्रकाशित नहीं हो पाते ॥ ५-६३ ॥ यह अति विशाल पर्वतराज जितना ऊँचा है, ७ उतना ही विस्तृत है । लोकोंका विस्तार इतना ही है । गणितशास्त्र के विद्वानोंने स्थिति, मान और लक्षणके अनुसार सम्पूर्ण भूगोलका परिमाण पचास करोड़ ८ योजन निश्चित किया है । हे मुने! उस भूगोलका
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२५४ भूगोलस्य चतुर्थांशो लोकालोकाचलो मुने तस्योपरि चतुर्दिक्षु ब्रह्मणा चात्मयोनिना निवेशिता दिग्गजा ये तन्नामानि निबोधत ऋषभः पुष्पचूडोऽथ वामनोऽथापराजितः एते समस्तलोकस्य स्थितिहेतव ईरिताः । तेषां च स्वविभूतीनां बहुवीर्योपबृंहणम् श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १४ । चौथाई भाग ( साढ़े बारह करोड़ योजन ) केवल यह ॥ ९ लोकालोकपर्वत ही है । उसके ऊपर चारों दिशाओं में स्वयम्भू ब्रह्माजीने जिन चार दिग्गजोंको नियुक्त किया । है, उनके नाम हैं — ऋषभ, पुष्पचूड, वामन और ॥ १० अपराजित । इन दिग्गजोंको समस्त लोकोंकी स्थितिका कारण कहा गया है ॥ ७– - १०३ ॥ भगवान् श्रीहरि उन दिग्गजों तथा अपनी विभूतिस्वरूप इन्द्र आदि लोकपालोंकी विविध शक्तियों के ॥ ११ विकास और उनमें विशुद्ध गुण तथा ऐश्वर्यकी वृद्धि विशुद्धसत्त्वं चैश्वर्यं वर्धयन्भगवान् हरिः आस्ते सिद्ध्यष्टकोपेतो विष्वक्सेनादिसंवृतः निजायुधैः परिवृतो भुजदण्डैः समन्ततः । आस्ते सकललोकस्य स्वस्तये परमेश्वरः आकल्पमेवं वेषं स गतो विष्णुः सनातनः । स्वमायारचितस्यास्य गोपीथायात्मसाधनः
योऽन्तर्विस्तार एतेन ह्यलोकपरिमाणकम् ।
व्याख्यातं यद्बहिर्लोकालोकाचल इतीरणात् ॥
ततः परस्ताद्योगेशगतिं शुद्धां वदन्ति हि ।
अण्डमध्यगतः सूर्यो द्यावाभूम्योर्यदन्तरम् ॥
सूर्याण्डगोलयोर्मध्ये कोट्यः स्युः पञ्चविंशतिः । मृतेऽण्ड एष एतस्मिञ्जातो मार्तण्डशब्दभाक् हिरण्यगर्भ इति यद्धिरण्याण्डसमुद्भवः । सूर्येण हि विभज्यन्ते दिशः खं द्यौर्महीभिदा
स्वर्गापवर्गौ नरका रसौकांसि च सर्वशः ।
देवतिर्यमनुष्याणां सरीसृपसवीरुधाम् ॥
सर्वजीवनिकायानां सूर्य आत्मा दृगीश्वरः । एतावान्भूमण्डलस्य सन्निवेश उदाहृतः । करनेके उद्देश्यसे आठों सिद्धियोंसहित विष्वक्सेन आदि पार्षदोंसे घिरे हुए सदा उस लोकालोकपर्वतपर ॥ १२ विराजमान रहते हैं । सम्पूर्ण लोकके कल्याणके लिये चारों भुजाओंमें अपने शंख, चक्र, गदा तथा पद्म— इन आयुधोंसे सुशोभित होते हुए भगवान् श्रीहरि वहाँ ॥ १३ सर्वत्र विराजमान हैं । अपने मायारचित इस जगत्की रक्षाके लिये स्वयं साधनस्वरूप वे सनातन भगवान् अपने लीलामयरूपसे ऐसे वेषको धारण किये वहाँ ॥ १४ । कल्पपर्यन्त प्रतिष्ठित रहते हैं ॥ ११ - १४ ॥ लोकालोकपर्वतके अन्तर्वर्ती भागका जो विस्तार कहा गया है, इसीसे उसके दूसरी ओरके अलोक १५ प्रदेशके परिमाणकी व्याख्या समझ लेनी चाहिये । विद्वान् लोग कहते हैं कि उसके आगे योगेश्वरोंकी ही विशुद्ध गति सम्भव है । पृथ्वी तथा स्वर्गके बीचमें १६ जो ब्रह्माण्डका केन्द्र है, वही सूर्यकी स्थिति है । सूर्य तथा ब्रह्माण्डगोलकके बीच सभी ओर पचीस करोड़ योजनकी दूरी है । इस मृत ब्रह्माण्डमें सूर्यके विराजमान ॥ १७ रहनेके कारण इनका नाम ' मार्तण्ड ' पड़ा और हिरण्यमय ब्रह्माण्डसे उत्पन्न होनेके कारण इन्हें ' हिरण्यगर्भ ' कहा जाता है ॥ १५ – १७३ ॥ दिशा, आकाश, अन्तरिक्ष, पृथ्वी, स्वर्ग, अपवर्ग, ॥ १८ नरक और पाताल - इन सभीका भलीभाँति विभाजन सूर्यके ही द्वारा किया जाता है । देवता, पशु - पक्षी, मनुष्य, रेंगकर चलनेवाले जन्तुओं, वृक्ष तथा अन्य १ ९ सभी प्रकारके जीवसमूहोंकी आत्मा सूर्य ही हैं । ये नेत्रेन्द्रियके स्वामी हैं । हे नारद! भूमण्डलका इतना ही विस्तार कहा गया है । इस विषयके ॥ २० जानकार लोग इसीके द्वारा स्वर्गलोकका भी विस्तार
