देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 281–290
देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 281–290
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२७२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २० यस्य कालेन देवस्य सजिहीर्षोः समं विभोः ॥
चराचरं भ्रुवोरन्तर्विवरादुदपद्यत ।
साङ्कर्षणो नाम रुद्रो व्यूहैकादशशोभितः ॥
त्रिलोचनश्च त्रिशिखं शूलमुत्तम्भयन्स्वयम् ।
उदतिष्ठन्महासत्त्वो महाभूतक्षयङ्करः ॥
यस्याङ्घ्रिकमलद्वन्द्वशोणाच्छनखमण्डले ।
विराजन्मणिबिम्बेषु महाहिपतयोऽनिशम् ॥
एकान्तभक्तियोगेन सह सात्त्वतपुङ्गवैः ।
प्रणमन्तः स्वमूर्ध्ना ते स्वमुखानि समीक्षते ॥
स्फुरत्कुण्डलमाणिक्यप्रभामण्डलभाञ्ज्यपि ।
सुकपोलानि चारूणि गण्डस्थलद्युमन्ति च ॥
नागराजकुमार्योऽपि चार्वङ्गविलसत्त्विषः ।
विशदैर्विपुलैस्तद्वद्धवलैः सुभगैस्तथा ॥
रुचिरैर्भुजदण्डैश्च शोभमाना इतस्ततः ।
चन्दनागुरुकाश्मीरपङ्कलेपेन भूषिताः ॥
तदभिमर्षसञ्जातकामावेशसमायुताः 1 ललितस्मितसंयुक्ताः सव्रीडं लोकयन्ति च ॥ अनुरागमदोन्मत्तविघूर्णारुणलोचनम् I करुणावलोकनेत्रं च आशासानास्तथाशिषः ॥
सोऽनन्तो भगवान्देवोऽनन्तसत्त्वो महाशयः ।
अनन्तगुणवार्धिश्च आदिदेवो महाद्युतिः ॥
संहृतामर्षरोषादिवेगो लोकशुभाय च ।
आस्ते महासत्त्वनिधिः सर्वदेवप्रपूजितः ॥
ध्यायमानः सुरैः सिद्धैरसुरैश्चोरगैस्तथा ।
विद्याधरैश्च गन्धर्वैर्मुनिसङ्घैश्च नित्यशः ॥
अनारतमदोन्मत्तलोकविह्वललोचनः वाक्यामृतेन विबुधान्स्वपार्षदगणानपि ॥ २१ समय आनेपर जब ये भगवान् अनन्त चराचर जगत् के संहारकी इच्छा करते हैं, तब इनकी भौंहोंके विवरसे ग्यारह रुद्रोंसे सुशोभित विग्रहवाले सांकर्षण २२ नामक रुद्र प्रकट हो जाते हैं॥२१-२२ ॥ ये रुद्र तीन नेत्रोंसे शोभा पाते हैं, ये स्वयं तीन नोकोंवाला त्रिशूल लेकर खड़े हो जाते हैं । असीम २३ शक्तिसे सम्पन्न ये रुद्र अखिल प्राणिजगत्का संहार करनेवाले हैं ॥ २३ ॥
२४ उन भगवान् शेषनागके दोनों चरणकमलोंके नख स्वच्छ तथा लाल मणियोंके समान देदीप्यमान हैं । जब बड़े - बड़े नागराज एकान्तभक्तिसे युक्त होकर २५ प्रधान भक्तोंके साथ भगवान् शेषके चरणोंमें सिर झुकाकर प्रणाम करते हैं, तब उन्हें माणिक्यजटित कुंडलकी प्रभासे प्रकाशित अपने मुख, सुन्दर कपोल २६ तथा गण्डस्थल उनके मणिसदृश नखोंमें दृष्टिगोचर होने लगते हैं ॥ २४–२६ ॥ वहाँ नागराजोंकी सुन्दर तथा कान्तियुक्त अंगोंवाली २७ कुमारियाँ भी रहती हैं । लम्बी, विशाल, स्वच्छ, सुन्दर तथा मनोहर भुजाओंसे सुशोभित वे कुमारियाँ इधर-२८ उधर घूमा करती हैं । वे अपने अंगोंमें चन्दन, अगुरु और कस्तूरीका लेपन किये रहती हैं ॥ २७ - २८ ॥ उन भगवान् संकर्षणके स्पर्शजन्य कामावेशसे २ ९ समन्वित तथा मधुर मुस्कानसे युक्त होकर उन अनुराग-मदसे उन्मत्त विघूर्णित रक्त नेत्रोंवाले तथा करुणापूर्ण दृष्टिवाले भगवान्को वे नागकन्याएँ आशीर्वादकी ३० । आशासे लज्जापूर्वक निहारती रहती हैं ॥ २ ९ -३० ॥ अनन्त पराक्रमवाले, अत्यन्त उदार हृदयवाले, अनन्त गुणोंके सागर, महान् तेजस्वी, क्रोध - रोष ३१ आदिके वेगोंको रोकनेवाले, असीम शक्तिके आगार-स्वरूप वे आदिदेव भगवान् अनन्त सभी देवताओंसे ३२ प्रपूजित होकर सिद्धों, देवताओं, असुरों, नागों, विद्याधरों, गन्धर्वों और मुनिगणोंके द्वारा निरन्तर ध्यान किये जाते हुए लोकोंके कल्याणार्थ वहाँ ३३ विराजमान रहते हैं ॥ ३१–३३ ॥ निरन्तर प्रेमके मदसे मुग्ध एवं विह्वल नेत्रोंवाले वे भगवान् अपनी अमृतमयी वाणीसे सभी देवताओं ३४ । तथा अपने पार्षदगणोंको भी सन्तुष्ट किये रहते हैं ।
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अ ० २१ ]
आप्यायमानः स विभुर्वैजयन्तीं त्रजं दधत् ।
अम्लानाभिनवैः स्वच्छैस्तुलसीदलसञ्चयैः ॥
