देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 271–280
देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 271–280
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२६२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १७
ततः शनैश्चरो घोरो लक्षद्वयपरो मितः ।
योजनैः सूर्यपुत्रोऽयं त्रिंशन्मासैः परिभ्रमन् ॥
एकैकराशौ पर्येति सर्वान्राशीन्महाग्रहः ।
सर्वेषामशुभो मन्दः प्रोक्तः कालविदां वरैः ॥
तत उत्तरतः प्रोक्तमेकादशसुलक्षकैः ।
योजनैः परिसंख्यातं सप्तर्षीणां च मण्डलम् ॥
लोकानां शं भावयन्तो मुनयः सप्त ते मुने ।
यत्तद्विष्णुपदं स्थानं दक्षिणं प्रक्रमन्ति ते ॥
उनसे भी दो लाख योजन ऊपर भयंकर ३४ शनि हैं । सूर्यके पुत्र कहे जानेवाले ये महाग्रह शनि एक - एक राशिको तीस - तीस महीनोंमें भोगते हुए सभी राशियोंका परिभ्रमण करते रहते हैं । श्रेष्ठ ३५ कालज्ञ पुरुषोंने शनिको सबके लिये अशुभ बताया है ॥ ३४-३५ ॥ उनसे भी ऊपर ग्यारह लाख योजनकी दूरीपर ३६ सप्तर्षियोंका मण्डल बताया गया है । हे मुने! वे सातों ऋषि प्राणियोंके कल्याणकी कामना करते हुए जो वह विष्णुपद है, उस ध्रुव - लोककी प्रदक्षिणा ३७ | करते हैं ॥ ३६-३७ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामष्टमस्कन्धे सोमादिगतिवर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
अथ सप्तदशोऽध्यायः शिशुमारचक्र तथा श्रीनारायण उवाच
अथर्षिमण्डलादूर्ध्वं योजनानां प्रमाणतः ।
लक्षैस्त्रयोदशमितैः परमं वैष्णवं पदम् ॥ १
महाभागवतः श्रीमान् वर्तते लोकवन्दितः ।
औत्तानपादिरिन्द्रेण वह्निना कश्यपेन च ॥ २
धर्मेण सह चैवास्ते समकालयुजा ध्रुवः ।
बहुमानं दक्षिणतः कुर्वद्भिः प्रेक्षकैः सदा ॥ ३
आजीव्यः कल्पजीविनामुपास्ते भगवत्पदम् ।
ज्योतिर्गणानां सर्वेषां ग्रहनक्षत्रभादिनाम् ॥ ४
कालेनानिमिषेणायं भ्राम्यतां व्यक्तरंहसा ।
अवष्टम्भस्थाणुरिव विहितश्चेश्वरेण सः ॥ ५
भासते भासयन्भासा स्वीयया देवपूजितः ।
मेढिस्तम्भे यथा युक्ताः पशवः कर्षणार्थकाः ॥ ६
मण्डलानि चरन्तीमे सवनत्रितयेन च ।
एवं ग्रहादयः सर्वे भगणाद्या यथाक्रमम् ॥ ७
ध्रुवमण्डलका वर्णन श्रीनारायण बोले- इस सप्तर्षिमण्डलसे तेरह लाख योजन दूरीपर वह परम वैष्णवपद स्थित है ॥ १ ॥
परम भागवत तथा लोकपूजित उत्तानपादपुत्र श्रीमान् ध्रुव यहींपर विराजमान हैं । इन्द्र, अग्नि, कश्यप, धर्म तथा सप्तर्षिगण – ये सब देखते हुए आदरपूर्वक जिनकी प्रदक्षिणा करते रहते हैं, वे ध्रुव कल्पपर्यन्त जीवित रहनेवाले प्राणियोंके जीवनाधार हैं और निरन्तर भगवान्के चरणोंकी उपासना करते रहते हैं॥२-३३ ॥ सर्वदा जाग्रत् रहनेवाले व्यक्तगति भगवान् कालने भ्रमण करनेवाले ग्रह, नक्षत्र, राशि आदि समस्त ज्योतिर्गणोंके अचल स्तम्भके रूपमें ध्रुवको व्यवस्थित कर रखा है । वे देवपूज्य ध्रुव अपने तेजसे सबको आलोकित करते हुए सदा प्रकाशित होते रहते हैं ॥ ४-५३ ॥ जिस प्रकार अनाजको पृथक् करनेवाले पशु छोटी - बड़ी रस्सियोंमें बँधकर निकट, दूर और मध्यमें रहकर खलिहानमें गड़े खम्भेके चारों ओर मण्डल
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अ ० १७ ] अष्टम
अन्तर्बहिर्विभागेन कालचक्रे नियोजिताः ।
ध्रुवमेवावलम्ब्याशु वायुनोदीरिताश्च ते ॥ ८
आकल्पान्तं च क्रमन्ति खे श्येनाद्याः खगा इव ।
कर्मसारथयो वायुवशगाः सर्व एव ते ॥ ९
एवं ज्योतिर्गणाः सर्वे प्रकृतेः पुरुषस्य च ।
संयोगानुगृहीतास्ते भूमौ न निपतन्ति च ॥ १०
ज्योतिश्चक्रं केचिदेतच्छिशुमारस्वरूपकम् ।
सोपयोगं भगवतो योगधारणकर्मणि ॥ ११
यस्यार्वाक्शिरसः कुण्डलीभूतवपुषो मुने ।
पुच्छाग्रे कल्पितो योऽयं ध्रुव उत्तानपादजः ॥ १२
लाङ्गूलेऽस्य च सम्प्रोक्तः प्रजापतिरकल्मषः ।
अग्निरिन्द्रश्च धर्मश्च तिष्ठन्ते सुरपूजिताः ॥ १३
धाता विधाता पुच्छान्ते कट्यां सप्तर्षयस्ततः ।
दक्षिणावर्तभोगेन कुण्डलाकारमीयुषः ॥ १४
उत्तरायणभानीह दक्षपार्श्वेऽर्पितानि च ।
दक्षिणायनभानीह सव्ये पार्श्वेऽर्पितानि च ॥ १५
कुण्डलाभोगवेशस्य पार्श्वयोरुभयोरपि ।
समसंख्याश्चावयवा भवन्ति कजनन्दन ॥ १६
अजवीथी पृष्ठभागे आकाशसरिदौदरे ।
पुनर्वसुश्च पुष्यश्च श्रोण्यौ दक्षिणवामयोः ॥ १७