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अ ० १५ ] एतेन हि दिवो मानं वर्णयन्ति च तद्विदः द्विदलानां च निष्पावादीनां च दलयोर्यथा अन्तरेण तयोरन्तरिक्षं तदुभयसन्धितम् यन्मध्यगश्च भगवान् भानुर्वै तपतां वरः आतपेन त्रिलोकं च प्रतपत्येव भासयन् उत्तरायणमासाद्य गतिमान्द्यं वितन्वते आरोहणस्थानमसौ गत्वाहो दैर्घ्यमाचरेत् दक्षिणायनमासाद्य गतिशैत्र्यं वितन्वते अवरोहस्थानमसौ गच्छन्हस्वं दिनं चरेत् । विषुवत्संज्ञमासाद्य गतिसाम्यं वितन्वते समस्थानमथासाद्य दिनसाम्यं करोति च । अष्टम स्कन्ध २५५ । बतलाते हैं, जैसे कि चना मटर आदिके दो दलोंमेंसे ॥ २१ एकका स्वरूप जान लेनेपर दूसरेका अनुमान कर लिया जाता है ॥ १८–२१ ॥ । उन द्युलोक तथा पृथ्वीलोकके मध्य में अन्तरिक्ष ॥ २२ स्थित है । अन्तरिक्ष उन दोनोंका सन्धिस्थान है । इसके मध्यमें स्थित रहकर तपनेवाले ग्रहोंमें श्रेष्ठ । भगवान् सूर्य चमकते हुए अपनी ऊष्मासे तीनों ॥ २३ लोकोंको प्रतप्त करते हैं ॥ २२३ ॥
उत्तरायण होनेपर सूर्य मन्दगति से चलने लगते । हैं । उत्तरायण उनका आरोहणस्थान है, जहाँ पहुँचनेपर ॥ २४ दिनमें वृद्धि होने लगती है । दक्षिणायनकी स्थिति प्राप्त करके वे तीव्र गति धारण कर लेते हैं । दक्षिणायन उनका अवरोहस्थान है, जिसपर सूर्यके ॥ २५ चलनेपर दिन छोटा होने लगता है ॥ २३-२४३ ॥ विषुवत् नामक स्थानपर पहुँचनेपर सूर्यकी यदा च मेषतुलयोः सञ्चरेद्धि दिवाकरः ॥ २६ गतिमें समानता आ जाती है । इस समस्थानपर सूर्यके समानानि त्वहोरात्राण्यातनोति त्रयीमयः वृषादिपञ्चसु यदा राशिष्वर्को विरोचते तदाहानि च वर्धन्ते रात्रयोऽपि हसन्ति च वृश्चिकादिषु सूर्यो हि यदा सञ्चरते रविः तदापीमान्यहोरात्राणि भवन्ति विपर्ययात् आनेपर दिनके परिमाणमें समानता आ जाती है । जब । वेदस्वरूप भगवान् सूर्य मेष और तुला राशिपर ॥ २७ संचरण करते हैं, तब दिन और रात समान होने लगते हैं । जब सूर्य वृष आदि पाँच राशियोंपर होते हैं, तब । दिन बढ़ने लगते हैं और रातें छोटी होने लगती हैं । ॥ २८ इसी प्रकार जब सूर्य वृश्चिक आदि पाँच राशियोंपर गति करते हैं, तब दिन और रातमें इसके विपरीत ॥ २ ९ । परिवर्तन होते हैं ॥ २५–२९ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामष्टमस्कन्थे सूर्यगतिवर्णनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
अथ पञ्चदशोऽध्यायः सूर्यकी श्रीनारायण उवाच
अतः परं प्रवक्ष्यामि भानोर्गमनमुत्तमम् ।
शीघ्रमन्दादिगतिभिस्त्रिविधं गमनं रवेः ॥
सर्वग्रहाणां त्रीण्येव स्थानानि सुरसत्तम ।
स्थानं जारद्गवं मध्यं तथैरावतमुत्तरम् ॥
वैश्वानरं दक्षिणतो निर्दिष्टमिति तत्त्वतः । गतिका वर्णन श्रीनारायण बोले- हे
उत्तम गतिका वर्णन करूँगा ।
१ । द्वारा सूर्यका गमन होता है ॥
हे सुरश्रेष्ठ! सभी ग्रहोंके स्थान हैं — जारद्गव, ऐरावत २ जारद्गव मध्यमें, ऐरावत उत्तरमें नारद! अब मैं सूर्यकी शीघ्र, मन्द गतियोंके १ ॥ तीन ही स्थान हैं । वे तथा वैश्वानर; जिनमें तथा वैश्वानर दक्षिणमें यथार्थतः निर्दिष्ट किये गये हैं ॥ २३ ॥