माद्यन्मधुकरव्रातघोषश्रीसंयुतां सदा । नीलवासा देवदेव एककुण्डलभूषितः हलस्य ककुदि न्यस्तसुपीवरभुजोऽव्ययः । महेन्द्रः काञ्चनीं यद्वद्वरत्रां च मतङ्गमः उदारलीलो देवेशो वर्णितः सात्त्वतर्षभैः अष्टम स्कन्ध २७३ वे कभी भी न मुरझानेवाले निर्मल और नवीन तुलसी-दलोंसे सुशोभित वैजयन्तीकी माला धारण किये रहते ३५हैं । वह माला मतवाले भौंरोंके समूहोंकी मधुर गुंजारसे सदा सुशोभित रहती है । वे देवदेव भगवान् शेष नीले रंगका वस्त्र धारण करते हैं और उनके कानमें केवल एक कुंडल सुशोभित रहता है I । वे ॥ ३६ अविनाशी भगवान् अपनी विशाल भुजा हलकी मूठपर रखे रहते हैं । सुवर्णमयी पृथ्वीको अपने सिरपर धारण किये हुए भगवान् शेष पीठपर हौदा रखे किसी मतवाले हाथीकी भाँति सुशोभित होते हैं । इस प्रकार । श्रेष्ठ भगवद्भक्तोंने उदार लीलाओंवाले भगवान् शेषका ॥ ३७ | वर्णन किया है || ३४–३७ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामष्टमस्कन्धे तलातलादिलोकवर्णनेऽनन्तवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
अथैकविंशोऽध्यायः देवर्षि नारदद्वारा भगवान् अनन्तकी महिमाका गान तथा श्रीनारायण उवाच तस्यानुभावं भगवान् ब्रह्मपुत्रः सनातनः सभायां ब्रह्मदेवस्य गायमान उपासते उत्पत्तिस्थितिलयहेतवोऽस्य कल्पाः सत्त्वाद्या: प्रकृतिगुणा यदीक्षयासन् यद्रूपं ध्रुवमकृतं यदेकमात्मन्-नानाधात्कथमुह वेद तस्य वर्त्म मूर्तिं नः पुरुकृपया बभार सत्त्वं संशुद्धं सदसदिदं विभाति यत्र यल्लीलां मृगपतिराददेऽनवद्या-मादातुं स्वजनमनांस्युदारवीर्यः नरकोंकी नामावली श्रीनारायण बोले- ब्रह्माके पुत्र महाभाग । नारद ब्रह्मदेवकी सभामें उन भगवान् शेषकी महिमाका गान करते हुए उनकी उपासना करते हैं ॥ १ ॥
॥ १ जिनका दर्शन पाकर इस जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके हेतुभूत सत्त्वादि प्राकृतिक गुणोंमें अपने कार्य करनेकी क्षमता आ जाती है, जिनका रूप अनन्त तथा अनादि है, जो अकेले होते । हुए ही इस नानात्मक प्रपंचको धारण किये हुए हैं-उन भगवान् संकर्षणके तत्त्वको कोई कैसे जान ॥ २ सकता है? ॥ २ ॥
जिनमें यह सत् - असत्रूप सारा प्रपंच भास रहा है तथा स्वजनोंका चित्त आकर्षित करनेके लिये की हुई जिनकी वीरतापूर्ण लीलाको परम । पराक्रमी मृगराज सिंहने आदर्श मानकर अपनाया है, उन उदारवीर्य भगवान् संकर्षणने हमपर बड़ी कृपा करके यह विशुद्ध सत्त्वमय स्वरूप धारण ॥ ३ | किया है ॥ ३ ॥
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२७४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २१ यन्नाम श्रुतमनुकीर्तयेदकस्मा-दार्तो वा यदि पतितः प्रलम्भनाद्वा हन्त्यंहः सपदि नृणामशेषमन्यं कं शेषाद्भगवत आश्रयेन्मुमुक्षुः मूर्धन्यर्पितमणुवत्सहस्रमूर्ध्ना भूगोलं सगिरिसरित्समुद्रसत्त्वम् आनन्त्यादनमितविक्रमस्य भूम्नः को वीर्याण्यधिगणयेत्सहस्त्रजिह्वः एवं प्रभाव भगवाननन्तो दुरन्तवीर्योरुगुणानुभावः मूले रसायाः स्थित आत्मतन्त्रो यो लीलया क्ष्मां स्थितये बिभर्ति एता ह्येवेह तु नृभिर्गतयो मुनिसत्तम गन्तव्या बहुशो यद्वद्यथाकर्मविनिर्मिताः यथोपदेशं च कामान्सदा कामयमानकैः एतावती राजेन्द्र मनुष्यमृगपक्षिषु विपाकगतयः प्रोक्ता धर्मस्य वशगास्तथा उच्चावचा विसदृशा यथाप्रश्नं निबोधत नारद उवाच
वैचित्र्यमेतल्लोकस्य कथं भगवता कृतम् ।
समानत्वे कर्मणां च तन्नो ब्रूहि यथातथम् ॥
श्रीनारायण उवाच
कर्तुः श्रद्धावशादेव गतयोऽपि पृथग्विधाः ।
त्रिगुणत्वात्सदा तासां फलं विसदृशं त्विह ॥
सात्त्विक्या श्रद्धया कर्तुः सुखित्वं जायते सदा ।
दुःखित्वं च तथा कर्तुं राजस्या श्रद्धया भवेत् ॥
दुःखित्वं चैव मूढत्वं तामस्या श्रद्धयोदितम् ।
तारतम्यात्तु श्रद्धानां फलवैचित्र्यमीरितम् ॥
यदि कोई दुःखी अथवा पतित मनुष्य अकस्मात् । अथवा हँसी - हँसीमें उनके सुने हुए नामका एक बार भी उच्चारण कर लेता है तो वह दूसरे मनुष्योंके भी सभी पापोंको शीघ्र ही नष्ट कर देता है - ऐसे भगवान् ॥ ४ शेषको छोड़कर मोक्षकी इच्छा रखनेवाला मनुष्य अन्य किसका आश्रय ग्रहण करे? ॥ ४ ॥
पर्वत, नदी और समुद्र आदिसे पूर्ण यह सम्पूर्ण । भूमण्डल उन हजार सिरोंवाले भगवान् शेषके एक मस्तकपर धूलके एक कणके समान स्थित है । वे अनन्त ॥ ५ हैं, इसलिये उनके पराक्रमका कोई परिमाण नहीं है । किसीके हजार जीभें हों, तो भी उन सर्वव्यापक भगवान्के पराक्रमकी गणना वह कैसे कर सकता है? ॥ ५ ॥