आर्द्राश्लेषे पश्चिमयोः पादयोर्दक्षवामयोः ।
अभिजिच्चोत्तराषाढा नासयोर्दक्षवामयोः ॥ १८
यथासंख्यं च देवर्षे श्रुतिश्च जलभं तथा ।
कल्पिते कल्पनाविद्भिर्नेत्रयोर्दक्षवामयोः ॥ १ ९
धनिष्ठा चैव मूलं च कर्णयोर्दक्षवामयोः ।
मघादीन्यष्टभानीह दक्षिणायनगानि च ॥२०
स्कन्ध २६३ बनाकर घूमते रहते हैं, उसी प्रकार सभी नक्षत्रगण और ग्रह आदि भीतर - बाहरके क्रमसे कालचक्रमें नियुक्त होकर ध्रुवका ही आश्रय लेकर वायुकी प्रेरणासे कल्पपर्यन्त परिभ्रमण करते रहते हैं, जिस प्रकार बाज आदि पक्षी अपने कर्मोंकी सहायतासे वायुके अधीन रहकर आकाशमें घूमते रहते हैं, उसी प्रकार वे सभी ज्योतिर्गण भी पुरुष और प्रकृतिके संयोगसे अनुगृहीत होकर परिभ्रमण करते रहते हैं और भूमिपर नहीं गिरते ॥ ६- - १० ॥ हे मुने! कुछ लोग भगवान् श्रीहरिकी योग-मायके आधारपर स्थित इस ज्योतिष्चक्रका वर्णन शिशुमारके रूपमें करते हैं, जो नीचेकी ओर सिर किये हुए कुण्डली मारकर स्थित है । उसकी पूँछके अग्रभागपर उत्तानपादपुत्र ध्रुव विराजमान कहे गये हैं । उसकी पूँछके मध्यभागमें देवताओं द्वारा पूजित पवित्रात्मा प्रजापति, अग्नि, इन्द्र और धर्म विराजमान हैं । पूँछकी जड़में धाता और विधाता तथा उसके कटिभागमें सप्तर्षिगण स्थित हैं । यह शिशुमार अपने शरीरको दाहिनी ओरसे कुण्डलाकार बनाकर स्थित है॥११–१४ ॥ उत्तरायणके चौदह नक्षत्र इसके दाहिने भागमें हैं और दक्षिणायनके चौदह नक्षत्र इसके बायें भागमें हैं । हे ब्रह्मापुत्र नारद! लोकमें भी शिशुमार जब कुण्डलाकार होकर बैठता है तो उसके दोनों पार्श्वभागोंके अवयवोंकी संख्या समान होती है, उसी प्रकार यहाँ नक्षत्रसंख्या में भी समानता है ॥ १५-१६ ॥ इसके पृष्ठभागमें अजवीथी ( मूल, पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़ नक्षत्रोंका समूह ) और उदरमें आकाशगंगा है । दायें तथा बायें कटिप्रदेशमें पुनर्वसु और पुष्य नक्षत्र स्थित हैं ॥ १७ ॥
पीछेके दाहिने और बायें चरणोंमें आर्द्रा तथा आश्लेषा नक्षत्र हैं । दाहिनी तथा बायीं नासिकाओंमें अभिजित् और उत्तराषाढ़ नक्षत्र विद्यमान हैं ॥ १८ ॥
हे देवर्षे! इसी प्रकार कल्पनाविदोंने दाहिने तथा बायें नेत्रोंमें क्रमशः श्रवण तथा पूर्वाषाढ़ और दाहिने तथा बायें कानोंमें क्रमशः धनिष्ठा और मूल नक्षत्रोंकी
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२६४ युञ्जीत वामपार्श्वीयवंक्रिषु क्रमतो मुने तथैव मृगशीर्षादीन्युदग्भानि च यानि हि दक्षपार्श्वे क्रिकेषु प्रातिलोम्येन योजयेत् शततारा तथा ज्येष्ठा स्कन्धयोर्दक्षवामयोः अगस्तिश्चोत्तरहनावधरायां हनौ यमः । मुखेष्वङ्गारकः प्रोक्तो मन्दः प्रोक्त उपस्थके
बृहस्पतिश्च ककुदि वक्षस्यर्को ग्रहाधिपः ।
नारायणश्च हृदये चन्द्रो मनसि तिष्ठति ॥
स्तनयोरश्विनौ नाभ्यामुशनाः परिकीर्तितः ।
बुधः प्राणापानयोश्च गले राहुश्च केतवः ॥
सर्वाङ्गेषु तथा रोमकूपे तारागणाः स्मृताः ।
एतद्भगवतो विष्णोः सर्वदेवमयं वपुः ॥
सन्ध्यायां प्रत्यहं ध्यायेत्प्रयतो वाग्यतो मुनिः ।
निरीक्षमाणश्चोत्तिष्ठेन्मन्त्रेणानेन धीश्वरः ॥
नमो ज्योतिर्लोकाय कालायानिमिषां पतये महापुरुषायाभिधीमहीति ॥ ग्रहर्क्षतारामयमाधिदैविकं पापापहं मन्त्रकृतां मन्त्रकृतां त्रिकालम् । नमस्यतः स्मरतो वा त्रिकालं श्येत तत्कालजमाशु पापम् ॥ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १८ । स्थिति बतायी है । हे मुने! दक्षिणायनके मघा आदि ॥ २१ आठ नक्षत्र वाम पार्श्वकी पसलियोंमें स्थित हैं । उसी प्रकार विपरीत क्रमसे उत्तरायणके मृगशिरा आदि जो । आठ नक्षत्र हैं, वे इसके दाहिने पार्श्वकी पसलियोंमें ॥ २२ स्थित हैं । शतभिषा और ज्येष्ठा नक्षत्र दाहिने तथा
बायें कन्धों पर विराजमान हैं । १ ९ - २२ ॥