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२५६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १५ अश्विनी कृत्तिका याम्या नागवीथीति शब्दिता रोहिण्यार्द्रा मृगशिरो गजवीथ्यभिधीयते । पुष्याश्लेषा तथादित्या वीथी चैरावती स्मृता एतास्तु वीथयस्तिस्त्र उत्तरो मार्ग उच्यते । तथा द्वे चापि फल्गुन्यौ मघा चैवार्षभी मता हस्तश्चित्रा तथा स्वाती गोवीथीति तु शब्दिता ज्येष्ठा विशाखानुराधा वीथी जारद्गवी मता
एतास्तु वीथयस्तिस्रो मध्यमो मार्ग उच्यते ।
मूलाषाढोत्तराषाढा अजवीथ्यभिशब्दिता ॥
श्रवणं च धनिष्ठा च मार्गी शतभिषक् तथा ।
वैश्वानरी भाद्रपदे रेवती चैव कीर्तिता ॥
एतास्तु वीथयस्तिस्रो दक्षिणो मार्ग उच्यते ।
उत्तरायणमासाद्य युगाक्षान्तर्निबद्धयोः ॥
कर्षणं पाशयोर्वायुबद्धयो रोहणं स्मृतम् ।
तदाभ्यन्तरगान्मण्डलाद्रथस्य गतेर्भवेत् ॥
मान्द्यं दिवसवृद्धिश्च जायते सुरसत्तम ।
रात्रिह्रासश्च भवति सौम्यायनक्रमो ह्ययम् ॥
दक्षिणायनके पाशे प्रेरणादवरोहणम् ।
बहिर्मण्डलवेशेन गतिशैत्र्यं तदा भवेत् ॥
तदा दिनाल्पता रात्रिवृद्धिश्च परिकीर्तिता ।
वैषुवे पाशसाम्यात्तु समावस्थानतो रवेः ॥
मध्यमण्डलवेशश्च साम्यं रात्रिदिनादिके ।
आकृष्येते यदा तौ तु ध्रुवेण समधिष्ठितौ ॥
तदाभ्यन्तरतः सूर्यो भ्रमते मण्डलानि च ।
ध्रुवेण मुच्यमानेन पुना रश्मियुगेन तु ॥
तथैव बाह्यतः सूर्यो भ्रमते मण्डलानि च । ॥ ३ अश्विनी, भरणी और कृत्तिकाको नागवीथी कहा जाता है । रोहिणी, मृगशिरा और आर्द्राको गजवीथी कहा जाता है । इसी प्रकार पुनर्वसु, पुष्य ॥ ४ और अश्लेषाको ऐरावती - २७ ९वीथी कहा गया है ये तीनों वीथियाँ उत्तरमार्ग कही गयी हैं ॥ ३-४३ ॥ मघा, पूर्वाफाल्गुनी और उत्तराफाल्गुनीको आर्षभी-॥ ५ वीथी माना गया है । हस्त, चित्रा तथा स्वातीको गोवीथी कहा गया है और इसी प्रकार ज्येष्ठा, विशाखा तथा । अनुराधाको जारद्गवीवीथी कहा गया है । इन तीनों ॥ ६ वीथियोंको मध्यममार्ग कहा जाता है॥५-६३ ॥ मूल, पूर्वाषाढ़ और उत्तराषाढ़ अजवीथी नामसे पुकारी जाती है । श्रवण, धनिष्ठा और शतभिषाको ७ मार्गीवीथी कहा जाता है और इसी तरह पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और रेवती वैश्वानरीवीथीके नामसे ८ प्रसिद्ध हैं । ये तीनों वीथियाँ दक्षिणमार्ग कही जाती हैं ॥ ७-८३ ॥ जब सूर्यका रथ उत्तरायण मार्गपर रहता है, उस ९ समय उसके दोनों पहियेके अक्षोंसे आबद्ध पवनरूपी पाशसे बँधकर ध्रुवद्वारा उसका कर्षण ' आरोहण ' कहा गया है । उस समय मण्डलके भीतर रथ चलनेसे १० गतिकी मन्दता हो जाती है । हे सुरश्रेष्ठ! इस मन्द गति दिनकी वृद्धि और रातका ह्रास होने लगता है । यही सौम्यायनका क्रम है । इसी प्रकार जब वह रथ ११ | दक्षिणायन मार्गपर पाशद्वारा खींचा जाता है, तब वह अवरोहण गति होती है । उस समय मण्डलके बाहरसे गति होनेके कारण सूर्यकी गतिमें तीव्रता हो जाती १२ है । उस समय दिनका छोटा तथा रातका बड़ा होना बताया गया है॥९ –१२३ ॥ १३ विषुव मार्गपर सूर्यका रथ पाशद्वारा किसी ओर न खींचे जानेके कारण साम्य स्थिति बनी रहती है । इसमें मण्डलके मध्यसे गति होनेसे दिन तथा रातके १४ मानमें समानता होती है ॥ १३३ ॥
जब ध्रुवकी प्रेरणासे दोनों वायुपाश खींचे जाते हैं, उस समय भीतरके मण्डलोंमें ही सूर्य चक्कर १५ लगाते हैं । पुनः ध्रुवके द्वारा दोनों पाशोंके मुक्त किये जाते ही सूर्य बाहरके मण्डलोंमें चक्कर लगाने लगते हैं ॥ १४-१५३ ॥