वास्तवमें उनका वीर्य, अतिशय गुण और प्रभाव असीम है । ऐसे प्रभावशाली भगवान् अनन्त रसातल मूलमें अपनी ही महिमामें स्थित होकर स्वतन्त्र हैं ॥ ६ और सम्पूर्ण लोकोंकी स्थितिके लिये पृथ्वीको अपनी । लीलासे धारण किये हुए हैं ॥ ६ ॥
॥ ७ हे मुनिश्रेष्ठ! निरन्तर भोगोंकी कामना करनेवाले पुरुषोंकी अपने कर्मोंके अनुसार प्राप्त होनेवाली । भगवान्की रची हुई ये ही गतियाँ कही गयी हैं । जैसा ॥ ८ मुझे उपदेश प्राप्त हुआ, वैसा कह दिया । हे राजेन्द्र! । मनुष्यों, पशुओं और पक्षियोंके प्रवृत्तिधर्मके परिणामस्वरूप प्राप्त होनेवाली परस्पर विलक्षण ऊँच - नीच गतियाँ ॥ ९ इतनी ही हैं । जो आपने पूछा था, उसे मैंने बता दिया और आगे भी सुनिये ॥७ – ९ ॥ नारदजी बोले - सभी प्राणियोंके कर्म समान होनेपर भी भगवान्ने उन लोगोंमें यह विभिन्नता क्यों १० की है? इसे आप यथार्थरूपमें बताइये ॥ १० ॥
श्रीनारायण बोले- [ हे नारद! ] कर्ताकी श्रद्धा सात्त्विक, राजस और तामस - इन तीन भिन्न - भिन्न गुणों के कारण गतियाँ भी अलग - अलग होती हैं और ११ इसीलिये उनका फल भी भिन्न - भिन्न होता है ॥ ११ ॥
सात्त्विक श्रद्धाके द्वारा कर्ताको सदा सुखकी प्राप्ति १२ होती है, राजसी श्रद्धासे कर्ताको दुःख मिलता है और तामसी श्रद्धाके प्रभावसे कर्ता दुःख और मूढ़ता दोनोंका उदय होता है । इस प्रकार श्रद्धाओंके तारतम्यसे १३ । फलोंमें भी विचित्रता बतायी गयी है ॥ १२ - १३ ॥
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अ ० २१ ] अष्टम
अनाद्यविद्याविहितकर्मणां परिणामजाः ।
सहस्त्रशः प्रवृत्तास्तु गतयो द्विजपुङ्गव ॥ १४
तद्भेदान्वर्णयिष्यामि प्राचुर्येण द्विजोत्तम ।
त्रिजगत्या अन्तराले दक्षिणस्यां दिशीह वै ॥ १५
भूमेरधस्तादुपरि त्वतलस्य च नारद ।
अग्निष्वात्ताः पितृगणा वर्तन्ते पितरश्च ह ॥ १६
वसन्ति यस्यां स्वीयानां गोत्राणां परमाशिषः ।
सत्याः समाधिना शीघ्रं त्वाशासानाः परेण वै ॥ १७
पितृराजोऽपि भगवान् सम्परेतेषु जन्तुषु ।
विषयं प्रापितेष्वेषु स्वकीयैः पुरुषैरिह ॥ १८
सगणो भगवत्प्रोक्ताज्ञापरो दमधारकः ।
यथाकर्म यथादोषं विदधाति विचारदृक् ॥ १ ९
स्वान्गणान्धर्मतत्त्वज्ञान्सर्वानाज्ञाप्रवर्तकान् ।
सदा प्रेरयति प्राज्ञो यथादेशनियोजितान् ॥ २०
नरकानेकविंशत्या संख्यया वर्णयन्ति हि ।
अष्टाविंशमितान्केचित्ताननुक्रमतो ब्रुवे ॥ २१
तामिस्र अन्धतामिस्त्रो रौरवोऽपि तृतीयकः ।
महारौरवनामा च कुम्भीपाकोऽपरो मतः ॥ २२
कालसूत्रं तथा चासिपत्रारण्यमुदाहृतम् ।
सूकरस्य मुखं चान्धकूपोऽथ कृमिभोजनः ॥ २३
संदंशस्तप्तमूर्तिश्च वज्रकण्टक एव च ।
शाल्मली चाथ देवर्षे नाम्ना वैरतणी तथा ॥ २४
पूयोदः प्राणरोधश्च तथा विशसनं मतम् ।
लालाभक्षः सारमेयादनमुक्तमतः परम् ॥ २५
अवीचिरप्ययः पानं क्षारकर्दम एव च ।
रक्षोगणाख्यसम्भोजः शूलप्रोतोऽप्यतः परम् ॥ २६
दन्दशूकोऽवटारोधः पर्यावर्तनकः परम् ।
सूचीमुखमिति प्रोक्ता अष्टाविंशतिनारकाः ॥ २७
इत्येते नारका नाम यातनाभूमयः पराः ।
कर्मभिश्चापि भूतानां गम्याः पद्मसम्भव ॥ २८
स्कन्ध २७५ हे मुनिश्रेष्ठ! अनादि मायाके बनाये हुए कर्मोंके परिणामस्वरूप हजारों प्रकारकी गतियाँ प्रवृत्त होती हैं । हे द्विजश्रेष्ठ! अब मैं उन गतियोंके भेदोंका विस्तारसे वर्णन करूँगा ॥ १४३ ॥
हे नारद! त्रिलोकीके भीतर दक्षिण दिशामें अग्निष्वात्ता नामक पितृगण तथा अन्य पितर निवास करते हैं । यह स्थान पृथ्वीसे नीचे तथा अतल लोकसे ऊपर है । सत्यस्वरूप ये पितृगण सदा परम समाधिसे युक्त होकर अपने वंशजोंके परम कल्याणकी आशा करते हुए यहाँ रहते हैं ॥ १५–१७ ॥ वहाँ पितृराज भगवान् यम अपने गणोंके साथ विराजमान रहते हैं । सम्यक् विचार दृष्टिवाले तथा दण्डधारी वे यमराज भगवान्की कही गयी आज्ञाका पालन करते हुए अपने दूतोंद्वारा वहाँ लाये गये मृत प्राणियोंके लिये उनके कर्मों तथा दोषोंके अनुसार वैसे ही फलका विधान करते हैं ॥ १८-१९ ॥ वे परम ज्ञानी यमराज धर्मतत्त्वको जाननेवाले, यथास्थान नियुक्त किये गये तथा आज्ञाकारी अपने सभी गणोंको सदा प्रेरित करते रहते हैं ॥२० ॥