इसकी ऊपरकी ठोड़ीमें अगस्ति, नीचेकी ठोड़ीमें ॥ २३ यमराज, मुखमें मंगल और जननेन्द्रियमें शनि स्थित कहे गये हैं । इसके ककुदपर बृहस्पति, वक्षपर ग्रहपति सूर्य, हृदयमें नारायण और मनमें चन्द्रमा २४ स्थित रहते हैं ॥ २३-२४ ॥ दोनों स्तनोंमें दोनों अश्विनीकुमारों तथा नाभिमें शुक्रका स्थान कहा गया है । प्राण और अपानमें बुध, २५ गलेमें राहु और केतु एवं सभी अंगों तथा रोमकूपोंमें तारागण कहे गये हैं । हे नारद! भगवान् विष्णुका यह सर्वदेवमय विग्रह है । परम बुद्धिमान् साधकको २६ चाहिये कि वह प्रतिदिन सायंकालके समय मौन धारण करके अपने हृदयमें भगवान्को स्थित देखते हुए उनके उस दिव्य स्वरूपका ध्यान करे और इस २७ मन्त्रसे जप करते हुए स्तुति करे - सम्पूर्ण ज्योतिर्गणोंके आश्रय, कालचक्ररूपसे विराजमान तथा देवताओंके अधिपति परम पुरुषको मेरा नमस्कार है; मैं आपका २८ ध्यान करता हूँ॥२५—२८ ॥ ग्रहों, नक्षत्रों तथा ताराओंके रूपमें भासित होता हुआ भगवान्का आधिदैविकस्वरूप तीनों कालोंमें इस मन्त्रका जप करनेवाले पुरुषोंके पापोंका नाश कर देता है । तीनों कालोंमें भगवान् के इस रूपका वन्दन तथा ध्यान करनेवाले व्यक्तिका उस समयका किया हुआ २ ९ । पाप तत्काल नष्ट हो जाता है ॥ २ ९ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामष्टमस्कन्धे ध्रुवमण्डलसंस्थानवर्णनं नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
अथाष्टादशोऽध्यायः राहुमण्डलका वर्णन श्रीनारायण उवाच श्रीनारायण बोले - [ हे नारद! ] सूर्यसे दस अधस्तात्सवितुः प्रोक्तमयुतं राहुमण्डलम् । हजार योजन नीचे राहुमण्डल कहा गया है । यह नक्षत्रवच्चरति च सैंहिकेयोऽतदर्हणः ॥ १ | सिंहिकापुत्र राहु योग्य न होनेपर भी नक्षत्रकी भाँति
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अ ० १८ ] अष्टम स्कन्ध २६५
सूर्याचन्द्रमसोरेव मर्दनः सिंहिकासुतः ।
अमरत्वं च खेटत्वं लेभे यो विष्ण्वनुग्रहात् ॥ २
यददस्तरणेर्बिम्बं तपतो योजनायुतम् ।
तच्छादकोऽसुरो ज्ञेयोऽप्यर्कसाहस्त्रविस्तरम् ॥ ३
त्रयोदशसहस्त्रं तु सोमस्याच्छादको ग्रहः ।
यः पर्वसमये वैरानुबन्धी छादकोऽभवत् ॥ ४
सूर्याचन्द्रमसोर्दूराद्भवेच्छादनकारकः I तन्निशम्योभयत्रापि विष्णुना प्रेरितं स्वकम् ॥ ५
चक्रं सुदर्शनं नाम ज्वालामालातिभीषणम् ।
तत्तेजसा दुःसहेन समन्तात्परिवारितम् ॥ ६
मुहूर्तो द्विजमानस्तु दूराच्चकितमानसः ।
आरान्निवर्तते सोऽयमुपराग इतीव ह ॥७
उच्यते लोकमध्ये तु देवर्षे अवबुध्यताम् ।
ततोऽधस्तात्समाख्याता लोकाः परमपावनाः ॥ ८
सिद्धानां चारणानां च विद्याध्राणां च सत्तम ।
योजनायतविख्याता लोकाः पुण्यनिषेविताः ॥ ९
ततोऽप्यधस्ताद्देवर्षे यक्षाणां च सरक्षसाम् ।
पिशाचप्रेतभूतानां विहाराजिरमुत्तमम् ॥ १०
अन्तरिक्षं च तत्प्रोक्तं यावद्वायुः प्रवाति हि ।
यावन्मेघास्ततोद्यन्ति तत्प्रोक्तं ज्ञानकोविदैः ॥ ११
ततोऽधस्ताद्योजनानां शतं यावद् द्विजोत्तम ।
पृथिवी परिसंख्याता सुपर्णश्येनसारसाः ॥ १२
हंसादयः प्रोत्पतन्ति पार्थिवाः पृथिवीभवाः ।
भूसन्निवेशावस्थानं यथावदुपवर्णितम् ॥ १३
विचरण करता रहता है । चन्द्रमा तथा सूर्यको पीड़ित करनेवाले इस सिंहिकापुत्र राहुने भगवान्की कृपासे ही अमर होने तथा आकाशमें विचरण करनेका सामर्थ्य प्राप्त किया है ॥ १-२ ॥ तेरह हजार योजन विस्तारवाला यह असुर दस हजार योजन विस्तारके बिम्बमण्डलवाले तपते सूर्यका तथा बारह हजार योजन विस्तृत मण्डलवाले चन्द्रमाका आच्छादक कहा गया है । पूर्वकालमें अमृतपानके समयके वैरको याद करके वह राहु अमावास्या और पूर्णिमाके पर्वपर उनका आच्छादक होता है । दूरसे ही वह राहु सूर्य तथा चन्द्रमाको आच्छादित करनेके लिये तत्पर होता है । यह बात जानकर भगवान् विष्णुने विशाल ज्वालाओंसे युक्त अपना अत्यन्त भयानक सुदर्शन नामक चक्र उन दोनों ( सूर्य तथा चन्द्रमा ) -के पास भेज दिया था । उसके दुःसह तेजसे सूर्य और चन्द्रमाका मण्डल चारों ओरसे घिरा रहता है । इससे खिन्न तथा चकित मनवाला वह राहु बिम्बके पास जाकर और वहाँ क्षणभर रुककर फिर सहसा लौट आता है । हे देवर्षे! जगत् में इसीको उपराग ( ग्रहण ) कहा जाता है - ऐसा आप समझिये ॥ ३–७ || हे श्रेष्ठ! उस राहुमण्डलसे भी नीचे सिद्धों, चारणों और विद्याधरोंके परम पवित्र लोक कहे गये हैं | पुण्यात्मा पुरुषोंद्वारा सेवित ये लोक दस हजार योजन विस्तारवाले बताये गये हैं ॥ ८- ९ ॥ हे देवर्षे! इन लोकोंके भी नीचे यक्षों, राक्षसों, पिशाचों, प्रेतों एवं भूतोंके उत्तम विहार-स्थल हैं । इसके नीचे जहाँतक वायु चलती है और जहाँतक मेघ दिखायी पड़ते हैं, ज्ञानी तथा विद्वान् लोगोंके द्वारा वह अन्तरिक्ष कहा गया है ॥ १०-११ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ! उसके नीचे सौ योजनकी दूरीपर, जहाँतक गरुड, बाज, सारस और हंस आदि पृथ्वीपर होनेवाले पार्थिव पक्षी उड़ सकते हैं, पृथ्वी बतायी गयी है । पृथ्वीके परिमाण तथा स्थितिका वर्णन पहले ही किया जा चुका है ॥ १२-१३ ॥