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अ ० १५ ] तस्मिन्मेरौ पूर्वभागे पुर्यैन्द्री देवधानिका ॥
दक्षिणे वै संयमनी नाम याम्या महापुरी ।
पश्चान्निम्लोचनी नाम वारुणी वै महापुरी ॥
तदुत्तरे पुरी सौम्या प्रोक्ता नाम विभावरी ।
ऐन्द्रपुर्यां रवेः प्रोक्त उदयो ब्रह्मवादिभिः ॥
संयमन्यां च मध्याह्ने निम्लोचन्यां निमीलनम् । विभावर्यां निशीथः स्यात्तिग्मांशोः सुरपूजितः
प्रवृत्तेश्च निमित्तानि भूतानां तानि सर्वशः ।
मेरोश्चतुर्दिशं भानोः कीर्तितानि मया मुने ॥
मेरुस्थानां सदा मध्यं गत एव विभाति हि ।
सव्यं गच्छन्दक्षिणेन करोति स्वर्णपर्वतम् ॥
उदयास्तमये चैव सर्वकालं तु सम्मुखे । दिशास्वशेषासु तथा सुरर्षे विदिशासु च यैर्यत्र दृश्यते भास्वान्स तेषामुदयः स्मृतः । तिरोभावं च यत्रैति तत्रैवास्तमनं रवेः नैवास्तमनमर्कस्य नोदयः सर्वदा सतः । उदयास्तमनाख्यं हि दर्शनादर्शनं रवेः शक्रादीनां पुरे तिष्ठन्स्पृशत्येष पुरत्रयम् । विकर्णौ द्वौ विकर्णस्थस्त्रीन्कोणान्द्वे पुरे तथा सर्वेषां द्वीपवर्षाणां मेरुरुत्तरतः स्थितः यैर्यत्र दृश्यते भानुः सैव प्राचीति चोच्यते तद्वामभागतो मेरुर्वर्ततेति विनिर्णयः यदि चैन्द्र्याः प्रचलते घटिका दशपञ्चभिः याम्यां तदा योजनानां सपादं कोटियुग्मकम् सार्धद्वादशलक्षाणि पञ्चनेत्रसहस्त्रकम् प्रक्रामति सहस्त्रांशुः कालमार्गप्रदर्शकः अष्टम स्कन्ध २५७ १६ उस मेरुपर्वतपर पूर्वभागमें इन्द्रकी पुरी ' देवधानिका ' और दक्षिणभागमें यमराजकी ' संयमनी ' नामक विशाल पुरी विद्यमान है । पश्चिममें वरुणदेवकी १७ ' निम्लोचनी ' नामक महान् पुरी है और उस मेरुके उत्तर - भागमें चन्द्रमाकी ' विभावरी ' नामक पुरी बतायी गयी है ॥ १६-१७३ ॥ १८ ब्रह्मवादियोंके द्वारा कहा गया है कि सूर्यका उदय इन्द्रकी पुरीमें होता है और वे मध्याह्नकालमें संयमनीपुरीमें पहुँचते हैं । सूर्यके निम्लोचनीपुरीमें पहुँचनेपर सायंकाल ॥ १ ९ और विभावरीपुरीमें पहुँचनेपर आधी रात होती है । वे भगवान् सूर्य सभी देवताओंके पूज्य हैं ॥ १८-१९ ॥ हे मुने! सुमेरुपर्वतके चारों ओर सूर्यके जिस २० परिभ्रमणसे जीवधारियोंकी सभी क्रियाएँ सम्पन्न होती हैं, उसका वर्णन मैंने कर दिया ॥२० ॥
२१ सुमेरुपर रहनेवालोंको सूर्य सदा मध्यमें विराजमान प्रतीत होते हैं । सूर्यका रथ सुमेरुके बायें चलते हुए वायुकी प्रेरणासे दायें हो जाता है । अतः उदय तथा ॥ २२ अस्त - समयोंमें सर्वदा वह सामने ही पड़ता है । हे देवर्षे! सभी दिशाओं तथा विदिशाओंमें रहनेवाले जो लोग सूर्यको जहाँ देखते हैं, उनके लिये वह सूर्योदय ॥ २३ तथा जहाँ सूर्य छिप जाते हैं, वहाँके लोगोंके लिये वह सूर्यास्त माना गया है । सर्वदा विद्यमान रहनेवाले सूर्यका न तो उदय होता है और न अस्त ही होता ॥ २४ है, उनका दर्शन तथा अदर्शन ही उदय और अस्त नामसे कहा गया है ॥२१ - २४ ॥ जिस समय सूर्य इन्द्र आदिकी पुरीमें पहुँचते हैं, ॥ २५ उस समय उनके प्रकाशसे तीनों लोक प्रकाशित होने । लगते हैं । दो विकर्ण, उनके तीन कोण तथा दो ॥ २६ पुरियाँ - सबमें सूर्य की किरणसे प्रकाश फैल जाता है । सम्पूर्ण द्वीप और वर्ष सुमेरुके उत्तरमें स्थित हैं । जो । लोग सूर्यको जहाँ उदय होते देखते हैं, उनके लिये ॥ २७ वही पूर्व दिशा कही जाती है । २५-२६ ॥ उसके वाम भागमें मेरुपर्वत है - ऐसा सुनिश्चित । है । काल तथा मार्गके प्रदर्शक हजार किरणोंवाले सूर्य ॥ २८ जब इन्द्रपुरीसे संयमनीपुरीको जाते हैं, तब वे पन्द्रह घड़ीमें सवा दो करोड़ बारह लाख पचहत्तर हजार । योजनकी दूरी तय करते हैं॥२७-२८३ ॥ 1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] -9 A