संख्यामें कुल इक्कीस नरक बताये गये हैं । कुछ लोग नरकोंकी संख्या अट्ठाईस बताते हैं । मैं क्रमशः उनका वर्णन कर रहा हूँ ॥ २१ ॥
हे देवर्षे! तामिस्र, अन्धतामिस्र, रौरव, महारौरव, कुम्भीपाक, कालसूत्र, असिपत्रवन, सूकरमुख, अन्धकूप, कृमिभोजन, सन्दंश, तप्तमूर्ति, वज्रकण्टक-शाल्मली, वैतरणी, पूयोद, प्राणरोध, विशसन, लालाभक्ष, सारमेयादन, अवीचि, अय: पान, क्षारकर्दम, रक्षोगणसंभोज, शूलप्रोत, दंदशूक, अवटारोध, पर्यावर्तनक और सूचीमुख - ये अट्ठाईस नरक बताये गये हैं । हे ब्रह्मापुत्र! इन नामोंवाले ये नरक यातना भोगने परम स्थान हैं; जहाँ प्राणी अपने - अपने कर्मोंके । अनुसार जाते हैं ॥ २२–२८ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामष्टमस्कन्धे नरकस्वरूपवर्णनं नामैकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥
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२७६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २२ अथ द्वाविंशोऽध्यायः विभिन्न नरकों का वर्णन नारद उवाच
कर्मभेदाः कतिविधाः सनातनमुने मम ।
श्रोतव्याः सर्वथैवैते यातनाप्राप्तिभूमयः ॥
श्रीनारायण उवाच
यो वै परस्य वित्तानि दारापत्यानि चैव हि ।
हरते स हि दुष्टात्मा यमानुचरगोचरः ॥
कालपाशेन सम्बद्धो याम्यैरतिभयानकैः ।
तामिस्त्रनामनरके पात्यते यातनास्पदे ॥
ताडनं दण्डनं चैव सन्तर्जनमतः परम् ।
याम्याः कुर्वन्ति पाशाढ्याः कश्मलं याति चैव हि ॥
मूर्च्छामायाति विवशो नारकी पद्मभूसुत ।
यः पतिं वञ्चयित्वा तु दारादीनुपभुज्यति ॥
अन्धतामिस्त्रनरके पात्यते यमकिङ्करैः ।
पात्यमानो यत्र जन्तुर्वेदनापरवान्भवेत् ॥
नष्टदृष्टिर्नष्टमतिर्भवत्येवाविलम्बतः वनस्पतिर्भज्यमानमूलो यद्वद्भवेदिह ॥
तस्मादप्यन्धतामिस्त्रनाम्ना प्रोक्तः पुरातनैः ।
एतन्ममाहमिति यो भूतद्रोहेण केवलम् ॥
पुष्णाति प्रत्यहं स्वीयं कुटुम्बं कार्यलम्पटः ।
एतद्विहाय चात्रैव स्वाशुभेन पतेदिह ॥
रौरवे नाम नरके सर्वसत्त्वभयावहे ।
इह लोकेऽमुना ये तु हिंसिता जन्तवः पुरा ॥
त एव रुरवो भूत्वा परत्र पीडयन्ति तम् ।
तस्माद्रौरवमित्याहुः पुराणज्ञा मनीषिणः ॥
रुरुः सर्पादतिक्रूरो जन्तुरुक्तः पुरातनैः । नारदजी बोले - हे सनातन मुने! विविध प्रकारकी यातनाओंकी प्राप्ति करानेवाले कर्मोंके भेद कितने प्रकारके होते हैं; मैं इनके विषयमें भलीभाँति सुनना १ चाहता हूँ ॥१ ॥
श्रीनारायण बोले – जो पुरुष दूसरेके धन, स्त्री और सन्तानका हरण करता है, वह दुष्टात्मा यमराजके दूतोंद्वारा पकड़कर ले जाया जाता है ॥ २ ॥
२ अत्यन्त भयानक रूपवाले यमदूत उसे कालपाशमें बाँधकर ले जाते हैं और यातना भोगनेके भयावह स्थानस्वरूप तामिस्त्र नामक नरकमें गिरा देते हैं ॥ ३ ॥
३ हाथमें रस्सी लिये हुए यमदूत उस प्राणीको पीटते हैं, तरह- तरहके दण्ड देते हैं और उसे डराते हैं । इस प्रकार वह जीव महान् क्लेश पाता है । ४ नारद! वह नारकी विवश होकर एकाएक मूर्च्छित हो जाता है ॥ ४३ ॥
इसी प्रकार जो व्यक्ति किसीके पतिको धोखा ५ देकर उसकी स्त्रीके साथ भोग करता है, वह यमदूतोंके द्वारा अन्धतामिस्त्र नामक नरकमें गिराया ६ जाता है; जहाँ गिराये जाते हुए जीवको असह्य वेदना होती है । वह दृष्टिहीन हो जाता है, उसकी बुद्धि नष्ट हो जाती है और वह शीघ्र ही जड़से कटे हुए वृक्षकी ७ भाँति नरकमें गिर पड़ता है । इसीलिये प्राचीन पुरुषोंने इसे अन्धतामिस्र नामकी संज्ञा दी है ॥ ५–७३ ॥ यह शरीर ही मैं हूँ और ये [ धन, स्त्री, पुत्रादि ] ८ मेरे हैं - ऐसा सोचकर जो अन्य प्राणियोंसे द्रोह करता हुआ केवल अपने परिवारके भरण - पोषणमें प्रतिदिन लगा रहता है, वह स्वार्थलोलुप प्राणी शरीर ९ छोड़कर अपने अशुभ कर्मोंके प्रभावसे जीवोंको अत्यधिक भय देनेवाले इस रौरव नामक नरक में गिरता है; और इस व्यक्तिके द्वारा जिन जन्तुओंकी १० पहले इस जगत्में हिंसा हुई रहती है, वे प्राणी भयंकर रुरु नामक जन्तु बनकर उसे यहाँ कष्ट देते हैं । इसीलिये पुराणवेत्ता मनीषी इसे रौरव नरक कहते हैं । ११ पुरातन पुरुषोंने इस रुरु नामक जन्तुको सर्पसे भी अधिक क्रूर बतलाया है ॥ ८–११३ ॥