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२६६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १८
अधस्तादवनेः सप्त देवर्षे विवराः स्मृताः ।
एकैकशो योजनानामायामोच्छ्रायतः पुनः ॥
अयुतान्तरविख्याताः सर्वर्तुसुखदायकाः ।
अतलं प्रथमं प्रोक्तं द्वितीयं वितलं तथा ॥।
तृतीयं सुतलं प्रोक्तं चतुर्थं वै तलातलम् ।
महातलं पञ्चमं च षष्ठं प्रोक्तं रसातलम् ॥
सप्तमं विप्र पातालं सप्तैते विवराः स्मृताः ।
एतेषु बिलस्वर्गेषु दिवोऽप्यधिकमेव च ॥
कामभोगैश्वर्यसुखसमृद्धभुवनेषु च ।
नित्योद्यानविहारेषु सुखास्वादः प्रवर्तते ॥
दैत्याश्च काद्रवेयाश्च दानवा बलशालिनः ।
नित्यप्रमुदिता रक्ताः कलत्रापत्यबन्धुभिः ॥
सुहृद्भिरनुजीवाद्यैः संयुताश्च गृहेश्वराः ।
ईश्वरादप्रतिहतकामा मायाविनश्च ते ॥
निवसन्ति सदा हृष्टाः सर्वर्तुसुखसंयुताः ।
मयेन मायाविभुना येषु येषु च निर्मिताः ॥
पुरः प्रकामशो भक्ता मणिप्रवरशालिनः ।
विचित्रभवनाट्टालगोपुराद्याः सहस्रशः ॥
सभाचत्वरचैत्यादिशोभाढ्याः सुरदुर्लभाः ।
नागासुराणां मिथुनैः सपारावतसारिकैः ॥
कीर्णकृत्रिमभूमिश्च विवरेशगृहोत्तमैः ।
अलङ्कृताश्चकासन्ति उद्यानानि महान्ति च ॥
मनः प्रसन्नकारीणि फलपुष्पविशालिभिः ।
ललनानां विलासार्हस्थानैः शोभितभाञ्जि च ॥
नानाविहंगमव्रातसंयुक्तजलराशिभिः स्वच्छार्णपूरितह्रदैः पाठीनसमलङ्कृतैः ॥ हे देवर्षे! इस पृथ्वीके नीचे सात विवर बताये गये हैं । इनमें प्रत्येक विवरकी लम्बाई तथा चौड़ाई १४ दस - दस हजार योजन है और ये एक - दूसरेसे दस-दस हजार योजनकी दूरीपर स्थित कहे गये हैं; ये १५ सभी ऋतुओंमें सुखदायक होते हैं ॥ १४३ ॥
इनमें पहलेको अतल, दूसरेको वितल, तीसरेको सुतल, चौथेको तलातल, पाँचवेंको महातल, छठेको १६ रसातल और सातवेंको पाताल कहा गया है । हे विप्र! इस प्रकार ये सात विवर बताये गये हैं । १५-१६ ÷ ये विवर एक प्रकारसे स्वर्ग ही हैं । अनेक उद्यानों १७ तथा विहारस्थलियोंवाले तथा काम, भोग, ऐश्वर्य, सुख तथा समृद्धिसे युक्त यहाँके भुवनोंमें स्वर्गसे भी बढ़कर सुख तथा आस्वाद उपलब्ध है ॥ १७-१८ ॥ १८ वहाँ निवास करनेवाले महाबली दैत्य, नाग तथा दानव अपने स्त्री, पुत्रों तथा बन्धुओंके साथ सदा आनन्दित तथा प्रफुल्लित रहते हैं । वे अपने - अपने १ ९ घरोंके स्वामी होते हैं । मित्र तथा अनुचर आदि सदा उनके पास विद्यमान रहते हैं । ईश्वर भी जिनकी इच्छाको विफल नहीं कर सकते, ऐसे वे अत्यन्त २० मायावी सदा हृष्ट - पुष्ट रहते हुए सभी ऋतुओंमें सुखी रहते हैं ॥ १ ९ -२० ३ ॥ मायाके स्वामी मय नामक दानवने उनमें अनेक २१ पुरियोंका निर्माण कराया, जो श्रेष्ठ मणियोंसे जटित हजारों अद्भुत भवनों, अट्टालिकाओं, गोपुरों, सभाभवनों, २२ प्रांगणों तथा वृक्षसमूहों आदिसे सुशोभित हैं; वे पुरियाँ देवताओंके लिये भी अति दुर्लभ हैं । जिनकी कृत्रिम भूमि ( फर्श ) - पर नागों तथा असुरोंके जोड़े और २३ कबूतर - मैना आदि पक्षी विहार करते हैं - ऐसे विवराधीश्वरोंके मनोहर भवनोंसे अलंकृत वे पुरियाँ अतीव सुशोभित हो रही हैं । उनमें मनको मुग्ध २४ करनेवाले, बड़े - बड़े सुन्दर फलों तथा फूलोंसे लदे हुए वृक्षोंवाले और कामिनियोंके विलासयोग्य स्थानोंसे अत्यधिक शोभा पानेवाले विशाल उद्यान विद्यमान २५ हैं । उन उद्यानोंमें स्वच्छ जलसे परिपूर्ण रहनेवाले विशाल जलाशय हैं, जो विविध पक्षियोंके समूहोंके कलरवसे तथा पाठीन नामक मछलियोंसे सुशोभित २६ । रहते हैं । जलचर जन्तुओंके क्रीड़ा करनेपर जलके क्षुब्ध
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अ ० १ ९ ] अष्टम स्कन्ध २६७ जलजन्तुक्षुब्धनीरनीरजातैरनेकशः 1 कुमुदोत्पलकहारनीलरक्तोत्पलैस्तथा ॥२७
तेषु कृतनिकेतानां विहारैः सङ्कुलानि च ।
इन्द्रियोत्सवकारैश्च तथैव विविधैः स्वरैः ॥ २८
अमराणां च परमां श्रियं चातिशयन्ति च ।
यत्र नैव भयं क्वापि कालाङ्गैर्दिनरात्रिभिः ॥ २ ९