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२५८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १५ एवं ततो वारुणीं च सौम्यामैन्द्रीं सहस्त्रदृक् ॥
पर्येति कालचक्रात्मा घुमणिः कालबुद्धये ।
तथा चान्ये ग्रहाः सोमादयो ये दिग्विचारिणः ॥
नक्षत्रैः सह चोद्यन्ति सह चास्तं व्रजन्ति ते ।
एवं मुहूर्तेन रथो भानोरष्टशताधिकम् ॥
योजनानां चतुस्त्रिंशल्लक्षाणि भ्रमति प्रभुः ।
त्रयीमयश्चतुर्दिक्षु पुरीषु च समीरणात् ॥
प्रवहाख्यात्सदा कालचक्रं पर्येति भानुमान् ।
यस्य चक्रं रथस्यैकं द्वादशारं त्रिनाभिकम् ॥
षण्नेमि कवयस्तं च वत्सरात्मकमूचिरे ।
मेरुमूर्धनि तस्याक्षो मानसोत्तरपर्वते ॥
कृतेतरविभागो यः प्रोतं तत्र रथाङ्गकम् । तैलकारकयन्त्रेण चक्रसाम्यं परिभ्रमन् ।
मानसोत्तरनाम्नीह गिरौ पर्येति चांशुमान् ।
तस्मिन्नक्षे कृतं मूलं द्वितीयोऽक्षो ध्रुवे कृतः ॥
तुर्यमानेन तैलस्य यन्त्राक्षवदितीरितः ।
कृतोपरितनो भागः सूर्यस्य जगतां पतेः ॥
रथनीडस्तु षट्त्रिंशल्लक्षयोजनमायतः ।
तत्तुर्यभागतः सोऽयं परिणाहेन कीर्तितः ॥
तावानर्करथस्यात्र युगस्तस्मिन्हयाः शुभाः ।
सप्तच्छन्दोऽभिधानाश्च सूरसूतेन योजिताः ॥
वहन्ति देवमादित्यं लोकानां सुखहेतवे ।
पुरस्तात्सवितुः सूतोऽरुणः पश्चान्नियोजितः ॥
सौत्ये कर्मणि संयुक्तो वर्तते गरुडाग्रजः । 1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –9 B २ ९ इसी प्रकार सहस्र नेत्रोंवाले कालचक्रात्मा सूर्य कालज्ञान करानेके लिये वरुणलोक, चन्द्रलोक तथा इन्द्रलोकका भ्रमण करते हैं ॥ २ ९ ३ ॥ ३० चन्द्रमा आदि अन्य आकाशचारी जो भी ग्रह हैं, वे नक्षत्रोंके साथ उदय तथा अस्त होते रहते हैं ॥ ३०३ ॥
३१ इस प्रकार भगवान् सूर्यका वेदमय रथ एक मुहूर्तमें चौंतीस लाख आठ सौ योजन चलता है । प्रवह नामक वायुके प्रभावसे वह तेजस्वी कालचक्र ३२ चारों दिशाओंमें स्थित चारों पुरियोंपरसे घूमता रहता है ॥ ३१-३२३ ॥ सूर्यके रथके एक चक्केमें बारह अरे, तीन ३३ धुरियाँ तथा छ: नेमियाँ हैं; विद्वान् लोग उस चक्केको एक संवत्सरकी संज्ञा प्रदान करते हैं । इस रथकी धुरीका एक सिरा सुमेरुपर्वतके शिखरपर और ३४ दूसरा मानसोत्तरपर्वतके शिखरपर स्थित है । इस धुरीमें लगा हुआ जो पहिया है, वह तेल निकालनेवाले यन्त्र ( कोल्हू ) -के पहियेकी भाँति घूमता रहता है ३५ और सूर्य भी उस मानसोत्तरपर्वतके ऊपर भ्रमण करते रहते हैं ॥ ३३ - – ३५३ ॥ उस धुरीमें जिसका मूल भाग लगा हुआ ३६ है, ऐसी ही एक दूसरी धुरी है, जिसकी लम्बाई पहली धुरीकी चौथाई है । ध्रुवसे लगी हुई वह धुरी तैलयन्त्रकी धुरीके सदृश कही गयी ३७ है ॥ ३६३ ॥
रथके ऊपरी भागमें जगत्के स्वामी सूर्यके बैठनेका स्थान छत्तीस लाख योजन लम्बा तथा ३८ उसका चतुर्थांश अर्थात् नौ लाख योजन चौड़ा बताया गया है । उतना ही परिमाणवाला सूर्यके रथका जूआ भी है । रथके सारथि ( अरुण ) - के द्वारा उस जू में ३ ९ जुते हुए गायत्री आदि छन्दोंके नामवाले सात घोड़े जगत्के प्राणियोंके कल्याणके लिये भगवान् सूर्यका वहन करते रहते हैं ॥ ३७–३९ ३ ॥ ४० सूर्यके आगे उन्हींकी ओर मुख करके उनके सारथि अरुण बैठते हैं । सारथिके कामपर नियुक्त ये अरुण गरुडके ज्येष्ठ भ्राता हैं ॥ ४०३ ॥