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अ ० २२ ] एवं महारौरवाख्यो नरको यत्र पूरुषः ॥
यातनां प्राप्यमाणो हि यः परं देहसम्भवः ।
क्रव्यादा नाम रुरवस्तं क्रव्ये घातयन्ति च ॥
य उग्रः पुरुषः क्रूरः पशुपक्षिगणानपि ।
उपरन्धयते मूढो याम्यास्तं रन्धयन्ति च ॥
कुम्भीपाके तप्ततैले उपर्यपि च नारद ।
यावन्ति पशुरोमाणि तावद्वर्षसहस्रकम् ॥
पितृविप्रब्राह्मणधुक्कालसूत्रे स नारके ।
अग्न्यर्काभ्यां तप्यमाने नारकी विनिवेशितः ॥
क्षुत्पिपासादह्यमानोऽन्तः शरीरस्तथा बहिः । आस्ते शेते चेष्टते चावतिष्ठति च धावति निजवेदपथाद्यो वै पाखण्डं चोपयाति च । अनापद्यपि देवर्षे तं पापं पुरुषं भटाः
असिपत्रवनं नाम नरकं वेशयन्ति च ।
कशया प्रहरन्त्येव नारकी तद्गतस्तदा ॥
इतस्ततो धावमान उत्तालमतिवेगतः । असिपत्रैश्छिद्यमान उभयत्र च धारभिः संछिद्यमानसर्वाङ्गो हाहतोऽस्मीति मूर्च्छितः वेदनां परमां प्राप्तः पतत्येव पदे पदे स्वधर्मानुगतं भुङ्क्ते पाखण्डफलमल्पधीः यो राजा राजपुरुषो दण्डयेद्वै त्वधर्मतः द्विजे शरीरदण्डं च पापीयान्नारकी च सः अष्टम स्कन्ध २७७ १२ इसी प्रकार महारौरव नामक नरक भी है, जहाँ यातना पानेके लिये प्राणी दूसरा सूक्ष्म शरीर धारण करके जाता है । वहाँ कच्चा मांस खानेवाले रुरु १३ नामक जन्तु उस जीवके मांसपर चोट पहुँचाते रहते हैं ॥ १२-१३ ॥ हे नारद! जो अत्यन्त क्रोधी, निर्दयी तथा मूर्ख पुरुष पशु - पक्षियोंको मारकर उनका मांस पकाता है, १४ यमराजके दूत उसे कुम्भीपाक नरकमें खौलते हुए तेलमें डालकर उस पशुके शरीरमें जितने रोम होते हैं, उतने हजार वर्षोंतक पकाते हैं । १४-१५ ॥ १५ जो पिता, विप्र तथा ब्राह्मणसे द्रोह करता है, वह नारकी मनुष्य अग्नि तथा सूर्यसे सदा तप्त रहनेवाले कालसूत्र नामक नरकमें डाला जाता है । १६ वहाँपर भूख और प्याससे पीड़ित हो जाता है और भीतर तथा बाहरसे जलते हुए शरीरवाला वह प्राणी व्याकुल होकर कभी बैठता है, कभी सोता है, कभी ॥ १७ नानाविध चेष्टाएँ करता है, कभी उठकर खड़ा हो जाता है और कभी दौड़ने लगता है ॥ १६ - १७ ॥ हे देवर्षे! विपत्तिका समय न रहनेपर भी जो अपने वेदविहित मार्गसे हटकर पाखण्डका आश्रय ॥ १८ लेता है, उस पापी पुरुषको यमदूत असिपत्रवन नामक नरकमें डाल देते हैं । जब वे उसके ऊपर कोड़ेसे प्रहार करते हैं, तब वहाँ डाला गया वह नारकी जीव १ ९ उतावला होकर अत्यन्त वेगसे इधर - उधर भागने लगता है, जिससे दोनों ओर तीखी धारोंवाले असिपत्रोंसे उसका शरीर छिद जाता है । छिदे हुए सभी अंगोंवाला ॥ २० वह जीव ' हाय मैं मारा गया ' – ऐसा कहते हुए मूच्छित हो जाता है । इस प्रकार वह अल्पबुद्धि प्राणी । वहाँ असीम कष्ट भोगते हुए पद - पदपर गिरता है ॥ २१ और अपने किये हुए कर्मके अनुसार उस पाखण्डका फल भोगता है ॥ १८–२१३ ॥ । जो राजा अथवा राजपुरुष अधर्मका सहारा लेकर प्रजाको दण्डित करता है और ब्राह्मणको ॥ २२ शारीरिक दण्ड देता है, वह नारकी तथा महापापी मनुष्य यमदूतोंके द्वारा सूकरमुख नामक नरकमें । गिराया जाता है । वहाँपर बलवान् यमदूतोंके द्वारा नरके सूकरमुखे पात्यते यमकिङ्करैः ॥ २३ | ईखकी भाँति पेरा जाता हुआ वह जीव सभी अंगोंके
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२७८ विनिष्पिष्टावयवको बलवद्भिस्तथेक्षुवत् आर्तस्वरेण स्वनयन्मूर्च्छितः कश्मलङ्गतः स पीड्यमानो बहुधा वेदनां यात्यतीव हि विविक्तपरपीडो योऽप्यविविक्तपरव्यथाम् ईश्वराङ्कितवृत्तीनां व्यथामाचरते स्वयम् । स चान्धकूपे पतति तदभिद्रोहयन्त्रिते तत्रासौ जन्तुभिः क्रूरैः पशुभिर्मृगपक्षिभिः सरीसृपैश्च मशकैर्यूकामत्कुणजातिभिः मक्षिकाभिश्च तमसि दन्दशूकैश्च पीड्यते श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २२ । पिस जानेसे वेदनाके कारण आर्तस्वर करता हुआ ॥ २४ मूच्छित हो जाता है और महान् क्लेश प्राप्त करता है । इस प्रकार अनेक प्रकारसे पीड़ित होता हुआ जीव । बहुत पीड़ा पाता है ॥ २२ - २४३ ॥ ॥ २५ जो पुरुष इस लोकमें खटमल आदि जीवोंकी हिंसा करता है, वह उनसे द्रोह करनेके कारण अन्धकूप नामक नरकमें गिरता है; क्योंकि स्वयं परमात्माने ही ॥ २६ । रक्तपानादि उनकी वृत्ति बना दी है और उसके कारण उन्हें दूसरोंको कष्ट पहुँचानेका ज्ञान भी नहीं है, किंतु । ईश्वरके द्वारा विधि - निषेधपूर्वक बनायी गयी वृत्तियोंवाले ॥ २७ मनुष्योंको दूसरोंके कष्टका ज्ञान है । इसीलिये वह प्राणी पशु, पक्षी, मृग, सर्प, मच्छर, जूँ, खटमल मक्खी, । दन्दशूक आदि क्रूर जन्तुओंके द्वारा अन्धकूप नरकमें परिक्रामति चैवात्र कुशरीरे च जन्तुवत् ॥ २८ पीडित किया जाता है । वह प्राणी भयानक रोगसे