यत्राहि प्रवराणां च शिरः स्थैर्मणिरश्मिभिः ।
नित्यं तमः प्रबाध्येत सदा प्रस्फुटकान्तिभिः ॥ ३०
न वा एतेषु वसतां दिव्यौषधिरसायनैः ।
रसान्नपानस्नानाद्यैर्नाधयो न च व्याधयः ॥ ३१
वलीपलितजीर्णत्ववैवर्ण्यस्वेदगन्धताः 1 अनुत्साहवयोऽवस्था न बाधन्ते कदाचन ॥ ३२
कल्याणानां सदा तेषां न च मृत्युभयं कुतः ।
भगवत्तेजसोऽन्यत्र चक्राच्चैव सुदर्शनात् ॥ ३३
यस्मिन्प्रविष्टे दैतेयवधूनां गर्भराशयः ।
प्रायो भयात्पतन्त्येव स्त्रवन्ति ब्रह्मपुत्रक ॥ ३४
होनेसे उसमें उगे हुए कुमुद, उत्पल, कहार, नीलकमल तथा रक्तकमल हिलने लगते हैं । उन उद्यानोंमें स्थान बनाकर रहनेवाले पक्षी अपने विहारों तथा इन्द्रियोंको उत्साहित करनेवाली अपनी विविध ध्वनियोंसे उन्हें सदा निनादित किये रहते हैं ॥ २१-२८ ॥ वे पुरियाँ देवताओंके श्रेष्ठ ऐश्वर्यसे भी बढ़कर हैं । जहाँ कालके अंगभूत दिन - रातका कोई भय नहीं रहता और जहाँ बड़े - बड़े सर्पोंके मस्तकपर स्थित मणियोंकी रश्मियोंसे प्रस्फुटित कान्तिके द्वारा अन्धकार सदा मिटा रहता है ॥ २ ९ -३० ॥ इनमें निवास करनेवाले लोगोंको दिव्य ओषधियों, रसायनों, रस, अन्नपान एवं स्नान आदिकी कोई आवश्यकता नहीं रहती; उन्हें किसी प्रकारके भी मानसिक या शारीरिक रोग नहीं होते; झुर्रियाँ पड़ने, बाल पकने, बुढ़ापा आ जाने, शरीरके विरूपित होने, पसीनेसे दुर्गन्ध निकलने, उत्साहहीन हो जाने और आयुके अनुसार शारीरिक अवस्थाओंमें परिवर्तन आने आदि विकार उन्हें कभी बाधित नहीं करते I हे ब्रह्मपुत्र नारद! उन कल्याणमय लोगोंको भगवान् श्रीहरिके तेजस्वी सुदर्शन चक्रके अतिरिक्त अन्य किसीसे भी भय नहीं रहता; जिस चक्रके वहाँ प्रवेश करते ही भयके कारण प्रायः दैत्योंकी स्त्रियोंका गर्भपात - गर्भस्राव * हो जाता है ॥ ३१ - ३४ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामष्टमस्कन्धे राहुमण्डलाद्यवस्थानवर्णनं नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
अथैकोनविंशोऽध्यायः अतल, वितल तथा श्रीनारायण उवाच
प्रथमे विवरे विप्र अतलाख्ये मनोरमे ।
मयपुत्रो बलो नाम वर्ततेऽखर्वगर्वकृत् ॥ १ ।
षण्णवत्यो येन सृष्टा मायाः सर्वार्थसाधिकाः ।
मायाविनो याश्च सद्यो धारयन्ति च काश्चन ॥ २
सुतललोकका वर्णन श्रीनारायण बोले - हे विप्र! अतल नामसे विख्यात पहले परम सुन्दर विवरमें मय दानवका पुत्र ' बल ' नामक अति अभिमानी दैत्य रहता है ॥ १ ॥
जिसने सभी प्रकारकी कामनाओंकी सिद्धि करानेवाली छियानबे प्रकारकी मायाएँ रची हैं, जिनमेंसे कुछ मायाओंको मायावी लोग शीघ्र ही धारण कर लेते ** ' आचतुर्थाद्भवेत्स्रावः पातः पञ्चमषष्ठयोः ' अर्थात् चौथे मासतक जो गर्भ गिरता है, उसे ' गर्भस्राव ' कहते हैं तथा पाँचवें और छठे मासमें गिरनेसे वह ' गर्भपात ' कहलाता है ।
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२६८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १ ९ जृम्भमाणस्य यस्यैव बलस्य बलशालिनः । स्त्रीगणा उपपद्यन्ते त्रयोलोकविमोहनाः पुंश्चल्यश्चैव स्वैरिण्यः कामिन्यश्चेति विश्रुताः या वै बिलायनं प्रेष्ठं प्रविष्टं पुरुषं रहः रसेन हाटकाख्येन साधयित्वा प्रयत्नतः स्वविलासावलोकानुरागस्मितविगूहनैः संलापविभ्रमाद्यैश्च रमयन्त्यपि ताः स्त्रियः यस्मिन्नुपयुक्ते जनो मनुते बहुधा स्वयम् ईश्वरोऽहमहं सिद्धो नागायुतबलो महान् आत्मानं मन्यमानः सन्मदान्ध इव कथ्यते ॥
एवं प्रोक्ता स्थितिश्चात्र अतलस्य च नारद ।
द्वितीयविवरस्यात्र वितलस्य निबोधत ॥
भूतलाधस्तले चैव वितले भगवान्भवः ।
हाटकेश्वरनामायं स्वपार्षदगणैर्वृतः ॥
प्रजापतिकृतस्यापि सर्गस्य बृंहणाय च ।
भवान्या मिथुनीभूय आस्ते देवाधिपूजितः ॥
भवयोर्वीर्यसम्भूता हाटकी सरिदुत्तमा ।
समिद्धो मरुता वह्निरोजसा पिबतीव हि ॥
तन्निष्ठ्यूतं हाटकाख्यं सुवर्णं दैत्यवल्लभम् ।
दैत्याङ्गना भूषणार्हं सदा तं धारयन्ति हि ॥
तद्बिलाधस्तलात्प्रोक्तं सुतलाख्यं बिलेश्वरम् ।
पुण्यश्लोको बलिर्नामा आस्ते वैरोचनिर्मुने ॥
महेन्द्रस्य च देवस्य चिकीर्षुः प्रियमुत्तमम् ।
त्रिविक्रमोऽपि भगवान् सुतले बलिमानयत् ॥
त्रैलोक्यलक्ष्मीमाक्षिप्य स्थापितः किल दैत्यराट् ।
इन्द्रादिष्वप्यलब्धा या सा श्रीस्तमनुवर्तते ॥