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अ ० १६ ] तथैव बालखिल्याख्या ऋषयोऽङ्गुष्ठपर्वकाः प्रमाणेन परिख्याताः षष्टिसाहस्रसंख्यकाः स्तुवन्ति पुरतः सूर्यं सूक्तवाक्यैः सुशोभनैः तथा चान्ये च ऋषयो गन्धर्वा अप्सरोरगाः ग्रामण्यो यातुधानाश्च देवाः सर्वे परेश्वरम् एकैकशः सप्त सप्त मासि मासि विरोचनम् सार्धलक्षोत्तरं कोटिनवकं भूमिमण्डलम् द्विसहस्त्रं योजनानां स गव्यूत्युत्तरं क्षणात् पर्येति देवदेवेशो विश्वव्यापी निरन्तरम् अष्टम स्कन्ध २५ ९ ॥ ४१ उसी प्रकार बालखिल्य आदि साठ हजार ऋषिगण जो परिमाणमें अँगूठेके पोरके बराबर कहे । गये हैं, सूर्यके सम्मुख स्थित होकर मनोहर वैदिक ॥ ४२ मन्त्रोंद्वारा उनका स्तवन करते हैं । वैसे ही अन्य जो । सभी ऋषि, गन्धर्व, अप्सराएँ, नाग, यक्ष, राक्षस और देवता हैं - उनमेंसे एक - एक करके ये सातों दो - दो ॥ ४३ मिलकर प्रत्येक महीने परमेश्वर सूर्यकी उपासना । करते हैं ॥ ४१-४३ ॥ ॥ ४४ इस प्रकार वे विश्वव्यापी देवदेवेश्वर भगवान् सूर्य प्रतिक्षण दो हजार दो योजनकी दूरी चलते हुए । नौ करोड़ इक्यावन लाख योजन मार्गवाले भूमण्डलकी ॥ ४५ । निरन्तर परिक्रमा करते रहते हैं ॥ ४४-४५ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामष्टमस्कन्धे भुवनकोशवर्णने सूर्यगतिवर्णनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
अथ षोडशोऽध्यायः चन्द्रमा तथा श्रीनारायण उवाच
अथातः श्रूयतां चित्रं सोमादीनां गमादिकम् ।
तद्गत्यनुसृता नॄणां शुभाशुभनिदर्शना ॥
यथा कुलालचक्रेण भ्रमता भ्रमतां सह ।
तदाश्रयाणां च गतिरन्या कीटादिनां भवेत् ॥
एवं हि राशिवृन्देन कालचक्रेण तेन च ।
मेरुं धुरं च सरतां प्रादक्षिण्येन सर्वदा ॥
ग्रहाणां भानुमुख्यानां गतिरन्यैव दृश्यते ।
नक्षत्रान्तरगामित्वाद्भान्तरे गमनं तथा ॥
गतिद्वयं चाविरुद्धं सर्वत्रैष विनिर्णयः ।
स एव भगवानादिपुरुषो लोकभावनः ॥
नारायणोऽखिलाधारो लोकानां स्वस्तये भ्रमन् ।
कर्मशुद्धिनिमित्तं तु आत्मानं वै त्रयीमयम् ॥
विभिश्चैव वेदेन विजिज्ञास्योऽर्कधाभवत् ।
षट्सु क्रमेण ऋतुषु वसन्तादिषु च स्वयम् ॥
यथोपजोषमृतुजान् गुणान् वै विदधाति च । ग्रहोंकी गतिका वर्णन श्रीनारायण बोले- [ हे नारद! ] अब आप चन्द्रमा आदिकी अद्भुत गतिका वर्णन सुनिये । उसकी १ गतिके द्वारा ही मनुष्योंको शुभ तथा अशुभका परिज्ञान होता है ॥ १ ॥
जिस प्रकार कुम्हारके घूमते हुए चाकपर स्थित २ कीड़ों आदिकी एक दूसरी गति भी होती है, उसी प्रकार राशियोंसे उपलक्षित कालचक्रके अनुसार सुमेरु और ध्रुवको दाहिने करके घूमनेवाले सूर्य आदि प्रमुख ग्रहों की ३ एक अन्य गति भी दृष्टिगोचर होती है । २-३३ ॥ सूर्यकी यह गति नक्षत्रोंपर निर्भर करती है । एक ४ नक्षत्रके बाद दूसरा नक्षत्र आनेपर सूर्यगतिमें परिवर्तन हो जाता है 1 । ये दोनों गतियाँ एक - दूसरेके अविरुद्ध हैं । यह निश्चित नियम सर्वत्रके लिये है ॥ ४३ ॥
५ वेद तथा विद्वान् पुरुष जिन्हें जाननेकी इच्छा रखते हैं, वे लोकप्रकाशक तथा सम्पूर्ण जगत्के ६ आधार आदिपुरुष सूर्य प्राणियोंके कल्याणार्थ और कर्मोंकी शुद्धिके निमित्त भ्रमण करते हुए अपने वेदमय विग्रहको बारह भागों में विभक्त करके स्वयं ७ वसन्त आदि छः ऋतुओंमें ऋतुसम्बन्धी सभी गुणोंकी यथोचित व्यवस्था करते हैं॥५–७३ ॥ 1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –9 C