यस्तु संविहितैः पञ्चयज्ञैः काकैश्च संस्तुतः ।
अश्नाति चासंविभज्य यत्किञ्चिदुपपद्यते ॥
स पापपुरुषः क्रूरैर्याम्यैश्च कृमिभोजने नरकाधमके दुष्टकर्मणा परिपात्यते लक्षयोजनविस्तीर्णे कृमिकुण्डे भयङ्करे कृमिरूपं समासाद्य भक्ष्यमाणश्च तैः स्वयम् अप्रत्ताप्रहुतादो यः पातमाप्नोति तत्र वै यस्तु स्तेयेन च बलाद्धिरण्यं रत्नमेव च ब्राह्मणस्यापहरति अन्यस्यापि च कस्यचित् अनापदि च देवर्षे तममुत्र यमानुगाः अयस्मयैरग्निपिण्डैः सदृशैर्निष्कुषन्ति च योऽगम्यां योषितं गच्छेदगम्यं पुरुषं च या तावमुत्रापि कशया ताडयन्तो यमानुगाः तिग्मया लोहमय्या च सूर्यायालिङ्गयन्ति तम् तां चापि योषितं सूर्म्यालिङ्गयन्ति यमानुगाः ग्रस्त शरीरमें रहनेवाले जीवकी भाँति व्यथित होकर इस नरकमें चक्कर काटता रहता है । २५–२८ ॥ २ ९ जो कुछ भी धन आदि प्राप्त हो उसे शास्त्रविहित पंचयज्ञोंमें विभक्त किये बिना ही जो भोजन करता है, । उसे काकतुल्य समझना चाहिये । यमराजके अत्यन्त ॥ ३० निर्मम दूत उस पापी पुरुषको उसके दुष्कर्मोंके फलस्वरूप कृमिभोजन नामक अधम नरकमें गिराते । हैं । इस प्रकार जो अतिथियोंको दिये बिना ही भोजन ॥ ३१ करता है । वह एक लाख योजन विस्तारवाले भयंकर । कृमिकुण्डमें कीड़ा होकर नरकके कीड़ोंद्वारा खाया जाता हुआ वहीं पड़ा रहता है ॥ २ ९ - ३१३ ॥ ॥ ३२ हे देवर्षे! विपत्तिकाल न होनेपर भी जो प्राणी । ब्राह्मण अथवा अन्य किसी भी वर्णके लोगोंसे चोरी से या बलात् स्वर्ण या रत्न छीन लेता है, उसे मरनेपर ॥ ३३ यमराजके दूत संदंश नामक नरकमें गिराते हैं और अग्निके समान सन्तप्त लोहपिण्डोंसे उसे दागते हैं । तथा संड़सीसे उसकी खाल नोचते हैं ॥ ३२-३३३ ॥ ॥ ३४ जो पुरुष अगम्या स्त्रीके साथ अथवा जो स्त्री अगम्य पुरुषके साथ समागम करती है, उन्हें यमदूत । तप्तसूर्मि ( मूर्ति ) नामक नरकमें गिराकर कोड़ेसे ॥ ३५ पीटते हैं । पुनः वे यमदूत लोहेकी बनी प्रज्वलित स्त्रीमूर्तिसे पुरुषको तथा लौहनिर्मित जलती हुई । पुरुषमूर्तिसे स्त्रीको आलिंगित कराते हैं ॥ ३४-३५३ ॥
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अ ० २२ ] यस्तु सर्वाभिगमनः पुरुषः पापसञ्चयी ॥
निरयेऽमुत्र तं याम्याः शाल्मलीं रोपयन्ति तम् ।
वज्रकण्टकसंयुक्तां शाल्मलीं तामयस्मयीम् ॥
राजन्या राजपुरुषा ये वा पाखण्डवर्तिनः ।
धर्मसेतुं विभिन्दन्ति ते परेत्य गता नराः ॥
वैतरण्यां पतन्त्येव भिन्नमर्यादपातकाः ।
नद्यां निरयदुर्गस्य परिखायां च नारद ॥
यादोगणैः: समन्तात्तु भक्ष्यमाणा इतस्ततः ।
नात्मना वियुजन्त्येव नासुभिश्चापि नारद ॥
स्वीयेन कर्मपाकेनोपतपन्ति च सर्वतः ।
विण्मूत्रपूयरक्तैश्च केशास्थिनखमांसकैः ॥
मेदोवसासंयुतायां नद्यामुपपतन्ति ते ।
वृषलीपतयो ये च नष्टशौचा गतत्रपाः ॥
आचारनियमैस्त्यक्ताः पशुचर्यापरायणाः ।
तेऽत्रानुकष्टगतयो विण्मूत्रश्लेष्मरक्तकैः ॥
श्लेष्ममलसमापूर्णे निपतन्ति दुराग्रहाः । तदेव खादयन्त्येतान्यमानुचरवर्गकाः ये श्वान गर्दभादीनां पतयो वै द्विजातयः । मृगयारसिका नित्यमतीर्थे मृगघातकाः परेतांस्तान्यमभटा लक्षीभूतान्नराधमान् इषुभिश्च विभिन्दन्ति तांस्तान्दुर्नयमागतान् ये दम्भा दम्भयज्ञेषु पशून्घ्नन्ति नराधमाः तानमुष्मिन्यमभटा नरके वैशसे तदा निपात्य पीडयन्त्येव कशाघातैर्दुरासदैः यो भार्यां च सवर्णां वै द्विजो मदनमोहितः रेतः पाययति मूढोऽमुत्र तं यमकिङ्कराः रेतःकुण्डे पातयन्ति रेतः सम्पाययन्ति च अष्टम स्कन्ध २७ ९ ३६ जो घोर पापी मनुष्य जिस किसीके साथ व्यभिचार करता है, उसके मरनेपर यमराजके दूत उसे शाल्मली नामक नरकमें वज्रके समान कठोर ३७ काँटोंवाले उस लोहमय शाल्मली ( सेमर ) -के वृक्षपर चढ़ाते हैं ॥ ३६-३७ ॥। जो राजा या राजपुरुष पाखण्डी बनकर धर्मकी ३८ मर्यादाको तोड़ते हैं, वे इस मर्यादाभंगरूपी पापके कारण मरनेपर वैतरणी नामक नरकमें गिरते हैं । हे नारद! नरकरूपी दुर्गकी खाईके समान प्रतीत होनेवाली ३ ९ उस वैतरणी नदीमें रहनेवाले जीव - जन्तु उन्हें चारों ओरसे काटते हैं और वे व्याकुल होकर इधर - उधर भागते रहते हैं । हे नारद! उनका शरीर नहीं छूटता ४० तथा उनके प्राण भी नहीं निकलते और वे अपने पापकर्मके कारण सदा सन्तप्त रहते हैं | मल, मूत्र, ४१ पी, रक्त, केश, अस्थि, नख, चर्बी, मांस और मज्जा आदिसे भरी पड़ी उस नदीमें गिरे हुए वे छटपटाते रहते हैं ॥ ३८-४१३ ॥ ४२ जो लोग सदाचारके नियमोंसे विमुख तथा शौचाचारसे रहित होकर शूद्राओंके पति बन जाते हैं और निर्लज्जतापूर्वक पशुवत् आचरण करते हैं, उन्हें ४३ अत्यन्त कष्टप्रद गतियाँ प्राप्त होती हैं । यमराजके दुराग्रही दूत उन्हें विष्ठा, मूत्र, कफ, रक्त और मलसे युक्त पूयोद नामक नरकमें गिराते हैं; जहाँ ये पापी ॥ ४४ इन्हीं वस्तुओंको खाते हैं ॥ ४२-४४ ॥ द्वाणि कुत्ते और गधे आदिको पालते हैं, आखेट करनेमें सदा रुचि रखते हैं तथा शास्त्रके विपरीत ॥ ४५ मृगोंका वध करते हैं; उन दुर्नीतिपूर्ण आचरणवाले अधम प्राणियोंको मरणोपरान्त यमदूत [ प्राणरोध नामक नरकमें । गिराकर ] लक्ष्य बनाकर बाणोंसे बेधते हैं ॥ ४५-४६ ॥ ॥ ४६ जो दम्भी और मनुष्योंमें अधम लोग अभिमानपूर्वक । यज्ञोंका आयोजन करके उसमें पशुओंकी हिंसा करते ॥ ४७ हैं, उन्हें इस लोकसे जानेपर यमदूत विशसन नामक नरकमें गिराकर कोड़ोंके असहनीय प्रहारसे उनको । अत्यधिक पीडा पहुँचाते हैं ॥ ४७३२३ ॥
॥ ४८ जो मूर्ख द्विज कामसे मोहित होकर सवर्णा भार्याको वीर्यपान कराता है, यमके दूत उसे वीर्य । कुण्डमें [ लालाभक्ष नामक नरकमें ] गिराते हैं और ॥ ४ ९ । वीर्य ही पिलाते हैं ॥ ४८-४९ ॥
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२८० ये दस्यवोऽग्निदाश्चैव गरदाः सार्थघातकाः ग्रामान्सार्थान्विलुम्पन्ति राजानो राजपूरुषाः तान्परेतान्यमभटा नयन्ति श्वानकादनम् । विंशत्यधिकसंख्याताः सारमेया महाद्भुताः सप्तशत्या समाख्याता रभसं खादयन्ति ते ।
सारमेयादनं नाम नरकं दारुणं मुने ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि अवीचिप्रमुखान्मुने ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २३ । जो चोर, राजा अथवा राजपुरुष आग लगाते हैं, ॥ ५० विष देते हैं, दूसरोंकी सम्पत्ति नष्ट करते हैं, गाँवों तथा धनिकोंको लूटते हैं, उनके मरनेपर यमराजके दूत उन्हें सारमेयादन नामक नरकमें ले जाते हैं । वहाँ ॥ ५१ सात सौ बीस अत्यन्त विचित्र सारमेय ( कुत्ते ) बताये गये हैं । वे बड़े वेगसे उन्हें नोच - नोचकर खाते हैं । हे मुने! वह सारमेयादन नामक नरक बड़ा ही भयानक है । हे मुने! अब इसके पश्चात् मैं अवीचि आदि ५२ । प्रमुख नरकोंका वर्णन करूँगा ॥५०–५२ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामष्टमस्कन्धे नरकप्रदपातकवर्णनं नाम द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥
अथ त्रयोविंशोऽध्यायः नरक प्रदान करनेवाले श्रीनारायण उवाच
ये नराः सर्वदा साक्ष्ये अनृतं भाषयन्ति च ।
दाने विनिमयेऽर्थस्य देवर्षे पापबुद्धयः ॥ १
ते त्यामुत्र नरके अवीच्याख्येऽतिदारुणे ।
योजनानां शतोच्छ्रायागिरिमूर्धः पतन्ति हि ॥ २
अनाकाशेऽधःशिरसस्तदवीचीतिनामके 1 यत्र स्थलं दृश्यते च जलवद्वीचिसंयुतम् ॥ ३
अवीचिमत्ततस्तत्र तिलशश्छिन्नविग्रहः ।
म्रियते नैव देवर्षे पुनरेवाऽवरोप्यते ॥ ४
यो वा द्विजो वा राजन्यो वैश्यो वा ब्रह्मसम्भव ।
सोमपीथस्तत्कलत्रं सुरां वा पिबतीव हि ॥ ५
प्रमादतस्तु तेषां वै निरये परिपातनम् ।
कुर्वन्ति यमदूतास्ते पानं कार्ष्णायसो मुने ॥