हैं तथा जिस बलवान् दैत्य बलके जम्हाई लेते ही तीनों ॥ ३ लोकोंके लोगोंको मोहित कर देनेवाली बहुत - सी स्त्रियाँ उत्पन्न हो जाती हैं । वे पुंश्चली, स्वैरिणी और कामिनी— । इन नामोंसे प्रसिद्ध हैं, जो अपने प्रिय पुरुषको बिलरूप ॥ ४ भवनमें एकान्तमें ले जाकर उन्हें प्रयत्नपूर्वक हाटक नामक रस पिलाकर शक्तिसम्पन्न बना देती हैं । तत्पश्चात् वे । स्त्रियाँ अपने हाव - भाव, कटाक्ष, प्रेमपूर्ण व्यवहार, मुसकान, ॥५ आलिंगन, मधुर वार्तालाप, प्रणयभाव आदिसे उन्हें आकर्षित करके उनके साथ रमण करती हैं ॥ २–५३ ॥ । उस हाटक - रसका पान कर लेनेपर मनुष्य ॥ ६ स्वयंको बहुत बड़ा मानने लगता है और अपनेको दस हजार हाथियोंके समान महान् बलवान् मानता हुआ । मैं ईश्वर हूँ, मैं सिद्ध हूँ- मदान्धकी भाँति ऐसा बढ़-७ चढ़कर बोलने लगता है ॥ ६-७ ॥ हे नारद! इस प्रकार मैंने अतललोककी स्थितिका वर्णन कर दिया । अब आप वितल नामक द्वितीय ८ विवरके विषयमें सुनिये ॥ ८ ॥
भूतलके नीचे वितल नामक विवरमें हाटकेश्वर नामसे प्रसिद्ध ये भगवान् शिव अपने पार्षदगणोंसे निरन्तर घिरे रहते हैं । देवताओंसे सुपूजित ये भगवान् शिव ब्रह्माकी रची गयी सृष्टि विस्तारके लिये भवानीके साथ रमण करते हुए यहाँ विराजमान रहते हैं ॥ ९ -१० ॥ १० वहाँ भगवान् शंकर और पार्वतीके तेजसे हाटकी नामक श्रेष्ठ नदी प्रादुर्भूत है । वायुसे प्रज्वलित अग्निदेव महान् ओजपूर्वक उसका जल पीते रहते हैं । उस ११ समय उनके द्वारा निष्ठ्यूत ( त्यक्त थूक ) दैत्योंके लिये अत्यन्त प्रिय हाटक नामक सुवर्ण बन जाता है । दैत्योंकी स्त्रियाँ आभूषण - योग्य उस सुवर्णको सदा १२ धारण किये रहती हैं ॥११-१२ ॥ हे मुने! उस वितलके नीचे सुतल नामक विवर कहा गया है, जो सभी बिलोंमें श्रेष्ठ है । यहाँ १३ विरोचनके पवित्र कीर्तिवाले बलि नामक पुत्र रहते हैं । देवराज इन्द्रका परम प्रिय कार्य करनेकी इच्छासे वामनरूप त्रिविक्रम भगवान् विष्णु बलिको इस सुतलमें लाये १४ और उन्होंने तीनों लोकोंकी लक्ष्मी सन्निविष्ट करके दानवराज बलिको यहाँ स्थापित किया । इन्द्र आदि देवताओंके पास भी जो लक्ष्मी नहीं है, वह उस १५ । बलिके पीछे - पीछे चलती है ॥ १३–१५ ॥
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अ ० १ ९ ]
Tha देवदेवेशमाराधयति भक्तितः ।
व्यपेतसाध्वसोऽद्यापि वर्तते सुतलाधिपः ॥
भूमिदानफलं ह्येतत्पात्रभूतेऽखिलेश्वरे ।
वर्णयन्ति महात्मानो नैतद्युक्तं च नारद ॥
वासुदेवे भगवति पुरुषार्थप्रदे हरौ ।
एतद्दानफलं विप्र सर्वथा नहि युज्यते ॥
यस्यैव देवदेवस्य नामापि विवशो गृणन् । स्वकीयकर्मबन्धीयगुणान्विधुनुते ऽञ्जसा
यत्क्लेशबन्धहानाय सांख्ययोगादिसाधनम् ।
कुर्वते यतयो नित्यं भगवत्यखिलेश्वरे ॥
न चायं भगवानस्माननुजग्राह नारद ।
मायामयं च भोगानामैश्वर्यं व्यतनोत्परम् ॥
सर्वक्लेशाधिहेतुं तदात्मानुस्मृतिमोषणम् ।
यं साक्षाद्भगवान् विष्णुः सर्वोपायविदीश्वरः ॥
याच्ञाछलेनापहृतं सर्वस्वं देहशेषकम् ।
अप्राप्तान्योपाय ईशः पाशैर्वारुणसम्भवैः ॥
बन्धयित्वावमुच्यापि गिरिदर्यामिवाब्रवीत् । असाविन्द्रो महामूढो यस्य मन्त्री बृहस्पतिः प्रसन्नमिममत्यर्थमयाचल्लोकसम्पदम् I त्रैलोक्यमिदमैश्वर्यं कियदेवातितुच्छकम् ॥
आशिषां प्रभवं मुक्त्वा यो मूढो लोकसम्पदि ।
अस्मत्पितामहः श्रीमान् प्रह्लादो भगवत्प्रियः ॥
दास्यं वव्रे विभोस्तस्य सर्वलोकोपकारकः ।
पित्र्यमैश्वर्यमतुलं दीयमानं च विष्णुना ॥
पितर्युपर वीरे नैवैच्छद्भगवत्प्रियः ।
तस्यातुलानुभावस्य सर्वलोकोपधीमतः ॥
अस्मद्विधो नाल्पपक्वेतरदोषोऽवगच्छति ।
एवं दैत्यपतिः सोऽयं बलिः परमपूजितः ॥
अष्टम स्कन्ध २६ ९ बलि उन्हीं देवदेवेश्वर श्रीहरिकी भक्तिपूर्वक आराधना करते हैं । वे सुतलके अधिपतिके रूपमें १६ आज भी वहाँ निर्भय होकर रहते हैं ॥ १६ ॥