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२६० तमेनं पुरुषाः सर्वे त्रय्या च विद्यया सदा वर्णाश्रमाचारपथा तथाम्नातैश्च कर्मभिः । उच्चावचैः श्रद्धया च योगानां च वितानकैः
अञ्जसा च यजन्ते ये श्रेयो विन्दन्ति ते मतम् ।
अथैष आत्मा लोकानां द्यावाभूम्यन्तरेण च ॥
कालचक्रगतो भुङ्गे मासान्द्वादशराशिभिः । संवत्सरस्यावयवान्मासः पक्षद्वयं दिवा
नक्तं चेति स पादर्क्षद्वयमित्युपदिश्यते ।
यावता षष्ठमंशं स भुञ्जीत ऋतुरुच्यते ॥
संवत्सरस्यावयवः कविभिश्चोपवर्णितः ।
यावतार्धेन चाकाशवीथ्यां प्रचरते रविः ॥
तं प्राक्तना वर्णयन्ति अयनं मुनिपूजिताः ।
अथ यावन्नभोमण्डलं सह प्रतिगच्छति ॥
कार्त्स्न्येन सह भुञ्जीत कालं तं वत्सरं विदुः ।
संवत्सरं परिवत्सरमिडावत्सरमेव च ॥
अनुवत्सरमिद्वत्सरमिति पञ्चकमीरितम् ।
भानोर्मान्द्यशैघ्रयसमगतिभिः कालवित्तमैः ॥
एवं भानोर्गतिः प्रोक्ता चन्द्रादीनां निबोधत ।
एवं चन्द्रोऽर्करश्मिभ्यो लक्षयोजनमूर्ध्वतः ॥
उपलभ्यमानो मित्रस्य संवत्सरभुजिं च सः ।
पक्षाभ्यां चौषधीनाथो भुङ्क्ते मासभुजिं च सः ॥
सपादमाभ्यां दिवसभुक्तिं पक्षभुजिं चरेत् ।
एवं शीघ्रगतिः सोमो भुङ्क्ते नूनं भचक्रकम् ॥
पूर्यमाणकलाभिश्चामराणां प्रीतिमावहन् ।
क्षीयमाणकलाभिश्च पितॄणां चित्तरञ्जकः ॥
1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –9 D श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १६ ॥ ८ वर्णाश्रमधर्मका आचरण करनेवाले जो पुरुष त्रयीविद्या ( वेद ) - के आदेशोंका पालन करके, शास्त्र-निर्दिष्ट छोटे - बड़े कर्म सम्पादित करके तथा उच्च ॥ ९ कोटिकी योग - साधना करके श्रद्धापूर्वक भगवान् सूर्यकी उपासना करते हैं, वे शीघ्र ही कल्याण प्राप्त कर लेते हैं; यह निश्चित सिद्धान्त है ॥ ८ - ९ ३ ॥ १० सभी प्राणियोंकी आत्मास्वरूप ये सूर्य काल -चक्रपर स्थित होकर द्युलोक तथा पृथ्वीलोकके मध्य गति करते हुए बारह राशियोंके रूपमें संवत्सरके ॥ ११ अवयवस्वरूप [ बारह ] महीनोंको भोगते हैं । उनमें प्रत्येक मास चन्द्रमानसे कृष्ण तथा शुक्ल — इन दो पक्षोंका, पितृमानसे एक दिन तथा एक रातका १२ और सौरमानसे सवा दो नक्षत्रोंका कहा गया है । सूर्य जितने समय में वर्षका छठा भाग भोगते हैं, विद्वान् लोग उसे संवत्सरका अवयवस्वरूप ऋतु १३ कहते हैं ॥ १०–१२३ ॥ भगवान् सूर्य जितने समयमें आकाशमार्गकी दूरी तय करते हैं, उसके आधे समयको पूज्य प्राचीन १४ मुनिगण ' अयन ' कहते हैं और जितने समयमें सूर्य सम्पूर्ण नभमण्डलको पार करते हैं, उस समयको वत्सर कहते हैं॥१३-१४३ ॥ १५ वत्सर पाँच प्रकारका कहा गया है- संवत्सर, परिवत्सर, इडावत्सर, अनुवत्सर और इद्वत्सर ॥ १५३ ॥
कालतत्त्वके ज्ञाताओंने सूर्यके मन्द, शीघ्र १६ तथा समान गतियोंसे चलनेके कारण उनकी इस प्रकार तीन गतियाँ बतायी हैं । [ हे नारद! ] अब चन्द्रमा आदिकी गतिके विषयमें सुनिये । इसी प्रकार १७ चन्द्रमा सूर्यकी किरणोंसे एक लाख योजन ऊपर है । औषधियोंके स्वामी वे चन्द्रमा सूर्यके एक वर्षके मार्गको दो पक्षोंमें, एक महीनेमें तय किये १८ गये मार्गको सवा दो दिनोंमें और एक पक्षमें तय किये गये मार्गको एक दिनमें भोग लेते हैं । इस प्रकार तीव्र गति से चलनेवाले चन्द्रमा नक्षत्रचक्रमें गति १ ९ करते रहते हैं ॥ १६-१९ ॥ ये चन्द्र क्रमशः अपनी पूर्ण होनेवाली कलाओंसे देवताओंको प्रसन्न करते हैं और क्षीण होती हुई २० । कलाओंसे पितरोंका चित्तानुरंजन करते हैं ॥२० ॥