वह्निना द्रवमाणस्य नितरां ब्रह्मसम्भव । विभिन्न पापोंका वर्णन श्रीनारायण बोले – हे देवर्षे! जो दान और धनके आदान - प्रदानमें साक्षी बनकर सदा झूठ बोलते हैं, वे पापबुद्धि मनुष्य मरनेपर सौ योजन ऊँचे पर्वत शिखरसे अवीचि नामक परम भयंकर नरमें गिरते हैं ॥ १-२ ॥ इस अवीचि नामक आधारशून्य नरकमें प्राणियोंको नीचा सिर किये हुए गिरना पड़ता है, जहाँ स्थलभाग लहरयुक्त जलकी भाँति दिखायी पड़ता है । 1 इसीलिये इसे अवीचि कहते हैं । हे देवर्षे! वहाँ पत्थर - ही - पत्थर बिछे रहते हैं । उनपर गिरनेसे प्राणियोंका शरीर तिल - तिल करके कट जाता है । वे मरते भी नहीं और उसीमें उन्हें बार- बार गिराया जाता है॥३-४ ॥ हे ब्रह्मपुत्र! जो ब्राह्मण अथवा ब्राह्मणी अथवा व्रतमें स्थित अन्य कोई भी प्रमादवश मद्यपान करता है तथा जो क्षत्रिय या वैश्य सोमपान * करता है, उसका अय: पान नामक नरकमें पतन होता है । हे मुने! हे ब्रह्मापुत्र! यमराजके दूत वहाँपर उन्हें आगसे अत्यन्त सन्तप्त तथा पिघला हुआ लोहा पिलाते हैं ॥ ५- ५-६३ ॥ * क्षत्रियों एवं वैश्योंके लिये शास्त्रमें सोमपानका निषेध है ।
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अ ० २३ ] अष्टम सम्भावनेन स्वस्यैव योऽधमोऽपि नराधमः ॥ ७
विद्याजन्मतपोवर्णाश्रमाचारवतो नरान् ।
वरीयसोऽपि न बहु मन्यते पुरुषाधमः ॥ ८
स नीयते यमभटैः क्षारकर्दमनामके ।
निरयेऽर्वाक्शिरा घोरा दुरन्तयातनाश्नुते ॥
ये वै नरा यजन्त्यन्यं नरमेधेन मोहिताः ।
स्त्रियोऽपि वा नरपशुं खादन्त्यत्र महामुने ॥ १०
पशवो निहितास्ते तु यमसद्मनि सङ्गताः ।
सौनिका इव ते सर्वे विदार्य शितधारया ॥ ११
असृक्पिबन्ति नृत्यन्ति गायन्ति बहुधा मुने ।
यथेह मांसभोक्तारः पुरुषादा दुरासदाः ॥ १२
अनागसोऽपि येऽरण्ये ग्रामे वा ब्रह्मपुत्रक ।
वैश्रम्भकैरुपसृतान्विश्रम्भय्यजिजीविषून् ॥ १३
शूलसूत्रादिषु प्रोतान्क्रीडनोत्कारकानिव ।
पातयन्ति च ते प्रेत्य शूलपाते पतन्ति ह ॥ १४
शूलादिषु प्रोतदेहाः क्षुत्तृड्भ्यां चातिपीडिताः ।
तिग्मतुण्डैः कङ्कबकैरितश्चेतश्च ताडिताः ॥ १५
पीडिता आत्मशमलं बहुधा संस्मरन्ति हि ।
ये भूतानुद्वेजयन्ति नरा उल्बणवृत्तयः ॥ १६
यथा सर्पादिकास्तेऽपि नरके निपतन्ति हि ।
दन्दशूकाभिधाने च यत्रोत्तिष्ठन्ति सर्वतः ॥ १७
पञ्चाननः सप्तमुखा ग्रसन्ति नरकागतान् ।
यथा बिलेशया विप्र क्रूरबुद्धिसमन्विताः ॥ १८ ।
स्कन्ध २८१ हे मुने! जो नराधम स्वयं निम्न श्रेणीमें उत्पन्न हुआ है, किंतु अभिमानवश विद्या, जन्म, तप, आचार, वर्ण या आश्रममें अपनेसे श्रेष्ठ पुरुषोंका यथोचित सम्मान नहीं करता; वह महान् अधम मनुष्य यमदूतोंके द्वारा क्षारकर्दम नामक नरकमें सिर नीचा किये हुए ले जाया जाता है; वहाँपर वह घोर कष्टप्रद यातनाएँ भोगता है ॥७ – ९ ॥ हे महामुने! जो मनुष्य मोहग्रस्त होकर नरमेधके द्वारा अन्य [ यक्ष, राक्षस आदि ] - का पूजन करते हैं अथवा जो स्त्रियाँ भी नरपशुका मांस खाती हैं; वे रक्षोगणसम्भोज नामक नरकमें गिरते हैं । उनके द्वारा इस लोकमें मारे गये वे पशु यमपुरीमें पहलेसे ही कसाईके रूपमें विद्यमान रहते हैं । हे मुने! जिस प्रकार इस लोकमें पशुओंका मांस खानेवाले पुरुष आनन्दित होते हैं, उसी प्रकार वे पशु भी निर्मम कसाईका रूप धारणकर तेज धारवाले अस्त्रसे उनके शरीरको काटकर उससे निकले रक्तको पीते हैं और अनेक प्रकारसे नाचते तथा गाते हैं ॥ १०–१२ ॥ हे ब्रह्मपुत्र! जो लोग ग्राममें अथवा जंगलमें रहनेवाले निरपराध प्राणियोंको - जो जीनेकी इच्छा रखते हैं - उन्हें विविध उपायोंसे विश्वासमें लेकर तथा फुसलाकर अपने पास बुला लेते हैं और अपने मनोरंजनके लिये उनके शरीरमें काँटे चुभाकर अथवा रस्सी आदिमें बाँधकर पीड़ा पहुँचाते हैं, वे मरनेपर शूलपात ( शूलप्रोत ) नामक नरकमें गिरते हैं । उनके शरीरमें शूल आदि चुभाये जाते हैं, वे भूख तथा प्याससे अत्यन्त पीड़ित होते हैं और तीखी चोंचवाले कंक, बक आदि पक्षी उन्हें जहाँ - तहाँ नोचते हैं । उस समय कष्ट भोग रहे वे प्राणी अपने पूर्वकृत पापोंका बार - बार स्मरण करते हैं॥१३–१५३ ॥ हे विप्र! उग्र स्वभाववाले जो मनुष्य सर्पोंकी भाँति प्राणियोंको उद्विग्न करते हैं, वे मरणोपरान्त दन्दशूक नामक नरकमें पड़ते हैं, जहाँपर पाँच तथा सात मुखोंवाले क्रूरस्वभाव सर्प मरनेके बाद इस नरकमें पहुँचे हुए प्राणियोंको चूहेकी भाँति निगल जाते हैं ॥ १६-१८ ॥