बलिके लिये यह सुतललोककी प्राप्ति अखिल १७ जगत्के स्वामी तथा दानपात्रभूत भगवान् विष्णुको दिये ये भूमिदानका ही फल है - ऐसा महात्मालोग कहते हैं, किंतु हे नारद! यह समीचीन नहीं है । हे विप्र! चारों १८ पुरुषार्थोंको देनेवाले वासुदेव भगवान् श्रीहरिको दिये गये दानका इसे फल समझना किसी भी तरहसे उचित नहीं है; क्योंकि कोई विवश होकर भी उन देवाधिदेवके ॥ १ ९ नामका उच्चारण करके अपने कर्मबन्धनरूपी पाशको शीघ्र ही काट देता है । योगीलोग उस क्लेशरूपी बन्धनको २० काटनेके लिये अखिल जगत्के स्वामीमें भक्ति रखते हुए सांख्ययोग आदिका साधन करते हैं । हे नारद! इन भगवान्ने हम देवताओंपर कोई अनुग्रह नहीं किया है, २१ जो कि उन्होंने भोगोंका परम मायामय ऐश्वर्य इन्द्रको देनेके लिये यह प्रयत्न किया था; क्योंकि यह ऐश्वर्य तो सभी कष्टोंका मूल कारण है और परमात्माकी स्मृतिको २२ मिटानेवाला है ॥ १७–२१३ ॥ जिस समय समस्त उपायोंका सहज ज्ञान रखनेवाले साक्षात् विष्णुने कोई अन्य उपाय न देखकर याचनाके २३ छलसे उस बलिका सर्वस्व छीन लिया और उसके पास केवल शरीरमात्र ही शेष रहने दिया, तब वरुण ॥ २४ पाशोंमें बाँधकर पर्वतकी गुफामें छोड़ दिये जानेपर उसने कहा था- - जिसके मन्त्री बृहस्पति हों, वे इन्द्र इतने महान् मूर्ख हैं! जो कि उन्होंने परम प्रसन्न २५ श्रीहरिसे सांसारिक सम्पत्तिकी याचना की । त्रिलोकीका यह ऐश्वर्य भला कितना नगण्य है । जो भगवान्के आशीर्वादोंका वैभव छोड़कर लोकसम्पत्तिकी कामना २६ करता है, वह मूर्ख है ॥२२–२५३ ॥ सम्पूर्ण लोकका उपकार करनेवाले तथा भगवत्प्रिय मेरे पितामह श्रीमान् प्रह्लादने उन प्रभुसे दास्यभावकी २७ याचना की थी । उनके पराक्रमी पिता हिरण्यकशिपुकी मृत्युके पश्चात् भगवान् विष्णुके द्वारा दी जानेवाली २८ अतुलनीय पितृसम्पदाको ग्रहण करनेकी थोड़ी भी इच्छा उन भगवत्प्रिय प्रह्लादने नहीं की थी ॥ २६–२८३ ॥ अतुलनीय अनुभाववाले तथा सम्पूर्ण लोकोंके २ ९ | उपकारकी बुद्धिवाले उन प्रह्लादका प्रभाव मुझ जैसा
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२७० सुतले वर्तते यस्य द्वारपालो हरिः स्वयम् । एकदा दिग्विजये राजा रावणो लोकरावणः प्रविशन्सुतले येन भक्तानुग्रहकारिणा । पादाङ्गुष्ठेन प्रक्षिप्तो योजनायुतमत्र हि एवंभूतानुभावोऽयं बलिः सर्वसुखैकभुक् । आस्ते सुतलराजस्थो देवदेवप्रसादतः श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २० दोषोंका आगार पुरुष भला कैसे जान सकता है । इस ॥ ३० प्रकारके विचारोंवाले परमपूज्य दानवराज बलि थे, जिनके द्वारपालके रूपमें स्वयं श्रीहरि सुतलमें विराजमान रहते हैं । एक समयकी बात है, जगत्को रुलानेवाला रावण दिग्विजयके उद्देश्यसे सुतललोकमें प्रवेश कर रहा था, इतनेमें भक्तोंपर कृपा करनेवाले उन श्रीहरिके ॥ ३१ पैरके अँगूठेकी ठोकरसे वह दस हजार योजन दूर जा गिरा था ॥ २ ९ – ३१ ॥ इस प्रकारके प्रभाववाले तथा सभी सुखोंका भोग करनेवाले बलि देवाधिदेव श्रीहरिकी कृपासे सुतललोकमें ॥ ३२ । राजाके रूपमें प्रतिष्ठित होकर विराजमान हैं ॥ ३२ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामष्टमस्कन्धे अतलवितलसुतललोकवर्णनं नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥ १ ९ ॥ अथ विंशोऽध्यायः तलातल, महातल, रसातल और पाताल तथा भगवान् अनन्तका वर्णन श्रीनारायण उवाच ततोऽधस्ताद्विवरकं तलातलमुदीरितम् दानवेन्द्रो मयो नाम त्रिपुराधिपतिर्महान् त्रिलोक्याः शङ्करेणायं पालितो दग्धपूस्त्रयः देवदेवप्रसादात्तु लब्धराज्यसुखास्पदः आचार्यो मायिनां सोऽयं नानामायाविशारदः पूज्यते राक्षसैर्घोरैः सर्वकार्यसमृद्धये
ततोऽधस्तात्सुविख्यातं महातलमिति स्फुटम् ।
सर्पाणां काद्रवेयाणां गणः क्रोधवशो महान् ॥
अनेकशिरसां विप्र प्रधानान्कीर्तयामि ते ।
कुहकस्तक्षकश्चैव सुषेणः कालियस्तथा ॥
महाभोगा महासत्त्वाः क्रूराः क्रूरस्वजातयः ।
पतत्रिराजाधिपतेरुद्विग्नाः सर्व एव ते ॥
स्वकलत्रापत्यसुहृत्कुटुम्बस्य च सङ्गताः ।
प्रमत्ता विहरन्त्येव नानाक्रीडाविशारदाः ॥
श्रीनारायण बोले – उस सुतलके नीचेके । विवरको ' तलातल ' कहा गया है । वहाँ त्रिपुराधिपति मय नामक महान् दानव रहता है ॥ १ ॥
॥ १ त्रिलोकीकी रक्षाके लिये भगवान् शंकरने । उसकी तीनों पुरियाँ भस्म करके उसके यहाँ रहनेकी व्यवस्था कर दी । उसे देवाधिदेव शिवकी कृपासे ॥ २ यहाँ सुखदायक राज्य प्राप्त हो गया है ॥ २ ॥
अपने समस्त कार्योंके अभ्युदयके लिये बड़े - बड़े ॥ ३ भयानक राक्षसगण अनेक प्रकारकी माया रचनेमें परम प्रवीण उस मायावियोंके भी गुरु मयकी पूजा करते हैं ॥ ३ ॥