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अ ० १६ ] अष्टम
अहोरात्राणि तन्वानः पूर्वापरसुघस्त्रकैः ।
सर्वजीवनिकायस्य प्राणो जीवः स एव हि ॥ २१
भुङ्गे चैकैकनक्षत्रं मुहूर्तत्रिंशता विभुः ।
स एव षोडशकलः पुरुषोऽनादिसत्तमः ॥ २२
मनोमयोऽप्यन्नमयोऽमृतधामा सुधाकरः ।
देवपितृमनुष्यादिसरीसृपसवीरुधाम् ॥ २३
प्राणाप्यायनशीलत्वात्स सर्वमय उच्यते ।
ततो भचक्रं भ्रमति योजनानां त्रिलक्षतः ॥ २४
मेरुप्रदक्षिणेनैव योजितं चेश्वरेण तु ।
अष्टाविंशतिसंख्यानि गणितानि सहाभिजित् ॥ २५
ततः शुक्रो द्विलक्षेण योजनानामथोपरि ।
पुरः पश्चात्सहैवासावर्कस्य परिवर्तते ॥ २६
शीघ्रमन्दसमानाभिर्गतिभिर्विचरन्विभुः लोकानामनुकूलोऽयं प्रायः प्रोक्तः शुभावहः ॥ २७
वृष्टिविष्टम्भशमनो भार्गवः सर्वदा मुने ।
शुक्राद् बुधः समाख्यातो योजनानां द्विलक्षतः ॥ २८
शीघ्रमन्दसमानाभिर्गतिभिः शुक्रवत्सदा ।
यदार्काद्व्यतिरिच्येत सौम्यः प्रायेण तत्र तु ॥२ ९
अतिवाताभ्रपातानां वृष्ट्यादिभयसूचकः ।
उपरिष्ठात्ततो भौमो योजनानां द्विलक्षतः ॥ ३०
पक्षैस्त्रिभिस्त्रिभिः सोऽयं भुङ्गे राशीनथैकशः ।
द्वादशापि च देवर्षे यदि वक्रो न जायते ॥ ३१
प्रायेणाशुभकृत्सोऽयं ग्रहौघानां च सूचकः ।
ततो द्विलक्षमानेन योजनानां च गीष्पतिः ॥ ३२
एकैकस्मिन्नथो राशौ भुङ्गे संवत्सरं चरन् ।
यदि वक्रो भवेन्नैवानुकूलो ब्रह्मवादिनाम् ॥ ३३
स्कन्ध २६१ अपने पूर्व और उत्तर पक्षोंके द्वारा दिन तथा रातका विभाजन करनेवाले वे चन्द्रमा ही समस्त जीव - जगत्के प्राण तथा जीवन हैं । परम ऐश्वर्यसम्पन्न वे चन्द्रमा तीस मुहूर्तमें एक - एक नक्षत्रका भोग करते हैं । सोलह कलाओंसे युक्त, मनोमय, अन्नमय, अमृतमय तथा श्रेष्ठ अनादि पुरुष वे भगवान् चन्द्रमा देवताओं, पितरों, मनुष्यों, रेंगकर चलनेवाले जन्तुओं तथा वृक्ष आदिके प्राणोंका पोषण करनेके कारण सर्वमय कहे जाते हैं ॥ २१ - २३३ ॥ चन्द्रमाके स्थानसे तीन लाख योजन ऊपर । नक्षत्रमण्डल है । अभिजित् को लेकर इस मण्डलमें कुल नक्षत्र संख्यामें अट्ठाईस गिने गये हैं । भगवान्के द्वारा कालचक्रमें बँधा हुआ यह नक्षत्रमण्डल मेरुको दाहिने करके सदा भ्रमण करता रहता है ॥ २४-२५ ॥ उससे भी दो लाख योजन ऊपर रहनेवाले शुक्र कभी सूर्यके आगे तथा कभी पीछे और कभी सूर्य साथ - साथ तीव्र, मन्द और समान गतियोंसे चलते हुए परिभ्रमण करते रहते हैं ॥ २६३ ॥
ये प्राणियोंके लिये प्रायः अनुकूल ही रहते हैं । इन्हें शुभकारी ग्रह कहा गया है । हे मुने! ये भार्गव शुक्र वर्षा विघ्नोंको सदा दूर करनेवाले हैं ॥ २७३ ॥
शुक्रसे भी ऊपर दो लाख योजनकी दूरीपर बुध बताये गये हैं । ये भी शुक्रके ही समान तीव्र, मन्द तथा सम गतियोंसे सदा भ्रमण करते रहते हैं ॥ २८३ ॥
ये चन्द्रपुत्र बुध जब सूर्यकी गतिका उल्लंघन करके चलते हैं, उस समय ये आँधी, विद्युत्पात और वृष्टि आदिके भयकी सूचना देते हैं ॥ २ ९ ३ ॥ उनसे भी ऊपर दो लाख योजनकी दूरीपर मंगल हैं । हे देवर्षे! यदि वे वक्रगतिसे न चलें तो एक - एक राशिको तीन - तीन पक्षोंमें भोगते हुए बारहों राशियोंको पार करते हैं । ये प्रायः अशुभ करनेवाले तथा
अमंगलके सूचक हैं । ३०-३१३ ॥
उनसे भी दो लाख योजन ऊपर बृहस्पति हैं । यदि वे वक्री न होकर भ्रमण करें तो एक - एक राशिको एक - एक वर्षमें भोगते हैं । वे प्रायः ब्रह्मवादियोंके । अनुकूल रहते हैं ॥ ३२-३३ ॥