उस तलातलके नीचे अति प्रसिद्ध ' महातल ' ४ नामक विस्तृत विवर है । उसमें कद्रूसे उत्पन्न हुए अनेक सिरोंवाले क्रोधी सर्पोंका एक बहुत बड़ा समूह रहता है । है विप्र! उनमें प्रधान सर्पोंके नाम आपको ५ बताता हूँ - कुहक, तक्षक, सुषेण और कालिय । ये विशाल फनवाले, महान् शक्तिसे सम्पन्न तथा अत्यन्त भयानक होते हैं । इनकी जाति ही बड़ी क्रूर होती है । ६ वे सभी केवल पक्षिराज गरुडसे ही आतंकित रहते हैं । अनेक प्रकारकी क्रीडा करनेमें परम दक्ष ये सर्प अपनी स्त्रियों, सन्तानों, सुहृदों तथा परिवारजनोंके साथ ७ । प्रमत्त होकर वहाँ विहार करते रहते हैं ॥ ४–७ ॥
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अ ० २० ] अष्टम स्कन्ध २७१
ततोऽधस्ताच्च विवरे रसातलसमाह्वये ।
दैतेया निवसन्त्येव पणयो दानवाश्च ये ॥ ८
निवातकवचा नाम हिरण्यपुरवासिनः ।
कालेया इति च प्रोक्ताः प्रत्यनीका हविर्भुजाम् ॥ ९
महौजसश्चोत्पत्त्यैव महासाहसिनस्तथा ।
सकलेशस्य च हरेस्तेजसा हतविक्रमाः ॥ १०
बिलेशया इव सदा विवरे निवसन्ति हि ।
ये वै वाग्भिः सरमया शक्रदूत्या निरन्तरम् ॥ ११
मन्त्रवर्णाभिरसुरास्ताडिता बिभ्यति स्म ह ।
ततोऽप्यधस्तात्पाताले नागलोकाधिपालकाः ॥ १२
वासुकिप्रमुखाः शङ्खः कुलिकः श्वेत एव च ।
धनञ्जयो महाशङ्खो धृतराष्ट्रस्तथैव च ॥ १३
शङ्खचूडः कम्बलाश्वतरो देवोपदत्तकः ।
महामर्षा महाभोगा निवसन्ति विषोल्बणाः ॥ १४
पञ्चमस्तकवन्तश्च फणासप्तक भूषिताः ।
केचिद्दशफणाः केचिच्छतशीर्षास्तथापरे ॥ १५
सहस्त्रशिरसः केऽपि रोचिष्णुमणिधारकाः ।
पातालरन्ध्रतिमिरनिकरं स्वमरीचिभिः ॥ १६
विधमन्ति च देवर्षे सदा सञ्जातमन्यवः ।
अस्य मूलप्रदेशे हि त्रिंशत्साहस्रकेऽन्तरे ॥ १७
योजनैः परिसंख्याते तामसी भगवत्कला ।
अनन्ताख्या समास्ते हि सर्वदेवप्रपूजिता ॥ १८
अहमित्यभिमानस्य लक्षणं यं प्रचक्षते ।
सङ्कर्षणं सात्वतीयाः कर्षणं द्रष्टृदृश्ययोः ॥ १ ९
इदं भूमण्डलं यस्य सहस्त्रशिरसः प्रभोः ।
अनन्तमूर्तेः शेषस्य ध्रियमाणं च शीर्षके ॥ २०
पृथ्वीगोलमशेषं हि सिद्धार्थ इव लक्ष्यते । * एक कथा आती है कि जब पणि नामक दैत्योंने सरमा नामकी एक दूतीको भेजा था । सरमासे दैत्योंने सन्धि हुए कहा था — ' हता इन्द्रेण पणयः शयध्वम् ' ( हे पणिगण! कारण उन्हें सदा इन्द्रका डर लगा रहता है । उसके भी नीचे ' रसातल ' नामवाले विवरमें ' पणि ' नामके दैत्य और दानव रहते हैं, जो निवातकवच, हिरण्यपुरवासी और कालेय कहे गये हैं । देवताओंसे इनकी शत्रुता रहती है ॥ ८ - ९ ॥ वे जन्मसे ही महान् पराक्रमी तथा साहसी होते हैं, किंतु अखिल जगत् के स्वामी भगवान् श्रीहरिके तेजसे कुण्ठित पराक्रमवाले होकर वे सर्पोंकी भाँति छिपकर सदा उस विवरमें पड़े रहते हैं । इन्द्रकी दूती सरमाके मन्त्र - वर्णरूप * वाक्योंके प्रभावसे असुर कष्ट पा चुके हैं - इसी बातका स्मरण करके वे हमेशा भयभीत रहते हैं ॥ १०-११३ ॥ इससे भी नीचे स्थित ' पाताललोक ' में मुख्यरूपसे वासुकि, शंख, कुलिक, श्वेत, धनंजय, महाशंख, धृतराष्ट्र, शंखचूड, कम्बल, अश्वतर और देवोपदत्तक | आदि महान् क्रोधी, बड़े - बड़े फनोंवाले तथा महान् विषधर सर्प निवास करते हैं; वे सब नागलोकके अधिपालक हैं॥१२–१४ ॥ उनमें कोई सर्प पाँच फनोंवाले, कोई सात फनोंवाले और कोई दस फनोंवाले हैं । कुछ सर्पोंके सौ सिर तथा कुछके हजार सिर हैं । हे देवर्षे! जगमगाती हुई मणियाँ धारण करनेवाले वे क्रोधयुक्त सर्प अपनी मणियोंके तेजसे पाताल - विवरके घोर अन्धकार - समूहको नष्ट कर देते हैं ॥ १५ - १६३ ॥ इस पाताललोकके नीचे तीस हजार योजनकी दूरीपर भगवान् श्रीहरिकी एक तामसी कला विराजमान है । सम्पूर्ण देवताओंसे सम्यक् पूजित इस कलाका नाम अनन्त है ॥ १७-१८ ॥ अहंरूप अभिमानका लक्षण होनेके कारण यह द्रष्टा तथा दृश्यका कर्षण करके एक कर देती है, इसीलिये पांचरात्र आगमके अनुयायी इसे संकर्षण कहते हैं ॥१ ९ ॥ हजार सिरोंवाले इन अनन्तमूर्ति भगवान् शेषके एक सिरपर रखा हुआ यह गोलाकार समग्र भूमण्डल सरसोंके दानेकी भाँति दिखायी पड़ता है ॥ २०३ ॥
पृथ्वीको रसातलमें छिपा लिया, तब इन्द्रने उसे ढूँढ़नेके लिये करनी चाही, परंतु सरमाने सन्धि न करके इन्द्रकी स्तुति करते तुम इन्द्रके हाथसे मरकर पृथ्वीपर सो जाओ ) इसी शापके